Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

સ્વાદ*

એક શેઠને પોતાના નોકર પર ખુબ પ્રેમ હતો. નોકર પાસે કામ કરાવે પણ સાથે સાથે નોકરનું ધ્યાન પણ રાખે. ઘણીવાર તો નોકરને પોતાના હાથે જમાડે પણ ખરા.

નોકર પણ આવા માલિકને મેળવીને પોતાની જાતને ધન્ય સમજતો હતો અને આનંદથી પોતાની જીંદગીને જીવતો હતો.

એકવાર સાંજના સમયે નોકર ખેતરમાંથી કામ કરીને થાક્યો પાક્યો ઘેર આવ્યો. શેઠે એને પોતાની પાસે બોલાવ્યો અને કહ્યુ કે મેં તારા માટે એક તરબુચ રાખ્યુ છે ચાલ હું તને તેની ચીરીઓ કરીને આપું.

શેઠે પોતાની જાતે જ તરબુચની એક ચીરી કરીને નોકરને ખાવા માટે આપી અને પછી પુછ્યુ કે કેવી લાગી ?

પેલા નોકરે કહ્યુ , “ માલિક , બહું જ મીઠી છે. મારી અત્યાર સુધીની જીંદગીમાં આવું મીઠું તરબુચ મેં ક્યારેય ખાધું નથી. ”

નોકરને તરબુચ ગમ્યુ એટલે શેઠ એક પછી એક ચીર કરીને નોકરને આપતા ગયા અને નોકર વખાણ કરતા કરતા આ ચીર ખાતો ગયો. શેઠના હાથમાં છેલ્લી ચીર હતી.

નોકર પાસે આ તરબુચની મિઠાશના બહું વખાણ સાંભળ્યા એટલે શેઠને તરબુચ ચાખવાની ઇચ્છા થઇ. તરબુચની ચીર પોતાના મોઢામાં નાંખી ત્યાં તો થું થું કરતા બહાર ફેંકી દીધી.

નોકરને કહ્યુ કે “આ તો કોઇપણ જાતના સ્વાદ વગરની છે તો પછી તું કેમ ખોટા વખાણ કરતો હતો.”

નોકરે કહ્યુ , “ માલિક હું તરબુચની ચીરના નહી પરંતું આપની લાગણી અને પ્રેમના વખાણ કરતો હતો. તરબુચ ભલેને સ્વાદ વગરનું હોય પણ તમારા હાથના સ્પર્શથી એ મીઠું થઇ જતું હતું. તમે મને ઘણીવાર ઘણું બધું સારુ સારુ ખવડાવ્યુ જ છે તો હવે હું આ એક સામાન્ય તરબુચને કેમ કરીને ખરાબ કહી શકું ?”

**

મિત્રો : આપણે ઘણી વાર આપણા સ્વાદ ગુલામ બની જય એ છીએ … અને ભૂલી જઈ એ છીએ કે બનાવનાર ને કેટલો શ્ર્રમ પડયો હશે ….

રોજ પ્રેમથી રસોઇ બનાવીને જમાડનારી પત્નિ કે મા ની રસોઇ જો ક્યારેક સ્વાદ વિહોણી લાગે તો એ બનાવતી વખતની લાગણી અને પ્રેમને યાદ કરજો રસોઇનો સ્વાદ જ બદલાઇ જશે.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कर्म प्रतिबिंब: कृष्ण से कंस तक

एक चित्रकार था, जो अद्धभुत चित्र बनाता था। लोग उसकी चित्रकारी की काफी प्रशंसा करते थे। एक दिन श्री कृष्ण मंदिर के भक्तों ने उनसे कृष्ण और कंस का एक चित्र बनाने की इच्छा व्यक्त की। चित्रकार तुरन्त इसके लिये तैयार हो गया क्योंकि यह भगवान् का काम था, पर उसने कुछ शर्ते रखी।

उसने कहा मुझे योग्य पात्र चाहिए अगर वो मिल जाएं तो मैं आसानी से चित्र बना दूंगा। कृष्ण जी के चित्र लिए एक योग्य नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दें तब मैं चित्र बनाकर दूंगा।

कृष्ण मंदिर के भक्त एक बालक ढूंढ कर ले आये, बालक सुन्दर था। चित्रकार ने उसे पसन्द किया और उस बालक को सामने रख बालकृष्ण का एक सुंदर चित्र बनाया।
अब बारी कंस की थी पर क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोडा मुश्किल था ! जो व्यक्ति कृष्ण मंदिर वालो को पसंद आता वो चित्रकार को पसन्द नहीं आता क्योंकि उसे वो भाव मिल ही नहीं रहे थे…

इसी इंतजार में कई साल गुजर गए तस्वीर अधूरी ही रही ; तस्वीर पूरी करवाने के लिए लोग आखिरकार थक-हार कर उस चित्रकार को जेल में ले गए, जहाँ उम्रकैद काट रहे अपराधी थे।
उनमें से एक व्यक्ति को चित्रकार ने पसन्द किया और उसे सामने बैठाकर उसने कंस का चित्र बनाया ! इस तरह सालों बाद कृष्ण और कंस की वो तस्वीर पूर्ण हुई।

कृष्ण मंदिर के भक्त तस्वीर देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। सभी लोग उसकी तारीफ करने लगे।

      कंस बने उस अपराधी से नहीं रहा गया और उसने भी वह तस्वीर देखने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन यह क्‍या…जैसे ही उसने वो तस्वीर देखी वो फूट-फूटकर रोने लगा।

यह देख सभी हैरान रह गए। चित्रकार ने जब बड़े प्‍यार से उस अपराधी के रोने का कारण पूछा तो हिचकियाँ लेता हुआ वह बोला- शायद आपने मुझे पहचाना नहीं, मैं वो ही बच्चा हूं जिसे सालों पहले आपने इस चित्र में बालकृष्ण बनाया था… मेरे कुकर्म देखिए कि आज मैं कृष्‍ण से कंस बन गया… इस तस्वीर में मैं ही कृष्ण और मैं ही कंस हूँ

दरअसल ईश्‍वर ने तो हम सभी को अपना ही प्रतिरूप बनाया है। हम ही हैं जो अपने कर्मों से अच्‍छे या बुरे बनते हैं। कृष्‍ण या कंस बनना ईश्‍वर के नहीं हमारे अपने हाथ में है 🙏🏻

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

हाथ का निशानेबाज – दृढ इच्छाशक्ति




आज हम आपके साथ शेयर कर रहे हैं एक ऐसी कहानी जो दर्शाती है कि अगर इंसान में दृढ इच्छाशक्ति हो तो वो असम्भव को भी संभव बना देता है। So let us read this very inspirational true Hindi Story on Willpower.

बात 1920s की है। हंगरी आर्मी का एक नौजवान लड़का था जिसकी ज़िन्दगी में बस एक ही मकसद था; उसका मकसद था दुनिया का सबसे अच्छा pistol shooter बनना। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वो दिन-रात मेहनत करता, घंटो प्रैक्टिस करता, और इसी का परिणाम था कि वो अपने देश के टॉप पिस्टल शूटर्स में गिना जाने लगा।

सन 1938 में , 28 साल का होते-होते उसने देश-विदेश की कई shooting championships जीत ली थी और सभी को यकीन हो चला था कि दांये हाथ का ये निशानेबाज 1940 के टोक्यो ओलंपिक्स में गोल्ड मैडल जीत कर ही दम लेगा!

लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था! एक आर्मी ट्रेनिंग सेशन के दौरान उसके दांये हाथ में मौजूद एक हैण्ड ग्रेनेड फट गया… इस हादसे में उसने अपना दांया हाँथ गंवा दिया और इसके साथ ही उसका ओलंपिक गोल्ड मैडल जीतने का सपना भी चकनाचूर हो गया। वह एक महीने तक हॉस्पिटल में पड़ा रहा और उसके बाद जब बाहर निकला तो उसकी दुनिया बदल चुकी थी…अब उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका दांया हाथ उसके साथ नहीं था!

कोई आम इंसान होता तो क्या करता? अपने भाग्य को कोसता… लोगों की sympathy लेने की कोशिश करता या लोगों से कटने लगता, may be depression में चला जाता और अपने ज़िन्दगी के मकसद को भूल जाता।

लेकिन बचपन से दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शूटर बनने का सपना देखने वाला वो लड़का तो किसी और ही मिट्टी का बना था… बाकी लोगों की तरह उसने ये नहीं सोचा कि उसने अपना वो हाथ खो दिया है जिसे दुनिया का सबसे अच्छा शूटिंग हैण्ड बनाने में उसने दिन रात एक कर दिए…बल्कि उसने सोचा कि मेरा एक हाथ बेकार हो गया तो क्या…. अभी भी मेरे पास भगवान् का दिया एक और हाथ है जो पूरी तरह से ठीक है और अब मैं इसी हाथ को दुनिया का सबसे अच्छा शूटिंग हैण्ड बना कर रहूँगा!!! और अपने इसे attitude के साथ वो एक बार फिर शूटिंग प्रैक्टिस में जुट गया और असम्भव को सम्भव बनाने की कोशिश करने लगा।

लगभग एक साल बाद वो नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में पहुंचा! इतने समय बाद उसे वहां देख बाकी शूटर्स उसकी हिम्मत की दाद देने लगे कि इतना कुछ हो जाने पर भी वो उन्हें encourage करने के लिए आया है।

पर जल्द ही वे आश्चर्य में पड़ गए जब उन्ह पता चला कि वो उन्हें encourage करने के लिए नहीं बल्कि उनसे मुकाबला करने के लिए आया है।

मुकाबला हुआ…और पूरी दुनिया को हैरान करते हुए अदम्य साहस वाले उस सख्श ने अपने बाएँ हाथ से वो मुकाबला जीत लिया।

एक बार फिर लगने लगा कि वो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शूटर बनने का अपना सपना पूरा कर सकता है और ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीत सकता है। पर दुर्भाग्य तो मानो उसके पीछे पड़ा था… विश्व युद्ध की वजह से 1940 और 1944 के ओलंपिक गेम्स कैंसिल हो गए और सीधे 1948 London Olympics कराने का फैसला लिया गया।

इस बीच कितने ही नए शूटर्स अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के लिए खड़े हो गए…कहाँ अपने प्राइम डेज में उसे दाएं हाँथ से मुकाबला करना था और कहाँ इतने सालों बाद अब बाएँ हाँथ से विश्वस्तरीय मुकाबले में भाग लेना था।

पर उसे इन बातों की फ़िक्र ही कहाँ थी वो तो बस एक ही चीज जानता था….practice…practice..and…practice…वो दिन रात अभ्यास करता रहा… और लन्दन ओलंपिक्स में दुनिया के बेहतरीन शूटर्स के बीच मुकाबला करने उतरा… उसके साहस…उसकी हिम्मत और उसके धैर्य का आज इम्तहान था और उसने किसी को निराश नहीं किया वो उस इम्तहान में पास हो गया….उसने गोल्ड मैडल जीत लिया।

दोस्तों, उस लड़के का नाम था कैरोली टैकाक्स (Károly Takács) . और उसकी ये unbelievable story हर उस सख्स के लिए एक बहुत बड़ा सन्देश है जो जरा सी परेशानी आने पर हार मान लेते हैं, जो अपनी असफलता के पचास कारण गिनाने में आगे रहते हैं पर सफल होने की एक भी वजह नहीं बता पाते!

Friends, दुनिया में बस एक ही इंसान है जो आपको कामयाब या नाकामयाब बना सकता है और वो इंसान आप खुद हैं। सफलता के संघर्ष में जब भी आपको लगे कि आपके साथ कुछ बुरा हुआ है तो एक बार उस एक हाथ वाले पिस्टल शूटर के बारे में ज़रूर सोचिये और खुद ही decide करिए कि क्या ये अपना एक हाथ खो देने से भी बुरा है… लाइफ में ups and downs को आने से हम नहीं रोक सकते…पर हम अपने साथ बुरा होने पर कैसे react करते हैं, इस चीज को ज़रुर control कर सकते हैं। इसलिए situation चाहे जितनी भी बुरी हो जाए अपना attitude positive बनाये रखिये, अपना ध्यान अपने लक्ष्य पर लगाए रखिये और इस दुनिया को अपनी मंजिल पाकर दिखाइए!.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

सेठ धनीराम


एक गांव में एक बहुत बड़ा धनवान व्यक्ति रहता था। लोग उसे सेठ धनीराम कहते थे। उस सेठ के पास प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति थी जिसके कारण उसके सगे-संबंधी, रिश्तेदार,भाई-बहन हमेशा उसे घेरे रहते थे वे उन्हीं के राग अलापते रहते थे, सेठ भी उन सभी लोगों की काफी मदद करता था। तभी अचानक कुछ समय बाद सेठ को भंयकर रोग लग गया।

इस भयंकर बीमारी का सेठ ने बहुत उपचार करवाया लेकिन इसका इलाज नहीं हो सका। आख़िरकार सेठ की मृत्यु हो गई। यमदूत उस सेठ को अपने साथ ले जाने के लिए आ गए, जैसे ही यमदूत सेठ को ले जाने लगे तभी सेठ थोड़ी दूर जाकर यमदूतो से प्रार्थना करने लगे कि “मुझे थोड़ा सा समय दे दो, मैं लौटकर तुरंत आता हूँ” दूतों ने उसे अनुमति दे दी।

सेठ लौटकर आया, चारों ओर नज़रे घुमायीं और वापस यमदूतों के पास आकर बोला- “शीघ्र चलिए” यमदूत उसे इस प्रकार अपने साथ चलने के लिए तैयार देखकर चकित रह गए और सेठ से इसका कारण पूछा। सेठ ने निराशा भरे स्वरों में कहा- “मैंने हेराफेरी करके अपार धन एकत्रित किया था, लोगों को खूब खिलाया-पिलाया और उनकी बहुत मदद भी की, सोचा था कि वो मेरा साथ कभी नहीं छोडेंगे। अब जब मैं इस दुनिया को सदा के लिए छोड़ कर जा रहा हूँ, तो वे सब बदल गए है मेरे लिए दुखी होने के बजाय, ये अभी से मेरी संपत्ति को बांटने की योजना बनाने लगे है किसी को मेरे लिए जरा-सा भी अफसोस नहीं है।”

सेठ की बात सुनकर यमदूत बोले- “इस संसार में प्राणी अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है, इंसान जो भी अच्छा या बुरा कर्म करता है उसे इसका परिणाम स्वयं ही भुगतना पड़ता है, हर प्राणी इस सत्य को समझता तो है पर देर से।”

शिक्षा:
हम इस बात को अपने जीवन में भी देख रहे हैं। लोग जीवन के सत्य को भूलकर मानव द्वारा बनाए गए जाल जैसे लालच, रूपए-पैसा, बुराई आदि तले दब गए हैं।

आप जो भोजन ग्रहण करते है वह पेट में 4 घंटे रहता है, जो वस्त्र पहनते है वह 4 महीने रहता है, लेकिन जो ज्ञान आप हासिल करते हैं वह आपके अंतिम सांस तक साथ रहता है और संस्कार बनकर आपकी अगली पीढी तक पहुँचता है, ज्ञान का बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता। जो है जितना है सफल करते चलो, सफल करने से ही सफलता मिलती है।

हर व्यक्ति को सकारात्मक तरीके से देखो, सुनो और समझो। हम जितना ज्यादा पढ़ते है, सुनते है, समझते है, हमें अपनी कमियों का उतना ही ज्यादा एहसास होता है और इसी कमी को दूर करके हम सफलता की मंजिल की और अपने कदम बढ़ाते चले जाते है!

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

तीन पुतले


कहानी:- मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार अपने भव्य स्वरूप में सजा हुआ था। स्वर्णिम छतरी के नीचे चमकते सिंहासन पर सम्राट विराजमान थे, और उनके चारों ओर विद्वानों, मंत्रियों तथा सेनापतियों की सभा आसीन थी। महामंत्री आचार्य चाणक्य अपने गहन ज्ञान और सूझबूझ से दरबार की कार्यवाही संचालित कर रहे थे।

चंद्रगुप्त को विलक्षण और अनोखी वस्तुओं का बड़ा शौक था, विशेषकर खिलौनों में उनकी रुचि असाधारण थी। प्रतिदिन वह कोई न कोई नया खिलौना देखने की इच्छा रखते थे। आज भी, जैसे ही उन्होंने उत्सुकतावश पूछा—

“आज हमारे लिए क्या नवीन उपहार आया है?”

एक दरबारी ने तुरंत सूचना दी—

“महाराज! एक दूरदेशीय सौदागर दरबार की दहलीज़ पर खड़ा है। वह दावा करता है कि उसने ऐसे अनूठे पुतले बनाए हैं, जिन्हें न तो आपने पहले कभी देखा होगा और न ही भविष्य में देखने को मिलेंगे।”

चंद्रगुप्त की जिज्ञासा प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने सौदागर को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।

कुछ ही क्षणों में, एक कुटिल मुस्कान लिए सौदागर राजदरबार में प्रविष्ट हुआ। उसने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और अपनी झोली में से तीन सुंदर, सजीव-से प्रतीत होते पुतले बाहर निकाले। उन पुतलों की कारीगरी इतनी उत्कृष्ट थी कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता मानो वे किसी क्षण बोल उठेंगे।

सौदागर ने पुतलों को राजा के समक्ष रखते हुए कहा—

“महाराज, ये तीनों पुतले अद्वितीय हैं। देखने में एक जैसे हैं, किंतु इनके गुण भिन्न-भिन्न हैं। पहला पुतला एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का है, दूसरा मात्र एक हजार मुद्राओं का, और तीसरे की कीमत केवल एक मुद्रा है।”

यह सुनकर सम्राट चकित रह गए। उन्होंने पुतलों को हर ओर से देखा, परंतु उनमें कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई दिया।

“इनमें इतना मूल्य अंतर क्यों?”— चंद्रगुप्त ने विस्मयपूर्वक पूछा।

मगर कोई उत्तर नहीं मिला। सभा में सन्नाटा छा गया। हर कोई पुतलों को उलट-पलट कर देखने लगा, परन्तु भेद कोई न पा सका। हारकर सम्राट ने महामंत्री चाणक्य की ओर देखा और कहा—

“गुरुदेव, आपके समक्ष कोई भी रहस्य अधिक देर तक छिपा नहीं रह सकता। कृपया इस गूढ़ पहेली को सुलझाने का कष्ट करें।”

चाणक्य मंद मुस्कुराए। उन्होंने पुतलों को ध्यानपूर्वक देखा और एक प्रहरी को आदेश दिया—

“तिनके ले आओ।”

सभी अचंभित थे। आखिर पुतलों का रहस्य तिनकों से कैसे खुलेगा?

कुछ ही क्षणों में, सैनिक तिनके ले आया। चाणक्य ने पहला तिनका उठाया और उसे पहले पुतले के कान में डाला। सभा में उपस्थित जन विस्मय से देखते रहे— तिनका सीधा पुतले के पेट में चला गया। कुछ क्षणों बाद पुतले के होंठ हिले, मानो वह कुछ कहने वाला हो, परंतु उसने कुछ नहीं कहा।

इसके बाद, आचार्य ने दूसरा तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार, सभी ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर निकल गया। किंतु पुतला वैसा ही स्थिर बना रहा।

अब चाणक्य ने तीसरे पुतले की बारी ली। जैसे ही तिनका उसके कान में डाला, वह सीधे पुतले के मुँह से बाहर निकल आया। और तब— पुतले का मुख खुल गया, मानो वह ऊँचे स्वर में कुछ चिल्ला रहा हो।

दरबार में हलचल मच गई। चंद्रगुप्त ने उत्सुकतावश पूछा—

“गुरुदेव! यह क्या रहस्य है? इन पुतलों का मूल्य इतना भिन्न क्यों है?”

चाणक्य गंभीरता से बोले—

“राजन! ये तीन पुतले मनुष्यों के स्वभाव के तीन भिन्न प्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।”

फिर उन्होंने प्रथम पुतले की ओर इशारा कर कहा—

“यह वह व्यक्ति है जो सुनी-सुनाई बातों को अपने हृदय में संजोकर रखता है। वह पहले विचार करता है, फिर अपनी वाणी खोलता है। यह एक ज्ञानी और विवेकी पुरुष का प्रतीक है। ऐसा व्यक्ति अपने ज्ञान की गंभीरता और बुद्धिमत्ता के कारण अत्यधिक मूल्यवान होता है। इसी कारण, इस पुतले का मूल्य एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ है।”


इसके पश्चात, उन्होंने दूसरे पुतले की ओर संकेत करते हुए कहा—

“यह वह व्यक्ति है, जो कुछ भी सुनता है, किंतु न तो उस पर ध्यान देता है और न ही उसे दूसरों को बताने में रुचि रखता है। वह अपने ही संसार में मग्न रहता है। ऐसे व्यक्ति किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाते, परंतु किसी विशेष योगदान के अभाव में उनकी कीमत सीमित रहती है। अतः इसका मूल्य एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ है।”

अंत में, उन्होंने तीसरे पुतले की ओर दृष्टि घुमाई और बोले—

“यह तीसरा पुतला उन लोगों का प्रतीक है जो किसी भी बात को बिना सोचे-समझे तुरंत दूसरों को बता देते हैं। वे कान के कच्चे और मुँह के हल्के होते हैं। बिना सत्यापन के किसी भी सूचना को फैलाने वाले लोग समाज में भ्रम और अशांति उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए, इस पुतले का मूल्य केवल एक मुद्रा है।”

सम्राट चंद्रगुप्त ने गहरे चिंतन के साथ चाणक्य के शब्दों को आत्मसात किया। दरबार में बैठे सभी व्यक्तियों ने भी इस कथा से एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त की।

शिक्षा:- मनुष्य को सदैव विवेकपूर्ण ढंग से व्यवहार करना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए, अपितु पहले तथ्यों की पुष्टि करनी चाहिए। ज्ञानवान व्यक्ति वही होता है, जो अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करता है।

आज के युग में भी यह शिक्षा अत्यंत प्रासंगिक है। जब सूचना तेजी से फैलती है, तब हमें यह निर्णय लेना चाहिए कि हम कौन-से पुतले की तरह बनना चाहते हैं—

▪️ वह जो सोच-समझकर बोलता है और समाज में आदर प्राप्त करता है?
▪️ वह जो अनसुना कर देता है, किंतु किसी को हानि नहीं पहुँचाता?
▪️ या वह, जो बिना सोचे-समझे कुछ भी कहकर समस्याएँ उत्पन्न करता है?

निर्णय आपका है!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अहंकार

कहानी:- शादी को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सुधा और मोहन के बीच किसी छोटी-सी बात पर विवाद हो गया। दोनों ही शिक्षित थे, अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त और स्वाभिमान से परिपूर्ण। जरा-सी अनबन हुई और दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद हो गई। किसी ने पहल नहीं की, क्योंकि दोनों के मन में एक ही सवाल था—”पहले मैं क्यों झुकूं? मैं क्यों माफी मांगूं।”

तीन दिन बीत गए, पर मौन की दीवार जस की तस खड़ी रही। इस बीच, न जाने कितनी बार दोनों ने चाहा कि एक-दूसरे से बात कर लें, परंतु अपने-अपने अहंकार के कारण रुक गए।

सुधा ने सुबह के नाश्ते में पोहे बनाए, लेकिन गलती से उसमें मिर्च अधिक डाल दी। उसने स्वाद नहीं चखा, इसलिए गलती का आभास भी नहीं हुआ। मोहन ने भी गुस्से में चुपचाप तीखा नाश्ता खा लिया, बिना एक शब्द बोले। मिर्च इतनी ज्यादा थी कि ठंड के मौसम में भी वह पसीने से तर हो गया, पर उसने सुधा को कुछ भी नहीं बताया। जब बाद में सुधा ने पोहे खाए, तब उसे अपनी भूल समझ आई।

एक पल को मन में आया कि मोहन से क्षमा मांग ले, पर तभी उसे अपनी सहेली की सीख याद आ गई—”अगर तुम झुकीं, तो हमेशा तुम्हें ही झुकना पड़ेगा।” यह सोचकर वह चुप रह गई, हालांकि मन ही मन अपराधबोध से भर गई।

अगले दिन रविवार था। मोहन की नींद देर से खुली। घड़ी देखी तो नौ बज चुके थे। उसने सुधा की ओर देखा—वह अभी तक सो रही थी। यह देखकर वह चौंका, क्योंकि सुधा तो रोज़ जल्दी उठकर योग करती थी। उसने सोचा, “शायद नाराजगी के कारण लेटी होगी।”

मोहन खुद उठकर नींबू पानी बनाने चला गया। अख़बार लेकर बैठा, पर सुधा को अब भी सोता देख उसका ध्यान भटक गया। दस बज गए थे, लेकिन सुधा अब भी नहीं उठी। कुछ हिचकते हुए वह उसके पास गया और धीरे से बोला—”सुधा… दस बज गए हैं, अब तो उठो।”

कोई उत्तर नहीं मिला। उसने दो-तीन बार पुकारा, पर सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब उसका मन बेचैन हो उठा। उसने घबराकर कंबल हटाया और सुधा के गालों को छूकर देखा—उसका शरीर तप रहा था!

वह घबराकर रसोई में गया और अदरक की चाय बनाई। जल्दी से वापस आकर उसने सुधा को सहारा देकर उठाया और पीठ के पीछे तकिया लगा दिया।

“कोई दिक्कत तो नहीं कप पकड़ने में? क्या मैं तुम्हें पिला दूं?” मोहन की आवाज़ में चिंता और स्नेह का अद्भुत मिश्रण था।

सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “नहीं, मैं पी लूंगी।”

मोहन भी वहीं बैठकर चाय पीने लगा। उसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट झलक रही थी।

“इसके बाद तुम आराम करो, मैं तुम्हारे लिए दवा लेकर आता हूं।”

सुधा चाय पीते-पीते मोहन को देखती रही। उसे याद आया कि कुछ देर पहले वह मायके जाने का निर्णय ले रही थी, और अब वही मोहन, जिससे वह तीन दिनों से बात भी नहीं कर रही थी, उसकी इतनी परवाह कर रहा था।

“मोहन…” सुधा ने धीमे स्वर में कहा।

“हाँ, क्या हुआ? सिर में बहुत दर्द हो रहा है क्या? आओ, मैं सहला दूं…” मोहन ने तुरंत पूछा।

“नहीं, मैं ठीक हूँ… बस एक बात पूछनी थी।”

“पूछो।”

“इतने दिनों से मैं तुमसे बात भी नहीं कर रही थी, और उस दिन नाश्ते में मिर्च भी ज़्यादा थी। तुम परेशान हुए, फिर भी मेरी इतनी देखभाल कर रहे हो… क्यों?”

मोहन ने गहरी सांस ली और मुस्कुराकर कहा, “परेशान तो मैं बहुत हूँ, क्योंकि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। रही हमारे झगड़े की बात, तो जब जीवनभर साथ रहना ही है, तो कभी-कभी मतभेद भी होंगे, रूठना-मनाना भी होगा। दो बर्तन साथ होंगे तो खटपट तो होगी ही… समझीं मेरी जीवनसंगिनी?”

सुधा ने हल्की हँसी के साथ सिर हिलाया और मोहन के गले लग गई। मन ही मन उसने अपने आपसे वादा किया—”अब कभी अपने और मोहन के बीच अहंकार को आने नहीं दूंगी।”

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अद्भुत अतिथि-सत्कार*

एक दिन एक व्याध भयानक वनमें शिकार करते समय पत्थर-पानी-हवाकी चोटसे अत्यन्त दुर्गतिमें पड़ गया। कुछ दूर आगे बढ़नेपर उसे एक वृक्ष दीखा। उसकी छायामें जानेपर उसे कुछ आराम मिला। तब उसे स्त्री-बच्चोंकी चिन्ता सताने लगी। इधर सूर्यास्त भी हो गया था। ठंडके कारण उसके हाथ-पैरमें कम्पन हो रहा था और दाँत किटकिटा रहे थे।

उसी वृक्षपर एक कपोत अपनी पत्नीकी चिन्तामें घुल रहा था। उसकी स्त्री पतिव्रता थी और अभी चारा चुगकर आयी नहीं थी। वस्तुतः वह इसी व्याधके पिंजड़ेमें पड़ी थी। कपोत उसके न लौटनेपर विलाप कर रहा था। पतिका विलाप सुनकर कपोती बोली- ‘नाथ ! मैं पिंजड़ेमें बँधी हुई हूँ। कृपया आप मेरी चिन्ता न कर अतिथि-धर्मका पालन करें। यह व्याध भूख और ठंडसे मरा जा रहा है। सायंकाल अपने आवासपर आ भी गया है। यह आर्त अतिथि है। यद्यपि यह शत्रु है, फिर भी अतिथि है। अतः इसका सत्कार करें। इसने जो मुझे पकड़ रखा है, वह मेरे किसी कर्मका फल है। इसके लिये व्याधको दोष देना व्यर्थ है। आप अपनी धर्ममयी बुद्धिको स्थिर करें।

थके हुए अतिथिके रूपमें सारे देवता और पितर पधारते हैं। अतिथि सत्कारसे सबका सत्कार हो जाता है। यदि अतिथि निराश होकर लौट जाता है तो सभी देवता और पितर भी लौट जाते हैं। आप इस बातपर ध्यान न दें कि इस व्याधने आपकी पत्नीको पकड़ रखा है; क्योंकि अपकार करनेवालेके साथ जो अच्छा बर्ताव करता है, वही पुण्यका भागी माना जाता है।’

कपोत अपनी पत्नीके धार्मिक प्रवचनसे बहुत प्रभावित हुआ। उसमें धर्ममयी बुद्धि जाग पड़ी। उसने व्याधके सामने उपस्थित होकर कहा-‘तुम मेरे घरपर आये हुए अतिथि हो। मेरा कर्तव्य है कि मैं प्राण देकर भी तुम्हारी सेवा करूँ। इस समय तुम भूख और ठंडसे मृतप्राय हो रहे हो। थोड़ी देर प्रतीक्षा करो।’ इतना कहकर वह उड़ा और कहींसे जलती हुई एक लकड़ी ले आया। उसे लकड़ीके ढेरपर रख दिया। धीरे-धीरे आग जल उठी। उससे व्याधकी जकड़न दूर हो गयी। तब कपोतने व्याधकी परिक्रमा कर अपनेको अग्निमें झोंक दिया।

व्याध उसे अग्निमें प्रवेश करते देख घबरा गया और अपनेको धिक्कारने लगा। फिर उसने कपोती तथा अन्य पक्षियोंको पिंजड़ेसे निकालकर छोड़ दिया। कपोतीने भी अपने पतिके पथका अनुसरण किया। तत्पश्चात् कपोत और कपोती देवताके समान दिव्य शरीर धारणकर तथा विमानपर चढ़कर स्वर्गलोककी ओर प्रस्थित हुए।

उन्हें जाते देखकर व्याधने उनकी शरण ली और अपने उद्धारके लिये उपाय पूछा। इसपर कपोतने उसे गोदावरीमें स्नान करनेकी बात बतायी। एक मासतक गोदावरी-स्नान करके व्याध भी स्वर्गलोकको चला गया। गोदावरीका वह स्थान आज भी कपोत-तीर्थके नामसे विख्यात है।

            (ब्रह्मपुराण)
Posted in हिन्दू पतन

संभल में सरकारी और निजी संपत्ति में आग लगाने पर अब्दुल पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

शिकार कार्ड खेलते हुए रोने लगा, कहा- मैं अपना घर बेच कर पूरी जिंदगी काम कर लूं, तो भी ये जुर्माना नहीं भर पाऊंगा जनाब।

बात योगी जी तक पहुंची, योगी जी ने दिया ऑफर- अरे, मूर्ख, हम जानते हैं कि आप अकेले ही शामिल नहीं थे, लेकिन आप भाग्यशाली थे, आपकी तस्वीर सबसे स्पष्ट आई।

एक काम करो, जो शामिल है उसका नाम बताओ, जुर्माना हम आप सब में बाँट देंगे, आपका बोझ कम होगा।

अब्दुल की आँखें जगमगा उठीं,वह चिल्लाया- मैं सबको जानता हूँ।

उन्होंने एक-एक करके उनका नामकरण करना शुरू कर दिया- मौलाना सादिक, रिजवान, आफताब, सुहैल, नसीम, करीम, मौलाना फज़लू, और 50 और लोग।

योगी जी मुस्कुराए- शाबाश, अब आपका जुर्माना ₹1,395 हो गया है। ज्यादा नाम याद रखोगे तो और कम हो जाएगा।

योगी जी ने एक और ऑफर दिया।

अब्दुल की आँखों में फिर से चमक आई। वह चिल्लाया- मेरे जीजा और मेरे तीन रिश्तेदार।

उसने सब कुछ बता दिया।

योगी जी ने मुस्कराकर कहा- अब आपका जुर्माना सिर्फ ₹500 है।

तुरंत भुगतान करें और छोड़ दें, योगी जी की सरकार की तारीफ करते अब्दुल चले गए।

अब पूरे इलाके से मौलाना सादिक और अन्य लोग जुर्माना भरने की तैयारी में हैं।

ये है योगी जी का शासन शैली सभी सुखी और समृद्ध हो।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas, हिन्दू पतन

सैयद सालार मसूद गाजी का विजय अभियान श्रावस्ती के राजा सुहलदेव ने नानपारा में रोक दिया. उनके नेतृत्व में हिन्दु सेना ने गाजी को भयंकर रूप से घायल किया. गाजी के विश्वासपात्र सैनिक उसे लेकर भाग खडे हुए किन्तु सतरिख बाराबंकी में वह 72 हूरों के पास चला गया. वहीं उसे दफन कर दिया गया. लगभग 300 वर्ष बाद फिरोज तुगलक उसकी कब्र खोदकर उसे बहराइच में बालार्क सूर्य मंदिर को ध्वस्तकर गर्भगृह में दफना दिया और बालार्क को बालेमियां बना दिया गया. गाजी के नाम पर उ. प्र. में सतरिख, नानपारा बहराइच के अतिरिक्त सिकन्दरा और सोहबतिया बाग प्रयागराज में भी उसकी कब्र परवर्ती काल में बना दी गयी. पूछने पर पता चला कि उसकी मूल कब्र की एक एक ईंट लाकर इन स्थानों पर कब्र बनायी गयी थी. सम्भल में नेजा मेला और वाराणसी में गाजी मियां की शादी का मेला कब से लगता है पता नहीं. उसकी शादी न हुई थी न वह वाराणसी पहुचा ही था. वह विजय अभियान में गायों के झुंड को आगे रखता था. इसलिए पंजाब से श्रावस्ती पहुचने तक वह सफल हो सका था. किन्तु सुहलदेव ने इस दुष्ट को मारने के लिए गायों की चिन्ता छोड दी इसलिए सफल हुआ. इसके नाम पर बनी कब्रें समाप्त की जायें और मेलें बन्द हों. 1 लाख हिन्दुओ  का कत्ल करने वाला गाजी कहलाता था, यह ध्यान में रखा जाये और इस्लाम में कब्र की इबारत हराम है. अरब में कहीं भी न पक्की कब्र है न उसकी इबारत.

Posted in खान्ग्रेस, हिन्दू पतन

आचार्य पं किशन सरवरिया झांसी
======================
दिनांक 27 मार्च 2021 की मेरी पोस्ट
————————————————–

#इंदिरा_गांधी_के_बनाये_नियम
**************************
इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा था।

धर्मनिरपेक्षता यानी कि सरकार और कानून धार्मिक आधार पर किसी के भी साथ भेदभाव नहीं कर सकते।
सभी धर्मों को एक समान माना जाएगा।

सभी धर्म के लोगों को एक जैसे ही अधिकार प्राप्त होंगे।
तो आइए आज इस धर्मनिरपेक्षता की सच्चाई को जान लिया जाए-

#शादी_शगुन : केवल मुस्लिम लड़कियों की शादी पर 51,000 रु

#नई_उड़ान : UPSC & PSC की परीक्षाओं के लिए हर मुस्लिम की एक लाख की मदद

#सीखो_और_कमाओ : हर मुस्लिम प्रतिभागी को 25,000

#नई_मंजिल : हर मुस्लिम प्रतिभागी को 56,500

#नई_रोशनी : मुस्लिम महिलाओं में नेतृत्व क्षमता के लिए 2,25,000

#हमारी_धरोहर_योजना : मुस्लिम प्रतिभागी को 3,32,000 प्रति वर्ष

अल्पसंख्यक पिछड़ों को बीस लाख तक के रियायती ऋण

#उस्ताद_योजना : हर अल्पसंख्यक अध्येता को नौ लाख बारह हजार रू

#नया_सवेरा : मुस्लिम प्रतिभागी को कोचिंग के लिए भोजन आवास के साथ 1,00,000

#मौलाना_आजाद_फेलोशिप : मुस्लिम प्रतिभागी को 28,000 प्रतिमाह व मकान भत्ता

#मैट्रिक_पूर्व_छात्रवृत्ति_योजना कक्षा 6 से 10 तक : मुस्लिम प्रतिभागी को 12,000 रू प्रतिवर्ष

#मैट्रिकोत्तर_छात्रवृत्ति_योजना : 11वीं और 12वीं 45,800 प्रतिवर्ष

#मैट्रिक_सह_साधन_आधारित #योजना : 30,000 प्रतिवर्ष

#पढ़ो_परदेश : विदेश में पढ़ने के लिए अल्पसंख्यकों को सहायता

#हज_हाउस_योजना
#गरीब_नवाज़_योजना
#मदरसा_अनुदान

#इस्लामिक_स्टडीज_को_सिविल #सेवा
में शामिल करने से ज्यादा मुसलमानों को IAS, IPS, IFS बनाया गया है जिनके सहयोग से भारत बहुत जल्दी मुस्लिम राष्ट्र बन जाएगा
और #गजवा_ए_हिंद का षड़यंत्र साकार होगा।

हिंदुओं को दूसरी शादी पर जेल की सजा और मुस्लिमो को चार निकाह की छूट, ताकि वह जल्दी जल्दी आबादी बढ़ाकर वोट बैंक बनकर देश की सत्ता पर काबिज हो जाएं और संविधान को हटाकर शरियत कानून लागु करवा सकें।

और मजहब के नाम पर पाकिस्तान और बांग्लादेश देने के बावजूद भी मुस्लिमों को दामाद बनाकर भारत में रोक लिया, ताकि मुल्ले बोल सके  हमारा भी खून शामिल है इस मिट्टी मे.
#दूसरी_बात
अब मुझे कहा जायेगा,इस तरह की लेख लिखने वाले सच्चे भारतीय नहीं हैं, उन्हें धर्म का ज्ञान नहीं है, संविधान की समझ नहीं है।
संघी हैं, देशद्रोही है।
हकीकत तो यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जरिए ज़कात की ख़ैरात खा-खाकर कांग्रेसी सूअरों की चेतना नष्ट हो गयी है और ये लोग पैदा ही सनातनधर्म के विनाश को हुए हैं।
🚩साभार—
सनातन धर्म सर्वोपरि