जार्ज गुरजिएफ ने लिखा है कि वह बचपन में एक छोटे-से खानाबदोशों के कबीले में रहा। उस खानाबदोश कबीले की औरतें एक तरकीब जानती थीं। क्योंकि खानाबदोश कबीले, जैसे हमारे यहां बलूची आते थे। पाकिस्तान बन गया तो बलूची आने बंद हो गए। उनके न आने से एक रौनक चली गई। वे नहीं आते हैं तो कुछ कमी हो गई।
बलूची आवारागर्द थे, घुमक्कड़ थे। उनकी औरतें मजबूत थीं। घुमक्कड़ होना हो तो औरतों को मजबूत होना ही पड़े। औरतें कमजोर हो गईं घरवाली हो कर। घर में बंद हो गईं, कमजोर हो गईं। बलूची की औरत तुम्हारे दो-चार मर्दों को पानी पिला दे। बलूची औरत किसी का हाथ पकड़ ले तो छुड़ाना मुश्किल हो जाए।
मुझे याद है, जब मैं छोटा था, मेरे गांव में बलूची आते थे तो लोग डरते थे। अच्छी-अच्छी चीजें बेचने लाते थे, लेकिन उनसे खरीदना मुश्किल था। क्योंकि उनसे अगर खरीद-फरोख्त की…छोटे-से चक्कू के दस रुपए बताएंगे। अब कोई दस रुपए बताएगा दाम तो तुम बहुत भी हिम्मत करोगे तो कम से कम दो रुपए तो कहोगे। वह बलूची स्त्री राजी हो जाएगी कि ठीक है, दो रुपए सही। हाथ पकड़ लेगी। हाथ छुड़ाना मुश्किल हो जाएगा। भीड़ इकट्ठी कर लेगी। दो रुपए निकलवा कर रख लेगी। चाकू मुश्किल से होगा आठ आने का, चार आने का।
बलूची स्त्रियां मजबूत थीं। सभी खानाबदोश कबीलों की औरतें मजबूत होती हैं। होना ही पड़ेगा। ऐसे हर कोई बलात्कार कर दे तो नहीं चलेगा। रोज चलना है, यात्रा करनी है। और दिन भर काम में लगे रहना है। इस तरह नहीं चलेगा, जैसा कि घूंघट मार कर बैठ गए।
गुरजिएफ ने लिखा है: मैं एक कबीलों में रहा, जो खानाबदोश था।
खानाबदोश बड़ा प्यारा शब्द है। खानाबदोश का अर्थ होता है, जिसका मकान अपने कंधे पर है। खाना यानी मकान। इसलिए कहते हैं–शराबखाना, मयखाना, दवाखाना। खाना यानी मकान। और बदोश…दोश का अर्थ होता है: कंधा। खानाबदोश का अर्थ होता है, जिसका मकान अपने कंधे पर; जो हमेशा चल रहा है; जो चलता ही रहता है; जो रुकता ही नहीं; जो कहीं मजबूत मकान नहीं बनाता, तंबू बांधता है। अभी बांधा और सांझ उखड़ जाएगा। सांझ बांधा और सुबह उखड़ जाएगा। सच पूछो तो हम भी सब खानाबदोश हैं संसार में। सुबह बांधा तंबू, सांझ उखड़ जाएगा।
गुरजिएफ ने कहा है कि उस कबीले की औरतें एक तरकीब जानती थीं, जो मुझे बहुत हैरान करती थी। वह तरकीब यह थी कि वे अपने बच्चों को–दिन भर तो उन्हें काम करना है, बाजार में सामान बेचना है, तरहत्तरह के धंधे करने हैं–वे अपने बच्चों को क्या करें? अपने बच्चों को बिठा देतीं, खड़िया मिट्टी से उन बच्चों के चारों तरफ एक सफेद लकीर खींच देतीं और बच्चों से कह देतीं कि इस लकीर के बाहर तुम निकल न सकोगे; लाख उपाय करोगे और निकल न सकोगे। बचपन से ही बच्चों को यह बात सिखाई जाती।
और बच्चों की तो बात और, गुरजिएफ ने लिखा है कि खानाबदोश औरत अपने पति के चारों तरफ लकीर खींच देती और कह देती कि बस इसके बाहर नहीं निकल सकोगे। गुरजिएफ तो बड़ा हैरान हुआ। बच्चा समझ लो कि बच्चा है, मान गया। लेकिन जिसने बीस-पच्चीस साल तक यह बात मानी हो, उसके भीतर गहरी बैठ गई। वह अब पति ही सही, मगर भीतर तो वही बच्चा है; और कहने वाली आज मां न सही, पत्नी है, मगर है तो वही औरत, है तो वही स्त्री। वही बल, वही धमकी–बाहर निकल न सकोगे! बाहर निकले कि मुसीबत में पड़ जाओगे, बीमार पड़ जाओगे, लंगड़े हो जाओगे, अंधे हो जाओगे। इस तरह की सारी धमकियां।
गुरजिएफ ने देखा कि जवान आदमी, बूढ़े आदमी के चारों तरफ लकीर खींच दें औरतें, वे बाहर न निकल सकें। निकलने की कोशिश करें तो यूं हो जैसे कि कोई अदृश्य दीवार, कांच की कोई पारदर्शी दीवार उन्हें रोक लेती है। बस वे लकीर तक आएं, हाथ से टटोलें, जैसे कोई चीज रोक रही है और वापस लौट जाएं।
गुरजिएफ ने कहा है, वहां मुझे पहली बार समझ में आया कि आत्म-सम्मोहन क्या है। और वहीं मैंने समझा कि यह संसार का उपद्रव क्या है।
हम सब आत्म-सम्मोहित हैं। जिस चीज को हमें धन बता दिया गया, हमने धन मान लिया। और जिस चीज को हमें पद बता दिया गया, हमने पद मान लिया। जिस चीज को हमसे कहा गया बहुमूल्य है, हमने बहुमूल्य मान लिया। और कंकड़-पत्थरों को हीरों की तरह पूज रहे हैं। दो कौड़ी की चीजों के पीछे जिंदगी भर दौड़ रहे हैं।
सांच-सांच सो सांच 👣 ओशो
♣️♣️♣️♣️
Day: March 1, 2026
प्लेग में हेडगेवार ने खोए थे माता-पिता और भाई, तेलंगाना से नागपुर आकर बसा था परिवार
प्लेग एक ऐसी महामारी थी जिसने 19वीं सदी के आखिरी 4 साल और 20वीं सदी के पहले दशक में हिन्दुस्तान में कहर बरपा दिया था. इस दौरान एक ऐसा मौका आया जब संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार का परिवार इस बीमारी की चपेट में आ गया.
डॉ केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म तो नागपुर में हुआ था, लेकिन उनका सरनेम ‘हेडगेवार’ महाराष्ट्र का नहीं है. उनके जन्म से कई दशक पहले उनके दादा नरहरि शास्त्री नागपुर में आकर बसे थे. उनका पैतृक गांव था कंदकुर्ती, जो तेलंगाना में महाराष्ट्र की सीमा पर है. गांव में ज्यादातर लोग तेलुगू बोलते हैं. मराठी और कन्नड़ भी बोली जाती है. तेलंगाना में इसी गांव से गोदावरी नदी राज्य में प्रवेश करती है और यहीं उससे दो नदियां और आकर मिलती हैं, हरिद्रा और मंजरी. यह संगम गांव निजामाबाद जिले को बोधन तालुक (तहसील) में पड़ता है. संगम गांव होने की वजह से इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है.
इस गांव में ब्राह्मणों के कई परिवार थे और देशस्थ ब्राह्मण हेडगेवार का परिवार प्रमुख था, क्योंकि पूरा परिवार वेद पठन पाठन में सक्रिय था, वही उनकी आजीविका थी. हेडगेवार परिवार के अभिलेखों में एक नियुक्ति पत्र भी मिलता है, जो बताता है कि कभी शंकराचार्य (आदि शंकराचार्य के धार्मिक वंशज) यहां आए थे और उन्हें हिंदू धर्म के रक्षण और प्रचार के लिए अपना प्रतिनिधि नियुक्त करके गए थे. शायद तभी से आसपास के क्षेत्र में सनातन, वेद-पुराणों आदि को लेकर उनके परिवार की राय ली जाती थी.
नाना पालकर हेडगेवार चरित में ये भी लिखते हैं कि उनके परिवार में सदस्यों को कुश्ती का भी शौक था, सो ये ज्यादातर बलिष्ठ हुआ करते थे. निजाम के शासन के समय हिंदुओं पर अत्याचार धीरे-धीरे बढ़ने लगा था. ऐसे में धीरे-धीरे सीमावर्ती क्षेत्रों से पास के राज्यों में हिंदुओं का पलायन बढ़ने लगा. हेडगेवार के दादा भी पूरे परिवार को लेकर नागपुर चले आए. तब भी वहां शिवाजी भोंसले के परिवार का साम्राज्य था, भले ही 1853 के बाद अंग्रेजी अधिकार में आ गया था. आज कंडकुर्ती गांव में 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं और करीब 35 प्रतिशत हिंदू. ये अलग बात है कि डॉ हेडगेवार का पुश्तैनी घर होने के चलते देश भर के स्वयंसेवक वहां एक तीर्थ की तरह आते-जाते रहते हैं. हालांकि गांव में जितने प्राचीन मंदिर हैं, उतनी ही मस्जिदें भी हैं.
स्थानीय ग्रामीणों ने डॉ हेडगेवार के इस छोटे से घर को तब संघ के सर सरकार्यवाह रहे मोरो पंत पिंगले की सहायता से एक स्मारक में बदल दिया था, जहां एक केशव बाल विद्या मंदिर चल रहा है. दिलचस्प बात है कि इस स्कूल में लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे पढ़ते हैं. पिंगले ने हेडगेवार परिवार के कुलदेवता के मंदिर को भी भव्य रूप दे दिया था. आजकल इस गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत निजामाबाद की सांसद के कविता (बीआरएस) ने गोद ले रखा है.
नरहरि शास्त्री के बेटे बलिराम पंत हेडगेवार ने भी पिता की तरह ही वेद, शास्त्रों में प्रवीणता हासिल कर ली थी और धीरे-धीरे उन्होंने नागपुर में अपना नाम बना लिया. हालांकि परिवार का गुजारा अब उसी पूजा पाठ पर चलता था. उनकी पत्नी रेवती बाई (दूसरा नाम यमुनाबाई) भी तेलंगाना से नागपुर आए पैठंकर परिवार से थीं. दोनों के 6 बच्चे हुए. तीन लड़के, तीन लड़कियां. लड़कों के नाम उन्होंने रखे महादेव, सीताराम और केशव, लड़कियों के रखे राजू, रंगू और शरायू या सरू. केशव इनमें पांचवें बच्चे थे, जो वर्ष प्रतिपदा के दिन 1 अप्रैल 1889 को पैदा हुए थे. महादेव सबसे बड़े थे और सीताराम लड़कों में दूसरे थे.
कालांतर में तीनों लड़कियों के विवाह अच्छे परिवारों में कर दिए गए, शरायु या सरू का विवाह नागपुर के देव परिवार में हुआ. राजू का विवाह विंचुरे परिवार में हुआ तो रंगू का विवाह पत्तलवार परिवार में हुआ. महादेव और सीताराम दोनों ने परिवार की वेद शास्त्रों के वाचन की परम्परा को आगे बढ़ाया. महादेव काशी से पढ़कर आए और महादेव शास्त्री कहलाने लगे. उन दिनों तेलंगी ब्राह्मणों के बारे में कहा जाता था कि ये स्वभाव से गुस्सैल होते हैं, जो पिता बलिराम और बड़े भाई महादेव थे भी. हालांकि सीताराम और केशव स्वभाव से शांत थे. यूं शुरुआती शास्त्रों की शिक्षा केशव ने भी पिता और बड़े भाई से ली थी, लेकिन वो सीताराम की तरह वैदिक स्कूल में पढ़ने नहीं गए. उनकी शुरुआत से ही दिलचस्पी देश की राजनीतिक, सामाजिक घटनाओं पर थी, जबकि उनके घर का माहौल पूरी तरह धार्मिक था, और पिता व भाई अक्सर किसी ना किसी तरह की पूजा या धार्मिक आयोजन से जुडे रहते थे. इधर केशव का दाखिला महाल के नील सिटी हाई स्कूल में करवा दिया गया. आजकल इसका नाम दादा धनवटे विद्यालय है.
जब केशव के परिवार पर टूटा प्लेग का कहर
केशव की उम्र मुश्किल से 13-14 साल रही होगी, और सीताराम की 18, कि नागपुर में प्लेग की प्रकोप फैल गया. 19वीं सदी के आखिरी 4 साल और 20वीं सदी का पहला दशक प्लेग की महामारी ने भारत में करीब 10 लाख लोगों को मौत दे दी थी. जबकि आज की पीढ़ी ने प्लेग सुना भी नहीं है, तब इसका कोई इलाज नहीं था. उनके पिता बलिराम पंत को लगता था कि वो तो घर को इतना स्वच्छ रखते हैं, यहां तो प्लेग का वायरस आ ही नहीं सकता, इसलिए उन्होंने वहां से निकलने में देरी की जबकि पड़ोसी कब के घर छोड़कर जा चुके थे. तमाम सावधानियों के बावजूद घर में प्लेग संक्रमित एक चूहा मरा हुआ मिला, वो फौरन अपने परिवार के साथ अपनी बेटी राजू के घर आ गए. यहां भी उनके रोज सुबह के तीन घंटे के धार्मिक अनुष्ठान जारी रहे.
लेकिन एक पंडित होने के नाते उनको अंतिम संस्कार के लिए श्मशान भी जाना होता था, प्लेग संक्रमित लाशें आ रही थीं. परिवार के समझाने के बावजूद वो सामाजिक जिम्मेदारी की बात कहकर जाते रहे और एक दिन फरवरी 1903 में बलिराम भी प्लेग की चपेट में आ गए, साथ में उनकी पत्नी रेवती भी. राजू के पति और महादेव ने काफी कोशिश की, लेकिन होनी ने कुछ और ही लिख रखा था. पहले केशव के पिता काल के मुंह में समाए, फिर पीछे-पीछे मां भी चली गईं.
बड़े भाई महादेव की लीला समझ नहीं आई
माता-पिता की मौत के बाद सबसे बड़े बेटे महादेव पर ही परिवार का बोझ आ गया और साथ में माता-पिता का जो थोड़ा बहुत डर था वो खत्म हो गया. महादेव ने भांग पीना शुरू कर दिया. दोनों भाइयों को ये पसंद नहीं था सो अक्सर झगड़े होने लगे. हालांकि छोटे दोनों भाइयों पर घर में भोजन आदि बनाने की जिम्मेदारी थी, गाय की जिम्मेदारी थी और महादेव घर का कमाऊ सदस्य था. सीताराम ने लड़कर तब घर ही छोड़ दिया और वेदों की पढ़ाई के लिए इंदौर चले गए. इधर केशव ने भी ज्यादातर समय मित्रों और रिश्तेदारों के यहां बिताना शुरू कर दिया. अगले दो-तीन साल दोनों छोटे भाइयों के लिए कठिन थे, कभी खाना मिला, कभी नहीं मिला, कभी कपड़े धुले पहन लिए, कभी फटे भी पहनने पड़े.
लेकिन केशव ने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी. क्लास में टॉप 5 में रहना ही रहना था. साथ में देश और समाज के लिए काम भी करना था. तिलक का पैसा फंड भी इन्हीं दिनों शुरू हुआ था. डॉ बीएस मुंजे से भी सम्पर्क में इन्हीं दिनों आना हुआ था. उसके बाद वंदेमातरम आंदोलन हो या सीताबर्डी किले पर चढ़ने के लिए सुरंग खोदना, स्कूली जीवन में ही केशव ने अपने जीवन की दिशा तय कर दी. भाई के पास भी केशव का जाना होता था, और महादेव की यही सलाह होती थी कि पढ़ाई करो, फालतू के कामों में समय नष्ट मत करो.
केशव ने बाद में डॉक्टर की पढ़ाई के लिए कलकत्ता का रुख कर लिया और सीताराम शास्त्री ने पिता की तरह प्रवचन, पूजा, संस्कार आदि करने शुरू कर दिए. डॉक्टर बनकर जब केशव ने वापसी की तो महादेव ने बड़ी खुशी जताई कि केशव अब डिस्पेंसरी खोलेगा, हालांकि इसी बीच महादेव ने घर के एक हिस्से में किरायेदार भी रख लिया था. लेकिन केशव की मेडिकल व्यवसाय में रुचि नहीं दिखी तो महादेव को ये अच्छा नहीं लगा. केशव ने भी ज्यादातर समय बाहर ही गुजारना शुरू कर दिया. अचानक फिर से प्लेग ने धावा बोला और केशव और सीताराम ने खूब कहा महादेव से कि नागपुर छोड़ दो, लेकिन उन्होंने नहीं छोड़ा, वो दोनों चले गए.
जिद्दी महादेव को लगता था कि प्लेग उनका क्या बिगाड़ सकता है. वीरान पड़े मोहल्ले में महादेव की प्लेग की चपेट में आने से मौत हो गई और कई दिन तक किसी को पता भी नहीं चला. चोर मौके का फायदा उठाकर घर में से सारा सामान चोरी करके ले गए. बाद में सीताराम और केशव लौटे तो बड़ा दुख हुआ. अब फिर से दोनों भाई एक साथ अपने पुराने घर में रहने लगे. बाद में सीताराम ने विवाह कर लिया तो घर फिर से घर जैसा लगने लगा. महादेव का जिम बंद कर दिया गया. सीताराम अपनी गृहस्थी में व्यस्त होते चले गए और केशव एक विशाल संगठन के अपने सपने को पूरा करने में.
परिवार के जिक्र में गुरु गोलवलकर और गांधीजी का जिक्र क्यों आता है?
हालांकि कई जीवनीकारों ने डॉ हेडगेवार के दो अलग-अलग दो भतीजों का जिक्र किया है, जिनमें से एक निजाम के खिलाफ हैदराबाद आंदोलन में जेल भी गया था. नाम था वामनराव हेडगेवार, जिसे सीताराम शास्त्री का बेटा माना जाता है. दूसरे भतीजे या दूर के रिश्तेदार का जिक्र भी है, जो केशव की देखभाल के लिए उनके साथ रहता था, और नागपुर में ही पढ़ाई कर रहा था, लेकिन उसका मानसिक स्तर सामान्य ना होने का जिक्र भी मिलता है. बाद में जब डॉ हेडगेवार गंभीर रूप से बीमार थे, तब गुरु गोलवलकर आदि उनके साथ थे, तब डॉक्टर ने उनके परिवार को सूचित करने को कहा था, तब गुरुजी ने जवाब दिया था, “हम ही उनके परिजन हैं”.
परिवार का जिक्र ड़ॉ हेडगेवार और गांधीजी की बातचीत के दौरान भी आया था. गांधी ने संघ के शिविर में जब इतना अनुशासन देखा, सभी जातियों के लोगों को एक साथ बैठकर खाना खाते देखा, तो उन्हें बड़ी हैरत हुई. ऐसा अनुशासन तो वो कांग्रेस में भी नहीं ला पा रहे थे, तो उन्होने केशव से पूछा था कि परिवार में कौन-कौन है? डॉ हेडगेवार का जवाब था कि कोई नहीं? विवाह ही नहीं किया. गांधीजी हैरान थे और कहा था कि तभी इतना बड़ा और अनुशासित संगठन इतने कम समय में खड़ा कर पाए हो.
लेखक : विष्णु शर्मा
सोर्स : आज तक
#IndianValues #ViralPost #ReelsIndia #TrendingNow #sanatansanskriti #VibrantIndia #Itihaaskepannose #sanatandharma #RSS100Years #hindu #SanghYatra #rashtriyswayamsevaksangh #sanatanihindu #hinduism #hindustan #RSS4Nation #RSSorg #rssnews #RSSImpact #rssbofficial
लगभग सत्तर अस्सी साल पुरानी हमारे गांव के एक बुद्धिमान किन्तु गरीब व्यक्ति की सच्ची कहानी पर आधारित है,
उस समय गांवों में काफी ग़रीबी थी,
और कुछ लोगों का जीवन यापन कठिनाई से होता था,
ऐसे में उस व्यक्ति के यहां भोजन के समय दो मेहमान आ पधारे,
सज्जन ने अपनी पत्नी को खाना बनाने को कहा तो पत्नी बोली- घर में केवल लगभग चौदह पंद्रह रोटियों के लिए ही आटा है और मेहमानों की शक्ल बता रही है कि इन दोनों का पन्द्रह बीस रोटियों से कम भला बुरा नही होगा,
तो सज्जन ने पत्नी से कहा- तू चिंता मत कर रोटी बना, और थाली में दो- दो रोटियां रख कर लाना,
और जब भी रोटी दुबारा लेकर आयेगी शुरुआत मेरी तरफ से ही करना!
पत्नी ने ऐसा ही किया जब तीनों को
चार- चार रोटियां मिल गयी और तीसरी बार वो पति को रोटियां देने लगी तो वो दिखावटी गुस्से में पत्नी पर चिल्लाया-
जानवर समझा है मुझे!
एक आदर्श पुरुष का खाना चार रोटियां हैं, जो मैं खा चुका!
चल मेहमानों को रोटियां दे!
तभी दोनों मेहमान एक स्वर में बोले-ना जी हम तो बिल्कुल भी रोटी नही लेंगे, हम अभी थोड़ी देर पहले ही पड़ोसी गांव में खाना
खाकर आए हैं!
एक कहानी सुनाना चाहता हूँ। इसका केजरीवाल के खिलाफ मामला खारिज होने से कोई लेना-देना नहीं है
अदालत के कमरे में जज साहब ने अपना हथौड़ा मेज पर मारा और फैसला सुनाया, “गवाहों के बयानों में तालमेल की कमी और ठोस सबूतों के अभाव के कारण, अदालत आरोपी को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए बाइज्जत बरी करती है।”
आरोपी की खुशी का ठिकाना न रहा। जैसे ही वह कटघरे से बाहर निकला, वह भागते हुए अपने वकील के पास पहुंचा और उनके हाथ थाम लिए।
“वकील साहब, आपने तो कमाल ही कर दिया! आपकी दलीलों के आगे तो सरकारी वकील पानी भर रहा था। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!” उसने गदगद होकर कहा।
वकील साहब ने अपनी फाइल समेटते हुए गर्व से मुस्कुरा कर कहा, “अरे भाई, सच्चाई की जीत तो होनी ही थी। अब आप बिना किसी डर के घर जा सकते हैं।”
तभी आरोपी थोड़ा हिचकिचाया और वकील के कान के पास झुककर फुसफुसाते हुए पूछा, “वकील साहब, एक छोटी सी उलझन है… अब जब कोर्ट ने मुझे छोड़ ही दिया है, तो क्या अब मैं उस सोने की चेन को खुलेआम पहन सकता हूँ? या उसे अभी भी छुपा कर ही रखना पड़ेगा?”
वकील साहब एक पल के लिए ठिठके, फिर अपनी फीस का लिफाफा जेब में रखते हुए बोले, “देखिए, कानून की नजर में तो आप बेगुनाह हैं। लेकिन अगर मेरा मशविरा मानें, तो उसे अभी पहनिएगा मत।”
आरोपी ने हैरान होकर पूछा, “क्यों वकील साहब? अब किसका डर है?”
वकील साहब ने धीरे से कहा, “डर पुलिस का नहीं, असली मालिक का है! क्योंकि जिस ‘संदेह का लाभ’ की वजह से आप छूटे हैं, वह संदेह असली मालिक के मन में अभी भी बरकरार होगा। कहीं ऐसा न हो कि वह अगली बार कोर्ट के बजाय सीधे आपसे अपनी चेन मांगने आ जाए!”
एक अमीर आदमी अपने प्यारे कुत्ते के साथ पार्क में मॉर्निंग वाॅक पर था।
अचानक झाड़ियों के पीछे से
एक नकाबपोश निकला
और
ताबड़तोड़ 4-5 गोलियाँ कुत्ते पर चला दीं, कुत्ते ने वहीं दम तोड़ दिया।
लेकिन नकाबपोश ने कुत्ते के मालिक उस अमीर आदमी को कुछ नहीं किया।
आदमी को बहुत अजीब लगा।
उसने नकाबपोश से पूछा :
” ये क्या किया भाई ? “
नकाबपोश बोला :
” आपके एक गुप्त शत्रु ने मुझे एक लाख रुपए दिए और कहा… GO & KILL THAT SON-OF-A-BITCH. ”
अमीर आदमी ने नकाबपोश को
बाहों में भर लिया
और
उसे धन्यवाद देते हुए बोला :
” भाई, मैं ये तो नहीं जानता कि
तुम्हारा अंग्रेजी टीचर कौन था,
मगर मैं उनका हमेशा अहसानमंद रहूँगा। “😝🤗
😂😂😄😄😆😆😆🤣🤣
કોમ્યુનિસ્ટનું સૌથી વિકૃત સ્વરૂપ તમને ભારતમાં જોવા મળશે…
હમણાં ભારતની કોમ્યુનિસ્ટ પાર્ટીએ નિવેદન જાહેર કરીને ઈરાનને સમર્થન કર્યું છે અને અમેરિકાને વખોડ્યું છે. જયારે હકીકત એ છે કે ઈ.સ. 1979 માં ખોમેનીની સરકાર આવી ત્યારે કોમ્યુનિસ્ટ નેતાઓ પર ભયંકર અત્યાચાર કરવામાં આવ્યો હતો.
મજાની વાત એ છે કે ઈરાનમાં એક કોમ્યુનિસ્ટ વિચારધારાવાળી પાર્ટી હતી, નામ હતું Tudeh party of Iran ( ઈરાન પબ્લિક પાર્ટી ). હવે જયારે ઈરાનમાં ધાર્મિક ક્રાંતિ ચાલી રહી હતી ત્યારે આ પાર્ટીએ ખોમેનીને પૂરો ટેકો આપ્યો હતો અને તત્કાલીન રાજા શાહ પહેલાવી વિરુદ્ધ અભિયાન ચલાવ્યું હતું.
ખોમેની સત્તામાં આવ્યો એટલે ધીરે ધીરે એક પછી એક કોમ્યુનિસ્ટ નેતા પર અલગ અલગ પ્રતિબંધ મુક્યા. થોડા આંદોલનનાં મોડમાં આવ્યા એટલે એક સાથે 5,000 લોકોને જેલમાં નાખીને હત્યા કરી મૂકી ( ઘણા લોકો આ આંકડો 10,000 સુધીનો કહે છે.) આ થવાથી 30,000 થી વધુ પાર્ટી વર્કર અને નેતાઓ ઈરાન છોડીને ભાગી ગયા. ખોમેનીએ કોમ્યુનિસ્ટ પાર્ટીને કાયમ માટે ઈરાનમાં પ્રતિબંધ મૂકી દીધો. આ ખાલી ઈરાનની સ્ટોરી નથી, સાઉદી અરેબીયા, ઇરાક, પાકિસ્તાન, અફઘાનિસ્તાન, સોમાલીયા, યમન, તુર્કી જેવા તમામ દેશોમાં કોમ્યુનિસ્ટ પાર્ટી પર સંપૂર્ણ પ્રતિબંધ છે.
એના જેવું જ જ્યાં જ્યાં કોમ્યુનિસ્ટ સરકારો છે ત્યાં ત્યાં ઇસ્લામિક લોકો પર અત્યાચાર કરવામાં આવે છે અને સંપૂર્ણ ધાર્મિક છૂટ આપવામાં આવી રહી નથી. ચીનની અંદર 8,00,000 ઉઇગર મુસ્લિમોને ભયાનક પ્રતાડના આપીને એક કેમ્પમાં પુરી દેવામાં આવ્યા છે, કુરાનમાં છેડછાડ કરવામાં આવી છે, મસ્જિદ તોડીને શૌચાલય બનાવવાનાં પણ દાવા કરવામાં આવ્યા છે. હદ તો એ છે કે જો તમારે કોઈ અંગ જોઈતું હોય તો ચીનમાં મળી જશે કારણ કે આ કેમ્પમાંથી કોઈ પણ ઉઇગર મુસ્લિમને ઉઠાવીને અંગ કાઢી લેવામાં આવે છે.
પણ, આપણાં દેશમાં આ બન્ને વિચારધારા સાથે થઇ જાય છે, મતલબ તમારો આધાર ફક્ત અને ફક્ત ભારતની મૂળ
સંસ્કૃતિનો વિરોધ માત્ર છે. નહીં તો તમે વિશ્વમાં કશે સાથે બેસતા નથી.
નોટ: જયારે તમારી વિચારધારાનો આધાર કોઈને નફરત હોય તો તમે આજ નહીં તો કાલ ખતમ થવાના જ છો.
– મહેશ પુરોહિત, નવસારી
#CommunismExposed
#IranTruth
#TudehPartyHistory
#KhomeiniRegime
#LeftistHypocrisy
@highlight