एक कहानी सुनाना चाहता हूँ। इसका केजरीवाल के खिलाफ मामला खारिज होने से कोई लेना-देना नहीं है
अदालत के कमरे में जज साहब ने अपना हथौड़ा मेज पर मारा और फैसला सुनाया, “गवाहों के बयानों में तालमेल की कमी और ठोस सबूतों के अभाव के कारण, अदालत आरोपी को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए बाइज्जत बरी करती है।”
आरोपी की खुशी का ठिकाना न रहा। जैसे ही वह कटघरे से बाहर निकला, वह भागते हुए अपने वकील के पास पहुंचा और उनके हाथ थाम लिए।
“वकील साहब, आपने तो कमाल ही कर दिया! आपकी दलीलों के आगे तो सरकारी वकील पानी भर रहा था। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!” उसने गदगद होकर कहा।
वकील साहब ने अपनी फाइल समेटते हुए गर्व से मुस्कुरा कर कहा, “अरे भाई, सच्चाई की जीत तो होनी ही थी। अब आप बिना किसी डर के घर जा सकते हैं।”
तभी आरोपी थोड़ा हिचकिचाया और वकील के कान के पास झुककर फुसफुसाते हुए पूछा, “वकील साहब, एक छोटी सी उलझन है… अब जब कोर्ट ने मुझे छोड़ ही दिया है, तो क्या अब मैं उस सोने की चेन को खुलेआम पहन सकता हूँ? या उसे अभी भी छुपा कर ही रखना पड़ेगा?”
वकील साहब एक पल के लिए ठिठके, फिर अपनी फीस का लिफाफा जेब में रखते हुए बोले, “देखिए, कानून की नजर में तो आप बेगुनाह हैं। लेकिन अगर मेरा मशविरा मानें, तो उसे अभी पहनिएगा मत।”
आरोपी ने हैरान होकर पूछा, “क्यों वकील साहब? अब किसका डर है?”
वकील साहब ने धीरे से कहा, “डर पुलिस का नहीं, असली मालिक का है! क्योंकि जिस ‘संदेह का लाभ’ की वजह से आप छूटे हैं, वह संदेह असली मालिक के मन में अभी भी बरकरार होगा। कहीं ऐसा न हो कि वह अगली बार कोर्ट के बजाय सीधे आपसे अपनी चेन मांगने आ जाए!”