एक बार सिकंदर ने अपने सेनापति से रुष्ट होकर उसे छोटा सूबेदार बना दिया !
कुछ समय बाद उसे सिकंदर ने बुलाकर पूँछा —- “तुम पहले के समान ही प्रसन्न हो , इसका कारण क्या ??”
सूबेदार ने कहा —- “श्रीमान , पहले तो सेना के छोटे अधिकारी और सैनिक मुझसे डरते थे , इसलिये संकोचवश बात करना क्या—-मिलना भी उनके लिये कठिन था । अब बात—-बात में वे मेरी सम्मति लेते और मेरा सम्मान करते हैं ।”
“मानवता की सेवा का अवसर तो मुझे अब मिला है ।”
सिकंदर ने पूँछा — “तुम्हें पदावनत होने का दु:ख या अपमान प्रतीत नही होता ??”
सूबेदार बोला—– “सम्मान पद में नही _मानवता_ में है । उच्चपद पाकर भी अन्य को सताना, गर्व करना , घूस लेना, निंदनीय और अपमान जनक है ।”
परन्तु मनुष्यतापूर्वक सेवा , कर्तव्यपालन , नम्र व्यवहार गौरव की बात है , चाहे वह छोटा सा चौकीदार ही क्यों न हो !
सिकंदर उससे बड़ा प्रभावित हुआ उसे पुन:सेनापति बना दिया गया !!