Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

#सुनो
दिल्ली अर्ध केंद्र शासित राज्य है जहाँ लगभग 80%पावर LG के पास थी। कोई भी फ़ाइल LG से अप्रूवल हुए बिना राजधानी में लागू नहीं हो सकती। वहाँ पे इन्होंने मलाई खाने के लिये कई मुद्दों पर LG को ही बाईपास कर दिया। मतलब LG के approval के बिना ही policy लागू कर दी।ऐसे राज्य में ये लुटेरे गैंग इतनी बड़ी लूट मार कर सकते हैँ। 2028 करोड़ का चुना अकेले शराब घोटाले में लगा दिया। अभी बाकी फ़ाइल खुलनी बाकी हैँ।
एक छोटा सा राज्य, LG का शासन,जहाँ मुख्य्मंत्री की औकात एक मेयर से ज़्यादा नहीं हो जहाँ देश की सारी एजेंसियों के हेड office हों। केंद्र सरकार, उसका पूरा मन्त्रीमंडल जहाँ बैठता हो वहाँ इन सबकी नाक के नीचे इन्होंने इतने बड़े बड़े घोटालों को अंजाम दे डाला। अब आप हिसाब लगाइये पंजाब सूबे का।
एक पूर्ण राज्य। लॉ न आर्डर आपके हाथ में। ड्रग का फलता फूलता कारोबार । ट्रांसफर पोस्टिंग आपके हाथ में,रेत माफिया आपके साथ ।जहाँ राज्य का हर निर्णय आप अपनी मर्जी से ले सकते हों।और जहाँ का मुख्यमंत्री है एक दारुबाज नकारा आदमी हो जिसे शाम को इतना होश ना हो कि आज की रात घर पर गुजरेगी या मयखाने में। उस प्रदेश का क्या हाल बनाया होगा इन लुटेरों ने? कितना खाया होगा और कितना विदेशों में जमा करवाया होगा चिकने चड्डा की आँखों के ऑपरेशन के बहाने। ख़ैर ये वक़्त ही बतायेगा जब 2027 में पंजाब की जनता अपना निर्णय सुनाएगी।
ख़ैर अभी फिलहाल तो दिल्ली की जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया है और कोर्ट की कार्यवाही अंडर प्रोसेस हैँ।।2027 आते आते कहीं आप साफ़ ना हो जाये।।
जय हिन्द
🚩✍️

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas, हिन्दू पतन

यदि इको सिस्टम मे सबसे ज्यादा कही सुधार हुआ है या यू कहे सुधार दिखा है तो वो बॉलीवुड है।

पिछले कुछ वर्षो मे ऐसी कई फिल्मे आकर गयी जिन्होंने कांग्रेस द्वारा प्रायोजित हिन्दू विरोध को किनारे करके सच्चाई दिखाई है। अब आवश्यक नहीं है कि हिन्दू को सहिष्णु दिखाने के लिये एक अच्छा मुस्लिम किरदार घुसाया जाए। जिसे सहिष्णु समझना है समझें वरना अपना रास्ता नापे।

इतिहास को ज्यादा गहराई मे नहीं लिखूंगा क्योंकि फ़िल्म देखने योग्य है और देखी ही जाना चाहिए। मुग़ल आधिपत्य के समय कई हिन्दू शक्तियां थी जिनके मन मे स्वतंत्रता की आग उठ रही थी। ज़ब शिवाजी ने औरंगजेब को आगरा के तख़्त पर बैठा देखा तो उनके मन मे यही स्वर गूंजा

“तू जिस तख्त पर बैठा है वो प्रभु श्री राम, धर्मराज युधिष्ठिर, चन्द्रगुप्त और पृथ्वीराज का है। उस नाते इसका उत्तराधिकार मेरे पास है, इसलिए औरंगजेब नीचे उतर।”

इसी भावना के साथ 1674 मे मराठा साम्राज्य की स्थापना की गयी, रघुवंश कालीन छत्रपति उपाधि पुनः जीवित की गयी। 1680 मे शिवाजी की मृत्यु हो गयी, तमाम आंतरिक षड्यंत्रो से जूझकर उनके बेटे संभाजी अगले छत्रपति बने।

छत्रपति के रूप मे संभाजी का डेब्यू इतना भयावह था कि औरंगजेब खुद आगरा से निकल पड़ा और यही औरंगजेब की जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई क्योंकि इसके बाद वो दोबारा कभी उत्तर भारत नहीं लौट सका।

संभाजी 1681 से 1689 तक औरंगजेब से लड़ते रहे, हर युद्ध मे जीते और अंत मे धोखे से पकडे गए। कई दिनों की यातना के बाद उन्हें मार दिया गया, ये यातनाये फ़िल्म मे पूरी तरह दिखाई गयी है।

संभाजी को इतनी बेरहमी से मारा गया था कि हिन्दुओ के पास सिर्फ दो विकल्प बचे थे, या तो डरकर हथियार रख देते या फिर मुगलो की कब्र खुदने तक लड़ते, महाराष्ट्र मे हिन्दुओ ने दूसरा विकल्प चुना और लड़ाई जारि रखी। संभाजी को मारकर भी औरंगजेब वापस नहीं लौट सका और 27 वर्ष दक्खन मे बर्बाद करके मर गया।

ये इतना समय था कि उत्तर मे मेवाड़ के जय सिंह, भरतपुर के चुड़ामन जाट और गुरु गोविन्द सिंह जी ने हिन्दुओ की एक नई फ़ौज खड़ी करके मुगलो का सिरदर्द बढ़ा दिया। 1707 मे औरंगजेब महाराष्ट्र मे ही मर गया, आगे चलकर मराठा साम्राज्य मे भी छत्रपति की जगह उनके पेशवा प्रधान बन गए।

हालांकि स्वराज की अवस्था अभी दूर थी और 1757 मे जब पेशवा ने दिल्ली से अब्दाली को खदेड़कर अपना गवर्नर बैठाया तब जाकर पूर्ण स्वराज का सपना साकार हुआ। हालांकि 1803 मे अंग्रेजो ने मराठा साम्राज्य के सेनापति दौलतराव सिंधिया को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया।

किताबो मे आज भी यही पढ़ाया जाता है कि मुगलो ने 1857 तक राज किया मगर ये नहीं पढ़ाया जाता कि 1757 से ही उनकी शक्ति शून्य थी और वे एक हिन्दू साम्राज्य के अधीन थे।

खैर मराठा साम्राज्य 144 वर्ष शासन मे रहा, संभाजी का कार्यकाल इसमें 5% ही है मगर ये साम्राज्य के फाउंडिंग फिगर मे से एक है। यदि वे नहीं होते तो हमारे आज की कल्पना नहीं हो सकती थी शायद इसीलिए ही इन्हे इतिहास मे स्थान नहीं मिला।

लेकिन बॉलीवुड की ये अच्छी पहल रही, जब सेक्युलरिज्म के आधार पर पाठ्यक्रम बनाये जा रहे थे तो बनाने वालो ने सोचा भी नहीं होगा कि सच डिजिटल गलियारों मे रास्ता बनाकर हिन्दुओ के सामने खड़ा हो जाएगा।

उसी सच को जानने के लिये यह फ़िल्म जरूर देखिये, जो देख चुके है वे पूर्ण रेटिंग दे। ये भी एक प्रकार का इनफार्मेशन वॉरफेयर ही है।

विशेषार्थ – ये फ़िल्म बंटेंगे तो कटेंगे की अगली कड़ी है, इस पर चर्चा करते समय जातियों के नाम का प्रयोग करने से बचे, पोस्ट मे मराठा शब्द साम्राज्य के लिये प्रयोग हुआ है, किसी जाति के लिये नहीं। हमें जातिवाद मे उलझें बिना सिर्फ हिन्दू एकता पर केंद्रित होना है।

✍️परख सक्सेना✍️
https://t.me/aryabhumi

Posted in हिन्दू पतन

અખિલેશ યાદવ


દિલ ધ્રૂજી જશે…..

અખિલેશ યાદવ ઉત્તર પ્રદેશના મુખ્યમંત્રી હતા.
ઉત્તર પ્રદેશમાં આતંકનો માહોલ હતો.

યુપીનો દરેક જિલ્લો જેહાદની પકડમાં હતો, ક્યારેક મુઝફ્ફરનગરમાં તો ક્યારેક સુલતાનપુરમાં રમખાણો થયા હતા.

કૈરાના, અલીગઢ અને દેવબંદના મુસ્લિમ પ્રભુત્વવાળા વિસ્તારોમાંથી હિંદુઓ સ્થળાંતર કરી રહ્યા હતા.

ઘરો પર “મકન વેચવાનું ” ના બોર્ડ હતા અને દરવાજા બંધ હતા.

તે સમયે મથુરામાં એક ભરત યાદવ એક લારી પર લસ્સી વેચીને તેના પરિવારનું ભરણપોષણ કરતો હતો…

ભરત યાદવ જીને એક નાની પુત્રી હતી, તેના માતા-પિતા, તેની પત્ની… યાદવજી લસ્સી વેચીને પોતાનું ગુજરાન ચલાવતા હતા…

એક મુસ્લિમ તેની દુકાને આવ્યો, લસ્સી પીધી અને રૂ આપ્યા વગર ચાલતી પકડી,ભરત યાદવે તેને અટકાવ્યા ત્યારે તેણે ત્યાં જ છરી કાઢી અને ભરત યાદવની હત્યા કરી.

અખિલેશ યાદવના જ્ઞાતિ સમુદાય એટલે કે યાદવ સમુદાયના એક યુવકની હત્યા કરવામાં આવી હતી, પરંતુ અખિલેશ યાદવ પોતે ન તો ભરત યાદવના પરિવારજનોને સાંત્વના આપવા ગયા હતા… ન તો તેમણે સરકારી તિજોરીમાંથી 1 રૂપિયાનું વળતર આપવાની જાહેરાત કરી હતી, ન તો તેમણે તેમના પક્ષના કોઈ નેતા કે મંત્રીને ભારતના ઘરે મોકલ્યા હતા.



કારણ કે અખિલેશ યાદવને લાગતું હતું કે હત્યારો મુસ્લિમ છે, તો જો તેઓ ભરત યાદવના ઘરે જશે તો મુસ્લિમ સમુદાય તેમનાથી નારાજ થશે.

ઘણા હિન્દુ સંગઠનોએ ક્રાઉડ ફંડિંગ દ્વારા ભરત યાદવના પરિવારને 51 લાખ રૂપિયાનો ચેક આપ્યો હતો…. રાત-દિવસ જાતિવાદનું ઝેર વાવનાર અખિલેશ યાદવને યાદવ યાદ નથી આવતા જ્યારે એક નિર્દોષ યાદવની જેહાદી દ્વારા હત્યા કરવામાં આવે છે.

આવી જ એક ઘટના તાજેતરમાં પ્રયાગરાજમાં જોવા મળી હતી જ્યારે નવમા ધોરણમાં ભણતા શૈલેષ યાદવની જેહાદીઓએ નિર્દયતાથી હત્યા કરી હતી.

શૈલેષના મૃત શરીરને પણ આ રાક્ષસોએ વિકૃત કરી નાખ્યું હતું.  અહીં જેહાદીઓએ એવી ભૂલ કરી હતી કે તેઓ ભૂલી ગયા હતા કે ઉત્તર પ્રદેશમાં હવે યોગીની સરકાર છે.  બુલડોઝર ગર્જ્યા …

પરંતુ સવાલ એ છે કે સંભલમાં પથ્થરબાજોને 5-5 લાખ રૂપિયા વહેંચનાર અખિલેશ યાદવે શૈલેષ યાદવના પરિવારને એક પૈસો પણ નથી આપ્યો…

આખરે કેમ..?


સુલતાનપુરમાં બંદૂકની અણીએ જ્વેલરી શોપ લૂંટનાર ડાકુ મંગેશ યાદવના એન્કાઉન્ટર બાદ અખિલેશ યાદવ કેવી રીતે રડી પડ્યા હતા.

જ્યારે કોઈ ગુનેગારની હત્યા થાય છે ત્યારે જાતિ પ્રેમ જાગે છે, પરંતુ અખિલેશ યાદવ જ્યારે કોઈ નિર્દોષની હત્યા થાય છે ત્યારે વોટ બેંકની નારાજગી સ્વીકારતા નથી.

અખિલેશ યાદવ જી,શું ભરત યાદવ કે શૈલેષ યાદવ તમારી જાતિના નથી.

એક નહીં…
ભરત યાદવ અને શૈલેષ યાદવ જેવા હજારો યાદવોની કહાની છે,
મુખ્તાર અંસારીના મૃત્યુથી શ્રી અખિલેશ યાદવને વધુ દુ:ખ થયું હતું .

અતીક અહેમદ અને અશરફની હત્યાથી અખિલેશ યાદવ લગભગ સમાન રીતે દુખી હતા.

અખિલેશ યાદવના હૃદયમાં જેહાદીઓ, આતંકવાદીઓ, ડાકુઓ, માફિયાઓ અને ગુનેગારો વસે છે.

તેમના માટે અખિલેશ યાદવ જી સંસદમાં પણ રડતા.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ध्यान,धारणा, समाधि



एक फकीर एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे । वो रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काट कर ले जाते देखते थे। एक दिन उन्होंने लकड़हारे से कहा कि सुन भाई, दिन-भर लकड़ी काटता है, दो वक्त की रोटी भी नहीं जुट पाती । तू जरा आगे क्यों नहीं जाता, वहां आगे चंदन का जंगल है । एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा ।

गरीब लकड़हारे को विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कोई नहीं जानता ! जंगल में लकड़ियां काटते-काटते ही तो जिंदगी बीती । मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो ! एक बार प्रयोग करके देख लेना चाहिए ।

फकीर के बातों पर विश्वास कर वह आगे गया । लौटा तो फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है । मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी ।  हम यही जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या ! मैं भी कैसा अभागा ! काश, पहले पता चल जाता ! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है । जब जागा तभी सबेरा ।

लकड़हारे के दिन अब बड़े मजे में कटने लगे । एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती।

एक दिन फकीर ने कहा ; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी । जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए ; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है ? उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है ?

उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है । लकड़ियाँ काटना छोड़ो । एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया । अब तो वह फकीर पर भरोसा करने लगा था । बिना संदेह किये भागा । चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या ! चांदी ही चांदी !

चार-छ: महीने नदारद हो जाता । एक दिन जाता, फिर नदारद हो जाता ।

फकीर ने उसे फिर एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझे ही तुम्हें जगाना पड़ेगा । आगे सोने की खदान है मूर्ख ! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं ? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत ही फुर्सत। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता ?

उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा ? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था ।

फकीर ने कहा, थोड़ा और आगे सोने की खदान है। फिर और आगे हीरों की खदान

और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया ? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी हो गया था, महल भी खड़े कर लिए थे । उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन मत करो । अब मेरे पास सब कुछ है।

उस फकीर ने कहा, क्या तुम खुश रहतो हो। थोड़ी देर चुप चाप खड़ा रहा और फिर फुट फुट कर रोने लगा।

फ़क़ीर ने कहा कि तुम्हे पता है कि यह आदमी मस्त यहां क्यों बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा ! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा ?

वह आदमी रोने लगा । फ़कीर के चरणों में सिर पटक दिया और कहा कि मेरे पास सब कुछ है पर मन कि शांति, परिवार का सुख और ख़ुशी नाम की चीज मेरे जीवन से कोसो दूर जा चुकी हैं। ।

फकीर ने कहा :  अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं । अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे आगे है ।

यही मैं तुमसे कहता हूं ,, उस समय तक मत रुकना जब तक कि भीतर चल रहे उपद्रव शांत न हो जाएं फिर अनुभव होगा परम पिता परमात्मा के निकट होने का अनुभव।

एक सन्नाटा, एक शून्य । और उस शून्य में जलता है बोध का दीया। वही परम है । वही परम-दशा है, वही समाधि है ।

*वही सच्चा सुख है।*



*आप चाहे किसी भी समाज से हो, अगर आप अपने समाज के किसी उभरते हुए व्यक्तित्व से जलते हो या उसकी निंदा करते हो तो आप निश्चित रूप से उस समाज के लिए कलंक हो ।*


Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ઉદાસી …ખુશી.. ( વાત એક નાનકડી )
આલોક ઉદાસ બનીને આ હોટેલમાં બેઠો હતો. આજે તેની પત્નીની પ્રથમ પુણ્યતિથિ હતી. તેની પત્ની આશકાની આ પ્રિય જગ્યા હતી. અવારનવાર બંને અહીં કોફી પીવા આવતા અને કલાકો ગાળતા.આ હોટેલ તેમની અનેક સુંદર સાંજની સાક્ષી હતી. પણ આજે…નિતાંત એકલતા તેને ઘેરી વળી. કોફી તો આવી ગઇ હતી. પરંતુ પીવાનું મન ન થયું. સાથે પીનાર કયાં ? કેન્સરે તેની પ્રિય વ્યક્તિને છીનવી લીધી હતી. તેના પ્રાણમાં એક ઉદાસી છવાઇ રહી.
અચાનક આલોકનું ધ્યાન હોટેલના એક ખૂણામાં..કોઇની નજર ન જાય તે રીતે બેસેલ એક યુવતી પર પડી. તેની આંખોમાં પણ તેને ઉદાસીની એક ઝલક નજરે પડી. પરંતુ કદાચ આ તો પોતાના જ મનનું પ્રતિબિંબ…! પોતાની ઉદાસ દ્રષ્ટિને બધે ઉદાસી જ દેખાય છે. છતાં ન જાણે કેમ પણ તેણે તે યુવતીનું નિરીક્ષણ ચાલુ રાખ્યું. ના, ના, આ પોતાની ઉદાસીનું પ્રતિબિંબ નથી જ. ખરેખર તેની આંખોમાં..ચહેરા પર છવાયેલી ઉદાસી..અસ્વસ્થતા તે જોઇ શકતો હતો..કોઇની નજર તેના પર ન પડે તે રીતે તે ચહેરો પાછળ ફેરવી બેઠી હતી. આ તો પોતે એ રીતે બેઠો હતો તેથી તેને જોઇ શકતો હતો.
આલોકે તેના ચહેરાના ભાવ વાંચવાનો પ્રયત્ન કર્યો. ના…ના…કોઇ વાત જરૂર છે જે તેને અસ્વસ્થ બનાવે છે. યુવતીએ માથા પર સુંદર સ્કાર્ફ વીંટેલ હતો. તેનો લંબગોળ ચહેરો,પાણીદાર આંખો, કપાળ પર નાનકડી કાળી બિન્દી, બધું મળીને એક સુંદર વ્યક્તિત્વનો એહસાસ થતો હતો. આ ઉદાસી કયા કારણે ? તેને જાણવાની જિજ્ઞાસા થઇ. પણ એમ અજાણી વ્યક્તિને પૂછાય કેમ ? અને તે પણ સુંદર યુવતીને ? લાફો જ ખાવો પડેને ?
જે હોય તે મારે શું ? એમ વિચારી તેણે અભાનપણે હાથમાં કોફીનો કપ ઉપાડયો. આશકાની ઝિલમિલ આંખોનું પ્રતિબિંબ કોફીમાં ઉપસતું હતું કે શું ?
અચાનક હવાની એક લહેરખી આવી. યુવતીના માથા પરનો સ્કાર્ફ ફરફર્યો. યુવતી જાણે બેબાકળી બની ગઇ. તેણે જોશથી સ્કાર્ફ પકડી રાખ્યો..કોઇ જોઇ તો નથી ગયું ને ? તેની નજર ચારે તરફ ફરી રહી. શું હતું એ નજરમાં ?
આલોકે પોતાના ચહેરા આડે છાપુ ધર્યું. પણ જે જોવાનું હતું તે તો એક ક્ષણમાં જોવાઇ ગયું હતું.
યુવતીના માથા પર વાળ નહોતા..ફકત વાળના અવષેશ જ બચ્યા હતા..નાના નાના વાળ ઊગવાની શરૂઆત થઇ હતી. આશકા પણ આમ જ…કીમોથેરાપી કરાવ્યા બાદ આમ જ સ્ક્રાફ બાંધી રાખતી…! આમ જ વિહવળ રહેતી..કોઇ તેને જોઇ જાય આ રીતે તે તેને જરાયે પસંદ નહોતું પડતું. અહીં કોફી પીવા આવતી ત્યારે આમ જ માથા ઉપર સ્કાર્ફ બાંધી રાખતી અને કોઇ જોઇ ન જાય માતે સતત સચેત કે સાવધાન રહેતી. પોતે ઘણી વખત આશકાને સમજાવતો..
’એમા શરમાવા જેવું શું છે ? શા માટે એવો કોઇ ડર રાખે છે ? તું તારે બિન્દાસ રહે ને…હું છું ને તારી સાથે ? ‘
પણ આશકા એ પરિસ્થિતિ કયારેય મનથી સ્વીકારી શકી નહોતી. રોજ સવારે ઉઠીને પહેલું કામ અરીસામાં જોવાનું કરતી..હવે કેટલા વાળ આવ્યા ? ઇચ્છા મુજબનો ગ્રોથ ન દેખાતા તેની વિશાળ આંખોમાં આમ જ ઉદાસી છવાઇ જતી. અને વાળ પૂરા ઊગે તે પહેલાં તો…..
આજે આ અજાણ યુવતીની આંખોમાં પણ એ જ ભાવ..એ જ વિહવળતા હતા. તેને આશકા યાદ આવી ગઇ. તેની આંખો ભીની બની.
અચાનક આલોકે એક કાગળ લીધો..પેન ઉપાડી અને..
’ તમે ખૂબ સુંદર છૉ..તમારી આંખો ખૂબ સુંદર છે. તમારું વ્યક્તિત્વ એટલું સુંદર છે કે કોઇ કમી તેને સ્પર્શી શકશે નહીં. આ દુનિયા ખૂબ સુન્દર છે..માણવા લાયક છે અને જીવન અણમોલ છે. તેને ઉદાસીની ગર્તામાં ધકેલવાની ભૂલ ન કરશો.. જે ક્ષણો ઇશ્વરે આપી છે તેને સંપૂર્ણપણે સ્વીકારો. તેનાથી ભાગવાને બદલે સામનો કરો. તમારી આંખોમાં મારી આશકાની વિહવળતા મને દેખાય છે. મારી આશકા પરિસ્થિતિનો સ્વીકાર ન કરી શકી..અને મને છોડીને હમેશ માટે…….’
લખીને આલોકે વેઇટરને બોલાવ્યો. કાગળ આપીને કોને આપવાનો છે એ સમજાવ્યું. પછી તે દૂર ચાલ્યો ગયો. થોડીવાર પછી તેણે દૂરથી યુવતી તરફ નજર નાખી. યુવતીએ કાગળ વાંચ્યો..આસપાસ નજર ફેરવી.. બે પાંચ મિનિટ મૌન બેસી રહી. મનમાં કોઇ વિચારો….કોઇ ગડમથલ ચાલતી હતી કે શું ?
તેની ઉદાસ આંખોમાં એક ચમક ઉપસી આવી. તે ધીમેથી ઊભી થઇ.. તે ખૂણાની જગ્યા છોડીને વચ્ચે આવીને બેઠી. અહીંથી હવે તે બધાને જોઇ શકતી હતી. અને બધા તેને જોઇ શકે તેમ હતા. તેણે માથા પરથી સ્કાર્ફ કાઢી નાખ્યો. તેની આંખોમાંથી પેલી વિહવળતા અદ્ર્શ્ય થઇ ગઇ હતી.
દૂરથી તેને જોઈ રહેલા આલોકની ઉદાસી અદ્રશ્ય થઇ ગઇ. તે ધીમેથી વ્હીસલ વગાડતો હોટેલની બહાર નીકળી ગયો.
નીલમ દોશી

Posted in જાણવા જેવું

कुतुब मीनार मुगलों में बनाया था,
ये नाम भी उनके ही बाप दादाओं के लिखे हैं…..

#गुप्त सम्राट चंदगुप्त विक्रमादित्य द्वारा स्थापित महरौली का लौह स्तंभ 
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विष्णु स्तम्भ (कुतुब मीनार टॉवर) के पास, शुद्ध लोहे से बना यह लौह स्तंभ है।
इसमें 99.72% लोहा, शेष 0.28% अशुद्धियाँ हैं।
यह स्तंभ महान गुप्त सम्राट चंदगुप्त विक्रमादित्य दितीय ने अपनी शकों पर विजय के उपलक्ष्य में स्थापित किया था।
इस लौह स्तंभ में आज 1600 वर्ष बीत जाने के बाद भी जंग नहीं लगी है यह लौह स्तंभ गुप्तकाल में हुए वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रगति का घोतक है।

इस कोलोसस का वजन 6.8 टन है।
निचला व्यास 41.6 सेमी है, शीर्ष पर यह 30 सेमी तक बढ़ता है। स्तंभ की ऊंचाई 7.5 मीटर है।

आश्चर्यजनक बात यह है कि वर्तमान में धातु विज्ञान में शुद्ध लोहे का निर्माण एक बहुत ही जटिल विधि और कम मात्रा में होता है, लेकिन लोहा इतनी शुद्धता का होना आज के युग में असम्भव है।

इस लौह स्तंभ में जंग क्यों नहीं लगता इसका कारण जानने के लिए IIT कानपुर के प्रोफेसर ने 1998 में एक प्रयोग किया,
IIT के प्रोफेसर डॉ. बालासुब्रमण्यम ने स्तम्भ के लोहे की मटेरियल एनालिसिस की,
इस विश्लेषण में पता चला कि स्तम्भ के लोहे को बनाते समय पिघले हुए कच्चा लोहा (Pig iron) में फ़ास्फ़रोस तत्व (Phosphorous) मिलाया गया था,
इससे आयरन के अणु बांड नहीं बन पाए,
जिसकी वजह से जंग लगने की गति हजारों गुना धीमी हो गयी I

आश्चर्य की बात यह है कि हमारे पूर्वजों को फ़ास्फ़रोस के जंगरोधी गुण के बारे में कैसे पता चला,
फ़ास्फ़रोस के जंग रोधी गुणों का पता तो आधुनिक काल में चला है,
दुनिया भर में यह माना जाता है कि फ़ास्फ़रोस की खोज सन 1669 में हेन्निंग ब्रांड ने की,
मगर यह स्तंभ तो 1600 वर्ष से अधिक पुराना है I

मतलब यही हुआ कि पुरातन काल में भारत में धातु-विज्ञान (Metallurgy) का ज्ञान उच्चकोटि का था,
सिर्फ दिल्ली ही नहीं धार, मांडू, माउंट आबू, कोदाचादरी पहाड़ी पर पाए गये लौह स्तम्भ, पुरानी तोपों में भी यह जंग-प्रतिरोधक (Anti-rust) क्षमता पाई गयी है,

दिल्ली का यह लौह स्तम्भ (Iron Pillar)हमारे लिए गौरव का प्रतीक है और हमारे महान इतिहास का प्रत्यक्ष प्रमाण है I

इस अद्भुत स्तंभ की तकनीकी को आधुनिक युग में प्राप्त करना असंभव है।

#VinitHindu

Posted in हिन्दू पतन

प्रिय संजय लीला भंसाली जी
आप हीरा मंडी पर फ़िलम बनाये थे* सर- उस से बढ़िया टॉपिक है मेरे पास। बहुत मसाला है एक वेब सीरीज के लिए।

मुग़ल शहज़ादियाँ
आपकी सहूलियत के लिए सैंपल एपिसोड की कहानी भी दे रहा हूँ।

१- रोजबॉडी
बाबर की लड़की गुलबदन बेगम की कहानी जो मुग़ल ज़माने की रोमिला थापर थी। गप्पी खूसट बुढ़िया- अकबर की बुआ। नाम से ही पता लगता है सरल सलिल मैगज़ीन की किसी थर्ड ग्रेड कहानी की नायिका होगी। इसका रोल किसी बुझी हुई डोकरी से करवाना- जया बच्चन सही रहेगी।

२- आराम बानो बेगम
अकबर की बेटी- दौलत शाद से पैदा हुई।  जहांगीर की ऐसी बहन जिसे जहांगीर ने कभी हरम से बाहर ना जाने दिया। इस शहज़ादी ने ताउम्र केवल आराम फ़रमाया। सोनाक्षी सिन्हा परफ़ेक्ट रहेगी आराम करके फैली हुई शहज़ादी।

३- जहाँनारा बेगम
शाहजहाँ की बेटी और शाहजहाँ की बादशाह बेगम। शाहजहाँ के लगाये पेड़ का फल जिसे शाहजहाँ ने ख़ुद चखा। मुमताज़ और जहाँनारा के डबल रोल में स्वरा भास्कर ठीक रहेगी। क्या है- बाद में औरंगज़ेब ने भी इसकु अपनी बादशाह बेगम बनाया। टी

४- रोशन आरा बेगम
एक साथ ग्यारह आदमियों के साथ चट्टे बट्टे खेलती पकड़ी गई शहज़ादी जिसे बढ़िया शराब बढ़िया कबाब और बढ़िया आदमी का शौक़ था। ताउम्र कुँवारी रहने के लिए मजबूर कर डाला इसे भी औरंगज़ेब ने । इसे किरदार के लिए हुमा क़ुरैशी को नोष फ़रमाए जनाब।

५- ज़ेबुनिस्सा बेगम
औरंगज़ेब की बदकिस्मत बेटी जो शायर थी और केवल एक बोसा के कारण निकाह ना कर पाई। इस रोल के लिए कोई फ्रेश फेस ढूँढ लेना । ये मुग़लिया रिपोर्टर की पर्सनल फ़ेवरिट है।

५- हज़रत बेगम
रंगीला की वो बेटी जिसे अब्दाली उठा कर ले गया- बेचारी सोलह बरस की शहज़ादी जिसे अफ़ग़ानियों ने ना बख्शा। श्रद्धा कपूर परफ़ेक्ट फिट रहेगी।

इस वेबसेरीज़ में मसाला है, से** है, साज़िश है- बॉलीवुड के प्रिय नरभोगी वाले बादशाह है- बड़े महल है , डिज़ाइनर ड्रेस है। सब कुछ है जो तुम लोग किसी भी फ़िल्म में दिखाते हो। वेरफ़ाईड इतिहास है जनाब।

भंसाली जी- कहाँ मनगाढत कहानियों पर पैसा बेकार कर रहे हो। इस पर बनाओ। दस मुग़ल शहज़ादियाँ रेडी है जो हीरा मंडी को टोटल फेल कर देंगी।

थोक में कहानियों के रेट लगा देंगे। रस्ते का माल सस्ते में।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पैठण में एकनाथ महाराज के स्थान से गोदावरीजी को जाने वाले रास्ते में एक जगह एक धर्मशाला-सी है।वहाँ एक यवन रहा करता था। वह उस रास्ते से आने-जाने वाले हिन्दुओं को बहुत तंग किया करता था। एकनाथ महाराज जब स्नान करके लौटें तब वह इनके ऊपर पिचकारी छोड़े। इससे महाराज को किसी-किसी दिन चार-चार पाँच-पाँच बार स्नान करना पड़े। जहाँ वह स्नान करके लौटने लगे कि यह उन्मत्त मनुष्य फिर उन पर थूके और महाराज फिर गंगा-स्नान करने जायँ। इस बदमाशी से कोई भी आदमी चिढ़ जाता।

चिढ़ना भी बिलकुल स्वाभाविक था, पर एकनाथ महाराज की शान्ति ऐसी विलक्षण थी कि बार-बार एकनाथ महाराज ‘मातर्गंगे !’ कहकर वन्दन करके आनन्द से स्नान करें और धन्यवाद दें उस यवन को यह कहकर कि इसकी कृपा से मेरे इतनी बार स्नान हो जाते हैं। एक दिन तो यह बात हुई कि वह यवन उस मौके पर नहीं था, पर नाथ उसका नियम भंग न हो इस खयाल से कुछ काल तक उसकी राह देखते हुए वहाँ ठहर गये। कुछ काल प्रतीक्षा करके उसके आने का कोई लक्षण नहीं देखा तब आगे बढ़े।

एक बार वह यवन अत्यन्त उन्मत्त होकर महाराज के बार-बार स्नान करके लौटने पर उनकी देह पर बार-बार थूकता ही रहा। वह थूकता जाय और महाराज स्नान करते जायँ, इस तरह कहते हैं कि एक सौ आठ बार हुआ। तथापि महाराज की शान्ति भंग नहीं हुई। उन्मत्त क्रोध और शान्त सहिष्णुता का यह द्वन्द्व देखने के लिये हजारों लोग वहाँ जुटे थे। अन्त को यवन थक गया। लज्जित हुआ। महाराज के चरणों पर लोट गया। यवन ने महाराज के महात्मापन की बड़ी स्तुति की। इतने पर भी वह अपनी मसजिद पर अपने चार बार नमाज पढ़ने की तारीफ करने से बाज न आया। तब महाराज ने हँसकर कहा-

मसजिदमें ही जो अल्लाह खड़ा। तो और स्थान क्या खाली पड़ा ? ॥
चारों वक्त नमाजों के । तो क्या और वक्त हैं चोरों के ? ॥
एका जनार्दन का बंदा । जमीन आसमान भरा खुदा ॥

तात्पर्य – अल्लाह यानी परमात्मा किसी एक जगह में ही बँधा नहीं, वह सब जगह मौजूद है। सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी है। सबका है, सबके हृदय में है और उसकी यथार्थ स्तुति यही हो सकती है कि मनुष्य उसका अखण्ड स्मरण करे, सब कुछ वही करता है, यह जाने और निरहंकार होकर रहे। यवन ने पहचाना कि एकनाथ महाराज बड़े औलिया हैं और तबसे वह उनके साथ बड़े विनय और नम्रता से पेश आने लगा..!!