એપલના સહ-સ્થાપક સ્ટીવ જોબ્સ દ્વારા 19 વર્ષની ઉંમરે લખાયેલો એક પત્ર તાજેતરમાં હરાજીમાં $500,312 (લગભગ રૂ. 4.32 કરોડ)માં વેચાયો હતો. આ પત્ર જોબ્સે તેના બાળપણના મિત્ર ટિમ બ્રાઉનને લખ્યો હતો, જેમાં તેણે ભારત આવવા અને કુંભ મેળામાં હાજરી આપવાની પોતાની યોજનાનો ઉલ્લેખ કર્યો હતો.
એક માણસ તેના વાંદરાઓ સાથે હોડીમાં મુસાફરી કરી રહ્યો હતો.
એ બોટમાં અન્ય મુસાફરો સાથે એક ફિલોસોફર પણ હતો.
વાંદરાએ પહેલાં ક્યારેય બોટમાં મુસાફરી કરી ન હતી, તેથી તે આરામદાયક અનુભવતો ન હતો. તે બૂમો પાડીને ઉપર-નીચે જતો હતો, બોટ સવાર સહિત કોઈને પણ શાંતિથી બેસવા દેતો ન હતો.
બોટમેન આનાથી નારાજ થઈ ગયો હતો અને મુસાફરોના ગભરાટને કારણે બોટ ડૂબી જશે તેની ચિંતા હતી.
*જો વાંદરો શાંત ન થાય તો તે હોડીને ડૂબી જશે.*
તે માણસ પરિસ્થિતિથી અસ્વસ્થ હતો, પરંતુ વાંદરાને શાંત કરવાનો કોઈ રસ્તો શોધી શક્યો નહીં.
ફિલોસોફરે આ બધું જોયું અને મદદ કરવાનું નક્કી કર્યું.
તેણે કહ્યું: “જો તમે પરવાનગી આપો, તો હું આ વાંદરાને ઘરની બિલાડીની જેમ શાંત કરી શકું છું.”
માણસ તરત જ સંમત થયો.
ફિલોસોફરે બે મુસાફરોની મદદથી વાંદરાને ઉપાડીને નદીમાં ફેંકી દીધો.
તરતા રહેવા માટે વાંદરો ભયાવહ રીતે તરવા લાગ્યો.
તે હવે લગભગ મરી રહ્યો હતો અને તેના જીવન માટે સંઘર્ષ કરી રહ્યો હતો.
થોડા સમય પછી, ફિલોસોફરે વાંદરાને ખેંચીને પાછો હોડીમાં લઈ લીધો.
વાંદરો શાંત હતો અને જઈને એક ખૂણામાં બેસી ગયો.
વાંદરાના બદલાયેલા વર્તનથી માણસ અને બધા મુસાફરોને આશ્ચર્ય થયું.
પેલા માણસે ફિલોસોફરને પૂછ્યું: “પહેલાં તો તે ઉપર-નીચે કૂદકો મારતો હતો. હવે તે પાળેલી બિલાડીની જેમ બેઠો છે. કેમ?”
ફિલોસોફરે કહ્યું: “જ્યારે મેં આ વાંદરાને પાણીમાં ફેંકી દીધો, ત્યારે તે પાણીની શક્તિ, તેના જીવનની કિંમત અને હોડીની ઉપયોગીતા સમજી ગયો.”
જે વાંદરાઓ ભારતમાં દરેક વસ્તુની ટીકા, ટિપ્પણી, વિરોધ કરીને ઉપર-નીચે કૂદકા મારતા હોય તેમને ઉત્તર કોરિયા, અફઘાનિસ્તાન, સોમાલિયા, દક્ષિણ સુદાન, સીરિયા, ઈરાક, પેલેસ્ટાઈન, પાકિસ્તાન, શ્રીલંકા કે ચીનમાં 6 મહિના સુધી ફેંકી દેવા જોઈએ, પછી ભારત આવીને આપોઆપ પાલતુ બિલાડીની જેમ શાંત થઈ જશે અને દેશને આગળ વધવા દેશે.
‘ભારત’નો દુરુપયોગ કરી બદનામ કરતાં તમામ વાંદરાઓને સમર્પિત. 😌😉🇮🇳🚩
नीतू बाथरूम से नहा कर निकली तो लाइट बन्द करना भूल गई, वह पूजा कर रही थी तभी उसकी सास कमलाजी ने बड़बड़ाना शुरू किया कि “बत्ती ऐसे जलाकर छोड़ देती है जैसे बिजली मुफ्त में आती है, बिल भरना पड़े तो पता चले”| नीतू मायूस होकर सुनती रही, पूजा करते हुए उसकी ऑंखें भर आयीं| नीतू की शादी को 3 साल हुए थे, 2 साल तक सब ठीक चला फिर अचानक उसके पति अक्षय की नौकरी छूट गयी| दोनों बेहद परेशान थे| नीतू का बेटा अभी 6 महीने का था| अक्षय के बहुत कोशिशों के बाद भी जब नई नौकरी नहीं मिली तो उसने अपने पिता मुकेशजी से बात करके घर लौटने का निर्णय किया| मुकेशजी ने अपने पुत्र को ढांढस बंधाया कि तुम यहाँ आ जाओ और दूसरी नौकरी की तलाश करो, परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है| उनके मन में कहीं न कहीं ये डर था कि अक्षय कहीं अवसाद में न घिर जाए,इसलिए वे यथासंभव सहयोग कर रहे थे बेटे और बहू को| नीतू अपने ससुर का बहुत सम्मान करती थी| वो स्वभाव से अंतर्मुखी थी,जल्दी अपनी बात किसी से नहींं कह पाती थी, बड़ों को पलट कर जवाब देना उसके संस्कारों में नहीं था| कमलाजी नीतू को सुनातीं कि जब उनकी शादी हुई तो उनके आने के बाद मुकेश जी की तरक्की होती गयी पर कोई बहुएँ ऐसी आती हैं कि पति का कामकाज चौपट हो जाता है| नीतू को यह बातें बाण की तरह सीधे हृदय बेधी लगतीं, वो तो पहले ही परेशान थी और कमला जी समय-समय पर सुई चुभोती रहतीं| आर्थिक परेशानी के कारण मुकेश जी ही बेटे और बहू का खर्च उठाते थे और कमला जी एहसान की परतें चढ़ाती जातीं, नीतू का आत्मसम्मान कुचलता रहता| जब नीतू कहीं बाहर जाने को निकलती तो कमलाजी दो चार सामान लाने को कहकर बोलतीं “अरे तुम्हारे पास पैसे तो होंगे नहीं, चलो मैं देती हूं, वैसे भी अब तो दोगुना खर्च हो गया है, पता नहीं कैसे चलेगा”| नीतू के आत्मसम्मान को फिर से झकझोर दिया था कमलाजी ने| वो वहाँ से चली गई| मुकेश जी अपनी बहू की व्यथा उसके चेहरे पर पढ़ कर अपनी पत्नी से बोले,”क्यों हर बात का एहसान जताती हो बहू से”,? वह इस घर के सदस्य है तो फिर क्यों उसके स्वाभिमान पर चोट करती हो। इस समय हमारे बच्चों का कठिन समय है उनको हमारी जरूरत है। हम मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा? भगवान की कृपा से हमारे पास सब कुछ है, किसी बात की कोई कमी नहीं है फिर भी तुम उनका मनोबल बढ़ाने के बजाय तोड़ रही हो। कमला जी पति के मिजाज को देखकर चुप रह गई पर वह सुधरने वाली कहां थी। अगर कभी खाना बच जाता तो वह बोलती,”मुफ्त का समान है बर्बाद करते रहो, अपनी रकम लगती तो पता चलता”। ऐसे ही कटु वचन प्रतिदिन नीतू को सुनते पड़ते थे। कभी-कभी कमल जी तो अक्षय को भी सुना देती थी, बहुत ही अधिक मानसिक वेदना से गुजर रही थी नीतू, एक तो पति को दिन भर तनाव में देखती दूसरी तरफ सासू मां उसके आत्मसम्मान को तार तार करने से कभी नहीं चूकती। छोटे बच्चे की वजह से वह नौकरी भी नहीं कर पा रही थी। आए दिन कमला जी नीतू के सामने अपनी तारीफों के पुल बांधती रहती। मैं जब ब्याह करके आई थी तो इस घर में कुछ भी नहीं था, मेरे कदम बहुत ही शुभ थे इस घर के लिए,मेरे घर में कदम रखते ही इस घर का नक्शा बदल गया। लेकिन तुम्हारे कदम शायद अक्षय के लिए शुभ नहीं है। तभी तो उसके साथ-साथ सब लोग परेशान हैं। नीतू को समझ में नहीं आता था इन सब में उसकी क्या गलती है? इतना तिरस्कार करने के बाद कमला जी ने अपनी बेटी के किस्मत का बखान करना शुरू कर दिया,”ऋचा भी अपने पति के लिए बहुत भाग्यशाली है ऋचा से शादी के बाद दामाद जी का व्यापार दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ता ही जा रहा है”नीतू अपनी तरफ किया गया इशारा समझ गई और अपने घायल हुए आत्मसम्मान को आंसुओं का मरहम लगाने के लिए अपने कमरे में चली गई। यही सब सुनते हुए और रोते हुए करीब 8 महीने का वक्त बीत गया। 8 महीना के बाद अक्षय की नौकरी मुंबई में लगी। मुकेश जी ने बोला पहले वहां जाकर अपने रहने की व्यवस्था कर लो फिर नीतू और बच्चे को लेकर चले जाना। अगले ही दिन अक्षय मुंबई के लिए निकल गया और चार-पांच दिनों के बाद फोन करके बोला मैंने सारा इंतजाम कर लिया है और एक हफ्ते में मैं तुम्हें लेने के लिए आ रहा हूं। इसी बीच अचानक एक दिन ऋचा अपनी बेटी के साथ अपने मायके आई अपनी बेटी और नतनी को आया देख कमला जी खुशी से फूली नहीं समाई, पर अगले ही पल ऋचा के चेहरे की उदासी उन्होंने पढ़ ली और पता चला कि दामाद जी को व्यापार में बहुत ज्यादा घाटा हो गया है और काफी ज्यादा कर्ज दामाद जी के ऊपर चढ़ गया है। पांच शोरूम में से तीन शोरूम दामाद जी के बिक चुके हैं और बस दो शोरूम बचे हैं जो कि घाटे में चल रहे हैं। यह सब सुनकर कमला जी और मुकेश जी के ऊपर तो मानो वज्रपात हो गया एक औलाद के दुख से अभी उबरे भी नहीं थे की दूसरी औलाद का दुख सामने आ गया। ऋचा ने कमला जी को बताया कि उसकी सास उसे बहुत ही ज्यादा ताने देती है। कोई मदद करती है तो बस एहसान गिनवाती रहती है। मेरे आत्म सम्मान को पूरा तार तार करके रख दिया है। ऋचा की बातें सुनकर कमला जी के विचार एकाएक बदल गए और वह बोलने लगी,”तुम्हारी सास को अक्ल नहीं है क्या ? ऐसे समय में बेटे बहु को भावनात्मक संबल की जरूरत होती है और वह तुम्हें ताने मार रही है।” उन्हें तुम दोनों के साथ खड़ा होना चाहिए था। कमला जी के बातें सुनकर नीतू से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी,”मम्मी की बेटी का दुख देखकर एकाएक आपके अंदर इतनी समझदारी कहां से आ गई?” कल तक जब मैं इस परिस्थिति में थी तब तो आपने नहीं सोचा कि मुझे और आपके बेटे को आपके भावनात्मक संभल की जरूरत है ना कि आपका तानों की। दूसरों के आगे हाथ फैलाना कितना पीड़ादायक होता है मुझे बहुत अच्छे से पता है। 8 महीने मैं इस दुख को झेला है। इसलिए मैं ऋचा दीदी के दर्द को बहुत अच्छे से समझ सकती हूं। लेकिन मेरा आत्म सम्मान तो आज तक आपके तानों से लहू लुहान होकर पड़ा हुआ है उसे तो आप कभी भी नहीं देख पाई। क्या आत्मसम्मान का आकलन रिश्ते देखकर किया जाता है बेटी का आत्म सम्मान ,आत्मसम्मान होता है और बहू का आत्म सम्मान नगण्य होता है । नीतू ने अपने नंद ऋचा से कहा दीदी आप परेशान मत हो। आपका दुख मुझे अधिक कोई नहीं समझ सकता। लेकिन जैसे मैंने इस कठिन समय को पार कर लिया है जल्दी आपका भी यह कठिन समय निकल जाएगा। हम सब मिलकर इस कठिन समय में आपके साथ रहेंगे। मुकेश जी ने कमला जी से बोल कमला जी एक बात अच्छे से समझ लीजिए मनुष्य नहीं बल्कि समय बलवान होता है और समय कब पलट जाए कोई नहीं जानता आज ऋचा का दुख देखकर अपका दिल रो रहा है और वही दुख जब आपने अपनी बहू नीतू को दिया तो आपका कलेजा नहीं कांपा ? फिर आप में और ऋचा की सास में क्या फर्क रह गया ?।आपने जो टीस नीतू और अक्षय के दिल को लगाई है वह उनके दिल में ताउम्र रहेगी और इसके लिए आप खुद जिम्मेदार है। कमल जी आत्मग्लानि से भर उठीं। उन्हें ऐसा लगने लगा की बहू के साथ उनके करनी की भरपाई अब उनकी बेटी कर रही है। और वह मन ही मन दृढ़ निश्चय कर रही थी अपनी बेटी की स्थिति संभालने की और बहू के मन में अपने लिए जगह बनाने की।🙏🙏🙏
उनमें से एक महात्मा उसे समय के ग्रेजुएट थे। आजकल के हिसाब से पहले तो आईआईटी पास । वह बाबा यह भी कहा करते थे की मैं बहुत सारा धन को छोड़कर साधु बना हूं। इस त्याग का बड़ा गर्व था I
इस कारण से अन्य किसी महात्माओं को अपने आगे कुछ समझते नहीं और बात-बात पर कहते – “तुमको मालूम है कि मैंने लाखों की संपत्ति पर लात मार दी है।”
ऐसा ही एक दिन बहुत बात बढ़ गई। एक किसी नए महात्मा से ग्रेजुएट महात्मा डांटकर कहने लगे की तुम ठीक नहीं हो,तुम्हारा व्यवहार ठीक नहीं है और तुम्हें मालूम नहीं है कि मैंने लाखों की संपत्ति और डिग्री पर लात मार दी है।
बगल में ही एक वृद्ध महात्मा लेटे हुए थे। ग्रेजुएट महात्मा ने जब कई बार इस बात को दोहराया तो वृद्ध महात्मा जी ने धीरे से ग्रेजुएट महात्मा को कहा-
“बेटा! तुमने लात तो मारी, पर लगता है कि वह लात ठीक से लगी नहीं !”
*एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे।* *उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे।*
एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।
एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?
सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।
दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी?
तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है।
एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है।
इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी? समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था।
सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी।
एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला।
पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया।
सांझ को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए।
जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा।
सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।
ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था।
एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।
दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे
सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो।
सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना।
सुबह बहेलिया आया।
हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था।
सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए।
बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया। वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं। वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया अवश्य देता है। उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग नहीं कर पाते है, परंतु उनसे हमे संस्कार एवं उनके अनुभव से कई बाते सीखने को मिलती है,
बड़े-बुजुर्ग परिवार की शान है वो कोई कूड़ा-करकट नहीं हैं, जिसे कि परिवार से बाहर निकाल फेंका जाए।
अपने प्यार से रिश्तों को सींचने वाले इन बुजुगों को भी बच्चों से प्यार व सम्मान चाहिए अपमान व तिरस्कार नहीं। अपने बच्चों की खातिर अपना जीवन दाँव पर लगा चुके इन बुजुर्गों को अब अपनों के प्यार की जरूरत है। यदि हम इन्हें सम्मान व अपने परिवार में स्थान देंगे तो लाभान्वित ही होंगे । ऐसा न करने पर हम अपने हाथों अपने बच्चों को उस प्यार, संस्कार, आशीर्वाद व स्पर्श से वंचित कर रहे हैं, जो उनकी जिंदगी को सँवार सकता है।
*याद रखिए किराए से भले ही प्यार मिल सकता है परंतु संस्कार, आशीर्वाद व दुआएँ नहीं। यह सब तो हमें माँ-बाप से ही मिलती है।*
🌳🦢🌳🦢🌳🦢🌳🦢🌳🦢🌳 परमात्मा आप सभी को सदा खुश रखे यही बीनती है 🙏 *सदैव प्रसन्न रहें* 🙏
मार्क ट्वेन- प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक ने भारत में वर्ष 1895 की यात्रा के दौरान कुंभ मेला का भ्रमण किया था। इस यात्रा को उन्होंने अपने रोजनामचे में कुछ ऐसा दर्ज किया— फिर हम गर्म मैदान में चले गए, और सड़कों को दोनों लिंगों के तीर्थयात्रियों से भरा हुआ पाया, क्योंकि भारत के एक बड़े धार्मिक मेले में से एक आयोजित किया जा रहा था… पवित्र नदियों के संगम पर, गंगा और यमुना। मुझे कहना चाहिए कि तीन पवित्र नदियाँ हैं, क्योंकि एक भूमिगत है। किसी ने इसे देखा नहीं है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह तथ्य कि यह वहां है, पर्याप्त है। ये तीर्थयात्री पूरे भारत से आए थे; कुछ महीनों से रास्ते में थे, गर्मी और धूल में धैर्यपूर्वक चलते हुए, थके हुए, गरीब, भूखे, लेकिन बिना डिगे विश्वास और विश्वास द्वारा समर्थित और बनाए रखा गए; वे अब अत्यंत सुखी और संतुष्ट थे; उनका पूर्ण और पर्याप्त इनाम निकट था; वे हर पाप के निशान से शुद्ध हो जाएंगे… इन पवित्र जलों द्वारा जो छूने वाली हर वस्तु को पूरी तरह से शुद्ध कर देते हैं… यह अद्भुत है, ऐसा विश्वास जो हमारे जैसे लोगों के लिए, ठंडे गोरे लोगों के लिए, असाधारण यात्रा पर बिना किसी झिझक या शिकायत के पुराने और कमजोर और युवा और दुर्बल को प्रवेश करने के लिए प्रेरित कर सकता है, और बिना रोना-धोना किए परिणामी परेशानियों को सहन कर सकता है। यह प्रेम में किया गया है, या यह भय में किया गया है; मैं नहीं जानता… चाहे प्रेरणा कुछ भी हो, इससे उत्पन्न कार्य हमारी तरह के लोगों के लिए असाधारण त्याग का प्रतीक है, और हममें से कुछ ही इसके बराबर का प्रदर्शन कर सकते हैं।” ~~~~~~<<<<<<< इसके ठीक बाद मार्क ट्वेन एक अंग्रेज़ विज्ञानी डॉक्टर हेन्किन जो अंग्रेज़ी हुकूमत के कर्मचारी थे- के साथ बनारस- काशी का दौरा किया और उनकी रोजनामचे की एंट्री कुछ ऐसी थी- एक स्थान पर जहां हम थोड़ी देर के लिए रुके, एक सीवर से आ रही गंदी धारा पानी को गंदा और मटमैला बना रही थी, और उसमें एक शव तैर रहा था जो ऊपर से बह कर आ गया था। उस स्थान से दस कदम नीचे पुरुषों, महिलाओं और आकर्षक युवा कन्याओं की भीड़ कमर तक पानी में खड़ी थी—और वे अपने हाथों में पानी भरकर उसे पी रहे थे। विश्वास वाकई में चमत्कार कर सकता है, और यह इसका एक उदाहरण है। वे लोग उस डरावने पानी को प्यास बुझाने के लिए नहीं पी रहे थे, बल्कि अपनी आत्माओं और शरीर के अंदरूनी हिस्सों को शुद्ध करने के लिए पी रहे थे। उनके विश्वास के अनुसार, गंगा का पानी जिस भी चीज को छूता है, वह पूरी तरह से शुद्ध हो जाती है—तुरंत और पूरी तरह से शुद्ध। सीवर का पानी उनके लिए कोई समस्या नहीं थी, शव ने उन्हें विचलित नहीं किया; पवित्र जल ने दोनों को छू लिया था, और अब दोनों पूरी तरह शुद्ध थे, और किसी को दूषित नहीं कर सकते थे। उस दृश्य की याद हमेशा मेरे साथ रहेगी; लेकिन अनुरोध पर नहीं। गंदे लेकिन सर्व-शुद्ध करने वाले गंगा जल के बारे में एक और शब्द। जब हम बाद में आगरा गए, तो हम वहां एक चमत्कार—एक यादगार वैज्ञानिक खोज—का जन्म देखकर आश्चर्यचकित हुए—यह खोज कि गंगा का पानी विश्व में सबसे शक्तिशाली शुद्धिकारक है! जैसा कि मैंने कहा, इस तथ्य को आधुनिक विज्ञान के खजाने में हाल ही में जोड़ा गया था। यह एक अजीब बात रही है कि जब बनारस अक्सर हैजा से प्रभावित होता है, तो वह इसे अपनी सीमाओं से बाहर नहीं फैलाता। इसे समझा नहीं जा सकता था। सरकार की सेवा में वैज्ञानिक श्री हेन्किन ने पानी की जांच करने का निश्चय किया। वे बनारस गए और अपने परीक्षण किए। उन्होंने घाटों पर नदियों में गिरने वाले सीवरों के मुहानों पर पानी प्राप्त किया; एक घन सेंटीमीटर में लाखों रोगाणु थे; छह घंटे बाद वे सभी मर चुके थे। उन्होंने एक तैरते हुए शव को पकड़ा, उसे किनारे खींचा, और उसके पास से पानी उठाया जो हैजा रोगाणुओं से भरा हुआ था; छह घंटे बाद वे सभी मर चुके थे। उन्होंने बार-बार इस पानी में हैजा के रोगाणुओं को जोड़ा; छह घंटे के भीतर वे हमेशा मर गए, अंतिम नमूने तक। बार-बार, उन्होंने शुद्ध कुएं के पानी को लिया जिसमें कोई पशु जीवन नहीं था, और उसमें कुछ हैजा के रोगाणुओं को डाला; वे हमेशा तुरंत प्रजनन शुरू कर देते थे, और हमेशा छह घंटे के भीतर वे भर जाते थे—और लाखों से गिने जा सकते थे। ~~~~~~~ गंगाजल की शुद्धता पर इतिहास का एक रोचक पन्ना! – मन जी
સારાહ રેસ્ટોરન્ટમાં વેઇટ્રેસનું કામ કરતી.એક દિવસ રેસ્ટોરન્ટમાં આવેલા એક યુગલ સમક્ષ સારાહે ભોજનનું મેનુ મૂક્યું. પણ આશ્ચર્ય, તે યુગલે મેનુ ખોલ્યા વગર જ ઓર્ડર કરવાનું શરુ કરી દીધું,
અમારી પાસે થોડા જ પૈસા છે.અમે પૈસાની તંગી અનુભવી રહ્યા છીએ.માટે, સૌથી સસ્તુ જે હોય તે લખી લે.સારાહએ ચહેરા પર સહેજે આનાકાનીનો ભાવ લાવ્યા વગર બે ઓછી કિમતની આઈટમ સૂચવી. તે યુગલ સારાહના સૂચન સાથે સહમત થયું. તેઓએ ઝટપટ ભોજન પતાવી ઉતાવળે સારાહ પાસે બિલ માગ્યું.
સારાહે બીલને બદલે તેમને એક કાગળ અને કવર આપ્યું. જેમા લખ્યું હતું…
આજે મે મારાં અંગત એકાઉન્ટમાંથી તમારું બિલ ચૂકવી દીધું છે. તે મારી ભેટ ગણશો. સાથે 100 ડોલરની એક નાનકડી ભેટ છે. … આપની સારાહ!
તે યુગલ રેસ્ટોરન્ટ છોડી ગયું. પણ, સારાહનું આ નાનું કૃત્ય તેમને અઢળક ખુશી આપી ગયું. તે સમજી શકતા હતા કે એક વેઇટ્રેસ પોતાની નાણાકીય મર્યાદાઓ છતાં આવું અદભુત કાર્ય કરી શકે! તે યુગલને પણ ખુશી હતી અને સારાહને પણ ખુશી હતી એક નાની મદદ કરવાની!
સારાહ કોઈ શ્રીમંત નહોતી. તેના ઘરે તેનું જુનું વોશિંગ મશીન બગડી ગયું હતું, નવું ઓટોમેટિક વોશિંગ મશીન લેવા ઈચ્છતી હતી. તે માટે એકાદ વર્ષથી પૈસા બચાવી રહી હતી. આમ છતાં તે પૈસામાંથી તેણે પેલા યુગલના જીવનમાં ખુશી ભરવાનું નક્કી કર્યું.
તેને સૌથી વધુ આઘાત ત્યારે લાગ્યો કે જયારે તેની ખાસ સહેલીએ તેને આ કામ માટે શાબાશી આપવાને બદલે ખખડાવી નાખી! તેનું કહેવું હતું કે પોતાની અગ્રતાઓ બાજુએ મૂકી આમ બીજાને મદદ ના કરાય! વાત પણ વ્યવહારુ હતી.
પણ, તે સમયે જ સારાહ પર તેના મમ્મીનો ફોન આવ્યો… તે ઉત્તેજિત હતી, તેણે જોરથી બુમ પાડતા આવાજે પૂછ્યું… સારાહ તે આ શું કર્યું?
સારાહે ગભરાતા અવાજે કહ્યું.. મમ્મી, મે? મે તો કશું નથી કર્યું, કેમ શું થયું?’ અરે…. ‘ હે દીકરી તને ખબર નથી? પેલા લોકો કે જેને તે મદદ કરી હતી તેમણે આ વાત ફેસબુક પર પોસ્ટ કરી છે, તે વાયરલ થઈ છે. અને ફેસબુક તારા વખાણથી ઉભરાઈ રહ્યું છે!’મમ્મીએ ઉત્તેજિત અવાજે કહ્યું.અને સહેજ ભીના અવાજે ઉમેર્યું,બેટા મને તારા માટે સાચે જ ગર્વ છે!
તે પછી તો તેના પર પરિચિતોના, મિત્રોના ઢગલો ફોન આવવાના શરુ થયાં. સોશિયલ મીડિયા પર વાયરલ થયેલી સ્ટોરીએ ગજબ કામ કર્યું. હવે, અખબાર અને ટીવી ચેનલોએ તેનો સંપર્ક કરવાનું શરુ કર્યું હતું.
બે ત્રણ દિવસ બાદ સારાહને એક અતિ લોકપ્રિય ટીવી શો માટે આમત્રિત કરી. તે ટીવી ચેનલ તરફથી સારાહ ને 10000 ડોલરનો પુરસ્કાર અપાયો.!! ઉપરાંત, શોને સ્પોન્સર કરતી કંપની દ્વારા આધુનિક વોશિંગ મશીન, નવો ટીવી સેટ, અને 5000 ડોલરના મૂલ્યની ઇલેક્ટ્રોનિક આઈટમોનું ગિફ્ટ હેમ્પર પણ અપાયું!! આવી અસંખ્ય ભેટોનો ધોધ વરસ્યો.જેનું મૂલ્ય એક લાખ ડોલરથી વધુ હતું!
બે સસ્તી જમવાની ડીશ અને 100 ડોલરની કોઈ વળતળની અપેક્ષા વગર આપવામાં આવેલી મદદથી સારાહનું જીવન ખુશીઓથી ભરાઈ ગયું!!!
તમારે જેની જરૂર નથી તે આપવું તે સાચું દાન નથી! દાન તો એ છે કે, જેની તમને તો અત્યંત જરૂર છે .પણ બીજા કોઈને તેની વધુ જરૂર છે!
ખરી ગરીબાઈ નાણાની નથી, પણ માનવતા અને ઉદાર અભિગમની છે!
આવો, ખુશી વહેંચીએ, ખુશ રહેવાનો અને સુખી થવાનો આ સૌથી આસાન રસ્તો છે!!!
देश का सबसे भ्रष्ट, बेईमान और क्रिप्टो क्रिश्चियन चुनाव आयुक्त। (नवीन G&MRA चावला।)
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे नवीन चावला को, सरकार ने नहीं बल्कि सोनिया गांधी ने नियुक्त किया था। सोनिया गांधी के लिए नवीन चावला उनकी पहली पसंद इसलिए थे क्योंकि नवीन चावला मदर टेरेसा के संपर्क में आकर क्रिप्टो क्रिश्चियन बन चुके थे। उन्होंने मदर टेरेसा पर काफी किताबें लिखी… इतना ही नहीं पद पर रहते हुए भी वह एक अपनी निजी एनजीओ चलाते थे। और जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने 8 एकड़ जमीन जयपुर में उन्हें मुफ्त में दी थी। नवीन चावला को इटली की सर्वोच्च कैथोलिक क्रिश्चियन संस्था ने अपना सर्वोच्च पुरस्कार दिया था। 31 जनवरी 2009 को तब के मुख्य चुनाव आयुक्त गोपाल स्वामी ने खुद राष्ट्रपति के पास जाकर शिकायत की थी कि उनके जूनियर चुनाव आयुक्त नवीन चावला कांग्रेस के एजेंट हैं और वह मीटिंगों की जानकारी बीच मीटिंग में ही कांग्रेस को लीक करते है। बीच मीटिंग में वह बाहर आकर बार-बार कांग्रेस नेताओं को मीटिंग की जानकारी देते रहते हैं और उनके निर्देश पर मीटिंग में उनका पक्ष रखते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी ना तो नवीन चावला को हटाया गया बल्कि गोपाल स्वामी के बाद अगला मुख्य चुनाव आयुक्त भी उसे ही बना दिया गया, जबकि उसका नंबर तीसरा था बीच में एक चुनाव आयुक्त ओर था जो दूसरे नंबर पर था और उसे बनाया जाना था। और नवीन चावला ने इस नमक का हक अदा किया। उसने 2009 के चुनाव में खुलकर बेईमानी करवाई। ऐसे कई केसेस हुए थे । नवीन चावला के ही जमाने में कांग्रेस पार्टी ने सपा से ज्यादा लोकसभा सांसद हासिल किए थे उत्तर प्रदेश में। यहां तक की सपा के गढ़ कन्नौज में हुए उपचुनाव में भी राज बब्बर ने डिंपल को हरा दिया था जबकि राज बब्बर खुद चुनाव लड़ने को इच्छुक नहीं थे। चिदंबरम को शिवगंगा से जयललिता की उम्मीदवार ने हरा दिया था, मगर तभी टीवी पर खबर आने लगी कि सोनिया गांधी चिदंबरम को ही गृहमंत्री बनाएंगी और उसके बाद दोबारा मतगणना हुई और उसमें चिदंबरम को जीता दिखा दिया गया। पूरे 5 साल तक वह केस अदालत में चला और बाद में वह केस आया-गया हो गया और जयललिता इन 5 सालों में कहती रही कि हमारे साथ बेईमानी हुई है, चिदंबरम बेईमानी से जीते हैं। मेनका गांधी को भी पहले हरा दिया गया था लेकिन मेनका गांधी दोबारा काउंटिंग पर अड गई और काफी बवाल के बाद जब दोबारा से वोटो की गिनती हुई तो उसमें मेनका गांधी जीत गई। यह नवीन चावला ही था जिसने उस दौरान परिसीमन किया था और परिसीमन का उद्देश्य यह था कि संघर्ष वाली सीटों पर भाजपा के वोट कम कर दिए जाएं और कांग्रेस के वोटरों को उस सीट में शामिल कर लिया जाए खासकर मुसलमानों को। सोचिए कांग्रेस ने इस देश में कितने कुकर्म किए हैं और हमारी याददाश्त इतनी छोटी होती है कि हम उसे भूल जाते हैं !
बलराज मधोक जी का जन्म 25 फरवरी, 1920 में बाल्टिस्तान के स्कार्दू में हुआ था. उनके पिता जगन्नाथ मधोक जम्मू कश्मीर के लद्दाख़ में एक सरकारी अधिकारी थे. बलराज मधोक ने अपनी उच्चतर माध्यमिक शिक्षा श्रीनगर से और स्नातक स्तर की पढ़ाई लाहौर से की. बलराज मधोक 20 बर्ष की आयु में (1940 में) आरएसएस के स्वयंसेवक बनेे.
वे मात्र 24 वर्ष की आयु में डीएवी पोस्ट ग्रेड्यूट कालेज में इतिहास के विभागाध्यक्ष बने. उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें वाइसप्रिंसिपल भी बना दिया गया. उनका मानना था कि – गुलामी के दौर में भारत में धर्म की हानि हुई है और हिन्दू समाज बिखरा हुआ है. वे बिखरे हुए समाज को एकत्र कर भारत को महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे.
विभाजन के कारण पापिस्तानी हिस्से से जान बचाकर कश्मीर में आये शरणार्थी हिन्दुओं को आर्थिक व सामाजिक सहायता प्रदान की. आज़ादी के बाद जब पापिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया, उस समय बलराज मधोक डी.ए.वी. कॉलेज, श्रीनगर में उपप्रधानाचार्य थे. इस दौरान उन्होंने शरणार्थी रिलीफ कमेटी का गठन किया और
पूरे जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और पाकिस्तान के षड्यंत्र पूरे उफान पर थे. लेकिन जवाहर लाल नेहरू, शेख अब्दुल्ला की मोहब्बत में गिरफ्तार थे. शेख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के डोगरा हिन्दू शासक “राजा हरिसिंह” को हटा कर घाटी में इस्लामी शासन की स्थापना करना चाहते थे. नेहरु भी जाने अनजाने में इसमें अब्दुल्ला का साथ दे रहे थे.
22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया, 25 अक्टूबर 1947 तक दोमेल, मुज़फ़्फ़राबाद, उड़ी, बारामुला और महूरा पर पाकिस्तान का कब्ज़ा हो गया. नेहरु का कहना था कि जबतक राजा हरिसिंह कश्मीर की सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं होंते तब तक कश्मीर को कोई सैन्य मदद नहीं दी जायेगी.
उस समय बलराज मधोक और संघ के गुरु गोलवरकर जी ने ही राजा हरिसिंह को 25 अक्टूबर 1947 को विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने को राजी किया था. कश्मीर के भारत में विलय हो जाने के बाद राजासिंह को कश्मीर छोड़ना पड़ा. कश्मीर के मुस्लिम सैनिको ने बगावत कर दी और पापिस्तानी सेना तथा कबायलियों का साथ देने लगे.
संघ संस्कारों की वजह से मधोकजी के भीतर कश्मीर को पापिस्तान से बचाने की अदम्य इच्छा थी. पापिस्तानी सेना ने श्रीनगर हवाई अड्डे को क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की थी. 26 अक्टूबर की सर्द रात में संघ ने हवाई पट्टी से बर्फ हटाने का संकल्प लिया. तो मधोक के आग्रह पर उनके कालेज के विद्यार्थी भी स्वयंसेवकों के साथ शामिल हुए थे.
27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना हवाई जहाजों से श्रीनगर उतरी. सेना ने उड़ी, बारामुला व अन्य क्षेत्र वापस जीत लिए लेकिन नेहरू, माउंटवेटन, शेख अब्दुल्ला और जिन्ना के षड्यंत्रों के चलते नेहरू ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी और कश्मीर का 40 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से में ही रह गया.
लेकिन कश्मीर की रक्षा करने के लिए राष्ट्रवादियों को इनाम नहीं बल्कि सजा मिली. शेख़ अब्दुल्ला ने श्रीनगर की गद्दी पर बैठते ही सभी स्वयंसेवकों को गिरफ्तार करने का हुक्म दे दिया. अनेकों स्वयंसेवक मार दिए गए. प्रोफेसर बलराज मधोक और प. प्रेमचन्द डोगरा साहसिक रूप से श्रीनगर से निकल जम्मू पहुचे.
शेख अब्दुल्ला की देशद्रोही हरकतों का सामना करने के लिए उन्होंने ‘जम्मू कश्मीर प्रजा परिषद’ की स्थापना की. प्रजा परिषद् के सदस्यों ने उस समय कदम कदम पर सेना का साथ दिया. 1949 में उन्होंने संघ के “दत्तोपंत ठेंगडी” जी के साथ मिलकर “अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्” नामक छात्र संगठन की नींव रखी थी.
“अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्” आज दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन है. 1951 में डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने “अखिल भारतीय जनसंघ” की स्थापना की तो बलराज मधोक भी उसके संस्थापक सदस्य बने. उन्होंने दिल्ली, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनसंघ के विस्तार और प्रचार का काम किया.
1961 के लोकसभा चुनाव में बलराज मधोक “दक्षिण दिल्ली” सीट से विजय प्राप्त कर संसद में पहुंचे. 1966-67 में वे जनसंघ के अध्यक्ष बने. 1966 भारतीय जनसंघ ने 33 सीटें जीतीं और वह कांग्रेस का मजबूत विकल्प बनकर उभरी, लेकिन दुर्भाग्य से जनसंघ के बड़े नेताओं में आपस में मनमुटाव होने लगा.
पार्टी में एक गुट अटल / अडवानी का तथा दूसरा गुट बलराज मधोक का बन गया. 1973 में उनका आपस का विवाद इतना बढ़ गया कि – तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण अडवानी ने “बाजराज मधोक” को पार्टी से निष्काषित कर दिया. हालांकि पार्टी के कई सीनियर / जूनियर नेता उनके साथ संपर्क में रहे.
इसी बीच 1975 में इंदिरा गांधी ने देश पर जबरन आपातकाल थोप दिया. तब बिना किसी बजह के “बलराज मधोक” को भी 18 महीने के लिए जेल में बंद कर दिया गया. 1977 में सभी गैर कांग्रेसी पार्टियों ने आपस में विलय करके एक नई पार्टी “जनता पार्टी” का गठन किया और इंदिरा गांधी / कांग्रेस को हराने में कामयाब हुए.
बलराज मधोक उस समय भी भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय का बिरोध करते रहे. 1979 में उन्होंने अपनी भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी से अलग घोषित कर दिया. उन्होंने अपनी पार्टी को आगे बढाने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली. अधिकाँश जनसंघी नेता अटल / अडवानी के नेतृत्व वाली “भारतीय जनता पार्टी” से जुड़ गए.
उन्होंने “भारतीय जनसंघ” को “अखिल भारतीय जनसंघ” के नाम से पुर्नजीवित करने का प्रयास किया परन्तु अधिक आयु, बीमारी और आर्थिक तंगी के चलते असफल रहे. धीरे धीरे यह महान राष्ट्रवादी नेता गुमनामी की ओर चला गया. धीरे धीरे लोग उन्हें भूल गए और वे एकाकी जीवन जीने लगे.
2 मई 2016 को 96 साल की आयु में बलराज मधोक अनाम और खामोश मृत्यु को प्राप्त हुए. उनकी म्रत्यु के समय एक तरह से उनके द्वारा बनाई गई पार्टी के लोगों कि ही सरकार थी, मगर उनको वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तव में हकदार थे ।
जिन्ना नमाज नहीं पढ़ता था, रोजे नहीं रखता था और दबाकर सूअर खाता था लेकिन मजाल है कि किसी मुस्लिम ने उसकी आलोचना की हो या उसके पाकिस्तानी इरादों पर शक किया हो।
ओवैसी ने भगवा साफा बांधा, जय महाराष्ट्र बोला लेकिन मजाल है कि किसी मुस्लिम ने एक शब्द उसके खिलाफ बोला हो क्योंकि वे उसके रजाकार इतिहास और भारत के विखंडनवादी इरादों के बारे में आश्वस्त हैं।
इधर रोंदू हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो खुद को बड़ा स्मार्ट और अतिबुद्धिमान समझता है। निहायत नाकारा और मानसिक रूप से कुंठित यह वर्ग उस बच्चे की तरह व्यवहार करता है जो घर में तो शेर होता है लेकिन गली में किसी आवारा गलीच बच्चे से पिटकर चला आता है और घर पर आकर रो रोकर अपने बाप पर दवाब डालता है कि वह चलकर उस आवारा बच्चे को पीटे।
कभी यहूदी भी हिंदुओं की तरह थे, एकदम रोंदू, सभ्य, सुशिक्षित, पैसे पर मरने वाले। पिटने पर बुक्का फाड़कर रो देने वाले। सरकारों की ओर मुंह ताकने वाले।
लेकिन फिर नियति ने उन्हें मिलवाया कैप्टन ऑर्ड विनगेट से जिसने उन्हें पिटने की जगह पीटने का सबक सिखाया और वे कमजोर रोंदू यहूदी ‘इजरायल’ बन गये।
हमें भी नियति से एक कैप्टन ऑर्ड विनगेट मिला है पर हम इतने बड़े वाले हैं कि उससे ही कह रहे हैं कि ‘शिकार करना नही सीखना बल्कि तू ही हमारे लिये शिकार करके ला।’
लेकिन हमारा विनगेट भी जिद्दी है कि बेटा शिकार तो तुम्हें खुदै करना पड़ेगा और मैं तुम्हें सिखाकर रहूँगा।