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प्रेरक गाथा


राजा उतान्पाद ब्रह्मा जी के पुत्र मनु के पुत्र थे | उनका विवाह एक बहुत ही सुंदर कन्या से हुआ था जिनका नाम सुनीति था | राजा अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी इसलिए रानी ने राजा को दूसरा विवाह करने कहा | राजा अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे इसलिए उन्होंने मना कर दिया और कहा कि दूसरी पत्नी के आने से तुम्हारा स्थान कम हो जायेगा जिस पर सुनीति ने कहा मुझे आप पर विश्वास हैं ऐसा नहीं होगा | राजा को सुनीति की हठ माननी पड़ी और उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया | उनकी दूसरी पत्नी का नाम सुरुचि था | विवाह के बाद जब सुरुचि महल आई | तब उसे राजा की पहली पत्नी के बारे में पता चला | यह जानने के बाद सुरुचि ने उत्तानपाद से कहा – जब तक आपकी पहली पत्नी वन प्रस्थान नहीं करेगी वो महल में प्रवेश नहीं करेगी |यह सुनकर सुनीति स्वयम ही राज महल त्याग कर वन में रहने चली गई |

कुछ समय बाद, राजा शिकार के लिए वन में जाते हैं और घायल हो जाते हैं | यह बात जब सुनीति को पता चलती हैं तो वो राजा को अपनी कुटिया में लाकर उनका उपचार करती हैं | राजा कई दिनों तक अपनी पहली पत्नी के साथ रहते हैं | उस दौरान सुनीति गर्भवती हो जाती हैं |और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती हैं जिसका नाम ध्रुव रखा जाता हैं |जिसके बारे में राजा को ज्ञात नहीं रहता |
कुछ दिनों, बाद राजा अपने महल चले जाते हैं | वहाँ भी रानी सुरुचि को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती हैं जिसका नाम उत्तम रखा जाता हैं |
कुछ समय बाद राजा उत्तानपाद को ध्रुव के बारे में पता चलता हैं वो रानी सुनीति को महल में आने का आगृह करते हैं लेकिन वो नहीं आती | ध्रुव को कभी कभी महल भेज दिया करती | यह सब देख रानी सुरुचि को ध्रुव से घृणा होने लगते हैं | एक दिन ध्रुव अपने पिता उत्तानपाद की गोद में बैठता हैं | यह देख रानी सुरुचि को क्रोध आ जाता हैं और वो उसे धक्का देकर अपशब्द कहती हैं और उसे छोड़ी हुई स्त्री का पुत्र कहकर अपमानित करती हैं |
नन्हा ध्रुव कुटिया में आकर माँ को पूरा घटनाक्रम सुनाता हैं |तब माता सुनीति उसे समझाती हैं | बेटा अगर कोई बुरा कहे तो उसके बदले में उसे बुरा मत कहो | इससे तुम्हे ही हानि होगी | अगर तुम अपने पिता की गोद में सह सम्मान बैठना चाहते हो तो भगवान विष्णु की उपासना करो वो जगत पिता हैं | अगर बैठना हैं तो उनकी गोद में बैठो |
बालक ध्रुव के मन में यह बात बैठ जाती हैं | और वह यही भाव लिए यमुना तट पर नहाने जाता हैं | वहाँ उसकी मनोदशा जानकर नारद मुनि आते हैं और वो ध्रुव को भगवान की भक्ति की विधि बताते हैं जिसे जानने के बाद ध्रुव कठोर तपस्या में लीन हो जाता हैं | कई महीनो तक खड़े होकर तपस्या करता हैं | कभी जल में तपस्या करता हैं तो कभी एक ऊँगली पर खड़े रहकर | निरंतर ॐ नमो वासुदेवाय का जाप पुरे ब्रह्माण में गूंजने लगता हैं | नन्हे से बालक की इस घौर तपस्या को देख भगवान् उसे दर्शन देते हैं |बालक ध्रुव भाव विभौर हो उठता हैं और कहता हैं मुझे माता, पिता की गोद में बैठने नहीं देती | मेरी माँ कहती हैं कि आप इस श्रृष्टि के पिता हैं | अतः मुझे आपकी गोद में बैठना हैं | भगवान उसकी इच्छा पूरी करते हैं और उसे तारा बनने का आशीर्वाद देते हैं जो कि सप्त ऋषियों से भी ज्यादा श्रेष्ठ होगा | उस दिन से आज तक आसमान में उत्तर दिशा की और ध्रुव तारा चमक रहा हैं |

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सर्वस्व दान की महानता




एक पुराना मन्दिर था| दरारें पड़ी थीं| खूब जोर से वर्षा हुई और हवा चली| मन्दिर का बहुत-सा भाग लड़खड़ा कर गिर पड़ा| उस दिन एक साधु वर्षा में उस मन्दिर में आकर ठहरे थे| भाग्य से वे जहाँ बैठे थे, उधर का कोना बच गया| साधु को चोट नहीं लगी| 🛕

साधु ने सबेरे पास के बाजार में चंदा करना प्रारम्भ किया| उन्होंने सोचा ‘मेरे रहते भगवान् का मन्दिर गिरा है तो इसे बनवाकर तब मुझे कहीं जाना चाहिये|’ 🤔

बाजार वालों में श्रद्धा थी | साधु विद्वान थे | उन्होंने घर-घर जाकर चंदा एकत्र किया| मन्दिर बन गया | भगवान् की मूर्ति की बड़े भारी उत्सव के साथ पूजा हुई| भण्डारा हुआ सबने आनन्द से भगवान् का प्रसाद लिया |

भण्डारे के दिन शाम को सभा हुई| साधु बाबा दान दाताओं को धन्यवाद देने के लिये खड़े हुए| उनके हाथ में एक कागज था जिसमें लम्बी सूची थी | 📋

उन्होंने कहा ‘सबसे बड़ा दान एक बुढ़िया माता ने दिया है| वे स्वयं आकर दे गयी थीं|’ लोगों ने सोचा कि अवश्य किसी बुढ़िया ने सौ-दो-सौ रुपये दिये होंगे | कई लोगों ने सौ रुपये दिये थे लेकिन सबको बड़ा आश्चर्य हुआ | जब बाबा ने कहा ‘उन्होंने मुझे चार आने पैसे और थोड़ा सा आटा दिया है |’ लोगों ने समझा कि साधु हँसी-ठिठोली कर रहे हैं | 😊

साधु ने आगे कहा ‘वे लोगों के घर आटा पीसकर अपना काम चलाती हैं | ये पैसे कई महीने में वे एकत्र कर पायी थीं | यही उनकी सारी पूँजी थी| मैं सर्वस्व दान करने वाली उन श्रद्धालु माता जी को प्रणाम करता हूँ | ’ 🙏

लोगों ने मस्तक झुका लिये सचमुच बुढ़िया माता का मन से दिया हुआ यह सर्वस्व दान ही सबसे बड़ा था | 👌👌

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भक्त का अड़िग विश्वास




एक बार कबीर जी ने साहूकार से एक सौ रूपये लिए और साधू संतों पर खर्च कर दिए…और इकरार किया कि कुछ महीने के बाद सूद समेत दूँगा।

महीने निकल गए। पर पैसे नही दिए। वह साहूकार भी बड़ा बे-दर्द था उसने काजी की कचहरी में अर्जी दे दी और डिगरी करवाकर कुर्की ले ली।

कबीर जी के एक प्रेमी ने आकर बताया तो वह बड़े परेशान हुए।

उन्होंने अपनी पत्नी लोई जी से कहा कि घर का सारा सामान पड़ौसियों के यहाँ पर रख दो। जिससे साहूकार उनको कुर्क ना करा सके।

और मैं चार दिन इधर-उधर चला जाता हूँ जब रूपये होगें तो साहूकार को देकर उससे देरी के लिए क्षमा माँग लूँगा।

लोई जी ने कहा – स्वामी! मुझे निश्चय है कि राम जी अपने भक्त की कभी कुर्की नहीं होने देंगे। आपको कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है।

कबीर जी ने अपनी पत्नी का निश्चय देखा, फिर भी कहा – लोई! फिर भी मुझे कुछ दिन कहीं पर बिताने चाहिए।

लोई जी – स्वामी जी! इसकी कोई जरूरत नहीं है। इस काम को राम जी अपने आप ही सवारेंगे। लोई जी ने निश्चय के साथ कहा।

कबीर जी मुस्कराकर बोले – प्यारी लोई! यही तो तेरा गुरू रूप है।

लोई जी ने कहा – स्वामी जी! गुरू बोलकर मेरे सिर पर भार ना चढ़ाओ।

कबीर जी – लोई जी! इसमें भला सिर पर भार चढ़ाने वाली कौन सी बात है। जो उपदेश दे, उसको गुरू मानना ही पड़ेगा।

कबीर जी अपनी पत्नी के साथ बात करने में इतने मग्न हो गये कि वह साहूकार और कुर्की वाली बात ही भूल गये। रात हो गई परन्तु साहूकार नहीं आया।

सोने से पहले कबीर जी ने फिर कहा – लोई! ऐसा लगता है कि साहूकार सबेरे पिआदे लेकर कूर्की करने आएगा।

लोई जी ने दृढ़ता के साथ कहा – स्वामी जी! जी नहीं, बिल्कुल नहीं, कतई नहीं, कोई कूर्की नहीं होगी। परमात्मा जी उसे हमारे घर पर आने ही नहीं देंगे।

कबीर जी – लोई! तूने मेरे रामजी से कुछ ज्यादा ही काम लेना शुरू कर दिया है।

लोई जी – स्वामी! जब हम उनके बन गए हैं तो हमारे काम वह नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

तभी अचानक किसी ने दरवाजा खटखटाया। लोई जी ने उठकर दरवाजा खोला तो सामने साहूकार का मूँशी खड़ा हुआ था, जो साहूकार की तरफ से तकाजा करने जाया करता था।

लोई जी ने मूँशी से पूछा – क्यों राम जी के भक्त! हमारी कुर्की करने आए हो?

मूँशी नम्रता से कहा – जी नहीं, माता जी! आपकी कुर्की करने कोई नहीं आएगा।

क्योंकि जब हम कल कचहरी से कुर्की लेने गए तो वहाँ पर एक सुन्दर मुखड़े वाला और रेश्मी वस्त्र धारण करने वाला सेठ आया हुआ था। उसने हमसे पूछा कि कबीर जी से आपको कितने रुपये लेने हैं।

साहूकार ने कहा कि 100 रूपये और सूद के 30 रूपये।

उस सुंदर मुखड़े वाले सेठ ने एक थैली साहूकार के हवाले कर दी और कहने लगा कि इसमें पाँच सौ रूपये हैं। यह कबीर जी के हैं और हमारे पास सालों से अमानत के तौर पर पड़े हुए हैं।

जितने तुम्हारे हैं आप ले लो और बाकी के कबीर जी के घर पर पहुँचा दो।

साहूकार जी उनसे और बातचीत करना चाह रहे थे, परन्तु वह पता नहीं एकदम से कहाँ चले गये जैसे छूमँतर हो गए हों।

यह कौतुक देखकर साहूकार पर बहुत प्रभाव पड़ा। वह समझ गया कि कबीर जी कोई ईश्वर बन्दे हैं और वह उनकी कुर्की करके गुनाह के भागी बनने जा रहे थे।

साहूकार जी ने यह थैली आपके पास भेजी है, इसमें पूरे पाँच सौ रूपये हैं।

साहूकार जी ने कहा है कि कबीर जी उनके रूपये भी धर्म के काम में लगा दें और उनका यह पाप बक्श दें।

लोई जी ने कबीर जी से कहा – स्वामी! राम जी की भेजी हुई यह माया की थैली अन्दर उठाकर रखो।

कबीर जी मुस्कराकर बोले – कि लोई जी! इस बार राम जी ने तेरे निश्चय अनुसार कार्य किया है। इसलिए थैली तुझे ही उठानी पड़ेगी।

लोई जी – नहीं स्वामी! राम जी हमारे दोनों के साँझें हैं। इसलिए आओं मिलकर उठाएँ।

दोनों पति-पत्नी अपने राम का गुणगान करते हुये थैली उठाकर अन्दर ले गए।

उसी दिन कबीर जी के घर पर एक बहुत बड़ा भण्डारा हुआ। जिसमें वह सारी रकम खर्च कर दी गई…!!

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जीवन का अनुभव



यह एक प्रसिद्ध एलोपैथी चिकित्सक 70 वर्षीय ईएनटी विशेषज्ञ का अनुभव है।
आइए सुनते हैं अनुठा अनुभव..👉

एक सुबह वे अचानक उठे। उन्हें मुत्रत्याग करने की जरूरत थी, लेकिन वे कर नहीं सके (कुछ लोगों को 55 वर्ष के बाद की उम्र में कभी-कभी यह समस्या होती है)। उन्होंने बार-बार कोशिश की, लेकिन लगातार कोशिश नाकाम रही। तब उन्होंने महसूस किया कि एक समस्या खड़ी हो गयी है।

एक डॉक्टर होने के नाते, वे ऐसी शारीरिक समस्याओं से अछूते नहीं थे; उनका निचला पेट भारी हो गया। बैठना या खड़े रहना दुस्वार होने लगा, तल-पेट में दबाव बढ़ने लगा ।

तब उन्होंने एक जाने-माने यूरोलॉजिस्ट को फोन पर बुलाया और स्थिति के बारे में बताया। मूत्र-रोग विशेषज्ञ ने उत्तर दिया: “मैं इस समय एक बाहरी क्षेत्र के अस्पताल में हूँ, और आपके क्षेत्र के क्लिनिक में दो घंटे में पहुँच पाऊँगा। क्या आप इतने लंबे समय तक इसका सामना कर सकते हैं?”
उन्होंने उत्तर दिया: “मैं कोशिश करूँगा।”
उसी समय, उन्हें बचपन की एक अन्य एलोपैथिक महिला-डॉक्टर का ध्यान आया। बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपनी दोस्त-डाक्टर को स्थिति के बारे में बताया।
उस सहेली ने उत्तर दिया:- “ओह, आपका मूत्राशय भर गया है। और कोशिश करने पर भी आप मुत्रत्याग कर नहीं पा रहे… चिंता न करें। जैसा मैं बता रही हूं, वैसा ही करें। आप इस समस्या से छुटकारा पा जाएंगे।”
और उसने निर्देश दिया:-
“सीधे खड़े हो जाइये, और जोर से बार-बार कूदिये। कूदते समय दोनों हाथों को ऊपर यूॅ उठाए रखें, मानो आप किसी पेड़ से आम तोड़ रहे हों। ऐसा 10 से 15 बार करें।”
बूढ़े डॉक्टर ने सोचा: “क्या? सचमुच मैं इस स्थिति में कूद पाऊंगा? इलाज थोड़ा संदिग्ध लग रहा था। फिर भी डॉक्टर ने कोशिश की…
3 से 4 बार छलांग लगाने पर ही उन्हें पेशाब की तलब लगी और उन्हें राहत मिल गयी।
उन्होंने इतनी सरल विधि से समस्या को हल करने के लिए अपनी मित्र डॉक्टर को सहर्ष धन्यवाद दिया।
अन्यथा, उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता, मूत्राशय की जाॅंच, इंजेक्शन, एंटीबायोटिक्स आदि के साथ साथ कैथेटर डालना होता… उनके और करीबी लोगों के लिए मानसिक तनाव के साथ लाखों का बिल भी होता।

कृपया वरिष्ठ नागरिकों के साथ साझा करें। इस असहनीय अनुभव वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक बहुत ही सरल उपाय है….

सभी वरिष्ठ नागरिक (55 से ऊपर की उम्र के) कृपया अवश्य पढ़े, हो सकता है आपके लिए फायदेमंद हो ..

आप जानते हैं कि मन चाहे कितना ही जोशीला हो पर साठ की उम्र पार होने पर यदि आप अपनेआप को फुर्तीला और ताकतवर समझते हों तो यह गलत है। वास्तव में ढलती उम्र के साथ शरीर उतना ताकतवर और फुर्तीला नहीं रह जाता।

आपका शरीर ढलान पर होता है, जिससे ‘हड्डियां व जोड़ कमजोर होते हैं, पर कभी-कभी मन भ्रम बनाए रखता है कि ‘ये काम तो मैं चुटकी में कर लूँगा’। पर बहुत जल्दी सच्चाई सामने आ जाती है मगर एक नुकसान के साथ।

सीनियर सिटिजन होने पर जिन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, ऐसी कुछ टिप्स दे रहा हूं।

धोखा तभी होता है जब मन सोचता है कि ‘कर लूंगा’ और शरीर करने से ‘चूक’ जाता है। परिणाम एक एक्सीडेंट और शारीरिक क्षति!
ये क्षति फ्रैक्चर से लेकर ‘हेड इंज्यूरी’ तक हो सकती है। यानी कभी-कभी जानलेवा भी हो जाती है।

इसलिए जिन्हें भी हमेशा हड़बड़ी में काम करने की आदत हो, बेहतर होगा कि वे अपनी आदतें बदल डालें।

भ्रम न पालें, सावधानी बरतें क्योंकि अब आप पहले की तरह फुर्तीले नहीं रहे।

छोटी सी चूक कभी बड़े नुक़सान का कारण बन जाती है।

सुबह नींद खुलते ही तुरंत बिस्तर छोड़ खड़े न हों, क्योंकि आँखें तो खुल जाती हैं मगर शरीर व नसों का रक्त प्रवाह पूर्ण चेतन्य अवस्था में नहीं हो पाता ।

अतः पहले बिस्तर पर कुछ मिनट बैठे रहें और पूरी तरह चैतन्य हो लें। कोशिश करें कि बैठे-बैठे ही स्लीपर/चप्पलें पैर में डाल लें और खड़े होने पर मेज या किसी सहारे को पकड़कर ही खड़े हों। अक्सर यही समय होता है डगमगाकर गिर जाने का।

— गिरने की सबसे ज्यादा घटनाएं बाथरुम/वॉशरुम या टॉयलेट में ही होती हैं। आप चाहे अकेले हों, पति/पत्नी के साथ या संयुक्त परिवार में रहते हों लेकिन बाथरुम में अकेले ही होते हैं।

यदि आप घर में अकेले रहते हों, तो और अधिक सावधानी बरतें क्योंकि गिरने पर यदि उठ न सके तो दरवाजा तोड़कर ही आप तक सहायता पहुँच सकेगी, वह भी तब जब आप पड़ोसी तक समय से सूचना पहुँचाने में सफल हो सकेंगे।
याद रखें बाथरुम में भी मोबाइल साथ हो ताकि वक्त जरुरत काम आ सके।

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जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो मिलेगा कल !




एक गाँव के एक जमींदार ठाकुर बहुत वर्षों से बीमार थे। इलाज करवाते हुए कोई डॉक्टर कोई वैद्य नहीं छोड़ा कोई टोने टोटके करने वाला नहीं छोड़ा।

लेकिन कहीं से भी थोड़ा सा भी आराम नहीं आया !

एक संत जी गाँव में आये उनके दर्शन करने वो ज़मींदार भी वहाँ गया और उन्हें प्रणाम किया
उसने बहुत दुखी मन से कहा – महात्मा जी मैं इस गाँव का जमींदार हूँ का सैंकड़ों बीघे जमीन है इतना सब कुछ होने के बावजूद मुझे एक लाइलाज रोग है जो कहीं से भी ठीक नहीं हो रहा !

महात्मा जी ने पूछा भाई, क्या रोग है आपको
जी मुझे मल त्याग करते समय बहुत खून आता है और इतनी जलन होती है जो बर्दाश्त नहीं होती।

ऐसा लगता है मेरे प्राण ही निकल जायेंगे।
आप कुछ मेहरबानी करो महात्मा जी बाबा ने आँख बंद कर ली शांत बैठ गये थोड़ी देर बाद बोले -बुरा तो नहीं मानोगे एक बात पूछूँ ? नहीं महाराज पूछिये !

तुमने कभी किसी का दिल इतना ज़्यादा तो नहीं दुखाया कि उसने तुम्हें जी भरके बद्दुआऐं दी हों जिसका दण्ड आज तुम भोग रहे हो ?

तुम्हारे दुःख देने से वो इतना अधिक दुखी हुआ हो जिसके कारण आज तुम इतनी पीड़ा झेल रहे हो ? नहीं बाबा !

जहाँ तक मुझे याद है, मैंने तो कभी किसी का दिल नहीं दुखाया।

याद करो और सोचो कभी किसी का हक तो नहीं छीना, किसी की पीठ में छुरा तो नहीं मारा किसी की रोज़ी रोटी तो नहीं छीनी ? किसी का हिस्सा ज़बरदस्ती, तुमने खुद तो नहीं संभाला हुआ ?

महात्मा जी की बात पूरी होने पर वो ख़ामोश और शर्मसार हो कर बोला।

जी मेरी एक विधवा भाभी है जो कि इस वक्त अपने मायके में रहती है वो जमीन में से अपना हिस्सा मांगती थी।

यह सोचकर मैंने उसे कुछ भी नहीं दिया कि कल को ये सब कुछ अपने भाईयों को ही दे देगी इसका क्या पता ?

बाबा ने कहा -आज से ही उसे हर महीने सौ रूपए भेजने शुरू करो ! यह उस समय की बात है जब सौ रूपए में पूरा परिवार पल जाता था !

उसने कुछ रूपए भेजना शुरू कर दिया ! दो तीन हफ़्तों के बाद उसने बाबा से आकर कहा – जी मै पचहत्तर प्रतिशत ठीक हूँ !
महात्मा जी ने सोचा कि इसे तो पूरा ठीक होना चाहिये था ऐसा क्यों नहीं हुआ ?
उससे पूछा तुम कितने रूपए भेजते हो ?
जी पचहत्तर रूपए हर महीने भेजता हूँ
इसी कारण तेरा रोग पूरा ठीक नहीं हुआ !
सन्त जी ने कहा उसका पूरा हक उसे इज़्जत से बुला कर दे दो, वो अपने पैसे को जैसे मर्जी खर्च करे, अपनी ज़मीन जिसे चाहे दे दे । यह उसकी मिल्कीयत है इसमें तुम्हारा कोई दख़ल नहीं है !
जानते हो वो कितना रोती रही है, जलती रही है तभी आपको इतनी जलन हो रही है

ज़रा सोचो, मरने के बाद हमारे साथ क्या जायेगा ?

ज़मींदार को बहुत पछतावा हुआ उसने फौरन ही अपनी विधवा भाभी और उसके भाईयों को बुलाकर, सारे गाँव के सामने, उसकी ज़मीन, उसके हक का पैसा उसे दे दिया और हाथ जोड़कर अपने ज़ुल्मों की माफी माँगी।
उसकी भाभी ने उसे माफ कर दिया और उसके परिवार को खूब आशीर्वाद दिये

जमींदार का रोग शीघ्र ही पूरी तरह से ठीक हो गया !

अगर आपको भी ऐसा कोई असाध्य रोग है तो ज़रूर सोचना* *कहीँ मैंने किसी का हक तो नहीं छीना है ?

किसी की पीठ में छुरा तो नहीं घोंपा है ? किसी का इतना दिल तो नहीं दुखाया हुआ कि वो बेचारा इतना बेबस था कि तुम्हारे सामने कुछ कहने की हिम्मत भी ना कर सका होगा ?
लेकिन उस बेचारे के दिल से आहें निकली होंगी जो आपके अंदर रोग पैदा कर रही है जलन पैदा कर रही हैं।

याद रखो, परमात्मा की लाठी बिल्कुल बे आवाज़ है।

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धन्यवाद शक्ति: एक अद्भुत प्रार्थना की कहानी



एक बार की बात है, एक महान जादूगर जीवन के अंतिम क्षणों में अपने बेटे को बुलाता है। वह अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और कहता है, “जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएं, मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ। उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लगेंगे।” और फिर उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना फुसफुसाई और हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गया।

सिक्कों से भरा थैला पाकर बेटा आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया। वह थैला इतना बड़ा था कि उसे खर्च करने में कई साल बीत गए। परंतु समय बीतते-बीतते, वह प्रार्थना भूल गया। जब थैला खत्म होने को आया, तो उसे याद आया कि उसके पिता ने उसे कुछ महत्वपूर्ण बताया था। उसने बहुत याद किया, पर उसे प्रार्थना याद नहीं आई।

वह मदद के लिए लोगों के पास गया। उसने अपने पड़ोसी से पूछा, “क्या तुम किसी चार शब्दों की प्रार्थना जानते हो?” पड़ोसी ने उत्तर दिया, “हाँ, ‘ईश्वर मेरी मदद करो’।” लेकिन इससे कुछ नहीं हुआ। फिर उसने एक फादर से पूछा, “ईश्वर तुम महान हो” प्रार्थना भी की, लेकिन थैला नहीं भरा।

उदास होकर घर लौट आया। अचानक एक भिखारी दरवाजे पर आया और खाने की मांग की। बेटे ने अपना बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया। भिखारी ने खाना खाकर बर्तन लौटाते समय प्रार्थना की, “हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद।”

यह सुनकर बेटा चौंक गया। यही वह चार शब्द थे! उसने प्रार्थना दोहराई, “हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद।” और उसके सिक्के फिर से बढ़ने लगे। उसने समझा कि किसी की मदद करने और धन्यवाद देने की शक्ति कितनी अद्भुत होती है।

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દિલ્હીના પરિણામોનું અદ્ભુત વિશ્લેષણ
ડૉ. ગોવિંદરાજ શેનોય

કેજરીવાલની હાર વિરુદ્ધ મોદીની જીત

કેજરીવાલની હાર 2024ની મોદીની જીત કરતાં 2025ની હાર કેમ વધુ મહત્વપૂર્ણ છે?

આપણે 2011/12માં પાછા જવું જોઈએ. કોંગ્રેસ જમીન ગુમાવી રહી છે તે સમજીને, સોનિયા ગાંધીએ યોગેન્દ્ર યાદવ, મનીષ સિસોદિયા અને સૌથી અગત્યનું, મેગ્સેસે એવોર્ડ વિજેતા અરવિંદ કેજરીવાલ જેવા તેમના લોકો સાથે અણ્ણાના “ઇન્ડિયા અગેઇન્સ્ટ કરપ્શન” (IAC) માં ઘૂસણખોરી કરી. બાકી તેમની વાર્તા હતી. કેજરીવાલે 28/70 બેઠકો જીતી અને 2013માં ભાજપને દિલ્હી જીતતા અટકાવવાની સોનિયાની યોજનાને સફળતાપૂર્વક પૂર્ણ કરી. તે ક્ષણથી, દિલ્હી ઘેરાબંધીમાં છે.

કેજરીવાલ ફક્ત બીજા જેવા  રાજકારણી નથી. તે ડીપ સ્ટેટ દ્વારા ભારત સામે છોડવામાં આવેલું એક હથિયાર હતું. સોનિયાને લાગ્યું કે તે કોંગ્રેસ વિરોધી મતોને વિભાજીત કરવા માટે કેજરીવાલનો ઉપયોગ કરી રહી છે.  પરંતુ વાસ્તવમાં, તે કેજરીવાલ  જે પોતાની  રાજકીય પ્રગતિ માટે સોનિયા ગાંધીનો ઉપયોગ કરી રહ્યા હતા. બદલામાં, તેમણે 2014 માં રાયબરેલીમાં તેમની સામે ઉમેદવાર ઉભા રાખ્યા ન હતા.

ત્યાંથી, 2 વર્ષથી ઓછા સમયમાં, કેજરીવાલે 67/70 ના જનાદેશ સાથે દિલ્હીને લગભગ ગળી ગયા. તેમણે 2020 માં 62/70 બેઠકો સાથે  પુનરાવર્તન કર્યું. આ જીતની સૌથી ખાસ વાત એ હતી કે, આ બંને જીત લોકસભા ચૂંટણીમાં ભાજપ દ્વારા 7-0 થી મળેલા વિજય પછી જ મળી હતી. આ “કેન્દ્ર માટે મોદી અને દિલ્હી માટે કેજરીવાલ” ઘટનાએ કેજરીવાલને ઘમંડથી ભરી દીધો. તેમણે મોદીને પડકાર ફેંક્યો, “તમે આ જીવનમાં દિલ્હીમાં મને હરાવી શકતા નથી. તમારે બીજો જન્મ લેવો પડશે!” કેજરીવાલ ઘમંડના આટલા સ્તર સુધી કેમ અને કેવી રીતે પહોંચ્યા?

જવાબ એ હકીકતમાં રહેલો છે કે તેમણે વિવિધ લોકોની અજેય મતબેંક એકઠી કરી હતી.
૧. લગભગ ૯૯% મુસ્લિમો
૨. ૧૦૦% ખ્રિસ્તીઓ, નકલી ચર્ચ હુમલાના કથાનકની મદદથી
૩. ખાલિસ્તાન સમર્થક તત્વો
૪. મધ્યમ વર્ગના હિન્દુઓ, જેઓ મફતના ભંડારમાં ફસાઈ ગયા

વધુમાં, તેમણે મતદાર યાદીમાં છેડછાડ કરી ને બાંગ્લાદેશીઓ અને રોહિંગ્યાઓને મોટા પાયે ઉમેર્યા. લોકસભાની ચૂંટણી દરમિયાન મોદીને મત આપનારા મધ્યમ વર્ગના હિન્દુઓનો એક મોટો હિસ્સો વિધાનસભાની ચૂંટણી દરમિયાન કેજરીવાલ તરફ વળ્યો. કેજરીવાલ હિન્દુઓને વિભાજીત કરવામાં અને લઘુમતીઓને એક કરવામાં સફળ રહ્યા. કેજરીવાલ ભારતના અત્યાર સુધીના સૌથી ખતરનાક રાજકારણી બન્યા હતા અને લોકોએ તેમને ઓછો આંક્યા હતા. તે તેમની તાકાત હતી.

કેજરીવાલનો સૌથી મોટો વિજય કમનસીબે ભારત માટે સૌથી ખરાબ આપત્તિ છે. તેમણે ભાજપ જેવા વ્યવહારિક પક્ષને પણ લોકપ્રિય રાજકારણનો આશરો લેવા મજબૂર કર્યો. તે બધી “લાડલી બહિન” અને આવી યોજનાઓ ફક્ત કેજરીવાલને કારણે જ છે. તેમણે આ દેશના રાજકારણને ખતરનાક નાણાકીય તકલીફ પ્રથાઓ તરફ ધકેલી દીધું છે.

કેજરીવાલે સફળતાપૂર્વક તેમના આત્યંતિક ડાબેરી રાજકારણને મુસ્લિમ તુષ્ટિકરણ અને ખાલિસ્તાની તત્વોને લાડ લડાવવા સાથે જોડી દીધું.  શાહીન બાગથી લઈને દિલ્હીના રમખાણો, ખેડૂતોના વિરોધ પ્રદર્શનથી લઈને કુસ્તીબાજોના વિરોધ સુધી, તેમણે દિલ્હીના મુખ્યમંત્રીની ખુરશી પર બેસીને દરેક ભારત વિરોધી પ્રવૃત્તિને ગુપ્ત રીતે અને ખુલ્લેઆમ મદદ કરી.

સાથે સાથે, તેમણે ભ્રષ્ટાચારમાં સંપૂર્ણ બેશરમી અને સજાથી મુક્તિ સાથે ભાગ લીધો. તેમણે સોરોસના પૈસાથી મીડિયાને સંપૂર્ણપણે ચૂપ કરી દીધું હતું. કોઈ તેમને કોઈ પ્રશ્ન પૂછતું ન હતું. “શીશ મહેલ” વિશે પણ નહીં. તેમણે જૂઠું બોલ્યું અને ભાજપ વિરુદ્ધ ખોટા સમાચાર ફેલાવવા અને પોતાની તરફેણ કરવા માટે યુટ્યુબર્સનો ઉપયોગ કર્યો. “હરિયાણા ભાજપે દિલ્હીમાં ઝેર ફેલાવ્યું છે.” તે એક એવા તબક્કામાં પહોંચી ગયો હતો જ્યાં લોકોને એવું લાગવા માંડ્યું હતું કે તેઓ અજેય અને લગભગ અમર બની ગયા છે. આ રીતે મોદી માટે “દિલ્હીમાં મને હરાવવા માટે તમારે બીજો જન્મ લેવો પડશે!” પડકાર ઉભો થયો.
કેજરીવાલ ભારત માટે સૌથી ખતરનાક એન્ટિટી બની ગયા હતા. તેઓ મધ્યમ વર્ગની મહિલાઓને લાંચ આપીને તેમને ભ્રષ્ટ કરી રહ્યા હતા. તેઓ લોકોને વિભાજીત કરી રહ્યા હતા અને બાંગ્લાદેશ અને મ્યાનમારના ગેરકાયદેસર ઇમિગ્રન્ટ્સનો ઉપયોગ કરીને વોટ બેંક બનાવી રહ્યા હતા. તેમનો આત્યંતિક સમાજવાદ અને બેદરકારીભર્યો કરકસર દેશને અરાજકતા તરફ ધકેલી રહી હતી. તે બરાબર એ જ ઇચ્છતો હતો. કુમાર વિશ્વાસ ના કહેવા પ્રમાણે  કેજરીવાલ પાસે સ્વતંત્ર દેશના પ્રથમ વડા પ્રધાન બનવાની યોજના હતી. આપણે જાણીએ છીએ કે તેનો અર્થ શું છે.  હવે જ્યારે દિલ્હી તેમના હાથમાંથી નીકળી ગઈ છે, ત્યારે તેઓ પંજાબમાં ખાલિસ્તાનના સપના પર પોતાના પ્રયાસો વધુ તીવ્ર બનાવશે.

દિલ્હી કગાર પર હતું. ખાસ કરીને જ્યારે લોકોએ એમસીડીમાં આપને સત્તામાં મત આપ્યો. પરિસ્થિતિ નિરાશાજનક લાગી રહી હતી. કદાચ, તે ભાજપ માટે વળાંક હતો. દિલ્હી ભાજપને ખ્યાલ આવી ગયો હતો કે રમત નિયંત્રણ બહાર થઈ ગઈ છે. જ્યારે ભાજપે પાર્ટીમાં વિવિધ જૂથોને એકસાથે લાવીને ફરીથી સંગઠિત કર્યા, ત્યારે કેજરીવાલનો વધુ પડતો આત્મવિશ્વાસ તેમનો વિનાશ બન્યો. તે ભાજપની જીત ઓછી હતી પણ આમ આદમી પાર્ટીની હાર વધુ હતી. આરએસએસ કેડર દ્વારા ભારે અદભુત રણનીતિ  થી કેજરીવાલની હાર.

યાદ રાખો, બેઠકોનો હિસ્સો 48 વિરુદ્ધ 22 હોવા છતાં, મતોનો હિસ્સો 45.56 વિરુદ્ધ 43.57 છે તે ફક્ત 1.99% તફાવત છે. જો કોંગ્રેસ અને આપ ગઠબંધનમાં લડ્યા હોત, તો તેઓ 50% મતોને સ્પર્શી ગયા હોત અને ગઠબંધન દિલ્હીમાં સારી રીતે જીત મેળવી શક્યું હોત. કેજરીવાલના ઘમંડને કારણે તેમને સતત ત્રીજી હાર નો સામનો કરવો પડ્યો.  એટલા માટે જ આ ભાજપની જીત કરતાં કેજરીવાલની હાર છે. પણ ફરી એકવાર, આટલું મહત્વનું કેમ છે?

કેજરીવાલની આ હારથી એકસાથે ઘણી બધી બાબતો પ્રાપ્ત થઈ છે.

A. તેનાથી કેજરીવાલના અહંકાર અને ઘમંડમાં ભંગાણ પડ્યું છે. તેઓ હવે ટિટાર્ડ સાથીઓ, ખાસ કરીને કોંગ્રેસ પ્રત્યે વધુ ગ્રહણશીલ બનશે.

B. ટિટાર્ડ સાથીઓ પ્રત્યે કેજરીવાલનું નરમ વલણ તેમના પોતાના પક્ષના કાર્યકર્તા અને મધ્યમ સ્તરના નેતાઓને નબળા બનાવશે. તેમાંથી ઘણા ભાજપ તરફ આકર્ષિત થશે, કારણ કે તેઓ ભાજપ કરતાં કોંગ્રેસને વધુ ધિક્કારે છે.

C. ઇસ્લામવાદીઓ અને ખાલિસ્તાન સમર્થકોને આપવામાં આવેલ ફ્રી પાસ રદ કરવામાં આવશે.

D. ગેરકાયદેસર બાંગ્લાદેશી ઇમિગ્રન્ટ્સ અને રોહિંગ્યાઓ પણ આખરે નિયંત્રણ હેઠળ આવશે.

E. સોરોસવાડી NGOs પર તેમના પદ પર લાત મારવામાં આવશે.

F. પાકિસ્તાન પ્રેમી, ચીન પ્રેમી અને ડીપ સ્ટેટ એસેટ્સ હવે તેમની સંપૂર્ણ સ્વતંત્રતાનો આનંદ માણશે નહીં.

ટૂંકમાં, દિલ્હી હિન્દુ વિરોધી, ભારત વિરોધી લોબીઓ દ્વારા પ્રિય દિલ્હી રહેશે નહીં.  જો મોદી દિલ્હીમાં સત્તાના સ્થળો પરથી ડાબેરી લોબીઓને ખતમ કરવામાં નિષ્ફળ ગયા છે, તો તેનો મોટો શ્રેય કેજરીવાલને જાય છે. તે ઢાલ હવે ગઈ છે. હવે આપણે વધુ વિરોધ પ્રદર્શનો અને કાર્યકરોની વધુ પ્રવૃત્તિઓ જોશું. પરંતુ તેમને “રાજ્યનું સમર્થન” મળશે નહીં. ભારતની રાજધાની શહેરના મુખ્યમંત્રી ઇમરાન ખાન કે જસ્ટિન ટ્રુડોની ભાષા બોલશે નહીં. તેઓ એક દાયકામાં પહેલીવાર ભારતની ભાષા બોલશે.

જ્યારે 2024 માં મોદીની કઠોર લડાઈમાં મળેલી જીત ડીપ સ્ટેટના આક્રમણમાંથી બચી ગઈ, ત્યારે મહારાષ્ટ્ર, હરિયાણા અને દિલ્હીમાં આ જીતે તેમને વ્યવહારીક રીતે કચડી નાખ્યા છે. યુએસ અને USAID માં ટ્રમ્પના સુકાન ખુલ્લા પડી ગયા હોવાથી, ડાબેરી વિરોધી અને સરળ, રાષ્ટ્રવાદી લોકો માટે જીવંત રહેવા માટે આ શ્રેષ્ઠ સમય છે.

મુલ્લાઓ, મિશનરીઓ અને માર્ક્સવાદીઓના 3M સંયોજન સામે આ ક્યારેય ન સમાપ્ત થતા યુદ્ધમાં આપણે ખૂબ જ મહત્વપૂર્ણ યુદ્ધ જીતી લીધું છે. પરંતુ રક્ષક છોડશો નહીં. તમારી ઢાલ અને શસ્ત્રો તૈયાર રાખો. યુદ્ધ ચાલુ રહેવું જોઈએ.  કેજરીવાલ ફક્ત એક ઘોડો હતો, થોડો મહત્વપૂર્ણ. હવે વધુ પ્યાદાઓ, કારીગરો, અજાણ્યા રાણીઓ અને રાજાઓ છે. અજાણ્યા દુશ્મનો સામે લડવું ઘણું મુશ્કેલ છે. તેથી, આપણી તૈયારીઓ વધુ મજબૂત અને સ્માર્ટ હોવી જોઈએ. આપણે આ સભ્યતા યુદ્ધ હારવાનું પોસાય તેમ નથી, કારણ કે આપણું અને આપણી ભાવિ પેઢીઓનું અસ્તિત્વ તેના પર નિર્ભર છે. જાગતા રહો અને લડતા રહો. મહાકુંભ મેળો ફેબ્રુઆરીના અંત સુધીમાં સમાપ્ત થઈ જશે. પરંતુ આપણે આ હિન્દુ એકતાને ક્યારેય ખતમ થવા દેવી જોઈએ નહીં. એક રહેંગે, તો સલામત રહેંગે!

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પ્રખ્યાત કવિ આદમ ગોંડવીએ 90ના દાયકામાં ઉત્તર પ્રદેશમાં સમાજવાદીઓની બદનામી પર લખ્યું હતું.

  “काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

  તે કટ્ટર સમાજવાદી છે, પછી તે દાણચોર હોય કે ડાકુ.
  ખાદીના સફેદ પોશાકમાં ઘણી અસર છે.”

  સારું થયું કે આદમ ગોંડવી સાહેબ સૈફઈ મહોત્સવ ન જોઈ શક્યા.

  મુલાયમ યાદવ 5 વર્ષ સત્તામાં રહ્યા અને અખિલેશ યાદવ 5 વર્ષ સત્તામાં રહ્યા અને આ 10 વર્ષો દરમિયાન મુંબઈથી દર વર્ષે ઉત્તર પ્રદેશ સરકારના સરકારી વિમાનો અને અન્ય લક્ઝુરિયસ કોર્પોરેટ જેટ ભાડેથી લઈને સલમાન ખાન, કેટરિના કૈફ, રણબીર કપૂર, માધુરી દીક્ષિત, અમિતાભ બચ્ચન ને એક નાના એવા ગામ માં બોલવામાં આવે છે. મુલાયમ યાદવનું ગામ અને પછી 15 દિવસ સુધી તે ગામમાં દારૂ અને કબાબનો મેળાવડો જામે.

  સમાજવાદી લોકો હાથમાં દારૂનો ગ્લાસ લઈને મુર્ગ મુસલ્લમનો સ્વાદ ચાખીને ફિલ્મસ્ટારોના ડાન્સ જોઈને સમાજવાદને મજબૂત કરતા હતા.

  અને આ ફેસ્ટિવલ વિશે એવા પણ અહેવાલો છે કે માત્ર ડાન્સ જ નહીં, ઘણું બધું ચાલતું હતું, અને બીજું શું, તેમની બેશરમી અને બેશરમી જુઓ, જ્યારે તેમને આરટીઆઈ દ્વારા પૂછવામાં આવ્યું કે સમાજવાદના આ નગ્ન ડાન્સ પર સરકારી તિજોરીમાંથી કેટલા પૈસા ખર્ચવામાં આવ્યા છે, તો તેઓએ આરટીઆઈ દ્વારા જવાબ આપ્યો ન હતો અને જેણે હાઈકોર્ટમાં અપીલ કરી હતી તેને ગોળી મારી દેવામાં આવી હતી.

  તેણે 4 આરટીઆઈ કાર્યકર્તાઓને માર્યા હતા જેમણે સૈફઈ મહોત્સવનો ખર્ચ જાણવાનો પ્રયાસ કર્યો હતો.

  આતંકનો એ સમયગાળો યાદ કરો અને પછી મુલાયમ સિંહ યાદવના યુગ પછી જ્યારે માયાવતી આવ્યા ત્યારે તેમણે કહ્યું હતું કે મુલાયમ સિંહ યાદવના પાંચ સૈફઈ મહોત્સવો પાછળ 18,000 કરોડ રૂપિયા ખર્ચવામાં આવ્યા હતા અને યોગી સરકારે કહ્યું હતું કે 34,000 કરોડ રૂપિયા અખિલેશ યાદવના સૈફઈ મહોત્સવ પાછળ ખર્ચવામાં આવ્યા હતા અને આ તમામ સૈફઈ મહોત્સવો પર ખર્ચ કરવામાં આવ્યા હતા. મુંબઈના સમૃદ્ધ ફિલ્મ સ્ટાર્સ માટે.

  અખિલેશ યાદવનો આ વાસ્તવિક સમાજવાદ છે.

  તમે આ ફોટોગ્રાફ જુઓ, કેવી રીતે મુંબઈની આખી ફિલ્મ જગતને અખિલેશ યાદવ અને મુલાયમ યાદવ દ્વારા સરકારી પૈસાના આધારે ફાઇનાન્સ કરવામાં આવતું હતું અને પછી સમાજવાદી દારૂના સેવનનો જમાનો હતો અને કબાબ, જામ એકબીજા સાથે અથડાતા હતા અને સ્વાદની આપ-લે થતી હતી.

  હવે  કહો કે આનાથી સામાન્ય જનતાને શું ફાયદો થયો??

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2 ઓક્ટોબર 1994 – (રામપુર તિરાહા ઘટના)

મુલાયમ સિંહ યાદવની વધુ એક લોહિયાળ રમત..

કારસેવકોની હત્યા બાદ ફરી એકવાર મુલાયમ સિંહ યાદવના આદેશ પર ફાયરિંગ કરવામાં આવ્યું છે.

“બળાત્કાર અને લૂંટનું તાંડવ થયું”

રામપુર તિરાહા ઘટના:
આવો કાળો દિવસ, જેને યાદ કરીને આજે પણ લોકો ડરી જાય છે, નમાઝી ગુંડાઓએ માત્ર લોકોની સંપત્તિ જ નહીં પરંતુ તેમની મહિલાઓ, બહેનો અને પુત્રીઓની ઈજ્જત પણ લૂંટી હતી.

સેંકડો નિઃશસ્ત્ર લોકો નમાજવાદી સરકારની પોલીસની ગોળીઓનો ભોગ બન્યા હતા, પરંતુ લોકો કહે છે કે માત્ર 7 મૃતદેહો હતા…

ગુમ થયેલા બાકીના લોકોનું ઠેકાણું આજદિન સુધી જાણી શકાયું નથી.  ચાલો આ દર્દનાક ઘટના ની  વાત કરીએ..
રામપુર તિરાહાની ઘટના જલિયાવાલા ઘટનાથી ઓછી ભયાનક નહોતી.

1 ઓક્ટોબર, 1994 ની રાતથી 2 ઓક્ટોબરની સવાર સુધી, પોલીસે આંદોલનકારીઓ પર લાઠીચાર્જ કર્યો અને ગોળીઓ ચલાવી.

ગાંધી જયંતિ પર સવારે પોલીસ ગોળીબારમાં સાત આંદોલનકારીઓના મોત થયા હતા (પોલીસ ડેટા મુજબ).

ફાયરિંગ દરમિયાન ખેતરોમાં દોડી રહેલી મહિલાઓની ઈજ્જત સાથે રમત રમાઈ હતી.. તેમની ઈજ્જત લૂંટાઈ હતી.. 2 ઓક્ટોબર 1994ની રાત ઉત્તરાખંડના લોકો માટે કાળી રાત સાબિત થઈ હતી.

જ્યારે સેંકડો પ્રદર્શનકારીઓ અલગ રાજ્યની માંગ સાથે શાંતિપૂર્ણ રીતે દિલ્હી જઈ રહ્યા હતા.

ઉત્તર પ્રદેશની તત્કાલીન મુલાયમ સિંહ સરકારની જીદને કારણે આ આંદોલનકારીઓ મુઝફ્ફરનગરના રામપુર તિરાહા પહોંચ્યા કે તરત જ પોલીસ પ્રશાસને આંદોલનકારીઓ પર નાસભાગ મચી ગઈ.
  પોલીસે નરસનમાં આંદોલનકારીઓને અટકાવ્યા હતા
આંદોલનકારી રામલાલ ખંડુરીનું કહેવું છે કે 1 ઓક્ટોબરની મધ્યરાત્રિથી પોલીસે આંદોલનકારીઓના વાહનોને નરસનથી રોકવાનું શરૂ કરી દીધું હતું.

તેઓ પણ મુઝફ્ફરનગર પહોંચી શક્યા ન હતા.

આજ સુધી કોઈ ઉત્તરાખંડી 1 ઓક્ટોબર 1994ની એ કાળી રાતને ભૂલી શક્યો નથી.

મુઝફ્ફરનગરના રામપુર તિરાહામાં તે રાત્રે ખાકીએ જે તબાહી મચાવી હતી.  તેના ઘા હજુ રૂઝાયા નથી.  અલગ રાજ્યની માગણી સાથે દિલ્હી જઈ રહેલા આંદોલનકારીઓને પોલીસે પસંદગીપૂર્વક નિશાન બનાવ્યા હતા.

જલિયાવાલા બાગ હત્યાકાંડની જેમ આ ચીંથરેહાલ દ્રશ્યને અંજામ આપવામાં આવ્યો હતો.

અને સૌથી શરમજનક અને અમાનવીય કિસ્સો ત્યારે બન્યો જ્યારે ફાયરિંગ પછી સેંકડો મહિલાઓ પર પોલીસ અને સમાજવાદી પાર્ટીના કાર્યકરોએ મળીને સામૂહિક બળાત્કાર ગુજાર્યો.  જંતર-મંતર પર પ્રદર્શન કરવાનો નિર્ણય લેવાયો હતો.

ગઢવાલ અને કુમાઉથી 200 થી વધુ બસો દિલ્હી જવા રવાના થઈ હતી, પરંતુ ઉત્તર પ્રદેશ સરકારે આંદોલનકારીઓને આગળ વધવા દીધા ન હતા અને રામપુર ચારરસ્તા પર કાફલાને રોકી દીધા હતા.

રામપુર તિરાહા ખાતે પુરી તૈયારી સાથે હાજર પોલીસ પ્રશાસને આંદોલનકારીઓ પર લાઠીચાર્જ કર્યો અને ગોળીઓ ચલાવી અને આ ગોળીબારમાં 7 આંદોલનકારીઓ માર્યા ગયા અને 17 આંદોલનકારીઓ ઘાયલ થયા.

આજે પણ આ ઘટનામાં મોટી સંખ્યામાં લોકો ગુમ છે.
(તમે તમારા માટે અનુમાન લગાવી શકો છો કે તેમની સાથે શું થયું હશે)

તત્કાલિન મુખ્યમંત્રી મુલાયમ સિંહ યાદવ પર આ ભીષણ હત્યાકાંડને અંજામ આપવાનો આરોપ હતો.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

During an interview at a company, boss Rohit asked Mahila Pooja, “How much salary do you expect for this job? “Pooja replied with confidence,” at least 90,000 rupees. “

Rohit asked next question, “Are you interested in any game? “Pooja immediately replied, “Gee, I love playing chess very much. “

Rohit eagerly asked, “Which face do you like the most in chess? “Pooja smiled and said,” Prime Minister. “

Hearing this reply, Rohit said, “But horse’s trick is most unique, then why Wazir? “Pooja replied seriously, “The Prime Minister has a specialty of every penalty. He sometimes saves the king by moving forward like a seal, sometimes shocks by walking thirst, and sometimes protects him by being a shield. “

Rohit was impressed and then asked, “So what’s your opinion about the king? “

Pooja said without hesitation, “King is the weakest seal.” He can only take one step to defend himself, while the minister protects him from every direction. “

Rohit further asked, “So which of these points do you consider yourself like? “

Pooja replied non-stop, “King. “

Rohit was a little surprised and said, “But you called the king weak, then why do you consider yourself a king? “

Pooja said with a light smile, “Because I am the king and my minister was my husband. He always protected me, supported me in every difficulty, but now he has completely left me. “

Rohit was shocked to hear this. She seriously asked, “So why would you want to do this job?” “

The eyes of worship became moist. He took a deep breath and said, “Because my Prime Minister is no longer in this world. Now I have to be a prime minister and take responsibility for my children and my life. “

There was a deep silence in the room. Rohit clapped and said, “Well done, Pooja ji. You are a strong woman. ”

This story is an inspiration to all women who can face any difficult situation in life. A woman is not just a wife or mother, but also a warrior, who can fight the circumstances and shape her family.

“A great wife is one, who is an ideal woman in her husband’s presence, and can carry the burden of the family like a man in his absence. “

No matter what the circumstances in life, every difficulty can be overcome with confidence and understanding.


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