Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

लगभग सत्तर अस्सी साल पुरानी हमारे गांव के एक बुद्धिमान किन्तु गरीब व्यक्ति की सच्ची कहानी पर आधारित है,
उस समय गांवों में काफी ग़रीबी थी,
और कुछ लोगों का जीवन यापन कठिनाई से होता था,
ऐसे में उस व्यक्ति के यहां भोजन के समय दो मेहमान आ पधारे,
सज्जन ने अपनी पत्नी को खाना बनाने को कहा तो पत्नी बोली- घर में केवल लगभग चौदह पंद्रह रोटियों के लिए ही आटा है और मेहमानों की शक्ल बता रही है कि इन दोनों का पन्द्रह बीस रोटियों से कम भला बुरा नही होगा,
तो सज्जन ने पत्नी से कहा- तू चिंता मत कर रोटी बना, और थाली में दो- दो रोटियां रख कर लाना,
और जब भी रोटी दुबारा लेकर आयेगी शुरुआत मेरी तरफ से ही करना!
पत्नी ने ऐसा ही किया जब तीनों को
चार- चार रोटियां मिल गयी और तीसरी बार वो पति को रोटियां देने लगी तो वो दिखावटी गुस्से में पत्नी पर चिल्लाया-
जानवर समझा है मुझे!
एक आदर्श पुरुष का खाना चार रोटियां हैं, जो मैं खा चुका!
चल मेहमानों को रोटियां दे!
तभी दोनों मेहमान एक स्वर में बोले-ना जी हम तो बिल्कुल भी रोटी नही लेंगे, हम अभी थोड़ी देर पहले ही पड़ोसी गांव में खाना
खाकर आए हैं!

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