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मरना नही है मुझे



रामदयाल इस बड़ी दुनिया में अकेले रह गए थे। उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। वह दो-चार दिन ही बीमार रहीं। मोहल्ले वाले उन्हें अस्पताल ले गए। उन्होने ही भाग-दौड़ की। रामदयाल खुद बीमार थे। उनका लड़का मुंबई में रहता है। कई वर्षों से घर नहीं आया था। मां की मृत्यु का समाचार मिलने पर उसने जवाब भेज दिया-‘बहुत उलझा हुआ हूं, फुरसत होने पर आऊंगा।‘
पत्र पाने वाली रात रामदयाल तकिए में मुंह गड़ाकर कितना रोए-कहना कठिन है। उनकी खुद की उम्र पैंसठ वर्ष हो गई थी। अब उन्हें हरदम लगता था जैसे दुनिया में उनके लिए कुछ भी शेष नहीं रहा है। पड़ोसियों ने उनका बहुत ख्याल रखा। हर समय कोई-न-कोई उनके पास मौजूद रहता। लेकिन फिर भी रामदयाल की उदासी बढ़ती गई। वह जितना सोचते, यह विश्वास पक्का होता जाता कि अब इस दुनिया में रहना बेकार है। और एक सुबह घूमने के लिए निकले तो फिर लौटे नहीं। उनके कदम शहर से बाहर की ओर चलते चले गए।
एक बस आगे की तरफ जा रही थी। रामदयाल बस में बैठ गए। कई घंटे की यात्रा के बाद जब बस एक घने जंगल में से गुजर रही थी, तो वह पेशाब करने के लिए नीचे उतरे और एक दिशा में बढ़ गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने बस के भोंपू की आवाज सुनी। ड्राइवर उन्हें जल्दी करने को कह रहा था, लेकिन रामदयाल बाबू वहीं खड़े रहे। उन्होंने न लौटने का फैसला किया था। वह वन में खो जाना चाहते थे।
उस घने जंगल में दिन में भी पेड़ों के नीचे हल्का अंधेरा था। हर तरफ सुनसान। पत्तों में सांय-सांय हवा। रामदयाल बाबू को जैसे होश नहीं था। झाडि़यों में अटकते, उलझते बढ़ रहे थे, पता नहीं किधर। धूप तेज हुई तो प्यास से गला सूखने लगा। अब वह एक ऊंचे कगार की ओर बढ़ रहे थे-आंखों के सामने एक दृश्य तैर रहा था-वह हवा में हाथ-पैर मारते हुए नीचे घाटी की ओर गिरे जा रहे हैं।
और फिर एकाएक उनके कदम रुक गए। जहां ढलान नीचे घाटी की ओर खुलता था, वहां दो लकडि़यां लगाकर रास्ता बंद किया था, वहां मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-‘सावधान।’ रामदयाल बाबू ने इधर-उधर देखा पर कोई नजर नहीं आया। उनकी समझ में न आया कि
लोगों को सावधान रहने की बात किसने लिखी। उन्होंने जरा बढ़कर झांका तो देखा आगे गहरी खाई थी। वह पीछे हट आए-न जाने क्यों उनका मन कांप उठा। वह एक तरफ बैठ गए। कुछ देर पहले रामदयाल आत्महत्या के लिए तैयार थे, लेकिन अब कुछ-कुछ डर लग रहा था।
वह कुछ देर आंखें मूंदे बैठे रहे, फिर उठे। प्यास से गला खुश्क हो रहा था, लेकिन वहां भला पानी कहां मिलता। तभी उन्होंने देखा पास ही पत्थर की कूंडी में पानी भरा है। वहीं कुछ फल भी रखे दिखाई दिए। कुछ देर सोचते खड़े रहे-पिएं या न पिएं, फिर प्यास ने जोर मारा तो गटागट पानी पी गए। वहां रखे फल भी खा लिए। अब जाकर चित्त कुछ ठिकाने हुआ, लेकिन एक बात रह-रहकर परेशान कर रही थी-यह सब किसने किया है। यहां तो कोई नजर नहीं आता। कौन है वह?
रामदयाल के मन से आत्महत्या का विचार निकल गया। वह जंगल में घूमने लगे। जगह-जगह उन्होंने ‘सावधान’ लिखा देखा। कई पेड़ों पर ‘जहरीले फल’ भी लिखा था। उन्होंने पाया कि अगर वह सब न लिखा होता तो कोई भी गिरकर अपने प्राण गंवा सकता था। घास में छिपे हुए गहरे गड्ढे, खतरनाक मोड़, जहरीले फल-सबके बारे में सावधान किया गया था। अब तक दोपहर ढल चुकी थी। रामदयाल जी ने जोर से पुकारा, ‘‘मेरे प्राण बचाने वाले भाई, मैं आपके दर्शन करना चाहता हूं।’’
पत्तों के पीछे सरसराहट हुई और एक बूढ़ा हंसता हुआ सामने आ गया। उसने कहा-‘‘मैं बहुत देर से आपको देख रहा हूं, कहिए आप यहां कैसे आ गए?’’
‘‘सच कहूं, मैं आत्महत्या के इरादे से आया था लेकिन खाई के किनारे लिखे शब्दों ने मन बदल दिया।’’ रामदयाल कह गए।
उस व्यक्ति ने पूछा, ‘‘अब क्या इरादा है?’’
‘‘सोच रहा हूं क्या करूं।’’ रामदयाल ने कहा और उनकी आंखें भर आईं। बूढ़े के पूछने पर उन्होंने अपनी रामकहानी कह सुनाई। जब उन्होंने बात खत्म की तो उनकी आंखों से लगातार आंसू गिर रहे थे। एकाएक उन्होंने पूछा-‘‘लेकिन आपने अपना परिचय नहीं दिया।’’
बूढ़े ने कहा-‘‘जो आपका परिचय है वही मेरा भी है। मेरा नाम है नरसिंह। क्या सुनाऊं! अनेक वर्ष हो गए। एक दिन मैं अपने बेटे के साथ इस जंगल से गुजर रहा था। तभी बेटा घास में छिपे गहरे गड्ढे में गिर गया। वह इतना नीचे गिरा था कि मैं वहां पहुंच भी नहीं सकता था। मेरी दुनिया अंधेरी हो गई।
‘पत्नी पहले ही मर गई थी। अब तो कुछ भी नहीं बचा था जीवन में। मैंने तय किया कि मैं भी उसी गड्ढे में कूदकर जान दे दूं।’’रामदयाल जी ध्यान से सुन रहे थे।


नरसिंह ने आगे कहा-‘‘मैं कूदने जा रहा था, एकाएक मन ने कहा यह कायरता है। हो सकता है, इसी तरह लोग आकर इस छिपे गड्ढे में गिरते रहें। नहीं, यह ठीक नहीं। पहले इसका कुछ प्रबंध करना चाहिए। बस, मैंने गड्ढे के चारों ओर पेड़ की डालियां खड़ी करके उन्हें लताओं से बांध दिया।’’
‘‘फिर?’’ रामदयाल ने पूछा।
‘‘फिर मुझे लगा कि ऐसे खतरनाक स्थान तो इस जंगल में और भी होंगे। मैंने देखा, मेरे बेटे की जान लेने वाले गड्ढे के पास ऐसे ही दूसरे स्थान भी थे। बस, मैंने निश्चय कर लिया कि जंगल में जब तक एक भी ऐसा खतरनाक स्थान रहेगा, मैं नहीं मरूंगा।’’ वह दिन था और आज का दिन है, मैं इसी जंगल में रह रहा हूं-अभी मेरा काम खत्म नहीं हुआ। खतरनाक स्थानों पर मैंने चेतावनियां लिखकर लगा दी हैं। कौन-से फल जहरीले हैं और कौन-से खाने लायक यह भी जान लिया है। जंगल इतना खतरनाक नहीं रह गया है जितना पहले था। मैंने कई भटके लोगों को रास्ता बताया है। खाने-पीने की सामग्री दी है, नहीं तो शायद वे मर जाते। और हर बार मुझे लगा कि आत्महत्या न करने का मेरा निश्चय गलत नहीं था।’’
रामदयाल गंभीर होकर नरसिंह की बातें सुन रहे थे। एकाएक नरसिंह ने कहा-‘‘रात हो रही है, जंगली जानवरों का डर है। सुबह आपको जंगल से बाहर जाने का रास्ता बता दूंगा। आइए।’’
नरसिंह रामदयाल को एक गुफा में ले गया। उसके बाहर आग जलाकर दोनों लेट गए। रात को जंगली जानवरों की आवाजें सुनाई दीं, कभी दूर, कभी एकदम पास। सुबह रामदयाल की नींद खुली तो नरसिंह ने कहा-‘‘चलिए, आपको जंगल से बाहर जाने वाले रास्ते पर छोड़ दूं।’’
‘‘लेकिन मुझे कहीं नहीं जाना।’’
‘‘तब कहां जाएंगे, क्या इरादा है?’’ नरसिंह ने आश्चर्य से पूछा।
‘‘मैं यहीं रहूंगा, आपके साथ।’’ रामदयाल ने कहा-‘‘अभी जंगल में ऐसे बहुत-से स्थान हैं जहां देखभाल की जरूरत है- मैंने मरने का इरादा छोड़ दिया है।’’
‘‘क्या सच।’’ कहते हुए नरसिंह की आंखें चमक उठीं।
‘‘हां, मैने देख लिया है जीवित रहकर दूसरों को मरने से बचाया जा सकता है।’’ रामदयाल ने कहा और मुसकरा उठे।
मरने के लिए एक दुख है तो जीने के लिए सौ सुख भी कम हैं’’
रामदयाल ने कहा और गुफा से बाहर आ गए। सूरज पेड़ों के पीछे से ऊपर उठ रहा था..!!
🙏🙏🏿🙏🏾जय श्री कृष्ण

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राजा के दरबार में एक आदमी नौकरी मांगने के लिए गया, उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई तो वो बोला :-*
मैं किसी की भी — चाहे वो आदमी हो या चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ…..

राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया…..
कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा तो उसने कहा :-

नस्ली नहीं है…

राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा,,,,,
उसने बताया घोड़ा नस्ली तो है पर इसके पैदा होते ही इसकी माँ मर गई थी… इसलिए ये एक गाय का दूध पी पी कर उसके साथ पला बढ़ा है,,,,,
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा कि तुम्हें कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं…??

“उसने कहा” जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके खाता है, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुँह में लेकर सर उठा कर खाता है,,,,,,,,”

राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ, उसने नौकर के घर अनाज, घी, मुर्गे और ढेर सारी बकरियाँ बतौर इनाम भिजवा दिए,,,,,,,,,,
और अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया,,, कुछ दिनों के बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी, तब उसने रानी के लिए कहा :-

“तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी रानी नहीं हैं,,,,”

राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई, उसने अपनी सास को बुलाया, सास ने कहा “हक़ीक़त ये है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता माँग लिया था लेकिन हमारी बेटी 6 महीने में ही मर गई थी लिहाज़ा हमने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया,,,,,,,,,”

राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा “तुम को कैसे पता चला ??”

“”उसने कहा, “रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गँवारों से भी बुरा है… एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है जो रानी साहिबा में बिल्कुल नहीं है,,,,,,”

राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और फिर से बहुत सारा अनाज भेड़ बकरियां बतौर इनाम दी और फिर साथ ही उसे अपने दरबार में तैनात कर दिया,,,,,

कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया और अपने बारे में पूछा,,,,,,

नौकर ने कहा “जान की सलामती हो तो कहूँ…!!”

राजा ने वादा किया तो उसने कहा :-

“न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है !!”

राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था। राजा सीधा अपनी माँ के महल में पहुँचा और फिर माँ से पुछा तो फिर माँ ने कहा कि ये सच है कि तुम एक चरवाहे के बेटे हो…
हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हें गोद लेकर हम ने पाला,,,,,

राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा :- बता भई, अब ये तुझे कैसे पता चला ????

उसने कहा “जब राजा किसी को इनाम दिया करते हैं तो हीरे-मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं लेकिन आप भेड़, बकरियाँ, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं…
ये रवैया किसी राजा का नहीं, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है,,,,,,,,,”

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल है…
ये सब बाहरी दिखावा है।
इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी नीयत से है…😇

हैसियत चाहे कुछ भी हो… पर सोच नहीं बदलती…

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सोच का फ़र्क


एक शहर में एक धनी व्यक्ति रहता था, उसके पास बहुत पैसा था और उसे इस बात पर बहुत घमंड भी था| एक बार किसी कारण से उसकी आँखों में इंफेक्शन हो गया|

आँखों में बुरी तरह जलन होती थी, वह डॉक्टर के पास गया लेकिन डॉक्टर उसकी इस बीमारी का इलाज नहीं कर पाया| सेठ के पास बहुत पैसा था उसने देश विदेश से बहुत सारे नीम- हकीम और डॉक्टर बुलाए| एक बड़े डॉक्टर ने बताया की आपकी आँखों में एलर्जी है| आपको कुछ दिन तक सिर्फ़ हरा रंग ही देखना होगा और कोई और रंग देखेंगे तो आपकी आँखों को परेशानी होगी|

अब क्या था, सेठ ने बड़े बड़े पेंटरों को बुलाया और पूरे महल को हरे रंग से रंगने के लिए कहा| वह बोला- मुझे हरे रंग से अलावा कोई और रंग दिखाई नहीं देना चाहिए मैं जहाँ से भी गुजरूँ, हर जगह हरा रंग कर दो|

इस काम में बहुत पैसा खर्च हो रहा था लेकिन फिर भी सेठ की नज़र किसी अलग रंग पर पड़ ही जाती थी क्यूंकी पूरे नगर को हरे रंग से रंगना को संभव ही नहीं था, सेठ दिन प्रतिदिन पेंट कराने के लिए पैसा खर्च करता जा रहा था|

वहीं शहर के एक सज्जन पुरुष गुजर रहा था उसने चारों तरफ हरा रंग देखकर लोगों से कारण पूछा| सारी बात सुनकर वह सेठ के पास गया और बोला सेठ जी आपको इतना पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है मेरे पास आपकी परेशानी का एक छोटा सा हल है.. आप हरा चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेते फिर सब कुछ हरा हो जाएगा|

सेठ की आँख खुली की खुली रह गयी उसके दिमाग़ में यह शानदार विचार आया ही नहीं वह बेकार में इतना पैसा खर्च किए जा रहा था|

तो मित्रों, जीवन में हमारी सोच और देखने के नज़रिए पर भी बहुत सारी चीज़े निर्भर करतीं हैं कई बार परेशानी का हल बहुत आसान होता है लेकिन हम परेशानी में फँसे रहते हैं|

इसे कहते हैं सोच का फ़र्क|

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यही है हमारी-तुम्हारी जिंदगी


एक धन सम्पन्न व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहता था।
पर कालचक्र के प्रभाव से धीरे धीरे वह कंगाल हो गया।
उस की पत्नी ने कहा कि सम्पन्नता के दिनों में तो राजा के यहाँ आपका अच्छा आना जाना था।
क्या विपन्नता में वे हमारी मदद नहीं करेंगे जैसे श्रीकृष्ण ने सुदामा की की थी?

पत्नी के कहने से वह भी सुदामा की तरह राजा के पास गया।

द्वारपाल ने राजा को संदेश दिया कि एक निर्धन व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है और स्वयं को
आपका मित्र बताता है।
राजा भी श्रीकृष्ण की तरह मित्र का नाम सुनते ही दौड़े चले आए और मित्र को इस हाल में
देखकर द्रवित होकर बोले कि मित्र बताओ, मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?
मित्र ने सकुचाते हुए अपना हाल कह सुनाया।

चलो, मै तुम्हें अपने रत्नों के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर अपनी जेब में रत्न भर कर ले जाना।
पर तुम्हें केवल 3 घंटे का समय ही मिलेगा।
यदि उससे अधिक समय लोगे तो तुम्हें खाली हाथ बाहर आना पड़ेगा।
ठीक है, चलो।
वह व्यक्ति रत्नों का भंडार और उनसे निकलने वाले प्रकाश की चकाचौंध देखकर हैरान हो गया।
पर समय सीमा को देखते हुए उसने भरपूर रत्न अपनी जेब में भर लिए।
वह बाहर आने लगा तो उसने देखा कि दरवाजे के पास रत्नों से बने छोटे छोटे खिलौने रखे
थे जो बटन दबाने पर तरह तरह के खेल दिखाते थे।
उसने सोचा कि अभी तो समय बाकी है, क्यों न थोड़ी देर इनसे खेल लिया जाए?
पर यह क्या?
वह तो खिलौनों के साथ खेलने में इतना मग्न हो गया कि समय का भान ही नहीं रहा।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने स्वर्ण के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर सोना अपने थैले में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।

उसने देखा कि वह कक्ष भी सुनहरे प्रकाश से जगमगा रहा था।
उसने शीघ्रता से अपने थैले में सोना भरना प्रारम्भ कर दिया।
तभी उसकी नजर एक घोड़े पर पड़ी जिसे सोने की काठी से सजाया गया था।
अरे! यह तो वही घोड़ा है जिस पर बैठ कर मैं राजा साहब के साथ घूमने जाया करता था।
वह उस घोड़े के निकट गया, उस पर हाथ फिराया और कुछ समय के लिए उस पर सवारी
करने की इच्छा से उस पर बैठ गया।
पर यह क्या?
समय सीमा समाप्त हो गई और वह अभी तक सवारी का आनन्द ही ले रहा था।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह घोर निराश होकर
खाली हाथ ही बाहर आ गया।

राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने रजत के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर चाँदी अपने ढोल में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान अवश्य रखना।
ठीक है।
उसने देखा कि वह कक्ष भी चाँदी की धवल आभा से शोभायमान था।
उसने अपने ढोल में चाँदी भरनी आरम्भ कर दी।
इस बार उसने तय किया कि वह समय सीमा से पहले कक्ष से बाहर आ जाएगा।
पर समय तो अभी बहुत बाकी था।
दरवाजे के पास चाँदी से बना एक छल्ला टंगा हुआ था।
साथ ही एक नोटिस लिखा हुआ था कि इसे छूने पर उलझने का डर है।
यदि उलझ भी जाओ तो दोनों हाथों से सुलझाने की चेष्टा बिल्कुल न करना।
उसने सोचा कि ऐसी उलझने वाली बात तो कोई दिखाई नहीं देती।
बहुत कीमती होगा तभी बचाव के लिए लिख दिया होगा।
देखते हैं कि क्या माजरा है?
बस! फिर क्या था।
हाथ लगाते ही वह तो ऐसा उलझा कि पहले तो एक हाथ से सुलझाने की कोशिश करता
रहा।
जब सफलता न मिली तो दोनों हाथों से सुलझाने लगा।
पर सुलझा न सका और उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और
वह निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया।

राजा ने कहा- मित्र, कोई बात नहीं
निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
अभी तांबे का खजाना बाकी है।
चलो, मैं तुम्हें अपने तांबे के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर तांबा अपने बोरे में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।

मैं तो जेब में रत्न भरने आया था और बोरे में तांबा भरने की नौबत आ गई।
थोड़े तांबे से तो काम नहीं चलेगा।
उसने कई बोरे तांबे के भर लिए।
भरते भरते उसकी कमर दुखने लगी लेकिन फिर भी वह काम में लगा रहा।
विवश होकर उसने आसपास सहायता के लिए देखा।
एक पलंग बिछा हुआ दिखाई दिया।
उस पर सुस्ताने के लिए थोड़ी देर लेटा तो नींद आ गई और अंत में वहाँ से भी खाली हाथ
बाहर निकाल दिया गया।

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घर के बड़े बूढ़े


“मम्मा ये बताओ, दादा दादी आपको बहुत परेशान करते हैं ना..”
“हाँ बेटा पर क्या कर सकते हैं.. अब हैं यहाँ तो झेलना ही पड़ेगा |”
“पर क्यूँ मम्मा… क्यूँ झेलना पड़ेगा”

“तुम नही समझोगे रहने दो”

“एक काम करते हैं मम्मा, इन दोनो को चाचा चाची के घर भेज देते हैं”
“वो वहाँ दो दिन भी नही रह पायेंगे बेटा.. चाची तो दादी को देखते ही तुनक जाती है और चाचा तो तुम्हारे चाची के पल्ले से ऐसे बँधे हैं कि वो उतना ही सुनते हैं जितना चाची कहती है | वहाँ इनका कोई गुज़ारा नही होने वाला | “

“तो बुआ को बोल दो ना ये उनके भी तो माँ पापा हैं ना , वो ही ले जायें कुछ दिनों के लिए इन दोनो को| “

“तुम भी ना बड़े भोले हो बेटा.. वहाँ नही जायेंगे दादा दादी.. ढकोसला करेंगे कि हम तो बेटी के घर का पानी भी नही पी सकते तो वहाँ जा कर रहेंगे कैसे और अगर रहने को तैयार हो भी गये तो तुम्हारी बुआ के पचासों बहाने निकल आयेंगे | वो कम थोड़े ना है, वो भी तो अपनी माँ पर ही गयी है | “

“क्या मम्मा मतलब कोई इन्हे अपने साथ नही रखना चाहता | एक काम करो मम्मा इन्हे वहाँ पहुँचा दो… वो मैने टीवी पर देखा था कुछ ओल्ड ऐज होम टाइप से है.. अरे वो जो उस दिन मूवी में आ रहा था | “

“वृद्धाआश्रम कहते हैं उसे … मैं भी थक जाती हूँ काम कर के.. सुबह उठने से सोने तक इनके नखरे झेलना… तौबा तौबा… कब तक आखिर .. मैं भी कुछ दिन और देख रही हूँ..नहीं तो तुम्हारे पापा से बात करूँगी कि वो इन दोनो को वहीं छोड़ आये |”

“हाँ यही ठीक रहेगा.. दादी दिन भर टोकती रहती है.. टीवी मत देखो, मोबाइल मत खेलो….. मैं बच्चा थोड़े ना हूँ.. बड़ा हो रहा हूँ मैं… समझदार हो रहा हूँ.. ये भी कोई बात हुयी भला. .. हुँ…ह |”

“अरे मेरा राजा बेटा…इतना गुस्सा…. दस साल के ही हो अभी.. मेरी आँखो के तारे हो तुम…. इतनी जल्दी बड़े हो जाओगे कभी सोचा ही नही था | अब देखो तुम बड़े होते जाओगे और हम बूढ़े होते जाएँगे | फिर तुम्हारी शादी करेंगे.. प्यारी सी दुल्हनियाँ लायेंगे | “

“नहीं मम्मा प्लीज़…. मैं तो बड़ा हो रहा हूँ पर आप लोग प्लीज़ बूढ़े मत होना |”
“हा हा हा क्यूँ बेटा.. बूढ़ा तो सबको ही होना है एक दिन “

“पर मम्मा आप लोग बूढ़े हो जाओगे और मेरी वाइफ आयेगी तो उसे भी ऐसे ही परेशान होना पड़ेगा ना.. वो भी तरह तरह के आईडिया सोचेगी कि कैसे आप लोगों को यहाँ से हटाया जाये.. नो मम्मा प्लीज़ नो..आप भी दादी की तरह हो जाओगी और मेरी वाइफ को परेशान करोगी …. . मैं ऐसा नही होने दूँगा… एक काम करूँगा.. मैं मेरी शादी होते ही आप दोनों के लिए ओल्ड ऐज होम बुक करवा दूँगा जहाँ आप लोग रह सकोगे और मैं और मेरी वाइफ भी चैन से रह लेंगे |”

“हुँ…ह.. हमारा घर है हमारे पास… तुम रहना अपने घर में अपनी वाइफ को लेकर | यही करोगे तुम… पाल पोस कर बड़ा कर रहे हैं और तुम हमें वृद्धा आश्रम भेजने की तैयारी कर रहे हो | वाह बेटा वाह… | “

“मम्मा.. मैं कहाँ कुछ गलत कह रहा हूँ | दादा दादी ने भी तो पापा बुआ को पाला पोसा ही होगा ना…सभी माँ बाप पालते हैं अपने बच्चों को, उसमें क्या नया है… . पर अब जब सब बड़े हो गये हैं तो कोई बूढ़े लोगों को अपने पास नही रखना चाहता तो भला मैं क्यूँ रखूँगा, परेशानी बढ़ाते हैं ये बूढ़े लोग | मैं भी नही रखूँगा और साइंटिस्ट बन कर कोई ऐसी दवा बनाऊँगा जिससे कि मैं कभी बूढ़ा ही ना हो पाऊँ और मेरे बच्चों को कोई ओल्ड ऐज होम ना ढूँढना पड़े |”

अपने बेटे की बातें सुन माँ के शरीर में सिहरन सी दौड़ गयी और जिन आँखो में कुछ देर पहले परेशानी, व्यथा, गुस्सा दिख रहा था उन्ही आँखो में अब शर्म पानी का रूप ले चुका थी .

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चित्रकार की गलती


✍️  किसी शहर में एक प्रसिद्द  चित्रकार रहता था. देश-विदेश में उसकी चित्र प्रदर्शनी देखने हजारों लोग आते थे और उसके काम की प्रशंसा करते नहीं थकते थे.
एक बार उसने सोचा कि कहीं ऐसा तो नही कि लोग सिर्फ उसके मुंह पे उसकी तारीफ़ करते हैं और पीठ पीछे उसके काम में कमी निकालते हैं.
यही सोच कर उसने अपनी बनायी एक मशहूर पेंटिंग सुबह-सुबह शहर के एक व्यस्त चौराहे पर लगा दी और नीचे लिख दिया-
जिसे भी इस पेंटिंग में कहीं कोई कमी नज़र आये वह उस जगह एक निशान लगा दे.
शाम को जब वो पेंटिंग देखने चौराहे पर गया तो उसकी आँखें फटी-फटी रह गयीं… पेंटिंग पे सैकड़ों निशान लगे हुए थे. वह बहुत निराश हो गया और चुपचाप पेटिंग उठा कर अपने घर चला गया.
इस घटना का उसपर बहुत बुरा असर हुआ. उसने चित्रकारी करना छोड़ दिया और लोगों से मिलने-जुलने से भी कतराने लगा.
एक दिन उसके किसी दोस्ती ने उसकी निराश का कारण पूछा तब उसने उदास मन से उस दिन की घटना सुना डाली.
मित्र बोला, “एक काम करते हैं हम एक बार और तुम्हारी बनायी कोई पेटिंग उस चौराहे पर रखते हैं.”
और अगली सुबह उन्होंने चौराहे पर एक नयी पेंटिंग लगा दी. पेटिंग लगाने के बाद चित्रकार उसके नीचे फिर से वही लाइन लिखने जा रहा था कि “ जिसे भी इस पेंटिंग में कहीं  कोई कमी नज़र आये  वह  उस जगह एक निशान लगा दे. “
कि तभी दोस्त ने उसे रोका और कहा इस बार लिखो-
जिस किसी को भी इस पेंटिंग में कहीं भी कोई कमी दिखाई दे उसे सही कर दे.
शाम को जब दोनों दोस्त उस पेंटिंग को देखने गया तो उन्होंने देखा कि पेंटिंग जैसी सुबह थी अभी भी बिलकुल वैसी की वैसी ही है.
दोस्त चित्रकार को देखकर मुस्कुराया और बोला, “कुछ समझे…. कोई भी मूर्ख गलतियाँ निकाल सकता है और ज्यादातर मूर्ख निकालते ही हैं…लेकिन गलतियाँ सुधारने वाले बहुत कम ही लोग होते हैं… बेकार में ऐसे लोगों की राय लेने का कोई फायदा नहीं जो सिर्फ और सिर्फ दूसरों मीन मेख निकालना चाहते हैं… उन्हें नीचा दिखाना चाहते हैं…. लेकिन उनको सुधारने के लिए न उनके पास समय है और न ज्ञान.
इसलिये गलती तुम्हारे चित्र में नहीं बल्कि गलती ऐसे लोगों से सलाह मांगने में है!”
चित्रकार अपने दोस्त की बात समझ चुका था और अब वह दुबारा अपना मनपसंद काम करने लगा… वह पेंटिंग्स बनाने लगा.

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मतलब का संसार



काफी समय पहले की बात है, एक जंगल में एक शेर रहता था, शेर ठहरा जंगल का राजा, सौ पुरे जंगल के जानवर शेर से डरते थे, शेर दिनभर जंगल में मस्ती से घूमता और रात को अपनी गुफा में घुसकर मज़े से आराम करता, कई सालों से शेर की यही दिनचर्या थी,शेर का जीवन बड़े मज़े से कट रहा था।

एक दिन शेर की गुफा में एक चूहा घुस गया,शेर के दर से कोई भी जानवर शेर की गुफा की तरफ नहीं आता था,इसीलिए चूहे को शेर की गुफा उसके रहने के लिए सबसे उचित जगह लगी, अब चूहा दिन भर अपने बिल में रहता और रात के वक़्त जब शेर सो जाता तब बिल से बहार आता था,कुछ दिन तो सब कुछ इसे ही चलता रहा,शेर को अपने बिल में चूहे के होने की भनक भी नहीं लगी,लेकिन समय के साथ-साथ चूहे को खुद पर घमंड हो गया, अब उसे शेर से डर लगना भी बंद हो गया।

एक दिन चूहे ने सोचा, “शेर ने पूरी ज़िन्दगी इस जंगल को और जंगल के जानवरों को डरा-डरा कर परेशान किया है,क्यों ना में अब शेर को परेशान करके उसका जीना मुश्किल कर दूँ,बस चूहे महाराज के सोचने भर की देर थी..अब चूहा हर रोज रात को अपने बिल से बाहर निकलता और शेर की गर्दन के घने बाल काट जाता,शेर जब सुबह उठता तो उसे अपनी गर्दन के घने बाल ज़मीन पर पड़े मिलते,कुछ दिन तो शेर को कुछ समझ नहीं आया,लेकिन जल्द ही उसे अहसास हो गया की हो ना हो मेरे बिल में कोई चूहा घुस आया है, जो रोज रात को मेरे बाल कुतर जाता है,शेर ने चूहे को अपने पंजो से पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन हर बार चूहा शेर के चंगुल से निकल जाता।

चूहे को पकड़ने के लिए शेर एक दिन जंगल के एक बिलाव के पास गया और बिलाव को अपनी व्यथा सुनाइ,शेर ने बिलाव को अपने गुफा में चलकर रहने की विनती की ताकि बिलाव के डर से चूहा शेर का बिल छोड़कर भाग जाए या बिलाव खुद उस चूहे का शिकार कर उसे मार डाले,शेर और बिलाव ठहरे एक ही जाती के,सो बिलाव ने शेर की मदद करने के लिए हाँ कर दी और शेर के गुफा में आकर रहने लगा, शेर ने बिलाव की अपने गुफा में बहुत आदर सत्कार की और आराम से अपनी गुफा में रहने के लिए कहा।

अब शेर रोज जंगल से शिकार करके लाता बिलाव को खिलाता, बिलाव के डर से अब चूहे ने अपने बिल से बाहर निकलना बंद कर दिया,शेर को अपनी योजना कामियाब लगी,लेकिन उसे लगता था की हो ना हो चूहा अब भी बिल में है,शेर को जब भी चूहे की चूं-चूं सुनाई देती वह बिलाव को और भी अच्छा और ताज़ा शिकार खिला देता ताकि बिलाव उसकी गुफा में ही रहे और बिलाव के डर से चूहा उसका बिल छोड़कर भाग जाए,

एक दिन ऐसे ही शेर शिकार की तलाश में जंगल में गया था,तभी बिलाव को चूहा दिखाई दिया और उसने झट से उसे अपने पंजे में दबोच लिया और चूहे को मार कर खा गया,शेर जब शाम को वापस अपनी गुफा में आया तो उसे अपनी गुफा में मरे हुए चूहे की बू आई,शेर समझ गया की हो ना हो आज बिलाव ने चूहे का काम तमाम कर दिया है।

शेर ने सोचा अब जब चूहा ही ना रहा तो मुझे बिलाव की क्या आवश्यकता,बस शेर के सोचने भर की देर थी,अब शेर ने बिलाव को शिकार खिलाना भी बंद कर दिया,लेकिन बिलाव को तो अब बेठे-बेठे ताज़ा शिकार खाने की आदत हो चुकि थी,कई दिन तक भोजन ना मिलने के कारण बिलाव की हालत अब इतनी ख़राब हो चुकी थी की अब वह खुद शिकार भी नहीं कर सकता था,बस कुछ ही दिनों में भूख और कमजोरी के कारण बिलाव की मृत्यू हो गई।

मित्रों” कुल मिलाकर दुनिया मतलबी है,लेकिन हम दुनिया से दूर भी नहीं भाग सकते,इसलिए अगर जीवन में कोई भी आपकी मदद करे तो पहले उस मदद के पीछे छिपे स्वार्थ का पता करो..!!”

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बाज की उड़ान


एक राज्य में एक राजा अपनी प्रजा के साथ रहता था, राजा का राज्य ऐश्वर्य, धन-धान्य से भरपूर था, लेकिन फिर भी राज्य में हमेशा अशांति फैली रहती थी, राजा राज्य में फैली अशान्ति से हमेशा परेशान रहता था।

एक दिन राजा ने राज्य के सभी साधू-संतों की एक सभा बुलाई, और सभी साधू-संतो से राज्य में फैली अशांति का उपाय पूछा, सभी-साधू संतो ने आपसी सहमती से राजा को एक उपाय बताया, साधू महात्मा ने बताया की अगर राजा अपने महल में दो बाज के बच्चों को पाले तो राज्य में फैली अशांति दूर हो सकती है, साधुओं की बात मानकर राजा ने अपने सैनिकों को बाज के बच्चों को महल में लाने का आदेश दिया।

बाज के दोनों बच्चों को पलने के लिए राजा ने एक आदमी को महल में नियुक्त कर दिया, कुछ समय बाद जब राजा को राज्य में फैली अशांति दूर होते हुए नहीं दिखी उसे बाज के उन दो बच्चों को देखने की इच्छा हुई, राजा जब बाज के बच्चों को देखने गया तब तक बाज के वह बच्चे बड़े हो चुके थे, राजा ने बाज के बच्चों को पालने के लिए नियुक्त किए गए आदमी से कहा, कि वह इन बच्चों को उड़ते हुए देखना चाहता है, राजा की बात सुनकर उस आदमी ने बाज के उन बच्चो को उडा दिया।

राजा ने देखा, कि बाज के उन बच्चों में से एक बच्चा तो आसमान में काफी ऊपर तक उड़ रहा था, लैकिन दूसरा बाज थोड़ी देर आसमान में उड़ता और फिर आकर एक पेड़ पर बैठ जाता, राजा ने बाज की देख-रेख में नियुक्त आदमी से इसका कारण पूछा तो उसने बताया किन यह बाज शुरू से ही एसा करता है, कुछ देर आसमान में उड़ने के बाद यह बाज आकर वापस पेड की इस डाल पर आकर बेठ जाता है और इस डाल को छोडता ही नहीं है।

अगले दिन राजा ने पुरे राज्य में ऐलान करवा दिया, कि जो भी इस बाज को आसमान में दूर तक उड़ना सिखा देगा उसे मुह माँगा इनाम दिया जाएगा, बाज को उड़ना सिखाने के लिए पुरे राज्य से कई सारे लोग आए लेकिन बाज का रवैया जो का त्यों रहा, बाज कुछ देर आसमान में उड़ता और फिर आकर पेड की उसी डाल पर बेठ जाता।

एक दिन राजा ने देखा की दूसरा बाज भी पहले बाज के साथ आसमान में ऊँचा उड़ रहा था, दोनों बाजों को आसमान में एक साथ उड़न भरते देख रजा बहुत खुश हुआ, राजा ने अपने सैनिको को पता लगाने का आदेश दिया की किसने यह कारनामा कर दिखाया है।

सैनिकों ने पता लगाया, कि वहा व्यक्ति एक किसान है जिसने बाज को उड़ना सिखाया है, राजा ने किसान को महल में उपस्थित होने का हुक्म दिया, अगले दिन किसान राजा के महल में उपस्थित हुआ| राजा ने किसान से पूछा की कैसे उसने उस बाज को उड़ना सिखा दिया,

किसान ने बड़ी विनम्रता पूर्वक कहा, कि “महाराज मैंने धयान दिया की बाज रोज एक ही डाल के ऊपर आकर वापस बेठ जाता था इसलिए मैंने वह डाल ही काट दी जिस पर बाज बार-बार आकर वापस बेठ जाता था।”

किसान की बात सुनकर राजा को अपने अपने राज्य की अशांति का कारण पता चल गया।

तो मित्रों” कहानी का तर्क यही है, कि अपने अन्दर की बुरी आदत को पहचाने और उस डाल की तरह ही अपने अन्दर की कमी को काट कर फैक दें।

“बाज़” ऐसा पक्षी जिसे हम ईगल भी कहते है, जिस उम्र में बाकी पंछियो के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है।

मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग १२ कि.मी. ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर आधुनिक जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज ७ से ९ मिनट का समय लेती है।

यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा, उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है? तेरी दुनिया क्या है? तेरी ऊंचाई क्या है? तेरा धर्म बहुत ऊंचा है और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।

धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग २ कि.मी. उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। ७ कि.मी. के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते है।

लगभग ९ कि.मी. आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है।

अब धरती से वह लगभग ३००० मीटर दूर है लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है उसके स्वामित्व को।

अब उसकी दूरी धरती से केवल ७००/८०० मीटर होती है लेकिन उसके पंख अभी इतने मजबूत नहीं हुए है की वो उड़ सके।

धरती से लगभग ४००/५०० मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है।

फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपने कब्जे मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है।

यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है। और उसकी यह शिक्षा निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता।

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अनौखी युक्ति


एक नगर में एक लकड़हारा और एक पशुपालक रहता था | दोनों बहुत अच्छे मित्र थे | एक दुसरे पर जान देते थे | एक बार नगर में उत्सव हुआ | तब राजा की कन्या भी उस उत्सव को देखने आई | कन्या बहुत सुंदर थी | सभी की आँखे राजकुमारी पर ही आ टिकी थी |
जब पशुपालक ने राज कुमारी के दर्शन किये वो उनके प्रेम में दीवाना हो गया | उसे दिन रात हर जगह बस राजकुमारी की छवि ही दिखाई पड़ रही थी | उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था | उसकी इस हालत को देख उसके मित्र लकड़हारे को चिंता होने लगी | उसने अपने मित्र पशुपालक से इस दशा का कारण पूछा | तब पशुपालक ने बताया कि उसे राजकुमारी से प्रेम हो गया और वो उनके बिना जीवित नहीं रह सकता |
उसकी बात सुनकर लकड़हारा उसे एक सुझाव देता हैं कहता हैं कि सुना हैं राजकुमारी शिव भक्त हैं क्यूँ ना तुम इस माह की शिवरात्रि पर राजकुमारी से शिव का रूप धर कर मिलने जाओ | यह सुझाव पशुपालक को पसंद आ जाता हैं | वो अपने पशुओं में से सबसे सुंदर नंदी का चुनाव करता हैं | उसका पूरा श्रृंगार करता हैं और स्वयं भी शिव की भांति रूपधर कर शिवरात्रि की मध्य रात्रि को राजकुमारी को संदेश भिजवाता हैं कि आज रात्रि में शिव भगवान उन्हें दर्शन देंगे इसलिये अपने कक्ष की कुण्डी खोलकर रखे | राजकुमारी यह बात मान लेती हैं और रात्रि में कक्ष की कुण्डी खोलकर रखती हैं | मध्य रात्रि समय पशुपालक शिव का रूपधर राजकुमारी से मिलने आता हैं | जिसे देख राजकुमारी अचंभित रह जाती हैं | और उनके चरणों में गिर जाती हैं | पशुपालक उसे कहता हैं कि तुम देवी का रूप हो तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हारे समीप आया हूँ और तुमसे विवाह करना चाहता हूँ | राज कुमारी कहती हैं प्रभु इसके लिए आपको मेरे माता पिता से बात करनी होगी |

इस पर पशुपालक कहता हैं कन्या तुम देवी का रूप हो इसलिये मैं केवल तुम से बात कर सकता हूँ | तुम्हारे माता पिता साधारण मनुष्य हैं इसलिये हमें छिपकर ही विवाह करना होगा | राजकुमारी मान जाती हैं और शिव रूपी पशुपालक से विवाह कर लेती हैं |
अब पशुपालक रोजाना अर्धरात्रि में राजकुमारी के पास शिव के रूप में आने लगता हैं |
रोज कोई राजकुमारी के कक्ष में आता हैं | इसका दासियों को संदेह हो जाता हैं | दासियाँ यह बात महारानी को बताती हैं | महारानी महाराज से बात करती हैं | दोनों राजकुमारी के पास आते हैं और सच पूछते हैं | इस पर राजकुमारी पूरा सच अपने माता पिता को बताती हैं | माता पिता बहुत प्रसन्न होते हैं कि उनकी कन्या को स्वयं भगवान शिव ने पसंद किया | वो राजकुमारी से अपने जामाता से मिलवाने का कहते हैं | तब राजकुमारी कहती हैं कि वे साधारण मनुष्य से नहीं मिलते आप चाहे तो रात्रि में छिपकर उनके दर्शन कर सकते हैं |

माता पिता यही करते हैं रात्रि में पशुपालक को शिव समझकर बहुत खुश होते हैं |
इसी ख़ुशी के कारण राजा अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए आस पास के राज्यों में आक्रमण करने लगते हैं | उन्हें लगता हैं कि जिस राज्य का जामाता भगवान शिव हैं वो राज्य कैसे परास्त हो सकता हैं | देखते ही देखते छोटे- छोटे युद्ध महा संग्राम ने बदल जाते हैं और राज्य चारों तरफ से घिर जाता हैं | संकट के समय में महाराज अपनी पुत्री को कहते हैं कि वो भगवान शिव से कहे कि वो इस संकट से बाहर निकाले | राजकुमारी अपने पति से आग्रह करती हैं |

अब पशुपालक चिंतित हो जाता हैं | ना डरकर भाग सकता हैं और ना अकेले युद्ध कर सकता हैं | वो एक नया उपाय सोचता हैं और शिव जी का तांडव नृत्य सीखता हैं और अपने मित्र लकडहारे की मदद से एक उड़ने वाला नंदी बनवाता हैं |
जैसे ही रात्रि का समय होता हैं वो सीमा पर जाकर आकाश में नंदी पर बैठ कर सबके सामने जाता हैं | उसे देख सब डर जाते हैं फिर धरती पर उतरकर अपने क्रोध को तांडव के रूप में दिखाता हैं जिससे सभी डर जाते हैं और वहाँ से भाग जाते हैं | इस प्रकार पशुपालक अपने राज्य को संकट से बचाता हैं लेकिन उसे अपनी भूल का अहसास होता हैं इसलिये वो राज्य सभा में जाकर अपनी गलती स्वीकार करता हैं | सभी दरबारी भौचके से रह जाते हैं |
राजा को क्रोध आता हैं लेकिन वो पशुपालक के साहस से खुश भी हो जाते हैं क्यूंकि मामला खत्म हो चूका था अगर पशुपालक चाहता तो अपना नाटक जारी रख सकता था लेकिन उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने बिना परिणाम की सोचे सभी के सामने कुबूल किया |
राजा को भी अपनी गलती का अहसास होता हैं कि उसने बिना सोचे समझे राज्यों पर हमला कर दिया | अगर पशुपालक उपाय ना करता तो वो अपना राज्य हार गया होता | सब कुछ सोचने के बाद राजा पशुपालक को क्षमा करते हैं और अपनी कन्या का विवाह कर उसे राज्य में सम्मानीय पद प्रदान करते हैं |

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कर्म को ब्रह्म अर्पित करें



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महामुनी व्यास को नदी के उस पार जाना था, और वे नाव के प्रशिक्षा कर रहे थे..
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इतने में वहां कुछ गोपीयाँ पहुंची..
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काफी समय प्रतीक्षा करने के बाद भी जब कोई नाव नहीं आई तो गोपीयो ने निराश हो व्यासदेव से पूछा..
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महाराज नाव तो कोई आ नहीं रही है तो क्या किया जाए ?
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व्यासजी ने कहा चिंता ना करो तुम लोगों को नदी पार करा दूंगा।
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मगर मै भी नाव की प्रतीक्षा करते करते थक गया हूं तो मुझे भूख लगी है क्या तुम लोग कुछ दे सकती हो ?
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गोपीयाँ के पास ताजा दूध मलाई मक्खन था। जिसमे से कुछ व्यासजी को दे दिया।
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उन्होंने दूध मक्खन तो खा लिया लेकिन पार करने के बारे में कुछ नहीं बोले रहे हैं.. तब वे उनसे बोली नाव का क्या हुआ ?
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व्यास जी थोड़ा आगे गए वह हाथ जोड़कर नदी से प्रार्थना की जमने यदि मैंने कुछ खाया ना हो तो इसके बल पर तुम जल को दो भागों में विभक्त करो जिससे हम लोग उस पार जा सके।
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ज्यो ही उन्होंने ऐसा ने कहा नदी दो भागों में विभाजित हो गई और बीच में सूखा किनारा बिछ गया।
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यह देख गोपीयाँ चकित हो गई मन ही मन सोचने लगे कि थोड़ी देर पहले तो हमसे इन्होंने दूध मक्खन माग कर खाया था अब कह रहे हैं कि कुछ नहीं खाया।
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यमुना को भी इनके कथन पर विश्वास हो गया। आखिर उनहोने व्यासदेव से इसका रहस्य पूछ लिया।
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महामुनी ने कहा आपने मुझे दूध मलाई मक्खन अवश्य दी थी किंतु उसे मैंने नहीं मेरे ह्रदय मे अवस्थित भगवान ने खाया था।
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मनुष्य कर्म तो करता है पर वह कर्म को ब्रह्म अर्पित बुद्धी से नहीं करता..
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यदि वह ऐसा करें तो कर्म का बंधन ही नहीं रहेगा और वह कर्म करके भी कर्म रहित रहेगा। इसके लिए दृढ़ विश्वास की बड़ी आवश्यकता है।
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आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए साधना की आवश्यकता है। यदि दृढ़ विश्वास हो तो थोड़ी साधना में काम चल सकता है..
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गीता कहती हैं कि जो कुछ भी करता है मेरे अर्पित कर।
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श्रावण शुक्ल पञ्चमी, विक्रम संवत 2080