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मन की बात

एक डॉक्टर बहुत ही होशियार थे ।

उनके बारे में यह कहा जाता था कि वह मौत के मुंह में से भी बीमार को वापस ले आते थे।

डॉक्टर के पास जो भी मरीज आता वह उससे एक फॉर्म भरवाते थे।

मरीज से यह पूछते की आप इस फोरम में लिखें कि यदि आप बच गए तो किस तरह से बाकी जिंदगी जियेगें और आपके जीवन में क्या करना शेष रह गया है जो आप करना चाहेंगें।

सभी मरीज अपने मन की बात लिखने लगे।

अगर मैं बच गया तो अपने परिवार के साथ अपना समय बिताउंगा।

मैं अपने पुत्र और पुत्री की संतानों के साथ जी भर कर खेलूंगा।
किसी ने जी भर कर पर्यटन, घूमने का शौक पूरा करने का लिखा।

किसी ने तो यह भी लिखा की मेरे द्वारा जिंदगी में यदि किसी से ठेस पहुंची है तो मैं उनसे माफी मागुंगा।
किसी ने लिखा कि मैं अपनी जिंदगी में मुस्कुराना बढ़ा दूंगा।

जिंदगी में किसी से भी शिकायत नहीं करूंगा और ना किसी को शिकायत का मौका दूंगा। किसी को भी मन दुख ना ऐसा काम करूंगा।

बहुत से लोगों ने तरह-तरह की बातें लिखी।
डॉक्टर आपरेशन करने के बाद जब मरीज को छुट्टी देते तब वह लिखा हुआ फार्म उन्हे वापस कर देते थे।

मरीज से कहते की आपने जो फॉर्म में लिखा है वह आप अपनी जिंदगी में कितना पूरा कर पा रहे हैं उस पर निशान लगाते जाए्। वापस आए और मुझे बताएं कि आपने इसमें से किस तरह की जिंदगी जी है।

डॉक्टर ने कहा कि एक भी व्यक्ति ने ऐसा नहीं लिखा कि अगर मैं बच गया तो मुझे किसी से बदला लेना है।
अपने दुश्मन को खत्म कर दूंगा।
मुझे बहुत धन कमाना है।

अपने आपको बहुत व्यस्त रखना है।

प्रत्येक का जीवन जीने का नजरिया अपना-अपना था।
डॉक्टर ने प्रश्न किया की जब आप स्वस्थ थे तब आपने इस तरह का जीवन क्यों नहीं जिया, आप को कौन रोक रहा था। अभी कौन सी देरी हो गई है???
कुछ क्षण अपने जीवन के बारे में चिंतन मनन करें। हमें अपनी जिंदगी में किस तरह का जीवन जीना शेष रह गया है जो हम जीवन जीना चाहते थे ?

बस इस तरह का जीवन जीना प्रारम्भ करें।
जीवन का आनंद तभी ही है की जीवन यात्रा पूर्ण हो तब कोई कामना नहीं रहे, कोई अफ़सोस  ना रहे।

मन में यह ना रहे की मैं जैसा जीवन जीना चाहता था वैसा जीवन नहीं जी सका ।

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पराई बेटी

सुजाता जी थोड़ी सी मायूस हो गयी, अभी बेटी को भेज कर ।

यूँ तो खुश भी बहुत थी, आज कल । अभी बेटे की शादी जो हुई है बहू भी उनकी पसन्द की है, और बेटी अपने परिवार में खुश है ।

अब तो उनकी जिम्मेदारियां लगभग खत्म हो गयी है, पर फिर भी बेटी एक बार घर रहकर जाए तो दिल पर जोर तो पड़ता ही है इसीलिए न चाहते हुए भी.. कभी कभी आंखें छलछला रही थी ।

अचानक उन्हें एक याद आया, एक लिफाफा जो अंजू उन्हें जाते हुए थमा गयी थी कि मम्मी इसे फुर्सत में बैठकर पढ़ना, और विचार करना ।

ऐसे भागदौड़ में नही । लेकिन सब्र कहां था उन्हें..??? जल्दी से उसे खोला देखा तो एक खत था उसे खोला औऱ पढ़ने बैठ गयी ।

माँ !! बहुत खुश हूँ … कि आप अब माँ से एक सास भी बन गयी ।

यूँ तो मेरी शादी के बाद ही आप सास बन गयी थी लेकिन फिर भी सास बहू के रिश्ते की अलग बात है नवनीत।

मैं जानती हूँ, आप एक अच्छी माँ होने के साथ साथ अच्छी सास भी बनेंगी । पर फिर भी कुछ बातें है जो मैं आपसे कहना चाहती हूँ , जो मैंने खुद देखी और महसूस की है,
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बहुत कोशिश की. आपसे खुद कहूँ , पर हिम्मत नही जुटा पायी तो इस खत में लिख दिया ।
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जानती हूँ, मैं आपकी एकलौती बेटी हूँ . जिसके कारण आप मुझे बहुत प्यार करती है, आपकी हर चीज मेरी पसन्द से ही होती है..
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फिर चाहे वो घर के पर्दे ,चादर , पेंट हो या आपकी साड़ियां, ज्वैलरी कुछ भी , आज तक आपने मेरे बिना नही लिया । शादी के बाद भी हम हमेशा साथ साथ ही बाजार गए ।
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पर अब मैं चाहती हूँ कि आप ये मौका भाभी को दें. उनकी पसन्द न पसन्द का मान रखे ।
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आप चाहे तो मैं उनके साथ हर समय मौजूद रहूँगी । पर उनके साथ या उनके पीछे, उनसे पहले या उनके विरोध में कभी नही । जब तक उनकी कोई बहुत बड़ी गलती न हो.
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क्योंकि ….. अब इस घर पर उनका हक है , मैं जानती हूँ आपको ये सब जानकर तकलीफ होगी. और शायद आश्चर्य भी !
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क्योंकि..!!! मैंने आपको बहुत कुछ है जो कभी नही बताया ।
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पर … माँ , मैं पिछले 5 सालों से ये सब देखती आ रही हूँ , मेरे ही ससुराल में मेरी बातों , मेरी भावनाओं , या पसन्द का कोई महत्व नही है.
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सिर्फ और सिर्फ मेरी दोनो नन्दो को इसका हक़ है , मैं वहां तो कुछ नही कर पाती पर मैंने ये पहले ही से सोच लिया था कि अपनी भाभी के साथ ये सब नही होने दूंगी ,
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मैं कभी भी उनके जैसी नन्द नही बनूंगी न ही खुद जैसी अपनी भाभी को बनने दूंगी ।
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अब वो घर उनका है , उससे जुड़े फैसले लेने का हक़ भी उनका. चाहे वो छोटी बातें हो या बड़ी. उनकी सहमति सर्वोपरि है ।
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मैं भुगत चुकी हूँ , आप जानती है , माँ मैं जब अपने ही कमरे में कुछ बदलाव करती हूँ , तो दीदी मुझसे कैसे बात करती है ।
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या घर में मैं कोई भी नई चीज ले आऊं तो उसके लिए मुझे कैसे सुनाया जाता है…
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हमारे यहां ये सब नही चलता , आपके मायके में होगा..!!! ये शब्द तो हर दिन लगभग मैं 3-4 बार सुनती हूँ ।
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जब मैं उन्हें अपने साथ चलने को बोलती हूँ, तब भी उनके अलग अलग नखरे होते है ।
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कभी ….. आज नही भाभी. या आप अपनी पसंद से ही ले आइए न !! साथ न जाने के ढेरों बहाने होते है । इसीलिए अब मैं खुद सब करने लगी हूँ , किसी की परवाह किये बिना ।
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आप जानती है , जब भैया मुझसे मिलने आते है न तो घर में सबका मुंह देखने लायक होता है ।
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अगर उसके हाथ में कोई बड़ा सा गिफ्ट या सामान देख ले तो सब खुश हो जाते है खाली हाथ उनका आना किसी को गंवारा नही.
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कहते है अभी पिछले हफ्ते ही तो आया था , कोई खास काम था क्या ….??? मैं जानती हूँ इसीलिए उन्होंने अब घर आना भी कम कर दिया ।

मुझे यकीन है कि भैया ने ये बात आपको नही बताई होगी । इसीलिए आप प्लीज भाभी के मायके से किसी के आने पर तानाकशी न करिएगा ।
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क्योंकि मैं इसका दर्द जानती हूँ , और घरवालों से मिलने की खुशी भी ।
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कभी उन्हें ये मत कहिएगा कि घर से क्या सीख कर आई है ?? जो भी नही आता प्यार से सिखाइयेगा , जैसे आपने मुझे सिखाया था ।।
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बस यही कहना था आपसे कि माँ !! अब मैं पराई होना चाहती हूँ !! आपकी अंजू

सुजाता जी की आंखें भर आयी , गला रुंध गया, मुंह से एक शब्द नही निकल रहा था ।

उनकी छोटी सी अंजू आज इतनी बड़ी हो गयी कि अपनी माँ को ही उसने इतनी सारी सीख दे डाली । और खुद सालों से क्या क्या सहन कर रही है, इसकी भनक भी कभी नही लगने दी ।

सुजाता जी ने अंजू से बात करने के लिए फ़ोन उठाया, उधर से हेल्लो की जवाब में सन्नाटा था तो इधर एक कंपकपी थी।

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एक अदृश्य स्टिकर💐💐*

मेरे आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और मेरे बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था “शारीरिक विकलांग; कृपया धैर्य रखें”! और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया!!

मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया। यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो। मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।

इस घटना ने दिमाग को हिला दिया। क्या मुझे हर बार शांत करने और धैर्य रखने के लिए किसी स्टिकर की ही ज़रुरत पड़ेगी? हमें लोगों के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करने के लिए हर बार किसी स्टिकर की ज़रुरत क्यों पड़ती है?

क्या हम लोगों से धैर्यपूर्वक अच्छा व्यवहार सिर्फ तब ही करेंगे जब वे अपने माथे पर कुछ ऐसे स्टिकर्स चिपकाए घूम रहे होंगे कि “मेरी नौकरी छूट गई है”, “मैं कैंसर से संघर्ष कर रहा हूँ”, “मेरी शादी टूट गई है”, “मैं भावनात्मक रुप से टूट गया हूँ”, “मुझे प्यार में धोखा मिला है”, “मेरे प्यारे दोस्त की अचानक ही मौत हो गई”, “लगता है इस दुनिया को मेरी ज़रुरत ही नहीं”, “मुझे व्यापार में बहुत घाटा हो गया है”……आदि!

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धैर्य से काम लें

एक गांव में एक किसान रहता था| वह एक कुआं खोदना चाहता था| एक दिन उसने कुआं खोदना शुरू किया| कुछ फीट तक खुदाई करने पर भी जब उसे पानी नहीं दिखाई दिया तो वह निराश हो गया| फिर उसने दूसरी जगह खुदाई की किंतु पानी कहीं पर भी नहीं निकला|

इस तरह ६-७ जगहों पर उसने खुदाई की, किंतु उसे पानी नसीब नहीं हुआ| फिर वह बहुत दुखी और निराश होकर घर लौट गया|

अगले दिन उसने सारी बात एक बुजुर्ग व्यक्ति को बताई|उस व्यक्ति ने उसे समझाते हुए कहा:- “तुमने पांच अलग-अलग जगहों पर ६-७ फुट के गड्ढे खोदे लेकिन फिर भी तुम्हें कुछ हाथ नहीं लगा| यदि तुम अलग-अलग जगह पर खुदाई न करके एक ही स्थान पर इतना खोदते, तो तुम्हें पानी अवश्य मिल जाता|

तुमने धैर्य से काम नहीं लिया और थोड़ा-थोड़ा खोदकर अपना निर्णय बदल लिया| आज तुम एकाग्रता से एक ही स्थान पर गड्ढा खोदो और जब तक पानी दिखाई नहीं दे तब तक खोदना जारी रखना| तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी|”

उस दिन किसान ने दृढ़ निश्चय करते हुए एक बार फिर खुदाई शुरू कर दी| लगभग २५-३० फुट की खुदाई हो जाने पर खेत से पानी निकल आया| यह देखकर किसान बहुत खुश हुआ और मन ही मन उस व्यक्ति का धन्यवाद करने लगा|

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सच्चा सुख 🌹

एक व्यक्ति के पास बहुत सा धन था, इतना कि अब और धन पाने की इच्छा नहीं थी। जितना था उसका भी उपयोग नहीं हो पा रहा था। मृत्यु समीप आने लगी थी। न बेटे थे, न बेटियां थीं, कोई पीछे न था, सारा जीवन धन बटोरने में बीत गया था।
वह तथाकथित महात्माओं के पास गया कि मुझे कुछ आनंद का सूत्र दो। महात्मा, पंडित, पुरोहित, सब के द्वार खटखटाए। खाली हाथ लौटा। फिर किसी ने कहा कि एक साधू को हम जानते हैं, शायद वही कुछ कर सके। उनके ढंग जरूर अनूठे हैं; इसलिए चौंकना मत। उनके रास्ते उनके निजी हैं; उनकी समझाने की विधियां भी थोड़ी अजीब होती हैं। मगर कोई न समझा सके, तो जिनका कहीं कोई इलाज नहीं है, उस तरह के लोगों को हम वहां भेज देते हैं। जिनका कहीं कोई इलाज नहीं, उनके लिए वहां सुनिश्चित उपाय है।
उस धनी ने एक बड़ी पोटली भरी हीरे—जवाहरातों से और पहुंच गया साधू के घर।
साधू बैठे थे एक झाड़ के नीचे। धनी व्यक्ति ने पोटली पटक दी उनके सामने और कहा कि इतने हीरे—जवाहरात मेरे पास हैं, मगर सुख का कण भी मेरे पास नहीं। मैं कैसे सुखी होऊं ?
साधू ने आव देखा न ताव, उठाई पोटली और भाग लिए ! वह व्यक्ति एक क्षण तो समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है। महात्मागण तो ऐसा नहीं करते !एक क्षण तो वह ठिठका रहा, फिर उसे होश आया कि इस साधू ने तो उसे लूट लिया, मारे गए, सारी जिंदगी भर की कमाई साधु ले भागा। हम सुख की तलाश में आए थे, और दुःखी हो गए। व्यक्ति भागा, चिल्लाया कि लुट गया, बचाओ ! साधु चोर है, बेईमान है, भागा जा रहा है !
साधु ने पूरे गांव में उस व्यक्ति से चक्कर लगवाया। साधू का गांव तो जाना—माना था, गली—कूंचे से पहले से पहचान थी, इधर से निकले, उधर से निकल जाए। भीड़ भी पीछे हो ली— भीड़ तो साधू को जानती थी ! कि जरूर कोई विधि होगी ! गांव तो साधू से परिचित था, उसके ढंगों से परिचित था। धीरे-धीरे आश्वस्त हो गया था कि वह जो भी करे, वह चाहे कितना भी अबूझ मालूम पड़े, भीतर कुछ राज होता है।लेकिन उस व्यक्ति को तो कुछ पता नहीं था। वह पसीना-पसीना, जीवन मे कभी भागा भी नहीं था इतना, थका-मांदा साधू उसे भगाता हुआ, दौड़ाता हुआ, पसीने से लथपथ कराता हुआ वापिस अपने झाड़ के पास ले आया। जहां उसका घोड़ा खड़ा था। साधु ने लाकर पोटली वहीं घोड़े के पास पटक दी और स्वयं झाड़ के पीछे छिप कर खडे हो गए।
वह व्यक्ति लौटा, पोटली नीचे पड़ी थी, घोड़ा खड़ा था उसने पोटली उठा कर छाती से लगा ली और कहा कि हे! हे परमात्मा ! तेरा बहुत बहुत धन्यवाद ! आज मुझ जैसा सुखी इस दुनिया में और कोई भी नहीं मुझे मेरा धन वापिस मिल गया!
साधू वृक्ष के पीछे से झांके और , कहा : कुछ सुख मिला ? यही राज है। यही पोटली पहले तुम्हारे पास थी, इसी को लेकर तुम यहां वहां घूम रहे थे, और सुख का कोई पता नहीं था। अब वही पोटली वापिस तुम्हारे हाथ में है।लेकिन बीच में फासला हो गया, थोड़ी देर को पोटली तुम्हारे हाथ में न थी, थोड़ी देर को पोटली से तुम वंचित हो गए थे, अब तुम कह रहे हो- हे प्रभु, धन्यवाद तेरा कि आज मैं खुश हूं, आज पहली बार आनंद की थोड़ी झलक मिली।
शर्म नहीं आती ? बैठो घोड़े पर और भाग जाओ, नहीं तो मैं पोटली फिर छीन लूंगा। रास्ते पर लगो ! रास्ता तुम्हें मैंने बता दिया है।

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एक आदमी ने एक बूढ़े पक्षी को एक जंगल में पकड़ लिया था।

उस बूढ़े पक्षी ने कहा: मैं किसी के भी काम का नहीं हूं, देह मेरी जीर्ण-जर्जर हो गई, जीवन मेरा समाप्त होने के करीब है, न मैं गीत गा सकता हूं, न मेरी वाणी में मधुरता है, मुझे ले जा कर करोगे भी क्या? लेकिन यदि तुम मुझे छोड़ने को राजी हो जाओ, तो मैं जीवन के संबंध में तीन सूत्र तुम्हें बता सकता हूं।
उस आदमी ने कहा: भरोसा क्या कि मैं तुम्हें छोड़ दूं और तुम सूत्र बताओ या न बताओ?उस पक्षी ने कहा: पहला सूत्र मैं तुम्हारे हाथ में ही तुम्हें बता दूंगा। और अगर तुम्हें सौदा करने जैसा लगे, तो तुम मुझे छोड़ देना। दूसरा सूत्र मैं वृक्ष के ऊपर बैठ कर बता दूंगा। और तीसरा सूत्र जब मैं आकाश में ऊपर उड़ जाऊंगा तभी बता सकता हूं।

बूढ़ा पक्षी था, सच ही उसकी आवाज में कोई मधुरता न थी, वह बाजार में बेचा भी नहीं जा सकता था। और उसके दिन भी समाप्त प्राय थे, वह ज्यादा दिन बचने को भी न था। उसे पकड़ रखने की कोई जरूरत भी न थी। उस शिकारी ने उस पक्षी को कहा: ठीक, शर्त स्वीकार है। तुम पहला सूत्र मुझे बता दो।उस पक्षी ने कहा: मैंने जीवन में उन लोगों को दुखी होते देखा है जो बीते हुए को भूल नहीं जाते हैं। और उन लोगों को मैंने आनंद से भरा देखा है जो बीते को विस्मरण कर देते हैं और जो मौजूद है उसमें जीते हैं, यह पहला सूत्र है।

बात काम की थी और मूल्य की थी। उस आदमी ने उस पक्षी को छोड़ दिया। वह पक्षी वृक्ष पर बैठा और उस आदमी ने पूछा कि दूसरा सूत्र? उस पक्षी ने कहा: दूसरा सूत्र यह है कि कभी ऐसी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए जो तर्क विरुद्ध हो, जो विचार के प्रतिकूल हो, जो सामान्य बुद्धि के नियमों के विपरीत पड़ती हो, उस पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए, विश्वास करने वाला व्यक्ति भटक जाता है।पक्षी आकाश में उड़ गया। उड़ते-उड़ते उसने कहा: एक बात तुम्हें उड़ते-उड़ते बता दूं, यह तीसरा सूत्र नहीं है यह केवल एक खबर है जो तुम्हें दे दूं। तुम बड़ी भूल में पड़ गए हो मुझे छोड़ कर, मेरे शरीर में दो बहुमूल्य हीरे थे, काश, तुम मुझे मार डालते तो तुम आज अरबपति हो जाते।

वह आदमी एकदम उदास हो गया। वह एकदम चिंतित हो गया। लेकिन पक्षी तो आकाश में उड़ गया था। उसने उदास और हारे हुए और घबड़ाए हुए मन से कहा: खैर कोई बात नहीं, लेकिन कम से कम तीसरी सलाह तो दे दो। उस पक्षी ने कहा: तीसरी सलाह देने की अब कोई जरूरत न रही; तुमने पहली दो सलाह पर काम ही नहीं किया। मैंने तुमसे कहा था कि जो बीत गया उसे भूल जाने वाला आनंदित होता है, तुम उस बात को याद रखे हो कि तुम मुझे पकड़े थे और तुमने मुझे छोड़ दिया। वह बात बीत गई, तुम उसके लिए दुखी हो रहे हो।मैंने तुमसे दूसरा सूत्र कहा था: जो तर्क विरुद्ध हो, बुद्धि के अनुकूल न हो, उसे कभी मत मानना। तुमने यह बात मान ली कि पक्षी के शरीर में हीरे हो सकते हैं और तुम उसके लिए दुखी हो रहे हो।

क्षमा करो, तीसरा सूत्र मैं तुम्हें बताने को अब राजी नहीं हूं। क्योंकि जब दो सूत्रों पर ही तुमने कोई अमल नहीं किया, कोई विचार नहीं किया, तो तीसरा भी व्यर्थ के हाथों में चला जाएगा, उसकी कोई उपादेयता नहीं।

इसलिए अगर पिछले दो सूत्रों पर ख्याल किया हो, वह कहीं प्राण के किसी कोने में जगह बना ली हो, तो ही तीसरा सूत्र समझ में आ सकता है। अन्यथा तीसरा सूत्र बिल्कुल अबूझ होगा कि शरीर नाश्वर है इसलिए उसके लिए जुटाई और इच्छा की गई हर भौतिक वस्तु कोई काम की नहीं।

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सोझाजी पर भगवत्कृपा*


सोझाजी पर भगवत्कृपा*
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श्री सोझाजी नाम के महान संत हुए है । श्री सोझाजी गृहस्थ भक्त थे ।
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धीरे धीरे जगत की असारता, सांसारिक सुखों की असत्यता और श्री हरिभजन की सत्यता का सम्यक् बोध हो जाने पर आपके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया ।
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आपने अपनी धर्मपत्नी के समक्ष अपने गृहत्याग का प्रस्ताव रखा तो उस साध्वी ने न केवल सहर्ष प्रस्ताव का समर्थन किया, बल्कि स्वयं भी साथ चलने को तैयार हो गयी ।
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इस पर आपने कहा कि यदि तुम्हारे हृदय-से समस्त सांसारिक आसक्तियां समाप्त हो गयी हों तो तुम भी अवश्य चल सकती हो ।
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अर्घरात्रि के समय ये दोनों घर छोड़ कर चल दिये। आपकी तो प्रभु कृपा पर अनन्य निष्ठा थी, इसलिये साथ कुछ नहीं लिया,
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परंतु आपकी पत्नी अपने दस माह के शिशु के प्रति वात्सल्य भाव को न त्याग सकी और उसको भी अपनी गोद में लेते आयी ।
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रात भर पैदल चलने के उपरान्त प्रात: काल के उजाले में आपने जब पत्नी की गोद मे शिशु को देखा तो बहुत नाराज हुए और बोले-
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अभी तुम्हारे मन में संसार के प्रति बहुत राग है, यदि तुम मेरे साथ चलना चाहती हो तो इस शिशु को यहीं छोड़ दो ।
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पत्नी ने बड़े ही करुण स्वर में कहा-नाथ ! यहां इसका लालन पालन कौन करेगा ?
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आपने पृथ्वीपर रेंगते हुए जीव ज़न्तुओ को दिखाकर कहा- जो इनका पालन करता है, वही इस बालक का भी पालन करेगा ।
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आपकी आज्ञा का पालन करते हुए आपकी पत्नी ने बालक को वहीं छोड़ दिया और दोनों लोग श्री द्वारका पुरी की यात्रा पर चल दिये ।
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बारह वर्ष बाद अचानक एक दिन आपकी पत्नी को अपने उस दुधमुंहे शिशु की याद आयी, जिसे वे अपने पती देव के कहने पर रास्ते मे ही छोड़ कर चली आयी थीं ।
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उन्होंने इस बात को श्री सोझा जी से कहा । प्रभु कृपा से आप तो सब जानते ही थे, फिर भी पत्नी को भगवत् कृपा के दर्शन कराने के लिये उन्हें लेकर अपने देश वापस लौटे ।
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वहां वे एक बाग में रुके और माली से पूछा -यहां का राजा कौन है ?
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माली ने बताया यहां के राजा को कोई संतान नहीं थी अत: उन्होंने भक्त सोझा जी के पुत्र को गोद ले लिया था,
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जिसे उसके माता पिता जंगल में छोड़ गये थे, अब यही लड़का यहाँ का राजा है ।
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सोझा जी की पत्नी इस भगवत्कृपा से गदगद हो गयी, उन्हें विश्वास हो गया कि जो अनन्य भाव से प्रभु की शरण में जाते हैं, उनके योगक्षेम का वहन स्वयं श्री भगवान् करते हैं ।

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एक अधूरी कहानी की पूरी शुरुआत


सोम प्रकाश जिंदल जय गोपाल जी की, [13-05-2025 20:41]
प्रेरणादायक कहानिया मंगलसूत्र: एक अधूरी कहानी की पूरी शुरुआत
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जोकी हाट का ब्लौक दफ्तर. एक गोरीचिट्टी, तेजतर्रार लड़की ने कुछ दिन पहले वहां जौइन किया था. उसे आमदनी, जाति, घर का प्रमाणपत्र बनाने का काम मिला था. वह अपनी ड्यूटी को मुस्तैदी से पूरा करने में लगी रहती थी. सुबह के 10 बजे से शाम के 4 बजे तक वह सब की अर्जियां लेने में लगी रहती थी. आज उसे यहां 6 महीने होने को आए हैं. अब उस के चेहरे पर शिकन उभर आई है. होंठों से मुसकान गायब हो चुकी है. ऐसा क्या हो गया है? अजय भी ठहरा जानामाना पत्रकार. खोजी पत्रकारिता उस का शगल है. अजय ने मामले की तह तक जाने का फैसला किया. पहले नाम और डेरे का पता लगाया.

नाम है सुमनलता मुंजाल और रहती है शिवपुरी कालोनी, अररिया में.अजय ने फुरती से अपनी खटारा मोटरसाइकिल उठाई और चल पड़ा. पूछतेपूछते वहां पहुंचा. आज रविवार है, तो जरूर वह घर पर ही होगी.

डोर बैल बजाई. वह बाहर निकली. अजय अपना कार्ड दिखा कर बोला, ‘‘मैं एक छोटे से अखबार का प्रतिनिधि हूं मैडमजी. मैं आप से कुछ खास जानने आया हूं.’’

‘फुरसत नहीं है’ कह कर वह अंदर चली गई और अजय टका सा मुंह ले कर लौट आया.

अजय दूसरे उपाय सोचने में लग गया. 15 दिन की मशक्कत के बाद उसे सब पता चल गया. सुमनलता को किसी न किसी बहाने से उस के अफसर तंग करते थे.

अजय ने स्टोरी बना कर छपवा दी. फिर तो वह हंगामा हुआ कि क्या कहने. दोनों की बदली हो गई. अच्छी बात यह हुई कि सुमनलता के होंठों पर पुरानी मुसकान लौट आई.

एक दिन अजय कुछ काम से ब्लौक दफ्तर गया था. उस ने आवाज दे कर बुलाया. अजय चाहता तो अनसुना कर सकता था, पर फुरसत पा कर वह मिला. औपचारिक बातें हुईं. उस ने अजय को घर आने का न्योता दिया और उस का फोन नंबर लिया. बात आईगई हो गई.

3 दिन बाद रविवार था. शाम को अजय को फोन आया. अजनबी नंबर देख कर ‘हैलो’ कहा.

उधर से आवाज आई, ‘सर, मैं मिस मुंजाल बोल रही हूं. आप आए नहीं. मैं सुबह से आप का इंतजार कर रही हूं. अभी आइए प्लीज.’

मिस मुंजाल यानी ‘वह कुंआरी है’ सोच कर अजय तैयार हुआ और चल पड़ा. एक बुके व मिठाई ले ली. डोर बैल बजाते ही उस ने दरवाजा खोला.

साड़ी में वह बड़ी खूबसूरत लग रही थी. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आइए, मैं आप का ही इंतजार कर रही थी.’’

अजय भीतर गया. वहां एक औरत बनीठनी बैठी थी. वह परिचय कराते हुए बोली, ‘‘ये मेरी मम्मी हैं. और मम्मी, ये महाशय पत्रकार हैं. मेरे बारे में इन्होंने ही छापा था.’’

अजय ने उन के पैर छू कर प्रणाम किया. वे उसे आशीर्वाद देते हुए बोलीं, ‘‘सदा आगे बढ़ो बेटा. आओ, बैठो.’’

तभी मिस मुंजाल बोलीं, ‘‘आप ने मुझे अभी तक अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’

वह बोला, ‘‘मुझे अजय मोदी कहते हैं. आप सिर्फ मोदी भी कह सकती हैं.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अंदर गई. पलभर में वह ट्रौली धकेलती हुई आई. उस पर केक सजा हुआ था. देख कर अजय को ताज्जुब हुआ.

उस ने खुलासा किया, ‘‘आज मेरा जन्मदिन है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘मेहमान कहां हैं?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप ही मेहमान हैं मिस्टर अजय मोदी.’’

‘‘ओह,’’ अजय ने इतना ही कहा.

मोमबत्ती बुझा कर उस ने केक काटा. पहला टुकड़ा अजय को खिलाया. अजय ने भी उसे और उस की मम्मी को केक खिलाया. फिर बुके व मिठाई के साथ बधाई दी और कहा, ‘‘मैं बस यही ले कर आया हूं. पहले पता होता, तो तैयारी के साथ आता.’’

उस ने इशारे से मना किया और बोली, ‘‘आज प्रोफैशनल नहीं पर्सनल मूमैंट को जीना है.’’

अजय चुप हो गया. रात के 8 बजे वह लौटा, तो वे दोनों अजनबी से एक गहरे दोस्त बन चुके थे.

2 महीने बाद अजय का प्रमोशन हो गया, तो सोचा कि उस के साथ ही सैलिबे्रट करे. फोन किया. उस ने बधाई दी. उस की आवाज में कंपन और उदासी थी.

अजय ने कहा, ‘‘आप आज शाम को तैयार रहना.’’

शाम में वह तैयार हो कर शिवपुरी पहुंचा. वह सजसंवर कर तैयार थी. दोनों मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पड़े.

अजय ने रास्ते में बताया कि वे दोनों पूर्णिया जा रहे हैं. वह कुछ नहीं बोली. होटल हर्ष में सीट बुक थी. खानेपीने का सामान उस की पसंद से और्डर किया. पनीर के पकौड़े, अदरक की चटनी कौफी…

अजय ने कहा, ‘‘मिस मुंजाल, आज हम लोग स्पैशल मूमैंट्स को जीएंगे.’’

वह गजब की मुसकान के साथ बोली, ‘‘जैसा आप कहें सर.’’

अजय ने प्यार से पूछा, ‘‘मिस मुंजाल, मुझे ‘सर’ कहना जरूरी है?’’

वह भी पलट कर बोली, ‘‘मुझे भी ‘मिस मुंजाल’ कहना जरूरी है?’’

अजय ने कहा, ‘‘ठीक है. आज से केवल अजय कहना या फिर मोदी.’’

वह बोली, ‘‘मुझे भी केवल सुमन या लता कहना.’’

फिर वह अपने बारे में बताने लगी कि वह हरियाणा के हिसार की है. नौकरी के सिलसिले में बिहार आ गई, पर अब मन नहीं लग रहा है. एलएलएम कर रही है. बहुत जल्द ही वह यहां से चली जाएगी. उसे वकील बनने की इच्छा है.

फिर अजय ने बताया, ‘‘मैं भी बहुत जल्द दिल्ली जौइन कर लूंगा. हैड औफिस बुलाया जा रहा है.’’

सोम प्रकाश जिंदल जय गोपाल जी की, [13-05-2025 20:41]
फिर उस ने मुझे एक छोटा सा गिफ्ट दिया. बहुत खूबसूरत ‘ब्रेसलेट’ था, जिस पर अंगरेजी का ‘ए’ व ‘एस’ खुदा था.

मैं ने भी एक सोने की पतली चेन दी. उस में एक लौकेट लगा था और एक तरफ ‘ए’ व दूसरी तरफ ‘एस’ खुदा था.

वह बहुत खुश हुई. ब्रेसलेट पहना कर उस ने अजय का हाथ चूम लिया और सहलाने लगी. वह भी थोड़ा जोश में आ गया. उस ने भी उसे चेन पहनाई और गरदन चूम ली. वह सिसकने लगी.

अजय ने वजह पूछी, तो बोली, ‘‘तुम पहले इनसान हो, जिस ने मेरी बिना किसी लालच के मदद की थी.’’

अजय ने कहा, ‘‘एलएलएम करने तक तुम यहीं रहो. कुछ गलत नहीं होगा. मैं हूं न.’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया. रात होतेहोते अजय ने उसे उस के डेरे पर छोड़ दिया. विदा लेने से पहले वे दोनों गले मिले.

अजय दूसरे ही दिन गुपचुप तरीके से बीडीओ साहब से मिला. अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उस की ड्यूटी बदलवा दी.

इस बात को 10 साल गुजर गए. अजय अपने असिस्टैंट के साथ एक मशहूर मर्डर मिस्ट्री की सुनवाई कवर करने पटियाला हाउस कोर्ट गया था. कोर्ट से बाहर निकल कर वह मुड़ा ही था कि कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मिस्टर मोदी, प्लीज रुकिए.’’

अजय ने देखा कि एक लड़की वकील की ड्रैस में हांफती हुई चली आ रही थी. पास आ कर उस ने पूछा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी प्लीज, आर यू मिस्टर अजय मोदी?’’

अजय ने कहा, ‘‘यस. ऐंड यू?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं रीना महिंद्रा. आप प्लीज मेरे साथ चलिए. मेरी सीनियर आप को बुला रही हैं.’’

अजय हैरान सा उस के साथ चल पड़ा. पार्किंग में एक लंबी नीली कार खड़ी थी. उस के अंदर एक औरत वकील की ड्रैस में बैठी थी.

अजय के वहां पहुंचते ही वह बाहर निकली और उस के गले लग गई.

अजय यह देख कर अचकचा गया. वह चहकते हुए बोली, ‘‘कहां खो गए मिस्टर मोदी? पहचाना नहीं क्या मुझे? मैं सुमनलता मुंजाल.’’

अजय बोला, ‘‘कैसी हैं आप?’’

वह बोली, ‘‘गाड़ी में बैठो. सब बताती हूं.’’

अजय ने अपने असिस्टैंट को जाने के लिए कहा और गाड़ी में बैठ गया. उस ने भी रीना को मैट्रो से जाने के लिए कहा और खुद ही गाड़ी ड्राइव करने लगी.

वह लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट में ले आई. अजय को एक गिलास पानी ला कर दिया और खुद फ्रैश होने चली गई.

कुछ देर बाद टेबल पर नाश्ता था, जिसे उस ने खुद बनाया था. फिर वह अपनी जिंदगी की कहानी बताने लगी.

‘‘आप ने तो चुपचाप मेरी ड्यूटी बदलवा दी. कुछ दिन बाद ही मुझे पता चल गया. सभी ताने मारने लगे. मुझ से सभी आप का रिलेशन पूछने लगे, तो मैं ने ‘मंगेतर’ बता दिया.

‘‘काफी समय बीत जाने पर भी जब आप नहीं मिले और न ही फोन लगा, तो मैं परेशान हो गई. पता चला कि आप दिल्ली में हो और अखबार भी बंद हो गया है.

‘‘मैं समझ गई कि आप जद्दोजेहद कर रहे होंगे. इधर मेरी मां को लकवा मार गया. मेरी एलएलएम भी पूरी हो गई थी. उस नौकरी से मैं तंग आ ही चुकी थी.

‘‘मां के इलाज के बहाने मैं दिल्ली चली आई. एक महीने बाद मेरी मां चल बसीं. फिर मेरा संघर्ष भी शुरू हो गया. दिल्ली हाईकोर्ट जौइन कर लिया और धीरेधीरे मैं क्रिमिनल वकील के रूप में मशहूर हो गई.’’

अजय मुसकरा कर रह गया.

उस ने पूछा, ‘‘आप बताओ, कैसी कट रही है?’’

अजय ने बताया, ‘‘दिल्ली आने के कुछ महीनों बाद ही अखबार बंद हो गया. मैं ने हर छोटाबड़ा काम किया. ठेला तक चलाया. अखबार बेचा. फिर एक दिन एक रिपोर्टिंग कर एक अखबार को भेजी और उसी में मुझे काम मिल गया. आज तक उसी में हूं.’’

‘‘बीवीबच्चे कैसे हैं?’’

अजय ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम मुंजाल, जब अपना पेट ही नहीं भर रहा हो, तो फिर वह सब कैसे?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘तब तो ठीक है.’’

अजय बोला, ‘‘सच कहूं, तो तुम्हारी जैसी कोई मिली ही नहीं और न ही मिलेगी. जहां इतनी कट गई है, तो आगे भी कट ही जाएगी.’’

वह बोली, ‘‘अच्छी बात है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘तुम्हारे बालबच्चे कहां और कैसे हैं?’’

वह फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘एक भिखारी दूसरे भिखारी से पूछ रहा है, तुम ने कितना पैसा जमा किया है.’’

फिर वह चेन दिखाते हुए बोली, ‘‘याद है न… ये चेन आप ने ही पहनाई थी. मैं ने तब से ही इसे अपना ‘मंगलसूत्र’ मान लिया है. समझे…’’

‘‘और फिर मैं हरियाणवी हूं. पति के शहीद होने पर भी दूसरी शादी नहीं करते, यहां तो मेरा ‘खसम’ मोरचे पर गया था, शहीद थोड़े ही हुआ था.’’

अजय उस की प्यार वाली बात सुन कर फफकफफक कर रोने लगा. वह उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘कितना झंडू ‘खसम’ हो आप मेरे? मर्द हो कर रोते हो?’’

अजय ‘खसम’ शब्द पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आई एम सौरी माई लव. यू आर ग्रेट ऐंड आई लव यू वैरी मच.’’

वह भी मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, इसलिए पलट कर मेरी खबर तक नहीं ली.’’

इस के बाद अजय को अपनी बांहों में कसते हुए वह बोली, ‘‘मैं इस ‘अनोखे मंगलसूत्र’ को दिखादिखा कर थक चुकी हूं, मोदी डियर. अब सब के सामने मुझे स्वीकार भी कर लो प्लीज.’’

सोम प्रकाश जिंदल जय गोपाल जी की, [13-05-2025 20:41]
वे दोनों अगले हफ्ते ही एक भव्य समारोह में एकदूसरे के हो गए. कहा भी गया है कि जिंदगी एक बांसुरी की तरह होती है. अंदर से खोखली, बाहर से छेदों से भरी और कड़ी भी, फिर भी बजाने वाले इसे बजा कर ‘मीठी धुन’ निकाल ही लेते हैं.


हर कहानी सिर्फ शब्दों का मेल नहीं होती, बल्कि कई गहरी अनुभव और आत्मिक सीख से भरी होती है।

  1. सच्ची मदद का कोई मूल्य नहीं होता – सिर्फ याद रह जाती है।
    अजय ने बिना किसी स्वार्थ के सुमनलता की मदद की, और वो मदद उसके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गई।
  2. एक संवेदनशील इंसान हमेशा किसी की मुस्कान लौटाने की वजह बन सकता है।
    सुमनलता के होंठों की खोई मुस्कान, पत्रकारिता की ईमानदार रिपोर्टिंग से लौटी — यह बताता है कि लेखनी भी किसी की जिंदगी बदल सकती है।
  3. रिश्ते खून के नहीं, भावनाओं और सम्मान के होते हैं।
    दोनों अजनबी थे, पर सम्मान और भावों ने उन्हें एक-दूसरे का हमसफर बना दिया।
  4. समय चाहे जितना बीत जाए, सच्चे जज़्बात कभी पुराने नहीं होते।
    दस साल बाद भी वही ब्रेसलेट, वही चेन, वही भावनाएं — यह सच्चे रिश्तों की अमरता दर्शाता है।
  5. एक औरत को सिर्फ दया नहीं, सहयोग और आत्मसम्मान चाहिए।
    सुमनलता ने संघर्ष किया, वकील बनी और अपने आत्मसम्मान के साथ जीत गयी
    🙏🚩 राधे राधे शुभ वंदन।
Posted in खान्ग्रेस, हिन्दू पतन

#धोती_आंदोलन ………
आजादी के पहले हैदराबाद में निजाम के शासन काल में हिंदुओं पर तरह-2 की पाबंदियां लगाई गई थी
हिंदुओं की पूजा और मंदिरों पर प्रतिबंध था, सभी हिंदुओं को फर्शी सलाम करना पड़ता था ( झुक कर सलाम करना जिसमें हाथ जमीन से छूता रहें)

हिंदी मराठी और तेलुगू भाषाओं पर प्रतिबंध था, किसी भी स्कूल कॉलेज में यह भाषाएं नहीं पढ़ाई जाती थी। तत्कालीन हैदराबाद रियासत में केवल निजाम कॉलेज और उस्मानिया यूनिवर्सिटी ही थे. जहाँ हिंदू छात्रों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता था, उनके लिए छात्रावास अलग थे और उन्हें विश्वविद्यालय या छात्रावास में कहीं पर भी भारतीय परिधान पहनने की छूट नहीं थी। उन्हें मुस्लिम पोशाक या शरीयत के अनुसार पोशाक पहननी पड़ती थी, छात्रावास के अंदर भी भारतीय धोती पहनने पर प्रतिबंध था.

इसके विरोध में छात्रों ने उस्मानिया यूनिवर्सिटी में 15 दिन तक आंदोलन किया और इस आंदोलन का नेतृत्व किया पीवी नरसिम्हा राव ने इस आंदोलन को धोती आंदोलन कहा जाता है।

इस आंदोलन के कारण पीवी नरसिम्हाराव सहित लगभग 242 छात्रों को उस्मानिया से निष्कासित कर दिया गया। उस्मानिया यूनिवर्सिटी द्वारा देश के सभी विश्वविद्यालयों को पत्र भेजा गया कि इन छात्रों को प्रवेश न दिया जाए. किंतु महाराष्ट्र के नागपुर विश्वविद्यालय ने इन सभी 242 छात्रों को अपने यहां न केवल प्रवेश दिया बल्कि पढ़ाई की सारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जिसके कारण ये सारे छात्र अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर सके.

निजाम के शासनकाल में यह अपनी तरह का पहला आंदोलन था जिसने बाद में निजाम शासन के विरुद्ध आंदोलन करने का रास्ता खोल दिया. स्वतंत्रता के बाद जब निजाम ने भारत में विलय से आनाकानी की तो समुचित जबाब पटेल जी और भारतीय सेना ने दिया ।