Posted in खान्ग्रेस, हिन्दू पतन

કર્ણાટકમાં એક ડ્રોન બનાવતી કંપની છે જે ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય કરે છે.

તે વિસ્તારમાં પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર મોહમ્મદ સાદિક પાશા નામનો એક મુસ્લિમ છે.

જ્યારે તે પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર, મોહમ્મદ સાદિક પાશા, ને ખબર પડી કે કંપની ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય કરે છે, ત્યારે તેણે જાણી જોઈને કંપનીને હેરાન કરવાનું શરૂ કર્યું, તેના કર્મચારીઓ, તેના માલિકો અને તેમાં સામેલ દરેકને હેરાન કરવાનું શરૂ કર્યું, જેથી ઉત્પાદન બંધ થઈ જાય અને કંપની ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય કરી શકે નહીં.

કંપની એટલી નારાજ થઈ ગઈ કે તે કર્ણાટક હાઇકોર્ટમાં ગઈ.

અને જ્યારે કર્ણાટક હાઇકોર્ટ સમક્ષ બધી હકીકતો રજૂ કરવામાં આવી, ત્યારે જુઓ કે કર્ણાટક હાઇકોર્ટે મુસ્લિમ પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર, મોહમ્મદ સાદિક પાશાને કેવી રીતે સખત ઠપકો આપ્યો.

તેમના પર રાજદ્રોહનો આરોપ મૂકવો જોઈએ, સેવામાંથી કાઢી મૂકવો જોઈએ અને ધરપકડ કરવી જોઈએ.

પરંતુ કર્ણાટકમાં મુસ્લિમ-મૈત્રીપૂર્ણ કોંગ્રેસ સરકાર હોવાથી, કોંગ્રેસ સરકાર તેમને નાયબ પોલીસ અધિક્ષક તરીકે બઢતી આપશે.

કારણ કે કોંગ્રેસ સરકાર અને રાહુલ ગાંધી ખુશ થશે કારણ કે તેમણે ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય રોકવા માટે  પ્રયાસો કર્યા હતા.

અને બીજી એક મહત્વની વાત એ છે કે  ખડકે રડતા હતા કે બધા રોકાણ,બધી કંપનીઓ ભાજપ શાસિત રાજ્યોમાં કેમ જાય છે?

હવે ખડગેને પણ ખ્યાલ આવી ગયો હશે કે કંપનીઓ હંમેશા રોકાણ અને ફેક્ટરી સ્થાપના માટે ભાજપ શાસિત રાજ્યો કેમ પસંદ કરે છે.

જિતેન્દ્ર સિંહ

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*बांगरू-बाण*
श्रीमती अर्चना उपाध्याय की पोस्ट

श्रीपाद अवधूत की कलम से

*नर्मदा नदी नहीं, भारत की जीवित चेतना-रेखा व आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की प्रयोगशाला है…*

भारत की नदियों में नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जिसे केवल जलधारा नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन माना गया। जहाँ गंगा यमुना जनसमुदाय की नदी बनी, वहीं नर्मदा संन्यासियों, ऋषियों और साधकों की नदी रही। यही कारण है कि *नर्मदा परंपरा में “पूजी” ही नहीं गई जी गई इसीलिए अमर हो गई।*

नर्मदा नदी की उत्पत्ति के बारे में *पुराण कहते हैं कि यह भगवान शंकर के तपस्या से उत्पन्न पसीने से निर्मित हुई है। इसे ही विज्ञान कहता है नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन “टेक्टॉनिक प्लेट भ्रंश रेखा” (tectonic fault line) व “नर्मदा–सोन भ्रंश रेखा” या “नर्मदा–सोन रेखिक भू-संरचना” (Narmada–Son Lineament) से उत्पन्न ऐसी नदी जिसका प्रमुख जलस्त्रोत वर्षा नहीं, बल्कि भूमिगत झरने और प्राकृतिक स्रोत है। इसे “स्रोत-पोषित नदी” या “झरना-आधारित नदी” (spring-fed river) कहते है।*
*“शिव का पसीना” दरअसल धरती के भीतर संचित ऊर्जा और भूजल का प्रतीक है। शिव के पसीने की कथा शब्दशः नहीं, प्रतीकात्मक (symbolic) रूपक है, जबकि सत्य भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं।*
शिव विंध्याचल पर्वतीय क्षेत्र का भू-ऊर्जा केंद्र है। शिव का तप अर्थात विंध्याचल पर्वत के दीर्घकालीन भूगर्भीय दबाव (geological stress) हैं। एवं *शिव का पसीना अर्थात विंध्याचल पर्वत के भीतर संचित जल का प्रस्फुटन (spring eruption) हैं। सामान्य भाषा में कहें तो धरती के भीतर संचित ऊर्जा और जल-भंडार का फूट पड़ना है।*

*उल्टी बहने वाली अर्थात पश्चिम की ओर बहने वाली नदी और भूगर्भीय परिस्थितियाँ*
भारत का भूभाग सामान्यतः पूर्व-दक्षिण की ओर ढलान लिए है, इसलिए अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं। पर नर्मदा पश्चिम की ओर बहती है क्योंकि वह “भ्रंश घाटी” या “दरार घाटी” (rift valley) में बहती है। पुराण में इसे कहा गया कि *“नर्मदा नाराज़ होकर उल्टी दिशा में बह गई।”*
विज्ञान में इसे कहते हैं। *“भू-उत्थान के कारण नदी के प्रवाह की दिशा का उलट जाना” (drainage reversal due to tectonic uplift)* जब भूपर्पटी के उठने (tectonic uplift) से भूमि का ढाल बदल जाए और नदी का पुराना रास्ता अवरुद्ध हो जाए, तब नदी अपनी प्रवाह दिशा बदल ले इसे drainage reversal कहते हैं इसलिए *पुराण की भाषा में नर्मदा का “स्वभाव” भौगोलिक विज्ञान की भाषा में धरती की संरचना कारण है।*

*“नर्मदा–सोन विवाह” का वैज्ञानिक अर्थ*
*पुराण कहता है: नर्मदा का विवाह सोन से होना था।*
*भूगोल कहता है: नर्मदा और सोन दोनों एक ही भूगर्भीय रेखा (lineament) से निकली हैं। एक ही भ्रंश से उत्पन्न दो नदियाँ अलग-अलग दिशाओं में बँट गईं।* इसे ही *पुराण ने कहा: “विवाह टूट गया।” सहस्रार्जुन ने अपने 1000 हाथों से नर्मदा को रोकने का प्रयास किया। इसका वैज्ञानिक अर्थ सतपुड़ा–विंध्य के बीच के अनेक पर्वत-खंड, चट्टानें, बेसाल्ट प्लेट्स जो जल के प्रवाह को अवरुद्ध करने का काम करते हैं लेकिन नदी फिर भी बह गई क्योंकि जल की दिशा मनुष्य नहीं, गुरुत्व और ढाल तय करते हैं।*

*नर्मदा का सोन से विवाह प्रस्ताव को ठुकराना। नर्मदा का “स्त्री-स्वतंत्रता का निर्णय” है। यह कथा सिर्फ भूगोल नहीं, सामाजिक दर्शन भी है।*
जहाँ *गंगा–यमुना → पितृसत्तात्मक सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है।*
*नर्मदा → स्वयं निर्णय लेने वाली स्वयं प्रेरित नदी है।*
*वह: विवाह से मुड़ती है। समाज की अपेक्षा तोड़ती है। अपनी राह खुद चुनती है। इसलिए: नर्मदा को केवल कन्या। नहीं,“स्वतंत्र योगिनी” कहा गया।*
*गंगा → सत्ता का केन्द्र रही।*
*नर्मदा → साधना की तपस्थली रही इसलिए नर्मदा पश्चिम की ओर बह गई क्योंकि वह “बाहर नहीं, भीतर की यात्रा” की नदी है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में नर्मदा से अधिक तपस्वी किसी एक नदी पर नहीं रहे।*
*गंगा = सबसे पूज्य मानी गई इसीलिए पूजी गई।*
*सरस्वती = सबसे विद्वान मनीषियों की कार्यस्थली रही इसीलिए सभ्यता की प्रेरक रही।*
*नर्मदा = सबसे वैरागी योगियों की तपस्थली रही इसलिए शास्त्र में कहा गया कि “गंगा मोक्ष देती है, नर्मदा मोक्ष की इच्छा ही जला देती है।” यानी नर्मदा मुक्ति नहीं देती मुक्ति का संस्कार पैदा करती है।*

*विश्व की सबसे प्राचीन जैविक सभ्यता*

*नर्मदा घाटी में मिला नर्मदा मानव (Homo erectus) अर्थात वह मानव प्रजाति जिसने पहली बार दो पैरों पर स्थायी रूप से चलना शुरू किया। यह 3 से 5 लाख वर्ष पुराना माना गया है। यह एशिया का सबसे पुराना मानव अवशेष है। सिंधु नदी से भी पहले भारत की मानव संस्कृति नर्मदा नदी पर थी।*
*नर्मदा नदी साम्राज्य नहीं बनाती अपितु जीवन-पद्धति बनाती है।*

नर्मदा का जल हिमनदी नहीं, अपितु भूगर्भीय जल है इसलिए उसमें सिलिका, कैल्शियम, मैग्नीशियम जैसे तत्व अधिक हैं। *जो इसे स्वयं शुद्ध करने वाली अर्थात self-purifying बनाती हैं इसीलिए आज भी नर्मदा नदी के जल का टीडीएस भारत की अन्य सभी नदियों से सबसे कम है पीने योग्य हैं।*

*नर्मदा घाटी तीन जैव-क्षेत्रों का संगम है विंध्य, सतपुड़ा और दक्खन इसलिए इतनी छोटी नदी होकर भी नर्मदा में विश्वस्तर की per square km biodiversity अर्थात जैव विविधता मिलती है।*

*ऋषियों की नदी*

*नर्मदा किनारे नगरों से अधिक आश्रम बसे है। इनमें प्रमुख रूप से वैदिक–पौराणिक काल (सबसे प्राचीन) ये वे ऋषि हैं जिनका उल्लेख वेद, ब्राह्मण, पुराण और उपनिषदों में मिलता है:-*

*ऋषि – नर्मदा से संबंध*

कपिल मुनि-अमरकंटक क्षेत्र
मार्कण्डेय ऋषि-मंडला–डिंडोरी
दत्तात्रेय-महिष्मती (महेश्वर)
पाराशर ऋषि-ओंकारेश्वर
वशिष्ठ ऋषि-भेड़ाघाट
अगस्त्य ऋषि-सतपुड़ा
नारद ऋषि-नर्मदा परिक्रमा मार्ग
भृगु ऋषि-नर्मदा–ताप्ती क्षेत्र
अत्रि ऋषि-मध्य नर्मदा घाटी
जमदग्नि ऋषि-रेवा क्षेत्र
शुकदेव-नर्मदा वन क्षेत्र
व्यास-नर्मदा पर तपस्थली

*शैव अवधूत नाथ परंपरा (मध्यकाल)*
*यह वह काल है जब नर्मदा विशुद्ध संन्यास की नदी बनती है।*

*संत/योगी-परंपरा*

मत्स्येन्द्रनाथ-नाथ योग
गोरखनाथ-हठयोग
जालंधरनाथ-नाथ योग
कान्हप्पा योगी-नाथ योग
भर्तृहरि-वैराग्य योगी
बाबा केनाराम-अघोरी संत
भैरवानंद योगी-शैव उपासक
महेश्वरानंद-अवधूत योगी
राघवानंद’-वैराग्य

*दत्त संप्रदाय और अवधूत परंपरा नर्मदा का सबसे विशुद्ध प्रवाह:-*

*संत-परंपरा*

श्रीपाद श्रीवल्लभ-दत्त संप्रदाय
नृसिंह सरस्वती- दत्त संप्रदाय
स्वामी समर्थ-दत्त संप्रदाय
वासुदेवानंद सरस्वती( टेम्बे स्वामी महाराज)-दत्त संप्रदाय
श्री रंगावधूत दत्त-संप्रदाय
श्रीपाद बाबा (नर्मदा बाबा)-परिक्रमा परंपरा

*भारत के अन्य प्रमुख संतों का भी आश्रय किसी न किसी रूप में नर्मदा का तट रहा है*

स्वामी विवेकानंद-नर्मदा यात्रा
श्री अरविंद-मौन साधना
स्वामी ब्रह्मानंद-ओंकारेश्वर
महर्षि रमण-नर्मदा तट मौन
स्वामी शिवानंद’-योग
श्री बाबा कुटी’-अघोरी
माँ आनंदमयी-नर्मदा आश्रम
श्री जयदेव भारती-शैव

*गंगा भक्ति की नदी मानी गई है जबकि नर्मदा वैराग्य की नदी कहलाती हैं। यही कारण है कि पूरी दुनिया में किसी एक नदी पर इतने वर्षों तक इतने संन्यासी नहीं रहे जितने नर्मदा मैया के तट पर।*

*नर्मदा परिक्रमा :-*

परिक्रमा का मूल सिद्धांत है *बाहर घूमते हुए भीतर का केंद्र ढूँढना।*
नर्मदा परिक्रमा का उद्देश्य “पुण्य” कमाना नहीं है। वह तो द्वितीयक परिणाम है। *वास्तविक उद्देश्य मानव चेतना का पुनर्गठन कार्यक्रम है।* 3500–3600 किमी पैदल परिक्रमा करने पर *व्यक्ति का अहंकार टूटता है।*
*समय-बोध समाप्त होता है।*
*सामाजिक पहचान गिरती है।*
*परिक्रमा में दिन का हिसाब नहीं।*
*तारीख़ का महत्व नहीं।*
*भविष्य की चिंता नहीं।*
*मन काल-चक्र से बाहर आता है।*
*यह आधुनिक मनुष्य के लिए सबसे कठिन और सबसे उपचारक अवस्था है। मन primitive अवस्था में लौटता है। आधुनिक मनोविज्ञान में यह sensory detox*
*dopamine reset*
*ego dissolution कहलाता है।*
*भारतीय परंपरा में इसे “अहं का विसर्जन।” कहा गया है।*

*सामाजिक समानता की दृष्टि से देखने पर नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर राजा और भिखारी एक समान है। यहां जाति, भाषा, पद समाप्त हो जाते हैं। हर गाँव जल देता है, हर आश्रम भोजन देता है। यह दुनिया की एकमात्र जीवित समाजवादी व्यवस्था है। जो बिना सरकार, बिना कानून, केवल संस्कृति से संचालित होती है। वह भी बिना किसी भेदभाव के बिना किसी जाति प्रपंच के।*

*नर्मदा एक नदी नहीं अपितु एक जीवित दर्शन है।*
*नर्मदा मैया के संदर्भ में अगर संक्षेप में कहें तो।*
*भूगोल की दृष्टि से → पृथ्वी की दरार हैं।*
*विज्ञान की दृष्टि में → spring-fed rift river है।*
*जैव विज्ञान की दृष्टि में → biodiversity corridor*
*इतिहास की दृष्टि में → मानव विकास की धुरी हैं।*
*संस्कृति की दृष्टि में → वैराग्य की प्रयोगशाला है।*
*मनोविज्ञान की दृष्टि में → चेतना का रीबूट सिस्टम है।*
*अध्यात्म की दृष्टि में → शिव का मौन विस्तार है।*
और परिक्रमा करने वाला अंत में यही समझता है *“मैं नदी नहीं घूम रहा था, नदी मुझे घुमा रही थी।” इसलिए नर्मदा नदी को भारतीय परंपरा ने केवल “पवित्र” ही नहीं कहा बल्कि “अमर” भी कहा है क्योंकि पवित्र वस्तु पूजी जाती है जबकि अमर वस्तु मनुष्य को बदल देती है।*

*नर्मदा परिक्रमा धार्मिक कर्म नहीं है, न ही सामाजिक प्रयोग, न हीं पर्यटन, न हीं व्रत वैकल्य बल्कि मानव चेतना का प्राचीनतम वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रम है। जहाँ व्यक्ति भीड़ से अलग प्रकृति के साथ स्वयं के सामने खड़ा हो जाता है और यही कारण है कि परिक्रमा के बाद कोई व्यक्ति पहले जैसा कभी नहीं रह पाता।*

*आप भी इसका अनुभव लीजिए। संभव हो तो जीवन में एक बार नर्मदा परिक्रमा अवश्य करें।*

*नर्मदा परिक्रमा*
*पुराने संस्कारों को धीरे-धीरे पिघलाती है जैसे हिम धूप में गलता है। मन का बोझ हल्का होता है। व्यक्ति “खाली” होने लगता है। नर्मदा परिक्रमा से आपका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदत्त

श्रीपाद कुलकर्णी (बांगर)

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मक्का का सौक-अल-अबिद (गुलामों का बाजार)ये सही है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स (19वीं सदी के ट्रैवलर्स और वेस्टर्न रिपोर्ट्स) बताते हैं कि मक्का में सुक-अल-अबिद (Suk al-Abid) नाम का एक रेगुलर स्लेव मार्केट था, जो मस्जिद-ए-हरम (Kaaba) के बहुत करीब था।

अब वो एरिया अब्राज अल-बैत (Clock Tower complex) का हिस्सा बन चुका है—वही विशाल होटल और शॉपिंग मॉल जो मस्जिद के ठीक बगल में है।

ये कोई छिपी हुई बात नहीं, बल्कि पुरानी तस्वीरों और किताबों में दर्ज है।
2. सऊदी अरब में 1950-60 के दशक में कुल गुलामों की संख्या अनुमानित 3-5 लाख के आसपास थी (Anti-Slavery Society और UN रिपोर्ट्स के अनुसार)।
हज के दौरान कुछ गुलाम बेचे जाते थे (पिलग्रिम्स अपने साथ लाते थे), लेकिन 12 साल में 90 लाख? : सऊदी अरब ने 1962 में ऑफिशियली गुलामी खत्म की (King Faisal के डिक्री से)। इससे पहले ये कानूनी थी, और रेड सी और हज रूट्स से अफ्रीकी गुलाम आते रहते थे। कुल मिलाकर, सदियों के अरब स्लेव ट्रेड में 1.7 करोड़ से ज्यादा अफ्रीकी गुलाम बेचे गए, लेकिन 1950-62 का वो स्पेसिफिक आंकड़ा गलत है।
3. इस्लाम के उलेमा गुलामी को जायज बताते हैंबिल्कुल सही। यूट्यूब पर सर्च करें—”Slavery in Islam” या “Gulami Islam Mein Jaiz”—आपको Jonathan AC Brown, Hamza Yusuf, और कई सऊदी/मिस्री शेख मिलेंगे जो क्लासिकल इस्लामी फिक्ह (शरीअत) के मुताबिक बताते हैं कि:गुलामी जायज है, खासकर युद्ध के बंदियों (captives of war) से।
कुरान और हदीस में इसके नियम हैं (जैसे “दाहिने हाथ की मालकिन” यानी concubines)।
आजकल व्यावहारिक रूप से बंद है (क्योंकि कोई “इस्लामी स्टेट” नहीं), लेकिन सैद्धांतिक रूप से हराम नहीं।

कुछ मॉडर्न स्कॉलर्स (जैसे Yaqeen Institute) कहते हैं कि ये “ऐतिहासिक” था और अब “अबोलिश” हो चुका है, लेकिन कई स्ट्रिक्ट उलेमा (Salafi/Wahhabi) इसे अभी भी डिफेंड करते हैं।

ये कोई “इस्लामोफोबिया” नहीं—ये उनके अपने सोर्सेज से है।
4. भारत में “इस्लाम ने सामाजिक न्याय और मानवाधिकार स्थापित किए”?ये नैरेटिव है, हिस्ट्री नहीं। इस्लाम से पहले भारत में दासता थी: हां, दास प्रथा (दास, दासी) थी, लेकिन वो मुख्य रूप से debt bondage या युद्ध का नतीजा थी। बड़े स्केल पर ट्रेडिंग या एक्सपोर्ट नहीं।
मुस्लिम शासन में: 8वीं सदी से (Muhammad bin Qasim) लेकर मुगल तक, लाखों-करोड़ों हिंदू गुलाम बनाए गए। Mahmud of Ghazni के छापों में सैकड़ों हजार।
Delhi Sultanate और Mughals में स्लेव मार्केट्स फलते-फूलते थे—गुलाम बेचे जाते, eunuchs बनाए जाते, concubines रखी जातीं।
Firoz Shah Tughlaq जैसे सुल्तानों ने “हिंदू किडनैपिंग” को स्टेट पॉलिसी बनाया।
अनुमान: 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय गुलाम मध्य एशिया और मिडिल ईस्ट भेजे गए।
सामाजिक न्याय? जजिया टैक्स, मंदिर तोड़ना, जबरन कन्वर्शन—ये “मानवाधिकार” नहीं।
निचली जातियों (दलितों) के लिए? कुछ कन्वर्ट हुए (टैक्स बचाने या प्रोटेक्शन के लिए), लेकिन नई “कास्ट सिस्टम” बनी—Ashraf (विदेशी मुस्लिम), Ajlaf (कन्वर्टेड), Arzal (सबसे नीचे)।
ये “सामाजिक न्याय” का दौर? नहीं, ये विजय का दौर था।

तो सोचिए क्यों?क्योंकि इतिहास को पॉलिटिक्स के लिए री-राइट किया जाता है। लेफ्ट-इस्लामिस्ट एलाइंस में “इस्लाम = इक्वालिटी” का नैरेटिव बेचा जाता है, ताकि हिंदू “ब्राह्मणवाद” को विलेन बनाया जा सके।
लेकिन हकीकत: इस्लाम ने गुलामी को रिगुलेट किया (मानवाधिकारों की बजाय), न कि खत्म। सऊदी में 1962 तक ये चल रही थी—जब भारत “आजाद” हो चुका था।
भारत में ये “लिबरेशन थियोलॉजी” की तरह इस्तेमाल हुआ, लेकिन असल में ये इंपीरियल टूल था।

ये कोई “हेट” नहीं—ये फैक्ट्स हैं। अगर “सामाजिक न्याय” सच में आया होता, तो मक्का का गुलाम बाजार 20वीं सदी में नहीं चलता, न भारत में करोड़ों गुलाम बनते। सोचिए, क्यों ये बातें छुपाई जाती हैं?

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

घोड़े के नाल ठुक रही थी…
तभी तालाब से एक मेंढक बाहर आया
और लोहार से बोला मुझे भी नाल ठुकवानी है

लोहार बोला भाई रहने दे…. अपना साइज देख…

मेंढक बोला… साइज क्यूँ… तू मेरी छलांग देख…. इस घोड़े से शरीर के अनुपात में ज्यादा न हो तो बोल… मेरी पिछली टांग देख
इस घोड़े से लम्बी न हों शरीर के अनुपात में तो बात कर….
तो जब इसके नाल ठुक सकती है तो मेरे क्यूँ नहीं….?

खैर लोहार ने बहस करने की जगह नाल उठा ठोंक दी…
मेंढक का क्या हुआ होगा…. आप जानते ही हैं

छोटे ओवेसी एलान किये हैं
Mr योगी तैयार हो जाओ…. UP आरहा हूँ

बाबू UP है ये…. थोड़ा सोच समझ टांग उठाना… G भी फट सकती है नाल ठुकवाने में
🤣🤣🤣

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

અધૂરું સ્વપ્ન અને દર્દનાક અંત: મોહમ્મદ અલી ઝીણાની કહાણી

૧૯૪૭નો એ સમય જ્યારે અખંડ ભારતના ભાગલા રોકવા માટે લોર્ડ માઉન્ટબેટન, ગાંધીજી, નેહરુ અને પટેલ જેવા દિગ્ગજ નેતાઓ પ્રયત્નશીલ હતા. ગાંધીજીએ તો ઝીણાને ભારતના વડાપ્રધાન બનવાની ઓફર પણ આપી હતી, જેથી ભાગલા અટકી શકે. પરંતુ ઝીણાની જીદ સામે કોઈ ઉપાય કારગત ન નીવડ્યો. “હિન્દુઓના હાથ નીચે રહેવા કરતા બધું ગુમાવવું બહેતર છે”—આ વિચારધારા સાથે તેમણે પાકિસ્તાનનું નિર્માણ કર્યું.
વ્યક્તિગત જીવન અને વિરોધાભાસ
ઇતિહાસ સાક્ષી છે કે ઝીણાના પૂર્વજો કાઠિયાવાડી હિન્દુ હતા. તેમના દાદા પૂંજાભાઈ ઠક્કર માછલીના વેપારને કારણે જ્ઞાતિ બહાર મુકાયા અને ઇસ્લામ ધર્મ અંગીકાર કર્યો. ઝીણા પોતે લંડનમાં ભણ્યા અને પાશ્ચાત્ય સંસ્કૃતિથી પ્રભાવિત થયા. તેઓ દિવસની ૫૦ સિગારેટ ફૂંકતા, દારૂ પીતા અને સુવરનું માંસ પણ ખાતા, જે ઇસ્લામમાં વર્જિત છે. તેમ છતાં, તેમણે ધર્મના નામે અલગ દેશની માંગ કરી.
પ્રેમ અને એકલતા
ઝીણાની અંગત જિંદગી પણ કરુણ રહી. ૧૬ વર્ષની પારસી છોકરી રતી સાથે તેમને પ્રેમ થયો અને લગ્ન કર્યા. પરંતુ રાજકારણ અને પાકિસ્તાનની જીદમાં તેમણે પત્ની તરફ દુર્લક્ષ સેવ્યું. ૨૯ વર્ષની વયે રતીનું અવસાન થયું ત્યારે ઝીણા ધ્રુસકે-ધ્રુસકે રડ્યા હતા. તેમની એકમાત્ર દીકરી દીનાએ પણ પારસી સાથે લગ્ન કરી લીધા અને પાકિસ્તાન જવાની ના પાડી દીધી. અંતે ઝીણા સાવ એકલા પડી ગયા.
પાકિસ્તાન: એક ભૂલ?
પાકિસ્તાન બન્યા પછી ઝીણા જ્યારે કરાચી પહોંચ્યા, ત્યારે તેમનું ભવ્ય સ્વાગત થયું. પરંતુ થોડા જ સમયમાં તેમનો ભ્રમ ભાંગી ગયો. ટીબી અને કેન્સર જેવી ગંભીર બીમારીઓ હોવા છતાં, ડૉક્ટરોએ તેમને સિગારેટ પીવાની છૂટ આપી, જાણે તેઓ તેમના મૃત્યુની રાહ જોઈ રહ્યા હોય.
૧૧ સપ્ટેમ્બર ૧૯૪૮ના રોજ જ્યારે તેમની તબિયત લથડી અને તેમને કરાચી લાવવામાં આવ્યા, ત્યારે રસ્તામાં જ તેમની એમ્બ્યુલન્સનું પેટ્રોલ પૂરું થઈ ગયું! કલાકો સુધી પાકિસ્તાનના નિર્માતા ભરતડકે રસ્તા પર તડપતા રહ્યા. માખીઓ ઉડાડવાની શક્તિ પણ તેમનામાં નહોતી બચી. આખરે, તેમણે દમ તોડી દીધો.
અંતિમ અપમાન
ઝીણા શિયા મુસ્લિમ હતા, પરંતુ પાકિસ્તાનના કટ્ટરપંથીઓએ તેમને સુન્ની રિવાજ મુજબ દફનાવ્યા. તેમની બહેન ફાતિમા ઝીણાને પણ પાછળથી હાંસિયામાં ધકેલી દેવામાં આવી. જ્યારે ફાતિમાએ રેડિયો પર ભાઈના મૃત્યુનું સત્ય કહેવાનો પ્રયાસ કર્યો, ત્યારે પ્રસારણ અટકાવી દેવામાં આવ્યું. ફાતિમાએ પાછળથી સ્વીકાર્યું હતું કે, “પાકિસ્તાન બનાવવું એ મારા ભાઈની સૌથી મોટી ભૂલ હતી.”
જે વ્યક્તિએ ધર્મના નામે દેશના ભાગલા પાડ્યા, તેને જ તે દેશમાં શાંતિ કે સન્માન ન મળ્યું. આ એક ઐતિહાસિક વિડંબના છે કે જેનું સર્જન તેમણે કર્યું, તે જ તેમના અંતનું કારણ બન્યું.
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જે સૂવર નું માસ ખાતો હોય અને સિગારેટ પીતો હોય એ માણસ પાકિસ્તાન જ બનાવી સકે જે અત્યારે આખી દુનિયાનું માથાનો દુખાવો છે

મિત્રો મને લાગે છે કે જીણા ની ભુલ કરતા આપણા સમાજ ની ભૂલ વધારે લાગે છે આપના લખ્યા મુજબ જો કોઈ પણ ધંધો કરતા વ્યક્તિ ને બહિષ્કૃત કરવા માં આવે તો જે ધૃણા ઝીણા ને સમાજ માટે થઈ તે કોઈપણ વ્યક્તિ ને થઇ શકે છે અને આવા પરિણામ ભોગવવા માટે તૈયાર રહેવું પડશે .

અહીંયા એક વાત અધૂરી છે. પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર નો માછલી વેચવા નો ધંધો નહોતો. તેઓ કરિયાણા ની દુકાન ચલાવતા હતા. પુંજાભાઇ ના એક દિકરો જે નાનો હતો. તેને લોકો મુસલમાન કહી ને ચીઢવતા હતા. કરિયાણા ની દુકાને સૌ કોઈ વસ્તુ લેવા આવતા હતા. પુંજાભાઈ વેરાવળ પાસે રહેતા હતા. એક મુસલમાન વ્યક્તિ પુંજાભાઈ ની દુકાને કરિયાણું લેવા આવતા તેમની સાથે મિત્રતા થઈ. તેના લીધે હિન્દુ લોકો એ પુંજાભાઈ સાથે ના વેવાર બંધ કર્યા. કાળ ક્રમે હિન્દુ ઓ કરિયાણું લેવા આવતા હતા તે બંધ થઈ ગયા. તેમની સાથે ના તમામ પ્રકારના વ્યવહારો હિન્દુ ઓ એ બંધ કર્યા. પુંજાભાઈ નો ધંધો બંધ થતાં તેમના મુસલમાન મિત્ર એ તેમને સુક્કી મચ્છી વેચવાનું કહેતાં પુંજાભાઈ વિચાર માં પડ્યા. થાય શું? લોકો છોકરાને મુસલમાન કહી ખીજવતા અને કરિયાણાની દુકાન બંધ થઈ કરવું શું ? આખરે, સુક્કી મચ્છી વેચવાનું શરૂ કર્યું. હિન્દુ ઓ તરફથી પરેશાની વધતાં પુંજાભાઈ પોતાના ભોઈઓ ને વતન માં છોડી કરાંચી જતાં રહ્યાં. જ્યાં આઝાદી વખતે પણ કરાંચી માં એક ગલી છે ત્યાં પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર ની કરિયાણા ની દુકાન ચલાવતા હતા. પુંજાભાઈ નો નાનો દીકરો જે ને ઝિણો હોવાથી ઝિણા તરીકે તેઓ ઓળખાયા. તેમને કરાંચી માં અંગ્રેજે ક્રિશ્ચન સ્કુલ માં ભણવા મુક્યા, કારણકે હિન્દુ સ્કુલોમાં માં એડમિશન મળતું નહોતું. બીજા છોકરાઓ સાથે ઝઘડતા થતાં હતાં.
અળધીરાતે આઝાદી ચોપડી માં ઘણું બધું છે. કાળ ક્રમે પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર  કરાંચી માં ખુબ કમાયા. ઝીણા નું લગ્ન વેરાવળ ગાડુ લઈ ને આવી ગુજરાતી સાથે કર્યું હતું. એક વખત વેરાવળ પાસે ના હિન્દુ સંગઠનો એ કરાંચી જઈ ને પુંજાભાઈ પાસેથી મંદિર બાંધવા માટે પૈસા લઇ આવ્યા હતાં પણ આંખો દિવસ પુંજાભાઈ સાથે વાતો કરી પણ પાણી સુધા પીધું નહોતું. માફ કરજો કોઈ ને ખોટું લાગે તો.

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

चमचों के नहेरु

1962 में हिसार से एक सांसद थे –

जिनका नाम था मनीराम बागडी।

बागडी जी को नेहरू की नौटंकी से

बड़ी नफ़रत थी।

बागड़ी जी को पता था नेहरू

14 नवम्बर को सफ़ेद अचकन पर गुलाब का फूल टाँग कर आयेगा और

चमचे चाचा नेहरू ज़िन्दाबाद के नारे लगायेंगे, बागड़ी जी ने एक झुग्गी झोपड़ी का

साँवला सा बच्चा जिसकी नाक बह रही थी, थोड़ी सी राख व कालिख उसके मुँह पर

और लगादी, उसको अपनी गोद में उठाकर अपने शाल में ढककर चुपचाप जा कर

संसद में अपनी सीट पर बैठ गये।

ज्यों ही गुलाब का फूल टाँगकर

नेहरू जी संसद में घुसे तो

उनके चमचों ने चाचा नेहरू ज़िन्दाबाद के नारों से हाल को गुँजा दिया और जब नेहरू का महिमा मण्डन होने लगा

तो बागड़ी जी एकाएक उठ खड़े हुए

और बोले -नेहरू को भारतीय बच्चों से

प्यार नहीं, इसको तो अंग्रेज़ी मेमों के

बच्चे प्यारे लगते हैं !

अगर सच में नेहरू को

भारतीय बच्चों से प्यार है तो

मेरी गोद में जो भारतीय बच्चा बैठा है ,

उसको सबके सामने एक बार चूमकर दिखाएं, यह कहकर बागड़ी जी ने

उस काले कलूटे बच्चे को

नेहरू के सामने कर दिया।

उसके बाद नेहरू आगे आगे और

बागड़ी जी पीछे पीछे,

बागड़ी जी ने नेहरू को संसद भवन से

बाहर तक भगा दिया था।

कहने का मतलब यह है कि नेहरू का

बच्चों से कोई लेना देना नहीं था ,

यह केवल उसको

महान दिखाने के लिए दिया गया

केवल एक दिखावी तगमा था,

एक परिवार के नाम पर देश में

बहुत अति हो चुकी है,

अब समय आ गया है कि

चाचा व बापू नामक तगमे

अब हटा देने चाहिएँ…

आपकी क्या राय है?

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जापान को याद है, लेकिन भारत भूल गया।

वह दिन था 12 नवंबर, 1948। टोक्यो के बाहरी इलाके में एक विशाल बगीचेवाले घर में टोक्यो ट्रायल चल रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हारने के बाद, जापान के तत्कालीन प्रधान मंत्री तोजो सहित पचपन जापानी युद्धबन्दियों का मुकदमा चालू है …

इनमें से अट्ठाईस लोगों की पहचान क्लास-ए (शांतिभंग का अपराध) युद्ध अपराधियों के रूप में की गई है। यदि सिद्ध ह़ो जाता है, तो एकमात्र सजा “मृत्युदण्ड” है।

दुनिया भर के ग्यारह अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधीश …… “दोषी” की घोषणा कर रहे हैं …. “दोषी” …… “दोषी” ……… अचानक एक गर्जना, “दोषी नहीं! “

दालान में एक सन्नाटा छा गया।  यह अकेला असंतुष्ट कौन है ?

उनका नाम था राधा बिनोद पाल भारत से एक न्यायाधीश थे !

1886 में पूर्वी बंगाल के कुंभ में उनका जन्म हुआ। उनकी माँ ने अपने घर और गाय की देखभाल करके जीवन यापन किया। बालक राधा बिनोद गांव के प्राथमिक विद्यालय के पास ही गाय को चराने ले जाता था।

जब शिक्षक स्कूल में पढ़ाते थे, तो राधा बाहर से सुनता था। एक दिन स्कूल इंस्पेक्टर शहर से स्कूल का दौरा करने आये।  उन्होंने कक्षा में प्रवेश करने के बाद छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे। सब बच्चे चुप थे। राधा ने कक्षा की खिड़की के बाहर से कहा …. “मुझे आपके सभी सवालों का जवाब पता है।” और उसने एक-एक कर सभी सवालों के जवाब दिए। इंस्पेक्टर ने कहा … “अद्भुत! .. आप किस कक्षा में पढ़ते हो ?”

जवाब आया, “… मैं नहीं पढ़ता … मैं यहां एक गाय को चराता हूं।”

जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। मुख्याध्यापक को बुलाकर, स्कूल निरीक्षक ने लड़के को स्कूल में प्रवेश लेने के साथ-साथ कुछ छात्रवृत्ति प्रदान करने का निर्देश दिया।

इस तरह राधा बिनोद पाल की शिक्षा शुरू हुई। फिर जिले में सबसे अधिक अंकों के साथ स्कूल फाइनल पास करने के बाद, उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज में भर्ती कराया गया। M. Sc.गणित  होने के बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से, उन्होंने फिर से कानून का अध्ययन किया और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।  दो चीजों के विपरीत चुनने के संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, “कानून और गणिता सब के बाद इतने अलग नहीं हैं।”

फिर से वापस आ रहा है… अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय टोक्यो।

बाकी न्यायाधीशों के प्रति अपने ठोस तर्क में उन्होंने संकेत दिया कि मित्र राष्ट्रों (WWII के विजेता) ने भी संयम और अंतरर्राष्ट्रीय कानून की तटस्थता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों को अनदेखा करने के अलावा, उन्होंने परमाणु बमबारी का उपयोग कर लाखों निर्दोष लोगों को मार डाला।

राधा बिनोद पाल द्वारा बारह सौ बत्तीस पृष्ठों पर लिखे गए तर्क को देखकर न्यायाधीशों को क्लास-ए से बी तक के कई अभियुक्तों को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। इन क्लास-बी युद्ध अपराधियों को एक निश्चित मौत की सजा से बचाया गया था।  अंतर्राष्ट्रीय अदालत में उनके फैसले ने उन्हें और भारत को विश्व प्रसिद्ध प्रतिष्ठा दिलाई।

जापान इस महान व्यक्ति का सम्मान करता है। 1966 में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान *’कोक्को कुनासाओ’* से सम्मानित किया।  टोक्यो और क्योटो में दो व्यस्त सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। उनके निर्णय को कानूनी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा लगाई गई है। 2007 में, प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने दिल्ली में उनके परिवार के सदस्यों से मिलने की इच्छा व्यक्त की और वे उनके बेटे से मिले।

डॉ. राधा बिनोद पाल (27 जनवरी 1886 – 10 जनवरी 1967) का नाम जापान के इतिहास में याद किया जाता है।  जापान के टोक्यो में, उनके नाम एक संग्रहालय और यासुकुनी मंदिर में एक मूर्ति है।

उनके नाम पर जापान विश्वविद्यालय का एक शोध केंद्र है। जापानी युद्ध अपराधियों पर उनके फैसले के कारण, चीनी लोग उनसे नफरत करते हैं।

वे कानून से संबंधित कई पुस्तकों के लेखक हैं। भारत में लगभग कोई भी उन्हें नहीं जानता है और शायद उनके पड़ोसी भी उन्हें नहीं जानते हैं! इरफान खान अभिनीत टोक्यो ट्रायल्स पर एक हिंदी फिल्म बनाई गई थी, लेकिन उस फिल्म ने कभी सुर्खियां नहीं बटोरीं।

बहुत सारे अंडररेटेड और अज्ञात भारतीयों में से एक।

Posted in PM Narendra Modi

मित्रों…
यह प्रसंग 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों के तुरंत बाद का है।
सियासत अपने उफान पर थी।
जुबानी जंग चरम पर थी।
जीत की खुशी और हार की कसक—दोनों हवा में घुली हुई थीं।
लेकिन उसी गरम माहौल में एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने लोकतंत्र का असली संस्कार याद दिला दिया।
उत्तर–पूर्वी दिल्ली से विजय प्राप्त करने के बाद मनोज तिवारी सीधे अपनी प्रतिद्वंद्वी शीला दीक्षित के घर पहुँचे।
न कोई मीडिया की भीड़…

न कैमरों की चमक…
न कोई प्रचार का शोर…
सिर्फ एक भारतीय परंपरा—जहाँ विजय अहंकार नहीं बनती, विनम्रता बनती है।
जहाँ राजनीतिक प्रतिद्वंदी भी सम्मान के अधिकारी होते हैं।
मनोज तिवारी ने झुककर उनके चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया।
वह क्षण सिर्फ एक सांसद की जीत का नहीं था—
वह भारतीय संस्कृति की गरिमा का क्षण था।
वह लोकतांत्रिक मर्यादा का जीवंत उदाहरण था।
शीला जी ने स्नेह से पूछा—
“मनोज, कितने मतों से आगे रहे?”

और जो उत्तर मिला, वह राजनीति की किताबों में सुनहरे अक्षरों से लिखा जा सकता है—
“माँ, मैं आपसे नहीं जीता… मैं तो विचारधारा से जीता हूँ।”
यही है असली राजनीतिक संस्कार।
यही है विचारों की टक्कर की शालीनता।
जहाँ मतभेद होते हैं, मनभेद नहीं।
जहाँ चुनाव लड़े जाते हैं, चरित्र नहीं कुचले जाते।
आज जब राजनीति सोशल मीडिया की प्रयोगशाला बनती जा रही है…
जहाँ फोटोशॉप और AI से गढ़े गए दृश्य सच से ज्यादा तेज़ दौड़ते हैं…

जहाँ नैरेटिव तथ्यों से नहीं, ट्रेंड से बनते हैं…
तब इस घटना को याद करना जरूरी है।
विचारों से लड़िए।
नीतियों पर सवाल उठाइए।
लेकिन संस्कारों को कीचड़ मत बनाइए।
क्योंकि राजनीति जब गिरती है, तो गिरावट सामूहिक होती है।
और जब मर्यादा बचती है, तो सम्मान भी सबका बचता है।
सियासत अगर संघर्ष है—
तो संस्कृति उसका संतुलन है।
आपका अपना शरद

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

પાકિસ્તાન હજુ જૂનાગઢને ‘પાંચમો પ્રાંત’ ગણે છે!




થોડા સમય પહેલા  કરાચીમાં એક કાર્યક્રમ યોજાઈ ગયોઃ જૂનાગઢના નવાબે પોતાના કુંવરને ‘વઝીરે આઝમ’ની પાઘડી પહેરાવી!

જૂનાગઢ તો ભારતમાં છે, સૌરાષ્ટ્રનું માતબર નગર છે, અને પાકિસ્તાનમાં તેના નવાબ-દીવાનનો સોગંદવિધિ? આમાં નવું કશું નથી. છેક ૧૯૪૭થી જ પાકિસ્તાન કાશ્મીર, જૂનાગઢ, માણાવદરને પોતાનું ગણે છે. દસેક વર્ષ પૂર્વે કરાચીમાં ‘ઈલ્હાકે જૂનાગઢ’ પુસ્તક જનાબ લાખાણીએ લખ્યું ત્યારે જૂનાગઢને પાકિસ્તાનનો ‘પાંચમો પ્રાંત’ ગણવાની માગણી થઈ હતી.

પાકિસ્તાને ટપાલ ટિકિટ અને નકશો જાહેર કર્યો તેમાં કાશ્મીર, જનાગઢ, માણાવદર અને કચ્છની સીર ક્રિકનો સમાવેશ કર્યો છે. કચ્છ-પાકિસ્તાનની સરહદે આવેલાં સીર ક્રિકની જમીનમાં પેટ્રોલિયમ ભંડારની શક્યતાઓ છે, તો જૂનાગઢ (જેની હેઠળ સોમનાથ પણ હતું. હવે તેને અલગ જિલ્લો બનાવાયો છે.) તો સાચો સવાલ સમજવા જેવો છે.

સ્વતંત્રતા મળતાંવેત જૂનાગઢ એક મોટો અવરોધક બળ તરીકે બહાર આવ્યું અને ૧૪મી ઓગસ્ટ, ૧૯૪૭ના દિવસે જૂનાગઢના નવાબે પાકિસ્તાન સાથે જોડાયાની પોતાની ઈચ્છા જાહેર કરી! ૮૦ ટકા હિન્દુ પ્રજા ધરાવતું આ રાજ્ય પાકિસ્તાનમાં જોડાય તો અખંડિતતા પર જોખમ હતું. પ્રજાના આગેવાનો એકત્રિત થયા. મુંબઈમાં જૂનાગઢવાસીઓની બેઠક થઈ. જૂનાગઢના આગેવાનોએ પણ નવાબના નિર્ણય સામે વિરોધ વ્યક્ત કર્યો.

વી.પી. મેનન માણાવદરના નવાબને મળ્યા. માણાવદર ૧૦૦ ચોરસ માઈલનો નાનો નવાબી તાલુકો હતો. ત્યાંના ખાને પણ જૂનાગઢના પગલે પગલે પાકિસ્તાન સાથે માણાવદરને જોડવાની ઈચ્છા જાહેર કરી હતી. મેનનની સલાહ ખાને માની નહિ. માંગરોળના શેખે સ્ટેન્ડ બિલના કરાર પર સહી કરી આપી.

દરમ્યાન જૂનાગઢમાં બહુમતી હિંદુ પ્રજા પર ત્રાસ શરૂ થયો. લોકો હિજરત કરવા લાગ્યા. જૂનાગઢ તાબાનાં ૫૧ ગામ ધરાવતા બાબરિયાવાડના ગરાસદારોએ ખુલ્લો બળવો કરીને હિંદી સંઘમાં જોડાવાની જાહેરાત કરી અને વિલયના કરારપત્ર પર સહી કરી આપી.

૧૩મી ઓગસ્ટ, ૧૯૪૭ના દિવસે કેપ્ટન બનેસિંહે રાજકોટના રેસિડેન્ટનો ચાર્જ સંભાળ્યો. એજન્સીના ત્રીજાથી પાંચમા વર્ગના તમામ રજવાડાં અને એજન્સીનાં ૧૨ થાણાં આ રીતે હિંદી સંઘ તળે આવી ગયાં, પણ જૂનાગઢનો સવાલ એવો ને એવો હતો. તેણે બાબરિયાવાડ કબજે કરવા માટે પોતાનું દળ મોકલ્યું હતું. હિંદી સરકારે આ પગલાંને પોતાના પર આક્રમણ તરીકે ગણ્યું અને ગંભીર નોંધ લીધી. નેહરુને સમજાવીને સરદારે હિંદી સંઘની લશ્કરી ટુકડીઓ બાબરિયાવાડના રક્ષણ માટે મોકલી આપી.

આ દરમિયાન પ્રજાકીય લડતને પણ વેગ મળ્યો, ૨૫ ઓગસ્ટે ‘કાઠિયાવાડ રાજકીય પરિષદ’ મળી તેમાં એક સંરક્ષણ સમિતિ નિયુક્ત કરવામાં આવી. ૨૫મી સપ્ટેમ્બરે મુંબઈમાં માધવબાગ ખાતે મળેલી સૌરાષ્ટ્રવાસીઓની સભામાં ઢેબરભાઈ, દુર્લભજી ખેતાણી, નરેન્દ્ર નથવાણી, પુષ્પાબહેન મહેતા, ‘જન્મભૂમિ’ના તંત્રી અમૃલાલ શેઠ, બળવંતરાય મહેતા, શામળદાસ ગાંધી વગેરેએ જૂનાગઢની મુક્તિ માટે હાકલ કરી. ‘આરઝી હકૂમત’ સ્થપાઈ અને એના ‘સરનશીન’ શામળદાસ ગાંધી બન્યા. જૂનાગઢની કામચલાઉ સરકારના મુખ્ય પ્રધાન અને બીજા પ્રધાનોનું પ્રધાન મંડળ રચાયું. શામળદાસ ગાંધી અને બીજા નેતાઓ જૂનાગઢ તરફ નીકળવા રવાના થયા. મહમદઅલી ઝીણા અને મુસ્લિમ લીગના નેતાઓ જૂનાગઢ – બાંટવા વગેરે સ્થાનોએ જઈને હિંદી સંઘવિરોધી વ્યૂહરચના ગોઠવી આવ્યા હતા.

રાજકોટમાં જૂનાગઢ રાજ્યની મિલકત સમાન ‘જૂનાગઢ હાઉસ’નો કબજો ૩૦મી સપ્ટેમ્બરે ‘આરઝી હકૂમતે’ લીધો. યુવકોને સશસ્ત્ર તાલીમ અપાઇ. પોરબંદરની મેર, આયર, બાબરિયા વગેરે લડાયક કોમો ‘આરઝી હકૂમત’માં જોડાઈ અને કુતિયાણા, નવાગઢ, ગાધકડા, અમરાપર વગેરે મુખ્ય ગામો તેમજ બીજા ૩૬ સ્થાનો પર કબજો મેળવ્યો. કુતિયાણામાં સામે થોડીક અથડામણ થઈ, પણ એકંદરે ઝડપથી જૂનાગઢ, માણાવદર અને સરદારગઢ-બાંટવા વગેરેમાં હિંદી સંઘમાં વિલય માટેનું વાતાવરણ સર્જાતું થયું. જૂનાગઢ રાજ્યનો પોલીસ કમિશનર નકવી પાકિસ્તાની લશ્કરની મદદ માટે કરાંચી ગયો તે પાછો જ ન ફર્યો.

હિંદી સંઘે ૨૨મી ઓક્ટોબર અને ૧લી નવેમ્બરે માણાવદર, માંગરોળ અને બાબરિયાવાડમાં બ્રિગેડિયર ગુરુબક્ષસિંહની આગેવાની હેઠળ પોલીસ ટુકડીઓ મોકલી આપી એટલે આ સ્થાનોએ સોઢાણા-વડાલાના જે ‘સિંઘીઓ’ ત્રાસ વર્તાવી રહ્યા હતા તે પણ કાબૂમાં આવી ગયા. તકેદારીનાં પગલાં તરીકે પોરબંદર – માંગરોળના સમુદ્રકિનારે યુદ્ધનૌકાઓ પણ લંગરાવવામાં આવી. વાતાવરણ તંગદિલીભર્યું હતું અને ક્યારે શું બનશે એવી કલ્પનાથી હિંદુ પ્રજા ફફડતી હતી.

જૂનાગઢના નવાબ ઓક્ટોબરની ૧૭મીએ કરાંચી ગયા એટલે પાછળ વહીવટ માટે દીવાન શાહનવાઝ ખાન ભૂતો રહ્યા હતા. છેવટે એણે પણ કમિશનર બૂચને પત્ર લખીને જણાવ્યું કે ‘રાજ્યની અંદરના અને બહારના અનિષ્ટ તત્ત્વોથી પ્રજાને બચાવી લેવા માટે, નિર્દોશ લોકોને રક્તપાત તથા જાનમાલના જોખમથી ઉગારવા ભવિષ્યમાં પ્રજાની ઈચ્છા પ્રમાણે સમાધાન થાય તેવી આશાથી જૂનાગઢ રાજ્ય કાઉન્સિલ રાજ્યનો હવાલો હિંદી સંઘને સોંપવા તૈયાર છે.’ ભૂતોએ પત્ર તા. ૭-૧૧-૧૯૪૭ના કાઉન્સિલના અંગ્રેજ સભ્ય કેપ્ટન હાર્વે જોન્સને રાજકોટ મોકલ્યો. ૯મીએ ફરી વાર એ રાજકોટ ગયો. આ વિનંતીની જાણ લોર્ડ માઉન્ટબેટનને પણ કરવામાં આવી અને કોંગ્રેસ નેતાઓને એક પત્ર લખવામાં આવ્યો. કરાંચીથી નવાબે આપેલી સૂચના પ્રમાણે આમ કરવામાં આવ્યું.

સરકાર ત્યારે ચૂપચાપ ઘટના પ્રવાહ તપાસી રહી હતી. પત્ર મળતાંવેંત એમણે વડા પ્રધાનને દિલ્હી જાણ કરી. વી.પી. મેનને સરદાર પટેલની સાથે મસલત કર્યા બાદ જોડાણ – સ્વીકારપત્રનો મુસદ્દો તૈયાર કર્યો અને સૌરાષ્ટ્રના પ્રાદેશિક કમિશનર શ્રી નીલમ બૂચને હિંદી સરકાર વતી જૂનાગઢ રાજ્યનો વહીવટ સંભાળી લેવા સૂચના આપવામાં આવી.

૯મી નવેમ્બરે સાંજે પાંચ વાગ્યે જૂનાગઢ-મુક્તિ જાહેર કરાઈ અને ભારતીય સૈન્યે આ પ્રદેશમાં પ્રવેશ કર્યો. એ દિવસે જ્યારે બૂચ જૂનાગઢ પહોંચ્યા ત્યારે દીવાન શાહનવાઝ ખાન પણ કરાંચી ઊપડી ગયા હતા. રાજ્ય કાઉન્સિલના સેક્રેટરીએ બૂચને રાજ્યનો વહીવટ સોંપ્યો અને પોલીસ તથા સૈન્યની ટુકડીઓનાં શસ્ત્રો વગેરેનો કબજો સંભાળી લેવાયો. પાકિસ્તાન સરકારને જણાવવામાં આવ્યું કે રાજ્ય કાઉન્સિલની ઈચ્છા અને માગણી મુજબ જૂનાગઢનો વિલય હિંદી સંઘ સાથે કરવામાં આવ્યો છે.

આવી જાહેરાત પછી પાકિસ્તાને મોં ખોલ્યું. પાક. વડા પ્રધાન લિયાકતઅલી ખાને ૧૫મી નવેમ્બરે હિંદ સંઘના વડા પ્રધાન જવાહરલાલ નેહરુને પત્ર લખીને જૂનાગઢ વિલયનો વિરોધ પ્રદર્શિત કર્યો. એણે એમાં જણાવ્યું હતું કે, ‘જૂનાગઢ રાજ્ય પાકિસ્તાન સાથે યોગ્ય રીતે ધોરણસર જોડાયેલું હતું તેથી રાજ્યના દીવાન કે નવાબને હિંદી સરકારની સાથે એ અંગે કોઈ વિચાર કે નિર્ણય લેવાનો અધિકાર રહેતો નથી. ઉપરાંત પાકિસ્તાનની મંજૂરી સિવાય એ રાજ્યની હદમાં હિંદી સંઘનું લશ્કર મોકલીને એના વહીવટનો કબજો લેવામાં હિંદી સરકારે પાકિસ્તાનના પ્રદેશમાં સરહદી કાનૂનનો ભંગ કર્યો છે, એટલું જ નહિ, પણ આંતરરાષ્ટ્રીય કાયદાનો પણ ભંગ કર્યો છે.’

પ્રત્યુત્તરમાં નેહરુએ જણાવ્યુંઃ

‘હિંદી સરકારે જૂનાગઢ પર કોઈ આક્રમણ કર્યું નથી. જૂનાગઢ રાજ્યની કાઉન્સિલ પાકિસ્તાન સરકારની પ્રેરણાથી જ કામ કરતી હતી અને કાઉન્સિલના સભ્યો સર ભૂતો અને કેપ્ટન હાર્વે જોન્સ વારંવાર જૂનાગઢ રાજ્ય સંબંધે પાકિસ્તાન સરકારનો સંપર્ક રાખતા હતા અને જૂનાગઢમાં શું કરવું એ અંગે તમારી સલાહ લેવા માટે લાહોર, કરાંચી જતા હતા. એમણે જોયું કે જૂનાગઢનું રાજ્યતંત્ર સાવ ખોરવાઈ ગયું અને હિંદી સરકાર એનો કબજો ન લે તો તંત્ર પડી ભાંગે એમ છે, એની માઠી અસર સમગ્ર સૌરાષ્ટ્ર પર થાય. બીજી બાજુ, આરઝી હકૂમત આવા સંજોગોમાં રાજ્યનો કબજો ન લેત તો સંભવ હતો કે ખૂનામરકી અને અંધાધૂંધી પ્રવર્તી હોત. આ સ્થિતિમાં દીવાન સર શાહનવાઝ ખાન ભૂતોની લાગણીનો હિંદી સરકાર ઈન્કાર કરે તો એનું પરિણામ ખતરનાક આવે, જૂનાગઢની હયાતી ભયમાં મુકાય અને રક્તપાત તેમજ અરાજક્તા સર્જાય. આ પરિસ્થિતિનો ખ્યાલ દીવાને નવાબને આપ્યો હતો અને નવાબના સૂચન પ્રમાણે દીવાન વર્ત્યા હતા. હિંદી સરકારે જૂનાગઢને કામચલાઉ સરકારને માન્ય નથી કરી, પણ એમાં જે વ્યક્તિઓ છે તે પ્રજાની વિશ્વાસપાત્ર છે તેથી રાજ્યની પ્રજાની વિનંતીથી કાઉન્સિલે જે પગલું પ્રજાના હિતમાં ભર્યું તેની વચ્ચે હિંદી સરકાર આવે અને પ્રજાની માંગણીનો ઇન્કાર કરે એ ઉચિત નહોતું.’

વી.પી. મેનન અને બીજા રાજકીય નિરીક્ષકોની માન્યતા એવી હતી કે જૂનાગઢના પ્રશ્ને હિંદી સંઘને ભીંસમાં લઈ પાકિસ્તાન કાશ્મીર પ્રશ્નને પોતાની તરફેણમાં લઈ જવા માગતું હતું.

૧૩મી નવેમ્બર, ૧૯૪૭ના દિવસે સરદાર વલ્લભભાઈ પટેલ જૂનાગઢ આવ્યા. આરઝી હકૂમતનું કાર્ય પૂરું થયું હોઈ પ્રતીકરૂપે તલવાર શામળદાસ ગાંધીએ સરદારને અર્પણ કરી. બહાઉદ્દીન કોલેજના પટાંગણમાં જનમેદનીને સંબોધતા ‘રક્તપાત વિના વિજય મેળવવા’ માટે પ્રજાને અભિનંદન આપ્યા. આ સભામાં પણ સરદારે પ્રજાને પ્રશ્ન કર્યોઃ ‘તમે હિંદ સાથે જોડાશો કે પાકિસ્તાની સાથે?’ જવાબમાં ‘હિંદની સાથે…’ શબ્દો દ્વારા પ્રજાએ સંમતિ આપી. ત્યારબાદ સરદારે કહ્યું કે, ‘જૂનાગઢની પ્રજાનો અભિપ્રાય પણ આપણે વિધિસર – મતદાન પદ્ધતિથી લઈશું.’

એ જ દિવસે સરદાર વેરાવળ ગયા અને પ્રભાસ પાટણમાં સોમનાથ મહાદેવના મંદિરનો પુનરુદ્ધાર કરાવવાની ઘોષણા કરી.

ફેબ્રુઆરી, ૧૯૪૭માં જૂનાગઢ રાજ્યે પાકિસ્તાન સાથે જવું કે હિંદી સંઘમાં ભળવું એનો લોકમત લેવાયો. ગુપ્ત મતદાન દ્વારા લેવાયેલા આ લોકઅભિપ્રાયમાં વિશાળ બહુમતી (૧,૯૦,૮૭૦ મત) ભારત સાથેના વિલયની તરફેણમાં રહી અને માત્ર ૯૦ મત પાકિસ્તાન સાથેના વિલયને માટે પડ્યા. પ્રજાની બહુમતીએ આપી દીધેલા ચુકાદા પછી પણ પાકિસ્તાને વારંવાર આ પ્રશ્ન વ્યૂહરચનાના એક ભાગરૂપે ઉઠાવવાનો ચાલુ રાખ્યો.

પાકિસ્તાન સરકારે યુનો સત્તાવાળાઓ સમક્ષ રજૂઆત કરી, જૂનાગઢના નવાબનો હોદ્દો ચાલુ રાખ્યો અને જે ટપાલ ટિકિટો છાપી તેમાં ‘વિવાદાસ્પદ પ્રદેશો’ની નોંધમાં કાશ્મીરની સાથે જૂનાગઢ અને માણાવદરનો પણ નિર્દેશ કર્યો.

પરંતુ ઇતિહાસ, સાંસ્કૃતિક અને ભૌગોલિક તમામ પ્રકારે ‘સરવા સોરઠ’ નામે જાણીતો જૂનાગઢ વિસ્તાર ગુજરાતનો જ એક અવિચ્છિન્ન ભાગ અને એ તથ્યની અવહેલના થઈ શકી નહીં.

જૂનાગઢની સમસ્યાનો રાજકીય ઉકેલ આવવાથી વિક્ષોભક વાતાવરણ થોડુંક હળવું થયું, પણ હજુ વિલીનીકરણની લાંબી પ્રક્રિયા બાકી જ હતી. કાઠિયાવાડના રાજકીય નેતાઓની સાથે સરદાર પટેલે ચર્ચા કરી ત્યારે એક વિકલ્પ એવો સૂચવવામાં આવ્યો હતો કે જૂનાં રજવાડાંઓની જોડાણ યોજનાને પુનર્જીવિત કરવી અને કાઠિયાવાડની ૫૦ ટકાથી વધુ વસ્તી ધરાવતાં રાજ્યો (જેવા કે જૂનાગઢ, ભાવનગર, નવાનગર વગેરે)માં નાના રજવાડાં, જાગીરો અને તાલુકા ભેળવી દેવાં.

બીજી દરખાસ્ત પ્રમાણે અર્ધહકૂમતવાળા અને બિનહકૂમતવાળાં રાજ્યો – જાગીરો, થાણાંઓને મુંબઈ પ્રદેશ સાથે જોડી દેવાની વ્યવસ્થા કરી શકાય એમ હતું, પણ આ બંને યોજનાઓથી સમસ્યાનો આંશિક ઉકેલ જ આવે એમ હતું એટલે કાઠિયાવાડના તમામ એકમોનું જોડાણ કરીને એક સંયુક્ત રાજ્ય રચવાનો નિર્ણય લેવામાં આવ્યો. સૌરાષ્ટ્રની રાજકીય ચળવળોમાં મહત્ત્વનો ભાગ ભજવનારા નેતાઓની સરદાર પટેલ અને વી.પી. મેનન સાથે મંત્રણાઓ કરી ભાવનગર અને જૂનાગઢના રાજવીઓએ નવા સૌરાષ્ટ્ર રાજ્યની યોજનાને સમર્થન આપ્યું. સરદાર પટેલે બીજાં રજવાડાંઓને અપીલ કરી.

લેખતસવીર-એ-ગુજરાત
વિષ્ણુ પંડ્યા

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एक झेन फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था। सर्द रात, पूर्णिमा की रात। फकीर रोने लगा, क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा। उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो? न रहा गया उनसे। तो उस फकीर ने कहा कि आए थे— कभी तो आए, जीवन में पहली दफा तो आए! यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं। तुम चोरी करने क्या आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया! क्षण भर को मुझे भी लगा कि अपने घर भी चोर आ सकते हैं! ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं, मैं रोका बहुत कि कहीं तुम्हारे काम में बाधा न पड़े, लेकिन न रुक पाया, सिसकियां निकल गईं, क्योंकि घर में कुछ है नहीं। तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता। दुबारा जब आओ तो सूचना तो दे देना। मैं गरीब आदमी हूं। दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—तूंग कर इकट्ठा कर लेता। अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी।
चोर तो घबड़ा गए, उनकी कुछ समझ में ही नहीं आया। ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला न था।
चोरी तो जिंदगी भर से की थी, मगर आदमी से पहली बार मिलना हुआ था। भीड़— भाड़ बहुत है, आदमी कहां! शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां! पहली बार उनकी आंखों में शर्म आई, हया उठी। और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए, मना नहीं कर सके। मना करके इसे क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। लेना भी मुश्किल! इस पर कुछ और नहीं है! कंबल छूटा तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना। लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे नंगे रहने की आदत है। और तुम तीन मील चल कर गांव से आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं। तुम चुपचाप ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।
चोर तो ऐसे घबड़ा गए कि एकदम निकल कर बाहर हो गए। जब बाहर हो रहे थे तब फकीर चिल्लाया कि सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो
आदमी अजीब है, चोरों ने सोचा। और ऐसी कड़कदार उसकी आवाज थी कि उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे। फिर फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा और उसने एक गीत लिखा— जिस गीत का अर्थ है कि मैं बहुत गरीब हूं मेरा वश चलता तो आज पूर्णिमा का चांद भी आकाश से उतार कर उनको भेंट कर देता! कौन कब किसके द्वार आता है आधी रात!
यह आस्तिक है। इसे ईश्वर में भरोसा नहीं है, लेकिन इसे प्रत्येक व्यक्ति के ईश्वरत्व में भरोसा है। कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है, जो श्वासें ले रहा है, उस फैले हुए ईश्वरत्व के सागर में इसकी आस्था है।
फिर चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गया। और वह कंबल तो जाना—माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का कंबल था। मजिस्ट्रेट तत्‍क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है— तो तुम उस गरीब फकीर के यहां से भी चोरी किए हो! फकीर को बुलाया गया। और मजिस्ट्रेट ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है, तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस आदमी का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा है। फिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा। फिर बाकी तुम्हारी चोरियां सिद्ध हों या न हों, मुझे फिकर नहीं है। उस एक आदमी ने अगर कह दिया…।
चोर तो घबड़ा रहे थे, कंप रहे थे, पसीना—पसीना हुए जा रहे थे— जब फकीर अदालत में आया। और फकीर ने आकर मजिस्ट्रेट से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं। मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई। मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे।
यह आस्तिकता है। मजिस्ट्रेट ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं। फकीर के पैरों पर गिर पड़े चोर और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो। वे संन्यस्त हुए। और फकीर बाद में खूब हंसा। और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था। इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थीं। इस कंबल में मेरे सारे सिब्दों की कथा थी। यह कंबल नहीं था। जैसे कबीर कहते हैं न—झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया! ऐसे उस फकीर ने कहा प्रार्थनाओं से बुना था इसे! इसी को ओढ़ कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था, गंध थी। तुम इससे बच नहीं सकते थे। यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले आएगा तुमको भी। और तुम आखिर आ गए। उस दिन रात आए थे, आज दिन आए। उस दिन चोर की तरह आए थे, आज शिष्य की तरह आए। मुझे भरोसा था।

🪷आचार्य रजनीश ओशो🪷
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मन ही पूजा मन ही धूप