छावा मूवी आई है जिसमें औरंगजेब के किरदार को अच्छे से नहीं दिखाया गया
यहां मै डायरेक्टर की निंदा करना चाहता हूं और साथ में
हजरत औरंगजेब साहब के बारे में असली जानकारी लिखने की कोशिश करूंगा ताकि अब कभी इतने महान शख्सियत के ऊपर कोई मूवी बनाए तो याद रखे वो कितने महान थे
तो शुरू करते है हो सकता है ये दो पार्ट में लिखूं लेकिन जानकारी पूरी दूंगा 🙏
औरंगजेब के अब्बू थे शाहजहां अम्मी का नाम मुमताज महल था मुमताज इतनी खूबसूरत थी कि शाहजहां रोज उनके कमरे में जाते थे
मुमताज की खूबसूरती का अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं शाहजहां का निकाह उनसे सन 1612 में हुआ था तब वो मात्र 14 साल की थी 15 साल की उम्र में वो अम्मी जान बन गई थी
मतलब 1613 में पहली बार अम्मी बनी तब से 1631 तक हर साल एक बच्चा देती थी
क्योंकि जब वो 1631 में जन्नत गई तो उनकी उम्र 38 की थी और 14 की उम्र में निकाह मतलब 38-14=24
वो अद्भुत महिला थी 24 साल में 14 बच्चों को पैदा की उनकी अंतिम बेटी जिस वर्ष पैदा हुई उसी वर्ष उनको जन्नत जाना पड़ा
उनके बच्चे नाम और जन्म तिथि
मुमताज महल के 14 बच्चों के नाम इस प्रकार हैं:
1. हुस्न-आरा बेगम (1613)
2. परवेज मिर्जा (1614)
3. जहाँआरा बेगम (1614)
4. शाहजहाँ बख्त (1616)
5. दारा शिकोह (1617)
6 . औरंगजेब (1618)
7. शाह शुजा (1619)
8. रोशनआरा बेगम (1619)
9. गुलरुख बेगम (1621)
10 शहजादी सुरैया बेगम (1621)
11. शहजादी गुलबदन बेगम (1622)
12. मुराद बख्श (1624)
13. शहजादी फारूकसीसा (1625)
फिर 4 साल बच्चे नहीं हुए क्योंकि वो बीमार हो गई थी जैसे ही ठीक हुई फिर से प्रेग्नेंट हो गई
जब 14 बच्चा गौहर आरा बेगम 1631 में पैदा हुई तो इसी साल वो अल्लाह को प्यारी हो गई
वरना और बच्चे देती 🔥
14 बच्चों में से 6 बचपन में ही जन्नत चले गए 8 बच गए
जिनका नाम
बेटियाँ:
1. जहाँआरा बेगम
2. गौहरआरा बेगम
3. शाहजादी फारूकसिसा
4. शाहजादी गुलरुख बेगम
बेटे:
1. दारा शिकोह
2. शाह शुजा
3. औरंगजेब
4. मुराद बख्श
शाहजहां की दो बेटियां बिल्कुल अपनी अम्मी मुमताज के जैसे दिखती थी जहां आरा बेगम और गौहर आरा बेगम शाहजहां ने इन दोनों का निकाह किसी से नहीं होने दिया और अपने पास रख लिया 🔥
कुछ इतिहास कार का मानना है वो उनके साथ सोता भी था
प्रमुख इतिहासकारों के नाम जिनका मानना था
फ्रांसिस ग्लेडविन
विंसेट स्मिथ
जदूनाथ सरकार
रामचंद्र गुप्ता
जहां आरा इतनी ज्यादा खूबसूरत थी कि कुछ इतिहास कर उसका नाम दारा शिकोह के साथ भी जोड़ते थे क्योंकि वो ज्यादा समय उसके साथ बिताती थी
जब शाहजहां ने दारा शिकोह को अगला बादशाह चुना तो औरंगजेब से बर्दाश्त नहीं हुआ और बोला जो मुझे पसंद है वो सब इसे मिल जा रहा है
और वो इनके खिलाफ बगावत कर दिया इस बीच औरंगजेब अपने भाइयों से चार जंगे लड़ा
औरंगजेब ने अपने भाइयों के खिलाफ कई जंगें लड़ीं, जिनमें से कुछ प्रमुख जंगें इस प्रकार हैं:
1. *शाहजहाँ के उत्तराधिकार की जंग (1657) औरंगजेब ने अपने भाइयों दारा शिकोह, शाह शुजा और मुराद बख्श के खिलाफ जंग लड़ी। और जीता
2. *समूगढ़ की जंग (1658)*: औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह के खिलाफ समूगढ़ में जंग लड़ी। इस जंग में औरंगजेब विजयी हुआ।
3. *देवराई की जंग (1659)*: औरंगजेब ने अपने भाई शाह शुजा के खिलाफ देवराई में जंग लड़ी। इस जंग में औरंगजेब विजयी हुआ।
4. *खजवाह की जंग (1659)*: औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह के खिलाफ खजवाह में जंग लड़ी और जीता उसके बाद उसने अपने सगे भाई को बंदी बना लिया
1658 की जंग जीतने के बाद उसने अपनी दोनों बहन जहां आरा गौहर आरा बेगम के साथ अब्बू शाहजहां को पकड़कर बनाकर बंदी बना लिया
जब वो दारा शिकोह को जंग में हराकर बंदी बना लिया तो अपने भाई का sir को का*टकर अब्बू को कैद में पेश किया
उसके कुछ समय बाद गौहर हार मान कर उसकी सारी शर्त मान ली और औरंगजेब ने उसे अपने पास रख लिया
उसके कुछ समय बाद जहां आरा भी टूट गई उसे भी औरंगजेब ने रख लिया
पार्ट 2 बहुत जल्द आयेगा
Day: March 8, 2025
छावा मूवी आई है जिसमें औरंगजेब के किरदार को अच्छे से नहीं दिखाया गया
यहां मै डायरेक्टर की निंदा करना चाहता हूं और साथ में
हजरत औरंगजेब साहब के बारे में असली जानकारी लिखने की कोशिश करूंगा ताकि अब कभी इतने महान शख्सियत के ऊपर कोई मूवी बनाए तो याद रखे वो कितने महान थे
तो शुरू करते है हो सकता है ये दो पार्ट में लिखूं लेकिन जानकारी पूरी दूंगा 🙏
औरंगजेब के अब्बू थे शाहजहां अम्मी का नाम मुमताज महल था मुमताज इतनी खूबसूरत थी कि शाहजहां रोज उनके कमरे में जाते थे
मुमताज की खूबसूरती का अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं शाहजहां का निकाह उनसे सन 1612 में हुआ था तब वो मात्र 14 साल की थी 15 साल की उम्र में वो अम्मी जान बन गई थी
मतलब 1613 में पहली बार अम्मी बनी तब से 1631 तक हर साल एक बच्चा देती थी
क्योंकि जब वो 1631 में जन्नत गई तो उनकी उम्र 38 की थी और 14 की उम्र में निकाह मतलब 38-14=24
वो अद्भुत महिला थी 24 साल में 14 बच्चों को पैदा की उनकी अंतिम बेटी जिस वर्ष पैदा हुई उसी वर्ष उनको जन्नत जाना पड़ा
उनके बच्चे नाम और जन्म तिथि
मुमताज महल के 14 बच्चों के नाम इस प्रकार हैं:
1. हुस्न-आरा बेगम (1613)
2. परवेज मिर्जा (1614)
3. जहाँआरा बेगम (1614)
4. शाहजहाँ बख्त (1616)
5. दारा शिकोह (1617)
6 . औरंगजेब (1618)
7. शाह शुजा (1619)
8. रोशनआरा बेगम (1619)
9. गुलरुख बेगम (1621)
10 शहजादी सुरैया बेगम (1621)
11. शहजादी गुलबदन बेगम (1622)
12. मुराद बख्श (1624)
13. शहजादी फारूकसीसा (1625)
फिर 4 साल बच्चे नहीं हुए क्योंकि वो बीमार हो गई थी जैसे ही ठीक हुई फिर से प्रेग्नेंट हो गई
जब 14 बच्चा गौहर आरा बेगम 1631 में पैदा हुई तो इसी साल वो अल्लाह को प्यारी हो गई
वरना और बच्चे देती 🔥
14 बच्चों में से 6 बचपन में ही जन्नत चले गए 8 बच गए
जिनका नाम
बेटियाँ:
1. जहाँआरा बेगम
2. गौहरआरा बेगम
3. शाहजादी फारूकसिसा
4. शाहजादी गुलरुख बेगम
बेटे:
1. दारा शिकोह
2. शाह शुजा
3. औरंगजेब
4. मुराद बख्श
शाहजहां की दो बेटियां बिल्कुल अपनी अम्मी मुमताज के जैसे दिखती थी जहां आरा बेगम और गौहर आरा बेगम शाहजहां ने इन दोनों का निकाह किसी से नहीं होने दिया और अपने पास रख लिया 🔥
कुछ इतिहास कार का मानना है वो उनके साथ सोता भी था
प्रमुख इतिहासकारों के नाम जिनका मानना था
फ्रांसिस ग्लेडविन
विंसेट स्मिथ
जदूनाथ सरकार
रामचंद्र गुप्ता
जहां आरा इतनी ज्यादा खूबसूरत थी कि कुछ इतिहास कर उसका नाम दारा शिकोह के साथ भी जोड़ते थे क्योंकि वो ज्यादा समय उसके साथ बिताती थी
जब शाहजहां ने दारा शिकोह को अगला बादशाह चुना तो औरंगजेब से बर्दाश्त नहीं हुआ और बोला जो मुझे पसंद है वो सब इसे मिल जा रहा है
और वो इनके खिलाफ बगावत कर दिया इस बीच औरंगजेब अपने भाइयों से चार जंगे लड़ा
औरंगजेब ने अपने भाइयों के खिलाफ कई जंगें लड़ीं, जिनमें से कुछ प्रमुख जंगें इस प्रकार हैं:
1. *शाहजहाँ के उत्तराधिकार की जंग (1657) औरंगजेब ने अपने भाइयों दारा शिकोह, शाह शुजा और मुराद बख्श के खिलाफ जंग लड़ी। और जीता
2. *समूगढ़ की जंग (1658)*: औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह के खिलाफ समूगढ़ में जंग लड़ी। इस जंग में औरंगजेब विजयी हुआ।
3. *देवराई की जंग (1659)*: औरंगजेब ने अपने भाई शाह शुजा के खिलाफ देवराई में जंग लड़ी। इस जंग में औरंगजेब विजयी हुआ।
4. *खजवाह की जंग (1659)*: औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह के खिलाफ खजवाह में जंग लड़ी और जीता उसके बाद उसने अपने सगे भाई को बंदी बना लिया
1658 की जंग जीतने के बाद उसने अपनी दोनों बहन जहां आरा गौहर आरा बेगम के साथ अब्बू शाहजहां को पकड़कर बनाकर बंदी बना लिया
जब वो दारा शिकोह को जंग में हराकर बंदी बना लिया तो अपने भाई का sir को का*टकर अब्बू को कैद में पेश किया
उसके कुछ समय बाद गौहर हार मान कर उसकी सारी शर्त मान ली और औरंगजेब ने उसे अपने पास रख लिया
उसके कुछ समय बाद जहां आरा भी टूट गई उसे भी औरंगजेब ने रख लिया
पार्ट 2 बहुत जल्द आयेगा
😨😨*हाजी अली दरगाह…*👇
*दरअसल मुम्बई की हाजी अली दरगाह एक उज़्बेकी-अज़रबैजानी मोमिन की कब्र है ! कितनी पुरानी है?*
*कहने वाले ५०० वर्ष पुरानी मानते हैं, मगर ध्यान से देखेंगे तो इसका निर्माण तो १०० वर्षों से अधिक पुराना नहीं दिखता !*
*यही नहीं, इसके बाद का भी नया निर्माण है !*
*हाजी अली दरगाह सरकारी जमीन पर है! यही नहीं, बाद में भी ४,१६६ मीटर बेहद बेशकीमती ज़मीन, हाजी अली दरगाह को लीज पर और दी गई!*
*२००९ में उस सरकारी जमीन पर दरगाह वालों ने मोबाइल कंपनियों के अनेक ट्रांसमिशन टावर लगवा लिए, जिसका किराया दरगाह को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए मिलता है!*
*पिछले वर्ष मुंबई महानगरपालिका ने दरगाह की मोबाइल टावरों से कुल आय में से सिर्फ ₹१.८० करोड़ मांगे, क्यों कि लीज पर दी गई ४,१६६ वर्गमीटर सरकारी जमीन है!*
*दरगाह ने चवन्नी भी देने से इनकार कर दिया!*
*विश्वास मानिए! देश की अधिकांश मस्जिदें सरकारी जमीन पर बनी हुई हैं! सरकार को किसी भी रूप में गृहकर, किराया या लीज रेंट के रूप में धेले की आमदनी नहीं है!*
*नई बात यह हुई, कि उद्धव सरकार के आते ही रु३५ करोड़ “हाजी अली ट्रस्ट” को सुंदरीकरण हेतु और आबंटित कर दिए! अर्थात अपना पैसा मिला नहीं, ₹३५ करोड़ दरगाह को और दे दिए गए!*
*मगर देश के लिए इनका योगदान शून्य है! दरगाह के पास अकूट संपत्ति है! कभी आपने सुना है, कि मुम्बई में आई बाढ़, या किसी प्राकृतिक आपदा के समय, किसी दरगाह ने एक धेला भी दिया हो!*
*पिछले वर्ष, अजमेर दरगाह की आय ₹२३० करोड़ थी! असल मे कितनी होगी,अल्लाह जानें!*
*देश के मंदिरों ने ₹५०० करोड़ से अधिक कोरोना आपदा से निपटने के लिए दिए हैं!*
*मगर अजमेर, हज़रत निज़ामुद्दीन, अजमेर दरगाह, या किसी चर्च ने एक फूटी कौड़ी तक नहीं दिखाई है, जबकि अधिसंख्य कोरोना शिकार इसी वर्ग के हैं!*
*कुछेक मंदिरों की आय से नागरिकों की आंखें चौधियाई रहती हैं! जबकि पूरी आय सरकारें ही ले लेती है!*
*यह संभव है कि मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों की आय मंदिरों से हज़ार गुनी अधिक होगी… मगर उनसे कोई एक चव्वनी नहीं मांग सकता!*
😡😡👊🏼👊🏼
एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय लम्बी घास व झाड़ियों द्वारा घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था।
उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था। उनके स्वभाव भिन्न थे। अन्ना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। प्रत्यु कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो। यद्दी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता जो किस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा।
एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़कर घर जा रहे थे। बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी। अतः उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियां दबी थी। वे चौंके।
एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं।”
मछुआरे पुलकित होकर झाड़ियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।
एक मछुआरा बोला “अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पड़ी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा।” “यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।”
दूसरा बोला।
तीसरे ने कहा “आज तो शाम घिरने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे।”
इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछ्लियों ने मछुआरे की बात सुन ली थी।
अन्ना मछली ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई हैं। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोड़कर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं। उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से। तब तक मैं तो बहुत दूर अटखेलियां कर रही हो-ऊंगी।’
प्रत्यु मछली बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहां हैं, जो इतना घबराने की जरुरत है हो सकता है संकट आए ही न। उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है। उनकी बस्ती में आग लग जाए। भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता हैं या रात को मूसलाधार वर्षा आ सकती हैं और बाढ में उनका गांव बह सकता हैं। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में ही न फंसूं।”
यद्दी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने का। मछुआरों को आना हैं तो वह आएंगे। हमें जाल में फंसना हैं तो हम फंसेंगे। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”
इस प्रकार अन्ना तो उसी समय वहां से चली गई। प्रत्यु और यद्दी जलाशय में ही रही। भोर हुई तो मछुआरे अपने जाल को लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने । प्रत्यु ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।
जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सड़ने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में प्रत्यु फंस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, परन्तु प्रत्यु दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही। मछुआरे को सड़ांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पड़ी प्रत्यु को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड़ चुकी हैं।” ऐसे बड़बड़ाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने प्रत्यु को जलाशय में फेंक दिया।
प्रत्यु अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई।
यद्दी भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली यद्दी ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए।
! आशा !!
~~~
एक राजा ने दो लोगों को मौत की सजा सुनाई। उसमें से एक यह जानता था कि राजा को अपने घोड़े से बहुत ज्यादा प्यार है।
उसने राजा से कहा कि यदि मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं एक साल में उसके घोड़े को उड़ना सीखा दूँगा। यह सुनकर राजा खुश हो गया कि वह दुनिया के इकलौते उड़ने वाले घोड़े की सवारी कर सकता है।
दूसरे कैदी ने अपने मित्र की ओर अविश्वास की नजर से देखा और बोला, तुम जानते हो कि कोई भी घोड़ा उड़ नहीं सकता! तुमने इस तरह पागलपन की बात सोची भी कैसे? तुम तो अपनी मौत को एक साल के लिए टाल रहे हो।
पहला कैदी बोला, ऐसी बात नहीं है। मैंने दरअसल खुद को स्वतंत्रता के चार मौके दिए हैं…
१. पहली बात राजा एक साल के भीतर मर सकता है!
२. दूसरी बात मैं मर सकता हूं !
३. तीसरी बात घोड़ा मर सकता है !
४. और चौथी बात… हो सकता है, मैं घोड़े को उड़ना सीखा दूं !!
गोकुला जाट: एक वीर की गाथा-
मेरे गांव तथा मेरे गांव के समीपवर्ती प्रायः प्रत्येक गांव में एक जाट का नाम गोकुला अवश्य होता था। बाल्यकाल में हमें यह ज्ञान नहीं था कि गोकुला जाट इतने निःशंक, वीर, और महान थे। उन्होंने औरंगजेब के विरुद्ध दीर्घकाल तक युद्ध लड़ा। अंततः औरंगजेब ने उनके प्रति अमानुषिक व्यवहार प्रदर्शित करते हुए उन्हें एवं उनके परिवार को मृत्युदंड दे दिया।
आगरा में हॉस्पिटल मार्ग पर एक स्थान है, जिसे ‘फवारा’ कहते हैं। मान्यता है कि इसी चबूतरे पर गोकुला जाट को बाँधकर औरंगजेब ने उनके एक-एक अंग को कटवाया था। उनके कटे शरीर से रक्त की धारा फवारे के समान फूटी थी, इसी कारण उस चबूतरे का नाम ‘फवारा’ पड़ गया।
मैं आगरा में अनेक वर्षों तक आता-जाता रहा, चार वर्षों तक वहाँ निवास किया, कई बार फवारे के समीप भी गया, किंतु मुझे यह नहीं ज्ञात था कि इस स्थान का संबंध गोकुला जाट से है। आज मेरे फेसबुक मित्र श्री Pradeep Singh जी के यूट्यूब चैनल ‘आपका अखबार’ पर उनके द्वारा प्रस्तुत वीडियो को सुनकर यह तथ्य प्रकाश में आया। श्री प्रदीप सिंह जी को इस ऐतिहासिक घटना से अवगत कराने हेतु हृदय से धन्यवाद।
मैं गोकुला जाट के प्रति श्रद्धा और सम्मान सहित उन्हें नमन करता हूँ।
परंतु आज यह प्रश्न मन को उद्वेलित करता है कि जाट समाज, जो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियों—जो औरंगजेब की प्रशंसा करती हैं—के साथ क्यों और कैसे जुड़ा है? यह न केवल गोकुला जाट के साथ विश्वासघात है, अपितु सनातन धर्म और भारत देश के प्रति भी द्रोह है।
~ भगवान स्वरूप शर्मा
सीलमपुर के अल-मतीन मस्जिद मामले से समझिए, कैसे मुस्लिम आपके इलाके में घुसते हैं… खुद को फैलाते हैं और एक दिन आपको लगाना पड़ता है ‘मकान बिकाऊ’ का पोस्टर
सीलमपुर का ब्रह्मपुरी इलाके की गली नंबर 13 में स्थित अल-मतीन मस्जिद को लेकर हिंदुओं में डर और गुस्सा है। लोग कहते हैं कि मुस्लिम पहले चुपचाप आते हैं, फ्लैट खरीदते हैं, फिर घर लेते हैं, मस्जिद बनाते हैं और धीरे-धीरे पूरे इलाके पर कब्जा कर लेते हैं। फिर एक दिन मौका मिलते ही पूरी कौम एकजुट होकर हिंदुओं पर हमला कर देती है।
साल 2020 के हिंदू-विरोधी दंगों में ब्रह्मपुरी और सीलमपुर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में यही हुआ था। अल-मतीन मस्जिद से गोलियाँ चली थीं, भीड़ जमा हुई और हिंदुओं का जीना मुश्किल हो गया। अब इसे बड़ा करने की कोशिश हो रही है, जिससे हिंदुओं को लगता है कि मस्जिद और बड़ी हुई तो उनका जीना हराम हो जाएगा। 2018 में भी गली नंबर-8 की मस्जिद को लेकर तनाव हुआ था, जिसके बाद 2020 में मुस्लिमों ने हिंदुओं पर गुस्सा उतारा। आइए, इसकी पूरी कहानी समझते हैं।
फ्लैट से मस्जिद और फिर बदलने लगता है माहौल
ब्रह्मपुरी में अल-मतीन मस्जिद की कहानी साल 2013 से शुरू होती है। लोकल आदमी पंडित लाल शंकर गौतम बताते हैं, “2013 में मुस्लिमों ने गली नंबर-13 में एक फ्लैट खरीदा। वहाँ नमाज शुरू हुई। कोई कुछ नहीं बोला। लेकिन धीरे-धीरे उस फ्लैट को चार मंजिल की मस्जिद बना दिया।” गौतम कहते हैं कि ये सब सोचा-समझा था। पहले छोटी जगह ली, फिर उसे बढ़ाते गए।
उनका मानना है कि मुस्लिम इस तरह इलाके में घुसते हैं। पहले एक फ्लैट, फिर आसपास के घर खरीदते हैं और मस्जिद बना लेते हैं। शुरू में सब ठीक लगता है, लेकिन बाद में माहौल बदल जाता है। हिंदुओं को लगता है कि ये सब उनकी जिंदगी पर कब्जा करने की तैयारी है।
साल 2018 में भी हुआ था तनाव, मस्जिद थी वजह
ब्रह्मपुरी में मुस्लिमों की ये कारगुजारी कोई नई बात नहीं है। साल 2018 में गली नंबर-8 में भी एक मस्जिद को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों में ठन गई थी। उस वक्त हिंदुओं ने इसका विरोध किया।
शीशपाल तिवारी कहते हैं, “वहाँ मस्जिद बन रही थी। हमने कहा कि ये गलत है। तब पुलिस ने दोनों तरफ से बात कराई। एक समझौता हुआ कि मस्जिद में सिर्फ गली के लोग नमाज पढ़ेंगे। बाहर से कोई नहीं आएगा।” लेकिन तिवारी का कहना है कि मुस्लिमों ने इस वादे को तोड़ा। अब्दुल रफीक नाम का शख्स बाहर से लोगों को बुलाने लगा। गली में भीड़ बढ़ने लगी। हिंदुओं को लगने लगा कि ये सब उन्हें परेशान करने के लिए हो रहा है। ये तनाव 2018 में शुरू हुआ और आगे चलकर 2020 में बड़ा बवाल बन गया।
एक बुजुर्ग कहते हैं, “हमें बाहर निकलने में डर लगता है। मस्जिद बड़ी हुई तो ये रोज का हाल होगा।” 2018 के समझौते को तोड़ने का भी गुस्सा है। वो कहते हैं, “अब्दुल रफीक बाहर से लोगों को बुलाता है। गली में शांति नहीं रहती।” हिंदुओं को लगता है कि मस्जिद के बहाने मुस्लिम उनकी जिंदगी पर कब्जा करना चाहते हैं। यहाँ हिंदू डरकर ही रहने को मजबूर हैं। दंगों के बाद से कुछ ज्यादा ही खौफ है।
साल 2020 में दिख चुकी है मुस्लिमों की एकजुटता
साल 2020 के फरवरी महीने में ब्रह्मपुरी और सीलमपुर में जो हुआ, वो हिंदुओं के लिए खौफनाक था। दंगे भड़के और अल-मतीन मस्जिद उसका बड़ा केंद्र बना। गौतम बताते हैं, “25 फरवरी को मस्जिद से गोलियाँ चलीं। अचानक हजारों की भीड़ जमा हो गई। कहा गया कि मस्जिद में आग लगाई गई, जो झूठ था। फिर गली नंबर-13 में गोलीबारी हुई। तीन हिंदू लड़के घायल हुए।”
हिंदुओं का कहना है कि ये सब सोचा-समझा था। मुस्लिम पूरी कौम एकजुट होकर हिंदुओं पर टूट पड़े। 53 लोग मारे गए, जिसमें ज्यादातर मुस्लिम थे, लेकिन हिंदुओं को भी निशाना बनाया गया। गौतम कहते हैं, “उस दिन हमें समझ आ गया कि मस्जिद सिर्फ नमाज के लिए नहीं है। ये उनकी ताकत दिखाने की जगह है।” दंगों के बाद हिंदुओं का भरोसा टूट गया।
मस्जिद का विस्तार हिंदुओं के लिए बढ़ते खतरे की घंटी
2020 के बाद मस्जिद को बड़ा करने की कोशिश शुरू हुई। 2023 में मस्जिद वालों ने गली नंबर-12 में बगल का एक घर खरीदा। वो घर हिंदू का था। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “पहले घर खरीदा, फिर तोड़ दिया। अब वहाँ मस्जिद का हिस्सा बन रहा है।” प्लान ये था कि मस्जिद का नया गेट गली नंबर-12 में खोला जाए, जो ठीक सामने 1984 से बने शिव मंदिर के पास पड़ता है। हिंदुओं को ये बिल्कुल मंजूर नहीं। गली नंबर-12 में 60 हिंदू परिवार रहते हैं। उनमें से अधिकतर घरों के सामने ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर दिख जाएँगे।
ब्रह्मपुरी की गली नंबर-12 में लगे ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर
एक युवक ने कहा, “मंदिर बहुत पुराना है। हर सोमवार को पूजा होती है। मस्जिद का गेट सामने खुला तो हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा।” हिंदुओं को डर है कि मस्जिद बड़ी हुई तो भीड़ बढ़ेगी और 2020 जैसा हमला फिर हो सकता है।
शंकर लाल गौतम कहते हैं, “अगर मस्जिद दो गुनी बड़ी हो गई तो सोचो, कितने लोग यहाँ जमा होंगे। फिर हमें कौन बचाएगा? 2020 में जो हुआ, वो दोबारा होगा।” हिंदुओं का मानना है कि मुस्लिम पहले इलाके में फैलते हैं, फिर मस्जिद बनाते हैं और मौका मिलते ही एकजुट होकर हमला करते हैं। ब्रह्मपुरी में यही पैटर्न दिख रहा है।
हिंदुओं के घरों के बाहर फेंकी जाती हैं जानवरों की हड्डियाँ और खून
हिंदुओं का कहना है कि मस्जिद के आसपास उनका जीना मुश्किल हो गया है। सुरेश कुमार अग्रवाल ने साल 2023 में न्यू उस्मानपुर थाने में शिकायत की थी। उन्होंने शिकायत में लिखा था, “साल 2017 से मुस्लिम समाज के लोग आए दिन मुझे भगाने के लिए मेरे घर पर कभी खून डाल देते हैं, कभी कुछ। इसी कड़ी में 10 अप्रैल 2023 को किसी जानवर के कटे हुए पैर मेरे घर के सामने डाल दिया गया।”
साल 2023 समेत कई बार हिंदुओं के घरों के सामने फेंके गए जानवरों के अवशेष, शिकायत की कॉपी
वो शिकायत में आगे लिखते हैं, “यह लोग (मुस्लिम) चाहते हैं कि हम हिंदू समाज के लोग अपना घर बेचकर यहाँ से चले जाएँ। जिसके कारण मेरे ही नहीं, कई हिंदू परिवारों के घरों पर, छतों पर जानवरों की हड्डियाँ और खून फेंका जाता है। इसकी सूचना कई बार पुलिस को दी भी जा चुकी है।” स्थानीय लोग इन आरोपों की पुष्टि करते हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम जानबूझकर ऐसा करते हैं, ताकि हिंदू परेशान हों। इस बात की शिकायत गृहमंत्री अमित शाह तक की गई थी।
मुस्लिम पक्ष को मामले के ठंडा पड़ते ही निर्माण कार्य शुरू होने का इंतजार
मस्जिद का विस्तार 2023 में शुरू हुआ। हिंदुओं ने शिकायत की तो पुलिस ने काम रुकवा दिया। फिर 23 नवंबर, 2024 को मस्जिद वालों ने MCD से इजाजत ली और फरवरी 2025 में काम दोबारा शुरू किया। लेकिन 13 फरवरी, 2025 को फिर शिकायत हुई। पुलिस ने जाँच की तो नक्शा गलत निकला। MCD ने काम रोक दिया। मस्जिद का संचालन करने वाली अल-मतीन वेलफेयर सोसायटी और इसका नक्शा पास करने वाले आर्किटेक्ट मोहम्मद दाऊद खान को शो कॉज नोटिस भी भेजा गया है। अब एक महीने से निर्माण बंद है।
मस्जिद कमेटी और भवन निर्माण का नक्शा पास करने वाले आर्किटेक्ट को एमसीडी ने भेजा नोटिस
हालाँकि गौतम कहते हैं, “MCD बोर्ड लगाकर दिखावा कर रही है। असल में कुछ नहीं हो रहा।” हिंदुओं को लगता है कि पुलिस और MCD सिर्फ ऊपरी कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि मुस्लिम मौके की तलाश में हैं।
मस्जिद के नायब ईमाम सद्दाम हुसैन कहते हैं, “हमारी आबादी बढ़ रही है। मस्जिद छोटी पड़ गई। इसे बड़ा करना गलत कैसे है?” उनका कहना है कि हिंदुओं का डर बेकार है। वो कहते हैं, “हम शांति चाहते हैं।”
लेकिन हिंदुओं को ये बातें खोखली लगती हैं। अजय नाम के युवक ने कहा, “2020 में भी शांति की बात थी, फिर गोलियाँ चलीं। अब मस्जिद बड़ी हुई तो क्या होगा?” हिंदुओं को शक है कि मुस्लिम पहले फैलते हैं, फिर मौका देखकर हमला करते हैं।
साल 2020 के दंगों में हिंदुओं ने देखा कि मुस्लिम कैसे एकजुट हो जाते हैं। शंकर लाल गौतम कहते हैं, “मस्जिद से भीड़ निकली और हम पर टूट पड़ी। एक-एक घर को निशाना बनाया।” ब्रह्मपुरी और सीलमपुर जैसे इलाकों में मुस्लिम बहुल होने की वजह से उनकी ताकत बढ़ गई थी।
हिंदुओं का कहना है कि मस्जिदें इन हमलों का केंद्र बनती हैं। अगर अल-मतीन मस्जिद बड़ी हुई तो ये ताकत और बढ़ेगी। एक बुजुर्ग ने कहा, “हमें हर दिन डर में जीना पड़ेगा। मस्जिद जितनी बड़ी होगी, हमारा डर उतना बढ़ेगा।” यही वजह है कि लोगों ने अब पलायन को ही अपना भविष्य मान लिया है।
हिंदू समुदाय मस्जिद निर्माण को एक ‘मोडस ऑपरेंडी’ मानता है। उनका कहना है कि पहले मस्जिद बनती है, फिर माहौल बदलता है, और हिंदू पलायन को मजबूर हो जाते हैं। 2020 के बाद से ब्रह्मपुरी में यह ट्रेंड देखने को मिला है। विनोद नाम की स्थानीय महिला ने कहा, “पहले भी दिक्कतें होती थी, लेकिन बात इतनी नहीं बढ़ती थी। लेकिन दंगों के बाद सब बदल गया। अब मस्जिद का विस्तार देखकर लगता है कि हमें यहाँ से पूरी तरह से भगाने की तैयारी है।”
ब्रह्मपुरी में हिंदुओं को लगता है कि मुस्लिम पहले फ्लैट खरीदते हैं, फिर घर लेते हैं, मस्जिद बनाते हैं और इलाके पर कब्जा कर लेते हैं। 2018 का तनाव और 2020 का हमला इसके सबूत हैं। अब मस्जिद के विस्तार से डर और बढ़ गया है। पुलिस अभी शांति बनाए है, लेकिन हिंदुओं को भरोसा नहीं। अजय कहता है, “मस्जिद बड़ी हुई तो हमारा जीना हराम हो जाएगा।” ये कहानी सिर्फ मस्जिद की नहीं, बल्कि हिंदुओं के डर और मुस्लिमों की बढ़ती ताकत की है। आगे क्या होगा, ये वक्त बताएगा।





માહિલાદીવસે કંઈક પુણ્યશ્લોક રાજમાતા અહલ્યાબાઈ હોલકર વિશે.
પ્રકૃતિ પાસે રિપ્લેસમેન્ટ ની અદભુત વ્યવસ્થા હોય છે. પ્રલય પછી સર્જન અને સર્જન પછી પ્રલય. ભારતમાં મૂર્તિભંજક આક્રંતાઓના અવિરત એક હજાર વર્ષના શાસન પછી ભારતના સાંસ્કૃતિક, આધ્યાત્મિક નવનિર્માણની પ્રક્રિયાનો સમય પણ આવ્યો. મૂર્તિભંજકોની (ઔરંગઝેબ નું મૃત્યુ વર્ષ 1707 માં અહમદનગર ખાતે થયું હતું અને અહમદનગર જિલ્લામાં જ વર્ષ 1725 માં અહલ્યાબાઈ નો જન્મ થયો હતો. આને વિધિની વક્રતા કહો કે સંયોગ કહો.) વિધ્વંસક પ્રવૃતિઓ નો પ્રત્યુત્તર હતા ઇન્દોરના રાજમાતા અહલ્યાબાઈ હોલકર.
અહલ્યાબાઈ નો જન્મ 31 મેં 1725 ના મહારાષ્ટ્રના અહમદનગર જિલ્લાના ચૌડી ગામમાં થયો હતો તેમના પિતા માનકોજી શિંદે ધનગર સમુદાયના પાટીલ હતા અહલ્યાબાઈ પોતે સામાન્ય ખેડૂત પરિવારની કન્યા હોવા છતાં અદભુત વહીવટ કુશળ અને ધર્માનુરાગી મહિલા હતા. યુવાવસ્થામાં વિધવા થયા અને એમના સસરા દ્વારા એમને સતી થતા રોકી રાજ્યના વહીવટી તંત્રની સમજવા, સાંચવવા અને સંભાળવાની જવાબદારી સોંપવામાં આવી હતી. અહલ્યાબાઈ સામાન્ય ખેડૂતના પુત્રી હોવા છતાં એ સમયે પણ તેવો વાંચી લખી શકતા હતા અને એમની રાજકન્યાને એ સમયે સામાન્ય પરિવારમાં પરણાવી હતી અને પોતાના સગા પુત્ર માલેરાવની ગુનામાં સંડોવણી સાબિત થતા ઘટતી સજા આપી હતી (પુસ્તક માલેરાવ ની અંધાધૂંધી લેખક જાગીરદાર). આટલા ઉત્તમ ન્યાયકર્તા હતા આ મહિલા. ઇન્દોર જેવા સામાન્ય ગામડાને હોલકર સામ્રાજ્યનું વડું મથક બનાવવાનો શ્રેય પણ અહલ્યાબાઈ ને જાય છે.
આજના સમગ્ર ઉત્તર, પશ્ચિમ અને મધ્ય ભારતના પ્રતિષ્ઠિત મંદિરોના નવનિર્માણનો શ્રેય પણ આ પુણ્યશ્લોક મહિલા અહલ્યાબાઈ ના ફાળે જાય છે. અત્યારના હિંદુઓના પવિત્ર અને પ્રતિષ્ઠિત મંદિરોનું અસ્તિત્વ આ એકમાત્ર મહિલા ના યોગદાન ને કારણે સંભવ બન્યું છે. હાલના અયોધ્યા, કાશી વિશ્વનાથ, સોમનાથ, ઉજ્જૈન, નાથદ્વારા, નાસિક, પંઢરપુર, ચિત્રકૂટ, પુષ્કર, ગંગોત્રી, ગયા અને પરળીના મંદિરોના નવનિર્માણ તેમજ બદ્રીનાથ, મથુરા, હરિદ્વાર, રામેશ્વર, અમરકંટક, ટેહરી અને સપ્તશૃંગી જેવા સ્થળો પર યાત્રાળુઓને રહેવા માટે ધર્મશાળાઓ નું નિર્માણ કર્યું અને કાશી, પ્રયાગ અને કુરુક્ષેત્રમાં નદીઓના ઘાટ બંધાવ્યા. દરેક મંદિરોના નિભાવ ખર્ચ માટે કાયમી વાર્ષિક સાલીયાણા બાંધી આપ્યા. પોતે શિવભક્તીની હોવાથી બારેય જ્યોતિર્લિંગ માટે ઉદાર સખાવત કરી હતી અને ઉપરોક્ત તીર્થસ્થાનો સુધી પહોંચવા માટે સડકોનું નિર્માણ કરાવ્યું હતું ખાસ કલકતા થી બનારસ સુધીના રોડનું નિર્માણકાર્ય આ મહાન નારી દ્વારા કરવામાં આવ્યું હતું.
અહલ્યાબાઈ ભારતમાં મુઘલ સામ્રાજયના અંતિમ સમય થી લઈને આઝાદીના સમય સુધી ભારતના હિંદુત્વના એકમાત્ર રક્ષક, ઉદ્ધારક અને પોષક બન્યા હતા. જો અહલ્યાબાઈ ન જન્મ્યા હોત તો પુરા બસ્સો વર્ષ સુધી ભારતના તીર્થયાત્રીઓ પોતાના આરાધ્ય દેવના દર્શન ન કરી શક્યા હોત આ ઐતિહાસિક સત્ય છે અને આજના કાશી વિશ્વનાથ કે સોમનાથ મંદિર ક્યારેય અસ્તિત્વમાં ના આવ્યા હોત. કારણકે ત્યાં અહલ્યાબાઈ દ્વારા વચલા ગાળામાં મંદિર નિર્માણ કરી નાખવામાં આવ્યું હતું. પુરા બસ્સો વર્ષ સુધી હિંદુત્વને ઓક્સિજન પૂરો પાડનાર આ મહિલાને યાદ કર્યા વગર ક્યારેય અર્વાચીન હિંદુત્વ નો ઇતિહાસ રજૂ થઈ શકે એમ નથી.
સ્પાર્ક : કોઈપણ કાર્ય કરવા માટે પ્રબળ ઇચ્છાશક્તિ જોઈએ અને આ પ્રબળ ઇચ્છાશક્તિ ના કારણે જ અહલ્યાબાઈ એક સામાન્ય ખેડૂતના કન્યા હોવા છતાં પોતાના નામની આગળ પુણ્યશ્લોક જેવું અદભુત ટાઇટલ લાગે એટલું ઊંચું કર્મ કરી શકાય એનું ઉદાહરણ બની ગયા. એ સમયે સમગ્ર ભારતમાં અનેક સમૃદ્ધ રજવાડાઓ હતા પરંતુ અહલ્યાબાઈ જેવી પ્રબળ ઇચ્છાશક્તિ ના અભાવે આવું અદભુત કાર્ય નથી કરી શક્યા આ નિર્વિવાદીત સત્ય છે.
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लाहौर में पुराने किले में स्थित प्रभु श्रीराम के पुत्र ‘लव’ की समाधी पर पहुँचकर कांग्रेस नेता व BCCI उपाध्यक्ष
राजीव शुल्ला ने नमन् किया ..!
लाहौर नगर निगम के रिकॉर्ड में ये बात दर्ज है लाहौर शहर
‘लव’ ने बसाया था और ‘कसूर’ शहर कुश ने बसाया था ..!
पाकिस्तान की सरकार भी इस बात को प्रचारित करना
चाहती है ताकि हिंदू पर्यटक वहाँ आएँ और उनके कटोरे में मुट्ठी भर-भरकर सिक्के डालें !
आजकल पाकिस्तान का थिंकटैंक सभी हिंदू मंदिरों का जीर्णोदार करने की वकालत पाकिस्तान सरकार से कर रहा है ताकि हिंदू पर्यटन को बढ़ावा मिले!
अब राम को काल्पनिक बताने वाले इस बात से चिंतित हैं, जब पाकिस्तान सरकार ही हिन्दुओं का स्वागत करेगी तो रजिया कांग्रेस को वोट करने क्यों जाएगी?
वजह कोई भी हो… मगर सनातनी सत्य प्रमाणिक तौर पर बाहर आ रहा है! लेकिन JE &हादी इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि उसका बाप किशनलाल ही है ..!
साभार अभिमन्यु वाजपेयी 👏


बुद्ध का जन्म हुआ। पांचवें दिन रिवाज के अनुसार श्रेष्ठतम पंडित इकट्ठे हुए। उन्होंने बुद्ध को नाम दिया–सिद्धार्थ। सिद्धार्थ का अर्थ होता है: कामना की पूर्ति; आशा की पूर्ति; अर्थ की उपलब्धि; मंजिल का मिल जाना। बूढ़े शुद्धोधन के घर में बेटा पैदा हुआ था। जीवन भर प्रतीक्षा की थी, आशा की थी, सपने देखे थे; बहुत बार निराश हुआ था; और अब बुढ़ापे में बेटा पैदा हुआ था; निश्चित ही सिद्धार्थ था। पंडितों ने नाम ठीक ही दिया था। आठ बड़े पंडित थे। सम्राट पूछने लगा, इस नवजात शिशु का भविष्य भी कहोगे? सात पंडितों ने अपने हाथ उठाए और दो अंगुलियों का इशारा किया। सम्राट कुछ समझा नहीं। उसने कहा, मैं कुछ समझा नहीं। इशारे में नहीं, स्पष्ट कहो। तो उन सात पंडितों ने कहा कि दो विकल्प हैं–या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सब छोड़ कर सर्वत्यागी, वीतरागी, संन्यस्त हो जाएगा; या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सर्व वीतरागी संन्यासी होगा।
सिर्फ एक पंडित चुप रहा। वह सबसे युवा था। कोदन्ना उसका नाम था। लेकिन वह सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली भी था। सम्राट ने पूछा, तुम चुप हो, तुमने दो अंगुलियां न उठाईं!
कोदन्ना ने कहा, दो अंगुलियां तो सभी के जन्म के साथ उठाई जा सकती हैं, क्योंकि दोनों विकल्प सभी के सामने होते हैं–या तो संसार की दौड़ का, या संन्यास का। संन्यास या संसार–ये तो दो विकल्प सभी के सामने होते हैं। इन पंडितों ने कुछ विशेष नहीं किया अगर बुद्ध के लिए दो अंगुलियां उठाईं; मैं एक अंगुली उठाता हूं: यह संन्यासी होगा।
लेकिन आदमी का अभागा मन, शुद्धोधन रोने लगा। यह कोदन्ना सर्वज्ञात ज्योतिषी है; युवा है, पर महातेजस्वी है; और उसके वचन कभी खाली नहीं गए। दूसरे पंडितों के साथ तो सुविधा थी थोड़ी कि चक्रवर्ती भी बन सकता है, कोदन्ना ने तो विकल्प ही तोड़ दिया। उसने तो कहा, यह निश्चित बुद्ध बनेगा। उन पंडितों के साथ तो सम्राट रोया न था, प्रसन्न हुआ था–चक्रवर्ती सम्राट होगा बेटा। और दूसरे विकल्प को उसने कोई मूल्य न दिया था, क्योंकि जब चक्रवर्ती सम्राट होने का विकल्प हो तो कौन संन्यासी होना चाहता है! लेकिन कोदन्ना ने तो मार्ग तोड़ दिया, उसने तो एक ही अंगुली उठाई है। लेकिन सम्राट ने अपने मन को समझाया, कोदन्ना अकेला है, विपरीत सात ज्योतिषी हैं। ऐसे ही तो आदमी अपने मन को सांत्वना देता है। सात ही ठीक होंगे, एक ठीक न होगा। लेकिन वह एक ही ठीक सिद्ध हुआ। और अच्छा हुआ कि वह एक ही ठीक सिद्ध हुआ।
तुम्हारे जन्म के समय भी, जन्म के बाद भी–चाहे पंडित बुलाए गए हों, न बुलाए गए हों–प्रकृति दो अंगुलियां उठाती है। सारी प्रकृति दो विकल्प सामने रखती है–या तो खो जाना मूर्च्छा में, या जाग जाना होश में; या तो बाहर की संपदा को जुटाना, चक्रवर्ती होने की दौड़ में लगना; या भीतर की संपदा को जुटाना, आत्मवान होने में थिर होना। कोदन्ना की एक अंगुली याद रखना! कोई कोदन्ना तुम्हें न मिलेगा अंगुली उठाने को, तुम्हें ही अपनी अंगुली उठानी पड़ेगी।
ओशो
भज गोविंदम् मूढमते