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मार्क और ओलिविया


क्या आप जानते हैं? मार्क और ओलिविया, एक कालजयी प्रेम कहानी।

जब मार्क ट्वेन ने ओलिविया लैंगडन से शादी की, तो उन्होंने एक मित्र से कहा, “अगर मुझे पता होता कि वैवाहिक जीवन इतना सुखद हो सकता है, तो मैं 30 साल पहले ही शादी कर लेता, दाँत उगाने में समय बर्बाद करने के बजाय।” उस समय ट्वेन 32 वर्ष के थे।

ट्वेन—जिनका असली नाम सैमुअल क्लेमेंस था—एक साधारण परिवार में पले-बढ़े और छोटी उम्र से ही काम करने लगे। उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस में प्रशिक्षु के रूप में शुरुआत की, फिर नदी पर नाविक (रिवरबोट पायलट) बने, उसके बाद चांदी की खदान में किस्मत आजमाई (और बुरी तरह असफल हुए), फिर आखिरकार उन्हें अपना असली जुनून—लेखन—मिला। उनकी तेज़ बुद्धि और शानदार कहानी कहने की शैली ने उन्हें पूरे अमेरिका में प्रसिद्ध कर दिया।

इसी दौरान उन्हें प्रेम हुआ, लेकिन शुरुआत में ओलिविया से नहीं, बल्कि उनकी तस्वीर से। एक मित्र ने ट्वेन को ओलिविया की छवि वाला एक लॉकेट दिखाया और बाद में उनसे मिलवाने के लिए आमंत्रित किया। दो हफ़्तों के भीतर ही ट्वेन ने ओलिविया को विवाह प्रस्ताव दे दिया। ओलिविया को वे पसंद तो थे, लेकिन संशय था। ट्वेन उनसे दस साल बड़े थे, थोड़ा असभ्य स्वभाव के थे, उनकी संभ्रांत और शिक्षित समाज में कोई पहचान नहीं थी, और उनके पास धन भी नहीं था। हालांकि, वह उनके प्रतिभा से प्रभावित थीं, फिर भी उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया।

ट्वेन ने फिर प्रस्ताव रखा, लेकिन इस बार ओलिविया ने उनके धर्म के प्रति अनास्था को कारण बताते हुए मना कर दिया। ट्वेन ने अपने हास्य और ईमानदारी से जवाब दिया, “अगर यही जरूरी है, तो मैं एक अच्छा ईसाई बन जाऊँगा।” हालांकि ओलिविया ने इंकार कर दिया, परंतु वह पहले ही उनसे प्रेम करने लगी थीं। उधर ट्वेन को लगा कि उनके पास कोई मौका नहीं है, इसलिए वह वहाँ से चले गए।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब ट्वेन ट्रेन स्टेशन जा रहे थे, तो उनकी गाड़ी पलट गई। इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने अपनी चोटों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और उन्हें वापस ओलिविया के घर लाया गया। जब ओलिविया ने उनकी देखभाल की, तो ट्वेन ने एक आखिरी बार प्रस्ताव रखा—इस बार, ओलिविया ने ‘हाँ’ कह दिया।

ट्वेन ने अपनी धार्मिक पत्नी को खुश करने के लिए हर संभव प्रयास किया। वह रोज़ रात को उन्हें बाइबल पढ़कर सुनाते और भोजन से पहले प्रार्थना करते। ओलिविया को उनके कुछ लेख पसंद नहीं थे, इसलिए ट्वेन ने उन्हें कभी प्रकाशित नहीं किया और इस तरह 15,000 से अधिक पन्ने अप्रकाशित रह गए। ओलिविया उनकी पहली संपादक और सबसे कठोर आलोचक थीं। यहाँ तक कि जब उन्होंने हकलबेरी फिन में “धत्त तेरी की!” जैसा शब्द पाया, तो उन्होंने उसे हटाने के लिए कहा।

उनकी बेटी सूज़ी ने एक बार अपने माता-पिता के बारे में कहा: “माँ को नैतिकता से प्रेम है, और पिताजी को बिल्लियों से।”

कई कठिनाइयों—बच्चों को खोने और आर्थिक संकट—के बावजूद, ओलिविया का अटूट विश्वास ट्वेन को ताकत देता रहा। उन्होंने कभी एक-दूसरे के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई—ट्वेन ने ओलिविया पर कभी गुस्सा नहीं किया, और ओलिविया ने उन्हें कभी डाँटा नहीं। ट्वेन ने उन्हें हमेशा सुरक्षित रखा, यहाँ तक कि जब एक करीबी मित्र ने ओलिविया का मज़ाक उड़ाया, तो ट्वेन ने लगभग उससे दोस्ती खत्म कर दी।

जब 60 वर्ष की उम्र में ट्वेन ने विश्व भ्रमण पर जाने का निर्णय लिया, तो ओलिविया, यह जानते हुए कि उन्हें निरंतर देखभाल की जरूरत है, सबकुछ छोड़कर उनके साथ चली गईं।

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*⛸️जूते में जीवन है!⛸️*

गर्मियों की छुट्टी हुई तो जैसे सभी बच्चे अपने रिश्तेदारों के यहां जाते हैं तो हम भी अपनी बुआ के घर गए जूते पहनकर। एक दिन हमने देखा कि फ़ूफ़ा जी अपने पैर की मरहम-पट्टी कर रहे हैं। तो हमने पूछा क्या हुआ ?

बोले जूते ने काट लिया।

*हम हैरान परेशान… तो ⛸️जूता ‘काटता भी है’।*

अगली छुट्टियों में मामा के घर गए तो उन्हें जूते में तेल लगाते पाया। हमने पूछा क्या हुआ?

बोले ये चूं चूं करता है।

*अच्छा बोलता है… कमाल है ‘⛸️जूता बोलता भी है’।*

फिर अगली छुट्टियों में चाचा के घर गए तो उन्हें कहते सुना कि फ़लांना तो जूते का यार है…

*ओह तो ‘⛸️जूते दोस्ती भी करते हैं’।*

उससे अगली छुट्टियों में ताऊ जी के यहां गए तो वह किसी के बारे में कह रहे थे कि वह तो जूते खाये बिना मानेगा नहीं। शायद किसी सर जी के बारे में कह रहे होंगे।

*⛸️अरे वाह… ‘जूते खाये भी जाते हैं’ मने भूख मिटाते हैं।*

फिर अगली होली में देखा कि एक आदमी को गधे पर बैठाया गया है और उसके गले में जूते पड़े हैं और लोग नाच गा रहे हैं। हमने अपने पापा जी से पूछा कि ये क्या है?

तो बोले कि इस आदमी को इस साल मूर्खाधिराज चुना गया है और इसके गले में जूतों का हार पहना कर सम्मानित किया गया है।

*कमाल है …. ‘⛸️जूते सम्मान प्रदान करने के काम भी आते हैं’।*

थोड़ा और बड़े हुए और फुटबॉल मैच देखने का चस्का लगा तो पता चला कि सबसे अधिक गोल स्कोर करने वाले खिलाड़ी को ‘गोल्डन बूट’ दिया जाता है।

*वाह…. पुरस्कार में सोने का ⛸️जूता दिया जाता है।*

फिर थोड़ा और बड़े हुए तो पता चला कि वेस्टर्न टेलीविज़न और मूवीज इंडस्ट्री में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता को ‘गोल्डन बूट अवार्ड’ दिया जाता है।

*कमाल है…. सम्मान अभिनेता का हो रहा है कि ⛸️जूते का!*

एक दिन देखा कि एक आदमी बेहोश पड़ा है। शायद उसे मिर्गी का दौरा आया था। उसके चारों तरफ भीड़ लगी थी। तभी भीड़ में से एक बुजुर्ग ने फरमाया… जूता मंगवाओ और इसे जूता सुंघाओ। अभी ठीक हो जाएगा।

*अरे वाह… ‘⛸️जूता तो औषधी भी है’।*

फिर एक शादी में गये तो वहां देखा कि वर और वधु पक्ष में कुछ सौदेबाजी हो रही है। हमने अपने पापा जी से पूछा कि यह क्या हो रहा है?

उन्होंने बताया कि बेटा ये दूल्हे की सालियों ने दूल्हे के जूते चुरा लिए और अब उन्हें वापस करने के लिए रुपये मांग रही हैं।

*ओह नो… ⛸️जूते का ‘अपहरण भी हो जाता है’।*

*जूता काटता है, जूता बोलता है, जूता दोस्ती यारी करता है, जूता खाया जाता है। जूता सम्मान प्रदान करता है। जूता औषधी है और तो और जूते के अपहरण का भरा-पूरा व्यवसाय है।*

*_फिर किसी ने याद दिलाया कि श्री राम चन्द्र जी के वनगमन पर श्री भरत जी ने उनके जूते अर्थात खड़ाऊँ को राजगद्दी पर विराजमान करके चौदह वर्षों तक अयोध्या का राजकाज चलाया।_*

*तो ‘⛸️जूता महाराज भी है’।*

*कुल मिलाकर मुझे तो लगता है कि ‘⛸️जूते में जीवन’ है।*

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मेरे बचपन की बात है

पापा मुझे और मेरे छोटे भाई को लूना पर बैठाकर आइसक्रीम खिलाने मार्केट ले जाया करते ।

भाई बीच में बैठता और मैं पीछे ।

एक बार हमें आइसक्रीम खिलाने के बाद पापा लूना में पेट्रोल भरवाने के लिए पेट्रोल पंप ले गए ।

फिर भाई तो लूना पर बैठ गया पर इससे पहले कि मैं बैठ पाता, पापा आगे बढ़ गए ।

मैं पेट्रोल पंप पर ही रुका रहा उनके वापस आने के इंतज़ार में ।

कुछ दूर जाने के बाद पापा ने एक दुकान पर लूना रोकी और मुझे न पाकर भाई से पूछा,

“भैय्या कहां है ?”

तो भाई ने जवाब दिया,

“भैय्या तो पेट्रोल पंप पर ही रह गया ।“

वैसे मैं बहुत संजीदा किस्म की प्रजाति का प्राणी हूं, फिर भी ऐसी घटनाएं मेरे साथ होती रहती हैं  . . . 🫣

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🔥 होलिका दहन  एक अनसुनी कहानी 🔥

बहुत कम लोग जानते हैं कि होलिका दहन की रात सिर्फ प्रह्लाद की विजय की कहानी नहीं है, बल्कि उस रात कुछ ऐसा भी हुआ था जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया।

कहते हैं कि जब होलिका आग में जल रही थी, उसी समय उस नगर के एक वृद्ध तपस्वी, ऋषि वचस्पति, महल के बाहर खड़े होकर मुस्कुरा रहे थे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे प्रसन्न क्यों हैं, तो उन्होंने रहस्यमयी स्वर में कहा, “यह केवल एक पाप का अंत नहीं, बल्कि एक शाप की मुक्ति भी है!”

लोग चकित हो गए। तब ऋषि वचस्पति ने बताया कि होलिका को जन्म के समय एक शाप मिला था—वह जिस भी अग्नि को छुएगी, वह अग्नि उसकी आत्मा का दर्पण बन जाएगी। यदि उसका हृदय पवित्र होगा, तो वह अग्नि उसे आशीर्वाद देगी, और यदि वह अधर्म की राह पर चली, तो वही अग्नि उसे भस्म कर देगी।

होलिका को मिला वरदान सिर्फ बाहरी अग्नि से बचाने का नहीं था, बल्कि उसके भीतर की सच्चाई को उजागर करने का माध्यम था। जब वह प्रह्लाद के साथ आग में बैठी, तो अग्नि ने उसके भीतर के छल, कपट और अहंकार को देखा—और उसे भस्म कर दिया। लेकिन होलिका की राख में कुछ चमकता हुआ निकला—एक स्वर्णिम कमल!

ऋषि वचस्पति ने वह कमल उठाया और बोले, “यह उसकी आत्मा की शुद्धता का प्रमाण है, जो अब मुक्त हो चुकी है।”

उस दिन से, होलिका दहन सिर्फ बुराई के अंत का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और कर्मों के न्याय का भी संदेश बन गया। अग्नि कभी भी असत्य को स्वीकार नहीं करती, वह केवल सच को ही बचाती है!

🔥 तो इस होली, अपने भीतर की होलिका को पहचानिए और अपने सत्य को आग की कसौटी पर परखिए! 🔥

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मेरे बचपन की बात है

पापा मुझे और मेरे छोटे भाई को लूना पर बैठाकर आइसक्रीम खिलाने मार्केट ले जाया करते ।

भाई बीच में बैठता और मैं पीछे ।

एक बार हमें आइसक्रीम खिलाने के बाद पापा लूना में पेट्रोल भरवाने के लिए पेट्रोल पंप ले गए ।

फिर भाई तो लूना पर बैठ गया पर इससे पहले कि मैं बैठ पाता, पापा आगे बढ़ गए ।

मैं पेट्रोल पंप पर ही रुका रहा उनके वापस आने के इंतज़ार में ।

कुछ दूर जाने के बाद पापा ने एक दुकान पर लूना रोकी और मुझे न पाकर भाई से पूछा,

“भैय्या कहां है ?”

तो भाई ने जवाब दिया,

“भैय्या तो पेट्रोल पंप पर ही रह गया ।“

वैसे मैं बहुत संजीदा किस्म की प्रजाति का प्राणी हूं, फिर भी ऐसी घटनाएं मेरे साथ होती रहती हैं  . . . 🫣

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હોલિકા


*હોલિકા રાક્ષસી નહીં, પ્રેમાળ કોડભરી કન્યા હતી*

હિન્દુ સમાજની સૌથી મોટી વિશેષતા તેના નીરક્ષીરવિવેકમાં રહેલી છે. કોઈ વ્યક્તિ માટે આ સમાજ તેની જાતિ કે ધર્મના આધારે અભિપ્રાય બાંધતો નથી, પરંતુ તેનામાં કરેલા ગુણ અને અવગુણના આધારે તેનું મુલ્યાંકન કરે છે. અહીં બ્રાહ્મણ કુળમાં જન્મેલો રાવણ પણ રાક્ષસ ગણાય છે, અને દાનવોના ગુરુ શુક્રાચાર્યને પણ ઋષિનું સ્થાન અપાય છે. દાસીપુત્ર વિદુરને પણ મંત્રીનું પદ મળી શકે છે અને સ્વયં ભગવાન તેના ઘરે પ્રેમથી ભાજી આરોગવા જાય છે, તો પિતાનું નામ ન જાણતા સત્યકામ *જાબાલાની* સત્યનિષ્ઠા જાેઈને તેને માતાના નામે ઓળખ આપીને ગુરુકુળમાં ગુરુ જ્ઞાન આપે છે.

હોળીના ઉત્સવ પાછળની કથા આપણે એટલી જ જાણીએ છીએ પણ તેના બીજા દિવસે ધુળેટી શા માટે ઉજવાય છે? ધુળેટીનાં બધા એકબીજાને પાણી ઉડાડે, રંગો વડે રંગે, અને ઘણી વખત તો બહુ તાનમાં આવી જાય તો ઘણા બીજાને કાદવમાં પણ રગદોળી મજા લેતા હોય, તે પ્રથા કેવી રીતે શરુ થઈ?

તમને નવાઈ લાગશે કે ધુળેટી હોલિકા અને તેના પ્રેમી ઈલોજીના સાચા હ્ય્દયના પણ અધુરા રહેલા પ્રેમની યાદ જીવંત રાખવા માટે ઉજવાય છે!

*હોલિકાને* આપણે એક રાક્ષસીના રૂપમાં જ યાદ કરીએ છીએ.વાસ્તવમાં હોલિકા એ રાક્ષસી નહીં, પણ બીજી બધી જ યુવાન કન્યાઓ જેવી જ લાગણીથી ભરેલી, સંવેદનાઓથી છલકાતી એક પ્રેમાળ જાેબનવંતી કન્યા હતી. *પ્રહલાદ* તો તેનો ભત્રીજાે હતો અને તે નાનો પણ હતો. કોઈ પણ ફોઈને પોતાના ભત્રીજા માટે કુદરતી રીતે જ વહાલ જાગે, તેમ તેના મનમાં પણ જાગતુ હતુ. પ્રહલાદ તેનો લાડકો હતો. તેને તે ખુબ પ્રેમ કરતી હતી.

પોતાનો ભાઈ *હિરણ્યકશ્યપુ* સગા દીકરાનો જીવ લેવાના કારસા કરે છે, તે તેના હ્ય્દયને કોરી ખાતુ હતુ. તેણે હિરણ્યકશ્યપુને આમ ન કરવા માટે અનેક વખત સમજાવ્યો હતો. પણ તેના પ્રયાસો વિફળ રહ્યા.

હોલિકાનો એક પ્રેમી હતો, ઈલોજી. હોલિકા *ઈલોજીના* પ્રેમમાં પાગલ હતી, અને ઈલોજીના મનોરાજ્યમાં હોલિકાનું સ્થાન એવું અદકેરું હતુ કે સ્વર્ગની અપ્સરા પણ તે સ્થાન લઈ ન શકે! જાણે એકબીજા માટે જ બન્યા હોય તેવી પ્રેમી પંખીડાની આ જાેડી લોકમુખે અવી રીતે ચર્ચાતી હતી કે સાચો પ્રેમ કોને કહેવાય તે જાેવું હોય તો જાેઈ લો હોલિકા અને ઈલોજીને!

હિરણ્યકશ્યપુને કોઈ વાંધો નહતો આ પ્રેમ માટે, અને તેણે તો બહેનની ખુશીને વધાવી લેતા ઈલોજી સાથે તેના લગ્નની તિથિ પણ પણ નક્કી કરી દીધી હતી.

બંને પ્રેમીઓ કાયમ માટે સાથે જીવન ગુજારવાના સપના સાકાર થવાની ઘડીઓ ગણતા હતા. ક્યારે લગ્નનો દિવસ આવે તેની પ્રતીક્ષામાં પળ પળ વ્યાકુળ રહેતા હતા. તો બીજી તરફ હિરણ્યકશ્યપુના પ્રહલાદને મારવાના એક પછી એક બધા જ ઉપાયો નિષ્ફળ જતા તે આકુળવ્યાકુળ થઈ ગયો હતો.

તેને યાદ આવ્યુ કે હોલિકાને અગ્નિમાં નહીં બળે તેવું વરદાન છે, એને તેણે તેને પ્રહલાદને લઈ અગ્નિમાં બેસવા માટે આદેશ કર્યો. હોલિકાએ પહેલા તો ભારે વિરોધ કર્યો, અને પોતાના વહાલા ભત્રીજાના મૃત્યુ માટે હાથો બનવાની સ્પષ્ટ ના કહી દીધી.

પણ હિરણ્યક્શ્યપુ તેની નબળી કડી જાણતો હતો. તેણે છેલ્લે ધમકી આપી કે જાે તું આમ નહીં કરે તો તારા ઈલોેજી સાથે લગ્ન થવા નહીં દઉં.

એક તરફ વહાલસોયા ભત્રીજા અને બીજી તરફ પ્રાણથી પણ વધુ પ્રેમ જેને કરતી હતી તે ઈલોજી વચ્ચે તેને પસંદગી કરવાની હતી. અંતે ઈલોજી માટેનો પ્રેમ જીત્યો.

જે દિવસે તે પ્રહલાદને લઈને હોળીમાં બેઠી તે તેના લગ્નનો દિવસ હતો. પોતાને તો વરદાન હોવાથી કંઈ થવાનું નથી તે પોતે પણ માનતી હતી, તેનો ભાઈ પણ માનતો હતો અને પ્રેમી પણ.

પણ બન્યું કંઈક જુદું જ. ઈલોજી વરઘોડો કાઢીને હોલિકાને પરણવા માટે તૈયારી કરતો હતો તે જ વખતે વાયુવેગે ફેલાઈ ગયેલી વાત તેના કાન પર પડી કે હોેલિકા ભસ્મિભુત થઈ ગઈ!

મન પર ઓચિંતો આ વજ્રાઘાત થતા તે સહન કરી શક્યો નહી.સાનભાન ગુમાવી પાગલની માફક ચીસો પાડતો, દોડતો દોડતો તે ત્યાં પહોંચ્યો જ્યાં તેની પ્રેયસી રાખ બની ગઈ હતી.

આગમાં હોલિકા બળી મરી હતી. તેની ગરમ ગરમ રાખ ચારેકોર ફેલાયેલી હતી. ગાંડાની જેમ ઈલોજી તે રાખમાં આળોટવા માંડ્યો. રડતો, ચીસો પાડતો, પાગલ બની ગયેલો ઈલોજી કંઈ કેટલાય સમય સુધી રાખમાં આળોટતો રહ્યો, શરીરને પોતાની પ્રેમિકાના અવશેષોમાં રગદોળતો રહ્યો. અને પછી છેલ્લે થાકીને ગામ છોડીને જંગલમાં જતો રહ્યો. આખી જીંદગી જંગલમાં પાગલની જેમ ભટકતા ભટકતા તેણે પુરી કરી.

જે સમાજ પ્રહલાદનું રક્ષણ થયાની ખુશી મનાવે છે તે જ સમાજ *હોલિકા અને ઈલોજીના સાચે પ્રેમની યાદમાં ધુળેટી પણ ઉજવે છે.*

*રાજસ્થાનમાં ઈલોજી લોકદેવતા તરીકે આજે પણ પુજાય છે. નાગૌર અને અન્ય ઘણા સ્થળે ઈલોજી મહારાજના મંદિરો છે.*

https://www.loksattanews.co.in/news/holika-was-not-a-demon-but-a-loving-and-kind-girl

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गलती स्वीकार करना,माफी माँगना


रोहन एक शरारती बच्चा था। उसे दोस्तों के साथ खेलना और मस्ती करना बहुत पसंद था, लेकिन कभी-कभी वह अपनी शरारतों में कुछ ज्यादा ही आगे निकल जाता था। एक दिन, खेलते समय, उसने गलती से अपने सबसे अच्छे दोस्त, आर्यन की नई साइकिल तोड़ दी। आर्यन बहुत दुखी हुआ। वह अपनी साइकिल से बहुत प्यार करता था, और वह रोने लगा। रोहन को अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन वह डर गया। उसे नहीं पता था कि आर्यन से माफी कैसे मांगे। रोहन घर भागा और अपनी मां को सारी बात बताई। उसकी मां ने उसे समझाया कि अपनी गलती स्वीकार करना और माफी मांगना कितना जरूरी है। उन्होंने रोहन को आर्यन के घर ले जाने और उससे माफी मांगने के लिए कहा। रोहन आर्यन के घर गया और उसे बताया कि वह अपनी गलती के लिए कितना दुखी है। उसने आर्यन से वादा किया कि वह उसकी साइकिल ठीक करवाने में मदद करेगा। आर्यन रोहन की ईमानदारी देखकर खुश हुआ और उसने उसे माफ कर दिया। रोहन और आर्यन ने मिलकर आर्यन की साइकिल ठीक करवाई। इस घटना ने उन्हें और भी करीब ला दिया। रोहन ने सीखा कि अपनी गलती स्वीकार करना और माफी मांगना कितना महत्त्वपूर्ण है और आर्यन ने सीखा कि माफ करना दोस्ती को और मजबूत बनाता है।

सीख-गलती करना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती स्वीकार करना और माफी मांगना जरूरी है। माफी मांगने से दोस्ती और रिश्ते मजबूत होते हैं। माफ करना दयालुता और समझदारी का प्रतीक है। गलती को सुधारने के लिए प्रयास करना माफी का ही एक हिस्सा है।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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शत्रु चुनना


अक्सर लोग अपने दोस्तों के साथ काफी समय और शक्ति गंवाते हैं। लेकिन ये दोस्त तभी तक होते हैं, जब तक सब ठीक चल रहा होता है। जब कोई आपदा आती है, तब पता चलता है कि सब भाग गए। वस्तुतः हमारी दोस्ती इतनी गहरी नहीं होती, जितनी दुश्मनी । इसलिए ओशो कहते हैं, अगर दुश्मनी करनी हो, तो छोटे-मोटे दुश्मन मत चुनना। जितना बड़ा दुश्मन चुनोगे, उतनी ही बड़ी तुम्हारी विजय होगी उससे लड़ने में चुनौती है। छोटे-मोटे को हरा भी दिया, तो क्या सार है? जितना छोटा दुश्मन होगा, आपको उतना ही छोटा बनना पड़ेगा।

इस पर एक कथा है । एक गधे ने सिंह को चुनौती दी – ‘अगर हिम्मत है, तो आओ मैदान में, हो जाए दो-दो हाथ।’ लेकिन सिंह चुपचाप चला गया। एक सियार यह देख- सुन रहा था।

उसने कुछ आगे बढ़कर सिंह से पूछा ‘महाराज, बात क्या है? एक गधे की चुनौती भी आपने स्वीकार नहीं की ?’ सिंह ने कहा- ‘अगर उसकी चुनौती स्वीकार करता, तो अफवाह यह उड़ती कि सिंह गधे से लड़ा मेरी भयंकर बदनामी होती।

हमारे कुल, परंपरा में ऐसा नहीं हुआ कि गधे से लड़े। हम सिंह गधे को समाप्त कर सकते हैं, लड़ना क्या है? अगर गधा हारता, तो उसका कोई अपमान नहीं होता; हम जीतते भी, तो कोई सम्मान नहीं होता।

लोग कहते, गधे से जीते तो क्या जीते ! और कहीं भूल से गधा जीत जाता, अब गधे ही हैं, इनका भरोसा क्या, तो हम सदा के लिए मारे जाते । इसलिए मैं चुपचाप चला आया।’

इसलिए दुश्मन जरा बड़ा चुनें, क्योंकि बड़े शत्रु से लड़ने के लिए आपको पूरी ताकत लगानी पड़ेगी। यह चुनौती, संघर्ष आपको अवसर देगा आत्म-विकास का।

आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।

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प्रेम कभी नहीं मरता


सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि, एक वयोवृद्ध सज्जन डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाने लगे।

“इतने सुबह-सुबह कौन आ गया ?”

कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला।
वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा,
“दादा आज इतनी सुबह ? क्या परेशानी हो गयी आपको ??”

वयोवृद्ध ने कहा, “मेरे अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं बेटा, डॉक्टर साहब के पास। मुझे 8:30 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसीलिए जल्दी आया।
सॉरी डॉक्टर साहब।”

डाक्टर के पड़ोस वाले मोहल्ले में ही वयोवृद्ध का निवास था, जब भी जरूरत पड़ती वह डॉक्टर के पास आ जाते थे। इसलिए डाक्टर उनसे परिचित था। उसने कमरे से बाहर आकर कहा, “कोई बात नहीं दादा।बैठो। बताओ आप का अंगूठा।
डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले, और कहा कि, “दादा बहुत बढ़िया है। आपका घाव भर गया है ।फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि, कहीं पर चोट न पहुंचे।”

डाक्टर तो बहुत होते हैं परंतु, यह डॉक्टर बहुत हमदर्दी रखने वाले, आदमी का खयाल रखने वाले और दयालु थे।
डॉक्टर ने पट्टी लगाकर के पूछा, “दादा आपको कहां पहुंचना पड़ता है 8:30 बजे। आपको देर हो गई हो तो मैं चलकर आपको छोड़ आता हूं।”

वृद्ध ने कहा कि, “नहीं-नहीं डॉक्टर साहब, अभी तो मैं घर जाऊंगा, नाश्ता तैयार करूंगा, फिर निकलूंगा, और बराबर 9:00 बजे पहुंच जाऊंगा।”

उन्होंने डॉक्टर का आभार माना और जाने के लिए खड़े हुए।
बिल लेकर के उपचार करने वाले तो बहुत डॉक्टर होते हैं, परंतु दिल से उपचार करने वाले कम होते हैं।

दादा खड़े हुए तभी डॉक्टर की पत्नी ने आकर कहा कि, “दादा आज नाश्ता यहीं कर लो।”

वृद्ध ने कहा कि, “ना बेन !
मैं तो यहां नाश्ता कर लेता, परंतु उसको नाश्ता कौन कराएगा ?”

डॉक्टर ने पूछा, “किसको नाश्ता कराना है ?”

तब वृद्ध ने कहा कि, “मेरी पत्नी को।”

“तो वह कहां रहती है ? और 9:00 बजे आपको उसके यहां, कहां पहुंचना होता है ?” दोनों ने पूछा।

वृद्ध ने कहा, “डॉक्टर साहब वह तो मेरे बिना रहती ही नहीं थी, परंतु अब। वह अस्वस्थ है, तो नर्सिंग होम में हीै है।”

डॉक्टर ने पूछा, “क्यों, उनको क्या तकलीफ है ?”
वृद्ध व्यक्ति ने कहा, “मेरी पत्नी को अल्जाइमर हो गया है, उसकी याददाश्त चली गई है।
पिछले 5 साल से। वह मेरे को पहचानती नहीं है। मैं नर्सिंग होम में जाता हूं, उसको नाश्ता खिलाता हूं, तो वह फटी आंख से शून्य नेत्रों से मुझे देखती है। मैं उसके लिए अनजाना हो गया हूं।

ऐसा कहते-कहते वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए।

डॉक्टर और उसकी पत्नी की आंखें भी गीली हो गई !

याद रखें,
प्रेम निस्वार्थ होता है, प्रेम सबके पास होता है परंतु, एक-पक्षिय प्रेम ! यह दुर्लभ होता है। पर होता है जरूर !

कबीर ने लिखा है…
प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

बाजार में नहीं मिलता है यह।

डॉक्टर और उसकी पत्नी ने कहा,
“दादा 5 साल से आप रोज नर्सिंग होम में उनको नाश्ता करने जाते हो ? आप इतने वृद्ध।
आप थकते नहीं हो, ऊबते नहीं हो ?”

उन्होंने कहा कि, “मैं तीन बार जाता हूं !
डॉक्टर साहब उसने जिंदगी में मेरी बहुत सेवा की और आज मैं उसके सहारे जिंदगी जी रहा हूं। उसको देखता हूं तो मेरा मन भर आता है। मैं उसके पास बैठता हूं तो मुझमें शक्ति आ जाती है। अगर वह न होती तो अभी तक मैं भी बिस्तर पकड़ लिया होता, लेकिन उसको ठीक करना है, उसकी संभाल करना है, इसलिए मुझमें रोज ताकत आ जाती है। उसके कारण ही मुझमें इतनी फुर्ती है। सुबह उठता हूं तो तैयार होकर के काम में लग जाता हूं। यह भाव रहता है कि, उसको मिलने जाना है, उसके साथ नाश्ता करना है, उसको नाश्ता कराना है।
उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है। मैं अपने हाथ से उसको नाश्ता खिलाता हूं !”

डॉक्टर ने कहा, “दादा एक बात पूछूं !”

“पूछो ना डॉक्टर साहब।”

डॉक्टर ने कहा, “दादा, वह तो आपको पहचानती नहीं, न तो आपके सामने बोलती है, न हंसती है, तो भी तुम मिलने जाते हो !”

तब उस समय वृद्ध ने जो शब्द कहे, वह शब्द दुनियाँ में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और मार्मिक हैं।
वृद्ध बोले, “डॉक्टर साहब, वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं, पर मैं तो जानता हूं ना कि वह कौन है !”

और इतना कहते कहते हैं वृद्ध की आंखों से पानी की धारा बहने लगी।

डॉक्टर और उनकी पत्नी की आंखें भी भर आईं।

कहानी तो पूरी होगी परंतु, पारिवारिक जीवन में स्वार्थ अभिशाप है, और प्रेम आशीर्वाद है।

प्रेम कम होता है, तभी परिवार टूटता है।

अपने घर में अपने माता पिता को प्रेम करना।

जो लोग यह कहते हैं अपने पिता के लिए कि, “साठी, बुद्धि न्हाटी !”

उन्हें नहीं पता है कि माता पिता का प्रेम निस्वार्थ होता है वह केवल अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं ।