कांग्रेस के तलवे चाटू वामपंथी इतिहाकारों ने बेगम एजाज रसूल के बारे में बहुत कुछ लिखा लेकिन असली बात लिखना भूल गये…
बात ये कि जिन्ना की सबसे बड़ी चेली होने के बाद भी बेगम साहिबा पाकिस्तान क्यों नहीं गईं… चलो, वो मैं बता देता हूं।
तो बात ये है कि बेगम एजाज रसूल जिन्ना की बेहद-बेहद करीबी और मुस्लिम लीग की सबसे बड़ी महिला नेता थीं… 1945-46 के चुनावों में जिन्ना की इस चेली को यूपी के मुसलमानों ने भारी मतों से जितवाया था… इन चुनावों में बेगम साहिबा ने जमकर “जिन्ना जिंदाबाद” के नारे लगाये थे… लेकिन बड़ा सवाल… पाकिस्तान बनाने के बाद भी ये पाकिस्तान क्यों नहीं गईं?… इस सवाल का जवाब मुझे मिला ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च डिपार्टमेंट के आडियो अर्काइव में… जहां बेगम साहिबा का एक आडियो इंटरव्यू पड़ा हुआ है जो उन्होंने साल 1997 में दिया था… इस इंटरव्यू में बेगम एजाज रसूल से जब ये पूछा गया कि मुसलमानों ने जिन्ना और मुस्लिम लीग का इतना समर्थन क्यों किया और वह पाकिस्तान क्यों नहीं गईं, तो उन्होंने बड़ी मधुर आवाज़ में शातिराना जवाब देते हुए कहा कि –
“भारतीय इलाके में रहने वाले मुसलमानों को लगा कि उन्हें पाकिस्तान के इलाकों में रहनेवाले अपने भाइयों के लिए एक अलग मुल्क बनाने में मदद देना चाहिए। जिन्ना ने भी कहा था कि इसके लिए हिंदू इलाकों में रहनेवाले मुसलमानों को कुर्बानी देनी होगी। उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों मुसलमानों ने मुस्लिम लीग का साथ दिया क्योंकि वे अपने मुस्लिम भाइयों को एक अलग मुल्क बनाकर देना चाहते थे, जहां उनकी अपनी हुकूमत हो। उन लोगों ने इसके लिए अपनी कुर्बानी दी। आखिर, मैं ऐसे लाखों मुसलमानों को छोड़कर पाकिस्तान कैसे चले जाती जिन्होंने हमारे कहने पर पाकिस्तान के लिए वोट दिया था।”
अब इंटरव्यू का सोर्स क्या दूं… ये पूरा आडियो इंटरव्यू मेरे पास पड़ा हुआ है… जिस कांग्रेसी इतिहासकार या चमचे बेलचे को इसे सुनने का शौक हो साथ में पोस्ट कर रहा हूँ सुन लेना…
जो 1947 का जिन्ना की खास थी, वो इसके बाद कांग्रेस की खास बन गई… और सबसे हैरान कर देने वाली बात है कि ऐसी जिन्नावादी महिला को साल 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में पद्मभूषण दिया गया… सोचिये इस देश में क्या-क्या हो चुका है…
#Fake_History_of_Congress #Congress #PartitionHorrorsRemembranceDay #PartitionofIndia #Partion #विभाजन_विभीषिका
Note:-महान द ग्रेट ठरकी नेहरू बेगम साहिबा पर लट्टू थे… बेगम ने आजादी के बाद कई चुनाव मुस्लिम लीग के बैनर पर लड़ा था और इनको संविधान सभा में भी एंट्री दिलवाई थी…
Day: June 8, 2025
कांग्रेस के तलवे चाटू वामपंथी इतिहाकारों ने बेगम एजाज रसूल के बारे में बहुत कुछ लिखा लेकिन असली बात लिखना भूल गये…
बात ये कि जिन्ना की सबसे बड़ी चेली होने के बाद भी बेगम साहिबा पाकिस्तान क्यों नहीं गईं… चलो, वो मैं बता देता हूं।
तो बात ये है कि बेगम एजाज रसूल जिन्ना की बेहद-बेहद करीबी और मुस्लिम लीग की सबसे बड़ी महिला नेता थीं… 1945-46 के चुनावों में जिन्ना की इस चेली को यूपी के मुसलमानों ने भारी मतों से जितवाया था… इन चुनावों में बेगम साहिबा ने जमकर “जिन्ना जिंदाबाद” के नारे लगाये थे… लेकिन बड़ा सवाल… पाकिस्तान बनाने के बाद भी ये पाकिस्तान क्यों नहीं गईं?… इस सवाल का जवाब मुझे मिला ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च डिपार्टमेंट के आडियो अर्काइव में… जहां बेगम साहिबा का एक आडियो इंटरव्यू पड़ा हुआ है जो उन्होंने साल 1997 में दिया था… इस इंटरव्यू में बेगम एजाज रसूल से जब ये पूछा गया कि मुसलमानों ने जिन्ना और मुस्लिम लीग का इतना समर्थन क्यों किया और वह पाकिस्तान क्यों नहीं गईं, तो उन्होंने बड़ी मधुर आवाज़ में शातिराना जवाब देते हुए कहा कि –
“भारतीय इलाके में रहने वाले मुसलमानों को लगा कि उन्हें पाकिस्तान के इलाकों में रहनेवाले अपने भाइयों के लिए एक अलग मुल्क बनाने में मदद देना चाहिए। जिन्ना ने भी कहा था कि इसके लिए हिंदू इलाकों में रहनेवाले मुसलमानों को कुर्बानी देनी होगी। उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों मुसलमानों ने मुस्लिम लीग का साथ दिया क्योंकि वे अपने मुस्लिम भाइयों को एक अलग मुल्क बनाकर देना चाहते थे, जहां उनकी अपनी हुकूमत हो। उन लोगों ने इसके लिए अपनी कुर्बानी दी। आखिर, मैं ऐसे लाखों मुसलमानों को छोड़कर पाकिस्तान कैसे चले जाती जिन्होंने हमारे कहने पर पाकिस्तान के लिए वोट दिया था।”
अब इंटरव्यू का सोर्स क्या दूं… ये पूरा आडियो इंटरव्यू मेरे पास पड़ा हुआ है… जिस कांग्रेसी इतिहासकार या चमचे बेलचे को इसे सुनने का शौक हो साथ में पोस्ट कर रहा हूँ सुन लेना…
जो 1947 का जिन्ना की खास थी, वो इसके बाद कांग्रेस की खास बन गई… और सबसे हैरान कर देने वाली बात है कि ऐसी जिन्नावादी महिला को साल 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में पद्मभूषण दिया गया… सोचिये इस देश में क्या-क्या हो चुका है…
#Fake_History_of_Congress #Congress #PartitionHorrorsRemembranceDay #PartitionofIndia #Partion #विभाजन_विभीषिका
Note:-महान द ग्रेट ठरकी नेहरू बेगम साहिबा पर लट्टू थे… बेगम ने आजादी के बाद कई चुनाव मुस्लिम लीग के बैनर पर लड़ा था और इनको संविधान सभा में भी एंट्री दिलवाई थी…
क्या ये कुर्बानी है
बाजार से बकरा खरीदकर लाओ और उसे मारकर खा जाओ
कुर्बानी किसे कहते हैं, यह मै बताता हूं 💥
राजा दिलीप शेर से बोले – हे वनराज तुम इस गऊ के बदले मेरा भक्षण कर लो!…यह है कुर्बानी!
महाराज शिवि बोले – हे पक्षी राज इस कबूतर के बदले मैं अपने शरीर का मांस देता हूँ!… इसे कहते हैं कुर्बानी!
शैतानों को मारने की खातिर वज्र बनाने के लिए दधीचि ने स्वेच्छा से अपनी हड्डियां प्रदान कर दीं, ये है कुर्बानी!
राजा रन्तिदेव ने चालिस दिन के अकाल के बाद मिले भोजन को भी दान कर दिया, इसे कहेंगे कुर्बानी!
महारानी पद्मिनी ने म्लेच्छों से अपनी सतीत्व और देश की स्वाभिमान व इज्जत बचाने के लिए जौहर कर अपने अस्तित्व व जीवन को भी कुर्बान कर दिया!
अपने देश के युवराज उदय सिंह को बचाने के लिए पन्नाधाय ने अपने बेटे चंदन का बलिदान कर दिया,यह है कुर्बानी!
मातृभूमि की रक्षा की खातिर महाराणा प्रताप ने महल छोड़ जंगल में घास की रोटी खाकर जीवन व्यतीत किया, इसे कहेंगे कुर्बानी!
छोटे साहबजादे जिन्दा दीवार में चिनवा दिए गए
मगर उन्होंने अपना धर्म छोड़कर इस्लाम नही कबूला, यह है कुर्बानी!
महाराजा छत्रसाल ने समस्त धन खर्च कर सेना तैयार किया मुगलों से प्रजा की रक्षा के लिए यह है कुर्बानी!
धर्म की रक्षा के लिए संभाजी महाराज ने टुकड़े टुकड़े होकर मरना मंजूर किया. यह है कुर्बानी!
झांसी की रानी ने अपने जीते जी अपनी मातृभूमि अंग्रजों को नही सौंपी और मातृभूमि के लिए कुर्बान हो गई!
80 वर्ष की आयु में भी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए बाबू वीर कुंवर सिंह अंग्रेजो को भगाने के लिए रणभूमि में उतर गये यह है कुर्बानी!
राम मंदिर को बनाने की खातिर कई रामभक्त, कारसेवक बलिदान हो गये, यह है कुर्बानी!
कुर्बानी सीखनी है तो हम सनातनीयो से सीखो…
🚩🙏जय सनातन 👏🚩
🚩🙏 जब तक हिंदू धर्म है तब तक संसार सुरक्षित है। हिंदू धर्म का संरक्षण ही संसार के सलामत रहने की गारंटी है।
🚩🙏सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ है
दो पत्तो की कहानी💐💐*
एक समय की बात है… गंगा नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था। पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे।
एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा।
जो आड़ा गिरा वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा।”
वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा– रुक जा गंगा….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा!
पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है।
पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी..वो लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े भी वहीँ पहुंचेगा, जहां लड़कर.. थककर.. हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा।
वहीँ दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था।
यह कहता हुआ कि “चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा….तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा।
नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं…वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढ़ती जा रही थी।पर पत्ता तो आनंदित है, वह तो यही समझ रहा है ,कि वही नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है।
आड़े पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं, नदी तो वहीं पहुंचेगी जहाँ उसे पहुंचना है! पर अब और तब के बीच का समय उसके सुख का…. उसके आनंद का काल बन जाएगा।
जो पत्ता नदी से लड़ रहा है…उसे रोक रहा है, उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है और जो पत्ता नदी को बहाए जा रहा है उसकी हार को कोई उपाय संभव नहीं है।
हमारा जीवन भी उस नदी के सामान है जिसमें सुख और दुःख की तेज़ धारायें बहती रहती हैं …
और जो कोई जीवन की इस धारा को आड़े पत्ते की तरह रोकने का प्रयास भी करता है, तो वह मुर्ख है ,क्योंकि ना तो कभी जीवन किसी के लिये रुका है और ना ही रुक सकता है।
वह अज्ञान में है जो आड़े पत्ते की तरह जीवन की इस बहती नदी में सुख की धारा को ठहराने या दुःख की धारा को जल्दी बहाने की मूर्खता पूर्ण कोशिश करता है ।
क्योंकि सुख की धारा जितने दिन बहनी है… उतने दिन तक ही बहेगी। आप उसे बढ़ा नहीं सकते, और अगर आपके जीवन में दुःख का बहाव जितने समय तक के लिए आना है वो आ कर ही रहेगा, फिर क्यों आड़े पत्ते की तरह इसे रोकने की फ़िज़ूल मेहनत करना।
बल्कि जीवन में आने वाली हर अच्छी बुरी परिस्थितियों में खुश हो कर जीवन की बहती धारा के साथ उस सीधे पत्ते की तरह ऐसे चलते जाओ….
जैसे जीवन आपको नहीं बल्कि आप जीवन को चला रहे हो। सीधे पत्ते की तरह सुख और दुःख में समता और आनन्दित होकर जीवन की धारा में मौज से बहते जाएँ।
और जब जीवन में ऐसी सहजता से चलना सीख गए तो फिर सुख क्या? और दुःख क्या ?
शिक्षा- जीवन के बहाव में ऐसे ना बहें कि थक कर हार भी जाएं और अंत तक जीवन आपके लिए एक पहेली बन जाये। बल्कि जीवन के बहाव को हँस कर ऐसे बहाते जाएं की अंत तक आप जीवन के लिए पहेली बन जायें।
सुख हमारी खुद की सम्पत्ति है… इसे बाहर नहीं अपने भीतर ही तलाशें। इससे आप सदैव सुखी रहेंगे।
ीवन का संघर्ष💐💐*
एक बार एक व्यक्ति को अपने उद्यान में टहलते हुए किसी टहनी से लटकता हुआ एक तितली का कोकून दिखाई पड़ा. अब प्रतिदिन वो व्यक्ति उसे देखने लगा और एक दिन उसने ध्यान किया कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया है।. उस दिन वो वहीं बैठ गया और घंटों उसे देखता रहा। उसने देखा की तितली उस खोल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश कर रही है, पर बहुत देर तक प्रयास करने के बाद भी वो उस छेद से नहीं निकल पायी और फिर वो बिलकुल शांत हो गयी मानो उसने हार मान ली हो.
इसलिए उस व्यक्ति ने निश्चय किया कि वो उस तितली की मदद करेगा. उसने एक कैंची उठायी और कोकून की उस छेद को इतना बड़ा कर दिया की वो तितली आसानी से बाहर निकल सके और यही हुआ, तितली बिना किसी और संघर्ष के आसानी से बाहर निकल आई, पर उसका शरीर सूजा हुआ था और पंख सूखे हुए थे।
वो व्यक्ति तितली को ये सोच कर देखता रहा कि वो किसी भी वक़्त अपने पंख फैला कर उड़ने लगेगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसके उलट बेचारी तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और उसे अपनी बाकी की ज़िन्दगी इधर-उधर घिसटते हुए बीतानी पड़ी.
वो व्यक्ति अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया की दरअसल कोकून से निकलने की प्रक्रिया को प्रकृति ने इतना कठिन इसलिए बनाया है ताकि ऐसा करने से तितली के शरीर में मौजूद तरल उसके पंखों में पहुंच सके और वो छेद से बाहर निकलते ही उड़ सके.
आत्मा से तृप्त लोग💐💐*
बस स्टैंड पर बैठा मैं गृह नगर जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था। अभी बस स्टैण्ड पर बस लगी नहीं थी।
मैं बैठा हुआ एक किताब पढ़ रहा था।
मुझे देखकर लगभग 10 साल की एक बच्ची मेरे पास आकर बोली, “बाबू पैन ले लो,10 के चार दे दूंगी। बहुत भूख लगी है, कुछ खा लूंगी।”
उसके साथ एक छोटा-सा लड़का भी था, शायद भाई हो उसका।
मैंने कहा: मुझे पैन तो नहीं चाहिए।
आगे उसका सवाल बहुत प्यारा सा था,
फिर हम कुछ खाएंगे कैसे ?
मैंने कहा: मुझे पैन तो नहीं चाहिए पर तुम कुछ खाओगे जरूर।
मेरे बैग में बिस्कुट के दो पैकेट थे, मैने बैग से निकाल एक-एक पैकेट दोनों को पकड़ा दिया, पर मेरी हैरानी की कोई हद ना रही जब उसने एक पैकेट वापिस करके कहा,”बाबू जी! एक ही काफी है, हम बाँट लेंगे”।
मैं हैरान हो गया जवाब सुनकर !
मैंने दुबारा कहा: “रख लो, दोनों। कोई बात नहीं।”
मेरी आत्मा को झिंझोड़ दिया उस बच्ची के जवाब ने। उसने कहा:………….. “तो फिर आप क्या खाओगे”?
इस संसार में करोड़ों अरबों कमाने वाले लोग जहां उन्नति के नाम पर इंसानियत को ताक पर रखकर लोगों को बेतहाशा लूटने में लगे हुए हैं, वहां एक भूखी बच्ची ने मानवता की पराकाष्ठा का पाठ पढ़ा दिया।
मैंने अंदर ही अंदर अपने आप से कहा,इसे कहते हैं आत्मा के तृप्त लोग, लोभवश किसी से इतना भी मत लेना कि उसके हिस्से का भी हम खा जाएं…………….
मक्खीचूस गीदड💐💐*
जंगल में एक गीदड रहता था था। वह बड़ा कंजूस था।
क्योंकि वह एक जंगली जीव था इसलिए हम रुपये-पैसों की कंजूसी की बात नहीं कर रहे। वह कंजूसी अपने शिकार को खाने में किया करता था। जितने शिकार से दूसरा गीदड दो दिन काम चलाता, वह उतने ही शिकार को सात दिन तक खींचता। जैसे उसने एक खरगोश का शिकार किया। पहले दिन वह एक ही कान खाता। बाकी बचाकर रखता। दूसरे दिन दूसरा कान खाता। ठीक वैसे जैसे कंजूस व्यक्ति पैसा घिस घिसकर खर्च करता हैं। गीदड अपने पेट की कंजूसी करता। इस चक्कर में प्रायः भूखा रह जाता। इसलिए दुर्बल भी बहुत हो गया था।
एक बार उसे एक मरा हुआ बारहसिंघा हिरण मिला। वह उसे खींचकर अपनी मांद में ले गया। उसने पहले हिरण के सींग खाने का फैसला किया ताकि मांस बचा रहे। कई दिन वह बस सींग चबाता रहा। इस बीच हिरण का मांस सड़ गया और वह केवल गिद्धों के खाने लायक रह गया।
इस प्रकार मक्खीचूस गीदड प्रायः हंसी का पात्र बनता। जब वह बाहर निकलता तो दूसरे जीव उसका मरियल-सा शरीर देखते और कहते “वह देखो, मक्खीचूस जा रहा हैं।”
पर वह परवाह न करता। कंजूसों में यह आदत होती ही हैं। कंजूसों की अपने घर में भी खिल्ली उड़ती हैं, पर वह इसे अनसुना कर देते हैं।
उसी वन में एक शिकारी शिकार की तलाश में एक दिन आया। उसने एक सुअर को देखा और निशाना लगाकर तीर छोडा। तीर जंगली सुअर की कमर को बींधता हुआ शरीर में घुसा। क्रोधित सुअर शिकारी की ओर दौड़ा और उसने खच से अपने नुकीले दंत शिकारी के पेंट में घोंप दिए। शिकारी ओर शिकार दोनों मर गए।
तभी वहां मक्खीचूस गीदड आ निकला। वह खुशी से उछल पड़ा। शिकारी व सुअर के मांस को कम से कम दो महीने चलाना हैं। उसने हिसाब लगाया।
“रोज थोडा-थोडा खाऊंगा।’ वह बोला।
तभी उसकी नजर पास ही पड़े धनुष पर पड़ी। उसने धनुष को सूंघा। धनुष की डोर कोनों पर चमड़ी की पट्टी से लकडी से बंधी थी। उसने सोचा “आज तो इस चमडी की पट्टी को खाकर ही काम चलाऊंगा। मांस खर्च नहीं करूंगा। पूरा बचा लूंगा।’
ऐसा सोचकर वह धनुष का कोना मुंह में डाल पट्टी काटने लगा। ज्यों ही पट्टी कटी, डोर छूटी और धनुष की लकडी पट से सीधी हो गई। धनुष का कोना चटाक से गीदड के तालू में लगा और उसे चीरता हुआ। उसकी नाक तोड़कर बाहर निकला। मख्खीचूस गीदड वहीं मर गया।
मेरी प्रेरणा💐💐*
ऑफिस से आते ही वह आज कपड़ों की अलमारी लगाने में लग गई, अपने पति शिखर के आने के पहले ही वह उसके कपड़े प्रेस के लिए देना चाह रही थी,।
तभी शिखर की अलमारी से एक बन्द,पुराना सा पैकेट नीचे गिरते ही उसकी नजर उस पर लिखे “मेरी प्रेरणा” पर चली गई, यह क्या?
एक पुलिस ऑफिसर होंने के साथ ही
एक नारी मन शक के चक्रव्यूह में फंसता चला गया, शिखर जो कि एक आई ए एस ऑफिसर थे , अपने जीवन साथी के साथ वह दस माह पहले ही विवाह बंधन में बंधी थी, ” क्या शिखर मुझसे पहले–नहीं ऐसा नहीं हो सकता, ” उसने तो मुझसे यही कहा था कि तुम ही मेरा पहला एवम आखिरी प्यार–तभी अंदर से आवाज आई “आ गई बेटी,में चाय बनाती हूं” घर मे कई नौकर होने के बावजूद भी शांति ही अपने बेटे बहु को हाँथ से चाय बना कर पिलाती थीं।
” जी माँ, चाय तो मैं आपके ही हाँथ की पिऊंगी,” शिखर के साथ साथ उसे भी उनकी माँ की बनाई चाय अच्छी लगने लगी थी, ।
माँ, एक बात पूंछू , चाय पीते पीते ‘”क्या शिखर पहले किसी,–तभी माँ उसके हाँथ में पैकेट देख उसकी जिज्ञाशा को समझते हुए उसके सामने ही न चाहते हुए पैकेट खोलने लगी, 8-10 साल के बच्चे की सफेद शर्ट जिसमे पीछे नीली स्याही का बहुत बड़ा
धब्बा बना था देख वह चौक उठी , उसके मुंह से ” माँ,$$ मैं , भी क्या क्या,”
माँ के एक एक शब्द उसके सीने को चीर रहे थे,और वह आत्मग्लानि से भरती जा रही थी ।
“जब शिखर पांचवी में पढ़ता था ,उसके साथ ही पड़ोस में रहने वाले कलेक्ट्रेट के बड़े बाबू का लाडला ,जो अपने को कलेक्टर का बेटा बोलता और शिखर से ही अपना होमवर्क करवाता था, सभी पर सदा अपना रॉब जमाता था।
शिखर की स्याही की दावत उसने फोड़ दी।
” मैं कैसे लिखूंगा, मुझे थोड़ी स्याही अपनी दवात से दे दो” , उस शैतान लड़के ने पूरी स्याही की दावत इसकी शर्ट पर डाल दी स्कूल से आने पर यह खूब रोया , उसके पिताजी से बताने गया तो “चलो हटो , एक नौकरानी का बेटा , मेरे बेटे की बराबरी करने चला आया और शर्ट के साथ 20 रुपये फेंक कर इसे घर से बाहर निकाल दिया “
“देखा मेरे पापा कलेक्टर है , ” हंसते हुए उनके लड़के ने दरवाजे बंद कर लिए।
माँ, कलेक्टर क्या होता है, इसने हाँथ में शर्ट लिए रोते हुए पूंछा, था और कई दिनों तक बिना स्कूल ड्रेस के स्कूल न जा सका था ।
शिखर के बीमार एवम अपाहिज पिता के अंतिम शब्द ,” अपने बेटे को कलेक्टर बनाना” मुझे याद रहे।
दरवाजे के बाहर खड़े सभी बातों को सुन रहे शिखर ने “अरे मेरी पुलिस ऑफिसर ,”
” मेरी प्रेरणा ” ने ही मुझे तुमसे मिलाया है ,। और अपनी बाहों का हार उसके गले मे डाल दिया ।
और दोनों अपने को इस मुकाम पर पहुंचाने वाली नायिका अपनी जन्मदात्री के सीने से लग गये।
पुण्य और कर्तव्य💐💐*
एक बार की बात है एक बहुत ही पुण्य व्यक्ति अपने परिवार सहित तीर्थ के लिए निकला। कई कोस दूर जाने के बाद पूरे परिवार को प्यास लगने लगी, ज्येष्ठ का महीना था, आस पास कहीं पानी नहीं दिखाई पड़ रहा था। उसके बच्चे प्यास से व्याकुल होने लगे। समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। अपने साथ लेकर चला गया पानी भी समाप्त हो चुका था।
एक समय ऐसा आया कि उसे भगवान से प्रार्थना करनी पड़ी कि, “हे प्रभु ! अब आप ही कुछ करो मालिक।” इतने में उसे कुछ दूर पर एक साधु तप करता हुआ नजर आया। व्यक्ति ने उस साधु से जाकर अपनी समस्या बताई। साधु बोले कि यहाँ से एक कोस दूर उत्तर की दिशा में एक छोटी दरिया बहती है जाओ जाकर वहाँ से पानी की प्यास बुझा लो।
साधु की बात सुनकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने साधु का धन्यवाद किया। पत्नी एवं बच्चो की स्थिति नाजुक होने के कारण वहीं रुकने के लिये बोला और खुद पानी लेने चला गया।
जब वो दरिया से पानी लेकर लौट रहा था तो उसे रास्ते में पांच व्यक्ति मिले जो अत्यंत प्यासे थे। पुण्य आत्मा को उन पांचो व्यक्तियों की प्यास देखी नहीं गयी और अपना सारा पानी उन प्यासों को पिला दिया। जब वो दोबारा पानी लेकर आ रहा था तो पांच अन्य व्यक्ति मिले जो उसी तरह प्यासे थे। उस पुण्य आत्मा ने फिर अपना सारा पानी उनको पिला दिया।
यही घटना बार-बार हो रही थी, और काफी समय बीत जाने के बाद जब वो नहीं आया तो साधु उसकी तरफ चल पड़ा। बार बार उसके इस पुण्य कार्य को देख कर साधु बोला, “हे पुण्य आत्मा ! तुम बार-बार अपना बाल्टी भरकर दरिया से लाते हो और किसी प्यासे के लिए खाली कर देते हो। इससे तुम्हें क्या लाभ मिला ?” पुण्य आत्मा ने कहा, “मुझे क्या मिला ? या क्या नहीं मिला, इसके बारें में मैंने कभी नहीं सोचा, पर मैंने अपना स्वार्थ छोड़ कर अपना धर्म निभाया है।”
साधु बोला, “ऐसे धर्म निभाने से क्या फायदा जब तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा पाये। बिना जल के तुम्हारे अपने बच्चे और परिवार ही जीवित ना बचें ? तुम अपना धर्म ऐसे भी निभा सकते थे जैसे मैंने निभाया।” पुण्य आत्मा ने पूछा, “कैसे महाराज ?”
साधु बोला, “मैंने तुम्हे दरिया से पानी लाकर देने के बजाय दरिया का रास्ता ही बता दिया। तुम्हे भी उन सभी प्यासों को दरिया का रास्ता बता देना चाहिए था, ताकि तुम्हारी भी प्यास मिट जाये और अन्य प्यासे लोगों की भी। फिर किसी को अपनी बाल्टी खाली करने की जरुरत ही नहीं होती।” इतना कहकर साधु अंतर्ध्यान हो गया।
पुण्य आत्मा को सब कुछ समझ आ गया कि केवल स्वयं पुण्य कमाने में ना लगकर, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए दूसरों को भी पुण्य की राह दिखायें। किसी का भी भला करने का सबसे सही तरीका यही है कि उसे परमात्मा और सच्चाई की राह दिखा दें।
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।
िता की तरफ से बेटी को अदभुत भेट-संस्कार
विवाह के बाद, पहली बार मायके आयी बेटी का स्वागत सप्ताह भर चला।
सम्पूर्ण सप्ताह भर बेटी को जो पसन्द है, वही सब किया गया, वापिस ससुराल जाते समय, पिता ने बेटी को एक अति सुगंधित अगरबत्ती का पुडा दिया, और कहा, की, बेटी तुम जब ससुराल में पूजा करने जाओगी तब यह अगरबत्ती जरूर जलाना।
माँ ने कहा, बिटिया प्रथम बार मायके से ससुराल जा रही है, तो ऐसे कोई अगरबत्ती जैसी चीज कोई देता है भला।
पिता ने झट से जेब मे हाथ डाला और जेब मे जितने भी रुपये थे वो सब बेटी को दे दिए।
ससुराल में पहुंचते ही सासु माँ ने बहु के मात-पिता ने बेटी को बिदाई में क्या दिया यह देखा, तो वह अगरबत्ती का पुडा भी दिखा, सासु माँ ने मुंह बना कर बहु को बोला कि , कल पूजा में यह अगरबत्ती लगा लेना।
सुबह जब बेटी पूजा करने बैठी तो वह अगरबत्ती का पुडा खोला, उसमे से एक चिट्ठी निकली,
_लिखा था….
“बेटा यह अगरबत्ती स्वतः जलती है, मगर संपूर्ण घर को सुगंधी कर देती है, इतना ही नही तो, आजु-बाजू के पूरे वातावरण को भी अपनी महक से सुगंधित एवम प्रफुल्लित कर देती है….!!
हो सकता ह की तूम कभी पति से कुछ समय के लिए रुठ जाओगी, या कभी अपने सास-ससुरजी से नाराज हो जाओगी, कभी देवर या ननद से भी रूठोगी, कभी तुम्हे किसी से बाते सुननी भी पड़ जाए, या फिर कभी अडोस-पड़ोसियों के वर्तन पर तुम्हारा दिल खट्टा हो जाये, तब तुम मेरी यह भेंट ध्यान में रखना।
अगरबत्ती की तरह जलना, जैसे अगरबत्ती स्वयं जलते हुए पूरे घर और सम्पूर्ण परिसर को सुगंधित और प्रफुल्लित कर ऊर्जा से भरती है, ठीक उसी तरह तुम स्वतः सहन कर तेरे ससुराल को अपना मायका समझ कर सब को अपने व्यवहार और कर्म से सुगंधित और प्रफुल्लित करना….।
बेटी चिट्ठी पढ़कर फफकर रोने लगी, सासूमा लपककर आयी, पति और ससुरजी भी पूजा घर मे पहुंचे जहां बहु रो रही थी।
“अरे हाथ को चटका लग गया क्या?, ऐसा पति ने पूछा।
“क्या हुआ यह तो बताओ, ससुरजी बोले।
सासूमाँ आजु बाजु के सामान में कुछ है क्या यह देखने लगी,
तो उन्हें पिता द्वारा सुंदर अक्षरों में लिखी हुई चिठ्ठी नजर आयी, चिट्ठी पढ़ते ही उन्होंने बहु को गले से लगा लिया, और चिट्ठी ससुरजी के हाथों में दी, चश्मा ना पहने होने की वजह से, चिट्ठी बेटे को देकर पढ़ने के लिए कहा।
सारी बात समझते ही संपूर्ण घर स्तब्ध हो गया।
सासु माँ बोली अरे, यह चिठ्ठी फ्रेम करानी ह, यह मेरी बहु को मिली हुई सबसे अनमोल भेंट है, पूजा घर के बाजू में में ही इसकी फ्रेम होनी चाहिए।
और फिर सदैव वह फ्रेम अपने शब्दों से, सम्पूर्ण घर, और अगल-बगल के वातावरण को अपने अर्थ से महकाती रही, अगरबत्ती का पुडा खत्म होने के बावजूद भी…….
इसे कहते है,….
संस्कार……. मायके के !
आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।