Posted in खान्ग्रेस

1936માં એડવિના બેટન ઈરાકના પ્રવાસે ગઈ હતી.
તેને ઈરાકમાં એક કાંચીડો એટલો ગમ્યો કે તેણે તેને ખરીદ્યો અને પ્રેમથી તેનું નામ ગાંધી રાખ્યું.

રસપ્રદ વાત એ છે કે એડવિનાએ આ વાત તેના નજીકના મિત્ર જવાહરલાલ નેહરુથી પણ છુપાવી ન હતી અને નહેરુએ પણ ક્યારેય તેની સામે કોઈ વાંધો વ્યક્ત કર્યો ન હતો.

આઝાદીની ચળવળનો ઈતિહાસ શોધશો તો  જણાશે કે એડવિનાએ ક્યારેય ગાંધીને માન આપ્યું નથી.
એડવિનાએ પહેલી જ વાર માં ગાંધીજીના દંભને ઓળખ્યો હતો.

સલમાન રશ્દી બ્રિટિશ લેખક હતા.
તેણે પોતાના કૂતરાનું નામ જવાહરલાલ રાખ્યું.
આ સમાચાર લંડન મારફતે સમગ્ર વિશ્વમાં ફેલાઈ ગયા.  આ સાંભળીને કોંગ્રેસીઓને ખૂબ જ ખરાબ લાગ્યું અને તેઓએ સૌપ્રથમ સલમાન રશ્દી પર કૂતરાનું નામ બદલવા માટે દબાણ કર્યું અને જ્યારે સલમાન રશ્દી દબાણ સામે ન ઝૂક્યા તો તેમને ધમકીઓ મળવા લાગી.
આમ છતાં સલમાન રશ્દીએ કૂતરાનું નામ બદલ્યું ન હતું.
સલમાન રશ્દીને ભારત પ્રત્યે કોઈ દુશ્મની નહોતી.
પણ તેમને જવાહરલાલ નેહરુના નામથી આટલો ધિક્કાર કેમ હતો?
આ વાત આજ સુધી કોઈ જાણી શક્યું નથી.

એવું સાંભળવામાં આવ્યું છે કે કોંગ્રેસીઓને રાહુલ ગાંધીનું પપ્પુ સંબોધન પણ ખૂબ જ અપમાનજનક લાગે છે અને તેઓ એલોન મસ્ક પાસે એવા લોકોના આઈડી બ્લોક કરવાની માંગ કરવા જઈ રહ્યા છે જેઓ સોશિયલ મીડિયા પર રાહુલ ગાંધીને પપ્પુ કહે છે.

Posted in रामायण - Ramayan

રામ મંદિર પર હુમલાની યોજના ઘડનાર આ આતંકવાદી અબ્દુલ રહેમાનને ગુજરાત એટીએસ દ્વારા હરિયાણાના ફરીદાબાદમાં ધરપકડ કરવામાં આવી હતી.

  ગુજરાત ATSએ દોઢ વર્ષ પહેલા ગોધરામાં ઈસ્લામિક સ્ટેટ ખોરાસાન પ્રાંતના આતંકવાદી સંગઠન સાથે સંકળાયેલા 5 થી 6 આતંકીઓની ધરપકડ કરી પૂછપરછ કરી હતી.

  તેઓએ કહ્યું કે અમારું એક મોડ્યુલ રામ મંદિરને ઉડાવી દેવાની યોજના પર કામ કરી રહ્યું છે અને તેણે અબ્દુલ રહેમાનનું નામ જણાવ્યું જે મિલ્કીપુર, ફૈઝાબાદનો રહેવાસી હતો.

ગુજરાત એટીએસે તેની તાત્કાલિક ધરપકડ કરી ન હતી, પરંતુ ગુજરાત એટીએસ તેના લેપટોપથી તેના મોબાઈલ ફોન સુધી તેના પર દેખરેખ રાખતી હતી અને તેની દરેક હિલચાલ અને તે શું કહે છે તેના પર નજર રાખી રહી હતી.

તેને તેના માસ્ટર તરફથી સૂચના મળી કે શું આપણે રામ મંદિર પર ડ્રોનથી હુમલો કરી શકીએ છીએ, પછી ગુજરાત એટીએસ દ્વારા તરત જ યુપી સરકાર અને રામ મંદિર પ્રશાસનને આ સંદેશો મોકલવામાં આવ્યો હતો અને તે પછી રામ મંદિરમાં ડ્રોન મારવાની સિસ્ટમ લગાવવામાં આવી હતી કે શું તે ડ્રોનથી હુમલો કરી શકે છે કે કેમ, પરંતુ ડ્રોન એટેકની સિસ્ટમ તરત જ રામ મંદિરમાં લગાવી દેવામાં આવી હતી.

એ પછી પાકિસ્તાનમાં બેઠેલા અબ્દુલ રહેમાનના હેન્ડલરે તેને કહ્યું કે ગ્રેનેડથી હુમલો કરવો વધુ સારું રહેશે અને તેને કહેવામાં આવ્યું કે તેને ગ્રેનેડ પહોંચાડવામાં આવશે.

ગુજરાત ATS બધું સાંભળી રહી હતી અને રાહ જોઈ રહી હતી કે તેને ગ્રેનાઈટની ડિલિવરી ક્યારે મળે.

  જે બાદ તે ગ્રેનેડ સાથે ઝડપાયો હતો

કલ્પના કરો કે તેઓ રામ મંદિરના નિર્માણથી કેટલા નાખુશ છે કે તેઓ તેને નષ્ટ કરવાનો પૂરો પ્રયાસ કરી રહ્યા છે.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मुहल्ले में जिस ने भी सुना, उस की आंखें विस्मय से फटी की फटी रह गईं… ‘सतीश दास मर गया.’ विस्मय की बात यह नहीं कि मरियल सतीश दास मर गया बल्कि यह थी कि वह पत्नी के लिए पूरे साढ़े 5 लाख रुपए छोड़ गया है. कोई सोच भी नहीं सकता था कि पैबंद लगे अधमैले कपड़े पहनने वाले, रोज पुराना सा छाता बगल में दबा कर सवेरे घर से निकलने, रात में देर से  लौटने वाले सतीश के बैंक खाते में साढ़े 5 लाख की मोटी रकम जमा होगी.

गली के बड़ेबूढ़े सिर हिलाहिला कर कहने लगे, ‘‘इसे कहते हैं तकदीर. अच्छा खाना- पहनना भाग्य में नहीं लिखा था पर बीवी को लखपती बना गया.’’ कुछ ने मन ही मन अफसोस भी किया कि पहले पता रहता तो किसी बहाने कुछ रकम कर्ज में ऐंठ लेते, अब कौन आता वसूल करने.

जीते जी तो सभी सतीश को उपेक्षा से देखते रहे, कोई खास ध्यान न देता जैसे वह कोई कबाड़ हो. किसी से न घनिष्ठता, न कोई सामाजिक व्यवहार. देर रात चुपचाप घर आना, खाना खा कर सो जाना और सवेरे 8 बजे तक बाहर…

महल्ले में लोगों को इतना पता था कि सतीश दास थोक कपड़ों की मंडी में दलाली किया करता है. कुछ को यह भी पता था कि जबतब शेयर मार्केट में भी वह जाया करता था. जो हो, सचाई अपनी जगह ठोस थी. पत्नी के नाम साढ़े 5 लाख रुपए निश्चित थे.

आमतौर पर बैंक वाले ऐसी बातें खुद नहीं बताते, नामिनी को खुद दावा करने जाना पड़ता है. वह तो बैंक का क्लर्क सुभाष गली में ही रहता है, उसी ने बात फैला दी. अमिता के घर यह सूचना देने सुभाष निजी रूप से गया था और इसी के चलते गली भर को मालूम हो गई यह बात.

वह नातेदार, पड़ोसी, जो कभी उस के घर में झांकते तक न थे, वह भी आ कर सतीश के गुणों का बखान करने लगे. गली वालों ने एकमत से मान लिया कि सतीश जैसा निरीह, साधु प्रकृति आदमी नहीं मिलता है. अपने काम से काम, न किसी की निंदा, न चुगली, न झगड़े. यहां तो चार पैसे पाते ही लोग फूल कर कुप्पा हो जाते हैं.

अमिता चकराई हुई थी. यह क्या हो गया, वह समझ नहीं पा रही थी.

उसे सहारा देने दूर महल्ले के मायके से मां, बहन और भाई आ पहुंचे. बाद में पिताजी भी आ गए. आते ही मां ने नाती को गोद में उठा लिया. बाकी सब भी अमिता के 4 साल के बच्चे राहुल को हाथोंहाथ लिए रहते.

मां ने प्यार से माथा सहलाते हुए कहा, ‘‘मुन्नी, यों उदास न रहो. जो होना था वह हो गया. तुम्हें इस तरह उदास देख कर मेरी तो छाती फटती है.’’

पिता ने खांसखंखार कर कहा, ‘‘न हो तो कुछ दिनों के लिए हमारे साथ चल कर वहीं रह. यहां अकेली कैसे रहेगी, हम लोग भी कब तक यहां रह सकेंगे.’’

‘‘और यह घर?’’ अमिता पूछ बैठी.

‘‘अरे, किराएदारों की क्या कमी है, और कोई नहीं तो तुम्हारे मामा रघुपति को ही रख देते हैं. उसे भी डेरा ठीक नहीं मिल रहा है, अपना आदमी घर में रहेगा तो अच्छा ही होगा.’’

‘‘सुनते हो जी,’’ मां बोलीं, ‘‘बेटी की सूनी कलाई देख मेरी छाती फटती है. ऐसी हालत में शीशे की नहीं तो सोने की चूडि़यां तो पहनी ही जाती हैं, जरा सुखलाल सुनार को कल बुलवा देते.’’

‘‘जरूर, कल ही बुला देता हूं.’’

अमिता ने स्थायी रूप से मायके जा कर रहना पसंद नहीं किया. यह उस के पति का अपना घर है, पति के साथ 5 साल यहीं तो बीते हैं, फिर राहुल भी यहीं पैदा हुआ है. जाहिर है, भावनाओं के जोश में उस ने बाप के घर जा कर रहने से मना कर दिया.

सुभाषचंद्र के प्रयास से वह बैंक में मैनेजर से मिल कर पति के खाते की स्वामिनी कागजपत्रों पर हो गई. पासबुक, चेकबुक मिल गई और फिलहाल के जरूरी खर्चों के लिए उस ने 25 हजार की रकम भी बैंक से निकाल ली.

अब वह पहले वाली निरीह गृहिणी अमिता नहीं बल्कि अधिकार भाव रखने वाली संपन्न अमिता है. राहुल को नगर निगम के स्कूल से हटा कर पास के ही एक अच्छे पब्लिक स्कूल में दाखिल करा दिया. अब उसे स्कूल की बस लाती, ले जाती है.

बेटी घर में अकेली कैसे रहेगी, यह सोच कर मां और छोटी बहन वीणा वहीं रहने लगीं. वीणा वहीं से स्कूल पढ़ने जाने लगी. छोटा भाई भी रोज 1-2 बार आ कर पूछ जाता. अब एक काम वाली रख ली गई, वरना पहले अमिता ही चौका- बरतन से ले कर साफसफाई का सब काम करती थी.

अमिता के मायके का रुख देख कर पासपड़ोस की औरतों ने आना लगभग छोड़ सा दिया. अमिता और उस के मायके वालों की महल्ले भर में कटु आलोचनाएं होने लगीं.

‘‘पैसा क्या मिला दिमाग आसमान पर चढ़ गया है… कोई पूछे, तमाम दुनिया में तुम्हीं एक अनोखी लखपती हो क्या?’’

‘‘हम तो गए थे हालचाल पूछने, घड़ी दो घड़ी बातचीत करने, लेकिन घर वाले यों घूर कर देखते हैं जैसे कुछ चुराने या मांगने आए हों.’’

‘‘लानत भेजो जी, तुम देखना, घर वाले सारा पैसा चूस कर अमिता को छोड़ देंगे…’’

पड़ोसियों की इन बातों से अमिता अनजान नहीं थी. मां ने अफसोस से कहा, ‘‘कैसा सूनासूना लगता है बेटी का गला. बेटी, मेरा हार यों ही पड़ा है. ठहरो, ला देती हूं. गले में कुछ डाले रहो…’’

यही मां है. अभी 2 साल की ही तो बात है, सतीश के साथ एक विवाह में अमिता को जाना पड़ा था. यों तो वह कहीं साथ नहीं जाते थे, लेकिन एक थोक कपड़ा व्यापारी सतीश के खास दोस्त थे, उन के घर विवाह में वह सपरिवार वहां निमंत्रित थे. अमिता के कानों में हलके रिंग थे, लेकिन कलाई और गले में भी तो कुछ चाहिए, सूना गला नहीं जंचता था. मां से हार मांगने गई थी कि शादी में पहनेगी और वापस कर देगी. लेकिन मां ने यह कह कर साफ इंकार कर दिया था कि शादीब्याह की भीड़ में कोई छीन कर भाग जाएगा तो?

और आज वही मां उस के सूने गले में अपना वही हार डालने को बेचैन हैं.

मन में कितनी कटु बातें उमड़ीं, लेकिन वह बोली, ‘‘नहीं मां, वह पुराने फैशन का हार मुझ से नहीं पहना जाएगा. मैं हार बनवा लूंगी…’’

कई बार सतीश से वह झगड़ी थी, ‘कहीं आनाजाना हो तो गले में कुछ तो चाहिए.’ वह चुपचाप सुन लेता.

मां ने सुखलाल सुनार से अमिता के खर्चे पर ही उसे 4 सोने की चूडि़यां बनवा दी थीं, लेकिन वह दोपहर में बिना किसी को कुछ बताए कपड़े बदल कर निकल पड़ी. जौहरी बाजार उस का देखा हुआ था. रिकशे से सीधी वहीं पहुंची और एक दुकान में घुस गई. दुकानदार ने हार दिखाए. दाम पूछ कर उस ने एक हलका सा किंतु कीमती हार चुन लिया. सोने की शुद्धता की गारंटी दुकानदार ने खुद दे दी और साथ में यह भी कहा, ‘‘बहनजी, इसे आप अपनी ही दुकान समझें. कुछ भी लेनादेना  या तुड़वाना हो तो हम सेवा के लिए ही हैं.’’

अमिता लौटी. मन में एक तृप्ति थी. रुपया भी क्या चीज है. उस के मन में एक सुखद अनुभूति थी. हार देख कर मां और बहन की आंखें फटी की फटी रह गईं.

अमिता मन में सोचने लगी कि रुपए के लिए वह बेचारे जिंदगी भर खटते रहे, मेहनत की, न अच्छा खायापिया न पहना और मुझ को लखपती बना गए. उस का मन भर आया. वह सतीश की फोटो के आगे सिर झुका कर बुदबुदाई, ‘तुम्हारी मेहनत के पैसों का…ध्यान रखूंगी…यों ही बरबाद न होने दूंगी…अपनेपराए बहुत पहचान में आ रहे हैं…पैसा सब की कलई उतार देता है…’

पिता नगर निगम की क्लर्की से रिटायर हुए थे. पेंशन से घर चलाना कठिन होने पर कपड़ा मंडी में उन्होंने एक दुकान का बहीखाता लिखने का काम संभाल लिया था. वह एक दिन घबराए हुए आए. बताया कि बरसों पहले आफिस से एक मित्र क्लर्क को बैंक से लोन लेने में उन्होंने अपनी जमानत दी थी. पूरा कर्ज वसूल न हो पाया, मित्र रिटायर हो कर न जाने कहां चला गया है, पता नहीं लगता और बैंक वालों ने उन पर दावा दायर कर दिया है. अब 15 दिनों में रकम जमा न करने पर घर का सामान नीलाम करा लेंगे या मुझे जेल यात्रा करनी पड़ेगी.

पिता के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. मां रोने लगीं.

‘‘कितनी रकम का कर्ज था?’’ अमिता ने सहमते हुए पूछा.

‘‘कर्ज तो 50 हजार का था पर उस ने किस्तों में 30 हजार दे दिए थे, बाकी के 20 हजार का दावा बैंक वालों ने किया है…’’

मां ने रोते हुए अमिता का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बेटी, अब तुम्हारे ही ऊपर है, इन्हें जेल जाने से बचाओ…’’

अमिता ने बैंक द्वारा भेजे गए कागज देखने चाहे. पिता का चेहरा उतर गया. बोले, ‘‘बैंक ने अभी तो सम्मन नहीं भेजा है, लेकिन वहां के एक जानपहचान के आदमी ने बताया है कि जल्द भेजने की तैयारी हो रही है. उस ने राय दी है कि मैं मैनेजर से मिल लूं और शीघ्र रुपए की व्यवस्था करूं.’’

‘‘तो कागज आने दीजिए, तब देखेंगे.’’

‘‘तुम बात नहीं समझीं. सम्मन आने पर तुरंत बात फैल जाएगी, क्या इज्जत रहेगी तब?’’

मां ने कातर भाव से कहा, ‘‘बेटी, अब मांबाप की इज्जत तुम्हीं बचा सकती हो.’’

अमिता ने चेकबुक निकाली और पिता के नाम 20 हजार रुपए की राशि भर उन्हें चेक दे दिया.

मांबाप ने आशीर्वाद की झड़ी लगा दी. घर का वातावरण फिर सहज होने लगा.

अमिता ने हिसाब लगाया. खर्च के लिए पहले निकाली रकम 25 हजार लगभग खत्म होने को है. अब यह 20 हजार और बैंक की रकम से निकल गई. यों ही यदि चलता रहा, तो…

सुबह राहुल को स्कूल की बस ले गई तो वह कपड़े बदल कर बैंक के क्लर्क सुभाषचंद्र के घर गई. वह बैंक जाने की तैयारी में थे और उन की पत्नी टिफिन में खाना रख रही थी. दोनों ने बड़े अपनेपन से अमिता का स्वागत किया. सुभाष की पत्नी उस के लिए चाय बनाने चली गई.

‘‘सुभाषजी,’’ अमिता बोली, ‘‘मैं सोचती हूं कि बैंक में पड़ी रकम के लिए कुछ ऐसा उपाय हो कि जब तब उस में से रुपए निकाले न जा सकें, सुरक्षित रहें.’’

‘‘वही तो मैं आप को राय देना चाहता था,’’ सुभाषचंद्र ने उत्साह से कहा, ‘‘आप ने कल 20 हजार का एक चेक भुनवाया है. मेरी सलाह मानिए तो पूरी रकम को 5 साल के लिए फिक्स्ड डिपाजिट में डाल दें. ब्याज भी अधिक मिलेगा और रकम भी सुरक्षित रहेगी.’’

उन्होंने अमिता को विस्तार से चालू और सावधिक खातों के बारे में समझाया. अमिता ने राहुल की फीस, किताब, कापी, कपड़ों और अपने अन्य खर्चों के बारे में बताया तो सुभाष ने कहा, ‘‘आप की जो जमा रकम है, उस पर हर साल 25 हजार से ज्यादा का ब्याज मिलेगा. आप प्रतिमाह 2 हजार उस में से ले सकती हैं. इस के लिए आप को बैंक को लिखित रूप में देना होगा. इतने में तो आप के जरूरी घरेलू खर्च चल जाने चाहिए.’’

उन्होंने राहुल को नौमनी बनाते हुए अमिता को अपना जीवनबीमा करा लेने की सलाह भी दी.

अमिता के आगे सुरक्षा का नया संसार खुल गया. मन की चिंता दूर हो गई. सुभाष के साथ वह बैंक गई और जमा राशि को फिक्स्ड डिपाजिट में करवा देने की काररवाई उसी दिन पूरी कर दी.

बैंक से फोन कर सुभाष ने बीमा कार्यालय के एक एजेंट को वहां बुलवाया और अमिता से परिचय कराते हुए जीवन बीमा पालिसी के बारे में बातें कीं.

एजेंट विवेक ने अमिता को विभिन्न पालिसियों के बारे में समझाया और शाखा कार्यालय में ले जा कर फार्म भरवाने के साथसाथ अन्य जांचों की भी काररवाई पूरी करा दी.

बीमे की किस्त अमिता को हर 3 माह पर नकद देनी थी. विवेक ने जिम्मा लिया कि वह समय पर आ कर रुपए ले जा कर कागजी काररवाई निबटा देगा.

अमिता लगभग 4 बजे घर पहुंची तो सब चिंतित थे. मां ने पूछा, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी, बेटी?’’

‘‘बैंक गई थी मां, कुछ और भी जरूरी काम थे…’’

घर वालों के चेहरे आशंकाओं से घिर गए कि बैंक क्या करने गई थी. पर पूछने का साहस किसी में न हुआ.

2 दिन बाद छोटा भाई ललित आया और बोला, ‘‘दीदी, कालिज से 20 लड़कों का एक ग्रुप विन्टरविकेशन में गोआ घूमने जा रहा है, हर लड़के को 5 हजार जमा करने पड़ेंगे…’’

अमिता ने सख्ती से कहा, ‘‘अभी, गरमियों की छुट्टी में तुम मसूरी घूमने गए थे न? हर छुट्टी में मटरगश्ती गलत है. तुम्हें छुट्टियों में यहीं रह कर वार्षिक परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए. मैं इतने रुपए न जुटा सकूंगी…’’

ललित का चेहरा उतर गया. मां भी अमिता का रुख देख कुछ न कह सकीं.

3 माह पूरे होने पर विवेक आ कर बीमे की किस्त ले गया और कागजों पर उस से हस्ताक्षर भी कराए. अमिता ने साफ शब्दों में मां को बता दिया कि उसे अब राहुल की फीस और ललित की कोचिंग की फीस ही देने योग्य आय होगी, वीणा की फीस पिताजी जैसे पहले देते थे, दिया करें.

विवेक की सलाह से अमिता ने एक स्वयंसेवी संस्था की सदस्यता ग्रहण कर ली. उस के कार्यक्रमों में वह अधिकतर घर के बाहर ही रहने लगी. बाहरी अनुभव बढ़ने और व्यस्तता के चलते अब अमिता का तनमन अधिक खुश रहने लगा.

विवेक से अमिता की अच्छी पटने लगी. अकसर दोनों साथ ही बाहर घूमनेफिरने निकलते. यह देख कर मांपिता सहमते, किंतु सयानी और लखपती बेटी को क्या कहते. उस के कारण घर की हालत बदली थी.

साल भर बाद ही एक दिन अमिता, मां से बोली, ‘‘मां, मैं ने विवेक से विवाह करना तय कर लिया है, तुम्हारा आशीर्वाद चाहिए…’’

मां को तो कानों पर विश्वास ही न हुआ. हतप्रभ सी खड़ी रह गईं. बगल के कमरे से पिताजी भी आ गए, ‘‘क्या हुआ? मैं क्या सुन रहा हूं?’’

‘‘मैं विवेक के साथ विवाह करने जा रही हूं, आशीर्वाद दें.’’

मां फट पड़ीं, ‘‘तेरी बुद्धि तो ठीक है, भला कोई विधवा…’’ तभी विवेक आ गया. उसे देख कर मां खामोश हो गईं. लेकिन आतेआते उस ने उन की बातें सुन ली थीं, अंतत: हंस कर विवेक बोला, ‘‘मांजी, आप किस जमाने की बात कह रही हैं? अब जमाना बदल गया है. अब विधवा की दोबारा शादी को बुरा नहीं समझा जाता. जब हमें कोई आपत्ति नहीं है तो दूसरों से क्या लेनादेना. खैर, आप लोगों का आशीर्वाद हमारे साथ है, ऐसा हम ने मान लिया है. चलो, अमिता.’’

उसी दिन आर्यसमाज मंदिर में उन का विवाह संपन्न हो गया. मन में सहमति न रखते हुए भी अमिता के मातापिता व भाईबहन विवाह समारोह में शामिल हुए. मांपिता ने कन्यादान किया. विवेक के घर में केवल मां और छोटी बहन थीं और विवेक के आफिस के सहयोगी भी पूरे उत्साह के साथ सम्मिलित हुए. साथियों ने निकट के रेस्तरां में नवदंपती के साथ सब की दावत की.

अमिता ने मांपिता के पैर छुए. फिर अमिता के साथ सभी लोग उस के घर आ गए तो विवेक की मां ने कहा, ‘‘समधीजी, अब अमिता को विदा कीजिए. वह अब मेरी बहू है, उसे अपने घर जाने दें…’’

पिता की जबान खुली, ‘‘लेकिन, राहुल…’’

विवेक की मां ने हंस कर कहा, ‘‘राहुल विवेक को बहुत चाहता है, विवेक भी उसे अपने बेटे की तरह प्यार करता है. बच्चे को उस का पिता भी तो मिलना चाहिए.’’

अमिता बोली, ‘‘पिताजी, मेरे इस घर को फिलहाल किराए पर उठा दें. उस पैसे से भाईबहनों की पढ़ाई, घर की देखभाल आदि का खर्च निकल आएगा.’’

चलते समय विवेक ने अमिता के मातापिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं ने अमिता से स्पष्ट कह दिया है कि तुम्हारा जो धन है वह तुम्हारा ही रहेगा, तुम्हारे ही नाम से रहेगा. मैं खुद अपने परिवार, पत्नी और पुत्र के लायक बहुत कमा लेता हूं. आप ऐसा न सोचें कि उस के धन के लालच से मैं ने शादी की है. वह उस का, राहुल का है.’’

फिर मातापिता के पैर छू कर विवेक और अमिता थोड़े से सामान और राहुल को साथ लेकर चले गए.

Posted in आरक्षण

सनातन धर्म को एक सूत्र में बांधकर उन्हें एकत्रित करने और एक मजबूत राष्ट्र निर्माण में #ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है:

ब्राम्हणों  ने विवाह के समय अनिवार्य किया कि #दलित स्त्री द्वारा बनाये गये चूल्हे पर ही सभी शुभ कार्य होगें। इस तरह #दलित को जोड़ा गया।

#धोबन के द्वारा दिये गये सुहाग से ही कन्या सुहागन रहेगी इस तरह #धोबी को जोड़ा।

#कुम्हार  द्वारा दिये गये मिट्टी के कलश पर ही देवताओ के पुजन होगें यह कहते हुये कुम्हार को जोड़ा।

#मुसहर जाति जो वृक्ष के पत्तों से पत्तल/दोनिया बनाते है यह कहते हुये जोड़ा कि इन्हीं के बनाए गये पत्तल/दोनीयों से देवताओं का पुजन सम्पन्न होगे।

#कहार जो जल भरते थे यह कहते हुए जोड़ा कि इन्हीं के द्वारा दिये गये जल से देवताओं के पूजन होगा।
#यादव के गौशाला के दूध से बने प्रसाद को भगवान को भोग लगाया जाता है।

#विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए हथियार को भगवान के शस्त्र के रूप में स्वीकार किया गया।

#बढ़ई जो लकड़ी के कार्य करते थे यह कहते हुये जोड़ा कि इनके द्वारा बनाये गये आसन/चौकी पर ही बैठकर वर-वधू देवताओं का पुजन करेंगे।

#मालाकार जो डाल और मौरी को दूल्हे के सर पर रख कर द्वारचार कराया जाता है, #माली को यह कहते हुये जोड़ा गया कि इनके द्वारा बनाये गये उपहारों के बिना देवताओं का आशीर्वाद नहीं मिल सकता।

#डोम जो गंदगी साफ और मैला ढोने का काम किया करते थे उन्हें यह कहकर जोड़ा गया कि #मरणोंपरांत इनके द्वारा ही प्रथम मुखाग्नि दिया जायेगा।
इस तरह समाज के सभी वर्ग जब आते थे तो घर कि महिलायें मंगल गीत का गायन करते हुये उनका स्वागत करती है।और पुरस्कार सहित दक्षिणा देकर बिदा करती थी।

समाज के हर वर्ग की उपस्थिति हो जाने के बाद ब्राह्मण #नाई से पुछता था कि क्या सभी वर्गो कि उपस्थिति हो गयी है…?
#नाई के हाँ कहने के बाद ही #ब्राह्मण मंगल-पाठ प्रारम्भ किया करते हैं।

Posted in हिन्दू पतन

बॉलीवुड का इस्लामीकरण कैसे हुआ….?
ध्यान से पढ़ें…👇👇👇👇👇

👉सभी जानते हैं कि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त एक हिंदू थे और उनकी पत्नी फातिमा राशिद यानी नर्गिस एक मुस्लिम थीं।

👉लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि संजय दत्त ने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वह इतना चतुर भी है कि अपना फिल्मी नाम नहीं बदला।

जरा सोचिए कि हम सभी लोग इन कलाकारों पर हर साल कितना धन खर्च करते हैं। सिनेमा के मंहगा टिकटों से लेकर केबल टीवी के बिल तक।

हमारे नादान बच्चे भी अपने जेबखर्च में से पैसे बचाकर इनके पोस्टर खरीदते हैं और इनके प्रायोजित टीवी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए हजारों रुपए के फोन करते हैं।

एक विचारणीय बिन्दू यह भी है कि बाॅलीवुड में शादियों का तरीका ऐसा क्यों है कि शाहरुख खान की पत्नी गौरी छिब्बर एक हिंदू है।

आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता /किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह / करीना कपूर दोनों हिंदू हैं।

इसके पिता नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी।

फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं।

अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है।

सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं।

अनेक उदाहरण ऐसे हैं कि हिंदू अभिनेत्रियों को अपनी शादी बचाने के लिए धर्म परिवर्तन भी करना पड़ा है।

आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी का नाम अवंतिका मलिक है। संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है।

फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है। इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है। नसरुद्दीन शाह की हिंदू पत्नी रत्ना पाठक हैं।

एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा।

ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप कुमार समझते रहे।

महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू ह्रदयों पर राज करतीं रहीं।

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जॉनी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान विलेन अजित बनकर काम करते रहे।

हममें से कितने लोग जान पाए कि अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था।

आज के समय का एक सफल कलाकार जॉन अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है।

जरा सोचिए कि पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है।

यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है?

जरा सोचिए कि हम कौनसी फिल्मों को बढ़ावा दे रहे हैं?
क्या वजह है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू लड़की होती है?

क्योंकि ऐसा फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम चाहता है। टी-सीरीज का मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा।

आज भी एक फिल्मकार को मुस्लिम हीरो साइन करते ही दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है। इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सात सितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं।

सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों की सफलता की गारंटी बना दिए गए हैं।

अक्षय कुमार, मनोज कुमार और राकेश रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं।

तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहा अली खान और जरीन खान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं और इस्लामी कठमुल्लाओं को उनका काम गैरमजहबी लगता है।

फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी – बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है।

इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है।

इन अंडरवर्ड के हरामखोरों की असिलियत को पहचानिये और हिन्दू समाज को संगठित करिये तब ही हम  अपने धर्म की रक्षा कर पाएंगे ।

इस पोस्ट को हर हिन्दू तक  पहुँचाना हम सब हिन्दुओं की प्राथमिकता है।
आभार वैष्णवी  सिंह जी
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

Posted in हिन्दू पतन

बॉलीवुड का इस्लामीकरण कैसे हुआ….?
ध्यान से पढ़ें…👇👇👇👇👇

👉सभी जानते हैं कि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त एक हिंदू थे और उनकी पत्नी फातिमा राशिद यानी नर्गिस एक मुस्लिम थीं।

👉लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि संजय दत्त ने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वह इतना चतुर भी है कि अपना फिल्मी नाम नहीं बदला।

जरा सोचिए कि हम सभी लोग इन कलाकारों पर हर साल कितना धन खर्च करते हैं। सिनेमा के मंहगा टिकटों से लेकर केबल टीवी के बिल तक।

हमारे नादान बच्चे भी अपने जेबखर्च में से पैसे बचाकर इनके पोस्टर खरीदते हैं और इनके प्रायोजित टीवी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए हजारों रुपए के फोन करते हैं।

एक विचारणीय बिन्दू यह भी है कि बाॅलीवुड में शादियों का तरीका ऐसा क्यों है कि शाहरुख खान की पत्नी गौरी छिब्बर एक हिंदू है।

आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता /किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह / करीना कपूर दोनों हिंदू हैं।

इसके पिता नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी।

फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं।

अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है।

सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं।

अनेक उदाहरण ऐसे हैं कि हिंदू अभिनेत्रियों को अपनी शादी बचाने के लिए धर्म परिवर्तन भी करना पड़ा है।

आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी का नाम अवंतिका मलिक है। संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है।

फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है। इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है। नसरुद्दीन शाह की हिंदू पत्नी रत्ना पाठक हैं।

एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा।

ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप कुमार समझते रहे।

महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू ह्रदयों पर राज करतीं रहीं।

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जॉनी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान विलेन अजित बनकर काम करते रहे।

हममें से कितने लोग जान पाए कि अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था।

आज के समय का एक सफल कलाकार जॉन अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है।

जरा सोचिए कि पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है।

यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है?

जरा सोचिए कि हम कौनसी फिल्मों को बढ़ावा दे रहे हैं?
क्या वजह है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू लड़की होती है?

क्योंकि ऐसा फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम चाहता है। टी-सीरीज का मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा।

आज भी एक फिल्मकार को मुस्लिम हीरो साइन करते ही दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है। इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सात सितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं।

सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों की सफलता की गारंटी बना दिए गए हैं।

अक्षय कुमार, मनोज कुमार और राकेश रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं।

तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहा अली खान और जरीन खान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं और इस्लामी कठमुल्लाओं को उनका काम गैरमजहबी लगता है।

फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी – बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है।

इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है।

इन अंडरवर्ड के हरामखोरों की असिलियत को पहचानिये और हिन्दू समाज को संगठित करिये तब ही हम  अपने धर्म की रक्षा कर पाएंगे ।

इस पोस्ट को हर हिन्दू तक  पहुँचाना हम सब हिन्दुओं की प्राथमिकता है।
आभार वैष्णवी  सिंह जी
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

કુંભ


મહાકુંભથી માત્ર પ્રયાગરાજને જ ફાયદો થયો નથી.  અયોધ્યા-વારાણસી-પણ મોટા ભાગ ના ગયા જે લોકો મહાકુંભ ગયા હતા.
45 દિવસ માં 4.32 કરોડ લોકો વારાણસી બાબા ના દર્શન કરવા આવ્યા.
રોજ ના ,લગભગ 5 લાખ લોકો દર્શન કરતા હતા .

22 હજાર નાની મોટી હોટલ બુક રહી .હોવાથી..
વારાણસી માં 5000 ઘરો ને હોમ સ્ટે માં ફેરવવામાં આવી.

પરિણામે, વારાણસીમાં, 100 કરોડની રૂદ્રાક્ષની માળા વેચાઈ હતી…
30 કરોડની કિંમતની ચંદન ટીકા લગાવવામાં આવી હતી, 72 કરોડની કિંમતનો પ્રસાદ છૂટક વેચાયો હતો.

નાના મોટા કરિયાણા વાળા લોકો એ કામ ચલાવ ધાબા બનાવ્યા… ઘરે ઘરે ભોજનાલય બન્યા જે 24 કલાક શરૂ રહેતા
હોટલો, રેસ્ટોરન્ટ માં ગમે તેટલો માલ બને તરતજ ખલાસ થઈ જતો.
મોટા ભાગ ની ખાન પાન દુકાનો 24 કલાક શરૂ ..
દુકાનદારો કહે છે કે પ્રથમ વખત તેઓ ભાષા માં અટવાઈ ગયા કારણ કે મોટા ભાગના ગ્રાહકો દક્ષિણ ભારતના હતા.
2500 નાની મોટી હોડી,10 ક્રુઝ
તંત્ર એ હોડી ના દર નક્કી કર્યા હતા…375, હોડી ના માલિકો લેતા હતા 200..
175 રૂ સરકારી દર ના 100 રૂ લેતા હતા છતાંય ખૂબ કમાણા..
નાની હોડકી વાળા ની કમાણી 191 કરોડ રૂ.
મોટી ક્રૂઝ ની કમાણી ..3036 કરોડ..
હર હર મહાદેવ 🚩
જયતુ સનાતન સંસ્કૃતિ 🚩

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पचास का नोट
एक  व्यक्ति  ऑफिस में  देर  रात तक काम  करने  के  बाद  थका -हारा घर  पहुंचा  . दरवाजा  खोलते  ही  उसने  देखा  कि  उसका  पांच  वर्षीय  बेटा  सोने  की  बजाये  उसका  इंतज़ार  कर  रहा  है .
अन्दर  घुसते  ही  बेटे  ने  पूछा —“ पापा  , क्या  मैं  आपसे  एक  प्रश्न पूछ  सकता  हूँ ?”
“ हाँ -हाँ  पूछो , क्या  पूछना  है ?” पिता  ने  कहा .
बेटा – “ पापा , आप  एक  घंटे  में  कितना  कमा लेते  हैं ?”
“ इससे  तुम्हारा  क्या  लेना  देना …तुम  ऐसे  बेकार  के  सवाल  क्यों  कर  रहे  हो ?” पिता  ने  झुंझलाते  हुए  उत्तर  दिया .
बेटा – “ मैं  बस  यूँही जानना  चाहता  हूँ . प्लीज  बताइए  कि  आप  एक  घंटे   में  कितना  कमाते  हैं ?”
पिता  ने  गुस्से  से  उसकी  तरफ  देखते  हुए  कहा , “ 100 रुपये  .”
“अच्छा ”, बेटे  ने  मासूमियत   से   सर  झुकाते   हुए  कहा -, “  पापा  क्या  आप  मुझे  50 रूपये  उधार  दे  सकते  हैं ?”
इतना  सुनते  ही  वह   व्यक्ति  आग  बबूला  हो  उठा , “ तो  तुम इसीलिए  ये  फ़ालतू  का  सवाल  कर  रहे  थे ताकि  मुझसे  पैसे  लेकर तुम  कोई  बेकार  का  खिलौना   या  उटपटांग  चीज  खरीद  सको ….चुप –चाप  अपने  कमरे  में  जाओ  और  सो  जाओ ….सोचो  तुम  कितने  स्वार्थी  हो …मैं  दिन  रात  मेहनत  करके  पैसे  कमाता  हूँ  और  तुम  उसे  बेकार  की  चीजों  में  बर्वाद  करना  चाहते  हो ”
यह सुन बेटे  की  आँखों  में  आंसू  आ  गए  …और   वह  अपने  कमरे  में चला गया .
व्यक्ति  अभी  भी  गुस्से  में  था  और  सोच  रहा  था  कि  आखिर  उसके  बेटे  कि ऐसा करने कि  हिम्मत  कैसे  हुई ……पर  एक -आध  घंटा   बीतने  के  बाद  वह  थोडा  शांत  हुआ , और  सोचने  लगा  कि  हो  सकता  है  कि  उसके  बेटे  ने  सच -में  किसी  ज़रूरी  काम  के  लिए  पैसे  मांगे  हों , क्योंकि  आज  से  पहले   उसने  कभी  इस  तरह  से  पैसे  नहीं  मांगे  थे .
फिर  वह  उठ  कर  बेटे  के  कमरे  में  गया  और बोला , “ क्या तुम सो  रहे  हो ?”, “नहीं ” जवाब  आया .
“ मैं  सोच  रहा  था  कि  शायद  मैंने  बेकार  में  ही  तुम्हे  डांट  दिया , दरअसल  दिन भर  के  काम  से  मैं  बहुत
थक   गया  था .” व्यक्ति  ने  कहा .
“सॉरी बेटा ये लो  अपने  पचास  रूपये .” ऐसा  कहते  हुए  उसने  अपने  बेटे  के  हाथ  में  पचास  की  नोट  रख  दी .
“थैंक यू  पापा ” बेटा  ख़ुशी  से  पैसे  लेते  हुए  कहा , और  फिर  वह  तेजी  से  उठकर  अपनी  आलमारी  की  तरफ   गया , वहां  से  उसने  ढेर  सारे  सिक्के  निकाले  और  धीरे -धीरे  उन्हें  गिनने  लगा .
यह  देख  व्यक्ति  फिर  से  क्रोधित  होने  लगा , “ जब  तुम्हारे  पास  पहले  से  ही  पैसे  थे  तो  तुमने   मुझसे  और  पैसे  क्यों  मांगे ?”
“ क्योंकि  मेरे  पास पैसे कम  थे , पर  अब  पूरे  हैं ” बेटे  ने  कहा .
“ पापा  अब  मेरे  पास  100 रूपये  हैं . क्या  मैं  आपका  एक  घंटा  खरीद  सकता  हूँ ? प्लीज आप ये पैसे ले लोजिये और  कल  घर  जल्दी  आ  जाइये  , मैं  आपके  साथ  बैठकर  खाना  खाना  चाहता  हूँ .”
दोस्तों ,  इस तेज रफ़्तार जीवन में हम कई बार खुद को इतना बिजी  कर लेते हैं कि उन लोगो के लिए  ही समय नहीं निकाल पाते जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं इसलिए हमें ध्यान रखना होगा कि इस आपा-धापी में भी हम अपने माँ-बाप, जीवन साथी, बच्चों और अभिन्न मित्रों के लिए समय निकालें, वरना एक दिन हमें भी अहसास होगा कि हमने छोटी-मोटी चीजें पाने के लिए कुछ बहुत बड़ा खो दिया.

Posted in हिन्दू पतन

चाराचोर की कहानी-
-दुकान जाते थे बच्चे और जो मर्ज़ी उठा लेते थे, दुकानदार पैसे मांगने की हिम्मत ना करता
-बेटियाँ ज्वेलरी की दुकान में लाखों के गहने उठा लाती, और पैसे मांगने पर दुकानदार के यहाँ रेड पड़ जाती
-घर की शादी में नई गाड़ियाँ शोरूम में बारातियों के स्वागत के लिए उठा ली जातीं, सारे फर्नीचर शोरूम से उठा लिये जाते, शादी के पंडाल के लिए
-सारे बड़े कारोबारियों को रंगदारी देनी पड़ती, कई तो परेशान हो कारोबार ही बंद कर गए
-बड़े व्यवसायियों ने बच्चे बिहार से बाहर भेज दिए क्योंकि अपहरण और फ़िरौती आम बात थी, सबका ऊपर तक कट होता था
-रात में 8 बजे के बाद लड़कियों का निकलना मुश्किल होता था
-कई फेमस केस हुए इनके राज में-शिल्पी-गौतम, चंपा बिस्वास- पढ़ लीजिए
-और भ्रष्टाचार इतना कि बिहारी होना भी एक अपशब्द बन गया
कुल मिलाकर बात ये कि बदनाम बिना बात के थोड़ी ना हुए थे!!😂

Posted in रामायण - Ramayan

મહર્ષિ વિશ્વામિત્રએ ભગવાન શ્રી રામને કયા શસ્ત્રો આપ્યા હતા?

જવાબ:—
મહર્ષિ વિશ્વામિત્રે ભગવાન શ્રી રામને નીચેના શસ્ત્રો આપ્યાં હતાં, જે તમામ દૈવી શસ્ત્રો હતા:—
દંડચક્ર, ધર્મચક્ર, કાલચક્ર, વિષ્ણુચક્ર, ઐન્દ્રચક્ર, ઇન્દ્રનું વજ્રસ્ત્ર, શિવનું શ્રેષ્ઠ ત્રિશૂળ અને પશુપતાસ્ત્ર, બ્રહ્માનું બ્રહ્માશીર, બ્રહ્માસ્ત્ર, ઋષિકસ્ત્ર, મોદકી અને શિખરી નામની બે ઉગ્ર ગદાઓ, ધર્મપાશ, કલ્પશ, નૃષ્પાણ, નૃષ્પાના, નૃષ્પાણ, નૃષ્પાણ, નૃશસ્ત્ર , અગ્નિ હથિયારો, શિખરાસ્ત્ર,  વાયવ્યશાસ્ત્ર, હયશિરાસ્ત્ર, ક્રૌનશાસ્ત્ર, બે પ્રકારની શક્તિ, હાડપિંજર, ઉગ્ર મૂસળી, ખોપરી, કિંકિણી, નંદન નામથી પ્રસિદ્ધ વિદ્યાધરોનું મહાન શસ્ત્ર, શ્રેષ્ઠ તલવાર, સંમોહન નામનું શસ્ત્ર, ગંધર્વોનું પ્રિય, પ્રસવપન, પ્રશમન, કૃતજ્ઞતા, પ્રસન્નતા અને પૂર્વગ્રહ ઈવાનું પ્રચંડ શસ્ત્ર મદન, માનવશાસ્ત્ર, ગાંધર્વોનું પ્રિય, પિશાચનું પ્રિય.  મોહનસ્ત્ર, તમસ, સૌમન્, સંવર્ત, દુર્જયા, મૌસલ, સત્ય, મયસ્ત્ર, સોમદેવનું શિશિરાસ્ત્ર, વિશ્વકર્માનું દારુણાસ્ત્ર, ભગદેવતાનું ભાઈક્રસ્ત્ર, મનુનું શસ્ત્ર, શીતેષુ, સત્યવાન, સત્યકીર્તિ, ધૃષ્ટ, રભાસ, પ્રત્યક્ષમુક્તિ, અલૌકિક, અલૌકિક. સુનાભા, દશાક્ષ, શતવક્ર, દશશિશ્ર,  શતોદર, પદ્મનાભ, મહાનભ, દુન્દુનાભ, સ્વનાભ, જ્યોતિષ, શકુન, નૈરસ્ય, વિમલ, દૈત્યનાશક, યોગંધર, વિનિદ્રા, શુચિબાહુ મહાબાહુ, નિષ્કલી, વિરુચ, સરચિમાલી, ધૃતિર્માળી, વૃત્તિમાન, રુચિર, પિત્રિય, વિઘ્નહણ, રાક્ષસ, દ્વેષી કામરૂપ, કામરુચી, મોહ,  વાપર, ઝ્રુમ્ભક, સરપનાથ, પંથન અને વરુણ.
ઋષિ પાસેથી આ તમામ શસ્ત્રો પ્રાપ્ત કર્યા પછી, ભગવાન શ્રી રામે તેમના માટે વિનંતી કરી અને કહ્યું કે આ બધા દૈવી શસ્ત્રો તેમના મનમાં નિવાસ કરવા જોઈએ.  આ રીતે, આ બધા ભગવાનના મનમાં વસે છે અને જ્યારે પણ ભગવાન શ્રી રામને તેનો ઉપયોગ કરવાની જરૂર પડી, ત્યારે ભગવાને તેમને વિનંતી કરી અને તેમને તેમના મનમાંથી કાઢીને તેનો ઉપયોગ કર્યો.

           જય શ્રી રામ
    વાલ્મીકિ રામાયણ