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आततायी कौन है


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अग्‍निदो गरदश्‍चैव शस्‍त्रपाणिर्धनापहः|
क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिनः ||
– वसिष्ठस्मृति (३/१९)
अर्थात् (१) आग लगाने वाला, (२) विष देने वाला, (३) जो हाथ में शस्त्र लेकर मारने आ रहा हो, (४) धनका हरण करने वाला, (५) जमीन छीनने वाला और (६) स्त्री का हरण करने वाला, ये छहों आततायी हैं|

आततायीके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्|
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्‍चन||
– मनु स्मृति (३/३५०,३५१)

अपना अनिष्ट करने के लिये आते हुए आततायी को बिना विचार किए ही मार डालना चाहिये। आतताई को मारने से मारने वाले को कुछ भी दोष नहीं लगता।

दुर्योधन में आततायी के सभी लक्षण मौजूद थे। (१) लाक्षागृह में आग लगाकर उसने पांडवों को जलाने की चेष्टा की थी। (२) भीमसेन के भोजन में विष मिला दिया था। (३) महाभारत के युद्ध में हाथ में शस्त्र लेकर मारने के लिए तैयार था ही। (४) जुए में छल से पांडवों का समस्त धन और (५) संपूर्ण राज्य छीन लिया था। (६) अन्याय पूर्वक द्रोपदी को सभा में लाकर उनका घोर अपमान किया था।

यह सब जानते हुए भी अर्जुन के धर्म-ज्ञान को पारिवारिक ममत्व ने ढक दिया था। आततायी को मारना उन्हें पाप दिखायी देने लगा। वे भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं –
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।। – श्रीमद्भगवद्गीत (१/३६)
हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।

परंतु भगवान तो धर्म के पूर्ण ज्ञाता है। वह जानते हैं कि आततायी पर दया दिखाने का परिणाम बहुत भयंकर हो सकता है। इसीलिए वे अर्जुन से दृढ़ता पूर्वक कहते हैं –
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।। – श्रीमद्भगवद्गीता (२/३)
हे पार्थ! नपुंसक मत बनो। यह तुम्हारे जैसे वीर को शोभा नहीं देता, तुम्हारे पराक्रम से शत्रुओं के हृदय जलने लगते हैं। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। 

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तीन गेंदें


विशाल परेशान होकर अपने गुरु के पास जा कर कहता है-

गुरुजी आपने हमेशा समझाया है कि मेहनत व लगन से काम करने से सफलता मिलती रहेगी. मैं मेहनत लगन से काम कर रहा हूं मुझे सफलता तो मिल रही है लेकिन उस सफलता के साथ जो खुशी जुड़ी होती है… जो सुकून है वह मुझे नहीं मिल रहा. मेरा बेटा एक बड़े स्कूल में पढ़ रहा है , मैं एक महंगा घर भी खरीद चुका हूं आपके बताए मेहनत के रास्ते पर चल रहा हूं, लेकिन खुश नहीं हूं! गुरुजी मैं खुश कैसे रहू कृपया मेरी मदद कीजिए।

गुरुजी मुस्कुराते हुए अंदर कमरे में गए और अपने हाथ में तीन गेंद लेकर आए जिसमें से-

एक कांच की गेंद थी
एक रबड़ की गेंद थी
एक चीनी मिट्टी की

गुरुजी ने उन गेंदों को विशाल के हाथों में दिया और कहा, “तुम इन गेंदों को लगातार एक के बाद एक हवा में उछालते रहो और एक समय कम से कम एक गेंद हवा में जरूर होनी चाहिए.”

विशाल थोड़ा हैरान तो हुआ लेकिन गुरुजी की बात मान कर चुपचाप तीनों गेंद उठायीं और एक के बाद एक हवा में उछालने लगा.

कुछ देर तक तो वह बैलेंस बना पाया लेकिन जल्द ही उसका बैलेंस बिगड़ने लगा. उसने जैसे-तैसे कांच और रबड़ की गेंद तो पकड़ ली पर चीनी मिट्टी की गेंद पकड़ता तो कोई न कोई- गेंद नीचे गिर जाती.

अब ऐसे में उसने तेजी से निर्णय लिया और रबड़ की गेंद को हाथ से छोड़ कर चीनी मिट्टी वाली गेंद पकड़ ली, क्योंकि वह उन तीनो बालों में सबसे कीमती थी और रबड़ की गेंद नीचे गिर कर भी टूटती नहीं.

मतलब रबड़ की गेंद फेंकते हुए उसने कांच की और चीनी मिट्टी की गेंद को बचा लिया. पर फिर भी वह निराश था कि वह गुरुजी का दिया काम ढंग से नहीं कर पाया.

गेंद गिरते ही वह गुरुजी की ओर पलटा, उसने देखा कि गुरुजी मुस्कुरा रहे .

गुरुजी उसके पास आए और उससे पूछा, “बेटा बताओ तुमने रबड़ की गेंद को क्यों गिरने दिया? कांच की या चीनी मिट्टी वाली गेंद को क्यों नहीं?

तब विशाल ने गुरुजी से कहा, “गुरुजी चीनी मिट्टी वॉली गेंद सबसे ज्यादा कीमती थी इसलिए मैंने उसको पकड़ने की सोची और अगर कांच की या चीनी मिट्टी की गेंद नीचे गिर जाती तो वो टूट जाती… इसीलिए मैंने इन दोनों को नहीं छोड़ा, बल्कि रबड़ की गेंद छोड़ दी क्योंकि रबड़ की गेंद गिरने पर कोई नुकसान नहीं होता.

गुरुजी उसका जवाब सुनते हुए फिर मुस्कुराए और बोले बेटा तुमने अपनी समस्या का समाधान खुद ही ढूंढ लिया यह तीनों गेंद तुम्हारे जीवन की प्राथमिकताओं की तरह हैं.

यह चीनी मिट्टी वाली गेंद तुम, तुम्हारा परिवार, तुम्हारी सोच और तुम्हारी भावनाओं की तरह हैं.

यह कांच की गेंद तुम्हारा काम, तुम्हारी नौकरी तुम्हारे पैसे तुम्हारे सुख सुविधाओं के साधन हैं.

और यह रबड़ की गेंद तुम्हारी उन चीजों की तरह है जो अगर तुम्हारी जिंदगी में ना भी हो तब भी तुम आराम से जी सकते हो. जैसे कि तुम्हारा महंगा मोबाइल, महंगी कार या कोई महंगी घड़ी या फिर महंगे शौक.
तुमने अपनी जिंदगी में कांच की गेंद और रबड़ की गेंद दोनों को महत्व दिया. तुमने एक से एक महंगी चीजें इकट्ठा कर लीं, भौतिकता की चकाचौंध में तुम इतना खो गए कि अपने परिवार की तरफ, अपने रिश्तों की तरफ, यहाँ तक कि खुद अपनी भावनाओं की तरफ भी ध्यान नहीं दिया. इसीलिए आज तुम खुश नहीं हो.

मेहनत करते रहो आगे बढ़ते रहो लेकिन अपनी प्राथमिकताओं को सपष्ट रखो. जब भी मन परेशान हो जब भी किसी चीज को बैलेंस ना कर पाओ तो और मजबूरन कोई न कोई गेंद छोडनी पड़े तो रबड़ की गेंद को छोड़ दो, खुशियां नहीं रुकेंगी.

पर आज तुम ही नहीं विशाल ज्यादातर लोग रबड़ की गेंद को इतना मजबूती से पकड़ लेना चाहते हैं कि चीनी मिट्टी और कांच की गेंद उनके हाथ से छूट ही जाती है.

काम के पीछे, पैसों के पीछे इतना भी मत भागो कि खुशियां पीछे छूट जाएं ।अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर ध्यान देते हुए जीवन के लक्ष्य हासिल करना चाहिए


कहते है की इस कहानी से ओर भी कई बातें सीखने को मिलती है। 🙏🏻👇🏻

  1. जीवन में प्राथमिकताओं को समझें – हर चीज़ की अपनी अहमियत होती है, लेकिन हमें यह तय करना चाहिए कि किसे अधिक महत्व देना है। परिवार, रिश्ते और मानसिक शांति सबसे ज़रूरी हैं।
  2. संपत्ति और सफलता ही सबकुछ नहीं – पैसा और ऐशो-आराम (कांच की गेंद) ज़रूरी हैं, लेकिन अगर परिवार और खुशी (चीनी मिट्टी की गेंद) का ध्यान नहीं रखा, तो जीवन अधूरा रह जाता है।

GYLT- प्रेरक कहानियां, [10-03-2025 20:43]

  1. मaterialistic चीज़ों का त्याग करना सीखें – कुछ चीज़ें (रबड़ की गेंद) हमारे जीवन में महत्वपूर्ण नहीं होतीं, उन्हें छोड़ने से कोई नुकसान नहीं होता। हमें यह समझना चाहिए कि अनावश्यक चीज़ों को छोड़कर ही सच्ची खुशी मिल सकती है।
  2. संतुलन बनाना ज़रूरी है – करियर और परिवार, दोनों को सही तरीके से मैनेज करना चाहिए। अगर सिर्फ़ एक चीज़ पर ध्यान देंगे, तो बाकी चीज़ें हाथ से फिसल सकती हैं।
  3. सफलता और खुशी का सही अर्थ समझें – सिर्फ़ ऊँचाइयाँ छूना ही सफलता नहीं है, बल्कि सही मायने में खुशी और संतोष भी सफलता का एक अहम हिस्सा है।

निष्कर्ष:
पैसे और ऐशो-आराम के पीछे भागने से पहले हमें यह सोचना चाहिए कि हम किस कीमत पर इसे हासिल कर रहे हैं। अगर खुशी, परिवार और मानसिक शांति खो रही है, तो यह असली सफलता नहीं।

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सच्चा मित्र


ा मित्र*

“आदित्य, बेटा ज़रा सुनो, तुम और माही कब विवाह करने वाले हो?”

“ममा, माही से तो मेरा कब का ब्रेकअप हो गया और अगले सप्ताह उसका विवाह है…” आदित्य ने निःसंकोच स्वर में कहा और वहाँ से चला गया। मैं आश्चर्य में पड़ गई। आज के बच्चे इतने बिंदास… इन्हें प्यार खेल लगता है। प्यार को यूँ भूला देना जैसे क्रिकेट के मैदान में छक्का लगाते समय बॉल खो गई हो… मैं चुपचाप खड़ी अपने अतीत में झांकने लगी।

पापा का लखनऊ से दिल्ली स्थानांतरण हो गया था। मैंने वहाँ एक नए स्कूल में प्रवेश लिया। बीच सत्र में प्रवेश लेने के कारण मेरे लिए पूरी कक्षा अपरिचित थी। स्थानांतरण के कारण मैं बहुत दिन स्कूल नहीं जा पाई, इसलिए मेरा सिलेबस भी छूट गया था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मेरी अध्यापिका ने उसी कक्षा में पढ़ने वाले आर्यन से मेरा परिचय करवाया और उसे समझा दिया, “आर्यन, तुम काव्या की पढ़ाई में सहायता करना।” आर्यन ने मुझे अपने नोट्स दिए, जिससे मुझे पढ़ाई में बहुत सहायता मिली।

यह संयोग ही था कि मैं और आर्यन एक ही कॉलोनी में रहते थे, फिर हम स्कूल भी साथ आने-जाने लगे। एक-दूसरे के घर जाकर पढ़ाई भी करते और पढ़ाई के साथ अन्य विषयों पर भी चर्चा करते थे। कभी-कभी साथ मूवी देखने जाते, तो कभी छत पर यूँ ही टहलते। धीरे-धीरे हमारे मम्मी-पापा भी जान गए कि हम अच्छे दोस्त हैं।

हम दोनों ने स्कूल में टॉप किया। इसके बाद हम महाविद्यालय में आ गए। आर्यन इंजीनियरिंग करने रुड़की चला गया और मैं दिल्ली में पास कोर्स करने लगी। कॉलेज पूरा होते-होते पापा ने मेरे विवाह के लिए लड़का ढूँढना आरम्भ कर दिया। छुट्टियों में आर्यन के घर आने पर मैंने उसे अपने विवाह की चर्चा के बारे में बताया। वह एकाएक गंभीर हो गया। मेरा हाथ पकड़कर बोला, “काव्या, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। आज से नहीं, जब से पहली बार देखा था, तब से ही। मैंने रात-दिन तुम्हारे सपने देखे हैं। कृपया मेरी नौकरी लगने तक प्रतीक्षा कर लो। मेरे अलावा किसी से विवाह की सोचना मत।” मुझे भी आर्यन पसंद था। मैंने उसे हाँ कह दिया।

दो महीने बाद पापा ने अभिनव को पसंद कर लिया। उनके मान-सम्मान के आगे मैं अपनी पसंद नहीं बता पाई। एक बार माँ से चर्चा किया था, “मां, मैं आर्यन को पसंद करती हूं और उससे ही विवाह…” बात पूरी होती उससे पहले ही माँ ने एक थप्पड़ मार दिया। “बड़ों के सामने यूँ मुँह खोलते हुए लज्जा नहीं आती? चुपचाप पापा के बताए हुए संबंध के बंधन में बंध जाओ वरना अच्छा नहीं होगा।”

माँ की धमकी के आगे मैं विवश थी। मैं चुपचाप विवाह करने के लिए तैयार हो गई। उस समय मोबाइल नहीं होते थे। मैं आर्यन को अपनी विवाह के बारे में नहीं बता पाई। विवाह के बाद मैं आगरा आ गई।

करीब दो साल बाद मेरी भेंट आर्यन से हुई। हम दोनों के बीच सुनने-सुनाने को कुछ शेष नहीं था। आर्यन ने ही अपनी बात कही, “अवश्य तुम्हारी कोई विवशता रही होगी, वरना कोई यूँ छलने वाला नहीं होता। तुम्हारा विवाह हो गई तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं तुमसे प्यार करना छोड़ दूँ। तुम अपना विवाह निभाओ और मुझे अपने प्यार से निष्ठा करने‌ दो…” हम दोनों की आँखें नम हो गईं।

तब से लेकर आज तक आर्यन ने मेरी हर दिक़्क़त, हर दुख और हर खुशी में साथ दिया। मैं आर्यन जैसा सच्चा दोस्त पाकर निहाल हो गई। अभिनव और आर्यन की भी अच्छी बनती है। उसने विवाह नहीं किया। एक बार मेरे आग्रह देने पर कहा, “मेरे मन में बसी मुखड़े जैसी कोई मिली तो इन यादों को एक पल में ही विदा कह दूँगा…”

वह कई बार कहता है…

“तुझे पा लेते तो यह कहानी ही समाप्त हो जाती,
तुझे खोकर बैठे हैं अवश्य कहानी लंबी होगी।”×

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Wait!!! સમય થશે ત્યારે મળશે! લઈ દઈએ છીએ.


પાંચમાં ધોરણમાં સાયકલ લેવી હતી. ભાઈબંધોની સાયકલ જોઈને મને પણ સખત ઇચ્છા થતી. સ્કૂલે, ટ્યુશનમાં, ક્રિકેટમાં સ્ટમ્પ માટે કે પછી રવિવારે રખડવા જવા પોતાની સાયકલ હોય તો મજા આવે.

દર વર્ષે સારા માર્ક્સ લાવીને ઘરે સાયકલ લઈ આપવાની પપ્પાને ડિમાન્ડ કરું. પપ્પા ફરી છ માસિક પરીક્ષામાં માર્ક્સ લાવવાનું બહાનું આપે. વળી, ઉનાળુ વેકેશન પણ પડી જાય. એટલે નવા વર્ષે વધુ સારું પરફોર્મ કરવાની વાત થાય.

એમ આ સાયકલ લાવવાની સાયકલ બે વર્ષ ચાલી. એક દિવસ શનિવારે અચાનક જ પપ્પા LMLનું સ્કૂટર લઈને સ્કૂલ છૂટવાના ટાઈમે પહોંચી ગયા. તોફાની હોઈએ એટલે અચાનક તેમને જોઈને એટલે થોડો ડર પણ લાગે. મને કહ્યું, “બેસી જા પાછળની સીટમાં.”

મને એવું લાગ્યું કે કોઈક પ્રકારની કમ્પલેઈન મળી લાગે છે. એટલે કશું જ બોલ્યા વિના ચૂપચાપ બેસી ગયો. સીધા જ સાયકલની દુકાને લઈ ગયા. એમાં પણ બે જ ઓપ્શન પસંદ કરીને રાખેલા. બંને વચ્ચે 200/- રૂપિયાનો ગેપ હતો. મને કહી દીધું કે, “આપણું બજેટ 2500/- રૂપિયા આસપાસનું છે. એની અંદર જે તને ગમે તે સાયકલ આપણે લઈશું.”

તેમના ચહેરા પરના ભાવો એકદમ ફ્લેટ. તેઓ કહે, “તારે ફરી પહેલો નંબર આવ્યો સાતમા ધોરણમાં એટલે તને સાયકલ અપાવવાનું મેં નક્કી કરેલું. ચાલ હવે, પસંદ કર અને ચલાવવાનું ચાલુ કર.”

મેં પણ સાયકલ દુકાનની બહાર લાવીને ચલાવવાનું શરૂ કર્યું. આમ પાછા દર બે સેકન્ડે પાછળ ફરીને જુએ કે કશું થયું તો નથી ને! હું સાયકલ લઈને આવી તો રહ્યો છું ને! પરંતુ, ખાસ ભાવો ન દર્શાવે.


આ હતું Wait નું કલ્ચર. જે કદાચ આજે નથી. ઇઝી-પીઝી મની & ક્વિક હેપ્પીનેસવાળા કોન્સેપ્ટ કદી જીવનના સેટબેક્સમાંથી ઊભા નહીં થવા દે. ડાઉન ટાઈમ કેટલો ચાલશે એ થોડો કોઈના હાથમાં છે! અકળાઈ જવાનો સમય છે માત્ર એક સેકન્ડ, એ પછી મોબાઇલનું બફરિંગ હોય કે ક્રેડિટ કાર્ડવાળાના ફોન! 😁

ડામરના રોડ પર ફાસ્ટ પેસમાં દોડતી દુનિયામાં ફૂટપાથ પર ચાલતા ચાલતા પથ્થરને દેડવવાની નિરાંત હું શોધું છું! મનની ફરી એવી સ્થિતિ જે સાયકલ મેળવવા માટેની મથામણ વખતે હતી.

મોરલ:

  • હંમેશા કશુંક મેળવવા માટે કશુંક ગીરવે મુક્યું હોય તો જ તપ પાકે. પછી એ સેલરી હોય, સમય હોય કે સ્થિતિ હોય.
  • સમય આવ્યે મળશે અને આ સમય પહેલા આટલું જોઈએ, આમાંથી કયા પ્રકારનું વ્યક્તિત્વ આપણે છીએ?
  • કશું પણ ગીરવે મૂક્યા વિના સમય પહેલા જોઈએ, આવી માનસિકતા હોય તો મનોચિકિત્સક પાસે ઈલાજ જરૂરી છે.
Posted in हिन्दू पतन

बंटवारे से पहले मीरपुर (जो अब पाकिस्तान में है) की रहने वाली हरभजन कौर की यह दर्दनाक कहानी बाल के. गुप्ता द्वारा लिखी गई पुस्तक फॉरगॉटन एट्रोसिटीज़: मेमोरीज़ ऑफ़ अ सर्वाइवर ऑफ़ द 1947 पार्टीशन ऑफ़ इंडिया का अंश है। इस पुस्तक में गुप्ता ने मीरपुर में हुए नरसंहार से बच निकले लोगों के भुला देने वाले अनुभव लिखे हैं। गुप्ता खुद भी उस नरसंहार से बचने वालों में से एक हैं।
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के वक़्त मीरपुर शहर कश्मीर रियासत का हिस्सा था। यहां करीब 18 हजार से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। यही नहीं, 5 हजार से अधिक महिलाओं को अगवा कर खाड़ी के देशों और पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में 10-20 रुपयों में बेच दिया गया।
27 अक्टूबर 1947 को मीरपुर रियासत का विलय भारत में होने की घोषणा की गई थी, लेकिन उससे पहले ही पाकिस्तान ने मीरपुर और उसके आस-पास वाले शहरों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था।
यह क्षेत्र सिर्फ़ कश्मीर के सेना की एक छोटी सी टुकड़ी के सहारे था। तनाव बढ़ता जा रहा था। पर भारत सरकार कश्मीर के मामले में दखल नहीं देना चाहती थी।
बाल के गुप्ता के इस पुस्तक के मुताबिक, कश्मीर में मीरपुर से एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिला। उनसे वहां बिगड़ रहे हालात की चर्चा की गई, लेकिन भारत की तरफ से इस पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। इसके मुताबिक, यह प्रतिनिधिमंडल महात्मा गांधी से भी मिला था, लेकिन गांधीजी ने कहा कि मीरपुर में बर्फ पड रही है, इसलिए वहां सेना को नहीं भेजा जा सकता। जबकि, हकीकत यह थी कि मीरपुर में कभी बर्फ पड़ती ही नहीं।
मीरपुर के निवासी खुद को भारत का हिस्सा मान रहे थे। इसके बावजूद उन्हें मदद नहीं पहुंच सकी थी।
उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह मानवता के इतिहास पर कालिख है। 25 नवबंर को पाकिस्तानी कबीलाई सेना ने मीरपुर पर धावा बोल दिया। पाकिस्तान की फौज को जो भी मिला, उसका कत्लेआम कर दिया। जान बचाने के लिए हज़ारों की तादात में लोग दूसरे सुरक्षित स्थानों की तरफ पलायन कर गए। इधर पाकिस्तानी सेना ने लूटपाट मचाना शुरू कर दिया।
पाकिस्तानी सेना ने चौतरफ़ा घेराबंदी कर रखी थी। किसी को भी नहीं बख्शा गया।
पाकिस्तानी फौज करीब पांच हजार युवा लड़कियों और महिलाओं का अपहरण कर पाकिस्तान ले गई। इन्हें बाद में मंडी लगाकर बेच दिया गया।
आज भले ही मीरपुर पाकिस्तान के हिस्से में हैं, लेकिन इस नरसंहार का जख्म आज भी हिन्दुस्तान के दिल में है।

Posted in AAP

AAP कोई पार्टी नहीं थी, यह उभरते भारत को अस्थिर करने के लिए अमेरिका, पाकिस्तान और चीन में डीप स्टेट द्वारा एक कुटिल परंतु सफल प्रयोग (10 वर्षों से अधिक समय तक चला) था।
भारत का  केजरूद्दीन तो यूनुस से भी बड़ा बदमाश निकला.
एक आम आदमी के लिए, एक राजनेता के रूप में अरविंद केजरीवाल की चमकदार सफलता अनिल कपूर-स्टारर बॉलीवुड फिल्म नायक की वास्तविक जीवन की पुनरावृत्ति जैसी प्रतीत होगी। लेकिन जिसने भी पिछले साल बांग्लादेश में हुए घटनाक्रम को देखा है, वह उसके उत्थान को भी उतने ही संदेह की दृष्टि से देखेगा।
बांग्लादेश में, एक सहज ‘छात्र विरोध’ अचानक शासन परिवर्तन का एक मंच बन गया। बिल्कुल अरविंद केजरीवाल की तरह, एक व्यक्ति जो कहीं से राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से आया, कुछ ही महीनों में दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गया।आम आदमी पार्टी के त्रुटिहीन मीडिया प्रबंधन के पीछे यह कहानी छिपी है कि कैसे इस मैग्सेसे पुरस्कार विजेता को अमेरिकी गहरे राज्य से समर्थन मिला।
आइए हम DEEP STATE के गहरे हस्तक्षेप और शातिर कदमों को समझें।
1. यह अच्छी तरह से जानते हुए कि सरकारी कर्मचारी आमतौर पर एनजीओ स्थापित करने से बचते हैं, खासकर अगर इसमें हितों का टकराव शामिल हो, लेकिन इससे केजरीवाल की पसंद पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने 2000 में अपने यारो का यार मनीष सिसौदिया के साथ अपना एनजीओ ‘परिवर्तन’ बनाया। 2005 में उन्होंने एक और एनजीओ कबीर की स्थापना की। अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि उनके दोनों एनजीओ फोर्ड फाउंडेशन से धन के प्रमुख प्राप्तकर्ता थे, यह तथ्य जांच से बचने के लिए 2012 में उनकी संबंधित वेबसाइटों को बंद कर सार्वजनिक डोमेन से छिपा दिया गया था।
2. कार्नेगी और रॉकफेलर फाउंडेशन के साथ, फोर्ड को उन तीन प्रमुख तम्बूओं में से एक माना जाता है जिसके माध्यम से अमेरिकी डीप स्टेट, सीआईए न केवल दुनिया भर में अपना प्रभाव फैलाता है बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के निरंतर आधिपत्य को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न देशों की राजनीतिक प्रणालियों में भी सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है। इस प्रकार यह महज संयोग नहीं हो सकता कि एक भारतीय सरकारी कर्मचारी, जिसके एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित किया जा रहा था, फिर  उसे  2006 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला, जिसे एक बार फिर उनके द्वारा वित्त पोषित किया गया था।
3. विभिन्न मनी ट्रेल और दस्तावेज़ जो केजरीवाल को विदेशी संगठनों के गठजोड़ से जोड़ते हैं, जिनकी भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने की घोषित नीति है, सार्वजनिक डोमेन में बहुत उपलब्ध हैं। लेकिन यह उनकी राजनीति का एक पहलू है जिसे सावधानीपूर्वक पीआर PR अभ्यास और मीडिया प्रबंधन द्वारा सफलतापूर्वक छिपा दिया गया है।
4. कैसे केजरीवाल को उनके विदेशी सौतेले पिताओं ने एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया:
i) उन्होंने सीएए का पुरजोर विरोध किया और शाहीन बाग के नाजायज CAA  विरोध का पूरे दिल से समर्थन किया। वास्तव में उनकी ही पार्टी के सदस्यों और विधायकों ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रची थी ।
ii) उन्होंने खुले तौर पर किसानों के विरोध का समर्थन किया जो वास्तव में बिचौलियों दलालों द्वारा आयोजित किया गया था, इसके अलावा उन्होंने खुले तौर पर और गुप्त रूप से खालिस्तान आंदोलन का समर्थन किया। पन्नून ने खुले तौर पर घोषणा की है कि उसने तिहाड़ जेल से एक खालिस्तानी दोषी आतंकवादी को रिहा कराने के लिए केजरीवाल को 114 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। इन 2 घातक साजिशों ने शायद उन्हें पंजाब में सत्ता हासिल करने में मदद की।
शीतयुद्ध का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि भारतीय राजनेताओं को अमेरिकी और सोवियत संघ के सुदूरवर्ती राज्यों से रिश्वत मिलती थी, लेकिन आम आदमी पार्टी बिल्कुल अलग प्रयोग है। वास्तव में, यह एक बड़ी सफलता है क्योंकि इसने न केवल राष्ट्रीय राजधानी में सत्ता हासिल की, बल्कि एक प्रमुख सीमावर्ती राज्य में जीत हासिल करने के अलावा एक दशक से अधिक समय तक घोर अहंकार के साथ सत्ता में बनी रही।
यह महज़ संयोग नहीं हो सकता कि केजरीवाल को कुख्यात शराब घोटाले में तिहाड़ भेज दिया गया, जबकि डीप स्टेट/सीआईए में उनके आकाओं ने तुरंत मोदी सरकार द्वारा लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने जैसे आरोपों के साथ चिल्लाना शुरू कर दिया। इसी तरह भारतीय न्यायिक प्रणाली की अखंडता को भी डीप स्टेट में उनके आकाओं द्वारा निशाना बनाया गया।
अब जब षडयंत्रकारी अरविंद केजरीवाल चला गया हैं, उसी समय डीप स्टेट यूएस में उनके आकाओं को भी ट्रंप ने यूएसएआईडी USAID  को खत्म करके बाहर कर दिया है, यह निश्चित रूप से एक पवित्र संयोग है कि केजरीवाल और उनके आकाओं दोनों को अपने दूष “कर्म” का फल मिल गया । अंतत पाप  का घडा  फूट  ही गया I
आप AAP के पुनरुद्धार की संभावना अब कहीं से भी नही दिख रही है, साथ ही इसके दीर्घकालिक अस्तित्व की भी संभावना नही के बराबार  है। आप पंजाब के लिए अब गिनती के दिन रह गए हैं। केजरीवाल को अब लंबी जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी l
और जब 2000 में शुरू किया गया घृणित प्रयोग अब आखिरकार खत्म हो गया है, लेकिन इस बेहद खतरनाक षडयंत्रकारी मफलरमैन #केजरीवाल को हमेशा उसके षडयंत्र के लिए याद किया जाएगा  जिसने देशहित को इतने लंबे समय तक बंधक बनाए रखा।