महाराष्ट्र में शिवसेना की ही सरकार थी जब मुंबई सीरियल ब्लास्ट की पूरी जांच की गई थी
उस जांच में यह खुलासा हुआ था कि समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी और उस वक्त समाजवादी पार्टी का नेता रहा नवाब मलिक टेरर फंडिंग में लिप्त हैं और इन्होंने दाऊद इब्राहिम की प्रॉपर्टीओं को ठिकाने लगाने का काम किया है और उसमें से काफी पैसा मुंबई ब्लास्ट में इस्तेमाल किया गया
अबू आजमी तो खैर 5 साल जेल में रहकर आया लेकिन बाद में जब कांग्रेस सरकार ने टाडा खत्म कर दिया तब वह रिहा हो गया
फिर नवाब मलिक ने एक बेहद शातिराना चाल चला उसे लगा कि यदि वह महाराष्ट्र के सबसे धुरंधर नेता शरद पवार के शरणों में चला जाता है तब वह बच सकता है फिर नवाब मलिक एनसीपी में शामिल हो गया उसके बाद यह हमेशा बचता रहा क्योंकि अटल जी के बाद 10 सालों तक केंद्र में एनसीपी सत्ता में भागीदार थी या कहें कि शरद पवार और डीएमके जैसी पार्टियां ही पूरी सरकार चलाती थी मनमोहन सिंह तो सिर्फ एक रबर स्टैंप होते थे
शरद पवार और करुणानिधि सीधे सोनिया गांधी को रिपोर्ट करते थे
पब्लिक डोमेन में बाला साहब ठाकरे कई बार अब आजमी और नवाब मलिक की पोल खोली है
सबसे दिलचस्प बात कल कोर्ट में हुई जब ईडी ने नवाब मलिक से रिमांड मांगा और फिर जज के सामने मनी ट्रेल की पूरी हिस्ट्री रख दी नवाब मलिक का वकील अमित देसाई जो जानामाना क्रिमिनल लॉयर है उससे जज ने पूछा कि आप क्या कहते हैं क्या आप इन सबूतों को नकारते हैं ?नवाब मलिक टेरर फंडिंग में लिप्त थे या नहीं थे ?
फिर अमित देसाई की बोलती बंद हो गई
फिर जज ने तो हंसते हुए का कि मुंबई जैसे शहर में 4 एकड़ जमीन हमको भी 20 लाख में दिलवा दीजिए
कई ठोस दस्तावेज पेश किए गए जो सीधे-सीधे दिखाते थे कि नवाब मलिक के रिश्ते दाऊद इब्राहिम के साथ और उसकी बहन हसीना पारकर के साथ थे
उसके बाद नवाब मलिक के वकील अमित देसाई ने सिर्फ इतना कहा जज साहब 15 दिन का रिमांड ज्यादा है रिमांड की अवधि कुछ कम कर दीजिए फिर जज साहब ने 9 दिन के रिमांड दे दिया
हालांकि अपने आर्डर में यह भी लिखा कि 9 दिन के बाद यदि ईडी को ज्यादा रिमांड की जरूरत होगी तब भी ईडी वापस कोर्ट में आ सकती है
मुंबई सीरियल ब्लास्ट में सबसे ज्यादा नुकसान महाराष्ट्र का हुआ था मराठीओं का हुआ था सबसे ज्यादा मराठी लोग मरे थे मराठी अस्मिता पर हमला हुआ था भारत की आर्थिक राजधानी पर हमला हुआ था
अफसोस मराठी अस्मिता की बात करने वाले अब उन्हीं लोगों के साथ खड़े हैं जिन्होंने मराठी अस्मिता पर अब तक की सबसे करारी चोट की है
एक शिवसेना के लिए यदि यूपी और बिहार से कोई हिंदू आकर महाराष्ट्र में रोजी रोटी कमाता है तब वह गलत है तब घुसपैठिया है लेकिन यदि यूपी के बलरामपुर से आ कर शांतिदूत घर-घर कबाड़ खरीद ले खरीद लेते अरबपति बन जाता है या फिर उत्तर प्रदेश से आया हुआ अबु आजमी एक रेस्टोरेंट में प्लेट धोते-धोते और अरबपति बन जाता है तब वह जायज है।
Day: February 26, 2025
मदर टेरेसा
आखिर मदर टेरेसा का मकसद क्या था – सेवा या धर्मांतरण.
मदर टेरेसा की ईसाई धर्म में आस्था बेहद गहरी थी. जीसस क्राइस्ट के लिए उनका समर्पण ही उन्हें ईसाई मिशनरी बनाकर भारत ले आया था. कोलकाता के कालीघाट इलाके से शुरु हुआ ये सेवा का सफर मदर टेरेसा के लिए लाया बेशुमार शोहरत. उनका गरीबों से ये प्रेम दुनिया के सामने तब आया जब 1969 में इंग्लैंड के खबरिया चैनल बीबीसी ने उनके इस काम को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया के सामने पहुंचा दिया.
मदर टेरेसा को जो शोहरत मिली वो जल्द ही विवादों में भी आ गई. साल 1989 में बड़ा सवाल उठाया कोलकाता में उनके साथ 9 साल काम करने वाली सुजैन शील्ड ने सुजैन ने लिखा कि मदर को इस बात की बेहद चिंता थी कि हम खुद को गरीब बनाए रखें. पैसे खर्च करने से गरीबी खत्म हो सकती है. उनका मानना था इससे हमारी पवित्रता बनी रहेगी और पीड़ा झेलने से जीसस जल्दी मिलेगा. यहां तक कि वह जिनकी सेवा करती थीं उन्हें पुराने इंजेक्शन की सुई खराब हो जाने से दर्द होता था लेकिन वह नए इंजेक्शन भी नहीं खरीदने देती थीं.
मदर टेरेसा ऐसा क्यों चाहती थीं? इसका जवाब 1989 में मदर टेरेसा ने खुद टाइम मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में दिया था.
सवाल – भगवान ने आपको सबसे बड़ा तोहफा क्या दिया है?
मदर टेरेसा – गरीब लोग
सवाल – (चौंकते हुए) वो तोहफा कैसे हो सकते हैं?
मदर टेरेसा –उनके सहारे 24 घंटे जीसस के पास रहा जा सकता है.
मदर टेरेसा ने इसी इंटरव्यू में धर्मांतरण पर भी अपना रुख साफ किया था
सवाल – भारत में आपकी सबसे बड़ी उम्मीद क्या है?
जवाब – सब तक जीसस को पहुंचाना.
सवाल – आपके दोस्तों का मानना है कि आपने भारत जैसे हिंदू देश में ज्यादा धर्मांतरण ना करके उन्हें निराश किया है?
जवाब – मिशनरी ऐसा नहीं सोचते. वे सिर्फ जीसस के शब्दों पर भरोसा करते हैं. संख्या का इसके कोई लेना देना नहीं है. लोग लगातार सेवा करने और खाना खिलाने आ रहे हैं. जाइए और देखिए. हमें कल का पता नहीं लेकिन क्राइस्ट के दरवाजे खुले हैं. हो सकता है ज्यादा बड़ा धर्मांतरण ना हुआ हो लेकिन हम अभी नहीं जान सकते कि आत्मा पर क्या असर हो रहा है.
सवाल – क्या उन लोगों को जीसस से प्यार करना चाहिए?
जवाब – सामान्य तौर पर अगर उन्हें शांति चाहिए, उन्हें खुशी चाहिए तो उन्हें जीसस को तलाशने दीजिए. अगर लोग हमारे प्यार से बेहतर हिंदू बनें, बेहतर मुसलमान बनें, बेहतर बौद्ध बनें तो इसका मतलब है उनमें कुछ और जन्म ले रहा है. वो ऊपरवाले के पास जा रहे हैं. जब वो उसके और करीब जाएंगे तो वो उसे चुन लेंगे.
क्या यही वजह है कि अब आरएसएस के समर्थक और बीजेपी दोनों मदर टेरेसा की सेवा को धर्मांतरण से जोड़ कर देख रहे हैं.
मीनाक्षी लेखी ने कहा कि मदर टेरेसा अपने बारे बेहतर जानती थीं, उनकी बायोग्राफी लिखने वाले नवीन चावला खुद स्वीकार कर रहे हैं कि मदर टेरेसा ने खुद कहा था कि मैं कोई सोशल वर्कर नहीं हूं. मेरा काम जीसस की बातों को लोगों तक पहुंचाना है.
मीनाक्षी जिस पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का जिक्र कर रही हैं मदर टेरेसा के अच्छे दोस्त थे और उन्होंने मदर टेरेसा की जीवनी लिखी है. इसके मुताबिक उन्होंने नवीन चावला से पूछा था.
नवीन चावला – क्या आप धर्मांतरण करवाती हैं?
मदर टेरेसा – बिल्कुल. मैं धर्मांतरण करवाती हूं. मैं बेहतर हिंदू बनाती हूं या बेहतर मुसलमान या बेहतर इसाई. एक बार आपको आपका भगवान मिल गया तो आप तय कर सकते हैं किसे पूजना है.
ये वही बात थी जो वो टाइम मैगजीन से पहले भी कह चुकी थीं. 90 के दशक में भगवान में भरोसा ना रखने वाले क्रिस्टोफर हिचिन्स ने भी मदर टेरेसा पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक डाक्यूमेंट्री बनाई जिसकी आज भी चर्चा होती है. इसी डाक्यूमेंट्री में एक सीनियर पत्रकार ने भी कहा कि उनका मकसद धर्म था ना कि सेवा.
भारत में भी मदर टेरेसा के मकसद को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं.
हालांकि मदर टेरेसा के साथ काम करने वाली सुनीता कुमार उनके मकसद पर देश और दुनिया में बार बार उठने वाले सवालों को गलत ठहराती हैं. मदर टेरेसा ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को धर्म की आजादी का कानून बनाते वक्त भी एक खत लिख कर इसका विरोध किया था.
एम एस चितकारा की किताब के मुताबिक मदर टेरेसा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को 1978 में एक खुला खत लिखा था और इसकी प्रतियां सांसदों में बांटी थीं. खत का रिश्ता धार्मिक स्वतंत्रता के कानून से था. मदर टेरेसा इसके विरोध में थीं क्योंकि इससे धर्मांतरण की प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती थी.
मदर टेरेसा की जिंदगी पर उठे से सवाल पिछले 20 साल से बार बार सामने आते रहे हैं. इल्जाम ये भी लगा कि वो अपने मरीजों की देखभाल इसलिए नहीं करती थीं ताकि वो भगवान को याद करते रहें.
ये बेहद खूबसूरत है कि कोई भी बिना सेंट पीटर के स्पेशल टिकट के नहीं मर सकता. हम इसे सेंट पीटर का बपतिस्मा टिकट कहते हैं. हम लोगों से पूछते हैं क्या तुम्हें अपने पापों को माफ करने वाला आशीर्वाद और भगवान चाहिेए. उन्होंने कभी मना नहीं किया. कालीघाट में 29 हजार लोगों की मौत हुई है.
मदर टेरेसा
कैलिफोर्निया, 1992
मदर टेरेसा
आखिर मदर टेरेसा का मकसद क्या था – सेवा या धर्मांतरण.
मदर टेरेसा की ईसाई धर्म में आस्था बेहद गहरी थी. जीसस क्राइस्ट के लिए उनका समर्पण ही उन्हें ईसाई मिशनरी बनाकर भारत ले आया था. कोलकाता के कालीघाट इलाके से शुरु हुआ ये सेवा का सफर मदर टेरेसा के लिए लाया बेशुमार शोहरत. उनका गरीबों से ये प्रेम दुनिया के सामने तब आया जब 1969 में इंग्लैंड के खबरिया चैनल बीबीसी ने उनके इस काम को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया के सामने पहुंचा दिया.
मदर टेरेसा को जो शोहरत मिली वो जल्द ही विवादों में भी आ गई. साल 1989 में बड़ा सवाल उठाया कोलकाता में उनके साथ 9 साल काम करने वाली सुजैन शील्ड ने सुजैन ने लिखा कि मदर को इस बात की बेहद चिंता थी कि हम खुद को गरीब बनाए रखें. पैसे खर्च करने से गरीबी खत्म हो सकती है. उनका मानना था इससे हमारी पवित्रता बनी रहेगी और पीड़ा झेलने से जीसस जल्दी मिलेगा. यहां तक कि वह जिनकी सेवा करती थीं उन्हें पुराने इंजेक्शन की सुई खराब हो जाने से दर्द होता था लेकिन वह नए इंजेक्शन भी नहीं खरीदने देती थीं.
मदर टेरेसा ऐसा क्यों चाहती थीं? इसका जवाब 1989 में मदर टेरेसा ने खुद टाइम मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में दिया था.
सवाल – भगवान ने आपको सबसे बड़ा तोहफा क्या दिया है?
मदर टेरेसा – गरीब लोग
सवाल – (चौंकते हुए) वो तोहफा कैसे हो सकते हैं?
मदर टेरेसा –उनके सहारे 24 घंटे जीसस के पास रहा जा सकता है.
मदर टेरेसा ने इसी इंटरव्यू में धर्मांतरण पर भी अपना रुख साफ किया था
सवाल – भारत में आपकी सबसे बड़ी उम्मीद क्या है?
जवाब – सब तक जीसस को पहुंचाना.
सवाल – आपके दोस्तों का मानना है कि आपने भारत जैसे हिंदू देश में ज्यादा धर्मांतरण ना करके उन्हें निराश किया है?
जवाब – मिशनरी ऐसा नहीं सोचते. वे सिर्फ जीसस के शब्दों पर भरोसा करते हैं. संख्या का इसके कोई लेना देना नहीं है. लोग लगातार सेवा करने और खाना खिलाने आ रहे हैं. जाइए और देखिए. हमें कल का पता नहीं लेकिन क्राइस्ट के दरवाजे खुले हैं. हो सकता है ज्यादा बड़ा धर्मांतरण ना हुआ हो लेकिन हम अभी नहीं जान सकते कि आत्मा पर क्या असर हो रहा है.
सवाल – क्या उन लोगों को जीसस से प्यार करना चाहिए?
जवाब – सामान्य तौर पर अगर उन्हें शांति चाहिए, उन्हें खुशी चाहिए तो उन्हें जीसस को तलाशने दीजिए. अगर लोग हमारे प्यार से बेहतर हिंदू बनें, बेहतर मुसलमान बनें, बेहतर बौद्ध बनें तो इसका मतलब है उनमें कुछ और जन्म ले रहा है. वो ऊपरवाले के पास जा रहे हैं. जब वो उसके और करीब जाएंगे तो वो उसे चुन लेंगे.
क्या यही वजह है कि अब आरएसएस के समर्थक और बीजेपी दोनों मदर टेरेसा की सेवा को धर्मांतरण से जोड़ कर देख रहे हैं.
मीनाक्षी लेखी ने कहा कि मदर टेरेसा अपने बारे बेहतर जानती थीं, उनकी बायोग्राफी लिखने वाले नवीन चावला खुद स्वीकार कर रहे हैं कि मदर टेरेसा ने खुद कहा था कि मैं कोई सोशल वर्कर नहीं हूं. मेरा काम जीसस की बातों को लोगों तक पहुंचाना है.
मीनाक्षी जिस पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का जिक्र कर रही हैं मदर टेरेसा के अच्छे दोस्त थे और उन्होंने मदर टेरेसा की जीवनी लिखी है. इसके मुताबिक उन्होंने नवीन चावला से पूछा था.
नवीन चावला – क्या आप धर्मांतरण करवाती हैं?
मदर टेरेसा – बिल्कुल. मैं धर्मांतरण करवाती हूं. मैं बेहतर हिंदू बनाती हूं या बेहतर मुसलमान या बेहतर इसाई. एक बार आपको आपका भगवान मिल गया तो आप तय कर सकते हैं किसे पूजना है.
ये वही बात थी जो वो टाइम मैगजीन से पहले भी कह चुकी थीं. 90 के दशक में भगवान में भरोसा ना रखने वाले क्रिस्टोफर हिचिन्स ने भी मदर टेरेसा पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक डाक्यूमेंट्री बनाई जिसकी आज भी चर्चा होती है. इसी डाक्यूमेंट्री में एक सीनियर पत्रकार ने भी कहा कि उनका मकसद धर्म था ना कि सेवा.
भारत में भी मदर टेरेसा के मकसद को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं.
हालांकि मदर टेरेसा के साथ काम करने वाली सुनीता कुमार उनके मकसद पर देश और दुनिया में बार बार उठने वाले सवालों को गलत ठहराती हैं. मदर टेरेसा ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को धर्म की आजादी का कानून बनाते वक्त भी एक खत लिख कर इसका विरोध किया था.
एम एस चितकारा की किताब के मुताबिक मदर टेरेसा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को 1978 में एक खुला खत लिखा था और इसकी प्रतियां सांसदों में बांटी थीं. खत का रिश्ता धार्मिक स्वतंत्रता के कानून से था. मदर टेरेसा इसके विरोध में थीं क्योंकि इससे धर्मांतरण की प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती थी.
मदर टेरेसा की जिंदगी पर उठे से सवाल पिछले 20 साल से बार बार सामने आते रहे हैं. इल्जाम ये भी लगा कि वो अपने मरीजों की देखभाल इसलिए नहीं करती थीं ताकि वो भगवान को याद करते रहें.
ये बेहद खूबसूरत है कि कोई भी बिना सेंट पीटर के स्पेशल टिकट के नहीं मर सकता. हम इसे सेंट पीटर का बपतिस्मा टिकट कहते हैं. हम लोगों से पूछते हैं क्या तुम्हें अपने पापों को माफ करने वाला आशीर्वाद और भगवान चाहिेए. उन्होंने कभी मना नहीं किया. कालीघाट में 29 हजार लोगों की मौत हुई है.
मदर टेरेसा
कैलिफोर्निया, 1992
Last moments of Savarkarji.
Its baffling how physical endurance and mental resilience are considered the ultimate measures of a patriotic spirit and devotion. Here was a slight, frail man, more suited to a life of intellectual pursuits, who was subjected to prolonged incarceration, physical brutalities and mental torture meant to break his spirit and demolish his mental resilience.
A swift execution would have been a merciful sentence than 12 years of relentless physical torture and mental agony. But the British denied him his right to a heroic death and the honor of martyrdom and instead condemned him to a life of back breaking labour, soul crushing humiliation and excruciating physical torture. He and other patriotic prisoners were treated like beasts of burden, yoked to an oil mill, and forced to extract an impossible quota of 80 pounds of oil a day, and were mercilessly flogged if they failed to meet the stipulated amount. All this on a measely diet of food infested with worms and stones, served on rusty iron plates and water that was rationed to two cups a day.
Meanwhile one of our so called ‘founding fathers’ was busy revelling in the lap of luxury, travelling around the world, attending lavish parties with the elites, while brazenly romancing his colonial master’s wife and other mistresess, and the other was busy experimenting with his twisted version of truth by sleeping and bathing with his unclothed nubile grand neices or writing intimate letters full of sexual innuendos to his “soulmate” Kallenbaugh.
Three years before his death, Savarkarji had punlished an article titled “Atmahatya Nahi Atmaarpan”, in which he contended that when one’s purpose in life is fulfilled and one can no longer contribute to society, it is more honorable to willingly embrace death rather than passively await it. Ironically, the man who has been mocked as a coward, willfully and bravely chose to surrender his life by committing Prayopavesa, renouncing food and water and quietly embracing death with unwavering resolve and dignity and breathed his last on this day 58 years ago.
My humble tributes to the true patriot.
🙏🙏🙏

કુંભ
🌻🌸 *પર્વ વિશેષ* 🌸🌻
*મહા કુંભમેળો*
આજ કાલ છેલ્લા એકાદ માસથી દેશમાં અને વિશ્વમાં પણ બહુચર્ચિત વિષય – મહા કુંભ મેળો છે. તેનું *હાર્દ* શું છે તે સૌએ પ્રથમ જાણી લેવું જોઈએ.
આજથી ૨૫૦૦ વર્ષ પહેલાં બૌદ્ધ ધર્મને રાજ્યાશ્રય મળ્યો અને દેશમાં તેની Negative વિચારધારા પ્રભાવી થવા લાગી. તેમની વિચારધારામાં બે નકારાત્મક પાસાં એ હતાં કે તેમના પ્રચારકોએ ૧) વેદનિષ્ઠા અને ૨) મૂર્તિપૂજા ઉડાવી દીધી. જે આપણા વૈદિક સનાતન ધર્મનો પાયો છે. તેનાથી આપણા વૈદિક સનાતન ધર્મને મોટો ધક્કો બેઠો. તે કાળે સંસ્કૃતિના મહાન સપૂત કુમારીલ ભટ્ટ ઊભા થયા અને તેમણે અનેક શાસ્ત્રાર્થ કરી બૌદ્ધ પંડિતોને હરાવ્યા. પરંતુ સમગ્ર દેશમાં આ વિચારધારા ખૂણે ખૂણે પહોંચાડવાની જરૂર હતી તે કામ તે કરી ન શક્યા તેથી તેમણે પોતે ડાંગરના ભૂસાના ઢગલા પર આગ પેટાવી આત્મવિલોપન કર્યું. તેમની એવી ઇરછા હતી કે મારું બલિદાન જોઈને કોઈક સંસ્કૃતિ સપૂત આગળ આવશે. તે કાળે *આદ્ય શંકરાચાર્ય* તેમની પાસે આવ્યા અને તેમણે ભૂસાના ઢગલાની રાખ મસ્તકે ચડાવી, અને કુમારીલ ભટ્ટને વચન આપ્યું કે હું તમારું અધૂરું રહેલું સનાતન ધર્મનું કાર્ય પૂરું કરીશ. ત્યાર બાદ આદ્ય શંકરાચાર્યે કુમારીલ ભટ્ટને આપેલ વચન અનુસાર સમગ્ર દેશમાં ત્રણ વાર પગપાળા પ્રવાસ કરીને વૈદિક ધર્મનો ઝંડો લહેરાવ્યો, સંસ્કૃતિનો પુનરોદ્ધાર કર્યો, વૈદિક નિષ્ઠા, વૈદિક જ્ઞાન અને સગુણ ઉપાસના પાછાં ઊભા કર્યાં. બૌદ્ધ ધર્મની નકારાત્મક વિચારધારાને નષ્ટ કરી તેને દેશપાર કરી દીધો. હવે તેમનું આયુષ્ય માત્ર ૩૨ વર્ષનું જ હતું, તેથી તેમના ગયા પછી આ સંસ્કૃતિનું કાર્ય ચીરકાળ સુધી કોણ સંભાળશે ? તેમના ચાર શિષ્યો હતા તેથી ભારતના ચાર ખૂણે તેમણે ચાર મઠ સ્થાપ્યા અને વૈદિક સનાતન ધર્મના રક્ષણના કાર્યની જવાબદારી ચાર શિષ્યોને સોંપી અને પોતે ૩૨ વર્ષે કૈલાસધામ સિધાવ્યા. આ ચાર મઠના આચાર્યો દર બાર વર્ષે જ્યારે ગુરુ મકર રાશિમાં આવે ત્યારે ગંગા યમુનાના મિલન સ્થળે કુંભ મેળો યોજાય તેમાં મળશે અને તેમાં સમગ્ર ભારતના સૌ સાધુ સન્યાસીઓ અને મહામંડલેશ્વરો ભેગા મળીને સંસ્કૃતિના કાર્યની, તેના રક્ષણ માટેનું આયોજન કરશે, સંસ્કૃતિના કાર્યમાં મળેલા અનુભવો અને મુશ્કેલીઓની વાતો એકબીજાને Share કરશે અને તે મુજબ ૧૨ વરસ સતત કાર્યરત રહી ફરી પાછા બાર વર્ષે આવનારા કુંભ મેળામાં ફરી મળશે. તેમાં શંકરાચાર્યે હિમાલયમાં વરસોથી તપ કરતા રહેલા અસંખ્ય અઘોરી નાગા બાવાઓને પણ આ સંસ્કૃતિના પવિત્ર કાર્યમાં બોલાવ્યા અને તેમાં સામેલ થવા વિનંતી કરી. આદ્ય શંકરાચાર્ય દ્વારા શરુ કરવામાં આવેલ આ સિલસિલો ચાલુ રહેલ છે. તે બહાના હેઠળ સંસ્કૃતિ રક્ષણ અને સંવર્ધન કેટલું થાય છે તે આપણને સુવિદિત છે.
૧૪૪ વર્ષે *મહા કુંભ મેળો* ભરાય છે. તેમાં વિના આમંત્રણે, કોઈ જાહેરાત કે પ્રચાર વિના રોજના લાખો લોકો પ્રયાગરાજના મિલન સ્થળે જાય છે. અનેક તકલીફો વેઠીને પણ ત્યાં સ્નાન કરી ધન્યતા અનુભવે છે. આ આપણી *સાંસ્કૃતિક ધાર્મિક એકતા* નું પ્રતીક છે. આપણા વૈદિક સનાતન ધર્મની મોટી તાકાત છે. ત્યાં કોઈ જાતિભેદ, ભાષા ભેદ, વર્ણભેદ, જ્ઞાતિભેદ કે પ્રાંતભેદ નથી. સૌને આપણી સંસ્કૃતિ માટે પ્રેમ છે તેથી બધા જાય છે. આજ સુધીમાં લગભગ ૫૦ કરોડ જેટલા લોકો ત્યાં જઈને મુશ્કેલીઓ વેઠીને સ્નાન કરી ચૂક્યા છે. ( Latest Report ) હજુ તે મહા કુંભ મેળો ૨૬ મી તારીખ – મહા શિવરાત્રિ સુધી રહેશે. તેણે અનેક વિશ્વ રેકોર્ડ બનાવ્યા છે અને વિશ્વના બધા દેશોની નજર તેના ઉપર છે. આપણા ધર્મની તાકાત અને આસ્થા જોઈ સૌ નવાઈ પામે છે.
સાથે સાથે આજે તેના ઉપર મોટું રાજકારણ પણ ચાલી રહ્યું છે. સંસ્કૃતિ અને ધર્મ વિરોધી લોકો તેને બદનામ કરવાનો બધો જ પ્રયાસ કરી રહેલ છે. આપણા ધર્મના જ કહેવાતા ધાર્મિક લોકો જેમના પેટમાં સત્તા લાલસા છે તેઓ કોઈ પણ હિસાબે ધર્મનાં શ્રધ્ધા સ્થાનોને બદનામ કરી ધર્મની એકતા તોડવા પ્રયત્નશીલ થતા રહ્યા છે, એવા લોકો જ તેમાં પોતાના મલીન અને હીન વિચારો અને શંકા કુશંકાઓ, તર્ક કુતર્કનો કચરો ઠાલવતા રહેલા છે. લોકોની આસ્થા તોડવાનો પ્રયત્ન ચાલી રહ્યો છે.
બીજા બધા ઠીક, પણ આપણે આ કુંભ મેળાનું હાર્દ સમજી લઇએ. આપણી શ્રદ્ધાને ડગમગવા ન દઇએ. કુંભમેળામાં રહેલો હેતુ, તેની ઉદાત્ત ભાવના અને શંકરાચાર્યે આપેલ મંત્ર આજે કદાચ ચાલ્યો ગયો હશે પણ આપણે તે હાર્દ પુનઃ સ્થાપિત કરવાનું છે. સંસ્કૃતિ માટે જેને પ્રેમ નથી, જેણે સંસ્કૃતિ માટે કદી પોતાનાં શક્તિ સંપત્તિ અને સમય ખર્ચ્યા નથી, કુમારીલ ભટ્ટ જેવી કોઈ ત્યાગની ભાવના નથી, આદ્ય શંકરાચાર્ય જેવો જેને સંસ્કૃતિ માટે પ્રેમ નથી, જીવનમાં કોઈ જાતનો નિસ્વાર્થ કર્મયોગ નથી તેવા *નિસ્તેજ નિષ્પ્રાણ પ્રેમશૂન્ય કર્મશૂન્ય ભક્તિશૂન્ય* લોકો ત્યાં જઈને શું કરવાના ? માત્ર ત્યાંની ભીડમાં વધારો જ કરવાના. ગંગામા ના નિર્મળ જળને પ્રદૂષિત કરવાના, બીજું શું તે કરી શકે ?
*ગંગામૈયા* પાસે મળવા જવું હોય તો *ધર્મ અને સંસ્કૃતિ માટેનું કંઈક કામ* કરીને જઈશું તો મા ગંગા પ્રેમથી આવકારશે. નહિ તો હીરો ઘોઘે જઈ આવ્યો એવી દશા થશે.
આપણને સદભાગ્યે *પ પૂ દાદા* મળ્યા તેમણે કુંભમેળાનું હાર્દ અને તેનું સાચું મહત્ત્વ સમજાવ્યું અને આપણને સૌને મા સંસ્કૃતિનાં પવિત્ર નિસ્વાર્થ અને નિરપેક્ષ પ્રભુકાર્યમાં જોડ્યા. આદ્ય શંકરાચાર્ય પછી પહેલીવાર આટલા મોટા સમૂહે ( સ્વાધ્યાય પરિવારે ) ૧૨૦૦ વરસ પછી વૈશ્વિક *પ્રભુ કાર્ય ( સંસ્કૃતિનું કાર્ય )* ઉપાડ્યું છે, તે નાની સૂની વાત નથી, ગૌરવ લેવા જેવી વાત છે. સૌ પ્રભુ કાર્ય કરતા રહ્યા છીએ પણ તેમાં વારે વારે મુશ્કેલીઓ ઘણી આવે, શક્તિ ઓછી પડે, મન નિરાશ હતાશ થઈ જાય, જોઈતું પરિણામ ન મળે, ત્યારે મા ગંગાને પ્રેમભાવે એટલી જ પ્રાર્થના કરીએ –
*मातृगङ्गे नमस्तुभ्यं अहं त्वां शरणागतः।*
*कटीबद्धस्य ते कार्यं भक्तिं शक्तिं च देहि मे ।।*
હે મા ગંગે !
તને નમસ્કાર છે. તારું કાર્ય કરવા માટે હું કટીબદ્ધ થયો છું. મને *ભક્તિ અને શક્તિ* આપો એટલી જ મારી પ્રાર્થના.
जब महाराजा रणजीत सिंह का पोता हुआ तब उन्होंने लाहौर में अपने पोते के लिए एक शानदार हवेली का निर्माण करवाया उस हवेली में एक गुरुद्वारा भी था उस हवेली का नाम हवेली नौ निहाल सिंह था नौनिहाल सिंह महाराजा रणजीत सिंह के पोते थे।
अब पाकिस्तान सरकार ने गुरुद्वारा हटा दिया है पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब भारत आ गया है और इस शानदार हवेली में गवर्नमेंट इस्लामिया हाई स्कूल चलता है लेकिन भारत के खालिस्तानीयों को यह सब नहीं दिखता।।
साभार जितेंद्र सिंह जी






●मित्रो आईए आपको एक
ऐसे गद्दार के बारे मे बताता हूॅ…
जो #बामपंथी_प्रोफेसर था और
उसने #भारतीय_इतिहास की
किताबो मे किस प्रकार उलटफेर
फेर कराया और #इन्दिरा_गाधी
ने बामपंथियो का सहयोग लेने के
लिए इसको #केन्द्रीय_शिक्षा मंत्री
बनाया बाद मे यह राज्यपाल भी
रहा इसका नाम था- ●”#प्रोफेसर_सैय्यद_नूरूल_हसन”
●बहुत ही नायाब जानकारी
शायद आपको और कही नही मिले…@
●भारतीय इतिहास का इंदिरा गांधी
द्वारा किया हुआ सत्यानाश…!!
●यह बात सन १९७१ की है।
इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने
रहने के लिए वामपंथी लोगों से
मदद चाहिए थी…तो समझौता
यह हुआ था कि आप प्रधानमंत्री
बनी रहो और हमारे लोगों को देश
का शिक्षा बोर्ड दे दो…!!!
●इसीलिए कट्टर वामपंथी विचार
-धारा वाले डा. नूरूल हसन को
केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री का पद
सौंपा गया था…।
परिणाम स्वरूप डा. हसन जिस
काम के लिए आये थे उसमें लग
जाते हैं…।
उन्होनें प्राचीन हिन्दू इतिहास तथा
पाठ्य पुस्तकों के विकृतिकरण का
बीड़ा उठा लिया…!!!
●सन १९७२ में
इन सैकुलरवादियों ने “भारतीय
इतिहास अनुसंधान परिषद” का
गठन कर इतिहास पुनर्लेखन
की घोषणा की और सुविख्यात
इतिहासकार यदुनाथ सरकार,
रमेश चंद्र मजूमदार तथा
श्रीजीएस.सरदेसाई जैसे
सुप्रतिष्ठित इतिहासकारों
के लिखे ग्रंथों को नकल
कर नये सिरे से इतिहास
लेखन का कार्य शुरू कराया गया…!!
●घोषणा की गई कि इतिहास और
पाठ्यपुस्तकों से वे अंश हटा दिये
जाएँगे जो राष्ट्रीय एकता में बाधा
डालने वाले और मुसलमानों की
भावना को ठेस पहुँचाने वाले
लगते हैं…।
डा. नूरूल हसन ने अलीगढ़ मुस्लिम
विश्वविद्यालय में भाषण करते हुए
कहा,महमूद गजनवी औरंगजेब
आदि मुस्लिम शासकों द्वारा
हिन्दुओं के नरसंहार एवं मंदिरों
को तोड़ने के प्रसंग राष्ट्रीय एकता
में बाधक है अत: उन्हें नहीं पढ़ाया
जाना चाहिए…!!!!
●वामपंथियों ने भारतीय स्वाधीनता
संग्राम के महान स्वतंत्रता सेनानी वीर
सावरकर पर अंग्रेजों से क्षमा माँगकर,
अण्डमान के काला पानी जेल से रिहा
होने जैसे निराधार आरोप लगाये और
उन्हें वीर की जगह ‘कायर’ बताने की
बात लिखीं…!!!
●(ये बातें डा.अमरीश प्रधान द्वारा
एक संगोष्ठि में बताई गयी हैं)*
●देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ
हो नहीं सकता है कि हमारे बच्चे
यह नहीं पढ़ पा रहे हैं कि औरंगजेब
ने किस तरह से देश में हिन्दुओं का
कत्लेआम करवाया था…।
इन लेखकों ने यह तो लिख दिया
कि गांधी की हत्या नाथूराम ने की
थी किन्तु यह नहीं बताया कि गुरू
गोविन्द जी कैसे शहीद हुए थे…??
●सबसे बड़ा मजाक यह है कि स्कूल
की किताबों में कौन सा लेखक क्या
लिख रहा है इसकी जाँच करने के
लिए कोई भी बोर्ड नहीं है;
कोई लिखता है कि राम नहीं थे
तो कोई महाभारत को एक कहानी
लिखता है किन्तु एक खास धर्म से
पंगा नहीं लेता है।
आज भी कांग्रेस की दया के चलते
ही कई वामपंथी लोग शिक्षा बोर्ड
पर कब्जा किये बैठे हैं…!!
●इसी योजना के तहत JNU
जैसे अनेक तथाकथित ‘स्वायत्त’
विश्वविद्यालयों की स्थापना करके
भी उन्हें वामपंथियों को सौंप दिया
गया जो आज देशविरोधी जहर
उगलने वाले ‘बच्चों’ का पोषण
कर रहे हैं…।
इस विषय में केंद्र सरकार को
एक आयोग बनाकर “इनके गठन
के उद्देश्यों की पूर्ति” की जाँच
करवाकर कार्यवाही करनी चाहिए…!!
●शिक्षा बचाओ,
इतिहास पढ़ाओ…!!
●भारत बचाओ,
भारतीयता बचाओ…!!
●यह है %*%द्दीन नूरूल हसन…! ●और यह थी देश को बर्बाद करन
वाली हिन्दुओ की दुश्मन रण्डीरा
मुसल्ली…!!!*
© योगक्षेमं वहाम्यहम्★
जागो हिन्दुओ!!
जय श्रीराम💐
वंदेमातरम💐

एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने
देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।
औरत ने कहा –
“कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”
संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”
संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर
हों।”
शाम को उस औरत का पति घर आया और
औरत ने उसे यह सब बताया।
पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर
आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।”
औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के
लिए कहा।
संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ
नहीं जाते।”
“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है”
फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा –
“इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं।
हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है।
आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर
लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”
औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब
बताया।
उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और
बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित
करना चाहिए।
हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।”
पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को
आमंत्रित करना चाहिए।”
उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी।
वह उनके पास आई और बोली –
“मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना
चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम
को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने
कहा।
औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा –
“आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में
प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”
प्रेम घर की ओर बढ़ चले।
बाकी के दो संत भी उनके
पीछे चलने लगे।
औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा –
“मैंने
तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग
भीतर क्यों जा रहे हैं?”
उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और
सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता
तो केवल वही भीतर जाता।
आपने प्रेम को आमंत्रित किया है।
प्रेम कभी अकेला नहीं जाता।
प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता
उसके पीछे जाते हैं।
इस कहानी को एक बार, 2 बार, 3 बार
पढ़ें ……..
अच्छा लगे तो प्रेम के साथ रहें, 💖💖
प्रेम बाटें, प्रेम दें और प्रेम लें
क्यों कि प्रेम ही
सफल जीवन का राज है।
એક પ્રેમકહાની જે એની મંઝિલ સુધી પહોંચી.
ગોપાલનું ભણતર-ગણતર પૂરું થઈ ગયું હતું. ધનાઢ્ય પરિવારનું સંતાન હોવાના કારણે નોકરી શોધવાની નહતી. પિતાએ ઝમાવેલ ધંધામાં પિતાના માર્ગદર્શનમાં જ પલોટાવનું હતું. એના પિતાજીએ જ્યારે એને કહ્યું કે તું હવે બિઝનેસ શંભળવાનું શરૂ કરી દે, વરસે દહાડે કરોડોની આવક કમાવી આપતો બિઝનેસ તું મારુ હયાતીમાં જ શીખી લે તો અમને નિરાંત રહે. પિતાની વાત શંભળીને પુત્રએ જવાબ આપ્યો, ‘ પિતાજી હું બિઝનેસ તો શંભળીશ, પણ એક આખરી વાર મને મારા મન ગમતા સ્થળોએ પ્રવાસે જવાની રજા આપો. પ્રવાસેથી આવ્યા બાદ તરત જ બિઝનેસમાં લાગી જઈશ.
પિતાને પુત્રની વાતમાં આપત્તિ લેવા જેવુ કઈ લાગ્યું નહીં. પિતાને ખબર હતી કે પુત્ર હાઇસ્કૂલમાં હતો ત્યારથી પ્રવાસનો શોખીન હતો અને તેમાં પણ ખાસ એને પર્વતાળ પ્રદેશો ગમતા હતા. પિતાએ પણ પુત્રને ખુશી ખુશી મંજૂરી આપી દીધી. પુત્રએ એના પ્રવાસ માટે ખાસ નાનકડી બેગ તૈયાર કરી દીધી. આમ તો ઘરની ગાડી હતી, પણ એના પ્રવાસમાં ઘણા એવા વિસ્તારો આવતા હતા કે જ્યાં ગાડી લઈ શકાતી નહતી, તેથી ગાડી સગવડને બદલે બોઝા રૂપ બની જતી હતી, તેથી ગોપાલ પોતીકી મુક્ત રીતે પ્રવાસ કરવાનું પસંદ કરતો. ઓછામાં ઓછા સામાન સાથે એનો પ્રવાસ આયોજીત થઈ જતો હતો. પિતાજીની મંજૂરી મળતા ગોપાલ એના પ્રવાસે જવા નીકળી પડ્યો.
આ વખતે એણે પ્રવાસ માટે હિમાચલ પ્રદેશનો પાલનપૂર વિસ્તાર પસંદ કર્યો. પર્વતાળ વિસ્તારોમાં ફરવાનું એને ગમતું. અહીથી ઊગતા અને આથમતા સૂર્ય અને ચાંદ જોવાનો આનંદ ખાસ હતો. પર્વતો ઉપર અમુક એવા પોઈન્ટ આવતા જ્યાથી ધરતીનો નઝારો બહુ જીવંત લાગતો, આવા નઝારાને જોતાં આંખો થાકથી નહતી. કે મન કદીય ધરાતું નહતું.
આમ તો એણે મન ભરીને ફરી લીધું હતું. આજે એના પ્રવાસનો છેલ્લો દિવસ હતો, એણે હવે દિલ્હી પોતાના ઘરે પરત ફરવાનું મન મનાવી લીધું હતું. તેથી આજે પ્રવાસનો છેલ્લો દિવસ હોઈ એણે પરત ફરવામાં મોડુ કર્યું, સુર્ય આથમી ચૂક્યા પછી પણ એ મોડેસુધી બેસી રહ્યો. એની ફેવરમાં એક વાત હતી, કે એની ભૌગોલીક સૂઝ સમાજ ધારદાર હતી, એ જે રસ્તે આવ્યો હોય એ જ રસ્તે કોઈને પૂછ્યા વગર પરત ફરી શકતો હતો, એણે રસ્તાઓ યાદ રહેતા હતા, દિશાઓ સંબંધી એની સૂઝ કુદરતી રૂપથી કેળવાયેલી હતી, એણે ગાઈડ રાખવાની ક્યારેય જરૂર પડી નહતી. તેથી મોડુ થઈ ગયું તો પણ એ નિશ્ચિત હતો.
પણ આજનો દિવસ જુદો હતો, એણે ધાર્યો ના હોય એ હદે અલગ હતો, જે એણે ભૂલવામાં નાખવાનો હતો. એ ધીમા પણ મક્કમ પગલે ચાલી રહ્યો હતો. અને એકાએક અચાનક આસમાન કાળા દિબાંગ વાદળોથી ઘેરાઈ ચૂક્યું હતું, એની સાથે મૂશળધાર વરસાદ તૂટી પડ્યો. આસપાસનું વાતાવરણ ધૂંધળું બની ગયું. અને એ એનો માર્ગ ચૂક્યો, ભૂલો પડી ગયો, પર્વતાળ વિસ્તારમાં નાના નાના ગામોમાં, પચાસ સો જેટલા ઘરોમાં લોકો રહેતા હોય છે. આ ગામો વચ્ચે પણ ઘણું અંતર હોય છે. ગોપાલને ખબર નથી કે અહી નજીકમાં કોઈ ગામ જેવુ છે પણ ખરૂ? એ ભગવાન ભરોસે ચાલી રહ્યો હતો. ભારે વરસાદના કારણે એણે દૂરનું દશ્ય દેખાતું પણ નહતું, કે જેથી એ અંદાજ લગાવી શકે કે અહી નજીકમાં કોઈ ગામ છે?
આ મુશ્કિલ સમયમાં કોઈ ગામ તો નજરે આવ્યું નહીં પણ એક ખંડેર જેવુ જર્જરિત ઘર નજરે આવ્યું. એ ઘર પાસે ગયો, ઘરનો ઓટલો એટલો બધો નાનો હતો કે વરસાદથી એનો બચાવ થઈ શકે એમ નહતો. એણે ઘરના દરવાજા ઉપર દસ્તક લગાવી. થોડી વારમાં એક ખૂબસૂરત યુવાન સ્ત્રીએ દરવાજો ખોલ્યો. એણે સ્ત્રીને બે હાથ જોડીને વિનતિથી ભરેલા શૂરમાં જણાવ્યુ, કે પોતે પ્રવાસી છે. અને આ વરસાદમાં ભૂલો પડી ગયો છે. એક રાત માટે આશરો મળી શકે? એણે આતુરતા પૂર્વક સ્ત્રીના પ્રત્યુત્તરની રાહ જોઈ. એને દેખાયું કે સ્ત્રીની નજરમાં ખંચકાટ હતો, થોડી સેકન્ડ અબોલ રહી, પછી મધુર અવાજમાં એ સ્ત્રી બોલી, કોઈ વાંધો નહીં, તમે ઘરમાં આવો, આટલા ભયંકર વરસાદમાં તમે જશો તો પણ ક્યાં જશો? અહી બે-ત્રણ કિલોમીટર સુધી કોઈ વસ્તી પણ નથી.
ઘરમાં ગયા પછી, ગોપાલને આશ્ચર્ય થયું કે ઘરમાં આ યુવાન અને અત્યંત સુદર સ્ત્રી એકલી જ રહેતી હતી. તો પણ આ સ્ત્રીએ એને સારી રીતે આવકાર્યોં. એક ટુવાલ આપ્યો, પહેરવા માટે એને શર્ટ અને પેન્ટ પણ આપતા કહ્યું,’ આ મારા પતિના કપડાં છે, તમને અનુકૂળ થઈ જશે એવું લાગે છે. તમે શરીર લૂછીને આવો હું તાપણું તૈયાર કરું છુ. ગોપાલ પણ ચૂપ ચાપ બાથરૂમમાં જતો રહ્યો.
બાથરૂમમાથી બહાર આવ્યો ત્યારે એનું શરીર ઠંડીથી ધ્રુજી રહ્યું હતું. પણ એને માટે મોટી સગડીમાં કોલસો નાખીને માટે તાપણું પેટાવ્યું હતું. મહિલાએ ગોપાલને કહ્યું, અહી તાપણા પાસે બેસો, હું થોડી વારમાં ગરમ ગરમ ચાય બનાવી લાવું છુ. ગોપાલ પાસે હા ના કરવા જેવુ કશું રહ્યું જ નહતું. એ બધુ જ એની સામે રજૂ થઈ રહ્યું હતું જેની એને સર્વાધિક જરૂર હતી. ગોપાલ તાપણા પાસે બેઠો, થોડી વારમાં એને સરસ મઝાની હૂંફનો અનુભવ થયો, શરીરની ધ્રૂજરી શાંત થઈ ગઈ. એના મનમાં, એકલી રહેતી આ સ્ત્રીને લઈને અનેક પ્રશ્નો હતા. એક તો આ સ્ત્રી અનહદ સુંદર હતી. પહાડી વિસ્તારના વસવાટના કારણે એનું શરીર ખૂબ જ સશક્ત હતું, આકર્ષક ઊંચાઈ હતી, ખૂબ જ ઘાટીલો ચહેરો હતો, નાક નકક્ષો તીખો હતો, એની આંખની કીકી કોલસા જેવી કાળી અને ચમકદાર હતી. હોઠ ખૂબ જ રસિલા હતા, સુંદરતા માટે એના ચહેરાને કોઈ પણ પ્રકારના મેકઅપની જરૂર નહતી.
‘લ્યો આ ગરમ ગરમ ચાય પીઓ’ કહીને એ એની સામે આવીને બેઠી. બંને જણા શાંતિથી ચાય પીવા લાગ્યા, સાથે સામ સામે પરિચયત્મક વાતો પણ થવા લાગી.
‘તમે આ ઘરમાં એકલા જ રહો છો?’ ગોપાલે વાતની શરૂઆત એને સૌથી મુઝવતા સવાલથી કરી.
‘હાલ તો હું એકલી જ રહું છુ, પણ બે મહિના પહેલા મારી સાથે મારા પતિ પણ રહેતા હતા. ચારેક વરસનું અમારું લગ્ન જીવન હતું. અમારું પ્રેમ-લગ્ન હતું, જે મારા અને એમના વડીલોને પસંદ નહતું તેથી તેઓએ અમારો બહિષ્કાર કરેલો. આ ઘર પણ અમે અમારી બંનેની કમાણી પર વસાવેલું , ત્યારે વિચારેલું કે આગળ પૈસા ભેગા કરીને નવું મકાન બનાવીશું, એક કમનસીબ અકસ્માતમાં એમનું મૃત્યુ થયું, હું સાવ એકલી પડી ગઈ, તો પણ અમારું કોઈ સગું, મારી પાસે આવ્યું નહીં, પતિના મૃત્યુ પછી તમે પહેલા છો, આ ઘરમાં આવ્યા, કે ભગવાને તમને મોકલ્યા.
ખૂબ જ સંક્ષિપ્તમાં, એણે એની કરૂણ કથની ઘણી સાદાઈ પૂર્વક રજૂ કરી દીધી. મનોમન ગોપાલ દુખી થયો. આટલી સુંદર સ્ત્રી ઉપર આટલી બધી આપત્તિ!
‘મારુ નામ ગોપાલ છે. તમારી જીવકથા મનને વિચલિત કરી મૂકે એવી છે. હું દિલ્હી નિવાસી છુ. હાલમાં જ મારુ ભણતર પૂરું થયું છે. ઘરનો જ બિઝનેસ છે, હવે પિતા સાથે જોડાઈને મારે બિઝનેસને શીખવાનો છે.’ ગોપાલના જીવનમાં કહાની જેવુ કઈ નહતું. એનો પરિવાર કરોડાધિપતિ હતો પણ એવું કહેવામા એને સંકોચનો અનુભવ થયો.
‘મારુ નામ રીતિકા છે, પ્રાથમિક સ્કૂલની શિક્ષિકા છુ, મારા પતિ પણ મારી સાથે જ શિક્ષક તરીકે ફરજ બજાવતા હતા, અમે પરિચયમાં આવ્યા, એકબીજાને પસંદ પડ્યા, પ્રેમમાં પડ્યા અને લગ્ન કર્યા, અત્યારે એમની યાદોના સહારે દિવસો વિતાવું છુ’ આટલું કહેતા એની આંખો ભીની બની ગઈ.
‘તમારી કહાની શંભળીને હું ખૂબ જ ગમગીન બની ગયો છુ. સૌથી વધારે દુખ એ વાતે થાય છે કે આવા કપરા સમયમાં પણ તમારા માતા પિતા, તમારો પરિવાર તમારી પાસે નથી અને તમને આમ એકલા મૂકીને તેઓ કઈ રીતે જીવી પણ શકતા હશે ! આવું વિચારતા મને આઘાત લાગે છે.’
રીતિકા ને ગોપાલની વાતમાં ઊંડી સમજદારી જણાઈ. એની વાત સાચી હતી. ‘તમે બેસો, હું આપના માટે ખાવાનું બનાવી લાવું છુ. એવું વિચારીને મને રોકતા નહીં કે રહેવા દો ખોટી તકલીફ…વાસ્તવમાં ઘણી વાર સાંજનું ખાવાનું હું રાંધતી જ નથી. મારા એકલા માટે કામ કરવાનું ગમતું નથી. આજે તમારા કારણે હું પણ કઈક ખાવા પામીશ.’ ગોપાલ પાસે હા ના કરવાનો કોઈ વિકલ્પ નહતો.
બંને એક સાથે ખાવા બેઠા, પણ સાથે બંનેની વાતો ચાલતી રહી. ધીમે ધીમે ખાતા જાય અને વાતો કરતાં જાય. ખાવાનું પતિ ગયું પણ બંનેની વાતો ખૂટતી નહતી. બંને એક-બીજા માટે હવે અજાણ નહતા રહ્યા, પણ એકબીજાના પરિચિત થઈ ગયા. વાત ક્યારે પરિચયથી આત્મીયતા સુધી પહોંચી ગઈ એનો ખ્યાલ બંનેને રહ્યો નહીં.
વાત વાતમાં ક્યારે સવાર પડી ગઈ, ક્યારે સૂર્યનો તડકો ઘરની અંદર સુધી આવી ગયો, ક્યારે વરસાદ બંધ થઈ ગયેલો એનો ખ્યાલ બનનેમાથી કોઈને રહ્યો નહતો. એકાએક ગોપાલને ખ્યાલ આવીઓ કે આજે તો દિલ્હી એના ઘરે જવા માટે નીકળી જવાનું છે. ગોપાલ ઊભો થયો અને જવા માટે તૈયારી કરવા લાગ્યો ત્યારે રીતિકાને ખ્યાલ આવ્યો કે હવે એમની મહેફિલ સંકેલાવા જઈ રહી છે.
ગોપાલ જ્યારે જવા માટે ઘરની બહાર નીકળ્યો ત્યારે બંનેના ચહેરા ઉપર ઉદાસી છવાયેલી હતી. કોઈ કોઇને વિદાય આપવા માંગતુ નહતું. ગલીના નાકે, ગોપાલે એક વાર પાછું ફરીને જોયું તો, રીતિકા એને એક ટશ જોઈ રહી હતી, એની આંખો ભીની હતી.
માં-બાપ બંનેને થયું કે ગોપાલ પ્રવાસેથી આવ્યા પછી ખોવાયેલો ખોવાયેલો ઉદાસ રહે છે. આમ તો પ્રવાસેથી આવતો ત્યારે એની પાસે વાતોનો ભંડાર રહેતો, પણ આજે એ ભંડાર ખાલી હતો. માં-બાપે ઉદાસીનું કારણ પૂછ્યું પણ ગોપાલ વાતને ઉડાવી દેતો હતો. કમને ખાતો, મોટા ભાગે પોતાના રૂમમાં પથારીમાં પડી રહેતો હતો, ઊંઘતોં નહતો પણ ઉદાસીમાં ઘેરાયેલો રહેતો હતો. અઠવાડિયાની એકધારી વિનંતી પછી એના પિતાને રીતિકા સાથે થયેલ મુલાકાતની અને એની સાથે થઈ ગયેલા પ્રેમની વાત કહી.
ગોપાલના માં-બાપે પણ પ્રેમ લગ્ન કર્યા હતા તેથી તેઓ પ્રેમનું દર્દ સમજતા હતા. ‘જો ભાઈ અમારે માટે તારું સુખ સર્વોપરી છે.’ ચાલ તું અમને છોકરીના ઘરે લઈ જા, અમે તારા ત્યાં ને ત્યાં જ લગ્ન કરાવી દઈએ.’
માં-માપની વાત શંભળીને ગોપાલના મનનો ઉચાટ તોં શાંત થઈ ગયો, પણ એણે કહ્યું, ‘ જુઓ, વાત એવી છે કે હું એના પ્રેમમાં છુ એ મારા મનની વાત છે, એના મનની વાત મને ખબર નથી, પહેલા હું એના ઘરે જઈ આવું, એની સાથે વાતની ચોખાવટ કરી આવું, પછી હું તમને ત્યાં બોલાવી લઇશ.’ ગોપાલની આ વાત પણ યોગી લાગી.
ગોપાલ ફરીથી પાલનપુર આવ્યો, ફરીથી એજ ઘર પાસે આવ્યો, જ્યાં એણે વરસતા વરસાદમાં આશ્રય લીધો હતો, એણે ફરીથી એજ ઘરનો દરવાનો ખટખટાવીઓ, ફરીથી એજ રીતિકાએ દરવાજો ખોલ્યો. પણ અત્યારની સ્થિતિ જુદી હતી. અત્યારે એણે આશ્રય નહતો માંગવાનો, પ્રેમની કબૂલાત માંગવાની હતી.
દરવાજાની બહાર ઊભા ઊભા જ એણે પૂછ્યું, ‘ હું, તારા પ્રેમમાં છુ અને તારી સાથે લગ્ન કરવા ચાહું છુ, તું પણ લગ્ન માટે સમ્મત છે?’ ગોપાલની વાત શાંભળીને રીતિકાએ ફટાક દઈને દરવાનો બંધ કરી દીધો. ગોપાલે અધિરાઈથી ફરીથી દરવાજો ખટખટાવીઓ, પણ આ વખતે ફટાક દઈને દરવાજો ખૂલી ગયો, અને રીતિકા બોલી, ‘ઓહ…આ સત્ય છે, રીઅલ છે, સ્વપ્નું કે ભ્રમણા નથી. એણે ગોપાલનો હાથ ખેંચીને એણે ઘરમાં અંદર લઈ લીધો. ગોપાલ ને વળગી પડી. કહેવા લાગી, ‘ તમે અહીથી ગયા પછી, હું એકધારું રડતી રહી છુ, એક અઠવાડિયાથી નોકરીએ પણ નથી ગઈ.
‘તોં પછી તે મને ત્યારે વાત કેમ ના કરી?’ ગોપાલે પ્રશ્ન કર્યો.
‘પણ કયા મોઢે હું તમારી સામે પ્રેમની કબૂલાત કરું? હું આ જર્જરિત મકાનમાં રહેનારી વિધવા એની સામે તમે કરોડાધિપતિ, તેથી ચૂપ રહી’
ગોપાલે સીધો પિતાને ફોન જોડ્યો અને કહ્યું, તમે અહી આવવા નીકળો. અમે બંને લગ્ન માટે તૈયાર છીએ. ગોપાલના પિતાએ આવતાની સાથે રીતિકા પાસે એના માં-બાપનો ફોન નંબર માંગ્યો. ‘પણ તેઓ મને પોતાની પુત્રી માનતા જ નથી, તેઓ વાત પણ કરશે નહીં.’
‘કોઈ વાંધો નથી, હું પ્રયત્ન તોં કરી જોવું,’ એવું કહીને ગોપાલના પિતાએ રીતિકાના પિતાને ફોન જોડ્યો, પોતાનો પરિચય આપ્યો, કહ્યું, કે મારો પુત્ર તમારી પુત્રી સાથે લગ્ન કરવા ચાહે છે, એમાં તમારે પરિવાર સહિત આવવાનું છે.’
રીતિકાના કહેવા મુજબ જ એમને પહેલા તોં વાત કરવાનો ઈન્કાર કર્યો, પણ અહી એક કુશળ વ્યાપારી માણસ હતો, એમણે સમજાવ્યું , ‘ જુઓ સંતાનોની ખુશી એ જ માબાપનું સુખ છે. અમે કરોડાધિપતિ છીએ, અમારી રીતે તોં અમે કોઈ રાજકુમારીની અપેક્ષા રાખીએ, પણ સંતાનને જે ગમે એ જ અમારા માટે રાજકુમારી છે.’
બધુ જ સારું હતું તેથી અંત પણ સારો હતો. રીતિકાના પરિવારની હાજરીમાં ગોપાલ સાથે લગ્ન થયા. રીતિકાને લઈને ગોપાલ દિલ્હી પોતાના ઘરે આવી ગયો.
આજે આ વાતને છ વરસ થઈ ગયા, દરમિયાન બંનેને સંતાનોમાં એક દીકરો અને એક દીકરી છે. બંને સુખી અને સંતોષી જીવન જીવી રહ્યા છે.
સમાપ્ત.
जावेद अख्तर की वंशावली
जावेद अख़्तर की बंसावली 😁
बात मुगल काल की है, जब भारत के कुछ हिस्सों में शाहजहां का शासन चल रहा था।
उसी कालखंड में आगरा में एक मस्त सुंदरी हुआ करती थी, जो गजल शायरी और शायद मुजरा आदि किया करती थीं, नाम था बानो बेगम।
शाहजहां का कुपुत्र दराशिकोह उसके चेचिस पे फ़िदा था, जिद थी कि नही मुझे ये ही गाड़ी चलानी है।
अब शाहजहां परेशान कि मुगल सल्तनत का शहजादा एक छीनाल के चक्कर में, चमचे क्या कहेंगे?
तब उसने अपनी बेटी जहांआरा से कहा कि समझाओ इसको , कुछ रास्ता निकालो ताकि बदनामी से बचा जाय।
तब जहांआरा ने अपने लवर जगन्नाथ पंडित से कहा कि ये मामला तुम हैंडल करो, काम तुम्हारा रहेगा, नाम मेरा, पंडित ने कहा ओके डार्लिंग।
आगे पण्डित जी ने अपने विश्वासपात्र साथी त्रिलोचन महराज को ये काम सौप दिया, कंडीशन सेम, काम तुम्हारा, नाम मेरा।
त्रिलोचन भाई काम पर लग गए, जासूसी की डाटा एकत्रित किया, इसी दौरान त्रिलोचन जी की मुलाकात बनो बेगम के स्टॉफ दिलरूबा से हुई और दोनो में लव सब टाइप का हो गया ।
अब त्रिलोचन को भी गाड़ी चलाने की तिब्र इच्छा होने लगी लेकिन अपन लोगों के यहां तो ये कांसेप्ट नही है कि किसी भी गाड़ी को कोई भी चला ले, तो उनने सोचा कि इस्लाम में तो ये सुविधा उपलब्ध है कि एक ड्राइवर चार चार गाडियां चला सकता है, तो लोभ बस उसने इस्लाम अपना लिया एक छेदा के लिए, और अपना नाम त्रिलोचन से एजाज हक रख लिया।
ये सब प्यार मुहब्बत चल ही रहा था कि एक दिन शाहजहां की सुलग गई और उसने दराशिकोह को निपटा दिया।
फिर क्या था बाकि के सारे आशिक कन्नी काट लिए, जिन्हे जिधर मौका मिला निकल लिए।
इसी कड़ी में त्रिलोचन जो अब एजाज हक बन गया था अपने माल दिलरुबा को लेकर खैराबाद (अवध ) में बस गए।
गाडियां चलने लगी और इनका परिवार बड़ा होता गया ।
इनके नाती पोते हुए सारे अवध के नवाब के महफिल में चार चांद लगाते, कोई गाता कोई नाचता कोई बजाता।
इनमे से एजाज हक और दिलरूबा का एक पोता थोड़ा हाइलाइट हो गया और इसके सेवा से खुश होकर अवध के नवाब ने उसे इमाम बना दिया नाम था फजल ए ईमान।
इनका भी एक कुपुत्र था जिसका निकाह हो चुकी थी और बच्चे भी थे नाम था मौलाना फजल ए हक खैराबादी।
इसी बीच 1857 की क्रांति हुई, अंग्रेज बिलबिला गए जिसको तीसको पकड़ कर अंदर करने लगे, इसी क्रम में ये जनाब फजल ए हक खैराबादी भी पकड़े गए और इन्हे काला पानी की सजा हुई।
हालाकि कि इसने कुछ उखड़ा नहीं था, लेकिन माहौल ऐसा था कि इसने कुछ मजहबी तकरीरें लिख कर अपने बेगम को दी थी इंप्रेस करने हेतु, उसी में बंदा लपेटे में आ गया।
खैर ये अंडमान को 22 महीने भी नहीं झेल पाए और इसके लौवे लग गए।
इधर इसके बीबी बच्चे बेसहारा, कोई देखभाल करने वाला नही, दाने दाने को मोहताज, में ऐसे ग्वालियर के राजघराने यानी शिंधिया परिवार ने इन्हे सहायता दी, रोटी कपड़ा मकान मुहैया करवाई।
आगे चलकर फजल ए हक के पोते हुए इफ्तिकार हुसैन, जिसने नमक तो खाई हिंदु सिंधिया फैमिली की, लेकिन तलवे चाटे अंग्रेजों के और इनकी इस तलवे चाटने के कला से खुश होकर अंग्रेजों ने इसे एतबार उल मुल्क का खिताब भी दिया।
आगे इफ्तिकार हुसैन को भी एक पुत्र हुआ जिसका नाम जन्निसार अख्तर हुआ, वो भी अपने दादा की तरह ही हिंदु राजपरिवार सिंधिया परिवार के टुकड़ों पर ही पल बढ़ कर बड़ा हुआ और आगे चलकर, सिंधिया राजपरिवार और राजमाता के टुकड़ों पर पलते बड़े होते हुए ही इसे ( जाननिसार अख्तर ) को भी एक कुपुत्र की प्राप्ति हुई जिसे आज हम जावेद अख्तर के नाम से जानते हैं।
इस लेख में जावेद अख़्तर के पुरखो ने आजादी की क्या लड़ाई लड़ी, क्या कुर्बानी दी संक्षिप्त में लिखी हुई है, जिसकी बात ये अपने ट्वीट में कर रहा है, SS नीचे दे रहा हूं आप खुद ही आंकलन कर लीजिए।
