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इस्लाम वन वे ट्रैफ़िक

इस्लाम में प्रेम मतलब धर्मपरिवर्तन!

मंसूर अली खान पटौदी से शादी करने से पहले शर्मिला टैगोर ने इस्लाम कबूल किया था, जिसके बाद शर्मिला का नाम रखा गया आएशा बेगम! प्यार सच्चा था तो इस्लाम कबूल करवाने की जिद किस लिए? और अगर इस्लाम कुबूल कर ही लिया है तो खुद को शर्मिला टैगोर कहने की जिद किसलिए?

अक्सर हिन्दुओं और बाकी विश्व को मूर्ख बनाने के लिये मुस्लिम और सेकुलर विद्वान (?) यह प्रचार करते हैं कि कम पढ़े लिखे तबके में ही इस प्रकार की तलाक की घटनाएं होती हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है। क्या इमरान खान या नवाब पटौदी कम पढ़े लिखे हैं? तो फ़िर नवाब पटौदी, रविन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से रिश्ता रखने वाली शर्मिला से शादी करने के लिये इस्लाम छोड़कर हिन्दू क्यों नहीं बन गये? सैफ़ अली खान को अमृता सिंह से इतना ही प्यार था तो सैफ़ हिन्दू क्यों नहीं बन गया? अब अमृता सिंह को बेसहारा छोड़कर करीना कपूर से विवाह किया और बेटे का नाम रखा तैमूर। इससे अनुमान लगा ले इनका आदर्श वही खुनी तैमूर लंग है जिसने भारत में कत्लेआम मचाया था।

आँख बंद कर लेने से रात नहीं होती, प्रेम अन्धा होता है। सभी धर्म समान हैं। शादी ब्याह में धर्म नहीं दिल देखा जाता है, मुसलमान भी तो इंसान हैं। यह कहने वाली एक बार विचार करें। जो हिन्दू लड़कियां सोचती हैं कि लव जेहाद जैसा कुछ नहीं होता तो उन्हें सोचना चाहिए। क्या कोई मुस्लिम लड़की लव मैरिज करके हिन्दू लड़के की पत्नी बन सकती है? इस्लाम के तथाकथित विद्वान ज़ाकिर नाइक खुद फ़रमा चुके हैं कि इस्लाम “वन वे ट्रेफ़िक” है, कोई इसमें आ तो सकता है, लेकिन इसमें से जा नहीं सकता… क्या दोनो एक ही घर में अपने अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते? मुस्लिम बनना क्यों जरूरी है? और यही बात उनकी नीयत पर शक पैदा करती है।

अंकित सक्सेना का सडक पर उसे माँ बाप के सामने क़त्ल कर दिया गया। क्योंकि वह एक मुस्लिम लड़की से शादी करने वाला था। उस लड़की के माँ बाप और चाचा ने सडक पर अंकित सक्सेना का गला काट कर हत्या कर दी।

जेमिमा मार्सेल गोल्डस्मिथ और इमरान खान, ब्रिटेन के अरबपति सर जेम्स गोल्डस्मिथ की पुत्री (21), पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान (42) के प्रेमजाल में फ़ँसी, उससे 1995 में शादी की, इस्लाम अपनाया (नाम हाइका खान), उर्दू सीखी, पाकिस्तान गई, वहाँ की तहज़ीब के अनुसार ढलने की कोशिश की, दो बच्चे (सुलेमान और कासिम) पैदा किये… नतीजा क्या रहा… तलाक तलाक तलाक। वापस ब्रिटेन। फ़िर वही सवाल, क्या इमरान खान कम पढ़े लिखे थे? या आधुनिक (?) नहीं थे?

24 परगना (पश्चिम बंगाल) के निवासी नागेश्वर दास की पुत्री सरस्वती (21) ने 1997 में अपने से उम्र में काफ़ी बड़े मोहम्मद मेराजुद्दीन से निकाह किया, इस्लाम अपनाया (नाम साबरा बेगम)। सिर्फ़ 6 साल का वैवाहिक जीवन और चार बच्चों के बाद मेराजुद्दीन ने उसे मौखिक तलाक दे दिया और अगले ही दिन कोलकाता हाइकोर्ट के तलाकनामे (No. 786/475/2003 दिनांक 2.12.03) को तलाक भी हो गया। अब पाठक खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि चार बच्चों के साथ घर से निकाली गई सरस्वती उर्फ़ साबरा बेगम का क्या हुआ होगा, न तो वह अपने पिता के घर जा सकती थी, न ही आत्महत्या कर सकती थी…

प्रख्यात बंगाली कवि नज़रुल इस्लाम, हुमायूं कबीर (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने भी हिन्दू लड़कियों से शादी की, क्या इनमें से कोई भी हिन्दू बना? अज़हरुद्दीन भी अपनी मुस्लिम बीबी नौरीन को चार बच्चे पैदा करके छोड़ चुके। बाद में संगीता बिजलानी से निकाह कर लिया, कुछ साल बाद उसे भी तलाक दे दिया। उन्हें कोई अफ़सोस नहीं, कोई शिकन नहीं। ऊपर दिये गये उदाहरणों में अपनी बीवियों और बच्चों को छोड़कर दूसरी शादियाँ करने वालों में से कितने लोग अनपढ़ या कम पढ़े लिखे हैं? तब इसमें शिक्षा दीक्षा का कोई रोल कहाँ रहा? यह तो विशुद्ध लव जेहाद है।

वहीदा रहमान ने कमलजीत से शादी की, वह मुस्लिम बने, अरुण गोविल के भाई ने तबस्सुम से शादी की, मुस्लिम बने, डॉ ज़ाकिर हुसैन (पूर्व राष्ट्रपति) की लड़की ने एक हिन्दू से शादी की, वह भी मुस्लिम बना, एक अल्पख्यात अभिनेत्री किरण वैराले ने दिलीप कुमार के एक रिश्तेदार से शादी की और गायब हो गई।

इस कड़ी में सबसे आश्चर्यजनक नाम है भाकपा के वरिष्ठ नेता इन्द्रजीत गुप्त का। मेदिनीपुर से 37 वर्षों तक सांसद रहने वाले कम्युनिस्ट (जो धर्म को अफ़ीम मानते हैं), जिनकी शिक्षा दीक्षा सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज दिल्ली तथा किंग्स कॉलेज केम्ब्रिज में हुई, 62 वर्ष की आयु में एक मुस्लिम महिला सुरैया से शादी करने के लिये मुसलमान (इफ़्तियार गनी) बन गये। सुरैया से इन्द्रजीत गुप्त काफ़ी लम्बे समय से प्रेम करते थे, और उन्होंने उसके पति अहमद अली (सामाजिक कार्यकर्ता नफ़ीसा अली के पिता) से उसके तलाक होने तक उसका इन्तज़ार किया। लेकिन इस समर्पणयुक्त प्यार का नतीजा वही रहा जो हमेशा होता है, जी हाँ, “वन वे-ट्रेफ़िक”। सुरैया तो हिन्दू

नहीं बनीं, उलटे धर्म को सतत कोसने वाले एक कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त “इफ़्तियार गनी” जरूर बन गये।

इसी प्रकार अच्छे खासे पढ़े लिखे अहमद खान (एडवोकेट) ने अपने निकाह के 50 साल बाद अपनी पत्नी “शाहबानो” को 62 वर्ष की उम्र में तलाक दिया, जो 5 बच्चों की माँ थी… यहाँ भी वजह थी उनसे आयु में काफ़ी छोटी 20 वर्षीय लड़की (शायद कम आयु की लड़कियाँ भी एक कमजोरी हैं?)। इस केस ने समूचे भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ पर अच्छी खासी बहस छेड़ी थी। शाहबानो को गुज़ारा भत्ता देने के लिये सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को राजीव गाँधी ने अपने असाधारण बहुमत के जरिये “वोटबैंक राजनीति” के चलते पलट दिया, मुल्लाओं को वरीयता तथा आरिफ़ मोहम्मद खान जैसे उदारवादी मुस्लिम को दरकिनार किया गया… तात्पर्य यही कि शिक्षा दीक्षा या अधिक पढ़े लिखे होने से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, शरीयत और कुरआन इनके लिये सर्वोपरि है, देश समाज आदि सब बाद में…।

शेख अब्दुल्ला और उनके बेटे फ़ारुख अब्दुल्ला दोनों ने अंग्रेज लड़कियों से शादी की, ज़ाहिर है कि उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने के बाद, यदि वाकई ये लोग सेकुलर होते तो खुद ईसाई धर्म अपना लेते और अंग्रेज बन जाते…? और तो और आधुनिक जमाने में पैदा हुए इनके पोते यानी कि जम्मू कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक हिन्दू लड़की “पायल” से शादी की, लेकिन खुद हिन्दू नहीं बने, उसे मुसलमान बनाया, तात्पर्य यह कि “सेकुलरिज़्म” और “इस्लाम” का दूर दूर तक आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है और जो हमें दिखाया जाता है वह सिर्फ़ ढोंग ढकोसला है।

एक बात और है कि धर्म परिवर्तन के लिये आसान निशाना हमेशा होते हैं “हिन्दू”, जबकि ईसाईयों के मामले में ऐसा नहीं होता, एक उदाहरण और देखिये…

पश्चिम बंगाल के एक गवर्नर थे ए एल डायस (अगस्त 1971 से नवम्बर 1979), उनकी लड़की लैला डायस, एक लव जेहादी ज़ाहिद अली के प्रेमपाश में फ़ँस गई, लैला डायस ने जाहिद से शादी करने की इच्छा जताई। गवर्नर साहब डायस ने लव जेहादी को राजभवन बुलाकर 16 मई 1974 को उसे इस्लाम छोड़कर ईसाई बनने को राजी कर लिया। यह सारी कार्रवाई तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की देखरेख में हुई। ईसाई बनने के तीन सप्ताह बाद लैला डायस की शादी कोलकाता के मिडलटन स्थित सेंट थॉमस चर्च में ईसाई बन चुके जाहिद अली के साथ सम्पन्न हुई। इस उदाहरण का तात्पर्य यह है कि पश्चिमी माहौल में पढ़े-लिखे और उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले डायस साहब भी, एक मुस्लिम लव जेहादी की “नीयत” समझकर उसे ईसाई बनाने पर तुल गये। लेकिन हिन्दू माँ बाप अब भी “सहिष्णुता” और “सेकुलरिज़्म” का राग अलापते रहते हैं, और यदि कोई इस “नीयत” की पोल खोलना चाहता है तो उसे “साम्प्रदायिक” कहते हैं। यहाँ तक कि कई लड़कियाँ भी अपनी धोखा खाई हुई सहेलियों से सीखने को तैयार नहीं, हिन्दू लड़के की सौ कमियाँ निकाल लेंगी, लेकिन दो कौड़ी की औकात रखने वाले मुस्लिम जेहादी के बारे में पूछताछ करना उन्हें “साम्प्रदायिकता” लगती है…

ऐसी हज़ारों दास्तानों में से एक है सिरोंज के महेश्वरी समाज की दास्तान। सिरोंज यह स्थान विदिशा से ५० मील की दूरी पर एक तहसील है। 200 साल पहले सिरोंज टोंक के एक नवाब के आधिपत्य में था। एक बार नवाब ने इस क्षेत्र का दौरा किया। उसी रात की यहाँ के माहेश्वरी सेठ की पुत्री का विवाह था। संयोग से रास्ते में डोली में से पुत्री की कीमती चप्पल गिर गई। किसी व्यक्ति ने उसे नवाब के खेमे तक पहुँचा दिया। नवाब को यह भी कहा गया कि चप्पल से भी अधिक सुंदर इसको पहनने वाली है। यह जानने के बाद नवाब द्वारा सेठ की पुत्री की माँग की गई। यह समाचार सुनते ही माहेश्वरी समाज में खलबली मच गई। बेटी देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। अब किया क्या जाये? माहेश्वरी समाज के प्रतिनिधियों ने कुटनीति से काम किया। नवाब को यह सूचना दे दिया गया कि प्रातः होते ही डोला दे दिया जाएगा। इससे नवाब प्रसन्न हो गया। इधर माहेश्वरियों ने रातों रात पुत्री सहित शहर से पलायन कर दिया तथा। उनके पूरे समाज में यह निर्णय लिया गया कि कोई भी माहेश्वरी समाज में न तो इस स्थान का पानी पिएगा, न ही निवास करेगा। एक रात में अपने स्थान को उजाड़ कर महेश्वरी समाज के लोग दूसरे राज्य चले गए। मगर अपनी इज्जत, अपनी अस्मिता से कोई समझौता नहीं किया। आज भी एक परम्परा माहेश्वरी समाज में अविरल चल रही है। आज भी माहेश्वरी समाज का कोई भी व्यक्ति सिरोंज जाता है। तो वहाँ का पानी पीता है और न ही रात को कभी रुकता हैं। यह त्याग वह अपने पूर्वजों द्वारा लिए गए संकल्प को निभाने एवं मुसलमानों के अत्याचार के विरोध को प्रदर्शित करने के लिए करता हैं।

दरअसल मुस्लिम शासकों में हिंदुओं की लड़कियों को उठाने, उन्हें अपनी हवस बनाने, अपने हरम में भरने की होड़ थी। उनके इस व्यसन के चलते हिन्दू प्रजा सदा आशंकित और भयभीत रहती थी। ध्यान दीजिये किस प्रकार हिन्दू समाज ने अपना देश, धन, सम्पति आदि सब त्याग कर दर दर की ठोकरे खाना स्वीकार किया। मगर अपने धर्म से कोई समझौता नहीं किया। अगर ऐसी शिक्षा, ऐसे त्याग और ऐसे प्रेरणादायक इतिहास को हिन्दू समाज आज अपनी लड़कियों को दूध में घुटी के रूप में दे। तो कोई हिन्दू लड़को कभी लव जिहाद का शिकार न बने।

सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कैसा प्रेम है? यदि वाकई “प्रेम” ही है तो यह वन-वे ट्रैफ़िक क्यों है? इसीलिये सभी सेकुलरों, प्यार मुहब्बत भाईचारे, धर्म की दीवारों से ऊपर उठने आदि की हवाई किताबी बातें करने वालों से मेरा सिर्फ़ एक ही सवाल है, “कितनी मुस्लिम लड़कियों (अथवा लड़कों) ने “प्रेम”(?) की खातिर हिन्दू बनना स्वीकार किया है?”

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इस्लाम वन वे ट्रैफ़िक

इस्लाम में प्रेम मतलब धर्मपरिवर्तन!

मंसूर अली खान पटौदी से शादी करने से पहले शर्मिला टैगोर ने इस्लाम कबूल किया था, जिसके बाद शर्मिला का नाम रखा गया आएशा बेगम! प्यार सच्चा था तो इस्लाम कबूल करवाने की जिद किस लिए? और अगर इस्लाम कुबूल कर ही लिया है तो खुद को शर्मिला टैगोर कहने की जिद किसलिए?

अक्सर हिन्दुओं और बाकी विश्व को मूर्ख बनाने के लिये मुस्लिम और सेकुलर विद्वान (?) यह प्रचार करते हैं कि कम पढ़े लिखे तबके में ही इस प्रकार की तलाक की घटनाएं होती हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है। क्या इमरान खान या नवाब पटौदी कम पढ़े लिखे हैं? तो फ़िर नवाब पटौदी, रविन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से रिश्ता रखने वाली शर्मिला से शादी करने के लिये इस्लाम छोड़कर हिन्दू क्यों नहीं बन गये? सैफ़ अली खान को अमृता सिंह से इतना ही प्यार था तो सैफ़ हिन्दू क्यों नहीं बन गया? अब अमृता सिंह को बेसहारा छोड़कर करीना कपूर से विवाह किया और बेटे का नाम रखा तैमूर। इससे अनुमान लगा ले इनका आदर्श वही खुनी तैमूर लंग है जिसने भारत में कत्लेआम मचाया था।

आँख बंद कर लेने से रात नहीं होती, प्रेम अन्धा होता है। सभी धर्म समान हैं। शादी ब्याह में धर्म नहीं दिल देखा जाता है, मुसलमान भी तो इंसान हैं। यह कहने वाली एक बार विचार करें। जो हिन्दू लड़कियां सोचती हैं कि लव जेहाद जैसा कुछ नहीं होता तो उन्हें सोचना चाहिए। क्या कोई मुस्लिम लड़की लव मैरिज करके हिन्दू लड़के की पत्नी बन सकती है? इस्लाम के तथाकथित विद्वान ज़ाकिर नाइक खुद फ़रमा चुके हैं कि इस्लाम “वन वे ट्रेफ़िक” है, कोई इसमें आ तो सकता है, लेकिन इसमें से जा नहीं सकता… क्या दोनो एक ही घर में अपने अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते? मुस्लिम बनना क्यों जरूरी है? और यही बात उनकी नीयत पर शक पैदा करती है।

अंकित सक्सेना का सडक पर उसे माँ बाप के सामने क़त्ल कर दिया गया। क्योंकि वह एक मुस्लिम लड़की से शादी करने वाला था। उस लड़की के माँ बाप और चाचा ने सडक पर अंकित सक्सेना का गला काट कर हत्या कर दी।

जेमिमा मार्सेल गोल्डस्मिथ और इमरान खान, ब्रिटेन के अरबपति सर जेम्स गोल्डस्मिथ की पुत्री (21), पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान (42) के प्रेमजाल में फ़ँसी, उससे 1995 में शादी की, इस्लाम अपनाया (नाम हाइका खान), उर्दू सीखी, पाकिस्तान गई, वहाँ की तहज़ीब के अनुसार ढलने की कोशिश की, दो बच्चे (सुलेमान और कासिम) पैदा किये… नतीजा क्या रहा… तलाक तलाक तलाक। वापस ब्रिटेन। फ़िर वही सवाल, क्या इमरान खान कम पढ़े लिखे थे? या आधुनिक (?) नहीं थे?

24 परगना (पश्चिम बंगाल) के निवासी नागेश्वर दास की पुत्री सरस्वती (21) ने 1997 में अपने से उम्र में काफ़ी बड़े मोहम्मद मेराजुद्दीन से निकाह किया, इस्लाम अपनाया (नाम साबरा बेगम)। सिर्फ़ 6 साल का वैवाहिक जीवन और चार बच्चों के बाद मेराजुद्दीन ने उसे मौखिक तलाक दे दिया और अगले ही दिन कोलकाता हाइकोर्ट के तलाकनामे (No. 786/475/2003 दिनांक 2.12.03) को तलाक भी हो गया। अब पाठक खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि चार बच्चों के साथ घर से निकाली गई सरस्वती उर्फ़ साबरा बेगम का क्या हुआ होगा, न तो वह अपने पिता के घर जा सकती थी, न ही आत्महत्या कर सकती थी…

प्रख्यात बंगाली कवि नज़रुल इस्लाम, हुमायूं कबीर (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने भी हिन्दू लड़कियों से शादी की, क्या इनमें से कोई भी हिन्दू बना? अज़हरुद्दीन भी अपनी मुस्लिम बीबी नौरीन को चार बच्चे पैदा करके छोड़ चुके। बाद में संगीता बिजलानी से निकाह कर लिया, कुछ साल बाद उसे भी तलाक दे दिया। उन्हें कोई अफ़सोस नहीं, कोई शिकन नहीं। ऊपर दिये गये उदाहरणों में अपनी बीवियों और बच्चों को छोड़कर दूसरी शादियाँ करने वालों में से कितने लोग अनपढ़ या कम पढ़े लिखे हैं? तब इसमें शिक्षा दीक्षा का कोई रोल कहाँ रहा? यह तो विशुद्ध लव जेहाद है।

वहीदा रहमान ने कमलजीत से शादी की, वह मुस्लिम बने, अरुण गोविल के भाई ने तबस्सुम से शादी की, मुस्लिम बने, डॉ ज़ाकिर हुसैन (पूर्व राष्ट्रपति) की लड़की ने एक हिन्दू से शादी की, वह भी मुस्लिम बना, एक अल्पख्यात अभिनेत्री किरण वैराले ने दिलीप कुमार के एक रिश्तेदार से शादी की और गायब हो गई।

इस कड़ी में सबसे आश्चर्यजनक नाम है भाकपा के वरिष्ठ नेता इन्द्रजीत गुप्त का। मेदिनीपुर से 37 वर्षों तक सांसद रहने वाले कम्युनिस्ट (जो धर्म को अफ़ीम मानते हैं), जिनकी शिक्षा दीक्षा सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज दिल्ली तथा किंग्स कॉलेज केम्ब्रिज में हुई, 62 वर्ष की आयु में एक मुस्लिम महिला सुरैया से शादी करने के लिये मुसलमान (इफ़्तियार गनी) बन गये। सुरैया से इन्द्रजीत गुप्त काफ़ी लम्बे समय से प्रेम करते थे, और उन्होंने उसके पति अहमद अली (सामाजिक कार्यकर्ता नफ़ीसा अली के पिता) से उसके तलाक होने तक उसका इन्तज़ार किया। लेकिन इस समर्पणयुक्त प्यार का नतीजा वही रहा जो हमेशा होता है, जी हाँ, “वन वे-ट्रेफ़िक”। सुरैया तो हिन्दू

नहीं बनीं, उलटे धर्म को सतत कोसने वाले एक कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त “इफ़्तियार गनी” जरूर बन गये।

इसी प्रकार अच्छे खासे पढ़े लिखे अहमद खान (एडवोकेट) ने अपने निकाह के 50 साल बाद अपनी पत्नी “शाहबानो” को 62 वर्ष की उम्र में तलाक दिया, जो 5 बच्चों की माँ थी… यहाँ भी वजह थी उनसे आयु में काफ़ी छोटी 20 वर्षीय लड़की (शायद कम आयु की लड़कियाँ भी एक कमजोरी हैं?)। इस केस ने समूचे भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ पर अच्छी खासी बहस छेड़ी थी। शाहबानो को गुज़ारा भत्ता देने के लिये सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को राजीव गाँधी ने अपने असाधारण बहुमत के जरिये “वोटबैंक राजनीति” के चलते पलट दिया, मुल्लाओं को वरीयता तथा आरिफ़ मोहम्मद खान जैसे उदारवादी मुस्लिम को दरकिनार किया गया… तात्पर्य यही कि शिक्षा दीक्षा या अधिक पढ़े लिखे होने से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, शरीयत और कुरआन इनके लिये सर्वोपरि है, देश समाज आदि सब बाद में…।

शेख अब्दुल्ला और उनके बेटे फ़ारुख अब्दुल्ला दोनों ने अंग्रेज लड़कियों से शादी की, ज़ाहिर है कि उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने के बाद, यदि वाकई ये लोग सेकुलर होते तो खुद ईसाई धर्म अपना लेते और अंग्रेज बन जाते…? और तो और आधुनिक जमाने में पैदा हुए इनके पोते यानी कि जम्मू कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक हिन्दू लड़की “पायल” से शादी की, लेकिन खुद हिन्दू नहीं बने, उसे मुसलमान बनाया, तात्पर्य यह कि “सेकुलरिज़्म” और “इस्लाम” का दूर दूर तक आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है और जो हमें दिखाया जाता है वह सिर्फ़ ढोंग ढकोसला है।

एक बात और है कि धर्म परिवर्तन के लिये आसान निशाना हमेशा होते हैं “हिन्दू”, जबकि ईसाईयों के मामले में ऐसा नहीं होता, एक उदाहरण और देखिये…

पश्चिम बंगाल के एक गवर्नर थे ए एल डायस (अगस्त 1971 से नवम्बर 1979), उनकी लड़की लैला डायस, एक लव जेहादी ज़ाहिद अली के प्रेमपाश में फ़ँस गई, लैला डायस ने जाहिद से शादी करने की इच्छा जताई। गवर्नर साहब डायस ने लव जेहादी को राजभवन बुलाकर 16 मई 1974 को उसे इस्लाम छोड़कर ईसाई बनने को राजी कर लिया। यह सारी कार्रवाई तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की देखरेख में हुई। ईसाई बनने के तीन सप्ताह बाद लैला डायस की शादी कोलकाता के मिडलटन स्थित सेंट थॉमस चर्च में ईसाई बन चुके जाहिद अली के साथ सम्पन्न हुई। इस उदाहरण का तात्पर्य यह है कि पश्चिमी माहौल में पढ़े-लिखे और उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले डायस साहब भी, एक मुस्लिम लव जेहादी की “नीयत” समझकर उसे ईसाई बनाने पर तुल गये। लेकिन हिन्दू माँ बाप अब भी “सहिष्णुता” और “सेकुलरिज़्म” का राग अलापते रहते हैं, और यदि कोई इस “नीयत” की पोल खोलना चाहता है तो उसे “साम्प्रदायिक” कहते हैं। यहाँ तक कि कई लड़कियाँ भी अपनी धोखा खाई हुई सहेलियों से सीखने को तैयार नहीं, हिन्दू लड़के की सौ कमियाँ निकाल लेंगी, लेकिन दो कौड़ी की औकात रखने वाले मुस्लिम जेहादी के बारे में पूछताछ करना उन्हें “साम्प्रदायिकता” लगती है…

ऐसी हज़ारों दास्तानों में से एक है सिरोंज के महेश्वरी समाज की दास्तान। सिरोंज यह स्थान विदिशा से ५० मील की दूरी पर एक तहसील है। 200 साल पहले सिरोंज टोंक के एक नवाब के आधिपत्य में था। एक बार नवाब ने इस क्षेत्र का दौरा किया। उसी रात की यहाँ के माहेश्वरी सेठ की पुत्री का विवाह था। संयोग से रास्ते में डोली में से पुत्री की कीमती चप्पल गिर गई। किसी व्यक्ति ने उसे नवाब के खेमे तक पहुँचा दिया। नवाब को यह भी कहा गया कि चप्पल से भी अधिक सुंदर इसको पहनने वाली है। यह जानने के बाद नवाब द्वारा सेठ की पुत्री की माँग की गई। यह समाचार सुनते ही माहेश्वरी समाज में खलबली मच गई। बेटी देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। अब किया क्या जाये? माहेश्वरी समाज के प्रतिनिधियों ने कुटनीति से काम किया। नवाब को यह सूचना दे दिया गया कि प्रातः होते ही डोला दे दिया जाएगा। इससे नवाब प्रसन्न हो गया। इधर माहेश्वरियों ने रातों रात पुत्री सहित शहर से पलायन कर दिया तथा। उनके पूरे समाज में यह निर्णय लिया गया कि कोई भी माहेश्वरी समाज में न तो इस स्थान का पानी पिएगा, न ही निवास करेगा। एक रात में अपने स्थान को उजाड़ कर महेश्वरी समाज के लोग दूसरे राज्य चले गए। मगर अपनी इज्जत, अपनी अस्मिता से कोई समझौता नहीं किया। आज भी एक परम्परा माहेश्वरी समाज में अविरल चल रही है। आज भी माहेश्वरी समाज का कोई भी व्यक्ति सिरोंज जाता है। तो वहाँ का पानी पीता है और न ही रात को कभी रुकता हैं। यह त्याग वह अपने पूर्वजों द्वारा लिए गए संकल्प को निभाने एवं मुसलमानों के अत्याचार के विरोध को प्रदर्शित करने के लिए करता हैं।

दरअसल मुस्लिम शासकों में हिंदुओं की लड़कियों को उठाने, उन्हें अपनी हवस बनाने, अपने हरम में भरने की होड़ थी। उनके इस व्यसन के चलते हिन्दू प्रजा सदा आशंकित और भयभीत रहती थी। ध्यान दीजिये किस प्रकार हिन्दू समाज ने अपना देश, धन, सम्पति आदि सब त्याग कर दर दर की ठोकरे खाना स्वीकार किया। मगर अपने धर्म से कोई समझौता नहीं किया। अगर ऐसी शिक्षा, ऐसे त्याग और ऐसे प्रेरणादायक इतिहास को हिन्दू समाज आज अपनी लड़कियों को दूध में घुटी के रूप में दे। तो कोई हिन्दू लड़को कभी लव जिहाद का शिकार न बने।

सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कैसा प्रेम है? यदि वाकई “प्रेम” ही है तो यह वन-वे ट्रैफ़िक क्यों है? इसीलिये सभी सेकुलरों, प्यार मुहब्बत भाईचारे, धर्म की दीवारों से ऊपर उठने आदि की हवाई किताबी बातें करने वालों से मेरा सिर्फ़ एक ही सवाल है, “कितनी मुस्लिम लड़कियों (अथवा लड़कों) ने “प्रेम”(?) की खातिर हिन्दू बनना स्वीकार किया है?”

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

કાશી


#काशी तो काशी है, काशी अविनाशी है  !!

काशी को स्वयं भगवान शिव ने ‘अविनाशी’ और ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा है । ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ स्वरूप होने के कारण प्रलयकाल में भी काशी नष्ट नहीं होती है; क्योंकि प्रलय के समय जैसे-जैसे एकार्णव का जल बढ़ता है, वैसे-वैसे इस क्षेत्र को भगवान शंकर अपने त्रिशूल पर उठाते जाते हैं ।

स्कंद पुराण के अनुसार काशी नगरी का स्वरूप सतयुग में त्रिशूल के आकार का, त्रेता में चक्र के आकार का, द्वापर में रथ के आकार का तथा कलियुग में शंख के आकार का होता है ।

संसार की सबसे प्राचीन नगरी है काशी..!!

काशी को संसार की सबसे प्राचीन नगरी कहा जाता है; क्योंकि वेदों में भी इसका कई जगह उल्लेख है । पौराणिक मान्यता के अनुसार पहले यह भगवान माधव की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरने से वह स्थान ‘बिंदु सरोवर’ बन गया और भगवान यहा ‘बिंदुमाधव’ के नाम से प्रतिष्ठित हुए ।

एक बार भगवान शंकर ने ब्रह्माजी का पांचवा सिर अपने नाखूनों से काट दिया । तब वह कटा सिर शंकर जी के हाथ से चिपक गया । वे १२ वर्षों तक बदरिकाश्रम, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में घूमते रहे, परंतु वह सिर उनके हाथ से अलग नहीं हुआ । ब्रह्मदेव का सिर काटने से ब्रह्महत्या स्त्री रूप धारण करके उनका पीछा करने लगी ।

अंत में जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और स्नान करते ही उनके हाथ से चिपका हुआ कपाल भी अलग हो गया । जिस स्थान पर वह कपाल छूटा, वह ‘कपालमोचन तीर्थ’ कहलाया । तब शंकर जी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना करके उस पुरी को अपने नित्य निवास के लिए मांग लिया।
हर हर महादेव🚩

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કાશી


#काशी तो काशी है, काशी अविनाशी है  !!

काशी को स्वयं भगवान शिव ने ‘अविनाशी’ और ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा है । ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ स्वरूप होने के कारण प्रलयकाल में भी काशी नष्ट नहीं होती है; क्योंकि प्रलय के समय जैसे-जैसे एकार्णव का जल बढ़ता है, वैसे-वैसे इस क्षेत्र को भगवान शंकर अपने त्रिशूल पर उठाते जाते हैं ।

स्कंद पुराण के अनुसार काशी नगरी का स्वरूप सतयुग में त्रिशूल के आकार का, त्रेता में चक्र के आकार का, द्वापर में रथ के आकार का तथा कलियुग में शंख के आकार का होता है ।

संसार की सबसे प्राचीन नगरी है काशी..!!

काशी को संसार की सबसे प्राचीन नगरी कहा जाता है; क्योंकि वेदों में भी इसका कई जगह उल्लेख है । पौराणिक मान्यता के अनुसार पहले यह भगवान माधव की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरने से वह स्थान ‘बिंदु सरोवर’ बन गया और भगवान यहा ‘बिंदुमाधव’ के नाम से प्रतिष्ठित हुए ।

एक बार भगवान शंकर ने ब्रह्माजी का पांचवा सिर अपने नाखूनों से काट दिया । तब वह कटा सिर शंकर जी के हाथ से चिपक गया । वे १२ वर्षों तक बदरिकाश्रम, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में घूमते रहे, परंतु वह सिर उनके हाथ से अलग नहीं हुआ । ब्रह्मदेव का सिर काटने से ब्रह्महत्या स्त्री रूप धारण करके उनका पीछा करने लगी ।

अंत में जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और स्नान करते ही उनके हाथ से चिपका हुआ कपाल भी अलग हो गया । जिस स्थान पर वह कपाल छूटा, वह ‘कपालमोचन तीर्थ’ कहलाया । तब शंकर जी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना करके उस पुरी को अपने नित्य निवास के लिए मांग लिया।
हर हर महादेव🚩

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आजम खान को हेट  स्पीच में सजा इसी डिप्टी एसपी अनुज चौधरी के जांच और सुबुत जुटाए जाने के आधार पर मिली थी

बाद में एक बार जब वह जमानत पर रिहा हुआ तब एक दिन  आजम खान ने अनुज चौधरी को अचानक कचहरी में देख लिया

फिर अनुज चौधरी के पास गया उसका बेटा यानी सपोला भी साथ में था और बड़ी बेशर्मी से आजम खान ने डिप्टी एसपी अनुज चौधरी से कहा कि तुम्हें यह वर्दी अखिलेश यादव की मेहरबानी से मिली है तुम हमारा एहसान भूल गए ?

तब अनुज चौधरी ने उसको हड़काते  हुए कहा मैं अर्जुन पुरस्कार विजेता हूं ओलंपियन हूं कुश्ती में भारत और  एशिया चैंपियन रह चुका हूं किसी का एहसान मुझ पर नहीं है यह वर्दी मुझे मेरी मेहनत से मिली है

उसके बाद आजम खान बेशर्मी से दांत खिसियते हुए अपने सपोले बेटे  को लेकर चला गया

जी हां सच्चाई यह है की 1975 से ही उत्तर प्रदेश में एक सरकारी नीति बनी है यदि कोई उत्तर प्रदेश का व्यक्ति अर्जुन पुरस्कार जितता है तो उसे सीधे क्लास 2 की नौकरी मिलेगी और वह चाहे तो पुलिस में भी जा सकता है या वह एसडीएम या तहसीलदार नियुक्त हो सकता है और यह कानून पंजाब हरियाणा समेत कई राज्यों का है

अब अनुज चौधरी अर्जुन पुरस्कार जीते उत्तर प्रदेश के सरकारी नियम के अनुसार वह डिप्टी एसपी बने तो यह आजम खान कह रहा है कि अखिलेश यादव की मेहरबानी से तुम पुलिस में भर्ती हुए

लेकिन अनुज चौधरी की आंखों में गुस्सा देखकर दोनों बाप बेटा दुम दबाकर चले गए

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श्रीकृष्ण की जीवन गाथा में क्या राधा एक काल्पनिक पात्र हैं?
——
श्रीकृष्ण का चरित्र सनातन धर्म में दिव्यता, कर्म, और ज्ञान का अद्भुत संगम है। उनकी लीलाएं, उनके उपदेश और उनके कार्य, सभी वेदों, उपनिषदों और पुराणों में विस्तार से वर्णित हैं। किंतु जब हम राधा के ऐतिहासिक और शास्त्रीय संदर्भ की पड़ताल करते हैं, तो एक गहन चिंतन उभरकर सामने आता है।

शास्त्रों में राधा का अभाव: एक तथ्यात्मक दृष्टि-

सनातन धर्म के जिन प्राचीन ग्रंथों को श्रीकृष्ण के जीवन का प्रामाणिक स्रोत माना जाता है, जैसे महाभारत, श्रीमद्भगवत महापुराण, हरिवंश पुराण आदि, उनमें राधा का उल्लेख नहीं मिलता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध) में रासलीला का विस्तृत वर्णन है, जिसमें गोपियों संग श्रीकृष्ण के मधुर संबंधों और रासक्रीड़ा का वर्णन तो मिलता है, परंतु राधा के नाम का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं होता। श्लोक कहता है—
रासेन संनादयति यत्र नन्दति गोपीजनः संनादति च यः। (भागवत पुराण, 10.33.11)
यहाँ पर ‘गोपियों’ का उल्लेख हुआ है, किंतु राधा का नाम अनुपस्थित है। यदि राधा का अस्तित्व श्रीकृष्ण के जीवन में इतना महत्वपूर्ण होता, तो क्या भागवत जैसे प्रतिष्ठित ग्रंथ में उनका उल्लेख न किया जाता?
इसी प्रकार, महाभारत जो श्रीकृष्ण के जीवन का संपूर्ण वृत्तांत प्रस्तुत करता है, उसमें भी राधा का कोई स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। (महाभारत, भीष्म पर्व, 67.14)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नाम — देवकीनंदन, गोविंद, वासुदेव आदि उल्लिखित हैं, परंतु राधा का उल्लेख नहीं।
हरिवंश पुराण, जिसमें यदुवंश की वंशावली और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन है, उसमें भी राधा का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता।
राधा का उल्लेख: एक काव्यात्मक कल्पना?
ऐतिहासिक दृष्टि से राधा का चरित्र विशेष रूप से भक्ति आंदोलन के समय, विशेषकर जयदेव के गीत गोविंद (12वीं शताब्दी) में उभरकर सामने आया। गीत गोविंद के श्लोक—
स्मर गरल खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पदपल्लवमुदारम्।
यह श्लोक राधा-कृष्ण के मधुर प्रेम का वर्णन करता है, किंतु यह एक काव्यात्मक और भक्तिपूर्ण रचना है, शास्त्रीय प्रमाण नहीं।

श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप-

श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप हमें भगवद्गीता में दृष्टिगोचर होता है, जहाँ वे कर्म, धर्म और ज्ञान का उपदेश देते हैं। उनका चरित्र केवल प्रेमकथा का नायक नहीं है, बल्कि वे योगेश्वर और सृष्टि के अधिपति हैं। गीता में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (गीता, 4.7)
अर्थात्, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करता हूँ।
श्रीकृष्ण के जीवन में रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि पत्नियों का वर्णन तो श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में मिलता है—
रुक्मिणीं प्रथमां कन्यां गृह्णाति स्म यदुत्तमः। (भागवत पुराण, 10.54.1)
किन्तु राधा का उल्लेख इस आधिकारिक स्वरूप में नहीं मिलता।

अंतिम विचार-

श्रीकृष्ण और राधा का संबंध भले ही भक्ति आंदोलन के दौर में आध्यात्मिक प्रेम के प्रतीक के रूप में स्थापित हुआ हो, किंतु शास्त्रीय दृष्टि से राधा का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट नहीं है। यह संभावना बलवती होती है कि राधा का चरित्र बाद के युगों में काव्य और भक्ति रस को गहराई देने के लिए रचा गया, न कि श्रीकृष्ण के वास्तविक जीवन का हिस्सा था।
अतः यह कहना तर्कसंगत है कि राधा का चरित्र शास्त्रीय सत्य से अधिक भक्तिकालीन कवियों की कोमल कल्पना और काव्य रस का परिणाम है, जो भगवान श्रीकृष्ण के दैवीय स्वरूप की महानता को कम करने का प्रयास ही माना जाएगा।
“श्रीकृष्णं वंदे जगद्गुरुम्।”
~भगवान स्वरूप शर्मा
‐——————————–
स्पष्टिकरण-
इस मंच पर प्रस्तुत विचारों, विश्लेषणों अथवा चर्चाओं का खंडन या आलोचना करते समय केवल निम्न ग्रंथों से प्रमाण, उद्धरण या उदाहरण स्वीकार किए जाएंगे:
चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद)
तेरह मुख्य उपनिषद (ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर, कौशीतकि, मैत्रायणी)
महाभारत
श्रीमद्भगवद्गीता
हरिवंश पुराण
श्रीमद्भागवत पुराण
इनके अतिरिक्त अन्य प्राचीन ग्रंथों, लोक कथाओं, सुभाषित आदि से प्रस्तुत श्लोकों अथवा किसी अनुमानात्मक या अस्पष्ट भाषा जैसे — “अमुक श्लोक में संकेत दिया गया है”, “ऐसा प्रतीत होता है”, या “ऐसी छवि उभरती है” — जैसे तर्कों को मान्यता नहीं दी जाएगी।
सुसंस्कृत भाषा और सम्मानजनक संवाद की अपेक्षा की जाती है। अशिष्ट, अपमानजनक, अथवा धमकीभरी भाषा का प्रयोग करने वालों को तत्काल प्रतिबंधित कर दिया जाएगा।
यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि मेरी आजीविका धार्मिक कार्यों — जैसे प्रवचन, उपदेश, कथा, पूजा-पाठ, सत्संग आदि — पर निर्भर नहीं है, और न ही इन कार्यों से प्राप्त आय का उपयोग विलासितापूर्ण जीवन के लिए करता हूँ। अतः मुझे इन कार्यों से बहिष्कृत होने का कोई भय नहीं है। यही कारण है कि मैं सच लिखने और कहने का साहस रखता हूँ।
आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि चर्चा का स्तर मर्यादित और तर्कसंगत बनाए रखें।
धन्यवाद!

Posted in महाभारत - Mahabharat

श्रीकृष्ण की जीवन गाथा में क्या राधा एक काल्पनिक पात्र हैं?
——
श्रीकृष्ण का चरित्र सनातन धर्म में दिव्यता, कर्म, और ज्ञान का अद्भुत संगम है। उनकी लीलाएं, उनके उपदेश और उनके कार्य, सभी वेदों, उपनिषदों और पुराणों में विस्तार से वर्णित हैं। किंतु जब हम राधा के ऐतिहासिक और शास्त्रीय संदर्भ की पड़ताल करते हैं, तो एक गहन चिंतन उभरकर सामने आता है।

शास्त्रों में राधा का अभाव: एक तथ्यात्मक दृष्टि-

सनातन धर्म के जिन प्राचीन ग्रंथों को श्रीकृष्ण के जीवन का प्रामाणिक स्रोत माना जाता है, जैसे महाभारत, श्रीमद्भगवत महापुराण, हरिवंश पुराण आदि, उनमें राधा का उल्लेख नहीं मिलता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध) में रासलीला का विस्तृत वर्णन है, जिसमें गोपियों संग श्रीकृष्ण के मधुर संबंधों और रासक्रीड़ा का वर्णन तो मिलता है, परंतु राधा के नाम का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं होता। श्लोक कहता है—
रासेन संनादयति यत्र नन्दति गोपीजनः संनादति च यः। (भागवत पुराण, 10.33.11)
यहाँ पर ‘गोपियों’ का उल्लेख हुआ है, किंतु राधा का नाम अनुपस्थित है। यदि राधा का अस्तित्व श्रीकृष्ण के जीवन में इतना महत्वपूर्ण होता, तो क्या भागवत जैसे प्रतिष्ठित ग्रंथ में उनका उल्लेख न किया जाता?
इसी प्रकार, महाभारत जो श्रीकृष्ण के जीवन का संपूर्ण वृत्तांत प्रस्तुत करता है, उसमें भी राधा का कोई स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। (महाभारत, भीष्म पर्व, 67.14)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नाम — देवकीनंदन, गोविंद, वासुदेव आदि उल्लिखित हैं, परंतु राधा का उल्लेख नहीं।
हरिवंश पुराण, जिसमें यदुवंश की वंशावली और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन है, उसमें भी राधा का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता।
राधा का उल्लेख: एक काव्यात्मक कल्पना?
ऐतिहासिक दृष्टि से राधा का चरित्र विशेष रूप से भक्ति आंदोलन के समय, विशेषकर जयदेव के गीत गोविंद (12वीं शताब्दी) में उभरकर सामने आया। गीत गोविंद के श्लोक—
स्मर गरल खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पदपल्लवमुदारम्।
यह श्लोक राधा-कृष्ण के मधुर प्रेम का वर्णन करता है, किंतु यह एक काव्यात्मक और भक्तिपूर्ण रचना है, शास्त्रीय प्रमाण नहीं।

श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप-

श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप हमें भगवद्गीता में दृष्टिगोचर होता है, जहाँ वे कर्म, धर्म और ज्ञान का उपदेश देते हैं। उनका चरित्र केवल प्रेमकथा का नायक नहीं है, बल्कि वे योगेश्वर और सृष्टि के अधिपति हैं। गीता में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (गीता, 4.7)
अर्थात्, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करता हूँ।
श्रीकृष्ण के जीवन में रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि पत्नियों का वर्णन तो श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में मिलता है—
रुक्मिणीं प्रथमां कन्यां गृह्णाति स्म यदुत्तमः। (भागवत पुराण, 10.54.1)
किन्तु राधा का उल्लेख इस आधिकारिक स्वरूप में नहीं मिलता।

अंतिम विचार-

श्रीकृष्ण और राधा का संबंध भले ही भक्ति आंदोलन के दौर में आध्यात्मिक प्रेम के प्रतीक के रूप में स्थापित हुआ हो, किंतु शास्त्रीय दृष्टि से राधा का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट नहीं है। यह संभावना बलवती होती है कि राधा का चरित्र बाद के युगों में काव्य और भक्ति रस को गहराई देने के लिए रचा गया, न कि श्रीकृष्ण के वास्तविक जीवन का हिस्सा था।
अतः यह कहना तर्कसंगत है कि राधा का चरित्र शास्त्रीय सत्य से अधिक भक्तिकालीन कवियों की कोमल कल्पना और काव्य रस का परिणाम है, जो भगवान श्रीकृष्ण के दैवीय स्वरूप की महानता को कम करने का प्रयास ही माना जाएगा।
“श्रीकृष्णं वंदे जगद्गुरुम्।”
~भगवान स्वरूप शर्मा
‐——————————–
स्पष्टिकरण-
इस मंच पर प्रस्तुत विचारों, विश्लेषणों अथवा चर्चाओं का खंडन या आलोचना करते समय केवल निम्न ग्रंथों से प्रमाण, उद्धरण या उदाहरण स्वीकार किए जाएंगे:
चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद)
तेरह मुख्य उपनिषद (ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर, कौशीतकि, मैत्रायणी)
महाभारत
श्रीमद्भगवद्गीता
हरिवंश पुराण
श्रीमद्भागवत पुराण
इनके अतिरिक्त अन्य प्राचीन ग्रंथों, लोक कथाओं, सुभाषित आदि से प्रस्तुत श्लोकों अथवा किसी अनुमानात्मक या अस्पष्ट भाषा जैसे — “अमुक श्लोक में संकेत दिया गया है”, “ऐसा प्रतीत होता है”, या “ऐसी छवि उभरती है” — जैसे तर्कों को मान्यता नहीं दी जाएगी।
सुसंस्कृत भाषा और सम्मानजनक संवाद की अपेक्षा की जाती है। अशिष्ट, अपमानजनक, अथवा धमकीभरी भाषा का प्रयोग करने वालों को तत्काल प्रतिबंधित कर दिया जाएगा।
यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि मेरी आजीविका धार्मिक कार्यों — जैसे प्रवचन, उपदेश, कथा, पूजा-पाठ, सत्संग आदि — पर निर्भर नहीं है, और न ही इन कार्यों से प्राप्त आय का उपयोग विलासितापूर्ण जीवन के लिए करता हूँ। अतः मुझे इन कार्यों से बहिष्कृत होने का कोई भय नहीं है। यही कारण है कि मैं सच लिखने और कहने का साहस रखता हूँ।
आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि चर्चा का स्तर मर्यादित और तर्कसंगत बनाए रखें।
धन्यवाद!

Posted in PM Narendra Modi

प्रधानमंत्री Narendra Modi जी के विरोधी कौन हैं और क्यों.?

🔹नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने अभी तक 80 हज़ार किलोग्राम मादक दवाओं को पकड़ा और नष्ट किया है, जिसका मूल्य 8 लाख करोड़ रुपये है। जिन लोगोंका इतना धन खो गया है, वे मोदी जी से घृणा ही करेंगे।

🔹ईडी (ED) ने भ्रष्ट लोगों से अभी तक 1,20,000 करोड़ रुपयों का काला धन पकड़ा है। जिनका काला धन लुट गया है, वे मोदी से घृणा नहीं तो क्या करेंगे?

🔹मोदी जी ने फ़ाईजर और मॉडर्नो जैसी अमरीकी कम्पनियों से कोरोना वैक्सीन नहीं मँगायी। उन्होंने भारत में ही देशी वैक्सीन बनवायी और इस तरह अमेरिकी कम्पनियों के भारी व्यापार करने की संभावना को नष्ट कर दिया।

🔹मोदी जी योग, आयुर्वेद, पौष्टिक भोजन और रोगों से बचाव पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय दवा लॉबी मोदी जी से घृणा नहीं करेगी, तो क्या करेगी?

🔹मोदी जी ने हथियारों के डीलरों से हथियार ख़रीदना बन्द कर दिया और राफ़ेल को फ़्रांस से सीधे ख़रीदा। मोदी जी ने रक्षा उपकरण भारत में ही बनाना शुरू किया और रक्षा खरीदी कम कर दी। वह महा शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय रक्षा लॉबी मोदी जी से घृणा क्यों नहीं करेगी?

🔹मोदी जी ने मध्य-पूर्व के देशों से महंगा तेल लेना बन्द करके रूस से सस्ता तेल बड़ी मात्रा में लेना शुरू कर दिया। वह मध्य-पूर्व का तेल माफिया मोदी जी से घृणा क्यों नहीं करेगा?

🔹मोदी जी भारत में गहरे तक जड़ जमाये सड़े हुए तंत्र को साफ़ कर रहे हैं। 75 साल से देश का खून चूसने वाले भ्रष्ट लोग मोदी जी के विरुद्ध एक हो गये हैं। वे मोदी जी को रोकने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
जय हिन्द ! वन्दे मातरम् !🇮🇳

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

#जरा_याद_इन्हें_भी_कर_लो

बात फ़रवरी 1963 की है. चीन से लड़ाई ख़त्म होने के तीन महीने बाद एक लद्दाख़ी गड़ेरिया भटकता हुआ चुशूल से रेज़ांग ला जा पहुंचा. एकदम से उसकी निगाह तबाह हुए बंकरों और इस्तेमाल की गई गोलियों के खोलों पर पड़ी. वो और पास गया तो उसने देखा कि वहाँ चारों तरफ़ लाशें ही लाशें पड़ी थीं…. वर्दी वाले सैनिकों की लाशें.

जानीमानी सैनिक इतिहासकार और भारतीय सेना के परमवीर चक्र विजेताओं पर मशहूर किताब ‘द ब्रेव’ लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, ‘वो गड़ेरिया भागता हुआ नीचे आया और उसने भारतीय सेना की एक चौकी पर इसकी सूचना दी. जब सैनिक वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हर मृत भारतीय सैनिक के शरीर पर गोलियों के कई-कई ज़ख्म थे. कई अभी भी अपनी राइफ़लें थामे हुए थे. नर्सिंग असिस्टेंट के हाथ में सिरिंज और पट्टी का गोला था.”

उन्होंने कहा, “किसी की राइफ़ल टूट कर उड़ चुकी थी, लेकिन उसका बट उसके हाथों में ही था. हुआ ये था कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद वहाँ भारी हिमपात हो गया और उस इलाके को ‘नो मैन्स लैंड’ घोषित कर दिया गया. इसलिए वहाँ कोई जा नहीं पाया.”

रचना बिष्ट अपनी किताब में लिखती है ..,”लोगों को इनके बारे में पता ही नहीं था कि इन 113 लोगों के साथ हुआ क्या था. लोगों को यहाँ तक अंदेशा था कि वो युद्धबंदी बन गए हैं. तब तक इनके नाम के आगे एक तरह का बट्टा लग गया था. उनको कायर क़रार कर दिया गया था. उनके बारे में मशहूर हो गया था कि वो डर कर लड़ाई से भाग गए थे.”

वो लिखती  हैं, “दो तीन लोग जो बच कर आए उनका लोगों ने हुक्का-पानी बंद कर दिया था. यहाँ तक कि उनके बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया. एक एनजीओ को बहुत बड़ा अभियान चलाना पड़ा कि वास्तव में ये लोग हीरो थे, कायर नहीं थे.”

1962 में 13 कुमाऊँ  रेजिमेंट को चुशूल हवाईपट्टी की रक्षा के लिए भेजा गया था. उसके अधिकतर जवान हरियाणा से थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी बर्फ़ गिरते देखी ही नहीं थी. उन्हें दो दिन के नोटिस पर जम्मू कश्मीर के बारामूला से वहाँ लाया गया था. उन्हें ऊँचाई और सर्दी में ढ़लने का मौका ही नहीं मिल पाया था. उनके पास शून्य से कई डिग्री कम तापमान की सर्दी के लिए न तो ढ़ंग के कपड़े थे और न जूते. उन्हें पहनने के लिए जर्सियाँ, सूती पतलूनें और हल्के कोट दिए गए थे.
इस मोर्चे को मेजर शैतान सिंह कमांड कर रहे थे .

मेजर शैतान सिंह ने अपने जवानों को पहाड़ी के सामने की ढलान पर तैनात कर दिया था. 18 नवंबर, 1962 को रविवार का दिन था. ठंड रोज़ की बनिस्बत कुछ ज़्यादा पड़ रही थी और रेज़ांग ला में बर्फ़ भी गिर रही थी.

उस लड़ाई में ज़िंदा बच निकलने वाले ऑनरेरी कैप्टेन सूबेदार राम चंद्र यादव जो आजकल रेवाड़ी में रहते हैं, याद करते हैं, “तड़के साढ़े तीन बजे अचानक एक लंबा बर्स्ट आया ड-ड-ड-ड-ड. पूरा पहाड़ी इलाका उसके शोर से गूंज गया. मैंने मेजर शैतान सिंह को बताया कि 8 प्लाटून के सामने से फ़ायर आया है. चार मिनट बाद हरि राम का फ़ोन आया कि 8-10 चीनी सिपाही हमारी तरफ़ बढ़ रहे थे.”

वो कहते हैं, “जैसे ही वो हमारी रेंज में आए, हमारे जवानों ने लंबा बर्स्ट फ़ायर किया है. उस में चार-पांच चीनी तो उसी समय ख़त्म हो गए और बाकी वापस भाग गए. इसके बाद मैंने अपनी लाइट मशीन गन को मोर्चे के अंदर वापस बुला लिया है. ये सुन कर मेजर साहब ने कहा कि जिस समय का हमें इंतज़ार था, वो आ पहुंचा है. हरि राम ने कहा आप चिंता मत करिए. हम सब जवान तैयार हैं. हमने मोर्चा पकड़ लिया है.”

7 पलटन के जमादार सुरजा राम ने अपने कंपनी कमांडर को इत्तला दी कि चीन के क़रीब 400 सैनिक उनकी पोस्ट की तरफ़ बढ़ रहे हैं. तभी 8 पलटन ने भी रिपोर्ट किया कि रिज की तरफ़ से करीब 800 चीनी सैनिक भी उनकी तरफ़ बढ़ रहे हैं.

सूबेदार राम चंद्र यादव बताते हैं, “जब चीनी 300 गज़ की रेंज में आए तो हमने उन पर फ़ायर खोल दिया. क़रीब 10 मिनट तक भारी फ़ायरिंग होती रही. मेजर शैतान सिंह बार बार बाहर निकल जाते थे. मैं उन्हें आगाह कर रहा था कि बाहर मत जाइए क्योंकि कोई भरोसा नहीं कि चीनियों की कब ‘शेलिंग’ आ जाए.”

वो कहते हैं, “सुरजा राम ने रेडियो पर बताया कि हमने चीनियों को वापस भगा दिया है. हमारे सारे जवान सुरक्षित हैं. उन्हें कोई चोट नहीं लगी है. हम ऊँचाई पर थे और चीनी नीचे से आ रहे थे. ये बात हो ही रही थी कि चीनियों का पहला गोला हमारे बंकर पर आ कर गिरा. मेजर शैतान सिंह ने फ़ौरन फ़ायरिंग रुकवा दी. फिर उन्होंने 3 इंच मोर्टार चलाने वालों को कोडवर्ड में आदेश दिया ‘टारगेट तोता.’ हमारे मोर्टार के गोलों से चीनी घबरा गए और ये हमला भी नाकाम हो गया.”

जब चीनियों द्वारा सामने से किए गए सारे हमले नाकामयाब हो गए तो उन्होंने अपनी योजना बदल डाली. सुबह साढ़े चार बजे उन्होंने सभी चौकियों पर एक साथ गोले बरसाने शुरू कर दिए. 15 मिनट में सब कुछ ख़त्म हो गया. हर तरफ़ मौत और तबाही का मंज़र था.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, “पहला हमला उन्होंने नाकामयाब कर दिया था. ढलान के इधर-उधर चीनियों की लाशें पड़ी हुई थीं जो उन्हें ऊपर से दिखाई दे रही थीं. लेकिन फिर चीनियों ने मोर्टर फ़ायरिंग शुरू कर दी. ये हमला 15 मिनट तक चला होगा.”

वो लिखती  हैं, “भारतीय जवानों के पास सिर्फ़ लाइट मशीन गन्स और .303 की राइफ़ले थीं जो कि ‘सिंगिल लोड’ थी. यानी हर गोली चलाने के बाद उन्हें फिर से ‘लोड’ करना पड़ता था. इतनी सर्दी थी कि जवानों की उंगलियाँ जम गई थीं.”

उन्होंने बताया, “15 मिनट के अंदर चीनियों ने भारतीय बंकरों में बरबादी फैला दी. उनके बंकर उजड़ गए. तंबुओं में आग लग गईं और जवानों के शरीरों के अंग कट कर इधर उधर जा गिरे. मगर इसके बाद भी मेजर शैतान सिंह अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे. जब धुँआ छंटा तो जवानों ने देखा कि ‘रिज’ के ऊपर हथियारों से लदे याक और घोड़े चले आ रहे हैं. कुछ क्षणों के लिए जवानों ने सोचा कि उन्हीं की अल्फ़ा कंपनी उनके बचाव के लिए आ रही है. वो बहुत खुश हुए पर जब उन्होंने दूरबीन लगा कर ग़ौर से देखा तो वो चीनी सैनिक निकले. तब चीनियों का तीसरा हमला शुरू हुआ और उन्होंने आ कर एक-एक सैनिक को मार दिया.”

इस बीच मेजर शैतान सिंह की बाँह में ‘शेल’ का एक टुकड़ा आ कर लगा. उन्होंने पट्टी करवा कर अपने सैनिकों का नेतृत्व करना जारी रखा. वो ‘रिज’ पर थे तभी उनके पेट पर एक पूरा ‘बर्स्ट’ लगा. हरफूल ने लाइट मशीन गन से चीन के उस सैनिक पर फ़ायर किया जिसने शैतान सिंह पर गोली चलाई थी.

हरफूल को भी गोली लगी और उन्होंने गिरते हुए रामचंद्र से कहा कि मेजर साब को दुश्मन के हाथों मत लगने देना. मेजर शैतान सिंह अत्यधिक ख़ून बह जाने के कारण बार बार बेहोशी की हालत में चले जा रहे थे.
सूबेदार राम चंद्र यादव इस मुश्किल समय में उनके साथ थे और उन चंद लोगों में से एक हैं जिन्होंने उन्हें ज़िंदा देखा था.

यादव याद करते हैं, “मेजर साब ने मुझसे कहा रामचंद्र मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है. मेरी बेल्ट खोल दो. मैंने उनकी कमीज़ में हाथ डाला. उनकी सारी आंतें बाहर आ गई थीं. मैंने उनकी बेल्ट नहीं खोली, क्योंकि अगर मैं ऐसा करता तो सब कुछ बाहर आ जाता. इस बीच लगातार फ़ायरिंग हो रही थी. बेहोश हो गए मेजर शैतान सिंह को फिर होश आया.”

यादव कहते हैं, “उन्होंने टूटती सांसों से कहा मेरा एक कहना मान लो. तुम बटालियन में चले जाओ और सब को बताओ कि कंपनी इस तरह लड़ी है. मैं यहीं मरना चाहता हूँ. ठीक सवा आठ बजे मेजर साब के प्राण निकले.”

वो याद करते हैं, “इस बीच मैंने देखा कि चीनी सैनिक हमारे बंकरों में घुस रहे हैं और 13 कुमाऊँ के सैनिकों और चीनियों के बीच हाथों से लड़ाई हो रही है. हमारे एक साथी सिग्राम ने गोलियाँ ख़त्म हो जाने के बाद चीनियों को एक दूसरे के सिर लड़ा कर मारा. एक चीनी को उसने पैर पकड़ कर चट्टान पर दे मारा. इसके बाद 7 प्लाटून का एक सिपाही भी ज़िंदा नहीं बचा और न ही कैद हुआ.”
रेज़ांग ला की लड़ाई को भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक माना जाता है, जब एक इलाके का रक्षण करते हुए लगभग सभी जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी.

रचना बिष्ट रावत बताती हैं, “रेज़ांग ला की लड़ाई इसलिए बड़ी लड़ाई थी क्योंकि 13 कुमाऊँ के जवानों को जो आदेश मिले थे, उन्होंने उसे आख़िरी दम तक पूरा किया. उनको उनके ब्रिगेडियर टीएन रैना (जो बाद में थलसेनाध्यक्ष बने) ने लिखित आदेश दिया था कि उन्हें आख़िरी जवान और आख़िरी गोली तक लड़ते रहना है. उन्होंने इस आदेश का अक्षरश: पालन किया. “

वो कहती हैं, “सिर्फ़ 124 जवान वहाँ तैनात थे. क़रीब एक हज़ार की संख्या में चीनियों ने उन पर हमला किया था. 114 जवान वहाँ मारे गए. पांच को युद्धबंदी बना लिया गया. उनमें से एक की मौत हिरासत में हुई. जब मैं इस विषय पर शोध कर रही थी तो मैंने 13 कुमाऊँ से उस लड़ाई में मरने वाले सैनिकों के नाम मांगे, तो उन से मेरे लैप-टॉप की तीन शीट्स भर गईं. ये सोच कर मेरी आँखें भर आईं कि कितने लोगों ने इस लड़ाई में अपनी ज़िंदगी की शहादत दी थी. ये लड़ाई सुबह साढ़े तीन बजे शुरू हुई थी और सवा आठ बजे ख़त्म हो गई थी पर मुख्य लड़ाई आख़िरी घंटे में ही हुई थी.”

सूबेदार रामचंद्र यादव कहते हैं, “अगर ये चार्ली कंपनी शहीद नहीं हुई होती तो लेह, करगिल, जम्मू कश्मीर सब ख़तरे में पड़ जाते. इसी ने रोका चीनियों को. जब उनका इतना नुकसान हो गया तो उसने खुद युद्ध-विराम किया. हमने युद्ध-विराम नहीं करवाया था.”

(रचना बिस्ट की पुस्तक “The Brave ” का  एक अंश )