एक के साथ एक फ्री
आजकल एक बेहद मजेदार पुस्तक पढ़ रहा हूँ- आख़िरी निज़ाम। उक्त पुस्तक हैदराबाद के निज़ाम वंश पे है।
इस पुस्तक से एक मजेदार वाक्या पढ़िए।
तुर्की के अंतिम ख़लीफ़ा को तुर्की से निर्कर्षित कर पेरिस जाना पड़ा। अंतिम ख़लीफ़ा अपनी बेगमों और औलादों के साथ पेरिस रहने लगे किंतु ख़र्चे पूरे नहीं पड़ते थे। लिहाजा ख़लीफ़ा ने दुनिया भर के नवाब बादशाह आदि से गुहार लगाई कि हमको वज़ीफ़ा भेजो। ये वो दौर था जब भारत में खिलाफत आंदोलन में मौलाना शौकत अली और मौलाना अली जौहर गांधीजी के साथ अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे। मुस्तफा कमाल ने आख़िर ख़िलाफ़त ख़त्म कर के ख़लीफ़े को फ्रांस भेज दिया।
दोनों मौलानाओं ने हिन्दोस्तान के सब रजवाड़ों से गुहार लगाई कि पेरिस में रह रहे इन ख़लीफ़ा को वो माहवार वज़ीफ़ा दें। हैदराबाद के कंजूस निज़ाम से भी इन्होंने तीन सौ पाउंड महीने की किश्त बँधवाई। निज़ाम उस समय दुनिया का सबसे अमीर आदमी था।
अब इधर से कहानी में ट्विस्ट आया।
ख़लीफ़े की औलादों में प्रमुख थी एक बेहद ख़ूबसूरत शहज़ादी- दुर्रुश्शेहवर। शहज़ादी बेहद सुंदर थी और उससे निकाह करने बड़े बड़े लोग तैयार थे जैसे-
ईरान का शाह, इजिप्ट का बादशाह और तुर्की शहज़ादे आदि। सूची काफ़ी बड़ी थी। मतलब शहजादी को चाहने वालों की कमी ना थी।
किंतु ख़लीफ़ा ने शहज़ादी का निकाह करवाया निजाम के सबसे बड़े बेटे से। कारण था- निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी था और वो ख़लीफ़ा की मुफ़लिसी ख़त्म कर सकता था।
मौलाना शौकत अली और अली जौहर ने इस विवाह में अहम भूमिका निभाई- बिचौलिया बने। ख़लीफ़े ने निजाम से कहा- अपनी शहजादी को तुम्हारे लड़के से निकाह के बदले में तुम्हें मेहर में पचास हज़ार पाउंड देने होंगे।
कंजूस निजाम ने साफ़ इंकार कर दिया – कहा ये मुमकिन नहीं। हैदराबाद के गलियारों में अफ़वाह थी- निजाम एक मारवाड़ी जौहरी का खून है जो उनकी अम्मी को गहने आदि खूब बेचता था। निजाम ने कहा- पचास हज़ार पाउंड बहुत ज़ियादा है।
अब मौलाना शौक़त और जौहर ने निजाम ख़लीफ़ा से मांडवाली की- कहा- एक काम करो, पचास हज़ार पाउंड ले लो किंतु एक की जगह दो शहज़ादी निजाम के दो लड़कों से बियाह दो।
निजाम ने कहा- ये ठीक है, एक के साथ एक फ्री। इधर से इंडिया में लगने वाली सेल- buy one get one free सेल की शुरुआत हुई।
तय वक्त पे निजाम ने दोनों शहजादों को फ्रांस भेजा। ख़लीफ़ा को ये मंजूर ना था कि पचास हज़ार में वो दो शहज़ादी दें। उसने एक चाल चली।
उसनेनिजाम के छोटे लड़के के सामने अपनी रिश्तेदारी की भतीजी खड़ी कर दी, जिसे देख छोटा निजामजादा अपना सुध बुध खो बैठा और उसने भतीजी से निकाह करने का फैसला किया। इस निकाह की मेहर की रकम तय हुई पच्चीस हज़ार पाउंड।
इस तरफ़ से ख़लीफ़े ने पचास हज़ार ख़ुद की शहज़ादी के एवज़ में लिए और पच्चीस हज़ार भतीजी के। और बेचारा निज़ाम मांडवली के चक्कर में और रक़म से हाथ धो बैठा।
उक्त क़िस्सा पढ़कर मीर मुंशी जी ने कहा- अब ये तय है निज़ाम मारवाड़ी जौहरी की औलाद नहीं हो सकता, ऐसा घाटे का सौदा मारवाड़ी लोग करते ही नहीं है।
तस्वीर में ख़लीफ़ा अपनी शहजादी और दामाद के साथ!
