Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बहुत समय पहले की बात है- ईसा से पाँच सौ साल पहले। तब ना किसी और मजहब का उदय हुआ था और ना कोई पैगंबर आदि थे। तब के फ़ारस में एक राजा हुआ करता था- आवाम अग्निपूजक थी, राजा भी था।

राज्य में एक न्यायाधीश था- उस ज़माने का काजी, जज, फ़ैसला करने वाला। काजी भी अग्निपूजक था- किंतु था बेईमान, रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी, पैसे लेके फ़ैसले पलट देने वाला। एक बार एक केस में उसने पैसे खाये। जिस पक्ष के साथ उसने ग़लत किया धोखा दिया- वो पक्ष राजा के पास गया और राजा को सब सुबूत दिखाए। राजा को यकीन हो गया कि मेरा जज धोखेबाज़ बेईमान है।

राजा ने जज को बुलाया- सुबूत दिखाए और कहा- अपनी बेगुनाही साबित करो। जज निरुत्तर हो गया- उसके पास कुछ था ही नहीं कुछ कहने को। उसने अपना जुर्म कुबूल कर लिया। राजा ने हुक्म दिया- जज की खाल उधेड़ लो। खाल निकाल कर राजा ने वो खाल जज की कुर्सी पे मढ़वा दी। जज के बेटे को कहा- मेरे राज्य में कॉलेजियम सिस्टम है, तो लिहाज़ा अगले जज तुम बनोगे। इस कुर्सी पे बैठ कर न्याय करना जिस कुर्सी पे तुम्हारे बाप की खाल मढ़ी हुई है।

न्याय में भ्रष्टाचार नहीं होना चाहिए। न्यायाधीश पे कोई कलंक नहीं होना चाहिए। यही दस्तूर है यही परंपरा है।

इस घटना के कुछ तीन हज़ार साल बाद, एक मुल्क जिधर लोग मूर्तिपूजक थे, राजा मूर्तिपूजक था, किंतु मुल्क सेक्युलर था। हर मजहब के लिए अलग अलग कानून थे। जज थे, काजी थे, न्यायाधीश थे। कॉलेजियम सिस्टम था- मतलब जज का बेटा या बेटी या भतीजा या भतीजी ही जज बन सकते थे।

मतलब ठीक वही सिस्टम जो ऊपर बताई कहानी में था।

फिर एक जज के मकान के बाहर से नगद नोटों से भरी बोरियां मिली-आग लगी थी इसलिए बोरियां अधजली मिली। मुल्क में हंगामा मच गया- सबने कहा- ये सुबूत काफ़ी है कि क़ाज़ी धोखेबाज़ है, करप्ट है।भला इससे बड़ा सुबूत हो क्या होगा।

क़ाज़ी की पेशी हुई, बाक़ी जजों ने मुआमला सुना, राजा के संज्ञान में भी गया।भ्रष्ट क़ाज़ी ने कहा- जनाब नोट मेरे नहीं है, जिस कोठरी से नोटों की बोरियाँ मिली, वो कोठरी मेरी है, ख़ाली बोरियाँ मेरी है, किंतु- वो नोट मेरे नहीं है। वो नोट तो फादर ऑफ़ दिनेशन के है। यकीन ना हो तो नोटों पे लगी तस्वीरों से मैच करके देख लो। राजा ने कहा- बात ठीक है, भला मेरा क़ाज़ी चोर कैसे हो सकता है।

क़ाज़ी को रिहा कर दिया गया। आवाम में रोष ना फैले इसलिए उसे तबादला कर दूसरे कोर्ट में भेज दिया गया। इस तरह से न्याय हुआ- न्याय ठीक होना बहुत ज़रूरी है नहीं तो आवाम क्रोधित होती है, संतुलन बिगड़ जाता है।

ये न्याय देख सुवर्ग में ऊपर बैठे उस अग्निपूजक खालखिचाऊँ राजा ने अपने बाल नोंच लिए। ये देख बिना खाल के उस जज ने सर्द आह भरी और कहा-

या खोदा, ग़लत समय में पैदा हुआ था। इस समय में इस मुल्क में हुआ होता तो मेरा भी तबादला हो जाता।

आज कल खाल मढ़ी कुर्सियां बस कहानियाँ में मिलती है।

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