Posted in हिन्दू पतन

जयशंकर प्रसाद की एक कहानी थी, ममता जिसमें वह एक ऐसी हिंदू कन्या का उल्लेख करते हैं जिसने हुमायूँ को आश्रय देकर उसके प्राण बचाये थे। उसके पिता की हत्या धोखे से  विधर्मियों ने कर दी थी बावजूद इसके उसने एक विधर्मी की प्राण रक्षा की। कहानी के अंत में जब ममता वृद्ध हो जाती है तो एक सैनिक उस जगह का पता पूछते आता है जहाँ हुमायूँ को शरण मिली थी।  ममता उसे अपनी कुटिया की तरफ इशारा कर के बताती है। ममता की कुटिया ढहा दी जाती है और एक इमारत उसके ऊपर बनाई जाती है जिस पर लिखा होता है कि दुनिया भर के बादशाह  हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था पर हुमायूँ की कृतघ्नता इतनी कि उसमें ममता का नाम गायब था।

यही पैटर्न है गंगा जमुनी तहजीब का, हम शरण मे आये की रक्षा प्राण देकर करते पर वे धोखे से शरण लेकर हत्या करते हैं। हमारी दया, करुणा उनके लिए स्वर्ण अवसर है वार करने का। हम अपने धर्म पालन के लिए दूसरे की जान बचाते हैं वे कथित धर्म के लिए दूसरे की जान ले लेते हैं।  कल्पना करिए यदि ममता वहीं पर थके घायल हुमायूँ का सर तन से अलग कर देती तो इतिहास क्या होता? पर नही अतिथि भगवान होता है।

यह बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि धर्म का एक पहलू और होता है वह है आपद धर्म जो देश काल परिस्थिति के हिसाब से व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है। एक की जान बचाने के लिए लाखों लोगों के सर धड़ से अलग करवाने का शाप निश्चित रूप से ममता के ऊपर आया होगा।

किसी एक के प्रति करुणा दिखाते समय हमें यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि इसकी वजह से कितने घर सूने हो जाएंगे, कितने बालक अनाथ हो जाएंगे।

मणिपुर में धर्म परिवर्तित कुकी और मैती  हिंदू आदिवासियों के मध्य संघर्ष में लगभग 35 हजार मैती पलायन कर चुके हैं, पता नहीं कितने मारे जा चुके हैं, अनेक महिलाओं के साथ शील भंग हुआ है।

तमाम रोहिंग्याओ, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी म्लेच्छों को शरण देकर हमने देश में घुन लगा लिया है।

काश कि ममता उस दिन हुमायूं का गला घोंट देती, काश कि राय पिथौरा गोरी पर दया न दिखा कर उसका सर अलग कर देते, काश कि अमरकोट में हुमायूं को शरण न मिली होती।

काश… कि यह काश न होता।

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