Posted in જાણવા જેવું

वैदिक कैलेंडर :
हमारा नववर्ष चैत्र प्रतिपदा से आरंभ होता  है। हिंदू कैलेंडर के महीनों के नाम –

1. चैत्र
2. वैशाख
3. ज्येष्ठ
4. आषाढ़
5. श्रावण
6. भाद्रपद
7. अश्विन
8. कार्तिक
9. मार्गशीर्ष
10. पौष
11. माघ
12. फाल्गुन

चैत्र मास ही हमारा प्रथम मास होता है, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को नववर्ष मानते हैं। चैत्र मास अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च-अप्रैल में आता है, चैत्र के बाद वैशाख मास आता है जो अप्रैल-मई के मध्य में आता है, ऐसे ही बाकी महीने आते हैं। फाल्गुन मास हमारा अंतिम मास है जो फरवरी-मार्च में आता है। फाल्गुन की अंतिम तिथि से वर्ष की समाप्ती हो जाती है, फिर अगला वर्ष चैत्र मास का पुन: तिथियों का आरम्भ होता है जिससे नववर्ष आरम्भ होता है।
हमारे समस्त वैदिक मास ( महीने ) का नाम 28 में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं।

जिस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर होता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नाम हुआ।
1. चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास
2. विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास
3. ज्येष्ठा नक्षत्र से ज्येष्ठ मास
4. पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा से आषाढ़
5. श्रावण नक्षत्र से श्रावण मास
6. पूर्वाभाद्रपद या उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद
7. अश्विनी नक्षत्र से अश्विन मास
8. कृत्तिका नक्षत्र से कार्तिक मास
9. मृगशिरा नक्षत्र से मार्गशीर्ष मास
10. पुष्य नक्षत्र से पौष मास
11. माघा मास से माघ मास
12. पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक वैज्ञानिक एक प्रयोग करता था।
उसने दो बाल्टियों में पानी भरा और दो मेंढक पकड़कर लाया। एक बाल्टी में उसने उबलता हुआ पानी भरा और मेंढक को उसमें छोड़ा। जानते हैं आप क्या हुआ? मेंढक छलांग लगाकर बाहर निकल गया। उबलता हुआ पानी था। क्या होता? और होना क्या था? इतना तीव्र था उत्ताप जल का–मेंढक दौड़ा, वह छलांग लगाकर बाहर निकल गया। इस बात का दिखाई पड़ जाना मेंढक को कि आग सा पानी है–फिर कुछ करना थोड़े ही पड़ा। हो गई बात। निकल गया बाहर।

दूसरी बाल्टी में उसने मेंढक को डाला। उसमें कुनकुना पानी–ल्यूक-वार्म और धीरे-धीरे बाल्टी को नीचे से वह गरम करता गया। मेंढक मर गया। धीरे-धीरे पानी गरम होता गया, धीरे-धीरे पानी गरम होता गया। मेंढक को किसी तल पर यह पता नहीं चला कि पानी इतना गरम हो गया है कि मैं निकल जाऊं। धीरे-धीरे पानी गरम हुआ, मेंढक एडजस्ट होता गया। मेंढक जो था, वह धीरे-धीरे उस पानी से राजी होता गया, वह धीरे-धीरे गरम होता गया–डिग्री, आधा-डिग्री गरम होता रहा। मेंढक भी उसके साथ तैयारी करता रहा और गरम होता गया। मेंढक, थोड़ी देर में जब वह पानी उबला तो मेंढक उसी में उबल गया और मर गया।

पहला मेंढक छलांग लगाकर क्यों निकल सका? दूसरा मेंढक छलांग लगाकर क्यों नहीं निकल सका?
दूसरे मेंढक को पानी के गरम होने का तथ्य तीव्रता से दिखाई नहीं पड़ सका। धीरे-धीरे पानी गरम होता गया, वह एडजस्ट होता गया और अंत में मर गया।

जो अहिंसक दिखाई पड़ते हैं, वे अपनी हिंसा को कभी नहीं देख पाते अहिंसा के कारण। उनके भीतर की हिंसा ल्यूक-वार्म मालूम पड़ने लगती है, कुनकुनी मालूम पड़ने लगती है। वे रोज छानकर पानी पी लेते हैं। रात भोजन नहीं करते हैं। मांस नहीं खाते हैं। ऐसे वे अहिंसक हो जाते हैं। भीतर की हिंसा कुनकुनी मालूम पड़ने लगती है। लेकिन अगर वे अहिंसा की इस सारी बातचीत को अलग कर दें और पूरी दृष्टि से भीतर की हिंसा को देखें तो जैसे मेंढक छलांग लगाकर बाहर निकल गया, वैसे ही मनुष्य हिंसा के बाहर निकल सकता है। वैसे ही मनुष्य दुख के भी बाहर निकल सकता है। वैसे ही मनुष्य अज्ञान के भी बाहर निकल सकता है।
लेकिन हमारे आदर्श हमारे जीवन को कुनकुना बना देते हैं। और जो आदमी अपने जीवन को जितना आदर्शों से घेर लेता है, उतना ही उसके जीवन में ट्रांसफार्मेशन, वह क्रांति का क्षण कभी भी नहीं आ पाता, जो जीवन को बदल दे और नया कर दे।
अस्वस्थ चित्त है आदर्शों के कारण। लेकिन हम तो यही सोचते रहे हैं हजारों वर्षों से कि आदर्शों के कारण ही हम मनुष्य हैं! पशु नहीं हैं, फलां नहीं हैं, ढिकां नहीं हैं! आदर्श ही हमारे जीवन का लक्ष्य हैं। आदर्श जिसके जीवन में है, वही महान है! आदर्श जिसके जीवन में है, वही नैतिक, वही धार्मिक है!
झूठी हैं ये सब बातें। आदर्श जिसके जीवन में है, वह कभी धार्मिक हो ही नहीं सकेगा। आदर्श खुद को धोखा देने का, सेल्फ डिसेप्शन की तरकीब है, साइंस है। और हजारों साल से आदमी अपने को धोखा दे रहा है। इस प्रवंचना को तोड़ना जरूरी है।
जिस व्यक्ति को भी स्वस्थ चित्त उपलब्ध करना हो, उसे आदर्शों के जाल से मुक्त हो ही जाना चाहिए। फिर हम जीवन के तथ्यों को जैसे वे हैं, देखने में समर्थ हो सकते हैं। फिर हम अपने भीतर उतर सकते हैं और खोज सकते हैं–हिंसा को, क्रोध को, घृणा को।
स्वास्थ्य तो आधा इससे ही उपलब्ध हो जाएगा, जिस क्षण आपके आदर्शों से चित्त मुक्त हो गया। आप एकदम सरल हो जाएंगे। एक ह्यूमिलिटी, एक विनम्रता आ जाएगी। आदर्श की वजह से एक दंभ आ जाता है–मैं अहिंसक हूं, मैं फलां हूं, मैं ढिकां हूं, मैं धार्मिक हूं–ये सब अहंकार के रूप हैं, रोग हैं।
लेकिन जो आदमी सारे आदर्शों को मन से हटा देता है, और मन की तथ्यात्मकता को, वह जो मन है–हिंसा, क्रोध, घृणा से भरा हुआ,र् ईष्या से भरा हुआ–उसको जानता है वह एकदम विनम्र हो जाता है। एक ह्यूमिलिटि अचानक उसके ऊपर आ जाती है। वह देखता है, मैं क्या हूं? तथ्य बताते हैं कि मैं क्या हूं? मेरी असलियत क्या है? और जिस दिन वह पूरी शांति से और पूरी सरलता से, पूरी विनम्रता से इन तथ्यों को देखता है–वह देखना ही, वह दर्शन एक छलांग बन जाती है–एक जंप, उसके जीवन में आ जाता है, एक क्रांति उसके जीवन में आ जाती है।
   असंभव क्रांति
    प्रवचन – 5
       ओशो

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“एक बहुत पुरानी तिब्बती कथा है कि एक बार दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे। एक ने साँप अपने मुँह में पकड़  रखा था। वही उसका भोजन था, एक तरह से सुबह के नाश्ते की तैयारी थी। दूसरा एक चूहा पकड़ लाया था।

दोनों जैसे ही वृक्ष पर लगभग पास-पास आ कर बैठे। एक के मुँह में साँप, दूसरे के मुँह में चूहा! साँप ने चूहे को देखा तो वह यह भूल ही गया कि वह उल्लू के मुँह में है और मौत के करीब है।

चूहे को देख कर उसके मुँह में रसधार बहने लगी। वह भूल ही गया कि मौत के मुँह में है। उसको अपनी जीवेषणा ने पकड़ लिया। और चूहे ने जैसे ही देखा साँप को, वह भयभीत हो गया, वह कँपने लगा। ऐसे मौत के मुँह में बैठा है, मगर साँप को देख कर कँपने लगा।

वे दोनों उल्लू बड़े हैरान हुए। एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा कि भाई, इसका कुछ राज समझे? दूसरे ने कहा, बिलकुल समझ में आया। जीभ की, रस की, स्वाद की, भोग की इच्छा इतनी प्रबल है कि सामने मृत्यु खड़ी हो तो भी दिखाई नहीं पड़ती। और यह बात भी समझ में आ गई कि ‘भय’ मौत से भी बड़ा डर है।

मौत सामने खड़ी है, मौत के मुँह में है, उससे भयभीत नहीं है चूहा; लेकिन डर से भयभीत है कि कहीं साँप हमला न कर दे।

बात पकड़ में आ गई होगी। मौत से हम भयभीत नहीं हैं, हम भय से, डर से ज्यादा भयभीत हैं। और लोभ स्वाद का, इंद्रियों का, जीवेषणा का इतना प्रगाढ़ है कि मौत चौबीस घंटे खड़ी है, तो भी दिखाई नहीं पड़ती।”

ओशो

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

સરગવાનું ઝાડ
એક ઘર હતું એમાં એક નાનકડું કુટુંબ રહેતું હતું. આ ઘરના આંગણામાં એક સરસ મજાનું મોટું સરગવાનું ઝાડ હતું. આખું ઘર આ સરગવાના ઝાડ પર જ નભતું હતું. રોજ સરગવાનું શાક ખાય, સરગવાની કઢી સંભાર બધું સરગવાનું જ. કઈક વધે તો સરગવો વેંચીને બે પૈસા કમાઈ એ વાપરે બાકી કોઈ કાઈ કામ કરવા ના જતું.

એક દિવસ એમના ઘરે મહેમાન આવ્યા. મહેમાને જોયું કે આખું ઘર ગરીબીમાં ડૂબી ગયું છે. આ સરગવાના ઝાડ પર  જ બધું નિર્ભર છે. આ લોકો આ ઝાડના લીધે કામ પર નથી જતા, નવું કાઈ કરતા નથી. રાતે જ્યારે બધા સૂતા હતા ત્યારે એને આખી રાત જાગીને આ સરગવાનું વૃક્ષ કાપી નાખ્યુ અને નિકળી ગયો.

સવારે બધાએ જોયું તો ઝાડ તૂટેલું હતું. આખું પરિવાર રડ્યું કે આ ઝાડ વગર હવે એમનું ભરણ પોષણ કોણ કરશે. પણ હવે કામ કરવા સિવાય બીજો કોઈ ઓપ્શન હતો નહીં એટલે બધા કામ કરવા લાગ્યા અને ધીમે ધીમે ગરીબી ઓછી થઈ.

ક્યારેક આપણે પણ આવા એક કોઈ સરગવાના ઝાડ જેવા નોકરી ધંધાના લીધે આગળ નથી વધી શકતા. જ્યારે એ નોકરી કે ધંધો છોડીએ પછી વધુ પ્રગતિ કરી શકીએ..
🙏🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

वो दोनों सड़क पर एक दूसरे से लड़ते लड़ते जा रहे थे। तभी बड़ा भाई बड़े होने के गुरूर के कारण तना तना, आगे आगे बिना परवाह किये तेजी से चलने लगा वो खाली हाथ था..
*जबकि छोटे भाई की कमर पर एक भारी बैग टंगा था जिसे लिये लिये वह रोता चिल्लाता चल रहा था। बीच बीच में चिल्ला कर भाई को रोते हुए स्वर में पुकारता – ओ भाई…..रुक जा ना …मुझसे चला नहीं जा रहा ….भाई
*पर बड़ा सब बातों से बेखबर मस्त हाथी की तरह चलता ही जा रहा था*
*बडे़ भाई की उमर होगी कोई लगभग सात आठ साल की और छोटा मुश्किल से पांच साल का होगा बहुत देर तक सड़क पर यही क्रम चलता रहा.. *तभी वहां एक चौराहा आया जहां अच्छी खासी भीड़ और ट्रैफिक भी था। आड़ी तिरछी बाइक ,स्कूटर, स्कूटी, कार, टैम्पो और पैदल लोगों की आवाजाही और भीड़..
*तभी बड़े वाला वहां पर रुक कर छोटे का इन्तजार करने लगा। छोटा गिरता पड़ता, रोता चिल्लाता भाई के पास पहुंचा और जोर से बैग फैंक दो चार हाथ भाई के जोर जोर से मारे। वह क्रोध , पीड़ा और भाई की उपेक्षा से छटपटा रहा था.
*लेकिन बड़े भाई ने इस सब के बाद भी कोई खास प्रतिक्रिया ना दी बस उसने पास में पड़ा हुआ बैग कन्धे पर लटकाया और भाई को पीठ पर बैठाने के लिए नीचे बैठ गया। छोटा सब गुस्सा भूल गालों पर बहते आँसुओं को आस्तीन से पोंछ कर बडे़ भाई की कमर पर चढ गया…*
*बड़े भाई ने दोनों तरफ सावधानी से ट्रैफिक का जायजा ले कर सड़क पार की। सड़क पार कराने के लिए बड़े भाई ने जितनी जिम्मेदारी से छोटे को बैग समेत अपनी कमर पर लादा था सड़क पार करके फिर से बैग समेत छोटे भाई को उतार दिया और फिर अपने उसी मस्त अन्दाज में चल पड़ा।
*छोटे भाई ने जैसे तैसे लड़खड़ाते हुए पुन: बैग को उठाया और गिरता पड़ता भाई के पीछे पीछे चल दिया। पर अब वह रोया चिल्लाया नहीं था ….*
*क्योंकि वह अब समझ चुका था उसका बड़ा भाई उसे मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है ,

इसलिए छोटी छोटी परेशानियों से उसे अकेले तो कठिन परिस्थितियों में उसकी ढाल बनकर खड़ा है…!!
जीवन में बड़ी कामयाबी पाने के लिए आत्मनिर्भर होकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए।

Posted in AAP

#सुनो
दावा 20000 कमरों का, मिले 7000 ही: दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने बताया- किचन-टॉयलेट को भी क्लासरूम में गिनती थी केजरीवाल सरकार, ₹49 लाख की ‘देशभक्ति’ के प्रचार पर खर्च किए ₹11 करोड़

केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा मॉडल का प्रचार करते हुए दावा किया जाता था कि 20 हजार कमरे बनाए गए। मंत्री सूद ने बताया कि यह झूठ था और जब इस विषय में जाँच करवाई गई तो कमरों की संख्या की 7 हजार ही निकली है। सूद ने बताया कि केजरीवाल सरकार स्टोररूम, किचन और शौचालय भी क्लासरूम के रूप में गिनती थी।

दिल्ली आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के आँकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए थे। जितने क्लासरूम बनाने का दावा केजरीवाल सरकार करती थी, उसका एक तिहाई ही असल में निर्माण हुआ था। वहीं एक ₹4 करोड़ की योजना के प्रचार के लिए ₹20 करोड़ का खर्च किया गया था। यह सारे खुलासे के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने किए हैं।

दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दिल्ली विधानसभा में बजट सत्र की चर्चा के दौरान पूर्ववर्ती सरकार के विषय में कई आँकड़े रखे हैं। उन्होंने शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को बताया कि केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा मॉडल का प्रचार करते हुए दावा किया जाता था कि 20 हजार कमरे बनाए गए।

मंत्री सूद ने बताया कि यह झूठ था और जब इस विषय में जाँच करवाई गई तो कमरों की संख्या की 7 हजार ही निकली है। सूद ने बताया कि केजरीवाल सरकार जिन्हें क्लासरूम बताती थी, वह असल में स्टोररूम, किचन और बाकी कामों के लिए बनाए जाने वाले कमरे थे।

केजरीवाल सरकार ने शौचालयों तक को बच्चों की पढ़ाई का कमरा बता दिया था। मंत्री सूद ने बताया है कि भाजपा सरकार अब लोक निर्माण विभाग (PWD) को इस विषय में आदेश देगी कि वह मात्र क्लास रूम को ही गिने ना कि बाकी तरह के निर्माण को।

शिक्षा मंत्री सूद ने यह भी बताया है कि केजरीवाल सरकार के दौरान स्कूलों में हैप्पीनेस करिकुलम नाम का पाठ्क्रम जोड़ा गया था। इस पर ₹4 करोड़ खर्च किए गए थे। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसके प्रचार पर ₹20 करोड़ का खर्च कर डाला।

उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल की सरकार के दौरान देशभक्ति करिकुलम पर ₹49 लाख खर्च किए गए और इसके प्रचार पर ₹11 करोड़ से अधिक खर्च कर दिए गए। आशीष सूद ने आम आदमी पार्टी से कहा कि उनके कर्म वापस उनके पास आएँगे।

दिल्ली के स्कूलों में कमरों को निर्माण को लेकर यह पहला खुलासा नहीं है। इससे पहले केजरीवाल सरकार पर स्कूल कमरों के निर्माण में हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने ₹1300 करोड़ का घोटाला स्कूल के कमरों के निर्माण में किया।

आरोप है कि उन्होंने उन एजेंसियों को भी पैसे दे दिए जिन्होंने कमरे बनाए ही नहीं। इसको लेकर दर्ज की गई शिकायत के बाद उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी राष्ट्रपति मुर्मू ने हाल ही में दे दी थी। अब इस मामले में आगे कार्रवाई होनी है।

शिक्षा मॉडल पर चिल्लाने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्कूल पर कुछ ख़ास काम नहीं किया था। एक रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी पार्टी के शासन के दौरान दिल्ली के भीतर मात्र 75 नए स्कूल बनाए गए थे। पुराने स्कूलों को नया नाम देकर या उनमें मरम्मत का काम करवा कर केजरीवाल लाइमलाईट लूटना चाहते थे।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir, हिन्दू पतन

यहूदी और हिंदू का अंतर
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लगभग 1 किलोमीटर चलने के बाद… रिक्शा वाले ने रिक्शा रोका….

सामने बोर्ड दिखाई पड़ रहा था बांग्ला में… ढाकेश्वरी मंदिर… नेशनल टेंपल ऑफ बांग्लादेश… एक पुलिस वाला खड़ा था गेट पर… मैंने पुलिस वाले को नमस्कार किया… और पूछा… मुझे अंदर जाने के लिए कोई टिकट लेना होगा… उसने भी मुझे सलाम किया और कहा… नहीं… आप जा सकते हैं…  चंद कदम चलते ही मैंने खुद को मंदिर के प्रांगण में पाया… साफ सुथरा मंदिर… लेकिन बहुत कम ऊँचाई वाली मंदिर… अधिकतम ऊँचाई 15 फुट गई होगी…

मंदिर में एक पुजारी जी थे…. जिन्हें मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया… उन्होंने भी प्रत्युत्तर में मुझे नमस्कार किया… मंदिर में और कोई भी नहीं था… थोड़ी देर मंदिर में बैठा,  चारों तरफ तीन चार मंजिली इमारतें थी… और उन इमारतों की तुलना में मंदिर बहुत ही छोटा लग रहा था… मैंने पुजारी जी से बातचीत शुरू की….
उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी में मुझे बताना शुरू किया…

पुजारी जी की हिंदी कमजोर थी…
और मेरी बांग्ला… वे टूटी फूटी बांग्ला मिश्रित हिंदी में… मुझसे बातें कर रहे थे…
उन्होंने मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए बताया… सेन वंश के राजा बल्लाल सेन के द्वारा… 12वीं शताब्दी में यह मंदिर बनाया गया था… माँ ढाकेश्वरी की मूर्ति जमीन में दबी हुई मिली थी… और इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण… मूर्ति मिलने के पश्चात किया गया था… पार्टीशन के बाद असली मूर्ति यहाँ से कोलकाता ले जाया गया था… और मूर्ति के साथ लाखों हिंदू यहाँ से हिंदुस्तान चले गए…

आजाद होने के बाद और पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद… कुछ दिन तो स्थिति ठीक थी…
लेकिन उसके बाद हिंदुओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी…

हमारे पड़ोसी मुस्लिम हम पर धौंस जमाते रहते थे… उनकी जो मर्जी होती थी… वह हमसे छीन लेते थे… हमें सरेआम बेज्जती करते थे… और हमारे महिलाओं के साथ छेड़छाड़… सरकार भी हमारे लिए उदासीन थी… और कानून व्यवस्था में हम तो दोयम दर्जे के नागरिक थे…

खैर, किसी तरह से दिन गुजर रहा था… लेकिन 1971 में हमारा में हमारा सर्वनाश हो गया… 30 लाख से अधिक हिंदुओं की… बेरहमी से हत्या… 5 लाख से अधिक महिलाओं का अपहरण और बलात्कार… हमारे पास मरने के सिवा कोई उपाय नहीं था… हिंदुओं की पतलून उतारकर उनकी हत्या कर दी जाती थी… और महिलाओं को सड़कों पर बलात्कार… यही हमारी नियति हो गई थी… 1971 में भी एक करोड़ से अधिक लोग हिंदुस्तान चले गए… 3 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए… हजारों हिंदू छात्रों की निर्मम हत्या ढाका यूनिवर्सिटी में की गई… और छात्राओं का अपहरण और बलात्कार… सेना ने रमना काली मंदिर का विध्वंस कर दिया… ढाकेश्वरी मंदिर भी आधा से ज्यादा टूट चुका था.. और सेना ने इस पर कब्जा करके यहाँ अपना आयुध भंडार बना लिया.. बलात्कार के डर से हजारों महिलाओं ने आत्महत्या कर लिया… सड़कों पर हजारों की संख्या में लाशें पडी हुई रहती थी… हिंदुओं की लाश नोचते कुत्ते बहुतायत में दिखाई पड़ते थे… हजारों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार… और उसके बाद हत्या उनके परिवार वालों के सामने की गई… चुन-चुन कर हिंदुओं को मारा गया…

मैंने उनसे पूछा…
यह हत्याकांड सेना ने किया या यहाँ के नागरिको ने… उनका कहना था…
हमारे पड़ोसी मुस्लिम … सेना को जाकर खबर करते थे कि… यह परिवार हिंदुओं का है… और इस परिवार में लड़कियाँ हैं… सैनिकों की गाड़ी आती थी… लड़कियों को उठाकर गाड़ी में डाल देती थी… और परिवार वाले को गोली से उड़ा देते थे… हिंदूओं के थोड़ी भी प्रतिकार पर… परिवार के सामने महिलाओं की सामूहिक बलात्कार होती थी… और पुरे परिवार को मार दिया जाता था…. बाद में मृतक परिवार की संपत्ति पर… सूचना देने वाले मुस्लिम परिवार का कब्जा हो जाता था… मुस्लिमों में यह होड़ लग गई थी… कि कौन अधिक से अधिक हिंदू परिवारों की सूचना दे… जिससे उनकी संपत्ति उन्हें मिल जाए…

अबे अपनी रौ में बोलते जा रहे थे…
हिंदुस्तान के सहायता से बांग्लादेश एक इंडिपेंडेंट कंट्री बना…
भले ही बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र हो गया… लेकिन हिंदुओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ… हम दोयम दर्जे के नागरिक बने रहे…
1992 में ढाकेश्वरी मंदिर को गिरा दिया गया…
और फिर हजारों हिंदुओं का कत्लेआम हुआ…
कहाँ मैं ढाकेश्वरी मंदिर घूमने आया था…
हिंदू जनसंहार सुनकर मन व्यथित हो उठा…
मैंने उनसे पूछा आप भी असुरक्षित महसूस करते हैं…
उनका कहना था… हम सुरक्षा असुरक्षा से ऊपर उठ चुके हैं… मेरा परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर का पुजारी रहा है… और जब तक माँ ढाकेश्वरी चाहेंगी… मैं पूजा करता रहूँगा… जिस दिन चाहेंगी उस दिन माँ के चरणों में  मैं मर जाऊँगा…

मेरे लिए बेहद दु:खद आश्चर्य था…
60 लाख यहूदियों की हत्या एक मानव त्रासदी के रूप में पूरा विश्व जानता है… 30 लाख हिंदुओं की हत्या…
5 लाख से अधिक हिंदू महिलाओं का बलात्कार… लाखों करोड़ की संपत्तियों का लूट….
और तीन करोड़ विस्थापन के बारे में… किसी को भी कोई जानकारी नहीं है…. पूरी दुनिया चुप थी… पूर्वी पाकिस्तान के हिंदू अपने ही देश में मारे जा रहे थे… उनकी महिलाएं बल्तकृत हो रही थी… और उनकी संपत्तियाँ लूटी जा रही थी… मौत का यह तांडव 9 महीने तक चला…
यह सिलसिला रुका… जब भारतीय सेना के सामने 135000 पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया… 
ना तो हम दोषियों को सजा दे पाये और ना हीं पीड़ितों  को न्याय…

पता नहीं बांग्लादेश विजय में हमें क्या मिला…?
साभार Sanjay Kumar
Yashwant Pandey

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

બહુ જૂની વાત છે.
તે દિવસે તેજસ્વી યાદવનું 9મા ધોરણનું પરિણામ આવવાનું હતું. મુખ્યમંત્રીના નિવાસ સ્થાને તમામ વ્યવસ્થા ગોઠવવામાં આવી હતી. મોટી પાર્ટી ની વ્યવસ્થા કરવામાં આવી હતી. મહેમાનો ને આમંત્રણો મળી ગયું હતું. સર્વત્ર ખુશીનો માહોલ હતો.

પણ પછી શાળાના શિક્ષક નો ફોન આવ્યો.

લોકોને લાગ્યું કે તે આમંત્રણ મેળવવા માટે ફોન કરી રહ્યા હશે. લાલુજીએ ફોન ઉપાડ્યો. 

શિક્ષકે કહ્યું- તારો દીકરો 9મામાં નાપાસ થયો.

લાલુજીએ ગુસ્સામાં કહ્યું – તમને ખબર છે કે તે કોનો પુત્ર છે? શિક્ષકે કહ્યું- હા..હું તેને પાસ પણ કરી દે તે..પણ પરીક્ષા ના પેપર માં એક પણ શબ્દ લખાયો હોત..😆 તે દિવસે જ લાલુજી સમજી ગયા કે મારો પુત્ર બિહારની રાજનીતિ માટે એકદમ ફિટ છે.😂😆

Posted in हिन्दू पतन

ये तस्वीर है उन यजीदी महिलाओं की जिनके पति, पिता और भाइयों को मारकर जेहादियों  ने सेक्स-स्लेव बनाकर
बच्चे पैदा करने के लिए अपने कैदखाने में रखा था।

जब अमेरिकी सेनाओं ने मोसुल नगर में ऐसे ही एक कैदखाने को अपने कब्जे में लेकर इन्हें आजाद कराया तो कोई भी महिला बिना बच्चों के न थी ,जेहादी हर दिन इन्हें अपनी हवश का शिकार बनाते थे और नए जेहादी पैदा करने के लिए इन्हें पालते थे।
यजीदी परिवारों के पुरुषों को मारने और इन्हें  बंदी बनाने के पीछे की सोच मात्र यह है कि यजीदी काफ़िर हैं
और काफिरों के साथ उनका यह व्यवहार उनके इस्लामिक मजहब के अनुसार है।

उत्तरी इराक के दोहूक प्रान्त की रहने वाली 23 साल की यज़ीदी महिला फरीदा की शादी को अभी दो माह हुए थे कि एक रात जेहादियों ने उनके घर को घेर लिया और काफ़िर बताकर उनके सामने ही पांच भाइयो , पिता को मारकर
फरीदा और उसकी बहन को उठा ले गए थे ।
बाद में जब अमेरिकी सेना ने फरीदा को मोसुल के एक सेक्स-स्लेव सेंटर से आजाद कराया तो फरीदा ने बताया कि

‘मेरी बहन 16 साल की है. उसकी निकाह सात मर्दों से करा दी गई है. वह अभी भी सीरिया में ही है’. यह कहते हुए फरीदा फूट-फूट कर रोने लगती है. और फिर बताती है कि ‘मैंने एक आदमी को बारी-बारी से चार महिलाओं के साथ बलात्कार करते हुए देखा. और मैंने देखा कि इस्लामिक स्टेट के लोगों ने एक मां से उसके बच्चे को अलग कर दिया. वो भी तब जब वो अपने बच्चे को दूध पिला रही थी. उस बच्चे का मुंह उसकी मां के स्तन से लगा हुआ था. फिर उस औरत के साथ बलात्कार करने लगे. वहां एक बंदे से मेरा निकाह  होने वाली था. फिर उसके दोस्त मुझे देखने आये. उसका एक दोस्त भी मुझे पसंद करने लगा. उसने मुझसे शादी का इरादा बना लिया. और बाद में मैं खुद पांच मर्दों को बेच दी गई.’

जब एक सेकुलर पत्रकार ने
फरीदा से पूछा  कि ‘कई लोगों का ऐसा कहना है कि इस्लामिक स्टेट के लोग ड्रग लेते हैं. और इसलिए इस तरह हिंसा और बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देते हैं’. इस पर फरीदा ने बताया कि ‘वे लोग ये काम बिल्कुल स्वतंत्र रूप से और दिल से करते हैं. वो इस्लाम की ही सांस लेते हैं, खाते और सोते हैं. और इसी के लिए वो पागल हैं. ये एक सनक है. उनके बच्चे भी उनसे यही सीख रहे हैं. वो भी आगे जाकर उनके जैसे ही बनेंगे. मैंने वहां किसी को भी इस मानसिकता से अलग नहीं देखा’.

इस्लामिक जेहादियों के चंगुल से किसी तरह जान बचा कर भागी 25 वर्षीय यजीदी महिला नादिया मुराद को वर्ष 2018 में शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया था

नादिया मुराद ने बताया कि इराक के सिंजर के निकट यजीदी समुदाय के गढ़ के गाँव कोचों में शांतिपूर्वक जीवन जी रहीं थी
वर्ष 2014 के
एक दिन काले झंड़े लगे जिहादियों के ट्रक उनके गांव कोचो में धड़धड़ाते हुए घुस आए। इन आंतकवादियों ने पुरूषों की हत्या कर दी, बच्चों को लड़ाई सिखाने के लिए और हजारों महिलाओं को यौन दासी बनाने और बल पूर्वक काम कराने के लिए अपने कब्जे में ले लिया।
छह भाइयों , पिता और वृद्ध माँ का कत्ल कर दिया और सैकड़ो गांवों के हजारों यजीदी लड़कियों के साथ
जेहादी मुराद को मोसुल ले आये ।
मोसुल आईएस की इस्लामिक खिलाफत की ‘राजधानी’थी। दरिंदगी की हदें पार करते हुए आतंकवादियों ने उनसे लगातार सामूहिक दुष्कर्म किया, यातानांए दी।

वह बताती हैं कि जिहादी महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए दास बाजार लगते हैं और यजीदी महिलाओं को धर्म बदल कर इस्लाम धर्म अपनाने का भी दबाव बनाते हैं। मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाई। हजारों यजीदी महिलाओं की तरह मुराद का एक जिहादी के साथ जबरदस्ती निकाह कराया गया।

इस्लामिक स्टेट एक समय एक बड़े भूभाग पर शासन करने लगा था ।
ईराक , लीबिया और सीरिया के अनेकों तेल कुओं पर उसका कब्जा था जिससे तेल बेचकर इस्लामिक स्टेट रोज करोड़ों का मुनाफ़ा कमाता था और बाकायदा अन्य इस्लामिक देशों की तरह सरिया कानून लागू कर इस्लामिक शासन स्थापित किया था , जिसके समर्थन में पूरी दुनिया से मुसलमान इस्लामिक स्टेट के किये लड़ने रक्का और मोसुल में पहुंचे थे।
वैचारिक, सैनिक सहयोग के साथ करोड़ों रुपये प्रतिदिक मुसलमानों का आर्थिक सहयोग पूरी दुनिया से मोसुल में पहुंचता था ।

सुन्नी मुसलमानों की पूर्ण सहानुभूति इस्लामिक स्टेट के साथ इसलिए थी क्योंकि सीरिया, लीबिया,ईराक और लेबनान में शिया मुसलमान और यजीदी समुदाय पर इस्लामिक स्टेट  क्रूरतम कहर ढा रहे थे

मुराद बताती हैं कि मोसुल में उन्हें एकबार भागने का मौका मिला. वह बागीचे की चहारदिवारी फांदने में सफल रहीं. लेकिन मोसुल की गलियों में भटकते हुए उन्हें जब समझ में नहीं आया कि क्या करें तो उन्होंने एक अनजान घर के दरवाजे की घंटी बजा दी और मदद की गुहार लगाई , घर एक मुसलमान का था उसने मुराद को तत्काल इस्लामिक स्टेट की सेना के हवाले कर दिया । भगाने की कोशिश करने वाली हर लड़की को सजा के रूप में सामूहिक बलात्कार की पीड़ा मिलती है
मुझे छह लड़ाकों की अपनी सेंट्री को सौंप दिया. उन सभी ने मेरे साथ तब तक बलात्कार किया, जब तक मैं होशो-हवास न खो बैठी.”

मुराद बताती हैं कि इराक और सीरिया में उन्होंने देखा कि सुन्नी मुस्लिम आम जीवन जीते रहे, जबकि यजीदियों को IS के सारे जुल्म सितम सहने पड़े. मुराद बताती हैं कि हमारे लोगों की हत्याएं होती रहीं, रेप किए जाते रहे और सुन्नी मुस्लिम जुबान बंद किए सब देखते रहे. उन्होंने कुछ नहीं किया.

मुराद ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट गर्ल : माई स्टोरी ऑफ कैप्टिविटी एंड माई फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट’ में अपने साथ हुई बर्बरता का दिल दहला देने वाला वर्णन किया है.

ऐसा ही जेहादियों ने पिछले 1400 वर्षों में काफिरों के साथ किया है चाहे वह भारत की नारियों को अरब और अफगान की मंडियों में 2-2 दीनार में बेचना हो या कश्मीर में हिंदु पुरुषों को मारकर उनकी लड़कियों का बलात्कार करना हो
उनके लिए इसमें कुछ भी नया नहीं है।
कल जब भारत में इनकी संख्या बढ़ेगी, ये थोड़े और तागतवर होंगें तब यही हिंदुओं की बहन बेटियों के साथ होगा इसमें शंका न पालना 🤔🤔🤔

जाग सको तो जागो और जगाओ

शान्ति, प्रेम और भाईचारे ….!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક શેઠને પોતાના નોકર પર ખુબ પ્રેમ હતો. નોકર પાસે કામ કરાવે પણ સાથે સાથે નોકરનું ધ્યાન પણ રાખે. ઘણીવાર તો નોકરને પોતાના હાથે જમાડે પણ ખરા.

નોકર પણ આવા માલિકને મેળવીને પોતાની જાતને ધન્ય સમજતો હતો અને આનંદથી પોતાની જીંદગીને જીવતો હતો.

એકવાર સાંજના સમયે નોકર ખેતરમાંથી કામ કરીને થાક્યો પાક્યો ઘેર આવ્યો. શેઠે એને પોતાની પાસે બોલાવ્યો અને કહ્યુ કે મેં તારા માટે એક તરબુચ રાખ્યુ છે ચાલ હું તને તેની ચીરીઓ કરીને આપું.

શેઠે પોતાની જાતે જ તરબુચની એક ચીરી કરીને નોકરને ખાવા માટે આપી અને પછી પુછ્યુ કે કેવી લાગી ?

પેલા નોકરે કહ્યુ , માલિક , બહું જ મીઠી છે. મારી અત્યાર સુધીની જીંદગીમાં આવું મીઠું તરબુચ મેં ક્યારેય ખાધું નથી.

નોકરને તરબુચ ગમ્યુ એટલે શેઠ એક પછી એક ચીર કરીને નોકરને આપતા ગયા અને નોકર વખાણ કરતા કરતા આ ચીર ખાતો ગયો. શેઠના હાથમાં છેલ્લી ચીર હતી.

નોકર પાસે આ તરબુચની મિઠાશના બહું વખાણ સાંભળ્યા એટલે શેઠને તરબુચ ચાખવાની ઇચ્છા થઇ. તરબુચની ચીર પોતાના મોઢામાં નાંખી ત્યાં તો થું થું કરતા બહાર ફેંકી દીધી.

નોકરને કહ્યુ કે આ તો કોઇપણ જાતના સ્વાદ વગરની છે તો પછી તું કેમ ખોટા વખાણ કરતો હતો.

નોકરે કહ્યુ , માલિક હું તરબુચની ચીરના નહી પરંતું આપની લાગણી અને પ્રેમના વખાણ કરતો હતો. તરબુચ ભલેને સ્વાદ વગરનું હોય પણ તમારા હાથના સ્પર્શથી એ મીઠું થઇ જતું હતું. તમે મને ઘણીવાર ઘણું બધું સારુ સારુ ખવડાવ્યુ જ છે તો હવે હું આ એક સામાન્ય તરબુચને કેમ કરીને ખરાબ કહી શકું ?

મિત્રો : આપણે ઘણી વાર આપણા સ્વાદ ગુલામ બની જય એ છીએ … અને ભૂલી જઈ એ છીએ કે બનાવનાર ને કેટલો શ્ર્રમ પડયો હશે ….

રોજ પ્રેમથી રસોઇ બનાવીને જમાડનારી પત્નિ કે મા ની રસોઇ જો ક્યારેક સ્વાદ વિહોણી લાગે તો એ બનાવતી વખતની લાગણી અને પ્રેમને યાદ કરજો રસોઇનો સ્વાદ જ બદલાઇ જશે.