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अंग्रेज इतिहासकार माईकल एडवर्ड लिखते हैं, “अंग्रेजों को यह बात समझ में आ गयी थी कि उन्हें गांधीजी से डरने की कोई जरूरत नहीं है; क्योंकि उन्होंने समझा था कि वे पाश्चात्य-विरोधी एक सुधारक मात्र हैं….जब तक कांग्रेस की बागडोर गांधीजी के हाथों में रहेगी, उनका मानना था कि कांग्रेस में उनका एक मित्र मौजूद है. जब तक उनका असहयोग आन्दोलन अहिंसात्मक रहेगा, तब तक इसे लेकर सरकार को कोई सरदर्द नहीं है…. गांधीजी का एकमात्र मकसद था सशस्त्र संघर्ष न होने देना. सरकार का उद्देश्य भी यही था. लेकिन यदि गांधीजी के हाथों में कांग्रेस की बागडोर न रही होती, तो यह सन्गठन काफी गतिशील और हिंसात्मक आन्दोलन के समर्थक नेतृत्व के नियन्त्रण में चला गया होता. तब यदि कोई सर्वव्यापक विद्रोह उठ खड़ा हुआ होता, तो उसे दबाना सम्भव नहीं होता. इसी वजह से सरकार गांधीजी के प्रति सम्मानजनक बर्ताव करती थी. हालाँकि जनमानस में उनकी छवि को साफ सुथरा रखने केलिए (ताकि कहीं लोग उन्हें अंग्रेजों का मित्र न समझ लें) सरकार उन्हें बीच बीच में जेल भेज दिया करती थी….दूसरी तरफ आतंकवादी और पाश्चात्य शिक्षा से प्रेरित क्रांतिकारियों से उसे सचमुच डर था और उनके खिलाफ वह अत्यंत कड़ी कार्रवाई करती थी. (Last Years of British India, Writer- Michael Edwards, अनुवादक-कॉमरेड प्रभाष घोष)

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