कहानी:- मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार अपने भव्य स्वरूप में सजा हुआ था। स्वर्णिम छतरी के नीचे चमकते सिंहासन पर सम्राट विराजमान थे, और उनके चारों ओर विद्वानों, मंत्रियों तथा सेनापतियों की सभा आसीन थी। महामंत्री आचार्य चाणक्य अपने गहन ज्ञान और सूझबूझ से दरबार की कार्यवाही संचालित कर रहे थे।
चंद्रगुप्त को विलक्षण और अनोखी वस्तुओं का बड़ा शौक था, विशेषकर खिलौनों में उनकी रुचि असाधारण थी। प्रतिदिन वह कोई न कोई नया खिलौना देखने की इच्छा रखते थे। आज भी, जैसे ही उन्होंने उत्सुकतावश पूछा—
“आज हमारे लिए क्या नवीन उपहार आया है?”
एक दरबारी ने तुरंत सूचना दी—
“महाराज! एक दूरदेशीय सौदागर दरबार की दहलीज़ पर खड़ा है। वह दावा करता है कि उसने ऐसे अनूठे पुतले बनाए हैं, जिन्हें न तो आपने पहले कभी देखा होगा और न ही भविष्य में देखने को मिलेंगे।”
चंद्रगुप्त की जिज्ञासा प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने सौदागर को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।
कुछ ही क्षणों में, एक कुटिल मुस्कान लिए सौदागर राजदरबार में प्रविष्ट हुआ। उसने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और अपनी झोली में से तीन सुंदर, सजीव-से प्रतीत होते पुतले बाहर निकाले। उन पुतलों की कारीगरी इतनी उत्कृष्ट थी कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता मानो वे किसी क्षण बोल उठेंगे।
सौदागर ने पुतलों को राजा के समक्ष रखते हुए कहा—
“महाराज, ये तीनों पुतले अद्वितीय हैं। देखने में एक जैसे हैं, किंतु इनके गुण भिन्न-भिन्न हैं। पहला पुतला एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का है, दूसरा मात्र एक हजार मुद्राओं का, और तीसरे की कीमत केवल एक मुद्रा है।”
यह सुनकर सम्राट चकित रह गए। उन्होंने पुतलों को हर ओर से देखा, परंतु उनमें कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई दिया।
“इनमें इतना मूल्य अंतर क्यों?”— चंद्रगुप्त ने विस्मयपूर्वक पूछा।
मगर कोई उत्तर नहीं मिला। सभा में सन्नाटा छा गया। हर कोई पुतलों को उलट-पलट कर देखने लगा, परन्तु भेद कोई न पा सका। हारकर सम्राट ने महामंत्री चाणक्य की ओर देखा और कहा—
“गुरुदेव, आपके समक्ष कोई भी रहस्य अधिक देर तक छिपा नहीं रह सकता। कृपया इस गूढ़ पहेली को सुलझाने का कष्ट करें।”
चाणक्य मंद मुस्कुराए। उन्होंने पुतलों को ध्यानपूर्वक देखा और एक प्रहरी को आदेश दिया—
“तिनके ले आओ।”
सभी अचंभित थे। आखिर पुतलों का रहस्य तिनकों से कैसे खुलेगा?
कुछ ही क्षणों में, सैनिक तिनके ले आया। चाणक्य ने पहला तिनका उठाया और उसे पहले पुतले के कान में डाला। सभा में उपस्थित जन विस्मय से देखते रहे— तिनका सीधा पुतले के पेट में चला गया। कुछ क्षणों बाद पुतले के होंठ हिले, मानो वह कुछ कहने वाला हो, परंतु उसने कुछ नहीं कहा।
इसके बाद, आचार्य ने दूसरा तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार, सभी ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर निकल गया। किंतु पुतला वैसा ही स्थिर बना रहा।
अब चाणक्य ने तीसरे पुतले की बारी ली। जैसे ही तिनका उसके कान में डाला, वह सीधे पुतले के मुँह से बाहर निकल आया। और तब— पुतले का मुख खुल गया, मानो वह ऊँचे स्वर में कुछ चिल्ला रहा हो।
दरबार में हलचल मच गई। चंद्रगुप्त ने उत्सुकतावश पूछा—
“गुरुदेव! यह क्या रहस्य है? इन पुतलों का मूल्य इतना भिन्न क्यों है?”
चाणक्य गंभीरता से बोले—
“राजन! ये तीन पुतले मनुष्यों के स्वभाव के तीन भिन्न प्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
फिर उन्होंने प्रथम पुतले की ओर इशारा कर कहा—
“यह वह व्यक्ति है जो सुनी-सुनाई बातों को अपने हृदय में संजोकर रखता है। वह पहले विचार करता है, फिर अपनी वाणी खोलता है। यह एक ज्ञानी और विवेकी पुरुष का प्रतीक है। ऐसा व्यक्ति अपने ज्ञान की गंभीरता और बुद्धिमत्ता के कारण अत्यधिक मूल्यवान होता है। इसी कारण, इस पुतले का मूल्य एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ है।”
इसके पश्चात, उन्होंने दूसरे पुतले की ओर संकेत करते हुए कहा—
“यह वह व्यक्ति है, जो कुछ भी सुनता है, किंतु न तो उस पर ध्यान देता है और न ही उसे दूसरों को बताने में रुचि रखता है। वह अपने ही संसार में मग्न रहता है। ऐसे व्यक्ति किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाते, परंतु किसी विशेष योगदान के अभाव में उनकी कीमत सीमित रहती है। अतः इसका मूल्य एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ है।”
अंत में, उन्होंने तीसरे पुतले की ओर दृष्टि घुमाई और बोले—
“यह तीसरा पुतला उन लोगों का प्रतीक है जो किसी भी बात को बिना सोचे-समझे तुरंत दूसरों को बता देते हैं। वे कान के कच्चे और मुँह के हल्के होते हैं। बिना सत्यापन के किसी भी सूचना को फैलाने वाले लोग समाज में भ्रम और अशांति उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए, इस पुतले का मूल्य केवल एक मुद्रा है।”
सम्राट चंद्रगुप्त ने गहरे चिंतन के साथ चाणक्य के शब्दों को आत्मसात किया। दरबार में बैठे सभी व्यक्तियों ने भी इस कथा से एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त की।
शिक्षा:- मनुष्य को सदैव विवेकपूर्ण ढंग से व्यवहार करना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए, अपितु पहले तथ्यों की पुष्टि करनी चाहिए। ज्ञानवान व्यक्ति वही होता है, जो अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करता है।
आज के युग में भी यह शिक्षा अत्यंत प्रासंगिक है। जब सूचना तेजी से फैलती है, तब हमें यह निर्णय लेना चाहिए कि हम कौन-से पुतले की तरह बनना चाहते हैं—
▪️ वह जो सोच-समझकर बोलता है और समाज में आदर प्राप्त करता है?
▪️ वह जो अनसुना कर देता है, किंतु किसी को हानि नहीं पहुँचाता?
▪️ या वह, जो बिना सोचे-समझे कुछ भी कहकर समस्याएँ उत्पन्न करता है?
निर्णय आपका है!