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तराजू



“कभी मेरी भावनाओं का ध्यान नहीं रखते। जब देखो तब बस उन्हें माँ जी की ही चिंता रहती है। मैं भी अब वापस नहीं जाना चाहती वहाँ। रहे अपनी माँ के साथ और खूब सेवा करें।”
ससुराल से लड़-झगड़कर मायके आयी बेटी की भुनभुनाहट विभा जी बड़ी देर से सुन रही थी। बात कुछ खास नहीं थी। वही घर-गृहस्थी के छोटे-मोटे मनमुटाव और खींचतान।
जब बेटी अपनी भड़ास निकालकर चुप हुई तब विभा जी ने बोलना शुरू किया।
“हम जब सब्जी लेने जाते हैं तो जितनी सब्जी चाहिए उसके लिए क्या करते हैं?”
उनके इस अजीबो गरीब सवाल पर बेटी अचकचा गयी-
“तराजू में तुलवाते हैं, और क्या।”
“और सही तोल के लिए क्या करते हैं?” विभा जी ने फिर एक अटपटा प्रश्न किया।
“एक पलड़े में सब्जी तो दूसरे पलड़े में जितनी चाहिए उतने का बाट या वजन रखते हैं।” बेटी झुंझलाकर बोली।
“अगर हमें एक किलो सब्जी चाहिए तो क्या दो सौ ग्राम का बाट रखने से मिल जाएगी?” विभा जी ने एक और प्रश्न किया बेटी से।
“कैसी बचकानी बात कर रही हो माँ, दो सौ ग्राम के बाट रखने से भला एक किलो सब्जी कैसे तुलेगी?” बेटी अब सचमुच झुंझला गयी थी।
“तो फिर बेटी सम्मान और प्यार के सौ ग्राम बाट रखकर तुम किलो भर की आशा कैसे कर सकती हो?” विभा जी गम्भीर स्वर में बोली।
“क्या मतलब….” बेटी हकबका गयी।
“मतलब ये की रिश्ते भी तराजू की तरह होते हैं। दोनो पलड़े संतुलित तभी होंगे जब वजन बराबर होगा” विभा जी बोली।

बेटी उनका मुँह देखने लगी चुप होकर।
“तुम सास को सम्मान और माँ समान प्रेम नहीं देती, पति को सहयोग नहीं करती और चाहती हो तो घर में सब तुम्हे पलकों पर बिठायें, खूब सम्मान दें, तो ऐसा नहीं होता।”
विभा जी ने समझाया तो बेटी का चेहरा उतर गया।
“जितना प्रेम, सम्मान ससुराल वालों से चाहती हो पहले अपने पलड़े में उनके लिए उतना रखो। तभी रिश्तों का तराजू संतुलित रहेगा।”
बेटी की आँखे भर आयी। अपनी गलती वो समझ चुकी थी।

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लोहार्गल जहां पानी से गल गए थे पांडवों के अश्त्र शस्त्र?*



राजस्थान के शेखावटी इलाके के झुंझुनूं जिले से 70 कि. मी. दूर अरावली पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए।

यह राजस्थान का पुष्कर के बाद दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थ का सम्बन्ध पांडवो, भगवन परशुराम, भगवान सूर्य और भगवान विष्णु से है।

यहाँ गले थे पांडवों के हथियार महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।

घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुँचे तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधि से विभूषित किया।

यहां प्राचीन काल से निर्मित सूर्य मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसके पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई।

राजा ने भूत-भविष्य के ज्ञाताओं को बुलाकर उसके पिछले जन्म के बारे में पूछा। तब विद्वानों ने बताया कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी अर्थात बंदरिया थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया, क्योंकि बंदरिया का मांस अभक्ष्य होता है।

हवा और धूप के कारण वह सूख कर लोहार्गल धाम के जलकुंड में गिर गई किंतु उसका एक हाथ पेड़ पर रह गया। बाकी शरीर पवित्र जल में गिरने से वह कन्या के रूप में आपके यहाँ उत्पन्न हुई है।

विद्वानों ने राजा से कहा, आप वहां पर जाकर उस हाथ को भी पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया।

जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। राजा इस चमत्कार से अति प्रसन्न हुए। विद्वानों ने राजा को बताया कि यह क्षेत्र भगवान सूर्यदेव का स्थान है। उनकी सलाह पर ही राजा ने हजारों वर्ष पूर्व यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।

भगवान विष्णु ने लिया था मतस्य अवतार यह क्षेत्र पहले ब्रह्मक्षेत्र था। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने शंखासूर नामक दैत्य का संहार करने के लिए मत्स्य अवतार लिया था। शंखासूर का वध कर विष्णु ने वेदों को उसके चंगुल से छुड़ाया था। इसके बाद इस जगह का नाम ब्रह्मक्षेत्र रखा।

परशुराम जी ने भी किया था यहां प्रायश्चित।

विष्णु के छठें अंशअवतार भगवान परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शान्त होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। तब उन्होंने यहां आकर पश्चाताप के लिए यज्ञ किया तथा पाप मुक्ति पाई थी।

यहाँ एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पहाड़ी पर सूर्य मंदिर के साथ ही वनखण्डी जी का मन्दिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव मन्दिर, हनुमान मन्दिर तथा पाण्डव गुफा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढ़ियाँ चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किए जा सकते हैं।

श्रावण मास में भक्तजन यहाँ के सूर्यकुंड से जल से भर कर कांवड़ उठाते हैं। यहां प्रति वर्ष माघ मास की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

मालकेतु बाबा की चौबीस कोसी परिक्रमा भाद्रपद मास में श्रीकृषण जन्माष्टमी से अमावस्या तक प्रत्येक वर्ष लोहार्गल के पहाडो में हज़ारों लाखों नर-नारी 24 कोस की पैदल परिक्रमा करते हैं जो मालकेतु बाबा की चौबीस कोसी परिक्रमा के नाम से प्रसिद्ध है।

पुराणों में परिक्रमा का महात्म्य अनंत फलदायी बताया है। अब यह परिक्रमा और ज्यादा प्रासंगिक है। हरा-भरा वातावरण। औषधि गुणों से लबरेज पेड़-पौधों से आती शुद्ध-ताजा हवा और ट्रैकिंग का आनंद यहां है। और फिर खुशहाली की कामना से अनुष्ठान तो है ही। अमावस्या के दिन सूर्यकुण्ड में पवित्र स्नान के साथ यह परिक्रमा विधिवत संपन्न होती है।

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सही करने की प्रणाली


कहानी: राजा कर्मवीर अपनी प्रजा के आलसी स्वभाव से बहुत परेशान था। उसके राज्य के लोग जिम्मेदारी निभाने से कतराते थे और सोचते थे कि हर काम राजा या राज्य के कर्मचारी ही करेंगे। राजा ने कई बार उन्हें समझाने की कोशिश की कि नागरिकों की भी अपने राज्य के प्रति कुछ जिम्मेदारी होती है, लेकिन उनकी आदतें नहीं बदलीं।

राजा ने सख्ती के कई उपाय भी किए, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ। तब उसके मंत्री ने एक उपाय सुझाया। राजा ने नगर के मुख्य चौराहे पर एक बड़ा पत्थर रखवा दिया, जिससे आधा रास्ता बंद हो गया।

अगले दिन सुबह, एक व्यापारी अपनी घोड़ागाड़ी लेकर वहां पहुंचा। जब कोचवान ने उसे रास्ते पर पड़े पत्थर के बारे में बताया, तो व्यापारी ने रास्ता बदल लिया और दूसरे रास्ते से चला गया। ऐसे ही कई लोग पत्थर देखकर रास्ता बदलते रहे, लेकिन किसी ने पत्थर हटाने की कोशिश नहीं की।

कुछ समय बाद, एक गरीब किसान वहां पहुंचा। उसने पत्थर को देखा और आसपास खेल रहे बच्चों को मदद के लिए बुलाया। बच्चों के साथ मिलकर किसान ने पत्थर को रास्ते से हटा दिया। पत्थर हटाने पर वहां एक कागज मिला, जिस पर लिखा था: “इसे राजा के पास ले जाओ।”

किसान उस कागज को लेकर राजा के पास गया। राजा ने उसकी मेहनत और जिम्मेदारी को देखकर उसे भरपूर इनाम दिया। यह बात पूरे राज्य में फैल गई। अब हर कोई ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित होने लगा, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि मेहनत का उन्हें इनाम मिलेगा। धीरे-धीरे राज्य के लोग जिम्मेदार बनने लगे और यह उनकी आदत बन गई।

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पिता का आशीर्वाद



जब मृत्यु का समय निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धर्मपाल को बुलाकर कहा कि,
बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।

तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।
बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।

अब घर का खर्च बेटे धर्मपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।
धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।

अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।

क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।

एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?
धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।

इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद! धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता। एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।

तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो।

मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।

तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।

जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं।
भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।

नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को।

उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।

उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है?
उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं।

सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं।

सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने लगा।

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है।

उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।

सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई।

अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।

धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी।
सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है।

मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।

इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ,आप क्या माल ले कर आये हो।

धर्मपाल ने कहा कि: लौंग!

सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी।

जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?

धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं।


मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।

सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब?

धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें।

उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।

ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो..

धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।

अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: ऊपर वाले की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।

धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया।उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है,कि पिता के आशीर्वाद हों,तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी।

पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।

बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है।

अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है..!!
🙏🚩 राधे राधे जय श्री कृष्ण

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कुश


क्यो, हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में अक्सर कुश (विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है।
कुशा को सामन्य घास समझा जाता है उसका बहुत ही बड़ा महत्व है , कुशा के अग्र भाग जो कि बहुत ही तीखा होता है इसीलिए उसे कुशाग्र कहते हैं l

तीक्ष्ण बुद्धि वालो को भी कुशाग्र इसीलिए कहा जाता है.

कुशा नारियों की सुरक्षा करनें में राम बाण है जब लंकेश माँ सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका ले गया , उसके बाद वह बार बार उन्हें प्रलोभित करने जाता था और माता सीता इस कुशा को अपना सुरक्षा कवच बनाकर उससे बात करती थी , जिसके कारण रावण सीता के निकट नहीं पहुँच सका l

आज भी मातृ शक्ति अपने पास कुशा रखे तो अपने सतीत्व की रक्षा सहज रूप से कर सकती है क्योंकि कुशा में वह शक्ति विद्यमान है जो माँ बहिनों पर कुदृष्टि रखने वालों को उनके निकट पहुंचने भी नहीं देती l

जो माँ या बहिन मासिक विकार से परेशान है उन्हें कुशा के आसन और चटाई का विशेष दिनों में प्रयोग करना चाहीये .

पूजा-अर्चना आदि धार्मिक कार्यों में कुश का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। यह एक प्रकार की घास है, जिसे अत्यधिक पावन मान कर पूजा में इसका प्रयोग किया जाता है।

महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थीं। एक का नाम कद्रू था और दूसरी का नाम विनता। कद्रू और विनता दोनों महर्षि कश्यप की खूब सेवा करती थीं।

महर्षि कश्यप ने उनकी सेवा-भावना से अभिभूत हो वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने कहा, मुझे एक हजार पुत्र चाहिए। महर्षि ने ‘तथास्तु’ कह कर उन्हें वरदान दे दिया। विनता ने कहा कि मुझे केवल दो प्रतापी पुत्र चाहिए। महर्षि कश्यप ने उन्हें भी दो तेजस्वी पुत्र होने का वरदान देकर अपनी साधना में तल्लीन हो गए।

कद्रू के पुत्र सर्प रूप में हुए, जबकि विनता के दो प्रतापी पुत्र हुए। किंतु विनता को भूल के कारण कद्रू की दासी बनना पड़ा।

विनता के पुत्र गरुड़ ने जब अपनी मां की दुर्दशा देखी तो दासता से मुक्ति का प्रस्ताव कद्रू के पुत्रों के सामने रखा। कद्रू के पुत्रों ने कहा कि यदि गरुड़ उन्हें स्वर्ग से अमृत लाकर दे दें तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे।

गरुड़ ने उनकी बात स्वीकार कर अमृत कलश स्वर्ग से लाकर दे दिया और अपनी मां विनता को दासता से मुक्त करवा लिया।

यह अमृत कलश ‘कुश’ नामक घास पर रखा था, जहां से इंद्र इसे पुन: उठा ले गए तथा कद्रू के पुत्र अमृतपान से वंचित रह गए।

उन्होंने गरुड़ से इसकी शिकायत की कि इंद्र अमृत कलश उठा ले गए। गरुड़ ने उन्हें समझाया कि अब अमृत कलश मिलना तो संभव नहीं, हां यदि तुम सब उस घास (कुश) को, जिस पर अमृत कलश रखा था, जीभ से चाटो तो तुम्हें आंशिक लाभ होगा।

कद्रू के पुत्र कुश को चाटने लगे, जिससे कि उनकी जीभें चिर गई इसी कारण आज भी सर्प की जीभ दो भागों वाली चिरी हुई दिखाई पड़ती है.l

‘कुश’ घास की महत्ता अमृत कलश रखने के कारण बढ़ गई और भगवान विष्णु के निर्देशानुसार इसे पूजा कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा।

जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे असुर हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा। उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे। वहीं कुश के रूप में प्रकट हुए।

कुश ऊर्जा की कुचालक है। इसलिए इसके आसन पर बैठकर पूजा-वंदना, उपासना या अनुष्ठान करने वाले साधक की शक्ति का क्षय नहीं होता। परिणामस्वरूप कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है।

वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।

कुश का प्रयोग पूजा करते समय जल छिड़कने, ऊंगली में पवित्री पहनने, विवाह में मंडप छाने तथा अन्य मांगलिक कार्यों में किया जाता है। इस घास के प्रयोग का तात्पर्य मांगलिक कार्य एवं सुख-समृद्धिकारी है, क्योंकि इसका स्पर्श अमृत से हुआ है।

हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में अक्सर कुश (विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसका धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक कारण भी है।

कुश जब पृथ्वी से उत्पन्न होती है तो उसकी धार बहुत तेज होती है। असावधानी पूर्वक इसे तोडऩे पर हाथों को चोंट भी लग सकती है।

पुरातन समय में गुरुजन अपने शिष्यों की परीक्षा लेते समय उन्हें कुश लाने का कहते थे। कुश लाने में जिनके हाथ ठीक होते थे उन्हें कुशल कहा जाता था अर्थात उसे ही ज्ञान का सद्पात्र माना जाता था।

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सबसे बड़ा मूर्ख कौन हैं


एक नगर के राजा ने अपने दरबार में एक बड़ी अजीब इच्छा जाहिर की…

कहा कि मेरे दरबार में एक से बढ़कर एक अकलबंद है यहां एक मूर्ख भी होना चाहिए। जिसकी बातों को सुनकर मेरा और आप सबका मनोरंजन होना चाहिए।
राजा के इस इच्छा पर सभी दरबारीयो ने अपनी हा मिलाई।
इसके लिए राजा ने अपने राज्य में प्रतियोगिता रखी।
जिससे एक सबसे बड़ा मूर्ख मिल भी गया।

राजा ने उस मूर्ख को बहुत ही खास किस्म का ताज़ पहनाया। राजा रोज दरबार में उसे मूर्ख से कुछ सवाल पूछ़ता और उसका जवाब सुनकर राजा और सारे दरबारी खूब हंसते।

ऐसे ही सिलसिला चलता रहा और समय गुजरता गया और एक दिन अचानक राजा बीमार पड़ गया। बीमारी इतनी ग्रसीत थी कि राजा कि इस बीमारी का ईलाज करने के लिए राज्य के सारे वैद्य और दुसरे राज्यों से आए वैद्य भी हार मान चुके थे और सभी का एक ही जवाब था कि अब राजा को बचाना मुश्किल है।

राजा ने अपने सभी दरबारीयो के सामने एक इच्छा जाहिर कि वह यह जीवन के अंतिम वक्त हंसकर गुजराना चाहते है। तो राजा ने‌ उस मूर्ख को अपने पास बुलावाया और उससे कहा कि आज तक हम तुझसे प्रश्न करते रहे और तू उत्तर देता रहा। आज तू मुझसे प्रश्न कर और मैं उत्तर दूंगा।

मूर्ख ने सवाल किया – राजन मृत्यु के बाद आप कहां जाएंगे।
राजा ने जवाब दिया – मेरे मालिक के पास,उस परमात्मा के पास।

मूर्ख ने अगला सवाल किया – राजन वहां आप कितने दिन रहेंगे। राजा ने जवाब दिया– वहां हमेशा हमेशा के लिए।

मूर्ख ने फिर कहा – फिर तो आपने वहां अपने लिए बहुत ही एक से बड़कर एक अच्छे बेहतरीन इंतजाम किए होंगे। जिससे आपको वहां कभी भी किसी चीज कि तकलीफ ना हो।

राजा यह सब सुनकर सोच में पड़ गया और वो कुछ भी कह नहीं पाया।
तब उस मूर्ख ने अपना ताज़ उतार कर राजा के सर पर रखते हुए कहा मुझे माफ़ करना राजन पर इस ताज़ के असली हकदार मुझसे ज्यादा तो आप है। जहां रहना ही नहीं है वहां इतना बड़ा राज्य और जहां हमेशा के लिए रहना है वहां के लिए कुछ भी नहीं।

कड़वा तो बहुत है पर यही सच हैं
उड़ जाएंगे तस्वीर से रंगो की तरह हम।
वक्त की टहनी पर परिंदों की तरह हम।

यह बात हम सब जानते हैं पर फिर भी इस बात को अहसास करते हुए जीते नहीं तभी तो कहते हैं…

कितना अजीब स्वभाव है इंसान का जो लेकर जाना है उसे छोडे़ जा रहा हैं और जो यही रह जाना है उसे जोड़े जा रहा है

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क्रोध


एक महिला थी, जिसको बात बात पर गुस्सा करने की बहुत बुरी आदत थी। उसकी इस आदत की वजह से उसका पूरा परिवार परेशान था और परिवार में कलह का माहौल बना रहता था।

वह महिला भी अपनी इस आदत से बहुत परेशान थी। उसे हर छोटी छोटी बात पर एकदम से गुस्सा आ जाता था।

एक दिन उस महिला के घर उनके पति के बचपन के एक मित्र, परिवार के साथ मिलने आए। वह पेशे से डॉक्टर थे। बातों बातों मे उन्होंने पूछ लिया कि, “और बताओ भाभीजी, कैसा चल रहा है।” अचानक से जैसे महिला के दिल की तकलीफ को किसी ने छू लिया हो।उसकी आँखें भर आई। वह बोली, “मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है। और उस पल मैं चाहकर भी अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाती। बाद मे इसका मुझे बहुत अधिक पछतावा होता है और इससे मेरी तबियत भी बिगड़ने लगी है। मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता है। ऐसा लगता है, जैसे मेरे क्रोध ने मेरी जीवन की खुशियों को छीन लिया है।”

डॉक्टर मित्र ने बड़े ही शांत भाव से उस महिला की तकलीफ को सुना।
फिर वे उनकी तरफ देखते हुए प्यार से मुस्कराये और कहा, “भाभीजी बस इतनी सी बात! अभी कुछ ही दिन पहले मेडिकल साइंस ने गुस्से की एक मेडिसिन ईजाद की है। हजारों लोगो को इससे बहुत फायदा हुआ है। मैं हर पल उस दवाई को अपने साथ रखता हूँ।” फिर उन्होंने अपने बैग से एक दवा की शीशी निकालकर उन्हें दी और कहा कि, “जब भी गुस्सा आये, इसमें से चार बूंद दवा अपनी जीभ पर डाल लेना और 10 मिनट तक दवा को मुँह में ही रखना है और इस दौरान कुछ भी नहीं बोलना है। 10 मिनट तक मुँह नहीं खोलना है, नहीं तो दवा असर नहीं करेगी।”

महिला के चेहरे पर एक उम्मीद की किरण आ गई और उसने डॉक्टर के बताए अनुसार दवा का प्रयोग शुरू किया। जैसे ही उसे गुस्सा आता, वह एकदम से मुँह मे दवा डाल देती। इस तरह करते-करते उसे 15 दिन बीत गए। ‌15 दिन में ही उसकी गुस्सा करने की आदत कम होने लगी। और वह बहुत खुश रहने लगी। 15 दिन बाद वह महिला अपने पति के साथ उन्ही डॉक्टर से मिलने गई। जैसे ही वह उनके चेम्बर मैं गई, उसकी आँखें फिर भर आई, पर इस बार आँसू खुशी के थे। नम आँखों से उसने कहा कि, “इस दवा से मेरा क्रोध लगभग गायब हो गया है। अब मुझे इतना गुस्सा नहीं आता और मेरे परिवार में भी अब शांति का माहौल रहता है। मैं जीवन भर आपकी आभारी रहूँगी। मुझे गुस्से को दूर करने की दवाई और दे दीजिए।”

एक बार डॉक्टर फिर मुस्कराये, पर इस बार उनकी मुस्कराहट मे शरारत थी। और फिर वे बोले, “भाभीजी मैंने आपको कोई दवाई नहीं दी । बस वह तो सादा पानी था।”

महिला ने आश्चर्य से पूछा कि, “फिर मेरा क्रोध कैसे कम हो गया।”
डॉक्टर ने कहा, “जब आप गुस्से के आने पर इस दवाई को अपने मुँह मे रखती थी, उन ठहराव के पलों मे आपका क्रोध रूपी नकारात्मक ऊर्जा शांत होकर ठहर जाता है और ये ठहराव के पल हमारी विवेक की शक्ति को जीवंत कर देते है।”

इस तरह हम इस क्रोध नामक बदसूरत उर्जा को करुणा के एक सुंदर फूल के रूप में बदल सकते हैं।

दोस्तों, हम मे से कई लोग अपनी इस आदत से परेशान होंगे और कोई न कोई उपाय तलाश रहे होंगे, इस गुस्से से छुटकारा पाने का।

हार्टफुल्लनेस इंस्टिट्यूट के वैश्विक गाइड डॉ कमलेश डी पटेल जिन्हें हम प्यार से दाजी बुलाते है, वे कहते है “अगली बार जब आपको गुस्सा आए तो उसे सिर्फ नोटिस करें कि कैसे यह गुस्सा मेरे अंदर बह रहा है। उसे दबाने की बिल्कुल कोशिश ना करें। बस पूरी तरह जागरूक हो जाए। बस इतने से काम के अगर आप साक्ष्य बन जाते हैं, तो यह अंधेरे में रोशनी की किरण की तरह काम करेगा। जैसे ही आप जागरूक हो जाते हैं कि मेरे भीतर क्या चल रहा है, अचानक शांति उतरने लगेगी। जो ऊर्जा मेरे भीतर क्रोध को ईंधन दे रही थी, वही ऊर्जा मेरी शांति को ईंधन देने लगेगी। यह ऐसी हालत होगी जो आपने पहले कभी भी अनुभव नहीं की होगी। यह विपरीत परिस्थिति स्वयं क्रोध की वजह से ही होगी। जैसे जैसे हम ज्यादा जागरूक होते जाएँगे, हमें हमारे क्रोध से यू-टर्न लेने में उतना ही कम समय लगेगा। अधिक से अधिक जागरूकता होने पर कम से कम समय लगेगा क्रोध से यू-टर्न लेने में।

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व्यवस्था


जंगल में शेर ने एक फैक्ट्री डाली… उसमें एकमात्र काम करने वाली चींटियाँ थी जो समय से आती जाती थीं और फैक्ट्री का सारा काम करती थी।

शेर का व्यसाय बहुत ही व्यवस्थित ढंग से चल रहा था।

एक दिन शेर ने सोचा कि ये चींटियां इतना सुंदर काम कर रही है, अगर इसको किसी विशेषज्ञ के निगरानी में रख दूँ तो और बेहतर काम कर सकती है।

ये ख्याल मन में आते ही शेर ने एक मधुमक्खी को मैनेजर नियुक्त कर दिया।

मधुमक्खी को कार्य का बहुत अनुभव था और वह रिपोर्ट्स लिखने में भी बहुत होशियार थी।

मधुमक्खी ने शेर से कहा कि सबसे पहले हमें चींटियों का काम करने का समय सारणी बनाना होगा। फिर उसके काम का सारा रिकार्ड अच्छी तरह रखने के लिए मुझे एक अलग से सेक्रेटरी चाहिए होगा।

शेर ने खरगोश को सेक्रेटरी के रूप में नियुक्त कर दिया।

शेर को मधुमक्खी का कार्य पसंद आया। उसने कहा कि चींटियों के अब तक पूरे हुए सारे कार्यों की रिपोर्ट दो और जो प्रगति हुई है उसको एक सुंदर ग्राफ बनाकर निर्देशित करो।

मधुमक्खी ने कहा ठीक है, मगर मुझे इसके लिए कंप्यूटर, लेज़र प्रिंटर और प्रोजेक्टर चाहिए होगा। इस सबके लिए शेर ने एक कंप्यूटर डिपार्टमेंट बना दिया और बिल्ली को वहां का सर्वेसर्वा नियुक्त कर दिया।

अब चींटी अपना काम करने के बजाय सिर्फ कागज़ी रिपोर्ट बनाने में ध्यान देने लगी, जिससे उसका काम पिछड़ता गया और अंततः प्रोडक्शन कम हो गया।

शेर ने सोचा कि कंपनी में एक तकनीकी विशेषज्ञ रखा जाय जो मधुमक्खी की सलाहों पर अपनी राय दे सके। ऐसा सोंचकर उसने बंदर को तकनीकी विशेषज्ञ नियुक्त कर दिया।

अब चींटी को जो भी काम दिया जाता वह उसको पूरी सामर्थ्य से करने की कोशिश करती लेकिन अगर काम कभी पूरा नहीं होता तो वह विवश होकर उसको अपूर्ण छोड़कर घर चली जाती।

शेर को लगातार नुकसान होने लगा तो वह बहुत बेचैन हो उठा। कोई उपाय न देख मजबूरी में उसने उल्लू को नुकसान का कारण पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया।

तीन महीने बाद उल्लू ने शेर को अपनी विस्तृत व बेहद गोपनीय रिपोर्ट सौंप दी; जिसमें उसने बताया कि फैक्ट्री में काम करने वालों की संख्या ज्यादा है औऱ कंपनी के घाटे को कम करने के लिए कर्मचारियों को सस्पेंड, नोटिस, बर्खास्त करना होगा…

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મહાનતા




એક ક્લાસરૂમમાં અચાનક એક વિદ્યાર્થી ઊભો થયો અને તેણે ફરિયાદ કરતા પ્રોફેસરને કહ્યું કે, પોતાનાં જન્મદિવસ પર તેનાં પિતાજીએ ગિફ્ટમાં આપેલી કિંમતી ઘડિયાળ કલાસમાંથી કોઈએ ચોરી લીધી છે..!!

આ સાંભળી પ્રોફેસરે બધાને પોતાની આંખો પર પટ્ટી બાંધીને એક લાઈનમાં ઊભા રહેવા માટે કહ્યું. એ પછી પ્રોફેસરે બધાના ખિસ્સા તપાસવાનું શરૂ કર્યું.

થોડી જ વારમાં એક છોકરાના ખિસ્સામાંથી ઘડિયાળ મળી ગઈ. પ્રોફેસરે ચુપચાપ તે ઘડિયાળ લઈને તેના માલિકને આપી દીધી.

પ્રોફેસરે કોઈને કંઈ ન કહ્યું. બધાની આંખો પર પટ્ટી હોવાને કારણે કોઈને કંઈ ખબર ન પડી કે ઘડિયાળ કોણે ચોરી હતી.

પછીના ત્રણ દિવસ સુધી ઘડિયાળ ચોરનાર છોકરો ગભરાતો રહ્યો કે તેની ચોરીની જાણ બધાને થઈ જશે, પણ કોઈને ખબર ન પડી.
અને થોડા મહિનાઓમાં બધા વિદ્યાર્થીઓ અભ્યાસ પૂરો કરીને કોલેજમાંથી ચાલ્યા ગયા.

બહુ વર્ષો પછી કોલેજમાં જૂના વિદ્યાર્થીઓનો રીયુનિયન કાર્યક્રમ હતો.

એ વિદ્યાર્થી કે જેણે ચોરી કરી હતી, હવે એક મોટો ઉદ્યોગપતિ બની ગયો હતો.!!

તે પોતોના પ્રોફેસર પાસે ગયો. તેણે પ્રોફેસરને કહ્યું, ‘મારા જીવન પર તમારું ઋણ છે. આજે હું જીવું છું તો તે તમારા જ કારણે.’ પ્રોફેસરે આવું કહેવાનું કારણ પૂછ્યું તો તે વિદ્યાર્થીએ કહ્યું, ‘સર, એકવાર તમારા વર્ગમાં એક ઘડિયાળ ચોરાઈ હતી ત્યારે તમે બધાની આંખો પર પટ્ટી બંધાવીને બધાના ખિસ્સા તપાસ્યા હતા.

એ દિવસે આબરૂ જવાના ડરે મેં નક્કી કરી લીધું હતું કે જો બધાને ખબર પડી જશે તો હું આત્મહત્યા કરી લઈશ.

તે ઘડિયાળ મારા ખિસ્સામાંથી મળી, પરંતુ તે અંગે તમે કોઈને ન કહ્યું. તમે મને માફ કરીને મારી આબરૂ સાચવી લીધી.’

પ્રોફેસરે કહ્યું, ‘હું નહોતો જાણતો કે ઘડિયાળ તેં લીધી હતી. મેં તમારા બધાની આંખે પટ્ટી બાંધવાની સાથે મારી આંખ પર પણ પટ્ટી બાંધી દીધી હતી.

હું નહોતો ઇચ્છતો કે મને ખબર પડે કે મારા કયા વિદ્યાર્થીએ આ કામ કર્યું છે. જેથી તે વિદ્યાર્થી મારી નજરમાંથી ઉતરી જાય.’ આ સાંભળીને તે છોકરો નતમસ્તક થઈ ગયો.

કોઈની ભૂલ ખબર પડવા પર તેનું અપમાન કરવું, નિંદા કરવી અને સજા આપવી સામાન્ય વાત છે, પરંતુ તેની ભૂલ માફ કરીને તેનું આત્મસન્માન બચાવવાની તક આપવી “મહાનતા” છે#

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પુત્ર પ્રેમ



હંમેશા મુજબ સાંજે 6:00 વાગ્યે…
ઓફીસથી નીકળી ઘરે પાછા જવા 6:30 ની ભાયંદર ફાસ્ટ પકડી ઘરે જવા નીકળ્યો.

રસ્તા માં મારા મિત્ર પ્રથમનો ફોન આવ્યો કે ફાઉન્ટન પાસે ઊભો રહેજે મને થોડું કામ છે. હું ત્યાં તેની રાહ જોઈ બાજુમાં બનેલા પાર્કીંગની રેલીંગ પર બેઠો હતો.

એક 70-75 વર્ષના વૃદ્ધ જેને જાડા કાચના ચશ્મા પહેરેલા હતા અને મેલાં-ઘેલા કપડાં પહેર્યાં હતાં તે મારા પાસે આવી મારા પગ પકડીને બોલ્યા : “સાહેબ બહુ ભુખ લાગી છે એક વડાપાવ ખવડાવશો ?

” તે કોઈ ભિખારી હોય તેવુ લાગતું ન હતું કે તેને ભિક્ષા માંગવાની આદત હોય તેમ પણ લાગતું ન હતું.

અચાનક પગ પકડવાથી હું હડબડી ને નીચે ઉતરી ગયો. આ વ્યક્તિ ને જોઈ મને સંકોચ થયો. મેં કહ્યું: “કાકા ભુખ લાગી છે ?” ને પછી ખીસામાં હાથ નાખી 50 ની નોટ કાઢી તેમના હાથમાં મુકી તો તેઓએ તરતજ પાછી આપી કહે: “નહી ભાઇ આટલા બધા નહીં મને ફક્ત વડાપાઉ જેટલાં જ પૈસા આપો”.

હું જઈ ને બે વડાપાઉં લઇ આવ્યો.

કાકા ત્યાં જ નીચે બેસીને ખાવા લાગ્યા.

મેં પૂછ્યું ,”કાકા ક્યાંથી આવો છો? કયાં જાવું છે ? કોઇ ને શોધવા નીકળ્યા છો કે શું ?”

તેમણે જવાબ આપ્યો: “હું પુના પાસેના એક ગામ થી આવું છું. તારા જેવડો મારો પુત્ર અહીં કોઇ મોટી કંપનીમાં ઇન્જિનીયર છે. બે વર્ષ પહેલાં તેને મુંબઈમાં લવમેરેજ કરેલાં. તેની ભણેલી પત્નીને અમારા ગામડીયા સાથે રહેવું ગમતું નથી એટલે છોકરો અહીં તેની સાથે છેલ્લા બે વરસથી અલગથી રહે છે.

પરમદિવસે તેનો અમારા પર ફોન આવ્યો હતો કે અમેરિકામાં નોકરી મળી છે. પત્નીને લઈને 10 વર્ષ માટે અમેરિકા જાય છે.

મુંબઈથી તો વરસે દિવસે એકાદવાર મળવા આવી જતો હતો પણ હવે આટલું દૂર પરદેશ જતાં પહેલાં એકવાર તો મળીને જા”,,, કહ્યું

તો કહે,” જલ્દી જાવું છે એટલે સમય નથી.” મને થયું 10 વર્ષ હવે જીવન હશે કે નહીં કોને ખબર? એટલે હું જ મળી આવું.

પાડોશી પાસે ઉછીના પૈસા લઈને ટિકિટની વ્યવસ્થા કરી. હવે મારી પાસે પૈસા નથી.

બે દિવસથી મુંબઈમાં ફરુ છું પણ લોકો કહે છે કે અહીં ફાઉન્ટન માં એરપોર્ટ નથી એ તો અંધેરીમાં છે.

પરંતુ મારા પુત્રએ તો મને આજ સરનામું લખાવ્યું હતું “… કહી ને તેણે ખીસ્સા માંથી એક ચબરખી કાઢી બોલ્યા,” આ મોબાઇલ પણ ખરાબ થઈ ગયો લાગે છે. બે દિવસથી મારા દિકરાનો એક પણ ફોન નથી આવ્યો.”

મેં પૂછ્યું:”તમે કેમ ફોન કરીને પૂછી નથી લેતાં?”

તો કહે,” મને ફોન કરતા નથી આવડતું.

મેં તેમનો ફોન લઈ રિસીવ્ડ કોલનું લીસ્ટ કાઢીને બે દિવસ પહેલાં આવેલા એકમાત્ર નંબર પર ફોન કર્યો તો સામેથી ફોન કટ કરવામાં આવ્યો.

મેં વારંવાર પ્રયત્ન કર્યો પણ રિજલ્ટ તે જ આવ્યું.

છેવટે મેં તેમની પાસેથી ચબરખી લઈ સરનામું વાચ્યું
આંતર રાષ્ટ્રીય હવાઈ મથક-ફાઉન્ટન, ફોર્ટ, મુંબઈ.
મને સમજાઇ ગયું કે માં-બાપ ને ટાળવા માટે જ તેણે ખોટું સરનામું લખાવ્યું હતું અને હવે ફોન ઉપાડવાનું પણ ટાળતો હતો.

મને સમજાઇ ગયું હતું કે જે દિશામાં તેનું વિમાન ગયું હતું તેના પાછા ફરવાની શક્યતા ઘણી ઓછી હતી. અથવા તો એનો પુત્ર અહીં મુંબઈ માં જ રહે છે પણ પિતાને મળવા, સાચવવા નથી માંગતો.

મને સમજાઈ રહ્યું હતું કે પુત્ર તરફથી થઈ રહેલી ઊપેક્ષા તેને સમજાતી નહોતી અથવા તો જે સમજાય રહ્યું હતું કે તેનો પોતાનો પુત્ર તેને અવગણી રહ્યો છે તે સ્વીકારવા તેમનું મન તૈયાર નહોતું.

મેં કહ્યું, “કાકા હવે તો વિમાન નીકળી ગયું હશે તમે પાછા ગામડે તમારા ઘરે જાવ…કાકી તમારી રાહ જોતાં હશે.”

તેમના હાથમાં રહેલી જુની થેલી પર તેણે હાથ ફેરવ્યો મેં જોયું, ડબ્બા જેવું લાગ્યું મેં પૂછ્યું, “કાકા આમાં શું છે?”

તેઓ બોલ્યા આતો મારા દિકરાને મોહનથાળ બહુ ભાવે એટલે તેની માં એ બનાવી ને મોકલ્યો હતો.”..!!

મારા દિલ માં એકદમ ધ્રાસકો પડ્યો.!!

મને પારાવાર વેદના થઈ. મને થયું કે તેમના નાલાયક દિકરાની હકીકત તેમને સમજાવું પણ મારી હિંમત ખલાસ થઈ ગઇ હતી.

મારા કાળજાના કટકા થઈ રહ્યા હતા . હું નિ:શબ્દ બની તેમની સામે જોઈ રહ્યો હતો.

મેં કહ્યું: “કાકા હવે પુના જાવ મોડું થઈ જાશે વિમાન તો હવે જતું રહ્યું.” રડતી આંખે તેઓ ત્યાંથી વિદાય થયાં.

ભારે પગલે હું ત્યાંથી ચાલતો થયો. થોડે આગળ ગયા પછી મને સમજાયું કે તેઓની પાસે તો પુના બસ કે ટ્રેન માં જવા માટે પણ પૈસા નથી.

હું ઝડપથી પાછો ગયો અને મનાવીને મારા ઘરે લઈ આવ્યો કહ્યું કે એક દિવસ રોકાઇને આવતી કાલે તમે પુના જજો. ટિકિટ ની વ્યવસ્થા હું કરી આપીશ.

તે દિવસે મોડી રાત સુધી મને ઊંઘ ના આવી. બાજુના રૂમમાં કાકાની પણ આ જ હાલત હતી.

રહી રહી ને મને એક જ વિચાર આવતો હતો કે ભુખ ના માર્યા એક વડાપાવ માટે કાકલૂદી કરતાં એ વૃધ્ધ શું પુત્ર માટે લાવેલા પોતાની પાસે ના ડબ્બામાંથી એક મોહનથાળ નુ બટકું નોતા ખાઈ શકતા !!? પણ એ મોહનથાળ તો માતા એ એના દિકરા માટે બનાવ્યો હતો ને……બાપ તે થોડો ખાઈ શકે ?


આટલો બધો પુત્ર પ્રેમ…. !!!
બીજા દિવસે હું તેને પુનાની ટ્રેનમાં મુકી આવ્યો….ઘરે આવ્યો તો પત્ની એ કહ્યું કે કાકા મોહનથાળ નો ડબ્બો ભુલી ગયા છે…. !!

મેં કહ્યું એ ભુલી નથી ગયા પણ આપણા બન્ને માટે ઈરાદાપૂર્વક રાખીને ગયા છે.