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बदलाव की शुरुआत



एक लड़का सुबह- सुबह तालाब के  किनारे दौड़ने को जाया करता था | आते – जाते वो एक बूढी महिला को देखता था | वो बूढी महिला हर रोज तालाब के किनारे छोटे – छोटे कछुवों की पीठ को साफ़ किया करती थी | लड़का यह सब हर रोज देखता ।

एक दिन उसने सोचा कि इस का क्या कारण हो सकता। वो लड़का उस बूढी महिला के पास गया और उनका अभिवादन किया – नमस्ते आंटी जी ! और पूछा  कि मै आप को हर रोज कछुवों की पीठ को साफ़ करते हुआ देखता हू । आप यह क्यू करती हो ???

बूढी महिला ने बड़े प्यार से लड़के को देखा और बोला – बेटा मै यहा हर रविवार आती हु । मुझे इन कछुवों की पीठ को साफ कर के अछा लगता है। अंदर से शांति का अनुभव होता है ।

क्योंकि इनकी पीठ पर जो कवच होता है , उस पर कचरा जमता जाता है जिस की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है।  इसलिए इन  कछुवे को तैरने में मुश्किल का सामना करना पड़ता है , अगर  कुछ समय बाद तक अगर ऐसा ही रहे, इस को साफ ना किया जाए  तो ये कवच भी कमजोर हो जाते है । जिस से इनकी ज़िंदगी भी खतरे में पड़ जाती है । इसलिए मै इन कवच को हर रविवार साफ करने आती हू ।

यह सुनकर लड़का बड़ा हैरान हुआ | उसने फिर एक जाना – पहचाना सा सवाल किया और बोला “बेशक आप बहुत अच्छा काम कर रहे है लेकिन फिर भी एक बात सोचिये कि इन जैसे कितने कछुवे है , जो इनसे भी बुरी हालत में है। जबकि आप सभी के लिए ये नहीं कर सकते तो उनका क्या – क्योंकि आपके अकेले के बदलने से तो कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा ।

बूढ़ी महिला मुस्कुराई और बोलीं –  भले ही मेरे ऐसा करने से दुनिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा लेकिन सोचो इस एक कछुवे की तो पूरी दुनिया बदल जाएगी । इसके लिए तो ये बहुत बड़ी बात होगी…

बस यहीं सोच कर मुझे ख़ुशी और सुकून मिल जाता है ..कि मैं दुनिया को तो नहीं बदल सकती लेकिन मैंने किसी की दुनिया तो बदल दी।

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छोटा या बड़ा


वर्धमान नामक शहर में एक बहुत ही कुशल व्यापारी दंतिल रहता था। राजा को उसकी क्षमताओं के बारे में पता था जिसके चलते राजा ने उसे राज्य का प्रशासक बना दिया। अपने कुशल तरीकों से व्यापारी दंतिल ने राजा और आम आदमी को बहुत खुश रखा। कुछ समय के बाद व्यापारी दंतिल ने अपनी लड़की का विवाह तय किया। इस उपलक्ष्य में उसने एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। इस भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा तक सभी को आमंत्रित किया। राजघराने का एक सेवक, जो महल में झाड़ू लगाता था, वह भी इस भोज में शामिल हुआ। मगर गलती से वह एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो केवल राज परिवार के लिए रखी हुयी थी। सेवक को उस कुर्सी पर बैठा देखकर व्यापारी दंतिल को गुस्सा आ जाता है और वह सेवक को दुत्कार कर वह वहाँ से भगा देता है। सेवक को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है और वह व्यापारी दंतिल को सबक सिखाने का प्रण लेता है।

अगले ही दिन सेवक राजा के कक्ष में झाड़ू लगा रहा होता है। वह राजा को अर्धनिद्रा में देख कर बड़बड़ाना शुरू करता है। वह बोलता है, “इस व्यापारी दंतिल की इतनी मजाल की वह रानी के साथ दुर्व्यवहार करे। ” यह सुन कर राजा की नींद खुल जाती है और वह सेवक से पूछता है, “क्या यह वाकई में सच है? क्या तुमने व्यापारी दंतिल को दुर्व्यवहार करते देखा है?” सेवक तुरंत राजा के चरण पकड़ता है और बोलता है, “मुझे माफ़ कर दीजिये, मैं कल रात को सो नहीं पाया। मेरी नींद पूरी नहीं होने के कारण कुछ भी बड़बड़ा रहा था।” यह सुनकर राजा सेवक को कुछ नहीं बोलता लेकिन उसके मन में शक पैदा हो जाता है।

उसी दिन से राजा व्यापारी दंतिल के महल में निरंकुश घूमने पर पाबंदी लगा देता है और उसके अधिकार कम कर देता है। अगले दिन जब व्यापारी दंतिल महल में आता है तो उसे संतरिया रोक देते हैं। यह देख कर व्यापारी दंतिल बहुत आश्चर्य -चकित होता है। तभी वहीँ पर खड़ा हुआ सेवक मज़े लेते हुए बोलता है, “अरे संतरियों, जानते नहीं ये कौन हैं? ये बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो तुम्हें बाहर भी फिंकवा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसा इन्होने मेरे साथ अपने भोज में किया था। तनिक सावधान रहना।”

यह सुनते ही व्यापारी दंतिल को सारा माजरा समझ में आ जाता है। वह सेवक से माफ़ी मांगता है और सेवक को अपने घर खाने पर बुलाता है। व्यापारी दंतिल सेवक की खूब आव-भगत करता है। फिर वह बड़ी विनम्रता से भोज वाले दिन किये गए अपमान के लिए क्षमा मांगता है और बोलता है की उसने जो भी किया, गलत किया। सेवक बहुत खुश होता है और व्यापारी दंतिल से बोलता है, “आप चिंता ना करें, मैं राजा से आपका खोया हुआ सम्मान आपको ज़रूर वापस दिलाउंगा।”

अगले दिन राजा के कक्ष में झाड़ू लगाते हुआ सेवक फिर से बड़बड़ाने लगता है, “हे भगवान, हमारा राजा तो इतना मूर्ख है कि वह गुसलखाने में खीरे खाता है।” यह सुनकर राजा क्रोधित हो जाता है और बोलता है, “मूर्ख, तुम्हारी ये हिम्मत? तुम अगर मेरे कक्ष के सेवक ना होते, तो तुम्हें नौकरी से निकाल देता।” सेवक फिर राजा के चरणों में गिर जाता है और दुबारा कभी ना बड़बड़ाने की कसम खाता है।

राजा भी सोचता है कि जब यह मेरे बारे में इतनी गलत बातें बोल सकता है तो इसने व्यापारी दंतिल के बारे में भी गलत बोला होगा। राजा सोचता है की उसने बेकार में व्यापारी दंतिल को दंड दिया। अगले ही दिन राजा व्यापारी दंतिल को महल में उसकी खोयी प्रतिष्ठा वापस दिला देता है।

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ईश्वर बहुत दयालु है


एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था।उसमें तरह-तरह के फल होते थे और उस बगीचा की सारी देखरेख एक किसान अपने परिवार के साथ करता था. वह किसान हर दिन बगीचे के ताज़े फल लेकर राजा के राजमहल में जाता था।

एक दिन किसान ने पेड़ों पे देखा नारियल अमरुद, बेर, और अंगूर पक कर तैयार हो रहे हैं, किसान सोचने लगा आज कौन सा फल महाराज को अर्पित करूँ, फिर उसे लगा अँगूर करने चाहिये क्योंकि वो तैयार हैं इसलिये उसने अंगूरों की टोकरी भर ली और राजा को देने चल पड़ा!  किसान जब राजमहल में पहुचा,राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था और नाराज भी लग रहा था किसान रोज की तरह मीठे रसीले अंगूरों की टोकरी राजा के सामने रख दी और थोड़े दूर बेठ गया,अब राजा उसी खयालों-खयालों में टोकरी में से अंगूर उठाता एक खाता और एक खींच  कर किसान के माथे पे निशाना साधकर फेंक देता।

राजा का अंगूर जब भी किसान के माथे या शरीर  पर लगता था किसान कहता था, ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’ राजा फिर और जोर से अंगूर फेकता था किसान फिर वही कहता था ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’।

थोड़ी देर बाद राजा को एहसास हुआ की वो क्या कर रहा है और प्रत्युत्तर क्या आ रहा है वो सम्भल कर बैठा,उसने किसान से कहा,मै तुझे बार-बार अंगूर मार रहा हूँ,और ये अंगूर तुंम्हे  लग भी रहे हैं,फिर भी तुम यह बार-बार क्यों कह रहे हो की ईश्वर बड़ा दयालु है।

किसान ने नम्रता से बोला, महाराज,बागान में आज नारियल,बेर और अमरुद भी तैयार थे पर मुझे भान हुआ क्यों न आज आपके लिये अंगूर् ले चलूं लाने को मैं अमरुद और बेर भी ला सकता था पर मैं अंगूर लाया। यदि अंगूर की जगह नारियल,बेर या बड़े बड़े अमरुद रखे होते तो आज मेरा हाल क्या होता ? इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि  ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’!!

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इंसानियत


एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला~ ‘‘साहब! बूट पॉलिश ?’’

उसकी दयनीय सूरत देखकर उन्होंने अपने जूते आगे बढ़ा दिये, बोले- ‘‘लो, पर ठीक से चमकाना।’’

लड़के ने काम तो शुरू किया परंतु अन्य पॉलिशवालों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी।

वे बोले~ ‘‘कैसे ढीले-ढीले काम करते हो? जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ !’’

वह लड़का मौन रहा।

इतने में दूसरा लड़का आया। उसने इस लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट काम में जुट गया। पहले वाला गूँगे की तरह एक ओर खड़ा रहा। दूसरे ने जूते चमका दिये।

‘पैसे किसे देने हैं?’ इस पर विचार करते हुए उन्होंने जेब में हाथ डाला। उन्हें लगा कि ‘अब इन दोनों में पैसों के लिए झगड़ा या मारपीट होगी।’

फिर उन्होंने सोचा, ‘जिसने काम किया, उसे ही दाम मिलना चाहिए।’ इसलिए उन्होंने बाद में आनेवाले लड़के को पैसे दे दिये।

उसने पैसे ले तो लिये परंतु पहले वाले लड़के की हथेली पर रख दिये। प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया।

वह आदमी विस्मित नेत्रों से देखता रहा। उसने लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा~ ‘‘यह क्या चक्कर है?’’

लड़का बोला~ ‘‘साहब! यह तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं। ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया नहीं तो इसकी वृद्धा माँ और बहनों का क्या होता,बहुत स्वाभिमानी है… भीख नहीं मांग सकता….!’’

फिर थोड़ा रुककर वह बोला ~ ‘‘साहब! यहाँ जूते पॉलिश करनेवालों का हमारा समूह है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं जिन्हें सब ‘सत्संगी चाचाजी’ कहकर पुकारते हैं।

वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी सत्संग की बातें बताते रहते हैं। उन्होंने ही ये सुझाव रखा कि ‘साथियो! अब यह पहले की तरह स्फूर्ति से काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ?

ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना, स्नेह, सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकट करने का एक अवसर दिया है।

जैसे पीठ, पेट, चेहरा, हाथ, पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही शरीर के अंग, ऐसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी हैं एक ही आत्मा! हम सब एक हैं।

स्टेशन पर रहने वाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी करेंगे।’’

जूते पॉलिश करनेवालों के दल में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊँचाई देखकर वे सज्जन चकित रह गये औऱ खुशी से उसकी पीठ थपथपाई…औऱ सोंचने लगे शायद इंसानियत अभी तक जिंदा है…..!!

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सन्तों की शरण


एक गाँव में एक ठाकुर थे। उनके कुटुम्ब में कोई आदमी नहीं बचा, केवल एक लड़का रह गया। वह एक ठाकुर के घर काम करने लग गया। रोजाना सुबह वह बछड़े चराने जाता था और लौटकर आता तो रोटी खा लेता था। ऐसे समय बीतता गया। एक दिन दोपहर के समय वह बछड़े चराकर आया तो ठाकुर की नौकरानी ने उसको ठण्डी रोटी खाने के लिये दे दी। उसने कहा कि थोड़ी-सी छाछ या राबड़ी मिल जाय तो ठीक है। नौकरानी ने कहा कि जा-जा, तेरे लिये बनायी है राबड़ी! जा, ऐसे ही खा ले, नहीं तो तेरी मरजी ! उस लड़के के मन में गुस्सा आया कि मैं धूप में बछड़े चराकर आया हूँ, भूखा हूँ, पर मेरे को बाजरे की रूखी रोटी दे दी, राबड़ी माँगी तो तिरस्कार कर दिया! वह भूखा ही वहाँ से चला गया। गाँव के पास में एक शहर था। उस शहर में सन्तों की एक मण्डली आयी हुई थी। वह लड़का वहाँ चला गया। सन्तों ने उसको भोजन कराया और पूछा कि तेरे परिवार में कौन है ? उसने कहा कि कोई नहीं है तो सन्तों ने कहा कि तू साधु बन जा। लड़का साधु बन गया। फिर वह पढ़ने के लिये काशी चला गया। वहाँ पढ़कर वह विद्वान् हो गया। फिर समय पाकर वह मण्डलेश्वर (महन्त) बन गया। मण्डलेश्वर बनने के बाद एक दिन उनको उसी शहर में आने का निमन्त्रण मिला। वे अपनी मण्डली को लेकर वहाँ आये। जिनके यहाँ वे बचपन में काम करते थे, वे ठाकुर बूढ़े हो गये थे। ठाकुर उनके पास गये, उनका सत्संग किया और प्रार्थना की कि महाराज! एक बार हमारी कुटिया में पधारो, जिससे हमारी कुटिया पवित्र हो जाय ! मण्डलेश्वरजी ने उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया! मण्डलेश्वरजी अपनी मण्डली के साथ ठाकुर के घर पधारे। भोजन के लिये पंक्ति बैठी। गीता के पन्द्रहवें अध्याय का पाठ हुआ। फिर सबने भोजन करना आरम्भ किया। महाराज के सामने तख्ता लगा हुआ था और उस पर तरह-तरह के भोजन के पदार्थ रखे हुए थे। अब ठाकुर महाराज के पास आये। साथ में नौकर था, जिसके हाथ में हलवे का पात्र था। ठाकुर प्रार्थना करने लगे कि ‘महाराज! कृपा करके थोड़ा सा हलवा मेरे हाथ से ले लो!’ महाराज को हँसी आ गयी। ठाकुर ने पूछा कि ‘आप हँसे कैसे ?’ महाराज बोले कि ‘मेरे को पुरानी बात याद आ गयी, इसलिये हँसा।’ ठाकुर बोले कि ‘बताओ, वह बात क्या है ?’ महाराज ने सब सन्तों से कहा कि ‘भाई, थोड़ा ठहर जाओ, बैठे रहो, ठाकुर बात पूछते हैं तो बताता हूँ।’ महाराज ने ठाकुर से पूछा कि आपके कुटुम्ब में वह परिवार रहता था, उस परिवार में अब कोई है क्या ? ठाकुर बोले कि केवल एक लड़का था। उसने कई दिन बछड़े चराये, फिर न जाने कहाँ चला गया! बहुत दिन हो गये, फिर कभी उसको देखा नहीं। महाराज बोले कि वही मैं हूँ! पास में सन्त-मण्डली ठहरी हुई थी, मैं वहाँ चला गया। पीछे काशी चला गया, वहाँ पढ़ाई की और फिर मण्डलेश्वर बन गया। यही वह आँगन है, जहाँ आपकी नौकरानी ने मेरे को थोड़ी-सी राबड़ी देने से भी मना कर दिया था। अब मैं भी वही हूँ, आँगन भी वही है और आप भी वही हैं, पर अब आप अपने हाथ से मोहनभोग दे रहे हो कि महाराज, कृपा करके थोड़ा मेरे हाथ से ले लो!
माँगे मिले न राबड़ी, करूँ कहाँ लगि वरण।
मोहनभोग गले में अटक्या, आ सन्तों की शरण ॥
सन्तों की शरण लेनेमात्र से इतना हो गया कि जहाँ राबड़ी नहीं मिलती थी, वहाँ मोहनभोग भी गले में अटक रहा है! अगर कोई भगवान की शरण ले ले तो वह सन्तों का भी आदरणीय हो जाय। लखपति- करोड़पति बनने में सब स्वतन्त्र नहीं हैं, पर भगवान्‌ के शरण होने में, भगवान्‌ का भक्त बनने में सब-के-सब स्वतन्त्र हैं और ऐसा मौका इस मनुष्यजन्म में ही है।

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जीवन कहानी


एक बड़ा सुन्दर शहर था, उसका राजा बड़ा उदार और धर्मात्मा था। प्रजा को प्राणों के समान प्यार करता और उनकी भलाई के लिए बड़ी बड़ी सुन्दर राज व्यवस्थाएं करता। उसने एक कानून प्रचलित किया कि अमुक अपराध करने पर देश निकाले की सजा मिलेगी। कानून तोड़ने वाले अनेक दुष्टात्मा राज्य से निकाल बाहर किये गये, राज्य में सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य था।

एक बार किसी प्रकार वही जुर्म राजा से बन पड़ा। बुराई करते तो कर गया पर पीछे उसे बहुत दुःख हुआ। राजा था सच्चा, अपने पाप को वह छिपा भी सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।

दूसरे दिन बहुत दुखी होता हुआ वह राज दरबार में उपस्थित हुआ और सबके सामने अपना अपराध कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा मैं अपराधी हूँ इसलिए मुझे दण्ड मिलना चाहिए। दरबार के सभासद ऐसे धर्मात्मा राजा को अलग होने देना नहीं चाहते थे फिर भी राजा अपनी बात पर दृढ़ रहा उसने कड़े शब्दों में कहा राज्य के कानून को मैं ही नहीं मानूँगा तो प्रजा उसे किस प्रकार पालन करेगी? मुझे देश निकाला होना ही चाहिये।

निदान यह तय करना पड़ा कि राजा को निर्वासित किया जाय। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि नया राजा कौन हो? उस देश में प्रजा में से ही किसी व्यक्ति को राजा बनाने की प्रथा थी। जब तक नया राजा न चुन लिया जाय तब तक उसी पुराने राजा को कार्य भार सँभाले रहने के लिए विवश किया गया। उसे यह बात माननी पड़ी।

उस जमाने में आज की तरह वोट पड़कर चुनाव नहीं होते थे। तब वे लोग इस बात को जानते ही न हों सो बात न थी। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह प्रथा उपहासास्पद है। लालच, धौंस, और झूठे प्रचार के बल पर कोई नालायक भी चुना जा सकता है। इसलिए उपयुक्त व्यक्ति की कसौटी उनके सद्गुण थे। जो अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता था वही अधिकारी समझा जाता था।

उस देश का राजा जैसा धर्मात्मा था वैसा ही प्रधान मन्त्री बुद्धिमान था। उसने नया राजा चुनने की तिथि नियुक्त की। और घोषणा की कि अमुक तिथि को दिन के दस बजे जो सबसे पहले राजमहल में जाकर महाराज से भेंट करेगा वही राजा बना दिया जायेगा। राजमहल एक पथरीली पहाड़ी पर शहर से जरा एकाध मील हठ कर जरूर था पर उसके सब दरवाजे खोल दिये गये थे भीतर जाने की कोई रोक टोक न थी। राजा के बैठने की जगह भी खुले आम थी और वह मुनादी करके सबको बता दी गई थी।

राजा के चुनाव से एक दो दिन पहले प्रधान मन्त्री ने शहर खाली करवाया और उसे बड़ी अच्छी तरह सजाया। सभी सुखोपभोग की सामग्री जगह जगह उपस्थिति कर दी। उन्हें लेने की सबको छुट्टी थी किसी से कोई कीमत नहीं ली जाती। कहीं मेवे मिठाइयों के भण्डार खुले हुए थे तो कहीं खेल, तमाशे हो रहे थे कहीं आराम के लिए मुलायम पलंग बिछे हुए थे तो कहीं सुन्दर वस्त्र, आभूषण मुफ्त मिल रहे थे। कोमलाँगी तरुणियाँ सेवा सुश्रूषा के लिए मौजूद थीं जगह -जगह नौकर दूध और शर्बत के गिलास लिये हुए खड़े थे। इत्रों के छिड़काव और चन्दन के पंखे बहार दे रहे थे। शहर का हर एक गली कूचा ऐसा सज रहा था मानो कोई राजमहल हो।

चुनाव के दिन सबेरे से ही राजमहल खोल दिया गया और उस सजे हुए शहर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी गई। नगर से बाहर खड़े हुए प्रजाजन भीतर घुसे तो वे हक्के-बक्के रह गये। मुफ्त का चन्दन सब कोई घिसने लगा। किसी ने मिठाई के भण्डार पर आसन बिछाया तो कोई सिनेमा की कुर्सियों पर जम बैठा, कोई बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने लगा तो किसी ने गहने पसन्द करने शुरू किये। कई तो सुन्दरियों के गले में हाथ डालकर नाचने लगे सब लोग अपनी अपनी रुचि के अनुसार सुख सामग्री का उपयोग करने लगे।

एक दिन पहले ही सब प्रजाजनों को बता दिया गया था कि राजा से मिलने का ठीक समय 10 बजे है। इसके बाद पहुँचने वाला राज का अधिकारी न हो सकेगा। शहर सजावट चन्द रोजा है, वह कल समय बाद हटा दी जायेगी एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा था जिसे यह बातें दुहरा दुहरा कर सुना न दी गई हों, सबने कान खोलकर सुन लिया था।

शहर की सस्ती सुख सामग्री ने सब का मन ललचा लिया उसे छोड़ने को किसी का जी नहीं चाहता था। राज मिलने की बात को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। कोई सोचता था दूसरों को चलने दो मैं उनसे आगे दौड़ जाऊँगा, कोई ऊंघ रहे थे अभी तो काफी वक्त पड़ा है, किसी का ख्याल था सामने की चीजों को ले लो, राज न मिला तो यह भी हाथ से जाएंगी, कोई तो राज मिलने की बात का मजाक उड़ाने लगे कि यह गप्प तो इसलिये उड़ाई गई है कि हम लोग सामने वाले सुखों को न भोग सकें। एक दो ने हिम्मत बाँधी और राजमहल की ओर चले भी पर थोड़ा ही आगे बढ़ने पर महल का पथरीला रास्ता और शहर के मनोहर दृश्य उनके स्वयं बाधक बन गये बेचारे उल्टे पाँव जहाँ के तहाँ लौट आये। सारा नगर उस मौज बहार में व्यस्त हो रहा था।

✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ, [19-01-2025 16:58]
दस बज गये पर हजारों लाखों प्रजाजनों में से कोई वहाँ न पहुँचा। बेचारा राजा दरबार लगाये एक अकेला बैठा हुआ था। प्रधान मन्त्री मन ही मन खुश हो रहा था कि उसकी चाल कैसी सफल हुई। जब कोई न आया तो लाचार उसी राजा को पुनः राज भार सँभालना पड़ा।

यह कहानी काल्पनिक है परन्तु मनुष्य जीवन में यह बिल्कुल सच उतरती है। ईश्वर को प्राप्त करने पर हम राज्य मुक्ति अक्षय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। उसके पाने की अवधि भी नियत हैं मनुष्य जन्म समाप्त होने पर यह अवसर हाथ से चला जाता है। संसार के मौज तमाशे थोड़े समय के हैं यह कुछ काल बाद छिन जाते हैं। सब किसी ने यह घोषणा सुन रखी है कि संसार के भोग नश्वर हैं, ईश्वर की प्राप्ति में सच्चा सुख है, प्रभु की प्राप्ति का अवसर मनुष्य जन्म में रहने तक ही है। परन्तु हममें से कितने हैं जो इस घोषणा को याद रख कर नश्वर माया के लालच में नहीं डूबे रहते?

*अवसर चला जा रहा है। हम माया के भुलावे में फँस कर तुच्छ वस्तुओं को समेट रहे हैं और अक्षय सुख की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। हमारे इस व्यवहार को देखकर प्रधान मन्त्री शैतान मन ही मन खुश हो रहा है कि मेरी चाल कैसी सफल हो रही है। यह कहानी हमारे जीवन का एक कथा चित्र है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत।।

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सलाह के तीन टुकड़े


आदमी अपने भीतर के रडार, जो कि उसका दिल है, के माध्यम से चीजों को चुनता या अपने निर्णय लेता है।

एक बार एक युवा नवविवाहित दंपत्ति दूर एक छोटे से खेत में रहते थे। वे गरीब थे और उन दोनों के पास अपनी आजीविका कमाने का कोई साधन नहीं था।

एक दिन उस नवविवाहित पुरुष ने उस खेत को छोड़ कर कहीं दूर जाकर नौकरी खोजने की सोची।

उसने अपनी पत्नी से कहा- “प्रिय, मैं पैसे कमाने के लिए कहीं दूर जाना चाहता हूँ और मैं वादा करता हूँ कि वहाँ से बहुत सारा पैसा कमा के लौटूंगा, ताकि हम उन सभी सुख-सुविधाओं के साथ रह सकें, जिनके हम हकदार हैं। मुझे नहीं पता कि मैं कब तक आऊँगा, लेकिन कृपया मेरी प्रतीक्षा करना और मेरे प्रति वफादार रहना और मैं भी आपके प्रति वफादार रहूँगा।”

अब, वह युवक काम की तलाश में दूर-दूर के कई गाँवों और शहरों में जाता है। तब एक गाँव में उसे एक सेठ मिलता है जो काम के लिए एक मेहनती व्यक्ति की तलाश में था। वह युवा उस सेठ के साथ काम करने की इच्छा ज़ाहिर करता है और वह सेठ भी आसानी से उसे अपने पास काम करने के लिए रख लेता है। हालाँकि, अपना काम शुरू करने से पहले, वह युवा अपनी कुछ शर्तें रखता है, “जब तक मैं चाहूँगा, तभी तक मैं काम करूँगा और जब भी मुझे लगेगा कि मुझे घर जाना है, तो कृपया मुझे मेरे कर्तव्यों से मुक्त कर दें। मैं अपने काम के समय के दौरान कोई वेतन नहीं लूँगा। जब तक मैं आपके पास काम करता हूँ, मेरे वेतन को आप अपने पास सम्भाल कर रखें। जिस दिन मैं जाऊँगा, कृपया उस दिन आप मेरे सारे पैसे मुझे सौंप देना।”

सेठ उस युवक की सभी शर्तों से सहमत हो गया। युवक ने लगन से काम करना शुरू कर दिया। बीस वर्षों के लंबे समय के बाद, एक दिन वही युवक अपने सेठ के पास आया और कहा, “श्रीमान, मैं अब यहाँ से जाना चाहता हूँ। मुझे अब घर लौटना है। क्या मुझे मेरी मजदूरी मिल सकती है?”

सेठ ने उत्तर दिया, “बिल्कुल, लेकिन तुम्हारे जाने से पहले मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। मैं या तो तुम्हें जितने साल तुमने काम किया है, उतने सालों की मजदूरी दे कर तुम्हें भेज सकता हूँ, या फिर तुम्हें तुम्हारे जीवन के लिए तीन सलाह दे कर बिना पैसे के तुम्हें भेज सकता हूँ। इनमें से तुम्हें क्या चाहिए ये चुनाव तुम्हें करना है।”

उस व्यक्ति ने सोचने के लिए कुछ समय मांगा। उसने दो दिनों तक बहुत विचार किया और अपने वेतन की जगह तीन सलाहों को चुना।

सेठ ने उसे याद दिलाया कि अगर वह सलाह मांगेगा तो उसे कोई पैसा नहीं मिलेगा।

आदमी ने जवाब दिया- “मैंने आपके साथ बहुत समय तक काम किया है। आपके साथ काम करते हुए मैंने बहुत कुछ सीखा है और नई-नई चीजों में कौशलता हासिल की है। यह अनुभव मुझे जीवन में आगे ले जाएगा और इसलिए मुझे केवल तीन सलाह चाहिए।”

तब सेठ ने उसे तीन सलाहें दीं :

  1. अपने जीवन में कभी भी अनुचित रास्ता या शोर्ट्कट न अपनाएँ। ऐसे रास्ते आपकी जान भी ले सकते हैं।
  2. कभी भी किसी वस्तु के लिए ज्यादा व्याकुल या अधीर न हों, क्योंकि बुरी चीजों के प्रति ऐसी अधीरता घातक हो सकती है।
  3. क्रोध या दर्द के क्षणों में कभी भी निर्णय न लें क्योंकि यह आपको ग़लत निर्णय की ओर ले जा सकता है और फिर अपनी गलती पर पश्चाताप करना पड़ सकता है।”

इसके बाद मालिक ने उसे तीन रोटियाँ थमा दीं और कहा- “तुम्हारे पास तीन रोटियाँ हैं। तुम अपनी यात्रा के दौरान इनमें से दो का सेवन कर सकते हो और आखरी रोटी को घर पहुँचने तक अपने पास रखना और अपनी पत्नी के साथ साझा कर के खाना।”

उस व्यक्ति ने अपने सेठ को धन्यवाद दिया और बहुत सालों के बाद अपनी पत्नी से मिलने के लिए अपनी यात्रा शुरू की।

अपनी यात्रा के पहले दिन, वह एक बूढ़े व्यक्ति से मिलता है जो उसका अभिवादन करता है और पूछता है, “तुम कहाँ जा रहे हो?” जिस पर वह व्यक्ति जवाब देता है, “मैं जहाँ जा रहा हूँ वहाँ पहुँचने के लिए 20 दिनों तक चलने की जरूरत है।” इसके लिए बूढ़ा व्यक्ति उस व्यक्ति को एक छोटा रास्ता अपनाने की सलाह देता है और कहता है, “ये रास्ता अपनाने से तुम अपनी मंजिल तक सिर्फ पाँच दिनों में ही पहुँच जाओगे।”

वह व्यक्ति जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहता था इसलिए वह छोटा रास्ता अपनाने के बारे में सोचने लगा, लेकिन तभी उसे अपने सेठ की पहली सलाह याद आ गई। उसने सेठ की सलाह का पालन करते हुए लंबे रास्ते पर चल कर घर पहुँचना चुना।

कुछ दिनों बाद उसे पता चला कि लुटेरे लोगों को छोटा रास्ता अपनाने के लिए बरगलाया करते हैं और जब यात्री छोटा रास्ता अपना कर आगे बढ़ता है तो उन पर घात लगाकर हमला करते हैं और उनका सारा सामान लूट लेते हैं।


उस व्यक्ति ने सोचा कि सेठ की पहली सलाह ने उसे एक विपत्ति से बचा लिया। कुछ और दिन इसी तरह से यात्रा करने के बाद, वह सड़क के किनारे एक सराय में रुक गया और अंधेरा होने के कारण उसने पूरी रात वहीं आराम करने के बारे में सोचा। वह हाथ पैर धोकर बिस्तर पर सोने के लिए चला गया। लेकिन कुछ ही समय के बाद वह एक भयानक चीख सुन कर जाग गया। वह दरवाजा खोल कर बाहर जाने ही वाला था, तभी उसे सेठ की सलाह का दूसरा भाग याद आया और वह वापस अपने बिस्तर पर जाकर सो गया।

अगले दिन सुबह उसने सराय के मालिक को इस घटना के बारे में बताया तो उसने बहुत ही चौंकाने वाला जवाब दिया। सराय के मालिक ने कहा, “आप भाग्यशाली हैं कि आप ने अन्य मेहमानों की तरह उत्सुकता में आकर दरवाज़ा नहीं खोला। और इसलिए आप जीवित भी हैं। हमने सुना है कि रात के समय एक राक्षस राहगीरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चिल्लाता है और जब जिज्ञासु मेहमान बाहर आकर देखते हैं तो वह उन्हें खींच कर, जंगल में ले जा कर मार डालता है।”

उस व्यक्ति ने भगवान को धन्यवाद दिया और सोचा कि सेठ की दूसरी सलाह के कारण आज मैं जिंदा हूँ।

उस व्यक्ति ने अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए फिर से अपनी यात्रा प्रारंभ कर दी। कुछ दिनों तक चलने के बाद आखिरकार अब वह अपने घर के बहुत करीब पहुँच गया था। जैसे ही वह अपने घर के पास आया उसने खिड़की से देखा कि उसकी पत्नी अकेली नहीं थी और उसके साथ एक आदमी था जिसके बालों को वह धीरे से सहला रही थी। उस व्यक्ति का हृदय क्रोध और बदले की भावना से भर गया और उस के मन में उन दोनों को मारने के विचार आने लगे।

लेकिन तभी उसको अपने सेठ की दी हुई तीसरी और अंतिम सलाह याद आती है और वह एक गहरी सांस के साथ खुद को सांत्वना देता है, और सोचता है कि वह इस घटना पर शान्ति से बैठ कर विचार करेगा। वह उस रात पास की झाड़ी में ही सो जाता है।

सुबह होने पर जब वह शांत मन से उस घटना पर विचार करता, तो इस निर्णय पर पहुँचता है कि वह अपनी पत्नी और उसके प्रेमी को नहीं मारेगा। वह वापस अपने सेठ के पास चला जाएगा और जीवन भर वहीं काम करेगा। उसने सोचा कि जाने से पहले उसे एक बार अपनी पत्नी से मिलकर उसे बताना चाहिए कि इतने सालों में वह उसके प्रति कितना वफादार रहा है।

उस व्यक्ति ने दरवाज़े पर पहुँच कर दस्तक दी। जब पत्नी ने दरवाज़ा खोला तो अपने पति को सामने देखकर बहुत उत्साहित हो गई और खुशी से उसकी आँखों से आंसु बहने लगे। जब उसकी पत्नी उसे खुशी से गले लगाती है तो वह व्यक्ति उसे दूर धकेल देता है और उस व्यक्ति की आँखें आसुओं से भर जाती हैं। वह पूछता है, “वह आदमी कौन है जिसके साथ तुम कल रात थीं ?” वह जवाब देती है- “वह आपका बेटा है। जब आप चले गए थे, तब मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूँ। अब आपका बेटा बीस साल का हो गया है।”

यह सुनकर वह व्यक्ति रोने लगा और उसने अपने सेठ को सही सलाह देने के लिए मन ही मन अपने हृदय से धन्यवाद दिया। फिर उस व्यक्ति ने अपने बेटे को गले लगा लिया।

उन सब ने बैठ कर बहुत सारी बातें कीं, अपने अनुभवों को एक दूसरे के साथ साझा किया। अंत में उस व्यक्ति ने अपने सेठ की तीन सलाह के बारे में भी बताया। फिर उसने आखरी रोटी को मेज पर रख दिया और कहा, “यह सब मैंने पिछले बीस वर्षों में कमाया है।”

फिर रात के खाने के समय सबने मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की और तीनों मिलकर उस आखिरी रोटी को खाने लगे। पत्नी ने जैसे ही रोटी का आखरी टुकड़ा तोड़ा तो पाया कि उसमें सोने के सिक्के थे जो उसकी बीस साल की कमाई से कहीं अधिक थे। यह सब उस व्यक्ति की सच्चाई, ईश्वर में विश्वास, व कड़ी मेहनत का ही फल था।

दिल की सुनें और इसे अपना आंतरिक मार्गदर्शक बनने दें। दिल हमेशा सच बताएगा और सही मार्गदर्शन करेगा।

*” हृदय एक पवित्र स्थान है, और यह हमें विशाल आंतरिक ब्रह्मांड का द्वार, आश्चर्य और ज्ञान का रास्ता दिखाता है। हृदय के ज्ञान के माध्यम से, हम सरलता और आनंद से जी सकते हैं।”

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सतत् सुमिरन


एक ऋषि लोटा रोज मांजते थे,एक शिष्य ने उनसे कहा कि गुरुवर लोटे को रोज माँजने की क्या जरूरत है सप्ताह में एक बार माँज लिया करें..
ऋषि ने कहा बात तो सही है और फिर उसके बाद उन्होंने उसे नहीं माँजा उस लोटे की चमक फीकी पड़ने लगी सप्ताह बाद ऋषि ने शिष्य से कहा कि लोटे को साफ कर दो शिष्य लोटे को काफी देर माँजने के बाद भी पहले वाली चमक नही ला सका तब और काफी देर माँजा तब वह कुछ चमका
ऋषि ने कहा- लोटे से सीखो…..
“जब तक इसे रोज माँजा जाता रहा यह रोज चमकता रहा इसी तरह भक्त होता है यदि वह रोज सुमिरन न करे तो सांसारिक विकारों से अपनी चमक खो देता है ,इसलिए भक्त को रोज अपने प्रभु को सुमिरन करना होता है अगर एक दिन भी सिमरन छूटा तो भक्ति की चमक फीकी पड़ जाएगी..

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એક નાનો તથા અતિ ગરીબ પરીવાર ધરાવતી સ્ત્રીએં….
એક વાર “ઠાકોરજી” ની મદદ માગવા રેડીઓ સ્ટેશને ફોન 📞કર્યો.
એક નાસ્તિક માણસ પણ આ રેડીઓ કાર્યક્રમ સાંભળી રહ્યો હતો.
તેણે પેલી ગરીબ સ્ત્રીની મજાક
ઉડાવવાનું નક્કી કર્યું.
તેણે એ સ્ત્રીનું સરનામુ નોંધી લીધુ અને પોતાની સેક્રેટરી ને સારી એવી ખાદ્યસામગ્રી ખરીદી પેલી સ્ત્રીને ત્યાં પહોંચાડી આવવાની આજ્ઞા કરી.
પણ તેણે પોતાની સેક્રેટરી ને એક વિચિત્ર સૂચના આપી.તેણે કહ્યું જ્યારે એ ગરીબ સ્ત્રી પૂછે કે આ ખાવાનું કોણે મોકલાવ્યું છે ?
તો ત્યારે જવાબ આપવો કે એ “શેતાને”મોકલાવ્યું છે.


સેક્રેટરી એ તો પોતાના બોસની આજ્ઞા પ્રમાણે સારી એવી માત્રામાં ખાદ્યસામગ્રી પેલી ગરીબ સ્ત્રીના ઘરે પહોંચાડી.
ગરીબ સ્ત્રી તો આટલી બધી ખાદ્યસામગ્રી જોઈને રાજીના રેડ થઈ ગઈ.
આભાર વશતાની લાગણી અનુભવતા અનુભવતા તેણે એ બધો સામાન પોતાના નાનકડા ઘરમાં ગોઠવવા માંડ્યો.
સેક્રેટરી એ થોડી રાહ જોયા બાદ………
જ્યારે ગરીબ સ્ત્રીના તરફથી કોઈ સવાલ ન થયો ત્યારે અકળાઈને સામેથી જ પૂછી નાખ્યું ,
“શું તમને એ જાણવાની ઇચ્છા નથી કે આ બધું કોણે મોકલાવ્યું?”


ગરીબ સ્ત્રીએ જવાબ આપ્યો,
“ના.” જેણે મોકલાવ્યું
હોય તેનો ખૂબ ખૂબ આભાર માનજો. મને એની પરવા નથી
એ જે કોઈ પણ હોય………
કારણ જ્યારે મારા “ઠાકોરજી” હૂકમ કરે ને ત્યારે શેતાને પણ તેની આજ્ઞાનું પાલન કરવું પડતું હોય છે!

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અંધ બ્રિટન નશામાં છે,
ખંડ ખંડ ભાગલા પડશે તો..
તેના ભાનમાં આવશે –

“કટ્ટરવાદી હિંદુ રાષ્ટ્રવાદ” માટે ખતરો..
હકીકત માં
ઇસ્લામ તેને ગળી રહ્યો છે –

આજે એક સમાચાર અહેવાલમાં જણાવવામાં આવ્યું છે કે યુકે હોમ ઓફિસ તરફથી એક લીક થયેલો અહેવાલ જણાવે છે કે બ્રિટન “કટ્ટરપંથી હિંદુ રાષ્ટ્રવાદ” અને “ખાલિસ્તાન તરફી ઉગ્રવાદ” થી જોખમમાં છે – આ અહેવાલ ગૃહ સચિવ યવેટ કપૂર દ્વારા તૈયાર કરવામાં આવ્યો છે પરંતુ આ તે બ્રિટિશ સરકારની નીતિ નથી, તેણે કહ્યું છે, અને ગૃહ સચિવની કચેરીએ પણ કહ્યું છે કે તેના અહેવાલના તારણો પ્રધાનો દ્વારા ઔપચારિક રીતે સંમત થયા નથી –

લીક થયેલા અહેવાલમાં નવ પ્રકારના ઉગ્રવાદની યાદી આપવામાં આવી છે – ઇસ્લામવાદી, ડાબેરી ,  ખાલિસ્તાન તરફી ઉગ્રવાદ, હિંદુ રાષ્ટ્રવાદી ઉગ્રવાદ, પર્યાવરણીય ઉગ્રવાદ, ડાબેરી ઉગ્રવાદ, અરાજકતાવાદી અને એકલ મુદ્દાનો ઉગ્રવાદ, હિંસા અને ષડયંત્ર સિદ્ધાંતો –

પરંતુ “કટ્ટરપંથી હિંદુ રાષ્ટ્રવાદ” અને “ખાલિસ્તાન તરફી ઉગ્રવાદ” ને સમાચારોમાં ટોચ પર મૂકવામાં આવ્યા હતા, પરંતુ ઇસ્લામવાદીઓને મુખ્યત્વે ખતરો તરીકે દર્શાવવામાં આવ્યા ન હતા – હિંસા અને ષડયંત્રના સિદ્ધાંતોને પણ ખતરા તરીકે દર્શાવવામાં આવ્યા હતા, તેમ છતાં આ બ્રિટિશ સરકારના નિયમો હતા. પોતાની કુનીતિ તેણે 48 દેશોને કબજે કર્યા અને લૂંટ્યા.

હિંદુત્વ ક્યારેય કોઈના માટે જોખમી બન્યું નથી અને વિશ્વભરના દેશોની પ્રગતિમાં હિંદુઓએ ફાળો આપ્યો છે – “બ્રિટને પોતે જ ભારત વિરુદ્ધ ખાલિસ્તાન તરફી ઉગ્રવાદને વેગ આપ્યો છે.
આજે પરિસ્થિતિ એવી છે કે બ્રિટનના ઘણા મોટા શહેરો ઇસ્લામિક દળોના નિયંત્રણમાં છે અને દરરોજ શરિયાના અમલ માટે તોફાનો અને દેખાવો થાય છે – હવે તે દિવસ દૂર નથી જ્યારે બ્રિટન “યુનાઇટેડ કિંગડમ” ને બદલે “વિભાજી રાજ્ય” બની જશે. – ધર્મના આધારે ભારતનું વિભાજન કરતું બ્રિટન હવે પોતે જ વિખેરાઈ જશે કારણ કે પાપનું પોટલું ભરાઈ ગયું છે અને ફૂટવાની તૈયારીમાં છે –

પરંતુ બ્રિટન તેના દુષ્કર્મોથી બચી રહ્યું નથી – “પાકિસ્તાની અને બાંગ્લાદેશી” ગ્રુમિંગ ગેંગે 25 વર્ષમાં 2.5 લાખ બ્રિટિશ છોકરીઓ પર બળાત્કાર કર્યો – બ્રિટિશ રાજકીય કાર્યકર ટોમી રોબિન્સને 2018 માં આ રહસ્ય જાહેર કરતી વખતે કહ્યું હતું કે “2.5 લાખ બ્રિટિશ બાળકો પર ગેંગરેપ કરવામાં આવ્યો હતો. યુકેના દરેક મોટા શહેરમાં મુખ્યત્વે પાકિસ્તાની પુરુષો દ્વારા, આ સદીમાં જ.”  તેમની એક ડોક્યુમેન્ટ્રી પર બ્રિટિશ સરકારે પ્રતિબંધ મૂક્યો હતો, જ્યારે 9 જાન્યુઆરીએ તે X પર પ્રકાશિત થયો હતો, જેને 153 મિલિયન લોકોએ જોયો હતો –

વડા પ્રધાન કીર સ્ટારમેરે પાકિસ્તાની ગ્રુમિંગ ગેંગને એશિયન ગ્રુમિંગ ગેંગ તરીકે વર્ણવી હતી, જ્યારે તાજેતરમાં, પાકિસ્તાનીઓની સાથે, બાંગ્લાદેશીઓ પણ સામેલ હોવાનું જણાયું હતું – સ્ટેમર અને તેમની પાર્ટી એટલી ડરી ગઈ હતી કે તેઓને ઇસ્લામોફોબિક કહેવામાં આવશે અને તેઓ આના પર આરોપ લગાવવા માંગતા ન હતા. જઘન્ય ગુનાઓની તપાસ અને પગલાં લેવાનો પ્રસ્તાવ બ્રિટિશ સંસદમાં 111 વિરુદ્ધ 364 મતોથી ફગાવી દેવામાં આવ્યો હતો.

જો બ્રિટિશ સંસદ અને તેના સાંસદોનો આ દૃષ્ટિકોણ છે, તો બ્રિટનને વિખૂટા પડવામાં મોડું નથી થાય ભારતની 45 ટ્રિલિયન ડૉલરની અપાર સંપત્તિ લૂંટવા છતાં તે હવે અર્થતંત્રમાં ભારત કરતાં પાછળ છે – ભવિષ્યમાં શું થાય છે તે જુઓ. જેમના માટે પાકિસ્તાન બનાવવામાં આવ્યું હતું તેઓ બ્રિટનના ટુકડા કરી દેશે.