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वीर शिवाजी


*क्या आपको ज्ञात है कि हमारे वीर क्रांतिकारी अमर शहीद योद्धा धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज की मृत्यु का बदला किसने और कैसे लिया था …..

*आपको बता दें कि, छत्रपति संभाजी महाराज की हत्या के बाद औरंगजेब के सेनापति जुल्फिकार खान ने रायगढ़ पर कब्जा कर छत्रपति संभाजी की पत्नी येसु बाई और उनके पुत्र को भी कैद कर लिया जिसके बाद छत्रपति संभाजी महाराज के छोटे भाई  राजाराम जी महाराज छत्रपति के पद पर विभूषित हुए ।*

*अवगत करा दें कि, हमारे छत्रपति संभाजी महाराज को औरंगजेब ने 40 दिनों तक भयंकर यातनाएं देकर मारा था । इस हाहाकारी मृत्यु ने मराठों के सीनों में आग लगा दी, उनके सारे मतभेद खत्म हो गए और सिर्फ एक ही लक्ष्य रह गया राक्षस औरंगजेब का सर्वनाश ।*

*दरहसल संगमेश्वर के किले में जब शूरवीर छत्रपति संभाजी अपने 200 साथियों के साथ औरंगजेब के सिपहसालार मुकर्रम खान के 10 हजार मुगल सिपाहियों के साथ जंग लड़ रहे थे, उस वक्त छत्रपति संभाजी के साथ एक और बहादुर योद्धा अपनी जान की बाजी लगा रहा था जिसका नाम था… माल्होजी घोरपड़े।*

*छत्रपति संभाजी के साथ लड़ते हुए माल्होजी घोरपड़े भी वीरगति को प्राप्त हो गए और माल्होजी घोरपड़े के पुत्र संताजी घोरपड़े ने ही अपने युद्ध अभियानों से औरंगजेब की नाक काट डाली और औरंगजेब को इतिहास में भगोड़ा भी साबित कर दिया ।*

*संताजी घोरपड़े के साथ एक और वीर मराठा ने दिया जिसका नाम था धना जी जाधव । औरंगजेब को यकीन था कि छत्रपति संभाजी की हत्या के बाद मराठों का मनोबल टूट जाएगा लेकिन वो उस वक्त हैरान हो गया जब तुलापुर में अचानक संताजी और धनाजी ने हमला कर दिया । औरंगजेब लाखों की सेना के साथ महाराष्ट्र के तुलापुर नाम की जगह पर अपना
डेरा डाले बैठा हुआ था । यह वही जगह थी जहां पर औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज की क्रूरता से हत्या की थी । गुरिल्ला युद्ध में पारंगत संताजी  2000 मराठा सैनिकों के साथ औरंगजेब की सेना पर खूंखार शेर की तरह टूट पड़े । संताजी ने अपने साथियों के साथ गाजर मूली की तरह मुगलों को काटना शुरू कर दिया । इस युद्ध का वर्णन करते हुए मुगलिया इतिहासकार काफी खान लिखता है कि तुलापुर की जंग के बाद संताजी की दहशत मुगलिया सैनिकों के दिलों में घर कर गई थी । संताजी के सामने पड़ने वाला मुगलिया सैनिक या तो मार दिया जाता या कैद हो जाता । आखिर में हालत ये हो गए कि संताजी का नाम सुनते ही मुगल सेना में भगदड़ मच जाती थी ।*

*तुलापुर में संताजी के मराठों के अचानक हमले से मुगल जोर-जोर से चिल्लाने लगे हुजूर मराठे आ गए । एक तरफ पूरी मुगल सेना औरंगजेब की जान बचाने की कोशिश में लगी हुई थी तो दूसरी तरफ मराठे मुगलियों लाशों के ढेर लगा रहे थे । मराठे मुगल छावनी के अंदर घुस गए । इतना कत्लेआम हुआ कि औरंगजेब अपनी जान बचाकर भागा । औरंगजेब की जान बच गई लेकिन पूरे मुगल साम्राज्य की नाक कट गई और औरंगजेब पर भगोड़े का ठप्पा लग गया । मराठे औरंगजेब के कैंप के ऊपर लगे दो सोने के कलश काटकर सिंहगढ़ किले को लौट आए । अगले दिन जब सुबह हुई तो औरंगजेब मुगलों की मौत का मंजर देखकर हैरान रह गया और कहने लगा या अल्लाह किस मिट्टी के बने हैं ये मराठे यह ना थकते हैं ना झुकते हैं ना पीछे हटते हैं इन्हें मिटाते मिटाते कहीं हम ना मिट जाएं औरंगजेब इस दुख भरे हादसे से पूरी उम्र बाहर ही नहीं आ पाया था ।*

*इस घटना के दो दिन बाद ही संता जी ने रायगढ़ किले पर हमला बोल दिया ।*

छत्रपति संभाजी की पत्नी येसुबाई को कैद करने वाले मुगल सरदार जुल्फिकार खान ने यहां पहले ही घेरा बनाया हुआ था । मराठों ने जुल्फिकार खान की सेना को काटकर रायगढ़ किले पर भी कत्लेआम मचा दिया और मुगलों का बेश कीमती खजाना घोड़े और पांच हाथी अपने साथ पकड़कर पन्हाला लेकर आए ।

*इस तरह कई गोरिल्ला युद्धों ने मुगल सेना का मनोबल तोड़ कर रख दिया ।*

*मराठों को जब भी मौका मिलता वो मुगल सेना को चीर के रख देते । अब बारी मुकर्रम खान की थी ।  जिसने छत्रपति संभाजी महाराज को छल और धोखे से कैद किया था उस। 50 हजार रुपए ईनाम देते हुए, मुकर्रम खान को औरंगजेब ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर और कोकण प्रांत का सूबेदार नियुक्त किया था ।  मराठों ने यह प्रण लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए पर उस मुकर्रम खान को जिंदा नहीं छोड़ना है और दिसंबर सन 1689 को मराठों ने मुकर्रम  खान की विशाल सेना को घेरकर मुगलों को भिंडी की तरह तोड़ना शुरू कर दिया । इस घनघोर युद्ध में अब संताजी घोरपड़े ने मुकर्रम खान को दौड़ा दौड़ा कर मारा ।*

*खून से लथपथ पड़े मुकर्रम खान की ये दुर्दशा देखकर मुगल सेना उसे जंगलों में लेकर भाग गई पर मराठों के दिए घावों ने जंगल में तड़पा तड़पा कर मुकर्रम खान की जान ले ली । मुकर्रम खान को मारकर मराठों ने छत्रपति संभाजी महाराज के मृत्यु का बदला लिया ।*

*संताजी घोरपड़े के साहस और शौर्य पर खुश होकर सन 1691 को छत्रपति राजाराम महाराज ने उन्हें मराठा साम्राज्य का सरसेनापति घोषित किया । सर सेनापति बनते ही संताजी ने अपना पहला निशाना मुगल सल्तनत को बनाया और अपने साथ 15 से 20 हज का मराठा लश्कर लेकर औरंगजेब की मुगल सल्तनत में भयंकर तबाही मचा दी । कृष्णा नदी पार कर्नाटक जैसे एक के बाद एक मुगल इलाकों में मराठा साम्राज्य
के जीत का डंका बजाया ।*

*औरंगजेब मराठों के डर से सह्याद्री के पर्वतों में इधर से उधर भागता । लगातार 27 साल मराठों ने औरंगजेब को इतना घुमाया इतना दौड़ाया कि उसका जीना मुश्किल हो गया अंत में मराठों के हाथों हो रही लगातार मुगलों की पराजय के दुख में वह नीच औरंगजेब तड़प तड़प कर महाराष्ट्र में ही मर गया । औरंगजेब की मौत की कहानी एक और लेख में बताऊंगा ।*

*हर हर महादेव🔱 जय श्री महाकाल🚩*

*जय भवानी🏹 जय श्री राम🚩*

*जय जय हिंदू राष्ट्रएम🇮🇳🚩*

*आप सभी मित्रों से विनम्र निवेदन है कि हर हिंदू तक इस महत्व पूर्ण लेख को अवश्य शेयर करे*

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बुरे कर्म का बुरा नतीजा



एक गरीब किसान के पास एक छोटा सा खेत और एक बैल था। बड़ी मेहनत से उसने कुछ पैसे जमा किये और एक बैल और खरीदा। जब वो बैल खरीद कर ला रहा था तो रास्ते में उसे चार युवक मिले। उन युवकों ने किसान से कहा क्या तुम इस बैल को बेचोगे। किसान ने सोचा मैंने यह बैल 1500 रुपए में खरीदा है। यदि इससे अधिक पैसे मिलते हैं तो मैं इसे बेच दूंगा और इससे बेहतर बैल खरीद लूंगा।

उस किसान ने उन लड़कों को बैल की कीमत 2000 रुपए बताई। लड़के बोले कीमत तो ज्यादा है क्यों न किसी समझदार व्यक्ति को पंच बनाकर फैसला करा लें। आप और हम यह वचन लेंगे की जो भी कीमत पंच कहेंगे वो हम मान लेंगे। कुछ सोच कर किसान ने बैल बेचने का वचन दे दिया। थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध व्यक्ति गुजरे। सभी न उन्हें ही पंच बनाने का फैसला किया। किसान ने भी सहमति दे दी। वास्तव में वह चारों लड़के एक ठग पिता की संतान थे और वो वृद्ध कोई और नहीं बल्कि उन चरों का पिता ही था। उन्होंने पिता को ही पंच बना लिया।

पिता ने बैल की कीमत मात्र 500 रुपए तय की। वचन में बंधे किसाओं को 500 रूपये में बैल बेचना पड़ा। लेकिन वो इस बात को समझ गया कि मुझे ठगा जा रहा है। अगले दिन किसान एक सुंदर महिला के भेष में उन चारों भाइयों से मिला और उनमे से किसी एक के साथ शादी करने की इच्छा व्यक्त की। चारों तैयार हो गए और एक दूसरे से बहस करने लगे की मैं शादी करूँगा – मैं शादी करूँगा। नारी के भेष में किसान बोला जो मेरे लिए बनारसी साड़ी, मथुरा के पेड़े और सहारनपुर के आम सबसे पहले लाएगा मैं उसी के साथ शादी करूंगी। यह सुन चारों शहर की ओर दौड़े। उनके जाने के बाद किसान ने उस ठग पिता को बहुत पीटा और वहां से चला गया। जब ठक के चारों बेटे वापस आये और अपने पिता को इस स्थिति में देखा तो मन कसौटते रह गए वो कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि किसान का पता तो वह जानते ही नहीं थे।

अगले दिन वह किसान एक वैध का भेष बनाकर उस वृद्ध ठग का इलाज करने पंहुचा। और लड़कों को चार जड़ी बूटी लाने के लिए अलग अलग भेजा। लड़कों के जाने के बाद उस किसान ने उस वृद्ध को फिर पीटा और अपना बैल लेकर चला गया। जब चारों भाई लोटे तो पिता और और बद्तर अवस्ता में पाया। अब उन्होंने प्रण ले लिए की कभी किसी के साथ ठगी नहीं करेंगे। इस तरह एक मामूली किसान ने अपनी समझदारी से ठगों को सुधर दिया।

कहानी की शिक्षा:

बुरे कर्म करने पर हमेशा बुरा ही परिणाम मिलता है।

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चूहे से व्यापार
एक व्यक्ति जिसका नाम शम्भू था, बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता था पर उसके पास पैसे नहीं थे। वो अक्सर व्यापारियों को देखता और उन जैसा बनने की कल्पना करता। एक दिन उसने दो व्यापारियों की बात सुनी। एक व्यापारी दूसरे व्यापारी से कह रहा था, “व्यापर करने के लिए पैसे नहीं बल्कि लगन और चतुराई की जरूरत होती है। कोई चाहे तो वह जो कूड़े पर मरा चूहा पड़ा है, उससे भी व्यापार शुरू कर सकता है।”

शम्भू ने कूड़े पर पड़े चूहे को देखा और सोचा लगन और चतुराई तो है मुझमें हैं। क्यों न मैं इस मरे चूहे से ही व्यापार शरू करूँ। यह सोच उसने मरा हुआ चूहा उठा। तभी एक सेठ जी अपनी बिल्ली को गोद में लिए उधर से गुजर रहे थे। शम्भू के दिमाग में एक तरकीब आई । वह चूहा उठाए उस सेठ के आगे-आगे चलने लगा । सेठ जी की बिल्ली चूहे को देखकर उतावली हो गई व म्याऊँ-म्याऊँ करके कुलबुलाने लगी।

सेठ जी ने शम्भू से कहा, “क्यों भाई, यह चूहा बेचोगे ?” शम्भू ने कुछ देर सोचने का नाटक कीया । अंत में वह तैयार हो गया । सेठ ने उसे एक सिक्का दिया । शम्भू सिक्का लेकर आगे चला । इस एक सिक्के से क्या किया जाए ? तभी उसे आगे एक प्याऊ नजर आई ।

लोग पानी पीकर प्याऊ वाले को धन्यवाद देते जा रहे थे । कुछ उसे पैसे भी दे रहे थे । यह देखकर शम्भू ने सोचा कि क्यों न यही काम किया जाए । शम्भू ने एक घड़ा खरीदा और उसमें पानी भरकर खेतों के निकट बैठ गया । थके-प्यासे किसानों ने उसका ठंडा पानी पीया । किसानों के पास देने को पैसे तो नहीं थे पर उन्होंने शम्भू को कुछ फूल दे दिए । उसका दिमाग अब और तेज़ चल रहा था । शम्भू मटके में फूल भरकर मंदिर की ओर चला । वह मंदिर के बाहर फूल लेकर बैठ गया । मंदिर में चढ़ाने के लिए लोग पैसे देकर उससे फूल लेने लगे । शम्भू की अच्छी कमाई हो गई । अब वो दोपहर को किसानों को पानी पिलाकर उनसे फूल पाता और शाम को मंदिर में बेचकर पैसे कमाता ।

एक दिन उसने किसी से सुना कि एक बड़ा व्यापारी अगले महीने पाच सौ घोड़े लेकर शहर आने वाला है। उसका दिमाग दौड़ने लगा वो घड़े में पानी व गुड़ डालकर जंगल की ओर चल दिया। वहां घसियारों (घास काटने वाले) को मुफ्त में शर्बत पिलाता। घसियारे उसके बहुत आभारी हो गए । वे उसकी सेवा के बदले उसके लिए कुछ करना चाहते पर शम्भू उन्हें कहता समय आएगा तो मौका दूंगा।

एक दिन वो समय भी आ गया जब घोड़े का व्यापारी अपने पांच सो घोड़े लेकर शहर आ गया। शम्भू घसियारों के पास गया और अपनी सारी जमा-पूंजी देकर बोला, ”आज जितनी घास आपने काटी है वह मुझे बेच दो ।” घसियारे तुरंत मान गए । चंदु ने सारी घास ले ली । इस कारण बाजार में कोई घास नहीं लाया ।

व्यापारी शहर पहुंचा तो उसे घोड़ों के लिए घास नहीं मिली । केवल एक जगह घास का अम्बार लगाए शम्भू मिला । उसके पास पांच सौ गट्‌ठर थे । व्यापारी को घोड़ों के लिए घास की बहुत जरूरत थी । उसने शम्भू से घास की कीमत पूछी । चंदु ने एक हजार सिक्के मांगे ।

मजबूर होकर व्यापारी को घास के लिए एक हजार सिक्के देने पड़े । कुछ ही दिनों बाद एक जहाज माल लेकर आया । नगर के व्यापारियों के दल के पहुंचने से पहले ही शम्भू जहाज के व्यापारियों के पास पहुच गया और उसने एक हजार सिक्के अग्रिम देकर जहाज का सारा माल खरीद लिया ।

नगर के व्यापारियों को शम्भू से माल खरीदना पड़ा । शम्भू ने व्यापारियों से पैसे लेकर जहाज वालों को पूरी कीमत दे दी । शहर के व्यापारियों में शम्भू मशहूर हो गया । सब उसकी चतुराई के कायल हो गए । एक दिन शम्भू एक व्यापारी के घर गया ।

यह वही व्यापारी था जिसकी बात सुनकर शम्भू ने मरे चूहे से अपना कारोबार शुरू किया था । शम्भू ने एक सोने का चूहा उस व्यापारी के सामने रखा और बोला, ”आप मेरे गुरु हैं । यह सोने का चूहा गुरुदक्षिणा के रूप में स्वीकार कीजिए ।”

शम्भू ने मरे चूहे से लेकर अब तक की सारी कहानी उसे सुना दी । व्यापारी चकित रह गया और बोला : ”शम्भू, तुम्हारे जैसे योग्य युवक को मैं खोना नहीं चाहता । मेरी विवाह योग्य सुदर व सुशील बेटी है । तुमसे योग्य न मुझे उसके लिए नहीं मिल सकता । मुझे गुरु दक्षिणा के रूप में यही संबंध चाहिए ।” शम्भू ने रिश्ता सहर्ष स्वीकार कर लिया।

कहानी की शिक्षा:

मेहनत, लगन और चतुराई से किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है। हमेशा प्रयास करते रहें। सफल होते रहें और आगे बढ़ते रहें।

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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐सद्व्यवहार का जादू💐💐*

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किसी गाँव में एक चोर रहता था।
एक बार उसे कई दिनों तक चोरी करने का अवसर ही नहीं मिला, जिससे उसके घर में खाने के लाले पड़ गये।

अब मरता क्या न करता, वह रात्रि के लगभग बारह बजे गाँव के बाहर बनी एक साधु की कुटिया में घुस गया।

वह जानता था कि साधु बड़े त्यागी हैं, अपने पास कुछ नहीं रखते फिर भी सोचा, ‘खाने पीने को ही कुछ मिल जायेगा। तो एक दो दिन का गुजारा चल जायेगा।’

जब चोर कुटिया में प्रवेश कर रहे थे, संयोगवश उसी समय साधु बाबा ध्यान से उठकर लघुशंका के निमित्त बाहर निकले।

चोर से उनका सामना हो गया। साधु उसे देखकर पहचान गये क्योंकि पहले कई बार देखा था, पर साधु यह नहीं जानते थे कि वह चोर है।
उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह आधी रात को यहाँ क्यों आया !
साधु ने बड़े प्रेम से पूछाः “कहो बालक ! आधी रात को कैसे कष्ट किया ? कुछ काम है क्या ?”
चोर बोलाः “महाराज ! मैं दिन भर का भूखा हूँ।”
साधुः “ठीक है, आओ बैठो। मैंने शाम को धूनी में कुछ शकरकंद डाले थे, वे भुन गये होंगे, निकाल देता हूँ। तुम्हारा पेट भर जायेगा।

शाम को आ गये होते तो जो था हम दोनों मिलकर खा लेते। पेट का क्या है बेटा ! अगर मन में संतोष हो तो जितना मिले उसमें ही मनुष्य खुश रह सकता है। ‘यथा लाभ संतोष’ यही तो है।”

साधु ने दीपक जलाया। चोर को बैठने के लिए आसन दिया, पानी दिया और एक पत्ते पर भुने हुए शकरकंद रख दिये।

फिर पास में बैठकर उसे इस तरह खिलाया, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को खिलाती है।

साधु बाबा के सद्व्यवहार से चोर निहाल हो गया, सोचने लगा, ‘एक मैं हूँ और एक ये बाबा हैं।
मैं चोरी करने आया और ये इतने प्यार से खिला रहे हैं ! मनुष्य ये भी हैं और मैं भी हूँ।
यह भी सच कहा हैः आदमी-आदमी में अंतर, कोई हीरा कोई कंकर। मैं तो इनके सामने कंकर से भी बदतर हूँ।’

मनुष्य में बुरी के साथ भली वृत्तियाँ भी रहती हैं, जो समय पाकर जाग उठती हैं।

जैसे उचित खाद-पानी पाकर बीज पनप जाता है, वैसे ही संत का संग पाकर मनुष्य की सदवृत्तियाँ लहलहा उठती हैं।

चोर के मन के सारे कुसंस्कार हवा हो गये। उसे संत के दर्शन, सान्निध्य और अमृतवर्षा दृष्टि का लाभ मिला।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।।

उन ब्रह्मनिष्ठ साधुपुरुष के आधे घंटे के समागम से चोर के कितने ही मलिन संस्कार नष्ट हो गये।

साधु के सामने अपना अपराध कबूल करने को उसका मन उतावला हो उठा।
फिर उसे लगा कि ‘साधु बाबा को पता चलेगा कि मैं चोरी की नियत से आया था तो उनकी नजर में मेरी क्या इज्जत रह जायेगी !
क्या सोचेंगे बाबा कि कैसा पतित प्राणी है, जो मुझ संत के यहाँ चोरी करने आया !’

लेकिन फिर सोचा, ‘साधु मन में चाहे जो समझें, मैं तो इनके सामने अपना अपराध स्वीकार करके प्रायश्चित करूँगा।

इतने दयालू महापुरुष हैं, ये मेरा अपराध अवश्य क्षमा कर देंगे।’ संत के सामने प्रायश्चित करने से सारे पाप जलकर राख हो जाते हैं।

उसका भोजन पूरा होने के बाद साधु ने कहाः “बेटा ! अब इतनी रात में तुम कहाँ जाओगे, मेरे पास एक चटाई है, इसे ले लो और आराम से यहाँ सो जाओ। सुबह चले जाना।”
नेकी की मार से चोर दबा जा रहा था। वह साधु के पैरों पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा।
साधु समझ न सके कि यह क्या हुआ ! साधु ने उसे प्रेमपूर्वक उठाया, प्रेम से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछाः “बेटा ! क्या हुआ ?”
रोते-रोते चोर का गला रूँध गया। उसने बड़ी कठिनाई से अपने को सँभालकर कहाः
“महाराज ! मैं बड़ा अपराधी हूँ।”

साधु बोलेः “बेटा ! भगवान तो सबके अपराध क्षमा करने वाले हैं। उनकी शरण में जाने से वे बड़े-से-बड़े अपराध क्षमा कर देते हैं। तू उन्हीं की शरण में जा।”

चोरः “महाराज ! मेरे जैसे पापी का उद्धार नहीं हो सकता।”
साधुः “अरे पगले ! भगवान ने कहा हैः यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है।”

“नहीं महाराज ! मैंने बड़ी चोरियाँ की हैं। आज भी मैं भूख से व्याकुल होकर आपके यहाँ चोरी करने आया था लेकिन आपके सदव्यवहार ने तो मेरा जीवन ही पलट दिया।


आज मैं आपके सामने कसम खाता हूँ कि आगे कभी चोरी नहीं करूँगा, किसी जीव को नहीं सताऊँगा।

आप मुझे अपनी शरण में लेकर अपना शिष्य बना लीजिये।”
साधु के प्यार के जादू ने चोर को साधु बना दिया।
उसने अपना पूरा जीवन उन साधु के चरणों में सदा के समर्पित करके अमूल्य मानव जीवन को अमूल्य-से-अमूल्य परमात्मा को पाने के रास्ते लगा दिया।

महापुरुषों की सीख है कि “आप सबसे आत्मवत् व्यवहार करें क्योंकि सुखी जीवन के लिए विशुद्ध निःस्वार्थ प्रेम ही असली खुराक है।