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अंकित सक्सेना याद है ?

जिसका गला उसकी मुस्लिम गर्लफ्रेंड के पिता, मां, भाई और चाचा ने काटा था।

अपने बेटे की मौत के लिए कट्टरपंथी इस्लाम को उजागर करने के बजाय, अंकित के पिता ने मुसलमानों के लिए इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था।

शेखुलर हिंदू, हिंदू धर्म के लिए इस्लाम और ईसाई धर्म से भी बड़ा खतरा हैं।

जैसा कि वीर सावरकर ने कहा था, “मैं मुसलमानों से नहीं डरता। मैं अंग्रेजों से नहीं डरता। मैं हिंदू धर्म के खिलाफ हिंदुओं से डरता हूं।

अंकित सक्सेना जैसे शेखुलर हिंदू और उनका शेखुलर परिवार हिंदुओं के लिए किसी इस्लामी आतंकवादी या धर्मांतरण के लिए भारत में लाखों डॉलर खर्च करने वाले अमेरिकी ईसाई मिशनरी से भी अधिक खतरा है।

अंकित शेखुलरिज़्म में इतना डूबा हुआ था कि उसने मुस्लिम टोपी पहनना शुरू कर दिया, मुस्लिम ‘दोस्तों’ के साथ घुलने-मिलने लगा और शहजादी नाम की एक मुस्लिम लड़की से प्यार करने लगा।

लड़की के परिवार ने उसे बेरहमी से मार डाला। प्रेमिका के पिता, मां, चाचा और 14 वर्षीय भाई ने दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर हजारों लोगों के सामने उसका गला रेत दिया।

जब उसकी प्रेमिका की मां शहनाज बेगम उसे चाकू मार रही थी, तो वह गिड़गिड़ा रहा था: “आंटी, मैंने कुछ नहीं किया… मैं आपकी बेटी को कहीं नहीं ले गया।”

कट्टरपंथी परिवार ने जरा भी दया नहीं दिखाई। उन्होंने कसाई के चाकू से अंकित का गला रेत दिया। योजना इतनी सोची-समझी थी और हमला इतना हिंसक था कि अंकित की मौत सिर्फ 3 सेकंड में हो गई।

अंकित के पिता यशपाल, जिन्होंने यह सब देखा था, अपने बेटे के शव को अस्पताल ले गए, इस उम्मीद में कि शायद उसके जीवित होने की थोड़ी सी भी संभावना है।

अगर सिर्फ़ हत्या ही मकसद होता तो शहज़ादी का परिवार उसे चुपके से मार देता।

लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसा किया ताकि हिंदुओं को यह संदेश दिया जा सके कि हमारी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ मत करो।

अंकित की हत्या सिर्फ़ इसलिए कर दी गई क्योंकि वह हिंदू था, फिर भी यशपाल ने कहा: “हां, मेरे बेटे को मारने वाले मुसलमान थे…

लेकिन हर मुसलमान को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए मेरा इस्तेमाल न करें, मुझे इसमें न घसीटें… मैं सभी से अपील करता हूं कि इसे धर्म से न जोड़ें और माहौल को खराब न करें।”

यशपाल को बाद में मुस्लिम और शेखुलर समूहों के साथ सार्वजनिक बैठकों में शेखुलरिज्म के “महत्व” पर जोर देते हुए देखा गया। उनकी इफ्तार पार्टी एक शर्मनाक घटना थी जिसमें उनके बेटे की मौत का मजाक उड़ाया गया था।

एक मधुमक्खी भी,जिसका मस्तिष्क सुई की नोक के आकार का होता है, अपने छत्ते पर आने वाले खतरों को भांप सकती है और तुरंत निवारक उपाय कर सकती है।

लेकिन एक शेखुलर व्यक्ति का मस्तिष्क रेगिस्तानी पंथों द्वारा उत्पन्न खतरे को देखने में असमर्थ है।

और यही कारण है कि प्राचीन रोम में, शुरुआती ईसाई कट्टरपंथियों ने धर्मांतरण के लिए मानसिक रूप से विकलांग, भिखारियों और बच्चों को निशाना बनाया।

यह कभी न भूलें कि भारत में मुसलमान और ईसाई, हिंदुओं पर इसलिए हमला करते हैं क्योंकि उन्हें शेखुलर हिंदुओं का समर्थन प्राप्त है।
ऊपर से एनजीओ, अदालतें, मीडिया और सरकारें – ये सभी ईमानदार, मेहनती, टैक्स देने वाले हिंदुओं को अपना बचाव करने से रोकते हैं।

1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने अवैध रूप से संविधान में धर्मनिरपेक्षता को शामिल किया था। यह भारत में इस्लाम और ईसाई धर्म की ढाल है। संविधान से धर्मनिरपेक्षता को मिटाना जरूरी है।

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*ભારતના બીજા એક ભયંકર દેશદ્રોહીની વાત જેણે એક જ દિવસમાં દસ હજાર દલિતોને મારી નાખ્યા.*

મિત્રો!  CAAના જન્મથી જ એક નામ ખૂબ જ ઝડપથી ઉભરી આવ્યું છે, આ માટે ભાજપના ઘણા નેતાઓએ જોગેન્દ્રનાથ મંડલનું નામ લીધુ.

જોગેન્દ્રનાથ મંડલનો જન્મ 1904માં બંગાળના બરીસલ જિલ્લાના મૈસ્કડીના એક દલિત પરિવારમાં થયો હતો.

મંડલ 1939-40 સુધી કોંગ્રેસના ટોચના નેતૃત્વની નજીક આવ્યા હતા, પરંતુ થોડા સમય પછી તેઓ કોંગ્રેસ છોડીને મુસ્લિમ લીગ પાર્ટીમાં જોડાયા હતા, કારણ કે મંડલ અખંડ ભારતના ખૂબ મોટા દલિત નેતા હતા,

  દલિતો + મુસ્લિમોના ગઠબંધનને કારણે આજે જેઓ દલિતોના સ્વ-ઘોષિત નેતાઓ છે તેઓને એક વાર મંડલ વાંચવું જોઈએ અને તે મંડલનો ઉપયોગ માત્ર દલિતોના નેતાઓમાં જ થયો છે.

તેથી જ જિન્નાએ માંડલને પોતાના હાથમાં લીધા, કારણ કે જિન્નાહ જાણતા હતા કે દલિતોના સમર્થન વિના પાકિસ્તાનનું નિર્માણ થઈ શકે નહીં.

મિત્રો જોગેન્દ્રનાથ મંડલ ઝીણા સાથે મળીને તેમણે પાકિસ્તાનની રચનાની વાત શરૂ કરી, અને દલિતોને કહેવાનું શરૂ કર્યું કે દલિતો અને મુસ્લિમો માટે અલગ દેશ હશે.  જ્યાં આપણી સારી રીતે કાળજી લેવામાં આવશે, આપણા નવા દેશ પાકિસ્તાનની રચના પછી આપણે બધા દલિત ભાઈઓ ભારત છોડીને પાકિસ્તાન જઈશું અને ત્યાં ખૂબ જ આરામથી રહીશું.

જોગેન્દ્રનાથ મંડલે પોતાની શક્તિથી આસામનું વિઘટન કર્યું, આ 1947ની વાત છે.  3 જૂન, 1947ની ઘોષણા પછી, આસામના અસલહતને જનમત દ્વારા નક્કી કરવાનું હતું કે તે પાકિસ્તાનનો ભાગ બનશે કે ભારતનો, તે વિસ્તારમાં હિન્દુઓ અને મુસ્લિમોની સંખ્યા સમાન હતી.

જનમતમાં હિંદુઓ નિર્ણાયક હોત તો તે ભાગ ભારત પાસે જ રહેતો પરંતુ જિન્નાએ મંડલને આસામ મોકલીને તમામ દલિતોને પાકિસ્તાનની તરફેણમાં વોટ આપવાનું કહ્યું, એવું જ થયું કે મંડલના એક ઈશારે દલિતોએ પાકિસ્તાનની તરફેણમાં મતદાન કર્યું કારણ કે આ રીતે બાંગ્લાદેશમાં હિંદુઓ બહુમતી છે ઉત્સાહ, જિન્નાહ સાથે મળીને મંડલે પાકિસ્તાન બનાવ્યું અને  ભારતને અલવિદા કહ્યું અને લાખો દલિતો સાથે પાકિસ્તાન ગયા.

હવે જોગેન્દ્રનાથ મંડલની કહેવાતી સહાનુભૂતિનો ભ્રમ 20 ફેબ્રુઆરી, 1950 ના રોજ પાકિસ્તાનમાં 10,000 (દસ હજાર) થી વધુ દલિતોની હત્યા કરવામાં આવી ત્યારે મંડલને તેમની ભૂલનો સંપૂર્ણ ભાન થયું અને જોગેન્દ્રનાથ મંડલે રાજીનામું આપ્યું.

જિન્નાના મૃત્યુ પછી, મંડલે એક લાંબો અને વિગતવાર રાજીનામું પત્ર લખ્યો, જેમાં તેણે દલિતો પર થઈ રહેલા ભયંકર અત્યાચારનો ઉલ્લેખ કર્યો અને પાકિસ્તાન સરકાર બંધ આંખે બધું જોતી રહી આખરે, 1950 માં, જોગેન્દ્રનાથ મંડલે ભારતમાં શરણ લીધી.

લાખો દલિતોને મૃત્યુની અણી પર છોડીને જોગન્દ્રનાથ મંડલ એક શરણાર્થી તરીકે ભારત આવ્યા અને ગુમનામીમાં રહેવા લાગ્યા, કદાચ તેમને પોતાના કૃત્યથી શરમ આવી હતી.

એ જ દલિત હિંદુઓ ધીરે ધીરે શરણાર્થીઓ તરીકે ભારતમાં આવવા લાગ્યા, મોદી સરકારે CAA પર નવો કાયદો બનાવ્યો, પરંતુ દુખની વાત એ છે કે જેઓ પોતાને દલિતોના મહાન શુભચિંતક ગણાવે છે તેઓ પોતે જ આ કાયદાનો વિરોધ કરી રહ્યા છે.

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45 वर्षीय दीवान की नौकरी छुट गई थी,

बॉस ने जलील करके ऑफिस से निकाल दिया था।

पिछले बारह महीनों में तीसरी बार उसे नौकरी से निकाला गया था रात हो चुकी थी। वह बाजार मे पेड़ के नीचे रखी एक बेंच पर बैठा था।

घर जाने का उसका जरा भी मन नही था।

बेंच पर बैठा वह अपने दोस्तों को बार बार फोन मिला रहा था।

उनसे रिक्वेस्ट कर रहा था कि कही जगह खाली हो तो बता दे उसे तुरंत नौकरी की जरूरत है।

दीवान कामचोर नही था।

मगर बढ़ते कम्प्युटर के इस्तेमाल ने उसे कमजोर बना दिया था।

हालांकि उसने कम्प्युटर चलाना भी सीख लिया था मगर नये लड़कों जितना कम्प्युटर उसे नही चलाना आता था। इस कारण उससे गलतियाँ हो जाती थी।

रात के दस बजे वह हताश और निराश सा घर पहुंचा।

अंदर प्रवेश करते ही बीवी चिल्लाई “कहाँ थे इतनी रात तक? किस औरत के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे थे? तुमको शर्म भी नही आती क्या? घर मे जवान बेटा और बेटी बैठे हैं। उनकी शादी की उम्र निकलती जा रही है। कब होश आयेगा तुम्हे? अगर इनकी जिम्मेदारी नही निभानी थी तो पैदा ही क्यों किया था? “

दीवान कुछ भी नही बोला। पत्नी की रोज रोज की चिक चिक का उसने जवाब देना छोड़ दिया था। अभी वह बाहर रखी टंकी से लगे नल से हाथ मुँह धो रहा था कि बेटी दौड़ते उसके पास आई आते ही बोली ” पापा आप मेरे लिए मोबाइल लाए क्या? दीवान ने बेटी को भी कोई जवाब नही दिया। “

बेटी फिर से बोली ” पापा आप जवाब क्यों नही देते ? सुबह तो आप पक्का प्रोमिस करके गए थे कि रात को लौटते समय मेरे लिए मोबाइल लेकर ही आएंगे।” दीवान चुप ही रहा।

वह जवाब देता तो क्या देता? बेटी के मोबाइल के लिए एडवांस मांगने पर ही बॉस ने उसे नौकरी से निकाल दिया था।

बेटी अपने हाथ मे पकड़े पुराने फोन को दिखाते हुए बोली “आपको क्या लगता है पापा? मै झूठ बोल रही हूँ?

देखो ये मोबाइल सचमुच खराब हो गया है। ऑन करते ही हैंग हो जाता है। “

दीवान चुप था। वह अपनी नौकरी जाने की खबर भी किसी को नही बताना चाहता था। क्योंकि वह जानता था अगर ये बात बताई तो बेटा, बेटी और पत्नी सभी उसके पीछे पड़ जाएंगे। उसे कोसने लगेंगें कि वह ढंग से काम नही करता । इसीलिए हर चौथे महीने नौकरी से निकाल दिया जाता है।

हाथ मुँह धोने के बाद वह सीधा अपने कमरे मे गया।

जहाँ बैड पर पसरी पत्नी मोबाइल चला रही थी।

जिसकी आँखे मोबाइल स्क्रीन पर थी और कान घर मे हो रही बातों को सुन रहे थे।

ज्यों ही दीवान ने कमरे मे कदम रखा वह चिल्लाई “जवाब क्यों नही देते?

बहरे हो गए क्या?

बेटी को मोबाइल क्यों नही लाकर दिया? “

वह दबी दबी आवाज मे बोला ” पैसे हाथ मे नही आये। जब पैसे मिलेंगे तब ला दूंगा? पत्नी बोली ” हाथ मे नही थे तो किसी से उधार ले लेते? तुम जानते हो ना वह कम्पिटिशन की तैयारी कर रही है। बिना मोबाइल के कैसे पढेगी? ” “

दीवान के पास जवाब देने को बहुत

कुछ था। मगर अब उसने चुप

रहना सीख लिया था।

वह रसोई मे चला आया।

खुद ही थाली निकाली। फिर खाना खाने लगा।

दिवान की बेटी 22 साल की हो चुकी थी। बेटा 24 साल का हो चुका था। दोनों पढाई मे कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते थे। इस कारण कम्पिटिशन मे निकलने का सवाल ही पैदा नही होता था।

अभी दीवान ने खाना खत्म नही किया था कि उसका बेटा घर से बाहर से गाना गुनगुनाता हुआ सीधा रसोई मे आया।

मगर दीवान को वहाँ खाना खाते देखकर अपने कमरे मे चला गया।

दीवान ने नोटिस किया कि उसके कदम बहक रहे थे।

जरूर यार दोस्तों के साथ बैठ कर पीकर आया था।

शुरू शुरू मे जब बेटा पीकर घर आता था। तब दीवान उसे बहुत डांटा करता था।

मगर एक दिन बेटा सामने बोल गया। दीवान को ज्यादा गुस्सा आ गया था।

इस कारण उसने बेटे को थप्पड़ लगाना चाहा। तब बेटे ने उसका हाथ पकड़ लिया था और गुस्से मे उसे आँख दिखाने लगा था।

उस दिन के बाद दीवान ने बेटे से कुछ भी कहना छोड़ दिया था।

वह खाना खाकर वापस कमरे मे आया तब पत्नी की किच पिच फिर से शुरू हो गई थी। मगर वह चुपचाप सो गया।

सुबह जलदी उठकर वह काम की तलाश मे निकल गया।

वह जानता था बिना काम किये सबकुछ बिखर जाएगा। घर खर्च चलाना था। बच्चों की पढाई की जरूरते पूरी करनी थी। उनकी शादी भी करनी थी।

शाम तक वह भूखा प्यासा दफ्तरों के चक्कर लगाता रहा।

खाना नही खाने से शरीर की शुगर लो हो गई थी।

शरीर मे सुन्न सी आई हुई थी।

वह सोचते हुए चल रहा था।

पता नही कब चलते चलते वह फुटपाथ से मुख्य सड़क पर आ गया।

तेज दौड़ता हुआ ट्रोला उसके ऊपर से निकल गया। दीवान को तड़पने का मौका भी नही मिला।

सड़क पर ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

दीवान के बेटे- बेटी और पत्नी ने रोते बिलखते हुए उसका अंतिम संस्कार किया।

उसके जाने के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था।

जिन लोगों से उधार पैसे ले रखे थे वे रोज घर का चक्कर लगाने लगे थे।

रिश्तेदारों ने फोन उठाने बन्द कर दिये थे।

घर का वाईफाई का कनेक्शन कट चुका था। अचानक से घर मे नेट चलना बंद हो गया था।

बेटी और बेटा अब खाने मे कमी नही निकालते थे। जो भी मिल जाता खाकर पानी पी लेते थे।

बेटे की आजादी खत्म हो गई थी।

अब वह एक कपड़े की दुकान मे 7 हजार रुपये महीने की नौकरी करने लगा था।

बेटी भी एक प्राइवेट स्कूल मे 5000 हजार रुपये महीने की नौकरी करने लगी।

पत्नी के लिए सबकुछ बदल चुका था। माथे का सिंदूर मिटते ही उससे सजने संवरने का अधिकार छीन लिया गया था। अब वह घंटो शीशे के सामने खड़ी नही होती थी।

पति को देखते ही किच किच शुरू कर दिया करती थी। अब उसकी आवाज सुनने को तरस गई थी।

पति जब जिंदा था वह निश्चिंत होकर सोया करती थी।

मगर उसके गुजरने के बाद एक छोटी सी आवाज भी उसे डरा देती थी।

रात भर नींद के लिए तरसती रहती थी।

उसके गुजरने के बाद पूरे परिवार को पता चल गया था कि वो उनके लिए बहुत कुछ था। वो सुख चैन था। वो नींद था। वो रोटी था, कपड़ा था, मकान था। वो पूरा बाजार था। वो ख्वाहिशों का आधार था मगर उसकी वैल्यू उसके जीते जी उन्हे पता नही थी। बाप की कदर किया करो।💯🙏🏻

अगर वो गुजर गया तो अंधेरा छा जाएगा।💯✍🏻

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लाओत्से गुजर रहा है एक पहाड़ से। और सारा जंगल काटा जा रहा है।  यह बड़ी प्रीतिकर कथा है‌ और बहुत  बार मैंने कही है।
सिर्फ एक वृक्ष नहीं काटा जा रहा है। तो लाओत्से अपने शिष्यों को कहता है कि जाओ,  जरा पूछो इन काटने वालों से,
इस वृक्ष को क्यों नहीं काटते हो?तो वे गए, उन्होंने पूछा।
उन्होंने कहा, यह वृक्ष बिलकुल बेकार है।  इसकी सब शाखाएं टेढ़ी-मेढ़ी हैं। तो कुछ बन नहीं सकता।  दरवाजे नहीं बन सकते, मेज नहीं बन सकती, कुर्सी नहीं बन सकती।  और यह वृक्ष ऐसा है कि अगर इसे जलाओ  तो धुआं ही धुआं होता है; आग जलती नहीं। इसके पत्ते किसी काम के नहीं;  कोई जानवर खाने को राजी नहीं।  इसलिए इसे कैसे काटें?  तो सारा जंगल कट रहा है, यह भर बच रहा है। लाओत्से के पास जब शिष्य आए तो लाओत्से ने कहा, इस वृक्ष की भांति हो जाता है ताओ को उपलब्ध व्यक्ति।  देखो, यह वृक्ष कट नहीं सकता,
क्योंकि वस्तुतः यह सम्मान पाने को उत्सुक नहीं है।  एक लकड़ी सीधी नहीं है;  सम्मान की आकांक्षा होती तो कुछ तो सीधा रखता।  सब इरछा-तिरछा है। इस वृक्ष को दूसरों को प्रभावित करने की उत्सुकता नहीं है; नहीं तो धुआं ही धुआं छोड़ता?इस वृक्ष को जानवरों तक को अनुयायी बनाने का रस नहीं है; नहीं तो कम से कम पत्तों में कुछ तो स्वाद भरता।
लेकिन देखो, यही भर नहीं कट रहा है; बाकी सब कट रहे हैं।
सीधा होने की कोशिश करोगे, काटे जाओगे, लाओत्से ने कहा।
तुम्हारा फर्नीचर बनेगा।  सिंहासन में लगते हो कि साधारण क्लर्क की कुर्सी में लगते हो, यह और बात है; लेकिन फर्नीचर तुम्हारा बनेगा। और जो तुम्हें फर्नीचर बनाने को उत्सुक हैं,
वे तुमको समझाएंगे कि सीधे रहो, नहीं तो बेकार साबित हो जाओगे। अगर तुमने उनकी मानी, तो तुम कहीं ईंधन बन कर जलोगे।सब ईंधन बन कर जल रहे हैं। लोगों से पूछो, क्या कर रहे हो?  वे कह रहे हैं, हम बच्चों के लिए जी रहे हैं।
उनके बाप उनके लिए जी रहे थे। उनके बच्चे उनके बच्चों के लिए जीएंगे। तुम ईंधन हो? तुम किसी और के लिए जल रहे हो?लाओत्से ने कहा, छोड़ो फिकर।  ईंधन मत बनना। और लाओत्से ने कहा कि देखो, इस वृक्ष के नीचे एक हजार बैलगाड़ियां ठहर सकती हैं। यह वृक्ष किसी को बुलाता नहीं,
लेकिन इसकी घनी छाया, हजारों लोग इसके नीचे रुकते हैं।
बिलकुल बेकार है; पर हजारों थके हुए विश्राम पा लेते हैं।
यह वृक्ष कोई उन्हें छाया देना चाहता है, ऐसा भी नहीं। इस वृक्ष ने तो एक ही नियम बना रखा है मालूम होता है कि जो नैसर्गिक है, उसमें ही रहूंगा, कुछ गड़बड़ नहीं करूंगा। ताओ को उपलब्ध व्यक्ति ऐसा ही हो जाता है। हजारों लोग उसके नीचे छाया पाते हैं। वह छाया देता नहीं, छाया उसके नीचे होती है।

-ताओ उपनिषाद (भाग-3) प्रवचन–59

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लाओत्से गुजर रहा है एक पहाड़ से। और सारा जंगल काटा जा रहा है।  यह बड़ी प्रीतिकर कथा है‌ और बहुत  बार मैंने कही है।
सिर्फ एक वृक्ष नहीं काटा जा रहा है। तो लाओत्से अपने शिष्यों को कहता है कि जाओ,  जरा पूछो इन काटने वालों से,
इस वृक्ष को क्यों नहीं काटते हो?तो वे गए, उन्होंने पूछा।
उन्होंने कहा, यह वृक्ष बिलकुल बेकार है।  इसकी सब शाखाएं टेढ़ी-मेढ़ी हैं। तो कुछ बन नहीं सकता।  दरवाजे नहीं बन सकते, मेज नहीं बन सकती, कुर्सी नहीं बन सकती।  और यह वृक्ष ऐसा है कि अगर इसे जलाओ  तो धुआं ही धुआं होता है; आग जलती नहीं। इसके पत्ते किसी काम के नहीं;  कोई जानवर खाने को राजी नहीं।  इसलिए इसे कैसे काटें?  तो सारा जंगल कट रहा है, यह भर बच रहा है। लाओत्से के पास जब शिष्य आए तो लाओत्से ने कहा, इस वृक्ष की भांति हो जाता है ताओ को उपलब्ध व्यक्ति।  देखो, यह वृक्ष कट नहीं सकता,
क्योंकि वस्तुतः यह सम्मान पाने को उत्सुक नहीं है।  एक लकड़ी सीधी नहीं है;  सम्मान की आकांक्षा होती तो कुछ तो सीधा रखता।  सब इरछा-तिरछा है। इस वृक्ष को दूसरों को प्रभावित करने की उत्सुकता नहीं है; नहीं तो धुआं ही धुआं छोड़ता?इस वृक्ष को जानवरों तक को अनुयायी बनाने का रस नहीं है; नहीं तो कम से कम पत्तों में कुछ तो स्वाद भरता।
लेकिन देखो, यही भर नहीं कट रहा है; बाकी सब कट रहे हैं।
सीधा होने की कोशिश करोगे, काटे जाओगे, लाओत्से ने कहा।
तुम्हारा फर्नीचर बनेगा।  सिंहासन में लगते हो कि साधारण क्लर्क की कुर्सी में लगते हो, यह और बात है; लेकिन फर्नीचर तुम्हारा बनेगा। और जो तुम्हें फर्नीचर बनाने को उत्सुक हैं,
वे तुमको समझाएंगे कि सीधे रहो, नहीं तो बेकार साबित हो जाओगे। अगर तुमने उनकी मानी, तो तुम कहीं ईंधन बन कर जलोगे।सब ईंधन बन कर जल रहे हैं। लोगों से पूछो, क्या कर रहे हो?  वे कह रहे हैं, हम बच्चों के लिए जी रहे हैं।
उनके बाप उनके लिए जी रहे थे। उनके बच्चे उनके बच्चों के लिए जीएंगे। तुम ईंधन हो? तुम किसी और के लिए जल रहे हो?लाओत्से ने कहा, छोड़ो फिकर।  ईंधन मत बनना। और लाओत्से ने कहा कि देखो, इस वृक्ष के नीचे एक हजार बैलगाड़ियां ठहर सकती हैं। यह वृक्ष किसी को बुलाता नहीं,
लेकिन इसकी घनी छाया, हजारों लोग इसके नीचे रुकते हैं।
बिलकुल बेकार है; पर हजारों थके हुए विश्राम पा लेते हैं।
यह वृक्ष कोई उन्हें छाया देना चाहता है, ऐसा भी नहीं। इस वृक्ष ने तो एक ही नियम बना रखा है मालूम होता है कि जो नैसर्गिक है, उसमें ही रहूंगा, कुछ गड़बड़ नहीं करूंगा। ताओ को उपलब्ध व्यक्ति ऐसा ही हो जाता है। हजारों लोग उसके नीचे छाया पाते हैं। वह छाया देता नहीं, छाया उसके नीचे होती है।

-ताओ उपनिषाद (भाग-3) प्रवचन–59

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जज चंदावरकर:
जिसने वीर सावरकर को 1909 मे 50 साल की सजासुनायी वो 1900 मे कॉंग्रेस का अध्यक्ष था और 1901 मे कॉंग्रेस छोड़कर कर जज बन गया था। 1913 मे जजी छोड़कर फिर कॉंग्रेस मे आ गया। कांग्रेस का ये काला इतिहास हमे नही बताया गया।

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एक राजा ने दो लोगों को मौत की सजा सुनाई।
उसमें से एक यह जानता था कि राजा को अपने घोड़े से बहुत ज्यादा प्यार है l
उसने राजा से कहा कि यदि मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं एक साल में उसके घोड़े को उड़ना सीखा दूँगा l

यह सुनकर राजा खुश हो गया कि वह दुनिया के इकलौते उड़ने वाले घोड़े की सवारी कर सकता है  l
दूसरे कैदी ने अपने मित्र की ओर अविश्वास की नजर से देखा और बोला, तुम जानते हो कि कोई भी घोड़ा उड़ नहीं सकता !
तुमने इस तरह पागलपन की बात सोची भी कैसे ?
तुम तो अपनी मौत को एक साल के लिए टाल रहे हो l
पहला कैदी बोला, ऐसी बात नहीं है  l
मैंने दरअसल खुद को स्वतंत्रता के चार मौके दिए हैं ……
पहली बात राजा एक साल के भीतर मर सकता है !
दूसरी बात मैं मर सकता हूं !
तीसरी बात घोड़ा मर सकता है !
और चौथी बात… हो सकता है, मैं घोड़े को उड़ना सीखा दूं !!

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सुन्दरपुर गांव में एक किसान रहता था। उसके चार बेटे थे। वे सभी आलसी और निक्कमे थे। जब किसान बुढ़ा हुआ तो उसे बेटों की चिंता सताने लगी।

एक बार किसान बहुत बीमार पड़ा। मृत्यु निकट देखकर उसने चार बेटों को अपने पास बुलाया। उसने उस चारों को कहा, “मैंने बहुत-सा धन अपने खेत में गाड रखा है। तुम लोग उसे निकाल लेना।” इतना कहते-कहते किसान के प्राण निकल गए।

पिता का क्रिया-क्रम करने के बाद चारों भाइयों ने खेत की खुदाई शुरू कर दी। उन्होंने खेत का चप्पा-चप्पा खोद डाला, पर उन्हें कही धन नहीं मिला। उन्होंने पिता को खूब कोसा। वर्षा ऋतु आने वाली थी। किसान के बेटों ने उस खेत में धान के बीज बो दिए। वर्षा का पानी पाकर पौधे खूब बढ़े। उन पर बड़ी-बड़ी बालें लगी। उस साल खेत में धान की बहुत अच्छी फसल हुई।

चारों भाई बहुत खुश हुए। अब पिता की बात का सही अर्थ उनकी समझ में आ गया। उन्होंने खेत की खुदाई करने में जो परिश्रम किया था, उसी से उन्हें अच्छी फसल के रूप में बहुत धन मिला था।

इस प्रकार श्रम का महत्व समझने पर चारों भाई मन लगाकर खेती करने लगे।

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एक प्राचीन कथा है: जंगल की राह से एक जौहरी गुजरता था। देखा उसने राह में, एक कुम्हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चल रहा है। चकित हुआ! पूछा कुम्हार से, कितने पैसे लेगा इस पत्थर के? कुम्हार ने कहा, आठ आने मिल जाएं तो बहुत। लेकिन जौहरी को लोभ पकड़ा। उसने कहा, चार आने में दे दे, पत्थर है, करेगा भी क्या?

पर कुम्हार भी जिद बांधकर बैठ गया, छह आने से कम न हुआ तो जौहरी ने सोचा कि ठीक है, थोड़ी देर में अपने आप आकर बेच जाएगा। वह थोड़ा आगे बढ़ गया ।

लेकिन कुम्हार वापस न लौटा तो जौहरी लौटकर आया; लेकिन तब तक बाजी चूक गई थी, किसी और ने खरीद लिया था। तो पूछा उसने कि कितने में बेचा? उस कुम्हार ने कहा कि हुजूर, एक रुपया मिला पूरा। आठ आने में बेच देता, छह आने में बेच देता, बड़ा नुकसान हो जाता।
उस जौहरी की छाती पर कैसा सदमा लगा होगा! उसने कहा, मूर्ख! तू बिलकुल गधा है। लाखों का हीरा एक रुपए में बेच दिया?

उस कुम्हार ने कहा, हुजूर मैं अगर गधा न होता तो लाखों के हीरे को गधे के गले में ही क्यों बांधता? लेकिन आपके लिए क्या कहें? आपको पता था कि लाखों का हीरा है और पत्थर की कीमत में भी लेने को राजी न हुए!

धर्म का जिसे पता है, उसका जीवन अगर रूपांतरित न हो तो उस जौहरी की भांति गधा है। जिन्हें पता नहीं है, वे क्षमा के योग्य हैं; लेकिन जिन्हें पता है, उनको क्या कहें?

ओशो

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#सुनो
भारतीय अदालतों के तीन दुर्लभ किससे सुनाता हूँ

1:- तीस्ता सीतलवाड़ एकदम जेल जाने वाली थी गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी जमानत खारिज कर दी थी। तभी दिल्ली में बैठे कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज को फोन किया और उस जज ने उन्हें फोन की सुनवाई पर अग्रिम जमानत दे दिया।

ना भूतो ना भविष्यति।  भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज तक किसी अभियुक्त की न  फोन  पर सुनवाई हुई थी ना कभी होगी

2:- याकूब मेमन के लिए रात को 2:00 बजे प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट के एक जज के घर पर जाते हैं और वह जज रात को 2 बजे ही सुनवाई कर देता है और बकायदा भारत सरकार के वकील को भी रात को 2:00 बजे बुलाया जाता है और 4 घंटे तक सुनवाई चलती है।

3:- रविवार के दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच ने सुओ मोटो लेते  हुए लखनऊ प्रशासन को अदालत में तलब किया और बकायदा 4 घंटे बहस चली क्या दंगाइयों का पोस्टर लगाना जायज है ?

यह तीनों मामले में एक बात समान है कि भारत की वामपंथी न्यायपालिका  सिर्फ उनके लिए ही चिंतित है जो देश विरोधी गद्दार या वामपंथी विचारधारा के हैं .. कभी कोई हिंदूवादी नेता के लिए आज तक भारत की अदालतें चिंतित नहीं हुई है .. क्या उनका कोई हक नहीं है ?? कश्मीरी पंडित अपने जमीन से खदेड़ दिए गए… हजारों कश्मीरी पंडित कश्मीर में मार दिए गए… गिरजा टिक्कू से शुरू हुआ कश्मीरी लड़कियों का बलात्कार न जाने कितनी कश्मीरी महिलाओं और लड़कियों के बलात्कार पर खत्म हुआ.. दो दशकों तक कश्मीरी पंडित दिल्ली में टेंट में रहे आज तक भारत के किसी जज ने suo-moto नहीं लिया

थूकता हूं भारत की ऐसी न्यायपालिका पर
साभार आदरणीय आलोक शर्मा जी की वोल से कोपी🙏