Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

*इंदिरा गांधी के जमाने की एक सच्ची बात मिली है जो अभी तक हम इस से रूबरू नहीं थे।*
*जो आप तक पहुंचा रहे हैं, आशा है आप इसे पढ़ेंगे।* 👇🏻

*गुरुकुल घरोंदा के एक आचार्य जनसंघ के टिकट पर सांसद बन गए, तो उन्होंने सरकारी आवास नहीं लिया । वे दिल्ली के बाजार सीताराम, दिल्ली-6 के आर्य समाज मंदिर में ही रहते थे । वहाँ से संसद तक पैदल जाया करते थे कार्रवाई में भाग लेने।*

*वे ऐसे पहले सांसद थे, जो हर सवाल पूछने से पहले संसद में एक वेद मंत्र बोला करते थे। वे सब वेदमंत्र संसद की कार्रवाई के रिकार्ड में देखे जा सकते हैं। उन्होंने एक बार संसद का घेराव भी किया था, गोहत्या पर बंदी के लिए ।*

*एक बार इंदिरा गांधी ने किसी मीटिंग में उन स्वामी जी को पांच सितारा होटल में बुलाया। वहां जब लंच चलने लगा तो सभी लोग बुफे काउंटर की ओर चल दिये । स्वामी ही वहां नही गए । उन्होंने अपनी जेब से लपेटी हुई बाजरे की सूखी दो रोटी निकाली और बुफे काउंटर से दूर जमीन पर बैठकर खाने लगे।*

*इंदिरा जी ने कहा – “आप क्या करते हैं ? क्या यहां खाना नहीं मिलता ? ये सभी पांच सितारा व्यवस्थाएं आप सांसदों के लिए ही तो की गई है ।”*

*तो वे बोले – “मैं संन्यासी हूं। सुबह भिक्षा में किसी ने यही रोटियां दी थी । मैं सरकारी धन से रोटी भला कैसे खा सकता हूं।”*

*इंदिरा जी का धन्यवाद देते हुए होटल में उन्होंने इंदिरा से एक गिलास पानी और आम के अचार की एक फांक ली थी, जिसका भुगतान भी उन्होंने इंदिरा जी के मना करने के बावजूद किया था !*

*जानते हैं यह महान सांसद और संन्यासी कौन थे?*

*ये थे सन्यासी स्वामी रामेश्वरानंद जी, परम गौ भक्त,अद्वितीय व्यक्तित्व के स्वामी जी, स्वामी जी हरियाणा के करनाल से सांसद थे।*

*ऐसे अनेकों साधक हुए इस देव भूमि भारत पर, लेकिन  शायद हमें पढ़ाया ही नहीं गया। कभी मौका लगे तो आप भी अवश्य जानिए ऐसे व्यक्तित्वों को, भारत को तपस्वियों का देश ऐसे ही नहीं कहा जाता।*

*ऐसे महान व्यक्तियों का कहीं भी और कभी भी जिक्र नहीं किया जाता*

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Posted in हिन्दू पतन

जिन लोगों को इस्लाम की गंदी और डरावनी हकीकत पता नहीं है उन्हें बटवारे के समय पाकिस्तान से भारत आए भीष्म साहनी के द्वारा आंखों देखा मंजर जो उन्होंने अपने तमाम उपन्यास और किताबों में कहानियों में लिखा है वह पढ़ना चाहिए…गजवा-ए-हिन्द कोई कोरी कल्पना नही है

भीष्म साहनी और उनके भाई बलराज साहनी किसी तरह सब कुछ अपना गवा कर भारत आ गए भीष्म साहनी उस जमाने में आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक थे और उस समय ऑल इंडिया रेडियो का हेड क्वार्टर लाहौर में था बाद में वह दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गए और उनके भाई बलराज साहनी मुंबई में अभिनेता बन गए

आप भी पढ़िए उनकी कहानी अमृतसर आ गया है के कुछ हिस्से

पहली ट्रेन पाकिस्तान से (15.8.1947)

अमृतसर का लाल इंटो वाला रेलवे स्टेशन अच्छा खासा शरणार्थियों कैम्प बना हुआ था!पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से से भागकर आये हुए हज़ारों हिन्दुओ-सिखों को यहाँ से दूसरे ठिकानों पर भेजा जाता था ! वे धर्मशालाओं में, टिकट की खिड़की के पास, प्लेट फार्मों पर भीड़ लगाये अपने खोये हुए मित्रों और रिश्तेदारों को हर आने वाली गाड़ी मै खोजते थे…15 अगस्त 1947 को तीसरे पहर के बाद स्टेशन मास्टर छैनी सिंह अपनी नीली टोपी और हाथ में सधी हुई लाल झंडी का सारा रौब दिखाते हुए पागलों की तरह रोती-बिलखती भीड़ को चीरकर आगे बढे…थोड़ी ही देर में 10 डाउन,पंजाब मेल के पहुँचने पर जो द्रश्य सामने आने वाला था,उसके लिये वे पूरी तरह तैयार थे….मर्द और औरतें थर्ड क्लास के धूल से भरे पीले रंग के डिब्बों की और झपट पडेंगे और बौखलाए हुए उस भीड़ में किसी ऐसे बच्चे को खोजेंगे, जिसे भागने की जल्दी में पीछे छोड़ आये थे ! चिल्ला चिल्ला कर लोगों के नाम पुकारेंगे और व्यथा और उन्माद से विहल होकर भीड़ में एक दूसरे को ढकेलकर-रौंदकर आगे बढ़ जाने का प्रयास करेंगे ! आँखो में आँसू भरे हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक भाग भाग कर अपने किसी खोये हुए रिश्तेदार का नाम पुकारेंगे! अपने गाँव के किसी आदमी को खोजेंगे कि शायद कोई समाचार लाया हो ! आवश्यक सामग्री के ढेर पर बैठा कोई माँ बाप से बिछडा हुआ कोई बच्चा रो रह होगा, इस भगदड़ के दौरान पैदा होने वाले किसी बच्चे को उसकी माँ इस भीड़-भाड़ के बीच अपना ढूध पिलाने की कोशिश कर रही होगी….
स्टेशन मास्टर ने प्लेट फार्म एक सिरे पर खड़े होकर लाल झंडी दिखा ट्रेन रुकवाई ….जैसे ही वह फौलादी दैत्याकार गाड़ी रुकी, छैनी सिंह ने एक विचित्र द्रश्य देखा..चार हथियार बंद सिपाही, उदास चेहरे वाले इंजन ड्राइवर के पास अपनी बंदूकें सम्भाले खड़े थे !! जब भाप की सीटी और ब्रेको के रगड़ने की कर्कश आवाज बंद हुई तो स्टेशन मास्टर को लगा की कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है…प्लेट फार्म पर खचाखच भरी भीड़ को मानो साँप सुंघ गया हो..उनकी आँखो के सामने जो द्रश्य था उसे देखकर वह सन्नाटे में आ गये थे !

स्टेशन मास्टर छेनी सिंह आठ डिब्बों की लाहौर से आई उस गाड़ी को आँखे फाड़े घूर रहे थे! हर डिब्बे की सारी खिड़कियां खुली हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के पास कोई चेहरा झाँकता हुआ दिखाई नहीँ दे रहा था, एक भी दरवाजा नहीँ खुला.. एक भी आदमी नीचे नहीँ उतरा,उस गाड़ी में इंसान नहीँ #भूत आये थे..स्टेशन मास्टर ने आगे बढ़कर एक झटके के साथ पहले डिब्बे के द्वार खोला और अंदर गये..एक सेकिंड में उनकी समझ में आ गया कि उस रात न.10 डाउन पंजाब मेल से एक भी शरणार्थी क्यों नही उतरा था..वह भूतों की नहीँ बल्कि #लाशों की गाड़ी थी..उनके सामने डिब्बे के फर्श पर इंसानी कटे-फटे जिस्मों का ढेर लगा हुआ था..किसी का गला कटा हुआ था.किसी की खोपडी चकनाचूर थी ! किसी की आते बाहर निकल आई थी…डिब्बों के आने जाने वाले रास्ते मे कटे हुए हाथ-टांगे और धड़ इधर उधर बिखरे पड़े थे..इंसानों के उस भयानक ढेर के बीच से छैनी सिंह को अचानक किसी की घुटी.घुटी आवाज सुनाई दी ! यह सोचकर की उनमें से शायद कोई जिन्दा बच गया हो उन्होने जोर से आवाज़ लगाई..”अमृतसर आ गया है यहाँ सब हिंदू और सिख है.पुलिस मौजूद है, डरो नहीँ”..उनके ये शब्द सुनकर कुछ मुरदे हिलने डुलने लगे..इसके बाद छैनी सिंह ने जो द्रश्य देखा वह उनके दिमाग पर एक भयानक स्वप्न की तरह हमेशा के लिये अंकित हो गया …एक स्त्री ने अपने पास पड़ा हुआ अपने पति का ‘कटा सर’ उठाया और उसे अपने सीने से दबोच कर चीखें मारकर रोने लगी…उन्होंने बच्चों को अपनी मरी हुई माओ के सीने से चिपट्कर रोते बिलखते देखा..कोई मर्द लाशों के ढेर में से किसी बच्चे की लाश निकालकर उसे फटी फटी आँखों से देख रहा था..जब प्लेट फार्म पर जमा भीड़ को आभास हुआ कि हुआ क्या है तो उन्माद की लहर दौड़ गयी…स्टेशन मास्टर का सारा शरीर सुन्न पड़ गया था वह लाशों की कतारो के बीच गुजर रहा था…हर डिब्बे में यही द्रश्य था अंतिम डिब्बे तक पहुँचते पहुँचते उसे मतली होने लगी और जब वह ट्रेन से उतरा तो उसका सर चकरा रहा था उनकी नाक में मौत की बदबू बसी हुई थी और वह सोच रहे थे की रब ने यह सब कुछ होने कैसे दिया ? मुस्लिम कौम इतनी निर्दयी हो सकती है कोई सोच भी नहीँ सकता था….उन्होने पीछे मुड़कर एक बार फ़िर ट्रेन पर नज़र डाली…हत्यारों ने अपना परिचय देने के लिये अंतिम डिब्बे पर मोटे मोटे सफेद अक्षरों से लिखा था…..”यह पटेल और नेहरू को हमारी ओर से आज़ादी का नज़राना है ” !

तो यह है वह ‘गज़वा ए हिन्द’ का सच जो कांग्रेसियों व सेकुलर गिरोह ने हिन्दुओ के सामने कभी आने नही दिया..

Posted in PM Narendra Modi

👇🏿”तुलनात्मक अध्ययन”👇🏿

👉🏿 एक समय था कि अफगानिस्तान में बौद्ध मंदिरों को तोपों से उड़ा दिया गया था और आज वहां के राष्ट्रपति हमारे मुल्क के इतने पक्के दोस्त हैं कि हमारे देश पर आतंकवादी हमला हुआ तो उन्होंने दक्षेस सम्मलेन में पाक जाने से मना कर दिया

👉🏿 एक समय था जब ईरान हमारी एक नहीं सुनता था, आज उन्हीने भारत को *चाबहार* बंदरगाह बनाने और ईरान में अपनी फौजें रखने की इज़ाज़त दे दी

👉🏿 एक समय था कि नार्थ ईस्ट में terrorists हमला करके म्यांमार भाग जाते थे आज वहां की सरकार के सहयोग से इंडियन आर्मी ने वहीँ जा के उनके terrorist camps तबाह कर दिए

👉🏿 एक समय था जब खाड़ी देश पाक का साथ देते थे दाऊद बरसों तक दुबई में शरण लिए रहा आज सऊदी अरब ने दाऊद की संपत्ति ही जब्त कर ली

👉🏿 एक समय था जब खाड़ी देश भारत को कमजोर और गरीब समझते थे, आज अचानक क्या हुआ जो उन्हीने भारत के PM के आगमन पे अपने यहाँ पहला हिन्दू मंदिर बनाने के लिए जमीन दे दी

👉🏿 आज अचानक क्या हुआ जो बुर्ज खलीफा तिरंगे में रंगा दिखने लगा

👉🏿 आज अचानक क्या हुआ जो हमारी 26 जनवरी की परेड में UAE का फौजी दस्ता शामिल हुआ

👉🏿 आज अचानक क्या हुआ जो भारत में इतनी हिम्मत आ गयी कि चीन के अरुणांचल के बॉर्डर में सड़कें बना ली, हवाई पट्टी बना ली, 100 मिसाइल भी तैनात  कर दिए और टैंक की डीवीजन पोस्ट कर दी

👉🏿 आज अचानक क्या हुआ जो USA के नवनिर्वाचित प्रेजिडेंट ने सबसे पहले भारत के PM को फोन करके आभार व्यक्त किया

👉🏿 आज अचानक क्या हुआ जो ऑस्ट्रेलिया, इंडिया को यूरेनियम देने को राजी हो गया

👉🏿 आज अचानक जापान ने इंडिया के साथ युद्धाभ्यास किया
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“तब मन ने जवाब दिया कि ये सब परिवर्तन आये मात्र चार साल में *नरेंद्र मोदी* के आगमन के साथ

*प्रश्न*- क्या भारत में *नरेंद्र मोदी* के अलावा  वर्तमान नेताओं जैसे कि

लालू,
मुलायम,
अखिलेश,
सोनिया,
राहुल,
ममता,
केजरीवाल

आदि में कोई नेता है इस कैलिबर का जो इस प्रकार विश्व को झुका ले

इसलिए बंधुओं,
अब फैसला आपको करना है कि घर में ही युद्ध करने वाले चाहिए या घर-द्वार त्याग कर मातृभूमि को समर्पित ऐसा तेजस्वी मोदी है
हर बात लाऊडस्पीकर से नहीं बताई जा सकती ☝

तीन मित्रों को भेजकर सांस्कृतिक, धार्मिक विश्वास की सेवा करें…

           🚩 जय श्री राम 🚩

Posted in खान्ग्रेस

🍂🍀*कांग्रेस का चाल चरित्र*🍂🍀    
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आचार्य पं किशन सरवरिया
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◆ *क्या आपको याद है… कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने किया था विमान काअपहरण?*

*◆ हम लोगों की भूलने की आदत ज्यादा है…*

*◆ लेकिन इतिहास हमेशा स्थाई रहता है…*

*◆ कांग्रेस का ये घिनौना देश द्रोह कृत्य…*

*◆ देश के युवाओं की जानकारी के लिए…*

*◆ ये बात 20 दिसम्बर 1978 की है…*

◆ *जब आपातकाल में इंदिरा गांधी के जुल्मों के कारण वे सत्ता से बाहर हो गई थीं और भृष्टाचार के आरोप में जेल में थीं…*

◆ *तब लखनऊ से दिल्ली जाने वाली इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 410 को, लखनऊ से उड़ने के चंद मिनटों बाद हाईजैक कर लिया गया था…*

*◆ इस फ़्लाइट में 130 के करीब यात्री थे…*

*◆ हाईजैक करने वाले इंडियन यूथ कांग्रेस के दो सदस्य थे…*

◆ *एक आजमगढ़ का भोला पांडे और दूसरा बलिया का देवेन्द्र पांडे …*

🍂🍀🍂🍀🍂*मित्रों ध्यान दें !!!*🍂🍀🍂🍀🍂

◆ *उन दो हथियार बंद हाईजैकर्स ने यात्रियों को रिहा करने के बदले में तीन मांगे रखी थी…*

◆ *पहली मांग इंदिरा गांधी को जेल से रिहा किया जाए …*

◆ *दूसरी मांग संजय गांधी और इंदिरा गांधी के खिलाफ सारे आपराधिक मामले विड्राॅ किये जायें…*

◆ *और तिसरी मांग केंद्र में चुनी हुई जनता पार्टी की सरकार अपना इस्तीफा दे दे…*

*जिसके प्रधान मंत्री श्री मोरारजी देसाई थे…*

◆ *बाद में इन दोनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ बातचीत में सरेंडर कर दिया था…*

*इस घटना की सभी पार्टीयों ने जम कर आलोचना की सिर्फ कांग्रेस को छोड़कर…*

◆ *उसपर बेशर्मी ये… पहले तो कांग्रेस ने इस घटना को सिर्फ एक मज़ाक समझ कर भूल जाने को कहा…*

◆ *संसद में चर्चा के दौरान कांग्रेस इससे भी एक कदम आगे चली गयी…*

◆ *कांग्रेस के वरिष्ठ सांसदों, जिनमे वसंत साठे और आर वेंकटरमन थे, उन्होंने इस घटना की तुलना गांधी जी के नमक आंदोलन से कर डाली…*

◆ *और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध करने के अधिकार से जोड़ दिया था…*

◆ *बाद में इन्हीं हाईजैकर्स को कांग्रेस ने, उत्तर प्रदेश से टिकट देकर, विधायक बनवाया और वेंकटरामन आगे जाकर देश के राष्ट्रपति बने…*

◆ *भोला पांडे को कांग्रेस ने हाईजैकिंग के इस कारनामे को अंजाम देने के इनाम में 1991 से 2014 तक, पांच बार सांसद का टिकट भी दिया…*

◆ *जिसे वो कभी जीत ना सका…वरना एक हथियार बंद हाईजैकर भारतीय संसद में बैठा होता…*

*किन किन लोगों को मालूम है ये घटना…किसी को नहीं… पर इस घटना से आप लोग कांग्रेस के चाल और चरित्र को और अधिक गहराई से जरूर जान लीजिये…*

साभार संकलन—

Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

मोदी और मुसद्दिक:

ईरान 1951 और भारत 2024 — क्या इनमें कोई समानता है?

क्या आपने कभी सोचा है कि ईरानी लोग अमेरिका को “शैतानों की भूमि” क्यों कहते हैं?

कभी ईरान के तेल पर ब्रिटेन का वर्चस्व था। ईरान के तेल उत्पादन का 84% हिस्सा इंग्लैंड को जाता था, और केवल 16% ही ईरान को मिलता था।

1951 में, एक सच्चे देशभक्त मोहम्मद मुसद्दिक ईरान के प्रधानमंत्री बने।
वे नहीं चाहते थे कि ईरान की तेल संपदा पर विदेशी कंपनियों का कब्जा रहे।

15 मार्च 1951 को मुसद्दिक ने ईरानी संसद में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का विधेयक पेश किया, जो भारी बहुमत से पारित हुआ।
टाइम मैगज़ीन ने उन्हें 1951 का “मैन ऑफ द ईयर” घोषित किया!

लेकिन इस फैसले से ब्रिटेन को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने मुसद्दिक को हटाने के कई प्रयास किए — रिश्वत, हत्या की कोशिश, सैन्य तख्तापलट — पर मुसद्दिक की दूरदर्शिता और लोकप्रियता के कारण सब विफल रहे।

जब ब्रिटेन असफल हुआ, तो उसने अमेरिका से मदद मांगी।

CIA ने मुसद्दिक को हटाने के लिए 1 मिलियन डॉलर (लगभग 4,250 मिलियन रियाल) स्वीकृत किए।
योजना थी: जनता में असंतोष फैलाना, मीडिया और धार्मिक नेताओं को खरीदना, और अंततः संसद के भ्रष्ट सांसदों के माध्यम से उनकी सरकार को गिराना।

631 मिलियन रियाल पत्रकारों, संपादकों और मौलवियों को दिए गए ताकि वे मुसद्दिक के खिलाफ माहौल बना सकें।

हजारों लोगों को फर्जी प्रदर्शन के लिए भुगतान किया गया। प्रमुख वैश्विक मीडिया भी अमेरिका का समर्थन करने लगा।

व्यक्तिगत कार्टूनों से शुरू हुई आलोचना, बिल्कुल वैसी ही जैसे आज भारत में मोदी के निजी जीवन पर हमले होते हैं।

मुसद्दिक को तानाशाह कहा गया। जब उन्हें अहसास हुआ कि संसद के जरिए उनकी सरकार को गिराया जाएगा, तो उन्होंने संसद भंग कर दी।

अमेरिका ने ईरान के शाह पर दबाव बनाया कि वे मुसद्दिक को प्रधानमंत्री पद से हटाएं।

210 मिलियन रियाल की रिश्वत से फर्जी दंगे करवाए गए, और शाह की वापसी के बाद मुसद्दिक ने आत्मसमर्पण कर दिया।
उन्हें जेल में डाला गया और फिर जीवन भर नजरबंद रखा गया।

इसके बाद ईरान के तेल का 40% अमेरिका और 40% इंग्लैंड को दे दिया गया, बाकी 20% अन्य यूरोपीय देशों को।

फिर कट्टरपंथी खुमैनी सत्ता में आए, और आम ईरानी की हालत और खराब हो गई।

मुसद्दिक का अपराध क्या था?
सिर्फ इतना कि वे चाहते थे कि विदेशी नहीं, बल्कि देश की अपनी कंपनियां तेल और अन्य संसाधनों पर नियंत्रण रखें।

अगर मुसद्दिक का साथ दिया गया होता, तो 1955 से पहले ही ईरान एक संपूर्ण लोकतांत्रिक राष्ट्र बन सकता था।
लेकिन पत्रकारों, संपादकों, सांसदों और प्रदर्शनकारियों ने चंद पैसों में देश का भविष्य बेच दिया।

उसी समय ईरान की जनता ने महसूस किया कि अमेरिका ने उनकी सरकार को गिराने में गहरी भूमिका निभाई थी — और तभी से अमेरिका को “शैतानों की भूमि” कहा जाने लगा।

अब सोचिए — ईरान के असली दुश्मन कौन थे?
वे थे — बिके हुए पत्रकार, संपादक, सांसद और आंदोलनकारी।

अगर ये बिकते नहीं, और लोग मुसद्दिक के साथ खड़े रहते — तो अमेरिका की चालें कभी सफल नहीं होतीं।

आज भारत भी एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है।
यह दुर्भाग्य है कि आम जनता को षड्यंत्र तब तक समझ में नहीं आते जब तक उनके साथ अत्याचार नहीं होने लगते।

नकली मुद्दे, फर्जी आंदोलन, गलत आंकड़े, जातियों को आपस में लड़वाना, अल्पसंख्यकों को भड़काना, और कम्युनिस्ट लॉबी का राष्ट्रविरोधी ताकतों को समर्थन देना — ये सब एक गहरी साजिश का हिस्सा हैं, जिसका मकसद भारत को फिर से विदेशी नियंत्रण में लाना है।

अब समय है कि हम सजग बनें और बिकाऊ मीडिया के झूठे प्रचार का शिकार न बनें।

हर देशभक्त को वर्तमान नेतृत्व पर विश्वास करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए।

अन्यथा, ईरान जैसी तबाही भारत में भी हो सकती है।

आज दुनिया की कई खुफिया एजेंसियाँ भारतीय राजनेताओं को अपने एजेंट बनाने की कोशिश कर रही हैं, ताकि किसी भी तरह मोदी सरकार को हटाया जा सके।

हमारा भाग्य हमारे हाथ में है — बस समय रहते समझना होगा।

“न्यूयॉर्क टाइम्स” ने मुसद्दिक को तानाशाह कहा था।
आज वही “टाइम मैगज़ीन” मोदी को “डिवाइडर इन चीफ” कहती है।
क्या ये सब संयोग है? नहीं, ये एक रणनीति है।

सोचिए। समझिए। और जागरूक बनिए।