संयुक्त निकाय-तृतीय वर्ग
(पुग्गल सुत्त)
चार प्रकार के व्यक्ति
एक बार जब भगवान गौतम बुद्ध श्रावस्ती में थे, तब कोशलराज प्रसेनजित् जहाँ भगवान् थे, वहाँ आया, और भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया।
एक ओर बैठे हुए कोशलराज प्रसेनजित् को भगवान् ने कहा- महाराज संसार में चार प्रकार के लोग पाये जाते हैं।
कौन से चार प्रकार के:-
(१) तम-तम-परायणः (२) तम-ज्योति-परायणः
(३) ज्योति-तम-परायणः (४) ज्योति-ज्योति-परायण।
हे राजन् ! (जो कोई) दरिद्र पुरुष, अश्रद्धारहित, कंजूस, मक्खीचूस, पाप-संकल्पोंवाला, झूठे मत मानने वाला, पुण्य कर्मों में आदर-रहित होता है, श्रमण, ब्राह्मण, अथवा दूसरे भी याचकों को डाँटता और गालियां देता है, क्रोधी, नास्तिक होता है, माँगने वालों को भोजन देते हुए रोकता है।
हे राजन् ! हे जनाधिप ! उस प्रकार का पुरुष तम-तम-परायण है; वह यहाँ से मर कर घोर नरक में पड़ता है।
हे राजन् ! (जो कोई) दरिद्र पुरुष श्रद्धालु, कंजूसी-रहित होता है, दान देता है, श्रेष्ठ संकल्पों वाला, अव्यग्र मन वाला पुरुष, श्रमण, ब्राह्मण अथवा दूसरे याचकों को भी उठकर अभिवादन करता है, संयम का अभ्यास करता है, माँगने वालों को भोजन देते हुए मना नहीं करता ।
हे राजन् ! उस प्रकार का पुरुष तम-ज्योति-परायण है; वह यहाँ से मर कर स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है।
हे राजन् ! (जो कोई) धनाढ्य पुरुष, श्रद्धारहित, कंजूस होता है, मक्खीचूस, पाप-संकल्पोंवाला, झूठे मत माननेवाला, पुण्य कर्मों में आदर-रहित, श्रमण, ब्राह्मण अथवा दूसरे भी याचकों को डाँटता और गालियाँ देता है, क्रोधी, नास्तिक होता है, माँगने वालों को भोजन देते हुए मना कर देता है।
हे राजन् ! उस प्रकार का पुरुष ज्योति-तम-परायण है, वह यहाँ से मर कर घोर नरक में पड़ता है।
हे राजन् ! (जो कोई) धनाढ्य पुरुष, श्रद्धालु, कंजूसी-रहित होता है, दान देता है, श्रेष्ठ संकल्पोंवाला, अव्यग्र मनवाला पुरुष, श्रमण, ब्राह्मण अथवा दूसरे याचकों को भी उठ कर अभिवादन करता है, संयम का अभ्यास करता है, माँगने वालों को भोजन देते हुए मना नहीं करता ।
हे राजन् ! उस प्रकार का पुरुष ज्योति-ज्योति-परायण है; वह यहाँ से मर कर स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है।
इस सूक्त की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भगवान गौतम बुद्ध ने श्रमण और ब्राह्मण दोनों को एक ही श्रेणी में रखते हुए आदर, सम्मान और दान का अधिकारी माना था। दोनों का अपमान करने वाले व्यक्ति को अधम श्रेणी का माना है।
इससे भी उल्लेखनीय बात यह है की गौतम बुद्ध यह मानते थे कि इस जन्म में जीवन में अच्छे कर्म करने से अगले जन्म में अच्छे कुल में जन्म होता है और इस जन्म में पाप युक्त कर्म करने से अगले जन्म में नीच कुल में जन्म होता है।
यही बात यदि किसी हिंदू धर्माचार्य ने आज कही होती तो उस पर अंधविश्वास और वर्ण श्रेष्ठता का भाव बढ़ाने का आरोप लग सकता है।
यहां मैं केवल यह बताना चाहता हूं की हजारों वर्ष पुराने किसी धर्म ग्रंथ का सहारा लेकर आप किसी भी धार्मिक आस्था को सदा सर्वदा के लिए शर्मिंदा नहीं कर सकते हैं। सभी धर्म अपने-अपने समय की उपज होते हैं और समय के साथ-साथ उनमें उत्क्रांती होती चली जाती है। जो धर्म अपने आप को निरंतर आधुनिक बनाते चलता है, वही समय की तेज बहती नदी में टिक सकता है, बाकी सब बह जाते हैं, क्षीण हो जाते है।
उन्हें कोई नष्ट नहीं करता, समय की नदी ही उन्हें डूबा देती है। यह समय बढ़े बढ़े राजपाट निगल चुका है, हजारों भाषाएं निगल चुका है, हजारों संस्कृतियाँ निगल चुका है।
हिन्दी के महान कवि कुँवर नारायण ने लिखा है:
घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे
समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे
अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम
एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे।
मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके,
हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न, खो के,
और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम
अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग हो के।
एड. दिनेश शर्मा, पुलगांव