Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

**”एलिस इन वंडरलैंड” की कहानी का जन्म 4 जुलाई 1862 को एक नाव यात्रा के दौरान हुआ था। उस दिन, गणितज्ञ और लेखक लुईस कैरोल (जिनका असली नाम चार्ल्स लुटविज डॉजसन था) अपने मित्र रेवरेन्ड रॉबिन्सन डकवर्थ और क्राइस्ट चर्च के डीन की तीन बेटियों—लोरीना, इडीथ और ऐलिस लिडेल—के साथ थेम्स नदी में नाव की सवारी कर रहे थे। यात्रा के दौरान, छोटी ऐलिस ने डॉजसन से एक कहानी सुनाने के लिए कहा। डॉजसन ने एक कल्पनाशील कथा सुनानी शुरू की, जिसमें एक लड़की ऐलिस खरगोश के बिल में गिर जाती है और एक अद्भुत दुनिया में विचरण करती है। ऐलिस इस कहानी से इतनी प्रभावित हुई कि उसने डॉजसन से इसे लिखने का अनुरोध किया।

दो साल बाद, 1864 में, डॉजसन ने ऐलिस को “ऐलिस एडवेंचर्स अंडर ग्राउंड” नामक एक हस्तलिखित पांडुलिपि भेंट की, जिसमें उन्होंने खुद चित्र बनाए थे। लेकिन दोस्तों के प्रोत्साहन पर, उन्होंने इस कहानी का विस्तार किया और 1865 में इसे “ऐलिस एडवेंचर्स इन वंडरलैंड” नाम से प्रकाशित किया। यह पुस्तक लुईस कैरोल के छद्म नाम से प्रकाशित हुई और इसके चित्रांकन का कार्य जॉन टेनियल ने किया। यह पुस्तक तुरंत लोकप्रिय हो गई और समय के साथ साहित्य की एक क्लासिक कृति बन गई। इसे 50 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया गया है और इस पर कई फ़िल्में, नाटक और संगीत प्रस्तुतियाँ बनाई गई हैं।

इस कहानी के निर्माण से जुड़ी कई रोचक बातें हैं। इसके पात्र वास्तविक जीवन के व्यक्तियों से प्रेरित थे—डॉजसन ने नायिका के लिए ऐलिस लिडेल के उपनाम का उपयोग किया और कई अन्य पात्रों की रचना अपने आसपास के लोगों से प्रेरित होकर की। व्हाइट रैबिट, कैटरपिलर और मैड हैटर जैसे पात्रों में गणितीय और दार्शनिक संदर्भ छिपे हो सकते हैं, जो डॉजसन की बौद्धिक दुनिया को दर्शाते हैं। क्वीन ऑफ हार्ट्स विक्टोरियन युग की तानाशाही प्रवृत्ति का प्रतीक है, जबकि ऐलिस जिज्ञासा और स्वतंत्रता की चाह को दर्शाती है। यह कहानी तर्क, कल्पना और 19वीं सदी के समाज पर सूक्ष्म टिप्पणी का अनूठा संगम है, जो आज भी पाठकों को मोहित करती है।**

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav, हिन्दू पतन

ધુળેટી


#भूल_गए_भक्त_प्रहलाद ..??
यह पाकिस्तान के मुल्तान में स्थित #प्रहलादपुरी मंदिर है।

#नरसिंह भगवान का यह मंदिर खुद भक्त #प्रहलाद ने बनवाया था, इसे तालिबान ने नही तोड़ा ना ही अलकायदा ने। इसे उन्होंने तोड़ा जिनके बारे में आप कहते है कि वो तो हमारे साथ सारे त्यौहार मनाते है और ब्ला ब्ला।

जैसे अयोध्या में दिवाली और हरिद्वार में गंगा आरती प्रसिद्ध है वैसे ही मुल्तान में होली प्रसिद्ध थी। हिन्दू मुसलमान मिलकर होली खेलते थे, यहाँ की धर्मयात्राओ में मुस्लिम भी भागीदार होते थे। हिन्दू ने इसी भोलेपन में एक गलती कर डाली जिसका नतीजा यह फोटो है।

1810 में हिंदुओ ने बगल की एक जमीन दरगाह बनाने के लिये दान की। यह इलाका सूखे से ग्रस्त था और मंदिर परिसर में ही बस एक कुआँ था। दरगाह बनाते समय मुसलमान हिन्दू का ऋणी रहा, लेकिन कुछ सालों में मंदिर में चोरी के केस बढ़ गए।

मुस्लिम समुदाय ने आरोप लगाया कि हिन्दू कुएँ का पानी रोक रहे है। अंग्रेजो ने कुछ नियम बनाकर मामला शांत किया, लेकिन अब विवाद तेजी से बढ़ने लगे। 1850 में कुछ हिन्दू महिलाओं का अपहरण करके उनका बलात्कार किया गया।

इस पर मुल्तान के हिन्दू भड़क गए उन्होंने दरगाह पर हमला कर दिया, दरगाह में आगजनी की और कुरान को जलाया। इसके पलट में मुसलमानों ने मंदिर में आग लगा दी जिस पर नियंत्रण पा लिया गया। हिंदुओ के बाप दादाओं का सेक्युलरिज्म अब नई पीढ़ी भुगतने को प्रस्तुत थी।

दरगाह की जमीन हिन्दू कभी वापस नही ले सके, दरगाह होने के कारण मुल्तान में मुसलमानों की संख्या बढ़ती गयी और आखिरकार जो होली साथ मे मनाई जाती थी उस होली पर अब पथराव शुरू हो गए। जब पाकिस्तान अलग हुआ तो हिंदुओ को भागना पड़ा, नरसिंह भगवान की मूर्ति हरिद्वार में लाकर स्थापित की गई।

मंदिर के अंदर एक मदरसा आरंभ हो गया, 1992 में इस मंदिर को तोड़ दिया गया। लेकिन 2009 में पाकिस्तानी सरकार ने मंदिर के पुनः निर्माण का आदेश दिया।

पैसे भी दिये गए लेकिन जब भी कुछ करते है इस्लाम खतरे में आ जाता है और पत्थरबाजी शुरू हो जाती है। 18 वर्ग फ़ीट की दरगाह 2000 वर्ग फ़ीट वाले मंदिर के लिये बाधा है।

खैर आप लोग गुस्सा मत कीजिये ना ही दुख मनाइए लेकिन अवलोकन कीजिये क्यो कांग्रेस हमेशा कहती है कि इतिहास में कुछ नही रखा उसे मत कुरेदो। क्यो हमारे दिमाग में फ़ीट किया गया कि दरगाहों पर सिर धोकना अच्छी बात है? क्यो हमे लॉलीपॉप दिया जाता है कि त्यौहार मिल जुलकर बनाओ। ये दरगाहे हमेशा मंदिर के आसपास या सड़क किनारे ही क्यो बनती है?

आप सिर्फ ये समझिए की आपके अवचेतन मन में ये सब बातें क्यो डाली जाती है? मुसलमानों ने 1810 में जेहाद छेड़ा था 1992 में यह मंदिर गिरा सके, इसी तरह वो आज 2023 में जब हिंदुओ में सेक्युलरिज्म का बीज बोयेंगे तब ही उसकी फसल उन्हें 2193 तक खाने को मिलेगी।

लेकिन इस बार हम उन्हें रोकेंगे। आप लिख लीजिये वो दिन भी आएगा जब हम मुल्तान में मंदिर फिर से स्थापित करेंगे। अरब से जो इस्लाम की आंधी उठी थी उसने मलेशिया तक इंसानियत का सफाया कर दिया लेकिन भारत बच गया और ये भारत इसीलिए बचा है ताकि मानवता का कमल फिर से खिल उठे।

इस बार हम किसी भ्रमजाल में नही फसेंगे, बल्कि हम आगे बढ़ेंगे, सिंधु नदी एक बार फिर भारत में बहेगी, मुल्तान में होली खेली जाएगी और लाहौर में रावण दहन भी होगा।

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राहुल गांधी और कांग्रेस क्यों बार-बार कहते हैं कि मोदी सरकार सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है क्योंकि सीबीआई के दुरुपयोग की पूरी हिस्ट्री कांग्रेस के पास है

और इनके पास इतने गंदे रिकॉर्ड हैं जिसे जानकर आप चौक जायेंगे

1983 में बिहार में और केंद्र में दोनों जगहों पर कांग्रेस सत्ता में थी बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र थे और केंद्र में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी उस वक्त बिहार विधान परिषद की सभापति थी राजेश्वरी सरोज दास उन्होंने एक लड़की गोद ली हुई थी जिसका नाम था श्वेतनिशा त्रिवेदी

उन्होंने कभी यह खुलासा नहीं किया कि उस लड़की के असली मां बाप कौन थे वह लड़की बेहद खूबसूरत थी राजेश्वरी सरोज दास ने अपने प्रभाव से अपनी गोद ली हुई बेटी को बिहार विधानसभा में टेलीफोन ऑपरेटर बना दिया श्वेत निशा त्रिवेदी इतनी खूबसूरत थी के विधानसभा में सभी विधायक लोग उसे बॉबी कहकर बुलाते थे क्योंकि उसी समय राज कपूर की बॉबी फिल्म रिलीज हुई थी और वह बॉबी फिल्म के डिंपल कपड़िया के जैसी ही खूबसूरत थी

देखते ही देखते श्वेतनिशा त्रिवेदी सत्ता के गलियारों में बहुत बड़ा नाम बन गई उसे बिना टर्न प्रोमोशन देकर सीधे हेड क्लर्क  का पद दे दिया गया और कई विधायक ऐसे होते थे कि जो अपना पूरा भत्ते का बिल जो उसके पास पास होने के लिए आता था वह कहते थे कि से तुम ही रख लेना

स्वेतनिशा त्रिवेदी आईएएस तक का ट्रांसफर करवा देती थी

फिर एक दिन पता चला कि स्वेतनिशा त्रिवेदी इस दुनिया में नहीं है

बिहार के तमाम अखबारों को आदेश दे दिया गया था कि कोई भी बॉबी उर्फ श्वेतनिशा त्रिवेदी के निधन की खबर प्रकाशित नहीं करेगा

उस वक्त पटना के एसएसपी थे आईपीएस किशोर कुणाल उन्हें जब पता चला कि बॉबी उर्फ श्वेत निशा त्रिवेदी की अचानक मौत हो गई है तब उनका माथा ठनका वह तुरंत उसकी मां के पास गए फिर मां ने बताया कि उनकी बेटी की तबीयत खराब हुई और क्योंकि उनकी गोद ली हुई बेटी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था इसलिए उसे पटना के ईसाई कब्रिस्तान में दफन कर दिया गया है

तुरंत ही एसएसपी किशोर कुणाल ने कोर्ट का ऑर्डर लेकर बॉबी उर्फ श्वेत निशा त्रिवेदी की शरीर को कब्र से बाहर निकाला और उसका पोस्टमार्टम करवाया

शव के पोस्टमार्टम से पता चला कि बॉबी के पेट में 3 महीने का भ्रूण था और वह उसका निधन मेलाथियान नामक जहर देने से हुई थी

फिर एसएसपी किशोर कुणाल के पास बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा का फोन आया कि आप इस मामले की फाइल बंद कर दो आप अपनी जांच मत करो लेकिन किशोर कुणाल ने मना कर दिया और बोला कि सर यह मौत संदिग्ध है मैं इसकी जांच करूंगा

और वह एक टेप रिकॉर्डर लेकर श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बॉबी की मां के कुर्ती के नीचे लगा दी है और ऐसे लगाया गया था ताकि उन्हें पता ना चले कि उनकी कुर्सी के नीचे टेप रिकॉर्डर लगा है और उनका बयान लिया और उन्हें इमोशनली प्रभावित किया कि आप कैसी मां है अब आप रिटायर हो चुकी हैं इस बुढ़ापे में आपको अपनी बेटी की मौत पर सच बोलना चाहिए ताकि आपका अगला जन्म सुधर जाए फिर श्वेता त्रिवेदी की मां रोने लगी और उन्होंने बताया कि उनकी बेटी उनके कहने में नहीं थी कई मंत्रियों के साथ उसके संबंध थे और 50 से ज्यादा विधायक भी उसे जब चाहे तब अपने बंगले पर बुलाते थे

फिर उन्होंने बताया कि बिहार विधानसभा का अध्यक्ष और कांग्रेस नेता राधा नंदन झा का बेटा रघुवर झा एक पाउडर जैसी चीज लेकर आया और बॉबी श्वेत निशा त्रिवेदी से कहा कि यह तुम्हारी दवा है इसे खा लो और वह दवा खाते ही उसकी तबीयत बेहद बिगड़ गई और आनन-फानन में उसे हॉस्पिटल रघुवर झा लेकर गया जहां उसकी मौत हो गई

फिर किशोर कुणाल हॉस्पिटल गए तब डॉक्टरों ने बताया कि उन्होंने उसका पोस्टमार्टम करवाया था और जब उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखी तब वो चौक गए कि दो पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनी थी एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह लिखा था की  श्वेत निशा त्रिवेदी की मौत हार्ट अटैक आने से लिखी हुई है दूसरे पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह लिखा था कि मौत जहर से हुई है और जहर की वजह से अंदरूनी रक्तस्राव बहुत तेज हुआ जिससे उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया

बिहार में खबर फैल गई कि बॉबी उर्फ श्वेत निशा त्रिवेदी की मौत की जांच चल रही है और किशोर कुणाल बड़ी ईमानदारी से जांच कर रहे हैं फिर बिहार के 44 कांग्रेसी विधायक और बिहार के तीन मंत्री मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा से कहा कि आप बिहार के एसएसपी से यह जांच लेकर सीबीआई को दे दीजिए वरना हम आपकी सरकार गिरा देंगे और बिहार के विधायकों ने जगन्नाथ मिश्रा से कहा कि आप इंदिरा गांधी से बता दीजिए सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट बनाकर हम देंगे सीबीआई अधिकारियों को सिर्फ उस पर दस्तखत करनी होगी

एक दिन अचानक बिहार के मुख्यमंत्री ने प्रेस नोट जारी किया कि बॉबी उर्फ श्वेता निशा त्रिवेदी की हत्या की जांच बिहार पुलिस से लेकर सीबीआई को दे दी जाती है 4 दिन बाद सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दे दिया

सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट में लिखा बॉबी उर्फ श्वेत निशा त्रिवेदी एक लड़के के साथ प्रेम में थी और प्रेम में धोखा मिलने की वजह से उसने जहर खाकर आत्महत्या कर दिया

और आपको यह जानकर आश्चर्य होगा सीबीआई का कोई भी अधिकारी इस केस की जांच करने बिहार नहीं आया था इस केस में किसी से पूछताछ नहीं हुई थी यहां तक कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों से भी पूछताछ नहीं हुई थी

इसीलिए यह कांग्रेसी  बार-बार कहते हैं कि मोदी सरकार सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है क्योंकि इन कांग्रेसी  को अपने पाप और कुकर्म याद आ जाते हैं

एसएसपी किशोर कुणाल  ने बाद में मीडिया से कहा कि उस जमाने में अदालत में पीआईएल का सिस्टम नहीं था वरना मैं इसमें पीआईएल लगाता  और उस वक्त सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट सब कांग्रेसी सरकारों द्वारा मैनेज होते थे

और बाद में जब पीआईएल सिस्टम बना तब उन्होंने खुद इस मामले में पीआईएल लगाया तब कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीआईएल सिर्फ बॉबी के परिवार वाले लगा सकते थे और बॉबी की मां का निधन हो चुका था और उसके परिवार में कोई सदस्य नहीं था जो पीआईएल लगाएं

इस तरह यह मामला हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो गया।

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कभी पाकिस्तान भारत के एक  राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री के जहाज को मिसाइल से गिरा कर मार देता था और कहता था गलती से मिसाइल फायर हो गया था और भारत की काँग्रेस सरकार चुप रहती थी…

जी हां गुजरात के मुख्यमंत्री #बलवंत_राय_मेहता  गुजरात के द्वारिका से कच्छ जा रहे थे पाकिस्तान का एक लड़ाकू विमान भारत की सीमा में घुसता है और गुजरात के मुख्यमंत्री के विमान पर दनादन दो मिसाइल फायर करके वापस पाकिस्तान चला जाता है

इस हमले में मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता उनकी पत्नी उनके बेटे और विमान के पायलट और को पायलट सब मारे जाते हैं…

जब बलवंत राय मेहता के जहाज के पायलट ने पाकिस्तानी लड़ाकू विमान को देखा तभी उसने मर्सी का सिग्नल भी भेजा और विमान के डैने को हिला कर यह संदेश दिया कि मुझ पर रहम करो मुझ पर दया करो मैं सरेंडर करने को तैयार हूँ…

उसके बावजूद पाकिस्तान का वह लड़ाकू विमान बलवंत राय मेहता के जहाज को मार कर चला जाता है…

इस घटना के 30 साल के बाद पाकिस्तान के फाइटर जेट का वह पायलट जिसने बलवंत राय मेहता और उनकी पत्नी और उनके बेटे को मारा था वह बलवंत राय मेहता की अमेरिका में रह रही बेटी को पत्र लिखकर माफी मांग लेता है…

उस वक्त अगर भारत सरकार चाहती तब इसका घनघोर बदला ले सकती थी…

लेकिन कांग्रेस सरकार अपने ही एक मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी तथा चार अन्य लोगों के के मारे जाने पर कुछ नहीं किया और ना ही इस मामले को इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस में ले गए…

और आज यह चरसी राहुल गांधी कहता हैं नरेंद्र मोदी कायर हैं…

जागो हिंदुओं जागो

#विट्ठलदासव्यास

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મહાભારત કાળના મહાયુદ્ધનો સૌથી બળવાન મહાયોધ્ધો ભીમનો પૌત્ર બર્બરિક હતો, તેને શ્રીકૃષ્ણએ યુદ્ધ પહેલા જ સ્વૈચ્છીક આત્મહત્યા માટે પ્રેરિત કર્યો, અને યુધ્ધથી બહાર કર્યો, જોકે તે મહાયોદ્ધાની યુધ્ધ જોવાની ઈચ્છા પુરી કરવા તેનું મસ્તક યુધ્ધ પૂર્ણ થયું ત્યાં સુધી જીવંત હતું તેવો ઉલ્લેખ અનેક ગ્રંથોમાં છે. તે કેવો મહાયોધ્ધો હતો તે સમજવું હોય તો સરળ ભાષામાં કહેવાય કે, કૃષ્ણની ગુપ્તચર સંસ્થાએ યુદ્ધ પહેલા સર્વે કરાવ્યો તેમાં ઉત્તમ યોદ્ધાઓને પૂછવામાં આવ્યું કે તમે સેનાપતિ બનો તો આ યુદ્ધ કેટલા દિવસમાં પૂરું કરો…? તેના જવાબમાં ભિષ્મએ ચોવીસ દિવસ, દ્રોણાચાર્યે પચ્ચીસ દિવસ, કર્ણે વીસ દિવસ અને અર્જુને અઠ્ઠાવીસ દિવસ કહ્યા, જ્યારે ભીમના પૌત્ર અને ઘટોત્કચ્છના દિકરા બર્બરિકે આ આખુય યુદ્ધ માત્ર એક બાણનું સંધાન કરી પલકવારમાં પૂર્ણ કરી દેવાની ખાત્રી આપી હતી, શ્રીકૃષ્ણને લાઈવ ડેમો આપી એ વાત પુરવાર કરતુ ઉદાહરણ આપ્યું હતું. એક જ બાણથી પીપળના તમામ પાંદડાને વિધ્યા, તે ત્યાં સુધી કે કૃષ્ણે પગ નીચે દબાવેલા પાંદડાને વીંધવા તેનું બાણ તેમના પગ પાસે અટક્યુ.. આવી દુર્લભશક્તિ ધરાવતા આ યુવકનું મસ્તક યુદ્ધ પહેલા જ કૃષ્ણે કેમ માગી લીધું..? બર્બરિક યુવાન છે, તેણે કોઈ ભૂલ કે ગુનો કર્યો નથી, કૃષ્ણ તેના ગુરુ રહી ચુક્યા છે. નાગલોક, માનવલોક તથા દેવલોકની શ્રેષ્ઠ શક્તિઓ સાથે કઠીન તપશ્ચર્યા કરીને અમોધશક્તિ સાથે શિવનું ત્રિબાણ મેળવે, પાંડવોના પક્ષે હોય છતાં આવું કેમ ? વિવેચકોએ આ વાતને વધારે ઉજાગર કેમ કરી નથી ? બર્બરિક નામનો સંસ્કૃત અર્થ ઘુઘરિયા ઘટાટોપ વાળ સાથેનો તેજસ્વી ચહેરો, આવા મહાશક્તિસિદ્ધ યોદ્ધાને મહાભારતમાં એક માત્ર યશ એ મળ્યો કે અઢાર દિવસ ચાલેલા આ મહાસંહારક યુદ્ધનો એકમાત્ર ઘટનાસાક્ષી બન્યો, તેણે આ યુદ્ધ યુદ્ધભૂમિ પર રહીને તટસ્થ રીતે જોયું,જાણ્યું અને માણ્યું છે. પણ તે મહાયોદ્ધા વિશે જાણકારી મર્યાદિત છે.

રામાયણ અને મહાભારત હજારોવર્ષ જૂનો સાંસ્કૃતિક વારસો છે. વાલ્મિકકૃત રામાયણ કે મહર્ષિ વ્યાસ રચિત મહાભારત સનાતનધર્મની જેમ અનંત કાળ વહેતા રહેવાના છે, મૌખિક સંસ્કૃતિથી શરુ થયેલી પારંપરિક વારસાઈ સમયાંતરે પથ્થરોમાં, મૂર્તિસ્વરુપે, પોથીઓમાં કે આવનારા સમયમાં આભાસી ડિજિટલના સોફ્ટ ટ્રાન્સપ્લાન્ટમાં, કે પછી સમયના ભાવિમાં બદલાતા અનેક માધ્યમોમાં, બદલાતા જે તે રુપરંગ આવશે તેમાં આ મહાભારત અને રામાયણ ગ્રંથો બદલાતા દરેક રુપરંગમાં સમય અનુરુપ સરળ બની સતત વહ્યા કરશે.

બદલાતા દરેક સમયમાં આવતી દરેક મુશ્કેલીઓથી પાર ઉતરવા આ મહાકાવ્યો જ ઉપયોગી બની રહેશે તે હકીકત છે. રામાયણના દાખલા-દલીલો, દ્રષ્ટાંતો ઘરમાં, ઉંમરાની અંદર ઉપયોગી છે જ્યારે મહાભારતના દાખલા-દલીલો, દ્રષ્ટાંત ઘરની બહાર, ઉંબરાની બહાર ઉપયોગી છે. આપણે મોટેભાગે સમજફેર ને કારણે મહાભારતના સિદ્ધાંત ઘરમાં અને રામાયણના સિદ્ધાંત ઘરની બહાર અમલી બનાવીએ તેથી સમસ્યાઓ ઘટવાને બદલે વધે છે.

હા, આજે શંખનાદ કરવો છે, મહારથી બર્બરિક વિષે, મહાભારત સમયનું એક એવું અનોખું પાત્ર છે જેણે કશું જ ખોટું, ખરાબ કર્યું નથી, જીવન મુગ્ધ યુવાવસ્થા સુધી પહોંચતા પહોંચતા સૌ ઊંચા ગજાના મહારથીઓ કરતા તે બળવાન છે, તેજસ્વી છે, થનગનાટ છે, કૃષ્ણ જેના ગુરુ છે. નાગલોકની વિરાંગના મૌરવી જેની માતા છે, માયાવી રાક્ષસકુલનો ઘટોત્કચ્છ તેનો પિતા છે. હિડંબા તેની દાદી અને શ્રેષ્ઠ પાંડવ ગદાધર ભીમ જેના દાદા છે તેવું અનોખુ વ્યક્તિત્વ એટલે મહાભારતના યુદ્ધના લડવૈયાઓમાં સૌથી દમદાર, જાનદાર, મેધાવી મહાનાયક, કે જે અર્જુન અને કર્ણ કરતા સવાયો બાણાવળી છે, હા, તે બર્બરિક શા માટે બહુ જાણીતો કે ચર્ચિત ના બન્યો !! તેનુ સુખદ આશ્ચર્ય છે. જે યુવકમાં દૈવિતાકાત, દાનવીય માયા, તેજસ્વી ચપળ નાગકન્યાનું તેજ હોય, ત્રિપરિમાણિય સકારાત્મક શક્તિ સંચય હોય, શ્રીકૃષ્ણ જેવા ગુરુ હોય, તપશ્ચર્યા અંતે અમોધ શક્તિઓ ટૂંક સમયમાં જ હાંસલ કરી હોય, તે બર્બરિક. માનવ, દાનવ, દેવ એવી ત્રણેય મહાશક્તિનું સમન્વય થયું હોય તે બાળક વિચક્ષણના હોય તો જ નવાઈ. યુવાવસ્થાએ પહોંચતા પહેલા આ યુવક ઘોર તપસ્વી છે. મહિસાગર સંગમ તીર્થ ક્ષેત્રે તેના તપનો ઉલ્લેખ પુરાણોમાં છે. તે શક્તિનો ઉપાસક નવદુર્ગાને પ્રસન્ન કર્યા પછી સિદ્ધસ્થાને સિદ્ધમાતાને પ્રસન્ન કરે, અપરાજીતા વૈષ્ણવી પ્રસન્ન કરી “વાસુદેવ” અને “વૈષ્ણવી મહાવિદ્યા” મેળવી તમામ સંહારકશક્તિ એકત્ર કરે, અગ્નિ અને સુર્યદેવને પ્રસન્ન કરી વિશેષ શક્તિઓ મેળવે, સ્વયં મહાદેવને પ્રસન્ન કરી “ત્રિબાણ-શક્તિ” હસ્તગત કરે, જેને આજે લેસર મિશાઈલ કહી શકાય. પ્રથમ બાણ દુશ્મનને માર્ક કરે, બીજુ બાણ મિત્રોને માર્ક કરે અને ત્રીજુ બાણ માત્ર દુશ્મનનો સંહાર કરી, પાછા ત્રણેય બાણ તુણીરમાં આવી જાય.! એટલે કે સુદર્શન ચક્રથી વિશેષ શક્તિ, માત્ર એક બાણના સંધાનથી દુશ્મન સેનાનો સોથ વાળી દે, તેવો મહારથી કઈ સેનાને પસંદ ના આવે..! પણ, કૃષ્ણની મુત્સદી સામે વિદ્યાઓની શું વિસાત ! એવું કહી તો બાર્બરિક અને કૃષ્ણ બન્નેનું અપમાન ગણાય. તો પછી કૃષ્ણે તેનું આત્મ વિલોપન, સ્વહસ્તે મસ્તક સમર્પણ કેમ કરાવ્યું ? કેમ કે બર્બરિકને માતાનું પ્રશિક્ષણ હતું કે હંમેશા નબળાની પડખે રહેવું, અહિંયા બર્બરિક પાસે અનુભવનો અભાવ છે. ધર્મ-અધર્મના યુદ્ધમાં નબળાની નહીં, ધર્મપાલન કરનારની સહાય કરવી જાઈએ તેવું પૂર્ણ સત્ય ના સમજી ને બર્બરિકે માત્ર નબળાના પક્ષે લડવાની વાત પકડી, જે દુરંદેશી કૃષ્ણ પામી ગયા, કે આ તો જે સેના નબળી પડશે તે તરફી થશે, અંત સુધી જે પક્ષ નબળો થશે ત્યાં આ લડશે, જેમાં ધર્મ-અધર્મ તરફી સૌ નાશ પામશે, જેથી આ મહાયોધ્ધો તો ભિષ્મ, દ્રોણ કે કર્ણ કરતા ય વધારે ઘાતક બનશે. તેથી બર્બરિકને યુદ્ધ પહેલા, યુદ્ધનો પહેલો શહિદ બનાવ્યો. તે યાજ્ઞાકારી છે, ચુસ્ત છે, લડાયક છે. તપસ્વી છે. બળુકો છે પણ તેની એક નાની પ્રતિજ્ઞા, “માત્ર નબળાની પક્ષે રહીશ” જે પ્રથમ દર્શિય ખોટી નથી, નબળાના પક્ષે રહેવું એ સાચી વિરતા કહેવાય તેવું, આ નાનું યુદ્ધ નથી. આ ધર્મયુદ્ધ છે, મહાયુદ્ધ છે, સત્યના અસ્તિત્વનું યુદ્ધ છે. તેથી અમાપ શક્તિ ધરાવનાર, દુનિયાનું મહાયુદ્ધ લડવાના સ્વપ્ન જાનાર, આ તેજસ્વી બર્બરિક પોતાના ગુરુની કૃષ્ણયાજ્ઞાને કારણે સ્વૈચ્છિક મસ્તક ઉતારી દે છે. અને મહાયોદ્ધો હોવાથી, યુદ્ધદર્શક બનવા વિનંતી કરે છે, તેથી કહેવાય છે કે માત્ર ધડ વગર મસ્તકને શ્રીકૃષ્ણ વરદાન આપી યુદ્ધ પર્યન્ત જીવંત રાખે છે.

અહીંયા બર્બરિકની અર્ધસમજમાં અનુભવનું ભાથુ નથી. અનુભવ સૌથી મોટો શિક્ષક છે તેની ગેરહાજરીએ મહાયોદ્ધાને યુદ્ધ લક્ષ સુધી પહોંચવા ના દીધો. બાર્બરિક-કથા નો સાર એ છે કે નબળાને મદદગાર થવું સ્વાભાવીક છે, પણ જ્યારે વાત ધર્મ, સત્ય અને સિદ્ધાંતની હોય ત્યારે મદદ પામેલી વ્યક્તિ અધર્મી કે સત્ય વિરોધી નથી, તેની ચકાસણી જરુરી છે, આવું થાય તો નબળાને મદદ એ વિરતા નથી. નબળું સબળ બનીને અધર્મ આચરે, સમાજને નુકસાન કરે તો, તને કરેલી મદદ અધર્મ છે. યોગ્ય પાત્રને જ દાનનો કે વિદ્યાનો મહિમા પુરાણોમાં એવી રીતે ઉલ્લેખાયો છે કે, વિદ્યાધન કે અન્ય સંપત્તિનું દાન કરવા માટે જો, કોઈ સુપાત્ર કે યોગ્ય વાહકો ન મળે તો ભલે એ વિદ્યા નકામી જાય, ભલે ધનના ચરુ ભો’માં ભડારાઈ જાય, કે અન્ય સંપત્તિ-શક્તિનો પૂર્ણતઃ નાશ થઇ જાય, પણ કૃપાત્રને હાથમાં ખોટી વિદ્યા, કે ધન-સંપત્તિ ના જવા દેવું.

યુધ્દ્યન્તે પાંડવો શ્રીકૃષ્ણને પૂછે છે કે આ યુદ્ધવિજયમાં મુખ્ય હીરો કોણ, અને તેનો જવાબ બર્બરિક પાસે માંગવાનું કહેતા બર્બરિક કહે છે કે, હારવા-જીતવા તથા મર્યા-માર્યા બંને પક્ષે સૌ યુદ્ધોમાં, ઘાયલ થતા અને કરતા, મરતા અને મારતા, સૌમાં મને તો શ્રીકૃષ્ણ જ દેખાયા છે, ત્યારે પાંડવો ગર્વ, અભિમાન મૂકી, રાજ્ય સિંહાસનની મોહમાયા મૂકી હિમાળો ગાળવા પ્રસ્થાન કરે છે, કળિયુગમાં બર્બરિકની કૃષ્ણના એક નામ ‘શ્યામ’ થી પૂજાશે, તેવી લોક્વાયકા આધારિત, રાજસ્થાનમાં આવેલા શિકરમાં બર્બરિક આજે શ્યામખટ્ટુ (ખટ્ટુશ્યામ) તરીકે પુજાય છે. તે દેવ “બળિયા દેવ” કે જે હંમેશા નબળાની વ્હારે આવે છે, તે બર્બરિકનો અવતાર છે અને નબળાઓની સાચી યાચના ચોક્કસ પૂર્ણ કરે છે તેવી ભાવિકોને અપાર શ્રદ્ધા છે.
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મણિકર્ણિકા ઘાટ


મણિકર્ણિકા ઘાટ..ઇતિહાસ અને રહસ્યઃ

મણિકર્ણિકા ઘાટ, જેને “મહા સ્મશાન” તરીકે પણ ઓળખવામાં આવે છે, તે વારાણસીમાં ગંગા નદીના કિનારે સ્થિત એક પ્રાચીન અને પવિત્ર સ્થળ છે.  હિંદુ ધર્મમાં તેને ખૂબ જ મહત્વપૂર્ણ માનવામાં આવે છે, કારણ કે એવું માનવામાં આવે છે કે અહીં અંતિમ સંસ્કાર કરવાથી  આત્માને મોક્ષ મળે છે.  આ ઘાટ સાથે સંકળાયેલા ઘણા રહસ્યો અને કથાઓ છે, જેમાંથી કેટલાક તેને “શાપિત” તરીકે ઓળખાવે છે, જો કે “શાપિત” શબ્દનો ઉપયોગ સામાન્ય રીતે માત્ર સ્થાનિક માન્યતાઓ અથવા શ્રેષ્ઠતાના સંદર્ભમાં જ થાય છે.

મણિકર્ણિકા ઘાટનું નામ બે મુખ્ય કથાઓ સાથે સંકળાયેલું છે:

માતા પાર્વતીનું કર્ણફૂલ: એક માન્યતા અનુસાર, માતા પાર્વતીનું કર્ણફૂલ આ સ્થાન પર એક તળાવમાં પડ્યું હતું.  ભગવાન શિવે તેમને શોધી કાઢ્યા, જેના કારણે આ સ્થળનું નામ “મણિકર્ણિકા” પડ્યું.  આ તળાવ આજે પણ મણિકર્ણિકા કુંડ તરીકે ઓળખાય છે.
માતા સતીનો અગ્નિસંસ્કાર: બીજી વાર્તા અનુસાર, જ્યારે માતા સતીએ તેમના પિતા દક્ષના યજ્ઞમાં સ્વયંને અગ્નિદાહ આપ્યો, ત્યારે ભગવાન શિવે તેમના નશ્વર અવશેષો સાથે નૃત્ય કર્યું.  સતીનો મૃતદેહ અહીં પડ્યો હતો અને આ ઘાટ પર શિવે તેમના અંતિમ સંસ્કાર કર્યા હતા.  આ કારણથી તેને મહાશમશન કહેવામાં આવે છે.

શ્રાપ અને ચીસોનું રહસ્ય:

મણિકર્ણિકા ઘાટ “શાપિત” હોવાના કોઈ સ્પષ્ટ ઐતિહાસિક અથવા શાસ્ત્રોક્ત પુરાવા નથી, પરંતુ કેટલીક લોકવાયકાઓ અને લોકોના અનુભવો તેને રહસ્યમય બનાવે છે.  એવું કહેવાય છે કે માતા પાર્વતીએ આ સ્થાનને શ્રાપ આપ્યો હતો કે અહીંની ચિતાની અગ્નિ ક્યારેય બુઝાશે નહીં.  આ કોઈ શ્રાપ નથી પણ આશીર્વાદ તરીકે પણ જોઈ શકાય છે, કારણ કે સતત સળગતી ચિતા આ ઘાટની વિશેષતા છે.  અહીં દરરોજ સેંકડો મૃતદેહોના અગ્નિસંસ્કાર કરવામાં આવે છે, અને ચિતાની આગ ક્યારેય ઠંડક થતી નથી.

“ચીસો સંભળાય છે” ના મુદ્દે કોઈ નક્કર પુરાવા નથી, પરંતુ સ્થાનિક લોકો અને કેટલાક પ્રવાસીઓનું કહેવું છે કે આ ઘાટ પર રાત્રે વિચિત્ર અવાજો સંભળાય છે.  આ અવાજો અંતિમ સંસ્કાર દરમિયાન રડતા પરિવારના સભ્યોના હોઈ શકે છે અથવા તે પવન અને ગંગાના પ્રવાહ દ્વારા ઉત્પન્ન થતા કુદરતી અવાજો હોઈ શકે છે.  કેટલાક લોકો તેને આત્માઓની હાજરી સાથે જોડે છે, કારણ કે એવું માનવામાં આવે છે કે અહીં ભગવાન શિવ પોતે મૃતકોના કાનમાં તારક મંત્રનો ઉપદેશ આપીને મૃતકોને મોક્ષ આપે છે.  આ આધ્યાત્મિક માન્યતાને લીધે કેટલાક લોકો તેને ડરામણી અથવા શાપિત માને છે.

આજે મણિકર્ણિકા ઘાટ:

આજે પણ મણિકર્ણિકા ઘાટ પર 24 કલાક ચિતા સળગતી રહે છે.  આ સ્થાન મૃત્યુને ઉજવણી તરીકે જુએ છે, જ્યાં લોકો શોક કરતાં મુક્તિની ઇચ્છા રાખે છે.  રંગભરી એકાદશી પછી, અહીં “મસાન હોળી” રમવામાં આવે છે, જેમાં ચિતાની ભસ્મ સાથે હોળી રમવાની પરંપરા છે.  આ અનોખી પરંપરા તેને રહસ્યમય પણ બનાવે છે.

મણિકર્ણિકા ઘાટ ઓછો શાપિત, વધુ પવિત્ર અને રહસ્યમય છે.  ચીસો કદાચ અતિશયોક્તિ અથવા લોકોના મનોવૈજ્ઞાનિક અનુભવોનું પરિણામ હોઈ શકે છે.  આ સ્થાન મૃત્યુને જીવનના અંતિમ સત્ય તરીકે રજૂ કરે છે અને તેને ડરામણું ગણવાને બદલે તેને આધ્યાત્મિક દૃષ્ટિકોણથી સમજવું જોઈએ. 
હર હર મહાદેવ 🚩

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🌸तोरुलता दत्त🌸

मात्र 21  वर्ष की आयु में संसार छोड़कर जानें वाली, लेकिन रामायण को विश्वपटल पर ले जाने वाली भारत की पहली महिला कवयित्री -तोरुलता  दत्त

1800 के दशक में, जब भारतीय महिलाएं घर की चारदीवारी में सीमित थीं, एक बंगाली लड़की ने दुनिया को भारत की महाकाव्य कहानियों से परिचित कराया। उस लड़की का नाम था -तोरुलता दत्त।

तोरु दत्त, भारत की पहली प्रकाशित महिला कवयित्री, जिन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच में लिखा। वो महज 21 साल की उम्र में इस दुनिया से चली गईं, लेकिन उससे पहले उन्होंने जो साहित्यिक धरोहर छोड़ी, वो आज भी दुनिया को प्रेरित करती है।

भाषाओं का जादू और भारत की आत्मा
1856 में कलकत्ता में जन्मी टोरु दत्त ने 18 साल की उम्र तक बंगाली, संस्कृत, अंग्रेजी, और फ्रेंच में महारत हासिल कर ली थी। जब लड़कियों को पढ़ाई का अवसर नहीं मिलता था, तब उन्होंने न सिर्फ फ्रेंच कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया, बल्कि भारत की महान गाथाओं को भी विश्व के सामने रखा।

‘रामायण’ और ‘महाभारत’ को विदेशों तक पहुँचाया
1876 में टोरु ने A Sheaf Gleaned in French Fields नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें 165 फ्रेंच कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद था। फिर उन्होंने Ancient Ballads and Legends of Hindustan लिखी, जिसमें ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ की कहानियों को अंग्रेजी कविता में प्रस्तुत किया। यह पुस्तक उनकी मृत्यु के बाद 1882 में प्रकाशित हुई।

टोरु ने Le Journal de Mademoiselle d’Arvers नामक एक उपन्यास भी फ्रेंच में लिखा, जो भारतीय साहित्य में एक अनोखी उपलब्धि है।

मौत ने जल्दी बुलाया, लेकिन नाम अमर कर दिया
टोरु को युवावस्था में ही क्षय रोग हो गया। लेकिन बीमारी के बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। 30 अगस्त 1877 को मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई रचनाएं उन्हें भारत की महान साहित्यकारों में शामिल कर गईं।

टोरु दत्त क्यों हैं आज भी महत्वपूर्ण?

उन्होंने साबित किया कि एक भारतीय महिला अंग्रेजी और फ्रेंच में लिख सकती है, और दुनिया को भारतीय संस्कृति से परिचित करा सकती है।

उन्होंने पूर्व और पश्चिम के बीच साहित्यिक पुल बनाया।

उनकी कविताएं आज भी उन सपनों को जगा देती हैं, जो सीमाओं से परे होते हैं।

कम उम्र में गईं, लेकिन जो कर गईं, वो सदियों तक याद रखा जाएगा।
टोरु दत्त ने भारतीय साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई। उनका जीवन भले ही छोटा था, लेकिन प्रभाव अनंत है।

आज भी उनके शब्द हमारे सपनों को पंख दे सकते हैं।

🔥⚔️🔥जय श्री राम🔥⚔️🔥