Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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એક યુગલ મેરેજ રજિસ્ટ્રીની ઓફિસમાં દાખલ થયું. ત્યાં અધિકારીના ટેબલ પર નોંધણીનું કાગળ મુકતા કહ્યું ‘અમે છુટા પડવાનું નક્કી કર્યું છે, અમારે આ લગ્નની નોંધણી રદ કરાવવી છે.’

‘અરે, તમે તો એ જ છો ને કે જે હમણાં અડધો કલાક પહેલા જ અહીંથી નોંધણી કરાવીને બહાર નીકળ્યા ?!’ અધિકારીએ નજીકના ચશ્મા ઉતારીને તેમની સામે જોતા કહ્યું.

‘હા સાહેબ એ જ છીએ અને છેલ્લા અડધો કલાકથી બહાર ઝગડી જ રહ્યા છીએ, હજી પુરા પગથિયાં પણ ઉતર્યા નથી.’ જાણે કોઈ મોટો જંગ હારીને નાસીપાસ થયો હોય એવા ટોનમા યુવકે કહ્યું.

‘ઘર પહોંચવા સુધી તો રાહ જોવી હતી ! જિંદગી ક્યાં નાસી જવાની હતી ?!’ અધિકારીના પ્રશ્નમાં કટાક્ષ સ્પષ્ટ વર્તાતો હતો.

‘એ તો પૂછો આને, હું તો બહુ ઇગોઇસ્ટિક મોન્સ્ટર છું’ યુવકે આંગળીઓથી ઉચ્ચારણની સાઈન કરતા કહ્યું.

ગલોફામાં ગુટખા દબાઈને વાત કરતા અધિકારી હવે થૂંક્યા વગર મોઢું ખોલી શકે એમ નહતા એટલે એમણે ઇશારાથી જ યુવતીને પૂછી કાઢ્યું.

‘સાહેબ તમે જ રજીસ્ટર ખોલીને જુઓ અને પછી કહો’ યુવતીની આંખમાં પાણી હતા અને અધિકારીની આંખમાં પ્રશ્ન, શું જોઉ ?! જુઓ મેં કેટલા નાના અક્ષરમાં સહી કરી છે અને એણે ?! કેટલા મોટા ફાફડા જેવા અક્ષરમાં સહી કરી છે, મને તો બહાર નીકળતા જ થયું કે આવા ઇગોઇસ્ટિક માણસ સાથે ના રહેવાય.

‘તે માણસ નથી કહ્યું મોન્સ્ટર કહ્યું છે, સાહેબ સામે તારી ભાષા જેવી છે એવી જ બોલ’ યુવકે ગુસ્સામાં કહ્યું. અનુભવી સાહેબને અણસાર આવી ગયો કે હમણાં કચેરીમાં યુદ્ધ ફાટી નીકળશે એટલે તરત બંનેને હાથથી શાંત રહેવાનો ઇશારો કરતા કરતા થૂંકવા ચાલ્યા ગયા.

આવું તે કંઈ બનતું હશે ?! એવું તમે વિચારતા હોવ તો હું તમને કહી દઉં કે ના બને, આ તો નાની નાની બાબતોનો ઇસ્યુ બનાવીને ઝગડતા રહેતા યુગલો પર એક કટાક્ષ છે. મને હંમેશા એમ થાય કે માત્ર યુગલો જ શું કામ, દરેક વ્યક્તિ નાની નાની બાબતોમાં ટસલ પર આવી જતી જોવા મળે છે. મૂળે તો બધી જ પેઢીની સહનશક્તિમાં થયેલા ઘટાડાની વાત છે. જે પેઢીમાં સહનશક્તિ હતી તેનામાં હવે રહી નથી. તે પેઢીએ પોતાનાથી પાછળની પેઢીને આ બાબતે જોઈએ એવી કેળવણી આપી નથી. મીડિયા, રાજકારણ, ધર્મ, સમાજ વગેરે પોતપોતાની રીતે બળતામાં ઘી હોમતા જાય છે અને પોતાના રોટલા શેકતા જાય છે. સરવાળે, અસહિષ્ણુતા ચારેકોર, કોણ કોને શીખવે અને કોણ કોને સહન કરે ?! સાથે રહેવામાં પ્રશ્નો ના થાય તો જ નવાઈ, લુપ્ત થઈ ગયેલા સયુંક્ત કુટુંબો આનું સૌથી વરવું ઉદાહરણ છે.
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હંસલ ભચેચ
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जीने की कला – प्रेरणादायक लेख!
एक शाम माँ ने दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब रात का खाना बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी। मुझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर कोई कुछ कहेगा। परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया। मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए “साॅरी” बोलते हुए जरूर सुना था।

और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा “मुझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद है!” देर रात को मैंने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद है? उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लेते हुए कहा:- तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, और वो सचमुच बहुत थकी हुई थी और… वेसे भी… एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती, परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।

तुम्हें पता है बेटा जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से… अपूर्ण लोगों से… कमियों से… दोषों से… मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ मैंने इतने सालों में सीखा है कि एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करो… अनदेखी करो… और चुनो… पसंद करो… आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना!

मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है… उसे हर सुबह दु:ख… पछतावे… खेद के साथ जताते हुए बर्बाद न करें! जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करो और जो नहीं करते उनके लिए अपनांपन – सहानुभूति रखो!

किसी ने क्या खूब कहा है:-

“मेरे पास वक्त नहीं उन लोगों से नफरत करने का जो मुझे पसंद नहीं करते क्योंकि मैं व्यस्त हूँ उन लोगों को प्यार करने में जो मुझे पसंद करते है”

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व्यर्थ का क्रोध !!



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एक साँप, एक बढ़ई की औजारों वाली बोरी में घुस गया। घुसते समय, बोरी में रखी हुई बढ़ई की आरी उसके शरीर में चुभ गई और उसमें घाव हो गया, जिससे उसे दर्द होने लगा और वह विचलित हो उठा।

गुस्से में उसने, उस आरी को अपने दोनों जबड़ों में जोर से दबा दिया। अब उसके मुख में भी घाव हो गया और खून निकलने लगा।

अब इस दर्द से परेशान हो कर, उस आरी को सबक सिखाने के लिए, अपने पूरे शरीर को उस साँप ने उस आरी के ऊपर लपेट लिया और पूरी ताकत के साथ उसको जकड़ लिया। इस से उस साँप का सारा शरीर जगह जगह से कट गया और वह मर गया।

ठीक इसी प्रकार कई बार, हम तनिक सा आहत होने पर आवेश में आकर सामने वाले को सबक सिखाने के लिए, अपने आप को अत्यधिक नुकसान पहुंचा देते हैं।

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समस्या रूपी बंदर !!



एक बार स्वामी विवेकानंद को बंदरों का सामना करना पड़ा था। वह इस आप बीती को कई अवसरों पर बड़े चाव के साथ सुनाया करते थे। इस अनुभव का लाभ उठाने की बात भी करते थे।

उन दिनों स्वामी जी काशी में थे, वह एक तंग गली में गुजर रहे थे। सामने बंदरों का झुंड आ गया। उनसे बचने के लिए स्वामी जी पीछे को भागे। परंतु वे उनके आक्रमण को रोक नहीं पाए। बंदरों ने उनके कपडे तो फाड़े ही शरीर पर बहुत-सी खरोंचें भी आ गईं। दो-तीन जगह दांत भी लगे। शोर सुनकर पास के घर से एक व्यक्ति ने उन्हें खिड़की से देखा तुरंत कहा- “स्वामी जी! रुक जाओ, भागो मत। घूंसा तानकर उनकी तरफ बढ़ो। “स्वामी जी के पांव रुके। घूंसा तानते हुए उन्हें ललकारने लगे। बंदर भी डर गए और इधर-उधर भाग खड़े हुए। स्वामीजी गली को बड़े आराम से पार कर गए।

इस घटना को सुनाते हुए स्वामी जी अपने मित्रों तथा शिष्यों को कहा करते- “मित्रो! हमें चाहिए कि विपरीत हालात में डटे रहें, भागें नहीं। घूंसा तानें। सीधे हो जाएं। आगे बढ़े। पीछे नहीं हटें। कामयाबी हमारे कदमों में होगी।” वास्तव में समस्या पलायन से नहीं सामना करने से खत्म होती है। भागने वालों का समस्या बंदर की भाँति पीछा करती है।

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सोच का फर्क !!



~एक बार एक पिता और उसका पुत्र जलमार्ग से कहीं यात्रा कर रहे थे और तभी अचानक दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।

पिता ने पुत्र से कहा, “अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।”

अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि, “वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।”

उन्होंने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा, ”हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।”

ईश्वर द्वारा प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया।

फिर उसने प्रार्थना कि, “एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।”

तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी।

अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँग लूँ ? उसने ऐसा ही किया।

उसने प्रार्थना कि, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।

तत्काल नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा।

तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?

पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उन्होंने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी। शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ?

आकाशवाणी ने कहा, ‘क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?

पुत्र बोला, नहीं।

आकाशवाणी बोली तो सुनो, तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की… “हे भगवन! मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना क्योंकि मैं उसे दुःख में हरगिज़ नहीं देख सकता औऱ अगर मरने की बारी आए तो मेरी मौत पहले हो” और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।

पुत्र बहुत शर्मिंदा हो गया।

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एक रुपये का सिक्का !!


एक ब्राह्मण व्यक्ति सुबह उठकर मंदिर की ओर जा रहा था। वहां उसे रास्ते में ₹1 का सिक्का मिलता है। वह ब्राह्मण के मन में विचार आता है कि यह ₹1 रुपया में किसी दरिद्र को दे देता हूं।

वह पूरे नगर में ढूंढता है, उसे कोई दरिद्र और भिखारी नहीं मिलता है। हर रोज की तरह सुबह ब्राह्मण मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वहां उसे एक राजा दिखाई देता है वह बहुत बड़ी सेना लेकर दूसरे नगर में जाता रहता है।

राजा जैसे ब्राह्मण व्यक्ति को देखता है उसे प्रमाण करता है और कहता है कि महात्मा मैं युद्ध करने जा रहा हूं, आप मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं दूसरे नगर के राज्यों को भी जीत सकूं।

यह सुनते ही ब्राह्मण व्यक्ति ₹1 का सिक्का राजा के हाथ में थमा देता है। राजा आश्चर्यचकित हो जाता है और पूछता है कि आपने यह ₹1 का सिक्का मेरे हाथ में क्यों थमाया ? ब्राह्मण व्यक्ति उत्तर देते हुए कहते हैं कि, मैं कई दिनों से कोई दरिद्र व्यक्ति ढूंढ रहा हूं जिसे ₹1 रुपया दे सकूं।

पूरे नगर में ऐसा कोई दरिद्र और भिखारी व्यक्ति नहीं मिला जिसे मैं एक रुपये दे सकता हूं। सिर्फ और सिर्फ आप ही मुझे ऐसे दरिद्र व्यक्ति मिले जिनके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है जिसकी अपेक्षा हमेशा अधिक से अधिक पाने की रहती है। इसलिए मैं यह ₹1 का सिक्का आपको देना चाहता हूं क्योंकि जो दरिद्र व्यक्ति की तलाश में था वह साक्षत मेरे सामने खड़ा है। यह सुनकर राजा का मस्तिष्क शर्म से झुक जाता है और वह अपनी सेना को वापस जाने का आदेश देता है।