कलकत्ते में एक मित्र की शादी हुई। बहुत खुश था। उसने हमसबको बुलाया। उसे हमेशा बड़ा बनने दिखाने का शौक रहा। उसका घर आउटर में है तो लोकल ट्रेन से ढाई तीन घण्टे लगे। वहां गए तो देखा उसने तीन चार हज़ार लोगों को बुला लिया है।
और खाने की व्यवस्था के नाम पर 20-25 लोगों की पूरी-सब्जी बनवाई थी। आउटर में घर होने के कारण रात ट्रेनें, गाड़ियां कुछ नहीं थीं। होटल रेस्टोरेंट्स भी नहीं थे।
भूखे, पैदल लौटे हम सब।
दोस्त है तो उसे अयोग्य या बिना किसी प्लानिंग के बड़े आयोजन ठानलेने वाला अक्षम भी नहीं कह सकते। और ट्रोल भी करने लगते हैं मित्र के समर्थक।
और मज़े की बात यह है कि हमें बुलाकर, इतनी मुसीबत में डालकर वह अपनी मौज में है। कहता फिर रहा है हज़ारों लोगों को शादी में बुलाया। इतनी ग्रैंड पार्टी दी आदि आदि।
तो क्या कहूँ। यही है हाल।
(यह पोस्ट यूपी सरकार पर व्यंग्य है। मेरा कोई मित्र ऐसा नहीं है, किसी मित्र के साथ ऐसी कोई घटना नहीं घटी। मेरे सारे मित्र अच्छे हैं।)
Day: February 16, 2025
मैंने सुना है, एक सूफी फकीर के आश्रम में प्रविष्ट होने के लिये चार स्त्रियां पहुंचीं। उनकी बड़ी जिद थी, बड़ा आग्रह था। ऐसे सूफी उन्हें टालता रहा, लेकिन एक सीमा आई कि टालना भी असंभव हो गया। सूफी को दया आने लगी, क्योंकि वे द्वार पर बैठी ही रहीं–भूखी और प्यासी; और उनकी प्रार्थना जारी रही कि उन्हें प्रवेश चाहिए।
उनकी खोज प्रामाणिक मालूम हुई तो सूफी झुका। और उसने उन चारों की परीक्षा ली। उसने पहली स्त्री को बुलाया और उससे पूछा, “एक सवाल है। तुम्हारे जवाब पर निर्भर करेगा कि तुम आश्रम में प्रवेश पा सकोगी या नहीं। इसलिए बहुत सोच कर जवाब देना।’
सवाल सीधा-साफ था। उसने कहा कि एक नाव डूब गई है; उसमें तुम भी थीं और पचास थे। पचास पुरुष और तुम एक निर्जन द्वीप पर लग गये हो। तुम उन पचास पुरुषों से अपनी रक्षा कैसे करोगी? यह समस्या है।
एक स्त्री और पचास पुरुष और निर्जन एकांत! वह स्त्री कुंआरी थी। अभी उसका विवाह भी न हुआ था। अभी उसने पुरुष को जाना भी न था। वह घबड़ा गई। और उसने कहा, कि अगर ऐसा होगा तो मैं किनारे लगूंगी ही नहीं; मैं तैरती रहूंगी। मैं और समुद्र्र में गहरे चली जाऊंगी। मैं मर जाऊंगी, लेकिन इस द्वीप पर कदम न रखूंगी।
फकीर हंसा, उसने उस स्त्री को विदा दे दी और कहा, कि मर जाना समस्या का समाधान नहीं है। नहीं तो आत्मघात सभी समस्याओं का समाधान हो जाता।
यह पहला वर्ग है, जो आत्मघात को समस्या को समाधान मानता है। तुम चकित होओगे, कि तुममें से अधिक लोग इसी वर्ग में हैं। हर बार जीवन में वही समस्याएं हैं, वही उलझने हैं, और हर बार तुम्हारा जो हल है, वह यह है कि किसी तरह जी लेना और मर जाना। फिर तुम पैदा हो जाते हो।
इस संसार में मरने से तो कुछ हल होता ही नहीं। फिर तुम पैदा हो जाते हो, फिर वही उलझन, फिर वही रूप, फिर वही झंझट, फिर वही संसार; यह पुनरुक्ति चलती रहती है। यह चाक घूमता रहता है। तुम्हारे मरने से कुछ हल न होगा। तुम्हारे बदलने से हल हो सकता है। मरने से हल नहीं हो सकता। मर कर भी तुम, तुम ही रहोगे। फिर तुम लौट आओगे।
और अगर एक बार आत्मघात समस्या का समाधान मालूम हो गया तो तुम हर बार यही करोगे। तुम्हारे मन में भी अनेक बार किसी समस्या को जूझते समय जब उलझन दिखाई पड़ती है और रास्ता नहीं मिलता, तो मन होता है, मर ही जाओ। आत्महत्या ही कर लो। यह तुम्हारे जन्मों-जन्मों का निचोड़ है। पर इससे कुछ हल नहीं होता। समस्या अपनी जगह खड़ी रहती है।
दूसरी स्त्री बुलाई गई। वह दूसरी स्त्री विवाहित थी, उसका पति था। यही सवाल उससे भी पूछा गया, कि पचास व्यक्ति हैं, तू है; नाव डूब गई है सागर में, पचास व्यक्ति और तू एक निर्जन द्वीप लग गये हैं। तू अपनी रक्षा कैसे करेगी?
उस स्त्री ने कहा, इसमें बड़ी कठिनाई क्या है? उन पचास में जो सबसे शक्तिशाली पुरुष होगा, मैं उससे विवाह कर लूंगी। वह एक, बाकी उनचास से मेरी रक्षा करेगा।
यह उसका बंधा हुआ अनुभव है। लेकिन उसे पता नहीं, कि परिस्थिति बिलकुल भिन्न है। उसके देश में यह होता रहा होगा, कि उसने विवाह कर लिया और एक व्यक्ति ने बाकी से रक्षा की। लेकिन एक व्यक्ति बाकी से रक्षा नहीं कर सकता। एक व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली हो, पचास से ज्यादा शक्तिशाली थोड़े ही होगा। रक्षा असल में एक पति थोड़े ही करता है स्त्री की! जो पचास की पत्नियां हैं, वह उन पचास को सीमा के बाहर नहीं जाने देतीं।
इसलिए वह जो उसका अनुभव है, इस नई परिस्थिति में काम न आयेगा। वह एक आदमी मार डाला जायेगा, वह कितना ही शक्तिशाली हो। उसका कोई अर्थ नहीं है। पचास के सामने वह कैसे टिकेगा?
पुराना अनुभव हम नई परिस्थिति में भी खींच लेते हैं। हम पुराने अनुभव के आधार पर ही चलते जाते हैं, बिना यह देखे कि परिस्थिति बदल गई है और यह उत्तर कारगर न होगा।
फकीर ने उस स्त्री को विदा कर दिया और उससे कहा, कि तुझे अभी बहुत सीखना पड़ेगा, इसके पहले कि तू स्वीकृत हो सके। तूने एक बात नहीं सीखी है अभी, कि परिस्थिति के बदलने पर समस्या ऊपर से चाहे पुरानी दिखाई पड़े, भीतर से नई हो जाती है। और नया समाधान चाहिये।
लेकिन अनुभव की एक खराबी है, कि जितने अनुभवी लोग होते हैं, उनके पास नया समाधान कभी नहीं होता। छोटे बच्चे से तो नया समाधान मिल भी जाये, बूढ़े से नया समाधान नहीं मिल सकता। उसका अनुभव मजबूत हो चुका होता है। वह अपने अनुभव को ही दोहराये चला जाता है। वह कहता है, मैं जानता हूं, जीया हूं, बहुत अनुभव किये हैं; यह उसका सारा निचोड़ है। उसका मस्तिष्क पुराना, जरा-जीर्ण हो जाता है, बासा हो जाता है।
यह स्त्री बासी हो चुकी थी। इसके उत्तर खंडहर हो चुके थे। इसको यह बोध भी न रहा था, कि हर पल जीवन नई समस्या खड़ी करता है। और हर पल चेतना को नया समाधान खोजना पड़ता है। इसलिए बंधे हुए समाधान, लकीरें, और लकीरों पर चलनेवाले फकीर काम के नहीं हैं। रूढ़िबद्ध उत्तर काम नहीं देंगे। यहां तो सजगता चाहिये। सजगता ही उत्तर हो सकती है। वह स्त्री भी अस्वीकार दी गई।
तुममें से बहुतों के उत्तर बंधे हुए हैं। कोई हिंदू घर में पैदा हुआ है, कोई मुसलमान घर में पैदा हुआ है, कोई जैन घर में पैदा हुआ है। तुम्हारे पास बंधे हुए उत्तर हैं। जैन का एक उत्तर है, मुसलमान का एक उत्तर है, हिंदू का एक। तुम उन बंधे उत्तरों को खोजे जा रहे हो!
महावीर को विदा हुए पच्चीस सौ साल हो गये। पच्चीस सौ सालों में सारी समस्याएं बदल गई, संसार बदल गया, आदमी के होने का ढंग बदल गया, आदमी की चेतना बदल गई। तुम पुराना उत्तर पीटे चले जा रहे हो! तुम यह भूल ही गये हो, कि अब वह समस्या ही नहीं है, जिसके लिये तुम्हारे पास समाधान है। समस्या समाधान में कोई तालमेल नहीं रहा।
वेद बड़े प्राचीन हैं। हिंदू अघाते नहीं यह घोषणा करते, कि हमारी किताब सबसे ज्यादा पुरानी है। लेकिन जितनी पुरानी किताब उतनी ही व्यर्थ! पुरानी किताब का मतलब ही यह है, कि अब वह दुनिया ही नहीं रही, जब किताब लिखी गई थी। अब वे प्रश्न नहीं रहे, अब वे उलझनें नहीं रहीं। जिंदगी रोज नये ढांचे लेती है, नये रूप, नये रंग!
गंगा रोज नये किनारे को छूती है, पुराने किनारे छूट गए। और तुम पुराने नक्शे लिये घूम रहे हो। तुम्हारा गंगा से मिलन नहीं होता। क्योंकि गंगा नई होती जा रही है, तुम्हारे पास पुराने नक्शे हैं। गंगा ने जिन जमीनों पर बहना छोड़ दिया, तुम वहां के नक्शे लिये हो। और गंगा जहां बह रही है अभी, इस क्षण, वहां तुम्हारे नक्शे की वजह से तुम नहीं पहुंच पाते। कभी-कभी बिना नक्शे का आदमी भी पहुंच जाये, पर पुराने नक्शों को लेकर चलने वाला कभी नहीं पहुंच सकता। उसके लिये तो भारी अड़चन है।
वह दूसरी स्त्री विदा कर दी गई। तीसरी स्त्री बुलाई गई, वह एक वेश्या थी। और जब फकीर ने उसे समस्या बताई कि समस्या यह है, कि पचास आदमी हैं, तुम हो, नाव डूब गई, एकांत निर्जन द्वीप होगा, तुम अकेली स्त्री होओगी। समस्या कठिन है; तुम क्या करोगी?
वह वेश्या हंसने लगी। उसने कहा, मेरी समझ में आता है कि नाव है, पचास आदमी हैं, एक स्त्री मैं हूं। फिर नाव डूब गई है, पचास आदमी और मैं किनारे लग गये, निर्जन द्वीप है, समझ में आता; लेकिन समस्या क्या है? वेश्या के लिये समस्या हो ही नहीं सकती! इसमें समस्या कहां है, यह मेरी समझ में नहीं आता। और जब समस्या ही न हो, तो समाधान का सवाल ही नहीं उठता।
तीसरे वर्ग के लोग भी हैं। वे इतने दिन तक समस्या में रह लिए हैं, कि समस्या दिखाई पड़नी ही बंद हो गई। जब तुम बहुत किसी चीज के आदी हो जाते हो, तो तुम्हारी आंखें धुंधली हो जाती हैं। फिर वह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। अगर तुम्हारे घर के सामने ही कोई वृक्ष लगा हो, तो वह तुम्हें दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। तुम उसे रोज देखते हो, वह दिखाई पड़ना बंद हो जाता है।
जिस चीज के साथ तुम धीरे-धीरे रम जाते हो, उसकी चोट पड़नी बंद हो जाती है। जीवन बहुतों के लिये समस्या ही नहीं है। वे चकित होते हैं दूसरों को जीवन का समाधान खोजते हुए देखकर। वे हैरान होते हैं। उनकी नजरों में ये खोजनेवाले पागल हैं, दीवाने हैं। इनके दिमाग में कुछ खराबी हो गई हे; अन्यथा दुनिया सब ठीक है।
“समस्या कहां है?’ वेश्या ने पूछा।
वेश्या भी विदा कर दी गई। क्योंकि जिसके लिए समस्या ही नहीं है, उसे समाधान की यात्रा पर कैसे भेजा जा सकता है?
चौथी स्त्री के सामने भी वही सवाल फकीर ने रखा। उस स्त्री ने सवाल सुना, आंखें बंद कीं, आंखें खोलीं और कहा, “मुझे कुछ पता नहीं। मैं निपट अज्ञानी हूं।’
वह चौथी स्त्री स्वीकार कर ली गई।
ज्ञान के मार्ग पर वही सकता है, जो अज्ञान को स्वीकार ले।
ओशो;
आज से सिर्फ 200 साल पहले केरल में कोई मुस्लिम न था।इस राज्य के किसान मसालों की खेती करते थे जिनको विदेशी व्यापारी अपने देश ले जा कर ऊँचे दाम में बेचते थे। अब वहां के लोगों ने विचार किया कि क्यों न हम ही विदेश ले जाकर मसाले बेचें तो वो सब लाभ अपना होगा। लोगों ने वहां के राजा से आग्रह किया ,राजा ने दरबार में चर्चा की तो ब्राह्मणों ने कहा कि यहां के लोग विदेश जाएंगे तो वहां मांस आदि खाना पड़ेगा तो अपवित्र हो जायेंगे इसलिए किसी को विदेश जाने की इजाजत नही मिलेगी।
बहुत सोच विचार कर इसका ये समाधान निकाला कि निम्न जातियों के 500 युवाओं को मुसलमान बना देते हैं तब ये विदेश जा सकते हैं।वे ये काम करने लगे जब वापिस आते तो अपने आस पड़ोस के परिवार में जा कर बैठते तो ब्राह्मणों द्वारा इन परिवारों को भी धर्म भृष्ट घोषित कर दिया जाता ।
इस सब का ये परिणाम है कि आज वहां सिर्फ 43 % ही हिन्दू बचे हैं।
हमारे धर्म के ठेकेदारों ने धर्म के पैरों में कुल्हाड़ी मारी है।
और आज भी ये ठेकेदार सुधरे नही ।
दिल्ली से मुंबई जाने वाली इंडिगो की फ्लाइट में एक बाबा जी सवार होते हैं और अपनी सीट पर बैठ जातें हैं | जैसे ही वह सीट पर बैठते हैं, वे एक खूबसूरत महिला को विमान में चढ़ते हुए देखते हैं |
बाबाजी को जल्द ही एहसास हो जाता है कि वह सीधे उसकी सीट की ओर जा रही है।
और देखिए, वह बाबाजी के ठीक बगल वाली सीट पर बैठ जाती है।
बातचीत शुरू करने के लिए उत्सुक, बाबाजी पूछते हैं, “व्यावसायिक यात्रा या छुट्टी यात्रा?”
वह मुड़ती है, मुस्कुराती है और कहती है, “व्यावसायिक। मैं वार्षिक सेक्सोलॉजिस्ट सम्मेलन में जा रही हूँ।”
बाबाजी मुश्किल से थूक निगलते हैं। यह बाबाजी द्वारा देखी गई सबसे खूबसूरत महिला है, जो उनके बगल में बैठी है, और वह एक सेक्सोलॉजिस्ट है! अपनी उत्तेजना को नियंत्रित करने और अपना संयम बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हुए, बाबाजी पूछते हैं, “इस सम्मेलन में आपकी व्यावसायिक भूमिका क्या है?”
“व्याख्याता,” वह कहती है, “मैं अपने अनुभव का उपयोग कामुकता के बारे में कुछ लोकप्रिय मिथकों को दूर करने के लिए करती हूँ।”
“सच में?” बाबाजी ने मुश्किल से थूक निगलते हुए कहा। “ये कौन से म-म-म-मिथक हैं?”
“ठीक है,” वह समझाती है, “एक प्रचलित मिथक यह है कि अफ्रीकी पुरुष सबसे अच्छे होते हैं, जबकि वास्तव में तमिल लोगों में यह गुण सबसे अधिक होता है। एक और प्रचलित मिथक यह है कि फ्रांसीसी पुरुष सबसे अच्छे प्रेमी होते हैं, जबकि वास्तव में बंगाली ही सबसे अच्छे प्रेमी होते हैं। हालाँकि, हमने पाया है कि सभी श्रेणियों में सबसे अच्छा संभावित प्रेमी सरदार होता है।”
अचानक, महिला थोड़ी असहज हो जाती है और शरमा जाती है। “मुझे खेद है,” वह कहती है, “मुझे आपके साथ इस पर चर्चा नहीं करनी चाहिए। मैं आपका नाम भी नहीं जानती!”
“वेंकटरमन!” बाबाजी ने अचानक कहा….. “वेंकटरमन बनर्जी! लेकिन मेरे सभी दोस्त मुझे कुलदीप सिंह कहते हैं!”
साभार
बात है 1993 की है…कंधार-कंधार चिल्लाने वाले कोंग्रेस,राहुल को यह घटना तो शायद पता होगा ही कि अक्टूबर 1993 में 40 से ज़्यादा पाकिस्तानी अफगान आतंकी हथियार, गोला बारूद, मशीन गन, राकेट लांचर, श्रीनगर की हज़रत बल दरगाह में घुस गए थे।
ये हज़रत बल दरगाह श्रीनगर में डल झील के किनारे एक बहुत बड़ी दरगाह है जहां कहा जाता है कि हुज़ूर का एक बाल रखा है…।
सो दरगाह के कारिंदों ने पुलिस को खबर की कि अंदर मौजूद आतंकियों ने हुज़ूर के बाल वाले कमरे और उस वॉल्ट के ताले बदल दिए हैं, जिसमें पवित्र बाल रखा है…।
केंद्र में PV NarsimhaRao थे और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था… Governer थे Retd Gen. KV Krishna Rao… उनके Security Advisor थे Retd Gen. MA Zaki… उन्होंने तुरंत आदेश दिया BSF को… घेर लो… BSF ने घेरा डाल दिया।
दिल्ली अभी Opration Bluestar को भूली नहीं थी… Security Experts चाहते थे कि कमांडो कार्यवाही करके दरगाह को खाली करा लिया जाए… पर दिल्ली की जान सूख गयी… बाहर BSF. अंदर आतंकी और उनके साथ 100 से ज़्यादा Civilians…
सरकार ने Commando operation की इजाज़त न दी… सरकार की ओर से एक वरिष्ठ नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह को मध्यस्थ बना के अंदर भेजा गया, आतंकियों के सामने घुटने टेक गिड़गिड़ाने के लिये कि ‘पिलीज भाई लोग, Surrender कर दो’… वो नहीं माने… उन्होंने कहा – ‘Civilians को तो छोड़ दो’… आतंकियों ने कहा, ‘हाँ इनको ले जाओ’… पर civilians ने बाहर आने से मना कर दिया…
फौजी सलाहकारों ने दूसरा option सुझाया, वो जो वो 1988 में स्वर्ण मंदिर में ही Op Black Thunder में आजमा चुके थे… उस वक़्त उन्होंने जून महीने में स्वर्ण मंदिर घेर लिया था और बिजली पानी काट दी और शौचालय भी घेर लिए थे…
फौजी बोले यही रणनीति अपनाओ यहां भी… सरकार ने दो एक दिन बिजली पानी काटी भी… पर फिर बाद में डर गयी… घेरा डाले हफ्ता बीत गया था… तभी कश्मीरी, राज्य भर में हज़रत बल में नमाज़ पढ़ने को मचलने लगे… सड़कों पे प्रदर्शन होने लगे…
ऐसे ही एक प्रदर्शन में बीजबेहड़ा नामक कस्बे में BSF ने Firing कर दी और 37 आदमी मारे गए, 75 घायल… सरकार की और दम निकल गयी… हज़रत बल से BSF हटा के Army लगा दी गयी… सरकार को डर था कि BSF कहीं विद्रोह कर खुद ही न घुस जाए हज़रत बल में…
अंदर से आतंकियों ने खबर भेजी कि हमारे पास राशन पानी नहीं है… civilian भूखे प्यासे मरेंगे तो तुम जिम्मेवार होगे… काँग्रेस सरकार एकदम आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गयी… बिरयानी बना के भेजी गयी… फौज ने विरोध किया… ये क्या तमाशेबाज़ी है… बिरयानी ही भेजनी है तो घेराबंदी का क्या मतलब?
उधर आतंकियों ने बिरयानी reject कर दी… सरकारी बिरयानी नहीं खाएंगे…
वजाहत हबीबुल्लाह ने पूछा, किसने बनाई थी बिरयानी?
बताया गया कि किसी सरकारी मेस में बनी थी…
श्रीनगर के सबसे महंगे 5 Star hotel से बिरयानी मंगाई गयी और श्रीनगर के कुछ हुर्रियत छाप संगठन अंदर बिरयानी ले के गए तो नव्वाब साहेब ने बिरयानी खाई…
फिर यही सिलसिला हफ्ता भर चला… उस Hotel की एक Van में पतीला भर-भरकर बिरयानी जाती दिन में 3 बार… साथ में Bisleri की बोतलें… बाकायदे कंबल रजाई भेजी गयी… इस बीच शांति वार्ता भी चलती रही…
इधर फौज ने कहा कि इजाज़त दो तो इसी बिरयानी वाली गाड़ी में ही 20 कमांडो भेज दें, 10 मिनट में काम तमाम कर देंगे… पर बुज़दिल काँग्रेस सरकार नहीं मानी… उधर बीजबेहड़ा Firing के कारण बवाल मचा था पूरी घाटी में…
अंततः सरकार ने नव्वाब साहब लोगों को Free passage offer किया… बोली ‘आपको हम रिहा करते हैं… हथियार छोड़ पैदल निकल जाओ’… उन्होंने कहा, ‘ना… हथियार तो ले के जाएंगे’…. सरकार उसपे भी मान गयी…
अंत में 15 दिन की घेराबंदी के बाद वो 40 पाकिस्तानी – अफगान आतंकी हमारी फौज के सामने से AK 47 लहराते हुए पैदल ही निकले और श्रीनगर की गलियों में गुम हो गए… जब निकले तब भी Army ने कहा, अब ठोक देते हैं सालों को… पर दिल्ली बोली ‘नहीं… वादा खिलाफ़ी हो जाएगी’…
इस तरह इन काँग्रेसियों ने 40 पाकिस्तानी आतंकियों को 15 दिन दामाद की तरह पाला और फिर Safe Passage दे दिया।
कैंगियों इतिहास मत कुरेदिये वरना बहुत से कंकाल हैं आपकी अलमारी में…

यहाँ 3 मनोरंजक लघु कथाएँ हैं, जिनका गहरा अर्थ है और जो आपको तुरंत मुस्कुराहट लाएँगी।
1. “गहन”
मैंने लिफ्ट में एक छोटे बच्चे को आइसक्रीम खाते देखा। चिंता के कारण, मैंने सहजता से कहा, “आज बहुत ठंड है; इसे खाने से तुम बीमार हो जाओगे!”
बच्चे ने उत्तर दिया, “मेरी दादी 103 साल तक जीवित रहीं।”
मैंने पूछा, “आइसक्रीम खाने से?”
उसने कहा, “नहीं, क्योंकि उसने कभी दूसरों के काम में दखल नहीं दिया!”
कितना गहन! मुझे आखिरकार समझ में आ गया कि मैं इतनी तेज़ी से बूढ़ा क्यों हो रहा हूँ – बहुत ज़्यादा अनावश्यक दखलंदाज़ी।
*2. “थका हुआ”*
आजकल हर जगह घोटालेबाज हैं। मैंने अभी-अभी समाचारों में लोगों की बचत के बारे में देखा – हज़ारों डॉलर बिना किसी निशान के गायब हो गए।
घबराकर, मैं अपनी बाइक पर बैंक गया, अपना कार्ड डाला, अपना पासवर्ड डाला और अपना बैलेंस चेक किया। शुक्र है, मेरे 750 रुपये अभी भी वहाँ थे। मैंने राहत की सांस ली।
वाह, यह तो बहुत ही तनावपूर्ण था! मैं कसम खाता हूँ कि मैं फिर कभी समाचार नहीं देखूँगा – बहुत तनावपूर्ण!
जब मैं बैंक से बाहर निकला, तो मैं और भी थक गया था: मेरे 750 रुपये सुरक्षित थे, लेकिन मेरी बाइक गायब थी।
*3. “रुको”*
एक युवती ट्रेन में चढ़ी और उसने अपनी सीट पर एक आदमी को बैठे देखा। उसने विनम्रता से अपना टिकट चेक किया और कहा, “सर, मुझे लगता है कि आप मेरी सीट पर हैं।”
उस आदमी ने अपना टिकट निकाला और चिल्लाया, “ध्यान से देखो! यह मेरी सीट है! क्या तुम अंधी हो?!”
लड़की ने ध्यान से उसका टिकट चेक किया और बहस करना बंद कर दिया। वह चुपचाप उसके पास खड़ी हो गई।
ट्रेन चलने के बाद, लड़की झुकी और धीरे से बोली, “सर, आप गलत सीट पर नहीं हैं, लेकिन आप गलत ट्रेन में हैं। यह मुंबई जा रही है, और आपका टिकट अहमदाबाद का है।”
एक तरह का संयम होता है जो लोगों को उनके किए पर पछतावा कराता है। अगर चिल्लाने से सब कुछ हल हो जाता, तो गधे बहुत पहले ही दुनिया पर राज कर चुके होते।
ये तीन मज़ेदार छोटी कहानियाँ इतनी अच्छी हैं कि आप इन्हें अपने तक ही सीमित नहीं रख सकते—तो क्यों न दूसरों के साथ भी हँसी-मज़ाक करें?
हंसते मुस्कुराते रहे … 🤓😊
कहानी छोटी है, मगर सीख बड़ी है …..
“वाह ! क्या लगती हो ! इस उम्र में भी बिलकुल पटाखा हो पटाखा !” गली में तेज-तेज कदमों से अपने घर की ओर जाती हुई प्रीति को देख कर पीछे से आते एक बाइक सवार ने फब्ती कसी। प्रीति चालीस साल की एक गृहिणी थी। वह जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहती थी। बाहर बारिश हो रही थी अत: मुख्य सड़क पर पानी भरा होने के कारण वह गली वाले रास्ते से अपने घर जा रही थी।
“मैडम, बात तो सुनिए। “प्रीति उस बदतमीज लड़के को अनसुना कर चुपचाप चल रही थी पर उस 18-19 साल के लड़के की उद्दंडता बढ़ती ही जा रही थी। उसने मौका देख प्रीति की पीठ पर ज़ोर से एक हाथ मारा। अब प्रीति चुप न रह सकी – ” शर्म नहीं आती तुम्हें ? मैं तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ ?”
मैडम, हम तो आपको एक नवयौवना की तरह देख रहे हैं। आपको तो खुश होना चाहिए कि इस उम्र में भी कोई आपको इन नज़रों से देख रहा है।” लड़के ने बेशर्मी और बदतमीजी से सना एक जुमला फेंका। प्रीति ने अपनी चाल और तेज कर दी। गली में आगे अंधेरा था। एक जगह गड्ढे में पानी भरा था। लड़के को गड्ढें में पानी भरा होने के कारण गड्ढ़ा नहीं दिखा अत: बैलेंस बिगड़ने से वह बाइक समेत गड्ढे में जा गिरा। प्रीति ने मुड़ कर देखा। उसके मन में एक क्षण को आया कि बहुत ही अच्छा हुआ। इसके जैसे छिछोरे के साथ यही होना चाहिए था पर पता नहीं क्यों, वह कुछ आगे बढ़ कर रुक गयी। दूसरे ही क्षण वह पीछे लौट कर लड़के के पास पहुंच चुकी थी। “लो हाथ पकड़ो।” प्रीति ने लड़के को आवाज लगायी। प्रीति ने हाथ पकड़ कर लड़के को गड्ढे से बाहर खींचा। लड़के के सिर व बाहों पर गहरी चोट लगी थी। “चलो डॉक्टर के पास। “लड़का बड़ी ही हैरानी और कुछ-कुछ शर्मिंदगी से प्रीति को देख रहा था।” मैं आपको छेड़ रहा था, आपसे बदतमीजी कर रहा था फिर भी आप मेरी मदद कर रही हैं ? मुझे डॉक्टर के पास ले जाने को कह रही हैं ? “कुछ देर पहले की बदतमीजी अब शर्म बन कर लड़के की आंखों से छलकी। शब्दों में भी शर्मिंदगी अपनी जगह बना चुकी थी।” तुम्हारी नज़रों में मैं बस एक हाड़-माँस की औरत हूं इसलिए तुमने मेरा केवल शरीर ही देखा, दिल नहीं देख सके पर मेरी नज़रों में तुम मेरे बेटे जैसे हो। एक माँ बेटे की चोट को देख कैसे मुँह फेर सकती है ? “लड़का शर्म से पानी-पानी हो चुका था। उसके अंदर का गन्दा पुरुष विलुप्त होकर अब बेटा बन माँ के साथ चल पड़ा था।
BBC के नाम पर तानाशाही और अघोषित आपातकाल की नौटंकी करने वाले कांगियो को अपने मालकिन के बारे जरूर जानना चाहिए
आपातकाल लगने के बाद इंदिरा गांधी के निशाने पर जयपुर और ग्वालियर की महारानियाँ थीं. संसद में न सिर्फ़ वो विपक्ष की प्रमुख नेताओं में से एक थीं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र के आम लोगों के बीच लोकप्रिय भी थीं.
उनकी राजनीतिक साख़ कम करने के लिए उन्हें राजनीतिक विरोधी के तौर पर नहीं बल्कि आर्थिक अपराधी के तौर पर गिरफ़्तार किया गया था.
राजमाता गायत्री देवी को परेशान करने का सिलसिला आपातकाल की घोषणा से पहले ही शुरू हो चुका था और जयपुर राजघराने के हर घर, महल और दफ़्तर पर आयकर के छापे पड़ने शुरू हो गए थे.
आपातकाल घोषित होने के समय गायत्री देवी की आयु 56 साल थी और उनका मुंबई में इलाज चल रहा था.
जब वो 30 जुलाई, 1975 की रात को अपने दिल्ली के घर पहुंचीं तो पुलिस ने उन्हें विदेशी विनिमय और स्मगलिंग विरोधी कानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया.
उनके साथ उनके बेटे कर्नल भवानी सिंह को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
उन पर आरोप लगाया गया कि उनके पास विदेश यात्रा से बचे कुछ डॉलर्स हैं जिनका हिसाब उन्होंने सरकार को नहीं दिया है.
दोनों को दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया गया.
वहाँ ले जाने से पहले उन्हें स्थानीय पुलिस स्टेशन ले जाया गया.
गायत्री देवी अपनी आत्मकथा ‘अ प्रिंसेस रिमेंबर्स’ में लिखती हैं, “पुलिस स्टेशन पर हर किसी ने भवानी सिंह को पहचान लिया. वो राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड रह चुके थे और उन्हें 1971 की लड़ाई में वीरता के लिए महावीर चक्र मिला था.”
उस समय दिल्ली की सारी जेलें उसी तरह भरी हुई थीं जैसे पीक टूरिस्ट सीज़न में होटल भर जाया करते हैं. तिहाड़ जेल के अधीक्षक ने पुलिस अफसर से कुछ समय माँगा ताकि वहाँ हमारे रहने का इंतेज़ाम किया जा सके.”
“तीन घंटे बाद जब हम तिहाड़ पहुंचे तो उसने हमारे लिए चाय मंगवाई और हमारे घर फ़ोन कर हमारे बिस्तर मंगवा लिए.”
जॉन ज़ुब्रज़िकी राजमाता की जीवनी ‘द हाउज़ ऑफ़ जयपुर’ में लिखते हैं, “भवानी सिंह को जेल में बाथरूम वाले कमरे में रखा गया जबकि गायत्री देवी को एक बदबूदार कमरा दिया गया था जिसमें एक नल तो लगा था लेकिन उसमें पानी नहीं आता था. महारानी के कमरे में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता श्रीलता स्वामिनाथन को भी रखा गया था.”
कमरे में सिर्फ़ एक पलंग था जिसे श्रीलता ने महारानी को दे दिया था और वो खुद ज़मीन पर दरी पर सोती थीं. महारानी के रसूख की वजह से उन्हें रोज़ एक सेंसर किया हुआ समाचारपत्र और सुबह की चाय दी जाती थी. शाम को उन्हें अपने बेटे भवानी सिंह के साथ टहलने की इजाज़त थी.
एक कैदी लैला बेगम को उनकी सेवा में लगाया गया था जो उनका कमरा साफ़ करती थी.
15 नवंबर, 1977 को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे इंटरव्यू ‘राजमाता नरेट्स टेल्स ऑफ़ वेंडेटा’ में गायत्री देवी ने कहा था, “पहली रात मैं सो नहीं पाई. मेरी कोठरी के बाहर एक नाला था जिसमें कैदी मल त्याग करते थे. कमरे में कोई पंखा नहीं था और मच्छरों को हमारे ख़ून से कुछ ज़्यादा ही प्यार हो गया था.”
“जेल का सारा माहौल मछली बाज़ार जैसा था जहाँ चोर उचक्के और यौनकर्मी एक-दूसरे पर चिल्लाते रहते थे. हमें सी क्लास की श्रेणी दी गई थी
पढ़ने और कढ़ाई करने से आँखें ख़राब हुईं
तिहाड़ में रहने के दौरान महारानी गायत्री देवी के बेटे जगत उन्हें इंग्लैंड से वोग और टैटलर पत्रिका के ताज़ा अंक भेजा करते थे.
उनसे हफ़्ते में दो बार मिलने आने वाले लोग जेल में उनके लिए एक ट्राँजिस्टर रेडियो पहुंचा पाने में सफल हो गए थे.
महारानी इस ट्राँजिस्टर से बीबीसी के समाचार सुना करती थीं.
कूमी कपूर अपनी किताब ‘द इमरजेंसी अ पर्सनल हिस्ट्री’ में पत्रकार वीरेंद्र कपूर को बताती हैं, “गायत्री जेल में रह रही दूसरी महिलाओं से दूरी बनाकर रखती थीं. वो कभी-कभी उन पर मुस्कुराती थीं, कभी-कभी उनसे बातचीत भी कर लेती थीं लेकिन उनसे कभी घुलती-मिलती नहीं थीं.
एक महीने बाद तिहाड़ जेल के अधिकारियों ने गायत्री देवी को बताया कि ग्वालियर की राजमाता विजयराजे सिंधिया को भी वहाँ लाया जा रहा है और उनको उनके कमरे में ही रखा जाएगा.
राजमाता ने उसका ये कहते हुए विरोध किया कि अगर उनके कमरे में एक और पलंग लगाया गया तो वहाँ खड़े रहने की भी जगह नहीं बचेगी.
गायत्री देवी अपनी आत्मकथा ‘द प्रिंसेज़ रिमेंबर्स’ में लिखती हैं, “मुझे योगा करने के लिए अपने कमरे में थोड़ी जगह चाहिए थी और मुझे रात में पढ़ने और संगीत सुनने की भी आदत थी. हम दोनों की आदतें भी अलग-अलग थीं. वो अपना अधिक्तर समय पूजा-पाठ में बिताती थीं.”
“बहरहाल जेल सुपरिटेंडेंट ने मेरा अनुरोध स्वीकार कर लिया और राजमाता के लिए दूसरे कमरे की व्यवस्था की गई लेकिन चूँकि सितंबर की उमस भरी गर्मी थी, राजमाता ने मुझसे पूछा क्या वो मेरे कमरे से लगे बरामदे में सो सकती हैं? मैंने एक पर्दा लगवा कर अपने बरामदे में उनके लिए पलंग बिछवाई.”
3 सितंबर, 1975 के ग्वालियर की राजमाता विजयराजे सिंधिया को तिहाड़ जेल लाया गया.
उन पर भी आर्थिक अपराध की धारा लगाई गई. उनके सारे बैंक खाते सील कर दिए गए. एक समय नौबत यहाँ तक आ गई कि उन्हें अपनी संपत्ति बेचकर या दोस्तों से उधार लेकर अपना ख़र्च चलाना पड़ा. दोस्तों से उधार लेना भी इतना आसान नहीं था, क्योंकि जो भी इमरजेंसी पीड़ित की मदद करता, उसके ऊपर प्रशासन का कहर टूट पड़ता.
सिंधिया अपनी आत्मकथा ‘प्रिंसेज़’ में लिखती हैं, “तिहाड़ में मैं क़ैदी नंबर 2265 थी. जब मैं तिहाड़ पहुंची तो वहाँ जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने मेरा स्वागत किया. हम दोनों ने सिर झुकाकर और हाथ जोड़ कर एक दूसरे का अभिवादन किया.”
उन्होंने चिंतित होकर मुझसे पूछा, “आप यहाँ कैसे पहुंच गईं? ये बड़ी ही ख़राब जगह है. मेरे कमरे के साथ लगे बाथरूम में कोई नल नहीं था. टॉयलेट के नाम पर सिर्फ़ एक गड्ढा बना हुआ था. जेल का सफ़ाईकर्मी दिन में दो बार पानी की बाल्टी लेकर आता था और गड्ढे में पानी डालकर उसे साफ़ करने की कोशिश करता था.”
विजयराजे सिंधिया आगे लिखती है, “गायत्री देवी और मैं पूर्व महारानियाँ भले ही रही हों लेकिन तिहाड़ जेल की अपनी रानी एक कैदी थी जिसके खिलाफ़ 27 मुक़दमें चल रहे थे, जिसमें से चार हत्या के थे. वो अपने ब्लाउज़ में एक ब्लेड लेकर चलती थी और धमकी दिया करती थी कि जो भी उसके रास्ते में आएगा वो ब्लेड से उसका चेहरा बिगाड़ देगी. उसके पास गंदी गालियों का अच्छा भंडार था जिसे वो बिना झिझक इस्तेमाल करती थी.”
गायत्री देवी को वहाँ आए दो महीने बीत चुके थे, इसलिए हर सप्ताह उनसे मिलने लोग आ सकते थे. उनके ज़रिए गायत्री देवी जेल के अंदर बेडमिंटन रैकेट, एक फ़ुटबॉल और क्रिकेट के दो बल्ले और कुछ गेंदें मंगवाने में सफल हो गईं. इसके बाद उन्होंने जेल में रह रहे बच्चों को खेलना सिखाना शुरू कर दिया. लेकिन जेल में रहने की परिस्थितियाँ बहुत बुरी थीं.
विजयराजे ने लिखा था, “कमरे में हर समय बदबू फैली रहती थी. खाना खाते समय हम अपना एक हाथ भिनभिनाती हुई मक्खियों को दूर करने में इस्तेमाल करते थे. जब रात में मक्खियाँ सोने चली जाती थीं तो उनका स्थान मच्छर और दूसरे कीड़े मकोड़े ले लेते थे.”
“पहले महीने मुझे एक भी व्यक्ति से मिलने नहीं दिया गया. मेरी बेटियों को पता ही नहीं था कि मुझे किस जेल में रखा गया है. रात में मेरे कमरे में एक लाइट जलती थी जिसके बल्ब के ऊपर कोई शेड नहीं था.
इस बीच गायत्री देवी का दस किलो वज़न कम हो गया था और उन्हें लो ब्लड प्रेशर रहने लगा था.
कूमी कपूर अपनी किताब ‘द इमरजेंसी अ पर्सनल हिस्ट्री’ में लिखती हैं, “गायत्री देवी के मुँह में छाले हो गए थे. जेल प्रशासन ने उनके निजी दंतचिकित्सक को उन्हें देखने की इजाज़त नहीं दी. कई सप्ताह बाद जाकर उन्हें दिल्ली के मशहूर दंतचिकित्सक डॉक्टर बेरी के कर्ज़न रोड स्थित क्लीनिक में ऑपरेशन करवाने की अनुमति मिली.”
बाद में उन्हें जेल के डाक्टरों की सलाह पर दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वहाँ पहली बार पता चला कि गायत्री देवी के गॉल ब्लैडर में पथरी भी है. लेकिन उन्होंने अपने परिवारजनों के बिना अस्पताल में ऑपरेशन करवाने से इनकार कर दिया.
गायत्री देवी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “पंत अस्पताल में बिताई गई पहली रात बहुत डरावनी थी. मेरे कमरे में बड़े-बड़े चूहे घूम रहे थे. मेरे कमरे के बाहर तैनात संतरी उन्हें भगाने की कोशिश कर रहे थे. उनके बूटों की आवाज़ दूसरे मरीज़ों को सोने नहीं दे रही थी. अगले दिन डॉक्टर पद्मावती ने मुझे बाथरूम के साथ जुड़े एक साफ़ सुथरे कमरे में शिफ़्ट कर दिया.
“अगस्त, 1975 में गायत्री देवी और उनके बेटे भवानी सिंह ने स्वास्थ्य आधार पर सरकार से जेल से रिहा किए जाने का अनुरोध किया था. उस समय के वित्त मामलों के राज्य मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वो पत्र उन्हें रिहा करने की सिफ़ारिश के साथ इंदिरा गाँधी को भेज दिया था लेकिन प्रधानमंत्री ने गायत्री देवी और भवानी सिंह के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था.”
उधर लंदन में लॉर्ड माउंटबेटन ने ब्रिटेन की महारानी पर ज़ोर डालना शुरू कर दिया कि वो गायत्री देवी की रिहाई के लिए इंदिरा गाँधी को पत्र लिखें.
जॉन ज़ुब्रज़िकी गायत्री देवी की जीवनी में लिखते हैं, “दिल्ली स्थित ब्रिटिश उच्चायोग की राय थी कि ब्रिटिश राज परिवार को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये उनकी नज़र में भारत का आँतरिक मामला था. उनका मानना था कि अगर ऐसा प्रयास किया जाता है तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि इंदिरा गाँधी उसे मानेंगी.”
जयपुर की महारानी गायत्री देवी और महाराजा मान सिंह द्वितीय ब्रितानी महारानी एलिजाबेथ द्वितीय और उनके पति प्रिंस फिलिप के साथ
गायत्री देवी ने इंदिरा को लिखा पत्र
आख़िर गायत्री देवी के सब्र का बाँध टूट गया और उन्होंने अपनी रिहाई के लिए इंदिरा गाँधी को सीधे चिट्ठी लिख डाली.
उन्होंने लिखा, “अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष की समाप्ति के मौके पर अपने देश की बेहतरी के लिए मैं आपको और आपके कार्यक्रमों का समर्थन करने का आश्वासन देती हूँ.”
उन्होंने ये भी लिखा कि वो राजनीति से संन्यास ले रही हैं और चूँकि स्वतंत्र पार्टी वैसे भी समाप्त हो चुकी है और उनका किसी दूसरे दल की सदस्य बनने का इरादा नहीं है, इसलिए मुझे रिहा कर दिया जाए. अगर इसके लिए आपकी कोई और शर्त है तो मैं उसे भी मानने के लिए तैयार हूँ.
सरकार की पहली शर्त थी कि गायत्री देवी और उनके बेटे अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली याचिकाओं को वापस लें. उन्होंने इस शर्त को मानने में कोई देरी नहीं की. 11 जनवरी, 1976 को उनकी रिहाई के आदेश पर दस्तख़त हुए. उनकी बहन मेनका उनको अस्पताल से लेकर तिहाड़ जेल गईं जहाँ से उन्होंने अपना सामान उठाया. वहाँ उन्होंने कुल 156 रातें बिताईं थीं.”
“वहाँ उनके साथ रह रहे कैदियों और ग्वालियर की राजमाता ने उन्हें विदाई दी. वो दिल्ली में औरंगज़ेब रोड स्थित अपने निवास पर वापस आईं. दो दिन बाद वहाँ से वो कार से जयपुर गईं जहाँ सार्वजनिक जगह पर भीड़ जमा होने पर प्रतिबंध होने के बावजूद करीब 600 लोग उनके स्वागत में खड़े थे. उसके बाद वो बंबई गईं जहाँ उनका गॉल ब्लैडर में पथरी का आपरेशन हुआ.”
उधर विजयराजे सिंधिया की बेटी ऊषा बहुत मशक्कत के बाद इंदिरा गांधी से मिलने में सफल हो गईं.
जब उन्होंने अपनी माँ को रिहा करने का अनुरोध किया तो इंदिरा गाँधी ने कहा कि उनको राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि आर्थिक अपराधों के लिए गिरफ़्तार किया गया है.
जेल में रहने की परिस्थितियाँ बहुत ख़राब थीं. लेकिन जेल में उनके मनोरंजन की भी व्यवस्था रहती थी.
विजयराजे सिंधिया लिखती हैं, “एक दिन महिला कैदियों का एक समूह मेरे मनोरंजन के लिए गाने बजाने का कार्यक्रम लेकर आया. इसमें वो ताज़ा फ़िल्मों के गाने कोरस में गाती थीं और उसे ‘कैबरे’ कहती थीं. मैंने उन्हें सलाह दी कि अगर वो इसकी जगह भजन गाएं तो मुझे ज़्यादा अच्छा लगेगा. फिर वो मेरी फ़रमाइश पर भजन गाने लगीं. लेकिन उन्हें ये समझ नहीं आया कि कोई ‘कैबरे’ की जगह भजन को कैसे पसंद कर सकता है? बाद में वो मुझसे कहने लगीं, ‘ठीक है भजन पहले, लेकिन उसके बाद ‘कैबरे.”
कुछ दिनों बाद विजयराजे सिंधिया बीमार पड़ गईं और उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया.
सिंधिया लिखती हैं, “मुझे एक प्राइवेट रूम में रखा गया और बाहर एक संतरी बैठा दिया गया. किसी को मुझसे मिलने की इजाज़त नहीं थी. एक दिन देखती क्या हूँ कि एक आगंतुक ज़बरदस्ती मेरे कमरे में घुस गया.”
“वो कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख़ अब्दुल्ला थे जिनका खुद का एम्स में इलाज चल रहा था. ये एक विचित्र संयोग था. मुझे 12 साल पुरानी बात याद आ गई जब वो कैदी हुआ करते थे और मैं उन्हें देखने गई थी. एक सुबह मुझे बताया गया कि मेरे ख़राब स्वास्थ्य के कारण मुझे पेरोल पर छोड़ा जा रहा हैं.”
जब सिंधिया के बाहर निकलने का समय आया तो महिला कैदियों ने जेल के अंदरूनी गेट के दोनों ओर खड़े होकर उन पर फूल बरसाए. जब विजयराजे सिंधिया जेल के बाहर निकलीं तो उनकी तीनों बेटियाँ उनका इंतज़ार कर रही थीं. वो मुस्कुरा रही थीं लेकिन साथ ही उनकी आँखों में आँसू भी थे.

इस लेख को हर कोई ध्यान से पढ़िए … एक बार नही 10 बार पढिये …..!!
जब 2012 मे लीबिया मे गद्दाफी को मारा गया था तो ज्यादातर भारतीयों ने यही कहा होगा कि हमें इससे क्या? लेकिन ये ही चीजें हमें सीखनी चाहिए।
गद्दाफी निःसंदेह एक दुष्ट तानाशाह था यदि उसे इस वजह से मारा जाता तो ठीक था मगर बतौर तानाशाह उसने अमेरिकी डॉलर को चुनौती दी थी। उसके बाद अमेरिका की सूचना एजेंसियो ने गद्दाफी को घेर लिया।
लीबिया के आसपास जो गरीब देश है उनके उग्रवादियों को पैसा और हथियार देकर लीबिया मे घुसाया गया। अराजकता फैलाई गयी, गद्दाफी तो 1969 से शासन कर रहा था मगर अचानक 2010 से ही उस पर भ्रष्टाचार से जुडी खबरें अमेरिकी एजेंसी डालने लगी।
गद्दाफी थोड़ा बहुत अच्छे काम करने की कोशिश करता तो ना जाने कहाँ से कुछ लोग आकर काम बिगाड़ देते। इस तरह गद्दाफी के खिलाफ रोष व्याप्त हुआ और नतीजा सबने देखा कि जनता ने गद्दाफी को घसीट घसीट कर मार डाला।
भारत का केस अब इस दिशा मे करने का प्रयास था लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प का हमें ऋणी होना पड़ेगा कि उन्होंने खुद ही अपने देश को एक्सपोज करके रख दिया और भारत की संसद मे NDA के सांसदों ने राहुल गाँधी को जमकर घेरा।
दरसल आप एक ट्रेंड देखोगे कि भारत अमेरिका के संबंध बिल क्लिंटन के जाने के बाद सुधरने लगे। 2015 तक अमेरिका भारत के साथ न्यूट्रल रहा, लेकिन जैसे ही मेक इन इंडिया के तहत भारत ने पहली बार स्वदेशी ड्रोन बनाये तो भारत अमेरिका के निशाने पर आया।
जेएनयू के नारे तो बहुत छोटी घटना थे 2015 मे कई बार ऐसी हिंसा हुई कि मोदी सरकार बेकफुट पर आ गयी थी। स्टूडेंट्स, महिला आयोग, आदिवासी वर्ग, खालिस्तानी, दलित पार्टियां और तो और नेपाल जैसा पिद्दी देश भारत सरकार को घेरने लगे।
उसके बाद जैसे जैसे DRDO और रक्षा कंपनिया मजबूत होती गयी अमेरिका का शिकंजा कसता रहा। जब राहुल गाँधी ने अमेरिका यात्रा पर भारत विरोधी इलहान उमर से मुलाक़ात की तो ये इस षड्यंत्र का पीक था।
यदि भारतीय जनता को इलहान उमर के बारे मे ठीक से पता होता तो शायद वो राहुल गाँधी को दिल्ली एयरपोर्ट पर ही क्या क्या करती, शब्द नही मेरे पास । राहुल गाँधी अमेरिका गया, इलहान उमर से मिला और बयान दिया कि भारत मे सिखो पर अत्याचार होते है।
उस समय अमेरिका और कनाडा ने भारत को खालिस्तान के मुद्दे पर पहले ही घेरा हुआ था, जैसे ही राहुल गाँधी ने बयान दिया वैसे ही खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने उस बयान का स्वागत किया। मगर इस देश का दुर्भाग्य ये है कि आधी जनता के लिये ये नाम ही नए है तो षड्यंत्र कहाँ समझेंगे?
खैर कांग्रेस की हरियाणा और महाराष्ट्र मे धज्जिया उड़ा दी गयी तो अमेरिका का डीप स्टेट समझ गया कि घोड़े को हराने के लिये इन्होने गधे पर दाँव लगाया था। इसलिए अबकी बार इन्होने मोहरा बदला, दिसंबर मे ममता बनर्जी बोलने लगी कि विपक्ष की कमान मुझे दे दो।
ममता बनर्जी इतने पर ही नहीं रुकी वो बांग्लादेश से युद्ध के सुझाव देने लगी। यदि आप फ्रेंच और रुसी क्रांति पढोगे तो पता चलेगा कि जब राष्ट्र युद्ध मे उलझता है तो अंदर से तख्तापलट करना बहुत आसान होता है।
खैर ये समय वो था कि डीप स्टेट गिव अप कर चुका था क्योंकि ट्रम्प की वापसी होनी थी। हालांकि ट्रम्प तो पहले भी थे लेकिन अबकी बार ट्रम्प को जिन उद्योगपतियों ने समर्थन दिया वे उद्योगपति रक्षा उद्योग वाले नहीं थे।
उल्टे एलन मस्क और विवेक रामास्वामी जैसे लोग थे। डोनाल्ड ट्रम्प समझ चुके है कि डेमोक्रेटिक पार्टी को फंडिंग ये रक्षा क्षेत्र की कंपनीया करती है इनकी पकड़ अमेरिकी सरकार तक मे है।
ट्रम्प अमेरिका के इस इको सिस्टम को बदलना चाहते है इसलिये नहीं कि वे अच्छे है बल्कि इसलिए ताकि डेमोक्रेटिक पार्टी कमजोर हो जाए। ये अमेरिका की आंतरिक लड़ाई है और फायदा हमें हुआ।
इसी एक्सपोज़ करने की प्रक्रिया मे पता चला कि अमेरिका भारत को भी अस्थायी करना चाहता था। लेकिन भारत के लिये मोदीजी की अप्रूवल रेटिंग वरदान बनी जो कि 78% है। जनता के सामने सेना खड़ी होंगी तो तख्तापलट होगा मगर जनता के सामने ज़ब जनता ही आ जायेगी तो तख्तापलट करने वाले मारे जाएंगे।
इसलिए भारत मे गृहयुद्ध नहीं हो सका और हम लीबिया बनने से दो इंच से बच गए। मोदीजी के लिये आवश्यक है कि कांग्रेस मजबूत बनी रहे क्योंकि कांग्रेस अब अप्रासंगिक हो चुकी है। दिखाने के लिये विपक्ष भी रहेगा जो कुछ उखाड़ नहीं पायेगा।
विपक्ष मे कांग्रेस मतलब खंडहर किला जहाँ लोग दीवारों पर नाम लिखने तो जाएंगे मगर कोई उसे घर नहीं बनायेगा। इसलिए राहुल गाँधी पर कोई कार्रवाई ना हो तो ही फायदा है। लेकिन भारत की जनता को सबक लेना चाहिए कि ऐसा भी होता है।