Posted in हिन्दू पतन

*औरंगजेबाने हिंदूंवर केलेली दडपशाही व हिंदूंच्या धर्मांतरासाठी केलेले कपट कारस्थान*

औरंगजेब जसा सत्तेवर आला तसा त्याने इस्लामच्या प्रसारासाठी सर्वतोपरी प्रयत्न सुरू केले व गैरमुसलीम लोकांवर अन्याय अत्याचार करण्यास सुरुवात केली. त्यासाठी त्याने सर्वात आधी काफिरांवर आर्थिक दडपण आणायला सुरुवात केली.

➡️10 एप्रिल 1665 रोजी औरंगजेबाने एक वटहुकूम काढला, त्यानुसार विक्री करता आणलेल्या सर्व वस्तूंवर मुसलमानांना अडीच टक्के तर *हिंदूंना पाच टक्के* जकात कर देणे निश्चित केला. 1670 मध्ये मुस्लिमांना या करातून पूर्णपणे मुक्त करण्यात आले परंतु हिंदूंवर पाच टक्के कर कायम ठेवला. त्यामुळे हिंदू व्यापाऱ्यांना मुसलमान व्यापाऱ्यांशी संगनमत करावे लागले.

➡️ काफिरांवर *आर्थिक दडपण* आणण्यासाठी धर्मांतर केलेल्या व्यक्तींना द्रव्याच्या (पैशाच्या) स्वरूपात बक्षीस देणे, सार्वजनिक सेवेत मोठमोठ्या जागा देणे, तुरुंगातून मुक्ती देणे किंवा विवादित मालमत्तेचा वारसा हक्क मिळवून देणे अशा योजना केल्या. त्यामुळे आर्थिक विवंचनेत सापडलेल्या हिंदूंना धर्मांतरासाठी प्रवृत करण्यात आले.

➡️1661 मध्ये सरकारी मालकीच्या जमिनीतल्या शेतीचा *शेतसारा वसूल* करणारा अधिकारी मुसलमानाचा असले पाहिजे असा वटहुकूम जारी करण्यात आला.

➡️सर्व सुभेदारांनी आणि तालुकादारांनी आपल्या पेशकरांना (लिपिक) आणि लेखापालांना (दिवाण) नोकरीतून काढून टाकावे आणि त्यांच्या जागी *मुसलमानांच्या नेमणुका* कराव्यात असा हुकूम अमलात आणण्यात आला.

➡️हिंदू पेशकारांना नोकरीतून वगळण्यात आल्याने राज्य आखणी कठीण असल्याचे लक्षात आल्यावरही काही ठिकाणी हिंदू करोरींच्या जागी मुसलमान अधिकाऱ्यांना नेमण्यात आले.

➡️काही *धर्मांतर केलेल्या व्यक्तींची* बादशहाच्या खास आदेशावरून दिल्ली शहरातून बँडच्या निनादात आणि विजयी ध्वज लावून हत्तीवरून खास मिरवणूक काढण्यात येत होती इतरांना दैनंदिन भत्ता मिळत असेल हा कमीत कमी चार आण्याचा भत्ता असे.

➡️मार्च 1695 मध्ये राजपूत वगळता इतर सर्व हिंदूंना पालखीत बसण्यास हत्तीवर किंवा घोड्यावर स्वार होण्यास मनाई करण्यात आली. जवळ शस्त्र बाळगण्यासही त्यांना बंदी घालण्यात आली.

➡️वर्षभरातील काही शुभ दिवशी भारतातील हिंदू त्यांच्या तीर्थक्षेत्रांच्या जागी यात्रा भरवीत असत. अशावेळी या संख्या स्त्री पुरुष आणि मुले एकत्रित जमत. या ठिकाणी दुकानदार आपले दुकाने थाटून आपल्या वस्तू विकत असत व एकमेकांना भेटून लोक आनंद व्यक्त करत. त्यामुळे औरंगजेबाने संपूर्ण राज्यात अशा यात्रा भरवण्यास 1668 मध्ये बंदी घातली.

➡️एवढेच काय तर *दिवाळी आणि होळी* यासारखे हिंदूंचे प्रमुख सण ज्या ठिकाणी बाजार भरतो त्याच्या हद्दीबाहेर साजरी करावेत असाही हुकुम त्याने काढला होता.

यावरून औरंगजेब किती *धर्मांध मुसलमान* होता व इस्लामच्या प्रसारासाठी किती छळ कपट करत होता हे दिसून येते. हिंदूंचा आनंद हिरावून घेऊन त्यांना दुःखाच्या गर्तेत ढकलायचे आणि सुखी आयुष्य जगायचे असेल तर इस्लामचा मार्ग स्वीकारायचा असे प्रलोभनच त्याने ठेवले होते. यामुळे तत्कालीन समाजातील शेतकरी, कष्टकरी, दलीत, बहुजन तसेच व्यवसाय व व्यापार करणारा मोठा वर्ग इच्छा नसताना धर्मांतराच्या आहारी गेला.

संदर्भ: औरंगजेब, लेखक – जदुनाथ सरकार, पृष्ठ क्र. 160, 161
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Satish Chandra Mishra-
महमूद गजनवी की गिनती दुनिया के सबसे क्रूर शासकों में होती है। सैयद सालार मसूद गाजी इसी गजनवी का भांजा था और उसकी सेना का सेनापति भी था।
1033 ई. में सैयद सालार मसूद गाजी बहराइच तक पहुंच गया। वहां उसका सामना महाराजा सुहेलदेव राजभर से हुआ। महाराजा सुहेलदेव राजभर ने उस वक्त तक 21 पासी राजाओं के साथ मिलकर गठबंधन में एक संयुक्त सेना तैयार कर ली थी। बहराइच में हुए युद्ध में महाराजा सुहेलदेव राजभर की सेना ने सालार मसूद गाजी को करारी शिकस्त दी। हार के साथ ही युद्ध में सालार मसूद गाजी को जान भी गंवानी पड़ी। इसके बाद उसकी सेना ने बहराइच में ही उसको दफना दिया। काफी समय के बाद दिल्ली के सुल्तानों के दौर में यहां मजार बनी और इसे दरगाह के रूप दे दिया गया। बाद में यहां मेला लगने लगा। उसी हत्यारे लुटेरे की याद में वर्षों से संभल में मेला लगाकर जश्न मनाने का कुकर्म किया जाता रहा। अब मंदिरों को तोड़ने लूटने वाले गजनवी गिरोह के प्रमुख गुर्गे की याद में लगाने वाले गद्दारों को योगी प्रशासन ने कठोरता  से समझा दिया है कि, किसी लुटेरे हत्यारे की याद में संभल में कोई मेला नहीं लगेगा।

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रोटी के प्रकार……(पढ़ना जरूर)

कुछ वृद्ध मित्र एक पार्क में बैठे हुऐ थे, वहाँ बातों – बातों में रोटी की बात निकल गई।

तभी एक दोस्त बोला – जानते हो कि रोटी कितने प्रकार की होती है?

किसी ने मोटी, पतली तो किसी ने कुछ और हीं प्रकार की रोटी के बारे में बतलाया।

तब एक दोस्त ने कहा कि नहीं दोस्त…भावना और कर्म के आधार से रोटी चार प्रकार की होती है।”

पहली “सबसे स्वादिष्ट” रोटी ” माँ की “ममता” और “वात्सल्य” से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।

एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।

उन्होंने आगे कहा “हाँ, वही तो बात है।

दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और “समर्पण” भाव होता है जिससे “पेट” और “मन” दोनों भर जाते हैं।”,

क्या बात कही है यार ?” ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं।
फिर तीसरी रोटी किस की होती है?” एक दोस्त ने सवाल किया।

“तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें सिर्फ “कर्तव्य” का भाव होता है जो कुछ कुछ स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है”,
थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई।

“लेकिन ये चौथी रोटी कौन सी होती है ?” मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा-

“चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इन्सान का “पेट” भरता है न ही “मन” तृप्त होता है और “स्वाद” की तो कोई गारँटी ही नहीं है”, तो फिर हमें क्या करना चाहिये।

माँ की हमेशा इज्ज़त करो, पत्नी को सबसे अच्छा दोस्त बना कर जीवन जिओ, बहू को अपनी बेटी समझो और छोटी मोटी ग़लतियाँ नज़रन्दाज़ कर दो । बहू खुश रहेगी तो बेटा भी आपका ध्यान रखेगा।

यदि हालात चौथी रोटी तक ले ही आयें तो ईश्वर का शुक्रिया करो कि उसने हमें ज़िन्दा रखा हुआ है, अब स्वाद पर ध्यान मत दो केवल जीने के लिये बहुत कम खाओ ताकि आराम से बुढ़ापा कट जाये, और सोचो कि वाकई, हम कितने खुशकिस्मत हैं।

~ यह भोजन व्यवस्था पर आधारित है।

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ससुराल वाली मां


सुबह 10 बार आवाज़ लगाने पर भी ना उठती हो जो कभी वो आज सुबह 6 बजे उठकर चाय बनाने लगी। अखबार ले आयी, पौधों को पानी दे दिया, पापा को मॉर्निंग वॉक पर जाने के लिए जगाने आ गयी ! आखिर ये चक्कर क्या है। घर के सभी लोग रानी को बड़ी आश्चर्य मुद्रा में देखे जा रहे थे।

जब सब के सब्र का बांध टूट गया तो उसने बड़े ही मासूम से लहज़े में कहा, “वहाँ ससुराल में थोड़ी कोई होगा मेरे आगे पीछे घूमने के लिये”। शादी पक्की हुए अभी 3 महीने ही हुए थे और अचानक से रानी की समझ में इतना परिवर्तन और बेटी को बड़ी होते देख सब खुश भी थे और दुखी भी।

शादी हुई रानी अपने नए घर आयी। सुबह नींद नही खुलेगी यह सोचकर वह पूरी रात नहीं सोई। जल्दी नहा धोकर, पूजा कर अपनी पहली रसोई की तैयारी की सोचने लगी। क्या बनाऊ जो सबको अच्छा लगे, बच्चो को भी पसंद आये ! इस कशमकश में लगी थी कि एक सहज मीठी सी आवाज़ आयी, रानी तुम इतना जल्दी क्यों उठ गई बेटा ?”

राहत का चस्का था जैसे उन स्वरों में ! रानी ने जैसे ही पीछे मुड़ के देखा तो “सासु माँ” हाथ में शादी के हिसाब के कुछ पन्ने लिए खड़ी थी। शादी की दौड़ भाग में कितना परेशान हो गयी होगी, फिर घरवालो की याद भी आ रही होगी, ऐसे में अगर नींद पूरी नही करोगी तो अपनी तबियत बिगाड़ लोगी”। सासु माँ ने हिसाब के पन्नो को टेबल की दराज में रखते हुए रानी से कहा।

अरें ये क्या ! ये तो बिल्कुल वैसी नही है जैसा मैंने सोचा। मैं तो पिछले कितने महीनों से जल्दी उठने की प्रैक्टिस कर रही थी और यहाँ तो कुछ और ही हो गया। मेरी पूरी पढ़ाई घर से दूर रह कर हुई थी, होस्टल में जिस कारण मैं घर के कामों में उतनी कुशल नही थी जितना एक नई बहू को होना चाहये।

पहली रसोई में एक रोटी बनाए जाने का रिवाज है हमारे यहां, आटा ज़्यादा गीला हो जाने की वजह से रोटी उतनी गोल नही बनी जितनी बननी चाहये। मन में बहुत डर लग रहा था बहुत बुरा भी लग रहा था। मन ही मन माँ को कोस रही थी क्यों मुझे डांट कर अच्छे से घर का काम नही सिखाया।

सुबह की रस्म जैसे तैसे हुई। सब लोगो के लिए खाना बनाने की तैयारी हो रही थी। मैं किचन में खड़ी समझने की कोशिश कर रही थी कि कुछ प्रयास मैं भी करूँ खाना बनाने का। तभी वही आवाज़ वापस आयी। रानी देखो आज मैं क्या बना रही हूँ ? मटर पनीर की सब्ज़ी, गाजर का हलवा और लच्छे पराठे।”

फिर ये क्या ! ये सब तो मेरी पसंद के सामान है, मेरी पसंदीदा डिशेज़। समझ में नही आ रहा था कोई सपने में तो नहीं कह रहा। नहीं नहीं ये तो सासु माँ ही बोल रही है। मेरे थोड़े सहमे, थोड़े डरे, थोड़े विस्मयी भावो को शायद भाँप लिया था उन्होंने !

वो मेरे पास आई और मुझे बिठाकर बोली – “शादी लड़की की परीक्षा नहीं है रानी कदम कदम पर उसे किसी टेस्ट में पास होने पर नंबर दिए जाएं। तुम्हारी शादी केवल मेरे बेटे से नहीं हुई है। जितनी तुम्हारी खुशियों की ज़िम्मेदारी मेरे बेटे की है उतनी हमारी भी। मैं तुम्हे इस घर में केवल काम करवाने, तुम्हारी खूबियों को परखने, तुम्हारी अज़ादी को छीनने, या तुम हमारे लिए क्या क्या बलिदान कर सकती हो ,ये जानने के लिए नही लायी हूँ।

मुझे तो सिर्फ एक दोस्त, एक अच्छा साथी चाहिये जो मैं कभी कमज़ोर पड़ जाऊ तो मुझे संभाल सके। धागे का वो हिस्सा चाहये जो घर के सारे मोतियों को प्यार और स्नेह की एक माला में पिरोये रखे। मैं नही मानती की बहू को सुबह जल्दी उठकर नाहा धोकर पूजा कर लेनी चाहिये या उसे खाना बनाने में दक्षता हासिल होनी चाहये। अगर उसे कुछ आना चाहिए तो वो है “प्यार करना” परिवार से।

छोटे छोटे बदलाव से और सबसे ज़रुरी खुद से हां ! बिल्कुल ठीक सुना तुमने, जब तक तुम खुद से प्यार नही करोगे तुम खुश नही रह पाओगी। ये शादी तुम्हारे सपनो की क़ुरबानी नही है बेटा, तुम्हारे सपनो की उड़ान है। हम सब तुम्हारे साथ है ! हर कदम, हर पल, हर समय। और आज हमारे परिवार के नए सदस्य का स्वागत हम उसकी बनाई हुई पसंदीदा खाने से करके कर रहे हैं।”

आज रानी की शादी को 1 साल हो गए है, लेकिन उसने अपनी शादी से जो सबसे अनमोल रिश्ता कमाया था वो था “माँ” हां वही सासु माँ अब माँ बन गयी थी। बहुत उतार चढ़ाव देखे थे रानी ने अपने जीवन में, कभी गर्भपात, कभी पैसो की कमी, कभी पति से झगड़ा, कभी बच्चो की टेंशन, लेकिन आज भी मन से जुड़ीं है वो अपनी सास से। हर पल वो यही कामना करती है की जब उसका बेटा भी बहु लेकर घर आये तो वो उसकी सास जैसी सास बन सके, या उनका अंश ही सही।

समाज के कुछ हिस्सों में एक भी सास माँ बनने में विश्वास नही रखती पर मेरी सभी से ये गुज़ारिश है, जब हम किसी लड़की को अपने घर में लाये तो उसको उसकी कमियों के साथ स्वीकार करें, अपने बच्चों को गलतियों पर डांटकर भी तो फिर से उन्हें पुचकार लेते हैं ना तो वही हम उनके साथ भी करें

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રિટાયર્ડ વ્યક્તિ.

“આજે અમુલની ચાર કોથળી લાવવાની હતી. તમે ત્રણ લઈ આવ્યા.” જિગીશાબેન બોલ્યાં.
” સારું, હું લઈ આવું છું.
” એમ કહી ગૌરાંગ ભાઈ લિફ્ટ વગરના ફ્લેટમાં બીજા માળેથી ઉતરી અડધો કિલોમીટર ચાલી બીજી એક કોથળી લઈ આવ્યા…..!

ત્યાં નીચે શાકભાજીના ગાડા વાળાએ માઈકમાં બુમો પાડી…..
એટલે…..
“પપ્પા, તુવેરનું ગાડું આવ્યું છે.
ચાલીસની કિલો” પુત્રવધુ જુહી બોલી.
“સારું હું લઈ આવું છું.
“પાછા બે દાદરા ઉતરી અઢી કીલો તુવેર લઈ આવ્યા…..!

ચા પીતાં પીતાં જિગીશાબેન બોલ્યાં : ચા પીને તુવેરો ફોલી નાંખીએ…..
સાંજે કચોરી થાય.
“સારું ફોલી નાંખીએ” એમણે જવાબ આપ્યો…..!

એ અને પત્ની જિગીસા બેન તુવેર ફોલવા બેઠાં.
સવારે આઠ વાગ્યા હશે.
એમનો પુત્ર ચિરાયુ ઉઠયો.
સોફામાં બેસી ન્યૂઝ પેપર વાંચ્ચું.
પછી કોફી પીધી.
જુહીએ ગરમાગરમ ઉપમા બનાવ્યા એ ખાદ્યા અને મોબાઈલમાં મેસેજ જોવા લાગ્યો.
પણ…..
“કેમ છો પપ્પા મમ્મી”…..?, “જય શ્રી કૃષ્ણ “, “શું કરો છો…..?” કશું જ નહીં…..!
ઉભો થયો ત્યારે બોલ્યો: “મમ્મીના દાંતના ડોક્ટરની એપોઈન્ટમેન્ટ અગિયાર વાગ્યે છે. તમે સમયસર પહોંચી જજો. ગયા વખતે મોડું કયુંઁ હતું એવું ના થાય.”
“સારું સારું” ગૌરાંગ ભાઈએ જવાબ આપ્યો…..!

ત્યાં જિગીશાબેનની બેનનો ફોન આવ્યો. એટલે એ તુવેરો પડતી મુકીને વાતોએ વળગ્યાં. વાતમાં જરા પણ દમ નહોતો. માત્ર કોઈકનું લગ્ન આવતું હતું. એની ખોદણીઓ જ હતી. પણ પોણો કલાક લગાડ્યો. એટલા સમયમાં ગૌરાંગભાઈએ અડધી તુવેરો ફોલી કાઢી…..!

ત્યાં જિગીશાબેન બોલ્યાં: “ઓ હો….. નવ વાગી ગયા. હજી નહાવાનું બાકી છે. પાછું દવાખાને જવા દસ સવા દશે તો નીકળવું પડશે ને.. ઉપમા ખાઈને જઈશ” એમ કરી ઊભાં થઈ ગયાં.
એટલે તુવેરો ફોલતાં ફોલતાં ગૌરાંગભાઈ ફરી “સારું સારું” બોલ્યા…..!

એટલાંમાં પુત્રવધુ જુહી બોલી: “પપ્પા સ્કુલ બસ આવવાનો ટાઈમ થઈ ગયો છે. તુવેરો બપોરે ફોલજો. પિન્ટુ તૈયાર છે.”
“સારું સારું” કરી ફરી બે સીડી ઉતરી પિન્ટુને મુકી આવ્યા…..!

દસ વાગી ગયા હતા. નહાવાનું બાકી, સવારથી એક ચા જ પીધી હતી.
તુવેરો ફોલવાની લ્હાયમાં ઉપમાનો નાસ્તો પણ નહોતો કયોઁ.
પુજા તો એક બાજુ જ રહી
અને
બધું પડતું મુકીને પત્નીની દાંતની રૂટ કેનાલ ટ્રિટમેન્ટ માટે ઝડપથી તૈયાર થઈ, પત્નીને લઈ ચોથી વાર નીચે ઉતર્યા. દોડંદોડ કરી રિક્ષા બોલાવી આવ્યા…..!

ડોક્ટરને ત્યાં પહોંચ્યા. તો બીજું એક મોટું ઓપરેશન આગળ ચાલું હતું. એટલે એક કલાક પછી ટ્રિટમેન્ટ થશે. એમ નર્સ બોલી. ફરી ગૌરાંગભાઈ “સારું સારું” બોલ્યા…..!

પેટમાં ભુખ અને સવારથી અર્થ વગરના કામના કારણે એમને અણગમો લાગતો હતો. પણ બેસી રહ્યા. દાંતની ટ્રિટમેન્ટ કરાવી અઢી વાગે ઘરે આવ્યા તો…..?
પુત્રવધુ જુહી M Way નું Marketing કરવા નીકળી ગઈ હતી…..!

એટલે ગૌરાંગભાઈ નહાઈ, એક દીવો માત્ર કરી ઠંડુંગાર જમવા બેઠા.
બે રોટલી માંડ ખાઈ ઊભા થઈ ગયા…..!

જિગીશાબેનને વેનીલા આઈસ્ક્રીમ આપી, ગોળીઓ આપી સુવાડી રાખ્યાં…..!
ત્યાં તુવેરો યાદ આવી. એટલે ફોલવા બેઠા. સાડા ચાર થયા એટલે પિન્ટુને લેવા પાંચમી વાર સીડી ઉતર્યા…..!

તુવેરો લગભગ ફોલાઈ ગઈ. સાંજે કચોરી બની. એ અને જિગીશાબેન જમવા બેઠાં. ત્યાં જિગીશાબેનને માથામાં સણકા ચાલુ થયા. એટલે એમણે ડોક્ટરને ફોન કયોઁ.
ડોક્ટરે એક ગોળી લાવી આપવાનું કહ્યું.
એટલે ફરી છઠ્ઠી વાર સીડી ઉતર્યા…..!

ચાલતા ચાલતા એક મેડિકલ સ્ટોરમાં જઈ ગોળી લાવી, માથે પડેલા જેવી પત્નીને આપી. જમવા બેઠા. પણ માત્ર ત્રણ કચોરી ખાઈ શકયા. થાકના કારણે સ્વાદ જ આવતો ન હતો.

અડધો કલાક પછી પુત્ર જમવા બેઠો. એટલે પુત્રવધુ જુહી એ તળવાની બાકી રાખેલી કચોરીઓ તળી. દહીં, સોસ, ધાણા, ઝીણી સેવ સાથે પ્લેટ તૈયાર કરી આપી. પેલો ત્રણ પ્લેટ કચોરીઓ ખાઈ ગયો…..
જમીને મોબાઈલ પર ગેમ રમવા લાગ્યો…..!
પણ પૂછતો નથી કે, “દવાખાને શું થયું…..?”
પછી…..
ગૌરાંગભાઈ એ સામેથી કહ્યું ત્યારે “કામ પતી ગયું ને…..? સારું. મને ઊંઘ આવે છે.” કરી એના રૂમમાં જતો રહ્યો…..!

ગૌરાંગભાઈને ખોટું લાગ્યું. એ એમના રૂમમાં સુવા ગયા. અને વિચારોએ વળગ્યા.
“મેં નોકરી કરી ત્યાં સુધી એકપણ દિવસ ખરાબ વર્તન કયુંઁ ન હતું. બિમાર માને હાથ પકડી પકડી ફેરવતો હતો. ઘરની જવાબદારી નિભાવી…
પણ પોતાના માટે કશું જ અલગ મહત્વ બતાવ્યું ન હતું…..
નોકરીમાંથી રિટાયર્ડ થયો. મારા પેન્શનથી જ નેવું ટકા ઘર અત્યારે ચાલે છે.
પણ…..
મારી કાળજી લેનાર કોઈ નથી…..
બધાંને ફોનમાં રસ છે એટલો બાપા, તમે ખાધું કે નહીં…..? તમને દહીં સાથે કચોરી ભાવે છે. બનાવી આપું…..? પગની પિંડીઓ દુખે છે…..? દબાવી આપું…..? કશું જ નહીં…..!

તુવેરો લાવ્યો હું, ફોલી પણ મેં. પામ્યો કેટલું….? ત્રણ કચોરી…..!
એ તો બહાર મહારાજ ઘી કાંટા વાળાની ત્યાં ખાધી હોત તો આનાથી પણ વધારે આનંદથી સ્વાદ સાથે ખવાત…..!


હું રિટાયર્ડ થયો એટલે ઘરનો Unpaid નોકર જ બની ગયો કહેવાઉં…..!
પાછળની ઉંમરે પ્રભુ સ્મરણ, શાંતિ, હુંફ, લાગણી, આનંદ, પૌષ્ટિક ખોરાક વગેરે જોઈએ…..
આ તો એક વરસથી દિવસ દરમ્યાન ધક્કા, હુકમો અને તોછડાઈ સિવાય કશું રહ્યું નથી…..!

બસ કાલે…..
રાજેશભાઈ પંડયાને મળવું જ છે…..
એ ચોક્કસ રસ્તો બતાવશે…..

મારી પાસે આવીને બધી વાત કરી.

મેં એક જ જવાબ આપ્યો.
“તમારા ઘર નજીક જલારામ મંદિર છે. ત્યાં કોઈ સેવામાં જોડાવ. આશા વગર.
ઘરનાને એમ કહો કે “પાંચ હજાર પગારથી નોકરી મળી છે. એકાઉન્ટ લખવાનું છે. સવારે નવ થી સાંજે છ સુધી જવાનું છે. બપોરે જમવા ઘેર આવવા દેશે.”

બેન્કમાં પૈસા ઉપાડવા તો તમે જ જાવ છો…..?
ઘરનાને તો ઘર ચલાવવાનો જ સંબંધ છે…..?
બીજા સંબંધો પછી…..
બાકી જીવન પ્રભુ ભક્તિમાં, એક આત્મ શાંતિથી પસાર થશે અને સંસારથી વિમુખ પણ નહીં થાવ. ઘરનાનાં તોછડા મોંઢા જોવા કરતાં સેવાથી વધારે પુણ્ય કમાશો એ નક્કી…..!”

એક સંતોષ સાથે મારા ઘરેથી એ ગયા…..!


રાજેશ પંડયા

🙏🙏🙏

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आज वक़्फ़ पर दिल्ली में जो सांप्रदायिक भीड़ जमा हुई, वैसा जमावड़ा इससे पहले 4 बार हुआ।

1. अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए, ढाका, 1906
2. तलाकशुदा शाह बानो को गुज़ारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को खिलाफ कई शहरों में रैली, 1985
2. कोर्ट द्वारा राम मंदिर का ताला खोलने के फ़ैसले के ख़िलाफ़, बोट क्लब, दिल्ली, 1987
3. दक्षिण एशिया के धार्मिक पीड़ितों को नागरिकता देने के क़ानून सीएए के खिलाफ, शाहीन बाग़, 2019

पहली और दूसरी कोशिश सफल रही। अब और नहीं। संसद तय करेगी कि दे़श कैसे चलेगा। ये मसले सडकों पर तय नहीं होंगे।

अभी नया वक़्फ़ बिल आया भी नहीं है। नए विधेयक में क्या होगा-क्या नहीं, पता भी नहीं। पर राजनीति के लिए विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।

ये निंदनीय है।

दिलीप मंडल