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કુંભ


એપલના સહ-સ્થાપક સ્ટીવ જોબ્સ દ્વારા 19 વર્ષની ઉંમરે લખાયેલો એક પત્ર તાજેતરમાં હરાજીમાં $500,312 (લગભગ રૂ. 4.32 કરોડ)માં વેચાયો હતો. આ પત્ર જોબ્સે તેના બાળપણના મિત્ર ટિમ બ્રાઉનને લખ્યો હતો, જેમાં તેણે ભારત આવવા અને કુંભ મેળામાં હાજરી આપવાની પોતાની યોજનાનો ઉલ્લેખ કર્યો હતો.

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એક માણસ તેના વાંદરાઓ સાથે હોડીમાં મુસાફરી કરી રહ્યો હતો.

એ બોટમાં અન્ય મુસાફરો સાથે એક ફિલોસોફર પણ હતો.

વાંદરાએ પહેલાં ક્યારેય બોટમાં મુસાફરી કરી ન હતી, તેથી તે આરામદાયક અનુભવતો ન હતો.
તે બૂમો પાડીને ઉપર-નીચે જતો હતો, બોટ સવાર સહિત કોઈને પણ શાંતિથી બેસવા દેતો ન હતો.

બોટમેન આનાથી નારાજ થઈ ગયો હતો અને મુસાફરોના ગભરાટને કારણે બોટ ડૂબી જશે તેની ચિંતા હતી.

*જો વાંદરો શાંત ન થાય તો તે હોડીને ડૂબી જશે.*

તે માણસ પરિસ્થિતિથી અસ્વસ્થ હતો, પરંતુ વાંદરાને શાંત કરવાનો કોઈ રસ્તો શોધી શક્યો નહીં.

ફિલોસોફરે આ બધું જોયું અને મદદ કરવાનું નક્કી કર્યું.

તેણે કહ્યું: “જો તમે પરવાનગી આપો, તો હું આ વાંદરાને ઘરની બિલાડીની જેમ શાંત કરી શકું છું.”

માણસ તરત જ સંમત થયો.

ફિલોસોફરે બે મુસાફરોની મદદથી વાંદરાને ઉપાડીને નદીમાં ફેંકી દીધો.

તરતા રહેવા માટે વાંદરો ભયાવહ રીતે તરવા લાગ્યો.

તે હવે લગભગ મરી રહ્યો હતો અને તેના જીવન માટે સંઘર્ષ કરી રહ્યો હતો.

થોડા સમય પછી, ફિલોસોફરે વાંદરાને ખેંચીને પાછો હોડીમાં લઈ લીધો.

વાંદરો શાંત હતો અને જઈને એક ખૂણામાં બેસી ગયો.

વાંદરાના બદલાયેલા વર્તનથી માણસ અને બધા મુસાફરોને આશ્ચર્ય થયું.

પેલા માણસે ફિલોસોફરને પૂછ્યું: “પહેલાં તો તે ઉપર-નીચે કૂદકો મારતો હતો. હવે તે પાળેલી બિલાડીની જેમ બેઠો છે. કેમ?”

ફિલોસોફરે કહ્યું: “જ્યારે મેં આ વાંદરાને પાણીમાં ફેંકી દીધો, ત્યારે તે પાણીની શક્તિ, તેના જીવનની કિંમત અને હોડીની ઉપયોગીતા સમજી ગયો.”

જે વાંદરાઓ ભારતમાં દરેક વસ્તુની ટીકા, ટિપ્પણી, વિરોધ કરીને ઉપર-નીચે કૂદકા મારતા હોય તેમને ઉત્તર કોરિયા, અફઘાનિસ્તાન, સોમાલિયા, દક્ષિણ સુદાન, સીરિયા, ઈરાક, પેલેસ્ટાઈન, પાકિસ્તાન, શ્રીલંકા કે ચીનમાં 6 મહિના સુધી ફેંકી દેવા જોઈએ, પછી ભારત આવીને આપોઆપ પાલતુ બિલાડીની જેમ શાંત થઈ જશે અને દેશને આગળ વધવા દેશે.

‘ભારત’નો દુરુપયોગ કરી બદનામ કરતાં તમામ વાંદરાઓને સમર્પિત. 😌😉🇮🇳🚩

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नीतू बाथरूम से नहा कर निकली तो लाइट बन्द करना भूल गई, वह पूजा कर रही थी तभी उसकी सास कमलाजी ने बड़बड़ाना शुरू किया कि “बत्ती ऐसे जलाकर छोड़ देती है जैसे बिजली मुफ्त में आती है, बिल भरना पड़े तो पता चले”| नीतू मायूस होकर सुनती रही, पूजा करते हुए उसकी ऑंखें भर आयीं| नीतू की शादी को 3 साल हुए थे, 2 साल तक सब ठीक चला फिर अचानक उसके पति अक्षय की नौकरी छूट गयी| दोनों बेहद परेशान थे| नीतू का बेटा अभी 6 महीने का था| अक्षय के बहुत कोशिशों के बाद भी जब नई नौकरी नहीं मिली तो उसने अपने पिता मुकेशजी से बात करके घर लौटने का निर्णय किया| मुकेशजी ने अपने पुत्र को ढांढस बंधाया कि तुम यहाँ आ जाओ और दूसरी नौकरी की तलाश करो, परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है| उनके मन में कहीं न कहीं ये डर था कि अक्षय कहीं अवसाद में न घिर जाए,इसलिए वे यथासंभव सहयोग कर रहे थे बेटे और बहू को| नीतू अपने ससुर का बहुत सम्मान करती थी| वो स्वभाव से अंतर्मुखी थी,जल्दी अपनी बात किसी से नहींं कह पाती थी, बड़ों को पलट कर जवाब देना उसके संस्कारों में नहीं था| कमलाजी नीतू को सुनातीं कि जब उनकी शादी हुई तो उनके आने के बाद मुकेश जी की तरक्की होती गयी पर कोई बहुएँ ऐसी आती हैं कि पति का कामकाज चौपट हो जाता है| नीतू को यह बातें बाण की तरह सीधे हृदय बेधी लगतीं, वो तो पहले ही परेशान थी और कमला जी समय-समय पर सुई चुभोती रहतीं| आर्थिक परेशानी के कारण मुकेश जी ही बेटे और बहू का खर्च उठाते थे और कमला जी एहसान की परतें चढ़ाती जातीं, नीतू का आत्मसम्मान कुचलता रहता|
जब नीतू कहीं बाहर जाने को निकलती तो कमलाजी दो चार सामान लाने को कहकर बोलतीं “अरे तुम्हारे पास पैसे तो होंगे नहीं, चलो मैं देती हूं, वैसे भी अब तो दोगुना खर्च हो गया है, पता नहीं कैसे चलेगा”| नीतू के आत्मसम्मान को फिर से झकझोर दिया था कमलाजी ने| वो वहाँ से चली गई| मुकेश जी अपनी बहू की व्यथा उसके चेहरे पर पढ़ कर अपनी पत्नी से बोले,”क्यों हर बात का एहसान जताती हो बहू से”,? वह इस घर के सदस्य है तो फिर क्यों उसके स्वाभिमान पर चोट करती हो। इस समय हमारे बच्चों का कठिन समय है उनको हमारी जरूरत है। हम मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा? भगवान की कृपा से हमारे पास सब कुछ है, किसी बात की कोई कमी नहीं है फिर भी तुम उनका मनोबल बढ़ाने के बजाय तोड़ रही हो। कमला जी पति के मिजाज को देखकर चुप रह गई पर वह सुधरने वाली कहां थी। अगर कभी खाना बच जाता तो वह बोलती,”मुफ्त का समान है बर्बाद करते रहो, अपनी रकम लगती तो पता चलता”। ऐसे ही कटु वचन प्रतिदिन नीतू को सुनते पड़ते थे। कभी-कभी कमल जी तो अक्षय को भी सुना देती थी, बहुत ही अधिक मानसिक वेदना से गुजर रही थी नीतू, एक तो पति को दिन भर तनाव में देखती दूसरी तरफ सासू मां उसके आत्मसम्मान को तार तार करने से कभी नहीं चूकती। छोटे बच्चे की वजह से वह नौकरी भी नहीं कर पा रही थी। आए दिन कमला जी नीतू के सामने अपनी तारीफों के पुल बांधती रहती। मैं जब ब्याह करके आई थी तो इस घर में कुछ भी नहीं था,  मेरे कदम बहुत ही शुभ थे इस घर के लिए,मेरे घर में कदम रखते ही इस घर का नक्शा बदल गया। लेकिन तुम्हारे कदम शायद अक्षय के लिए शुभ नहीं है। तभी तो उसके साथ-साथ सब लोग परेशान हैं। नीतू को समझ में नहीं आता था इन सब में उसकी क्या गलती है? इतना तिरस्कार करने के बाद कमला जी ने अपनी बेटी के किस्मत का बखान करना शुरू कर दिया,”ऋचा भी अपने पति के लिए बहुत भाग्यशाली है ऋचा से शादी के बाद दामाद जी का व्यापार दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ता ही जा रहा है”नीतू अपनी तरफ किया गया इशारा समझ गई और अपने घायल हुए आत्मसम्मान को आंसुओं का मरहम लगाने के लिए अपने कमरे में चली गई। यही सब सुनते हुए और रोते हुए करीब 8 महीने का वक्त बीत गया। 8 महीना के बाद अक्षय की नौकरी मुंबई में लगी। मुकेश जी ने बोला पहले वहां जाकर अपने रहने की व्यवस्था कर लो फिर नीतू और बच्चे को लेकर चले जाना। अगले ही दिन अक्षय मुंबई के लिए निकल गया और चार-पांच दिनों के बाद फोन करके बोला मैंने सारा इंतजाम कर लिया है और एक हफ्ते में मैं तुम्हें लेने के लिए आ रहा हूं। इसी बीच अचानक एक दिन ऋचा अपनी बेटी के साथ अपने मायके आई अपनी बेटी और नतनी को आया देख कमला जी खुशी से फूली नहीं समाई, पर अगले ही पल ऋचा के चेहरे की उदासी उन्होंने पढ़ ली और पता चला कि दामाद जी को व्यापार में बहुत ज्यादा घाटा हो गया है और काफी ज्यादा कर्ज दामाद जी के ऊपर चढ़ गया है। पांच शोरूम में से तीन शोरूम दामाद जी के बिक चुके हैं और बस दो शोरूम बचे हैं जो कि घाटे में चल रहे हैं। यह सब सुनकर कमला जी और मुकेश जी के ऊपर तो मानो वज्रपात हो गया एक औलाद के दुख से अभी उबरे भी नहीं थे की दूसरी औलाद का दुख सामने आ गया। ऋचा ने कमला जी को बताया कि उसकी सास उसे बहुत ही ज्यादा ताने देती है। कोई मदद करती है तो बस एहसान गिनवाती रहती है। मेरे आत्म सम्मान को पूरा तार तार करके रख दिया है। ऋचा की बातें सुनकर कमला जी के विचार एकाएक बदल गए और वह बोलने लगी,”तुम्हारी सास को अक्ल नहीं है क्या ? ऐसे समय में बेटे बहु को भावनात्मक संबल की जरूरत होती है और वह तुम्हें ताने मार रही है।” उन्हें तुम दोनों के साथ खड़ा होना चाहिए था। कमला जी के बातें सुनकर नीतू से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी,”मम्मी की बेटी का दुख देखकर एकाएक आपके अंदर इतनी समझदारी कहां से आ गई?” कल तक जब मैं इस परिस्थिति में थी तब तो आपने नहीं सोचा कि मुझे और आपके बेटे को आपके भावनात्मक संभल की जरूरत है ना कि आपका तानों की। दूसरों के आगे हाथ फैलाना कितना पीड़ादायक होता है मुझे बहुत अच्छे से पता है। 8 महीने मैं इस दुख को झेला है। इसलिए मैं ऋचा दीदी के दर्द को बहुत अच्छे से समझ सकती हूं। लेकिन मेरा आत्म सम्मान तो आज तक आपके तानों से लहू लुहान होकर पड़ा हुआ है उसे तो आप कभी भी नहीं देख पाई। क्या आत्मसम्मान का आकलन रिश्ते देखकर किया जाता है बेटी का आत्म सम्मान ,आत्मसम्मान होता है और बहू का आत्म सम्मान नगण्य  होता है ।
नीतू ने अपने नंद ऋचा से कहा दीदी आप परेशान मत हो। आपका दुख मुझे अधिक कोई नहीं समझ सकता। लेकिन जैसे मैंने इस कठिन समय को पार कर लिया है जल्दी आपका भी यह कठिन समय निकल जाएगा। हम सब मिलकर इस कठिन समय में आपके साथ रहेंगे।
मुकेश जी ने कमला जी से बोल कमला जी एक बात अच्छे से समझ लीजिए मनुष्य नहीं  बल्कि समय बलवान होता है और समय कब पलट जाए कोई नहीं जानता आज ऋचा का दुख देखकर अपका दिल रो रहा है और वही दुख जब आपने अपनी बहू नीतू को दिया तो आपका कलेजा नहीं कांपा ? फिर आप में और ऋचा की सास में क्या फर्क रह गया ?।आपने जो टीस नीतू और अक्षय के दिल को लगाई है वह  उनके दिल में ताउम्र रहेगी और इसके लिए आप खुद जिम्मेदार है।
कमल जी आत्मग्लानि से भर उठीं। उन्हें ऐसा लगने लगा की बहू के साथ उनके करनी की भरपाई अब उनकी बेटी कर रही है। और वह मन ही मन दृढ़ निश्चय कर रही थी अपनी बेटी की स्थिति संभालने की और बहू के मन में अपने लिए जगह बनाने की।🙏🙏🙏

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इति शुश्रुम धीराणाम् :-

एक आश्रम में कुछ विरक्त सन्यासी  महात्मा रहते थे।

उनमें से एक महात्मा उसे समय के ग्रेजुएट थे। आजकल के हिसाब से पहले तो आईआईटी पास ।
वह बाबा  यह भी कहा करते थे की मैं बहुत सारा धन को छोड़कर  साधु बना हूं। इस त्याग का बड़ा गर्व था  I

इस कारण से अन्य किसी महात्माओं को अपने आगे कुछ समझते नहीं और बात-बात पर कहते – “तुमको मालूम है कि मैंने लाखों की संपत्ति पर लात मार दी है।”

ऐसा ही एक दिन बहुत बात बढ़ गई।
एक किसी नए महात्मा  से ग्रेजुएट महात्मा डांटकर कहने लगे की तुम ठीक नहीं हो,तुम्हारा व्यवहार ठीक नहीं है और तुम्हें मालूम नहीं है कि मैंने लाखों की संपत्ति और डिग्री पर लात मार दी है।

बगल में ही एक वृद्ध महात्मा लेटे  हुए थे।
ग्रेजुएट महात्मा ने जब कई बार इस बात को दोहराया तो वृद्ध महात्मा जी ने धीरे से ग्रेजुएट महात्मा को कहा-

“बेटा! तुमने लात तो मारी,  पर लगता है कि वह लात ठीक से लगी नहीं !”

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*।। आज की प्रेरणादायक कहानी ।।*

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*एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे।*
*उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे।*

एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।

एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?

सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।

दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी?

तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है।

एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है।

इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी?
समय बीतता रहा।
बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था।

सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी।

एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला।

पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया।

सांझ को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए।

जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा।

सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।

ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था।

एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।

दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे

सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो।

सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना।

सुबह बहेलिया आया।

हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था।

सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए।

बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया। वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं। वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया अवश्य देता है। उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग नहीं कर पाते है, परंतु उनसे हमे संस्कार एवं उनके अनुभव से कई बाते सीखने को मिलती है,

बड़े-बुजुर्ग परिवार की शान है वो कोई कूड़ा-करकट नहीं हैं, जिसे कि परिवार से बाहर निकाल फेंका जाए।

अपने प्यार से रिश्तों को सींचने वाले इन बुजुगों को भी बच्चों से प्यार व सम्मान चाहिए अपमान व तिरस्कार नहीं। अपने बच्चों की खातिर अपना जीवन दाँव पर लगा चुके इन बुजुर्गों को अब अपनों के प्यार की जरूरत है। यदि हम इन्हें सम्मान व अपने परिवार में स्थान देंगे तो लाभान्वित ही होंगे । ऐसा न करने पर हम अपने हाथों अपने बच्चों को उस प्यार, संस्कार, आशीर्वाद व स्पर्श से वंचित कर रहे हैं, जो उनकी जिंदगी को सँवार सकता है।

*याद रखिए किराए से भले ही प्यार मिल सकता है परंतु संस्कार, आशीर्वाद व दुआएँ नहीं। यह सब तो हमें माँ-बाप से ही मिलती है।*

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परमात्मा आप सभी को सदा खुश रखे यही बीनती है
🙏 *सदैव प्रसन्न रहें* 🙏