Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक के साथ एक फ्री

आजकल एक बेहद मजेदार पुस्तक पढ़ रहा हूँ- आख़िरी निज़ाम। उक्त पुस्तक हैदराबाद के निज़ाम वंश पे है।

इस पुस्तक से एक मजेदार वाक्या पढ़िए।

तुर्की के अंतिम ख़लीफ़ा को तुर्की से निर्कर्षित कर पेरिस जाना पड़ा। अंतिम ख़लीफ़ा अपनी बेगमों और औलादों के साथ पेरिस रहने लगे किंतु ख़र्चे पूरे नहीं पड़ते थे। लिहाजा ख़लीफ़ा ने दुनिया भर के नवाब बादशाह आदि से गुहार लगाई कि हमको वज़ीफ़ा भेजो। ये वो दौर था जब भारत में खिलाफत आंदोलन में मौलाना शौकत अली और मौलाना अली जौहर गांधीजी के साथ अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे। मुस्तफा कमाल ने आख़िर ख़िलाफ़त ख़त्म कर के ख़लीफ़े को फ्रांस भेज दिया।

दोनों मौलानाओं ने हिन्दोस्तान के सब रजवाड़ों से गुहार लगाई कि पेरिस में रह रहे इन ख़लीफ़ा को वो माहवार वज़ीफ़ा दें। हैदराबाद के कंजूस निज़ाम से भी इन्होंने तीन सौ पाउंड महीने की किश्त बँधवाई। निज़ाम उस समय दुनिया का सबसे अमीर आदमी था।

अब इधर से कहानी में ट्विस्ट आया।

ख़लीफ़े की औलादों में प्रमुख थी एक बेहद ख़ूबसूरत शहज़ादी- दुर्रुश्शेहवर। शहज़ादी बेहद सुंदर थी और उससे निकाह करने बड़े बड़े लोग तैयार थे जैसे-
ईरान का शाह, इजिप्ट का बादशाह और तुर्की शहज़ादे आदि। सूची काफ़ी बड़ी थी। मतलब शहजादी को चाहने वालों की कमी ना थी।

किंतु ख़लीफ़ा ने शहज़ादी का निकाह करवाया निजाम के सबसे बड़े बेटे से। कारण था- निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी था और वो ख़लीफ़ा की मुफ़लिसी ख़त्म कर सकता था।

मौलाना शौकत अली और अली जौहर ने इस विवाह में अहम भूमिका निभाई- बिचौलिया बने। ख़लीफ़े ने निजाम से कहा- अपनी शहजादी को तुम्हारे लड़के से निकाह के बदले में तुम्हें मेहर में पचास हज़ार पाउंड देने होंगे।

कंजूस निजाम ने साफ़ इंकार कर दिया – कहा ये मुमकिन नहीं। हैदराबाद के गलियारों में अफ़वाह थी- निजाम एक मारवाड़ी जौहरी का खून है जो उनकी अम्मी को गहने आदि खूब बेचता था।  निजाम ने कहा- पचास हज़ार पाउंड बहुत ज़ियादा है।

अब मौलाना शौक़त और जौहर ने निजाम ख़लीफ़ा से मांडवाली की- कहा- एक काम करो, पचास हज़ार पाउंड ले लो किंतु एक की जगह दो शहज़ादी निजाम के दो लड़कों से बियाह दो।

निजाम ने कहा- ये ठीक है, एक के साथ एक फ्री। इधर से इंडिया में लगने वाली सेल- buy one get one free सेल की शुरुआत हुई।

तय वक्त पे निजाम ने दोनों शहजादों को फ्रांस भेजा। ख़लीफ़ा को ये मंजूर ना था कि पचास हज़ार में वो दो शहज़ादी दें। उसने एक चाल चली।

उसनेनिजाम के  छोटे लड़के के सामने अपनी रिश्तेदारी की भतीजी खड़ी कर दी, जिसे देख छोटा निजामजादा अपना सुध बुध खो बैठा और उसने भतीजी से निकाह करने का फैसला किया। इस निकाह की मेहर की रकम तय हुई पच्चीस हज़ार पाउंड।

इस तरफ़ से ख़लीफ़े ने पचास हज़ार ख़ुद की शहज़ादी के एवज़ में लिए और पच्चीस हज़ार भतीजी के। और बेचारा निज़ाम मांडवली के चक्कर में और रक़म से हाथ धो बैठा।

उक्त क़िस्सा पढ़कर मीर मुंशी जी ने कहा- अब ये तय है निज़ाम मारवाड़ी जौहरी की औलाद नहीं हो सकता, ऐसा घाटे का सौदा मारवाड़ी लोग करते ही नहीं है।

तस्वीर में ख़लीफ़ा अपनी शहजादी और दामाद के साथ!

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एक के साथ एक फ्री

आजकल एक बेहद मजेदार पुस्तक पढ़ रहा हूँ- आख़िरी निज़ाम। उक्त पुस्तक हैदराबाद के निज़ाम वंश पे है।

इस पुस्तक से एक मजेदार वाक्या पढ़िए।

तुर्की के अंतिम ख़लीफ़ा को तुर्की से निर्कर्षित कर पेरिस जाना पड़ा। अंतिम ख़लीफ़ा अपनी बेगमों और औलादों के साथ पेरिस रहने लगे किंतु ख़र्चे पूरे नहीं पड़ते थे। लिहाजा ख़लीफ़ा ने दुनिया भर के नवाब बादशाह आदि से गुहार लगाई कि हमको वज़ीफ़ा भेजो। ये वो दौर था जब भारत में खिलाफत आंदोलन में मौलाना शौकत अली और मौलाना अली जौहर गांधीजी के साथ अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे। मुस्तफा कमाल ने आख़िर ख़िलाफ़त ख़त्म कर के ख़लीफ़े को फ्रांस भेज दिया।

दोनों मौलानाओं ने हिन्दोस्तान के सब रजवाड़ों से गुहार लगाई कि पेरिस में रह रहे इन ख़लीफ़ा को वो माहवार वज़ीफ़ा दें। हैदराबाद के कंजूस निज़ाम से भी इन्होंने तीन सौ पाउंड महीने की किश्त बँधवाई। निज़ाम उस समय दुनिया का सबसे अमीर आदमी था।

अब इधर से कहानी में ट्विस्ट आया।

ख़लीफ़े की औलादों में प्रमुख थी एक बेहद ख़ूबसूरत शहज़ादी- दुर्रुश्शेहवर। शहज़ादी बेहद सुंदर थी और उससे निकाह करने बड़े बड़े लोग तैयार थे जैसे-
ईरान का शाह, इजिप्ट का बादशाह और तुर्की शहज़ादे आदि। सूची काफ़ी बड़ी थी। मतलब शहजादी को चाहने वालों की कमी ना थी।

किंतु ख़लीफ़ा ने शहज़ादी का निकाह करवाया निजाम के सबसे बड़े बेटे से। कारण था- निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी था और वो ख़लीफ़ा की मुफ़लिसी ख़त्म कर सकता था।

मौलाना शौकत अली और अली जौहर ने इस विवाह में अहम भूमिका निभाई- बिचौलिया बने। ख़लीफ़े ने निजाम से कहा- अपनी शहजादी को तुम्हारे लड़के से निकाह के बदले में तुम्हें मेहर में पचास हज़ार पाउंड देने होंगे।

कंजूस निजाम ने साफ़ इंकार कर दिया – कहा ये मुमकिन नहीं। हैदराबाद के गलियारों में अफ़वाह थी- निजाम एक मारवाड़ी जौहरी का खून है जो उनकी अम्मी को गहने आदि खूब बेचता था।  निजाम ने कहा- पचास हज़ार पाउंड बहुत ज़ियादा है।

अब मौलाना शौक़त और जौहर ने निजाम ख़लीफ़ा से मांडवाली की- कहा- एक काम करो, पचास हज़ार पाउंड ले लो किंतु एक की जगह दो शहज़ादी निजाम के दो लड़कों से बियाह दो।

निजाम ने कहा- ये ठीक है, एक के साथ एक फ्री। इधर से इंडिया में लगने वाली सेल- buy one get one free सेल की शुरुआत हुई।

तय वक्त पे निजाम ने दोनों शहजादों को फ्रांस भेजा। ख़लीफ़ा को ये मंजूर ना था कि पचास हज़ार में वो दो शहज़ादी दें। उसने एक चाल चली।

उसनेनिजाम के  छोटे लड़के के सामने अपनी रिश्तेदारी की भतीजी खड़ी कर दी, जिसे देख छोटा निजामजादा अपना सुध बुध खो बैठा और उसने भतीजी से निकाह करने का फैसला किया। इस निकाह की मेहर की रकम तय हुई पच्चीस हज़ार पाउंड।

इस तरफ़ से ख़लीफ़े ने पचास हज़ार ख़ुद की शहज़ादी के एवज़ में लिए और पच्चीस हज़ार भतीजी के। और बेचारा निज़ाम मांडवली के चक्कर में और रक़म से हाथ धो बैठा।

उक्त क़िस्सा पढ़कर मीर मुंशी जी ने कहा- अब ये तय है निज़ाम मारवाड़ी जौहरी की औलाद नहीं हो सकता, ऐसा घाटे का सौदा मारवाड़ी लोग करते ही नहीं है।

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Posted in PM Narendra Modi

जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध में थीं सोनिया गाँधी, उसे NGT ने दी मंजूरी: जानें- क्या है ₹92000 करोड़ की यह परियोजना, जिससे सिंगापुर को पछाड़ देगा भारत ? 18 February, 2026 रुपम
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को मंजूरी,फोटो साभार-आजतक
देश के सबसे बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी ने मंजूरी दे दी है। 92,000 करोड़ रुपए से बनने वाला यह प्रोजेक्ट भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा। सैन्य रणनीति, सुरक्षा, व्यापार और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अंडमान निकोबार का सबसे निचला द्वीप ग्रेट निकोबार काफी अहम है। सरकार को उम्मीद है कि 2040 तक ये पूरी तरह तैयार हो जाएगा।अगर ये प्रोजेक्ट पूरी तरह बन जाता है तो भारत को एक ‘हॉगकॉग’ या ‘सिंगापुर’ मिल जाएगा। भारत हिन्द महासागर में चीन पर बढ़त बना लेगा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। एनजीटी की कोलकाता स्थिति ईस्टर्न जोनल बेंच ने परियोजना को सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण बताते हुए मंजूरी दी, साथ ही यहाँ पर्यावरण के पर्याप्त सुरक्षा के उपाय किये जाने का शर्त भी लगाया।

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का जलडमरूमध्य वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है। यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर का ‘चोक प्वांइट पॉलिटिक्स’ का केन्द्र भी माना जाता है।

इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट। पावर प्लांट, जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से फायदा
भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन जाएगा, लाखों नौकरियाँ पैदा होगी। अभी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ज्यादा होने से परेशानी आ रही है। जब ग्रेट निकोबार में आधुनिक पोर्ट बनेगा तो कंटेनर सीधे यहाँ पहुँचेंगे। समय के साथ-साथ खर्च भी कम होंगे। दूसरे देशों की शिप भी पहुँचेगी और भारत को समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मिलेगी। इतना ही नहीं सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी ये प्रोजेक्ट काफी अहम है। इस प्रोजेक्ट पर 92000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्यौकफ्यू और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाहों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। एक तरह से उसने समुद्र में भारत को घेरने की कोशिश की है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाए। इस प्रोजेक्ट से निगरानी और सैनिकों की मौजूदगी आसान हो जाएगी। इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए भी ये काफी अहम है।

साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया। 90000 करोड़ रुपए का ये प्रोजेक्ट शिपिंग, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय के तहत बनेगा और इसे केंद्र से पैसा मिलेगा। इसे चार चरणों में बनाया जाएगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख TEU (कंटेनर) संभालेगा। 2058 तक ये बंदरगाह 1.6 करोड़ कंटेनर तक संभालने के काबिल हो जाएगा।

ये सिर्फ एक और बंदरगाह बनाने की बात नहीं है, बल्कि ये भारत की समुद्री कमजोरी को ठीक करने का मौका है। भारत के पूर्वी तट के ज्यादातर बंदरगाहों की गहराई 8-12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए कम है। दुनिया के बड़े बंदरगाह 12-20 मीटर गहरे हैं, जो 1.65 लाख टन से ज्यादा के जहाज संभाल सकते हैं। इसीलिए भारत का 25% कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से जाता है। इससे हर साल 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान और अर्थव्यवस्था को 3,000-4,500 करोड़ का झटका लगता है।

गलाथिया बे की 18-20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और पूर्व-पश्चिम समुद्री रास्ते के पास इसकी जगह इसे इस निर्भरता को खत्म करने के लिए बिल्कुल सही बनाती है। रणनीतिक तौर पर ये भारत को बांग्लादेश और म्यांमार के कार्गो के लिए सिंगापुर से मुकाबला करने की ताकत देता है, जहाँ अभी 70% से ज्यादा कार्गो विदेशी बंदरगाहों से जाता है।

कॉन्ग्रेस कर रही है विरोध
कॉन्ग्रेस और पर्यावणविद इसके दीर्घकालीन पर्यावरण क्षति को लेकर विरोध कर रहे हैं। परियोजना का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस और पर्यावरणविद का मानना है कि इससे जैव विविधता, पारिस्थिकी तंत्र और शेरोन जैसे जनजातीय समुदाय को नुकसान होगा, जिनकी आबादी पहले ही सैकड़ों में बची है।

परियोजना के विरोध में कई याचिकाएँ कोलकाता हाईकोर्ट में अभी लंबित हैं। इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने कहा कि ‘शोम्पेन और निकोबारी आदिवासियों का अस्तित्व दाँव पर है’ और ‘भारत की आने वाली पीढ़ियाँ इस बड़े पैमाने की तबाही को नहीं झेल सकतीं।’

लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी कुछ नहीं कह रही हैं। भारत का 40% से ज्यादा ट्रांसशिपमेंट कोलंबो से होता है, जहाँ चीन एक टर्मिनल चलाता है और उसने वहाँ अरबों रुपये लगाए हैं। श्रीलंका बीजिंग के कर्ज में डूबता जा रहा है और वहाँ चीनी जासूसी जहाज भी रुकते हैं। इससे भारत की कमजोरी साफ दिखती है। ऐसे में गलाथिया बे का विरोध करना पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि रणनीतिक भूल है।

भारत अब विदेशी बंदरगाहों का इस्तेमाल और चीन के दबदबे को हिन्द महासागर में झेल नहीं सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण को नष्ट करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, नौकरियाँ पैदा करने और भारत को समुद्री ताकत बनाने का प्रोजेक्ट है।

ऑप इंडिया

Posted in रामायण - Ramayan

साल 1880… काशी से आई एक रामलीला मंडली तुलसी गांव में ठहरी हुई थी। करीब 22–24 कलाकार, सब एक ही घर में रहते—वहीं रिहर्सल, वहीं भोजन, और वहीं से हर रात मंच पर भगवान राम की लीलाएं जीवंत होतीं।

इस मंडली के दो प्रमुख लोग थे—

पंडित कृपाराम दूबे — मंडली के संचालक, जो हारमोनियम पर बैठकर पूरी रामलीला का संचालन करते थे। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि लोग कहते थे, “उनके सुर में सिर्फ संगीत नहीं, श्रद्धा बहती है।”

और दूसरा था—
फौजदार शर्मा — साज-सज्जा, मंच, वेशभूषा और खासकर “शिव धनुष” बनाने की जिम्मेदारी उसी की थी। पूरे मंच का तकनीकी काम वही संभालता था… और उसे अपने काम पर बहुत गर्व भी था।

एक दिन रिहर्सल चल रही थी…
पंडित जी ने सहज भाव से कहा—
“फौजदार, इस बार धनुष थोड़ा हल्का और लचीला बनवाना… राम का पात्र निभा रहा लड़का अभी छोटा है, पिछली बार उसे धनुष तोड़ने में बहुत समय लग गया था।”

ये बस एक सुझाव था… लेकिन फौजदार के दिल में इसे अपमान समझा गया।

उसे लगा—
“मेरे काम पर उंगली उठाई जा रही है…!
मैं इतना मेहनत करता हूं, और मुझे ही सिखाया जा रहा है?”
उसके भीतर धीरे-धीरे अहंकार और गुस्सा भरने लगा।
और उसी पल उसने मन ही मन ठान लिया—
“अब दिखाऊंगा… असली धनुष क्या होता है।”
संयोग देखिए… अगले ही दिन था सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन।

फौजदार चुपचाप उस घर के मालिक के पास गया, जहां मंडली रुकी थी।
बोला—“एक लोहे की मजबूत छड़ चाहिए, मंच के काम के लिए।”
उसे एक मोटी और भारी लोहे की छड़ मिल गई।
वह उसे लेकर दूसरे गांव के लोहार के पास गया… और उस छड़ को धनुष का आकार दिलवा लाया।

ऊपर से कपड़ा लपेटा, रंगीन कागज लगाया… ताकि कोई पहचान न सके।
अब उसके हाथ में था—लोहे का शिव धनुष।
रात आई… रामलीला शुरू हुई…
हजारों लोग जमा थे, सबको इंतज़ार था उस दृश्य का—
जब श्रीराम शिव धनुष तोड़ेंगे।

फौजदार ने मौका देखकर असली लकड़ी का धनुष हटा दिया… और उसकी जगह लोहे का धनुष रख दिया।
फिर खुद पर्दे के पीछे खड़ा होकर तमाशा देखने लगा।
उसे पूरा भरोसा था—
आज राम धनुष नहीं तोड़ पाएंगे…
और सबके सामने पंडित जी की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी।

लीला आगे बढ़ी…
एक-एक कर सभी राजा आए, धनुष उठाने की कोशिश की… कोई सफल नहीं हुआ।
अब बारी थी राम की।
17 साल का वह बालक, राम का रूप धारण किए, आगे बढ़ा।
जैसे ही उसने धनुष को हाथ लगाया…
उसे समझ आ गया—
“ये धनुष कुछ और है…”
वह हिल भी नहीं रहा था।
बालक घबरा गया… और उसने पंडित कृपाराम दूबे की ओर देखा।

वह एक नजर… जैसे सब कह गई।
पंडित जी सब समझ गए।
आज सिर्फ एक दृश्य नहीं था…
आज हजारों लोगों की आस्था का प्रश्न था।
अगर राम धनुष नहीं तोड़ पाए…
तो यह सिर्फ एक कलाकार की हार नहीं होगी—
यह लोगों के विश्वास को चोट पहुंचाएगी।

पंडित जी ने आंखों से संकेत दिया—
“रुको… धनुष की परिक्रमा करो…”
और फिर उन्होंने आंखें बंद कर लीं।
अगले ही पल…
हारमोनियम से ऐसे सुर निकले…
जैसे किसी ने उसमें प्राण भर दिए हों।

ढोल-नगाड़े तेज़ हो गए…
पेट्रोमेक्स की लौ अचानक तेज़ चमकने लगी…
और बिना बादलों के आकाश में बिजली कौंध गई।
पूरा वातावरण बदल चुका था।
लोग स्तब्ध थे… कोई समझ नहीं पा रहा था क्या हो रहा है।
पंडित जी पूरी तरह समर्पित हो चुके थे…
और तभी उनके मुख से चौपाई निकली—

“लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े, काहू न लखा देख सब ठाढ़े…
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा, भरे भुवन धुनि घोर कठोरा…”

जैसे ही आखिरी शब्द निकले…
एक जोरदार कड़क…
और उसी क्षण—वह लोहे का धनुष दो टुकड़ों में टूट गया।
किसने तोड़ा… कैसे टूटा…
कोई नहीं जान पाया।
बस एक पल… और सब सामान्य।

पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा।
पंडित कृपाराम दूबे मंच के बीच गए…
टूटे धनुष और उस बालक के सामने दंडवत लेट गए।
उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
वह जानते थे—
आज मंच पर सिर्फ लीला नहीं हुई…
आज आस्था ने अहंकार को हरा दिया।
और पर्दे के पीछे खड़ा फौजदार…
जिसने बदले की आग में ये सब किया था…
वह भी स्तब्ध था।

उसका सिर झुक चुका था।
उसे समझ आ गया था—
जहां सच्ची भक्ति होती है…
वहां अहंकार टिक नहीं सकता।
राम किसी के नहीं होते…
लेकिन जो खुद को राम के हवाले कर दे—
राम उसके जरूर हो जाते हैं।
जय श्री राम 🙏

Posted in खान्ग्रेस

ज़ब अमित शाह गुजरात के गृहमंत्री थे तो एक आतंकवादी सोहराबुद्दीन शेख गुजरात ATS ने मार दिया था।

केंद्र मे कांग्रेस आ चुकी थी,

कांग्रेस ने फ़ौरन पहले तो सेहराबुद्दीन को क्लीन चीट दिलाने की कोशिश की मगर सफलता नहीं मिली, फिर फर्जी एनकाउंटर की फाइल्स लाद दी, अमित शाह को जेल तक हो गयी।

उन दिनों दूरदर्शन जो कि सरकारी चैनल है, उस पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह का आना बैन था।

हालांकि उनके तमाम विरोधियों को बुलाकर कांग्रेस एक नैरेटिव बनाने की कोशिश जरूर करती थी।

फिर आया 2014, उसके बाद ये बेन हट गया। आज अमित शाह गुजरात से प्रमोट होकर भारत के गृहमंत्री बन गए और अहंकारी माता पुत्र एजेंसियो के चक्कर लगा रहे है।

1938 मे नेहरू जी ने नेशनल हेराल्ड अख़बार शुरू किया था इसे AJL नाम की कंपनी चलाती थी। 2008 मे ये अख़बार बंद हो गया, AJL के पास 2000 करोड़ की अचल सम्पत्ति भी थी।

घोटाला यही से शुरू हुआ, AJL ने कांग्रेस पार्टी से 90 करोड़ का लोन लिया और इसे चुकाने की जगह अपने शेयर दे दिये।

बाद मे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने यंग इंडिया नाम से कंपनी बनाई और 50 लाख कांग्रेस को देकर ये सारे शेयर्स अपने नाम कर लिये।

दरसल AJL मे 154 निवेशक भी थे जो पूर्व क्रांतिकारियो के परिवार से थे। उन्हें पता भी नहीं था कि उनके पास AJL के शेयर है उसी का फायदा गाँधी परिवार ने उठाया और यंग इंडिया के माध्यम से 50 लाख मे सारे शेयर्स अपने नाम कर लिये।

ये क्रिस्टल क्लियर घोटाला है और चोरी है, ऐसा भी नहीं कि गाँधी परिवार किसी गुलाम को आगे कर सके डायरेक्टर भी इटालियन माता और बहरूपिया पुत्र ही है।

इन्हे जेल भी हो चुकी है ये बस जमानत पर बाहर घूम रहे है, अमित शाह आज भी चाहे तो किसी भी दिन इन्हे जेल भेज सकते है। लेकिन बीजेपी जो कर रही है उसे आर्म ट्विस्टिंग कहते है। ये दोनों माँ बेटे बीजेपी की जीत की गारंटी है।

ज़ब तक ये दोनों बाहर है कांग्रेस के सारे नेता इनके गुलाम है और ये दोनों बहुत कमजोर प्रतिद्वंदी है। कांग्रेस कमजोर नहीं है लेकिन वो इन दोनों का बोझा उठाकर भागती है इसलिए पीछे रह जाती है।

दूसरी ओर कांग्रेस के पास आज भी ये क्षमता है कि वो देश मे कही भी दंगे करवा सकती है और ज़ब ज़ब ऐसा प्रयास होता है तो आप देखते है कि इसी केस मे समन आ जाता है। माँ बेटे कितने ही बहादुर बने मगर अंदर से डरपोक है।

शाहीन बाग़ मे ज़ब हिंसा हुई तो पहले दिन राहुल गाँधी का हिन्दू विरोधी बयान आया और अगले दिन नेशनल हेराल्ड केस मे एक नया समन आ गया।

यदि आप ये पैटर्न देखोगे तो ऐसा ही जेएनयू के समय हुआ था और CAA के समय भी। तेलंगाना मे कांग्रेस की सरकार है हैदराबाद मे मुसलमानो का कुछ इलाको मे वर्चस्व भी है, क्या कांग्रेस इतनी सीधी है कि वफ्फ बिल पर वहाँ दंगे नहीं करवा पा रही?

दरसल ज़ब भी लगता है कि कांग्रेस अब दंगे या हिंसा पर आने वाली है नेशनल हेराल्ड का तेल लगाकर संघी लाठी से माँ बेटे को कूटा जाता है।

ये एक बहुत बड़ा कारण है कि पिछले 10 वर्षो मे कई बड़े परिवर्तन हुए मगर दंगे वैसे नहीं हुए जैसे 2014 से पहले अपेक्षित थे।

आप तय समझिये माँ बेटे जेल नहीं जाने वाले, इन्हे मोटा भाई बाहर ही रखेंगे। ताकि भविष्य मे कई अवसरो पर आर्म ट्विस्ट कर अपना काम करवा सके। इस पद के लोगो के लिये जेल से ज्यादा बुरी सजा कोर्ट के चक्कर लगाना और जवाब देना है 💯 #gaming #mexicanmusic #trend #love #viralchallenge #socialimpact #viralphoto #viralreelschallenge #reelsfypシ #siblingrivalry #RIP #trendingnow #viralphotochallenge

Posted in हिन्दू पतन

मनु स्मृति में लिखा है की ब्राह्मण के स्थान पर शुद्र बैठ जाये तो उसे दंडित करो।

इस लेख को दिखा कर,, हिन्दूओं में भेदभाव जातिवाद है कहकर…

एक व्यक्ति मुझे उकसाने लगा।

फिर मैंनें उसकी समस्या का समाधान करने के लिए ठान लिया।

सबसे पहले उसको बौद्ध मंदिर ले गया

वहां बुद्ध के पास भंते जी का स्थान था।

मैंने उस व्यक्ति से कहा कि,

अब तू भंते को हटा कर खुद बैठ जा।

व्यक्ति ने ऐसा ही किया

फिर क्या था …

भंते जी ने गुस्से में चार पांच छड़ी व्यक्ति को जमाया

और उसे अपनी औकात में रहने की सलाह भी दे डाली।

फ़िर मैं उसे

एक दरगाह में ले गया

वहां कब्र के पास मौलाना साहब की गद्दी थी,

मैंने व्यक्ति से कहा की इसे हटा कर तू बैठ जा।

व्यक्ति ने वैसा ही किया।

मौलाना साहब ने उसे सौ जूते दिए

काफ़िर कह कर उसकी खूब ठुकाई की।

माफ़ी वगैरह मांगने के बाद व्यक्ति वहां से जान बचा कर भाग खड़ा हुआ।

फिर मैं उस व्यक्ति को एक चर्च में ले गया

वहां काफी लोग प्रे कर रहे थे , मैंने उससे कहा चर्च के फादर को किनारे ढकेल कर लोगो से बोलो की वह तुम्हें फादर कहे ,

फिर क्या था व्यक्ति ने वही किया ,

उसके बाद उसी चर्च में इतना ठुकाई हुई की बेहोश हो गया ,

बड़ी मुश्किल से उसे मैं घर लेकर आया।

फिर अगले दिन अब मैं उस,

व्यक्ति को एक गली के मंदिर मे ले गया

वहां सभी कॉलोनी के लोग बारी बारी से आरती कर रहे थे कोई शन्ख बजा रहा था तो कोई झालर, घण्टी व सभी लोग बारी बारी से आरती कर रहे थे…

मैंने व्यक्ति से कहा की इनको हटा कर तू जो भी करना चाहता है वो कर सकता है, फिर

व्यक्ति ने वैसा ही किया, उसने घण्टी बजाई, आरती भी की, पंडित जी ने अपने हाथ से प्रसाद दिया…..

व्यक्ति तब से आज तक शर्मिंदा है कहता है मैं भी हिन्दू हुं, अज्ञानता वंश निज धर्म का ही विरोध करता था।

अब मिलता है तो बोलता है भाई, हिन्दू हिन्दू भाई भाई॥

अगर आप को भी कोई व्यक्ति ऐसा मिले तो उसे चारो धाम के दर्शन जरूर करवायें। पुण्य कमाएं।

#जय_श्री_राम

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

धैर्य

एक गाँव में रामू नाम का किसान रहता था, उसके कुछ बड़े सपने थे। वह अपनी खेती से खुश नहीं था और अलग फसल लगाने की सोच रहा था ताकि उसे भविष्य में ज्यादा मुनाफा हो सके। China में एक बाँस का पेड़ होता है, जिसकी खेती करने से बहुत पैसे कमाए जा सकते हैं लेकिन रोपित करने के बाद चार से पांच साल तक उसे पानी और खाद देना होता है। जब रामू को उस बाँस के पेड़ के बारे में पता चला तो उसनें सोचा कि यही आगे बढ़ने के लिए एक बड़ा अवसर है और वह चाइनीस बास के पेड़ का बीज ले आया और उसनें अपने खेत में उसकी फसल बो दी।

जब गांव के दुसरे लोगों को पता चला कि वह अपनी खेती में फसल परिवर्तन कर रहा है और अलग तरह की कोई फसल बो रहा है तब गांववालों ने उसका बहुत मजाक बनाया और सबनें कहा कि ऐसी फसल उग ही नहीं सकती। रामू अपने फैसले पर अड़ा रहा और बाँस का पेड़ उगाने के लिए उसनें दृढ़ निश्चय कर लिया। धीरे-धीरे समय बीतता गया, उसके आसपास के सारे खेत फसलों से लहलहा रहे थे लेकिन रामू का खेत बंजर पड़ा था।

एक साल हो गये, दुसरे लोगों ने अपने खेत की फसलें तक काट डालीं लेकिन रामू का खेत अभी भी ज्यों का त्यों बंजर पड़ा था। अब उसके घरवाले भी उससे कहते फिरते कि उन्हें खेत में वही पुरानी फसलें बो देनी चाहिए लेकिन रामू सभी को धैर्य रखने और मेहनत करने की ही सलाह देता रहता। रामू अपने गांव में निकलता तो सभी उसे ‘बाँस का पेड़ जा रहा है’ करके चिढ़ाया करते थे।

दूसरों की बातों को अनसुना करके रामू अपने काम में ही लगा रहता था। देखते ही देखते चार साल बीत गये, रामू फसलों पर खाद और पानी अभी भी दे रहा था पर उसके खेत में अंकुर तक नहीं फूट रहे थे। सभी लोगों के ताने, मजाक उड़ाने वाली बातों से वह अब भी परेशान नहीं हुआ, लोग उससे कहते कि तुम्हारा परिवार भूखा मर जाएगा, अपनी पागलपन छोड़ो। लेकिन रामू अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। पांचवा साल जब रामू अपनी खेत पर गया तब उसनें पाया कि बंजर जमीन अब बंजर नहीं थी, उसमें अंकुर फूट चुके थे, छोटी छोटी पत्तियां बाहर निकली हुई थीं। यह देखकर रामू बहुत खुश हुआ, उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। और देखते ही देखते ६ सप्ताह में बाँस का वह पेड़ ९० फीट तक बढ़ गया। सारे गांव वाले यह देखकर हैरान थे, रामू आज बहुत ज्यादा खुश था, क्योंकि उसका जो भरोसा था, और उसके अन्दर जो धैर्य थी उसका नतीजा ही आज उसे देखने को मिला।

कहानी से सीख

इस कहानी से हमें २ बड़ी बातें सीखने को मिलती हैं कि या तो हम वो किसान बन जाएं, जहाँ हम अपना एक गोल सेट करते हैं, उस पर भरोसा करते हैं, और दुनिया वाले क्या कहते हैं इस पर ध्यान नहीं देते। हम बस अपना काम करते जाते हैं, ५ साल तक बिना किसी परिणाम के हमें खाद और पानी देना होता है या तो फिर एक बास का पेड़ बन जाएं, जहाँ हम ५ साल तक अपनी जड़ें मजबूत कर रहे हैं, इतनी कि ६ हप्ते में अपनी उस सफलता को संभाल पाएं। यदि हम दोनों में से कोई एक भी बन जाते हैं तो ये बहुत बड़ी बात होगी।

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एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक लड़का रहता था। गरीब परिवार में जन्मे रामू के पास साधन सीमित थे, लेकिन उसकी इच्छाशक्ति असीमित थी। उसका सपना था कि वह एक दिन धावक बने और देश के लिए पदक जीतकर गाँव का नाम रोशन करे। हालांकि, उसके गाँव के लोग हमेशा उसकी क्षमता पर संदेह करते थे और उसे हंसी में उड़ा देते थे।

रामू के पिता एक छोटे किसान थे, जो अपने खेतों में सुबह से शाम तक मेहनत करते थे। उन्होंने अपने बेटे को कभी हार न मानने का पाठ पढ़ाया था। लेकिन रामू की माँ को हमेशा चिंता होती थी कि कहीं उनके बेटे के सपने टूट न जाएँ। गाँव के लोग भी यही कहते थे, “रामू, दौड़ने का सपना देखना छोड़ दो। यहाँ से बड़े खिलाड़ी नहीं निकलते।”

हर साल गाँव में एक दौड़ प्रतियोगिता होती थी, जो रामू के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। पिछली तीन बार वह हार चुका था। उसके हारने के बाद लोग उस पर हँसते थे और कहते थे, “तुमसे न हो पाएगा, रामू। बड़े सपने देखने के लिए बड़ी ताकत चाहिए।”

इस बार रामू ने ठान लिया कि वह अपनी हर कमजोरी को ताकत में बदल देगा। उसने गाँव के मैदान में रोज़ सुबह चार बजे उठकर दौड़ का अभ्यास करना शुरू कर दिया। उसकी हर एक दौड़ में उसकी साँसें तेज हो जाती थीं, पैर थक जाते थे, लेकिन उसकी आँखों में एक चमक थी—जुनून की, जो उसे रुकने नहीं देती थी। उसने किताबों से नई तकनीकों के बारे में सीखा, अपने शरीर को मजबूत करने के लिए व्यायाम किए, और अपनी हर कमजोरी पर कड़ी मेहनत की।

प्रतियोगिता का दिन आ गया। आकाश में बादल थे, मानो मौसम भी रामू की परीक्षा लेने के लिए तैयार था। दौड़ शुरू होते ही सभी धावकों ने तेज़ी दिखाई। रामू का मन भी उथल-पुथल कर रहा था। लेकिन उसने अपनी आँखें लक्ष्य पर टिका लीं। जब सबको लगा कि रामू पिछड़ रहा है, तभी उसने अपनी स्पीड बढ़ाई और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

अंतिम चरण में, जब सबकी उम्मीदें टूट रही थीं, रामू ने अपनी पूरी ताकत और अपने पिता के द्वारा सिखाई गई मेहनत का सहारा लिया। उसकी हर दौड़, हर कदम, उसके सपनों का साकार रूप था। वह तेज़ी से फिनिश लाइन की ओर दौड़ा और सबको पीछे छोड़ते हुए सबसे पहले उस रेखा को पार किया।

भीड़ में सन्नाटा था, फिर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। लोगों के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे, और रामू के चेहरे पर एक अद्भुत शांति। उसने जीत लिया था, लेकिन उस जीत का मतलब अब उसके लिए कुछ और था। यह जीत सिर्फ प्रतियोगिता की नहीं थी; यह उसके खुद पर, अपने सपनों पर, और अपनी मेहनत पर विश्वास की जीत थी।

उसके पिता ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा, “रामू, तुमने साबित कर दिया कि सच्ची जीत वो होती है जब इंसान खुद को हरा दे और अपने सपनों के लिए हर बाधा पार कर जाए।”

रामू की आँखों में आँसू थे, लेकिन वो आँसू हार के नहीं थे, बल्कि उन संघर्षों और कड़ी मेहनत के थे जो उसने इस दिन के लिए की थी। गाँव के लोग जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, आज गर्व से उसका नाम ले रहे थे।

तात्पर्य: “जीत सिर्फ दौड़ में सबसे तेज़ होने की नहीं होती; असली जीत वो होती है जब हम अपने संदेहों और सीमाओं को पार करके अपने सपनों को साकार करते हैं।”

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ગરુડ પુરાણ અને કર્મોના સિદ્ધાંત પર આધારિત એક સુંદર અને માહિતીપ્રદ લેખ અહીં પ્રસ્તુત છે:
મૃત્યુ પછી શું? ગરુડ પુરાણ અનુસાર આત્માની રહસ્યમય યાત્રા અને કર્મોનો ન્યાય
શું મૃત્યુ એ જીવનનો અંત છે? કે પછી એક નવી યાત્રાની શરૂઆત? આપણા શાસ્ત્રો, ખાસ કરીને ગરુડ પુરાણ, કહે છે કે મૃત્યુ એ માત્ર શરીરનો અંત છે, આત્માનો નહીં. આત્માની ખરી કસોટી તો મૃત્યુ પછી શરૂ થાય છે, જ્યાં માણસની ઓળખ તેના નામ કે હોદ્દાથી નહીં, પરંતુ તેના ‘કર્મો’ થી થાય છે.
વૈતરણી નદી અને યમદૂતોનું આગમન
શાસ્ત્રો અનુસાર, જ્યારે પ્રાણ શરીર છોડે છે ત્યારે યમદૂતો આત્માને લેવા આવે છે. આત્માને યમલોક લઈ જતી વખતે રસ્તામાં ‘વૈતરણી નદી’ આવે છે. એવું કહેવાય છે કે આ નદીમાં પાણી નહીં પણ લોહી અને પરુ વહે છે. જે મનુષ્યે જીવનમાં ગાયોની સેવા કરી હોય, દાન-પુણ્ય કર્યા હોય, તેમના માટે આ નદી પાર કરવી સરળ બને છે. ગાયનું પૂંછડું પકડીને આત્મા આ ભયાનક નદી પાર કરી શકે છે. પરંતુ પાપીઓ માટે આ નદી એક ડરામણું સ્વપ્ન બની જાય છે.
ચિત્રગુપ્તનો ચોપડો અને ન્યાય
યમરાજના દરબારમાં ચિત્રગુપ્ત દરેક જીવના પાપ અને પુણ્યનો હિસાબ રાખે છે. ત્યાં જૂઠ કે છળકપટ ચાલતું નથી. જો પાપોનું પલ્લું ભારે હોય, તો આત્માને શુદ્ધ કરવા માટે નરકની યાાતનાઓ ભોગવવી પડે છે. ગરુડ પુરાણમાં ૨૮ પ્રકારના નરક અને તેમાં મળતી સજાઓનું વર્ણન છે, જે સાંભળીને પણ કંપારી છૂટી જાય.
કેટલાક મુખ્ય નરક અને તેના કારણો:
૧. કુંભીપાક નરક (માતા-પિતાનો અનાદર):
જે લોકો પોતાના માતા-પિતાનું અપમાન કરે છે અથવા તેમને દુઃખ પહોંચાડે છે, તેમને આ નરકમાં સ્થાન મળે છે. અહીં ઉકળતા તેલમાં આત્માને યાતના આપવામાં આવે છે. શાસ્ત્રો માને છે કે માતા-પિતાના આંસુ આ નરકનું દ્વાર ખોલે છે.
૨. તામિસ્ત્ર અને અંધતામિસ્ત્ર (દગો અને વિશ્વાસઘાત):
જે લોકોએ બીજાની સંપત્તિ પચાવી પાડી હોય, છેતરપિંડી કરી હોય કે કોઈનો વિશ્વાસ તોડ્યો હોય, તેમને અહીં ગાઢ અંધકારમાં રાખવામાં આવે છે અને ભયાનક સજા આપવામાં આવે છે. ખાસ કરીને મિત્રો કે જીવનસાથી સાથે દગો કરનારાઓ માટે આ સજા નિર્ધારિત છે.
૩. રૌરવ નરક (ક્રૂરતા અને હિંસા):
જેમણે પોતાના સ્વાર્થ માટે નિર્દોષ જીવોની હત્યા કરી હોય કે બીજાને શારીરિક પીડા આપી હોય, તેમને અહીં બળતી જમીન પર ચાલવું પડે છે અને ‘રુરુ’ નામના ભયાનક જીવો તેમને કરડે છે.
૪. અસિપત્રવન (પાખંડ અને ખોટો ઉપદેશ):
જે લોકો ધર્મના નામે ધતિંગ કરે છે, લોકોને ખોટા રસ્તે દોરે છે, તેમને આ જંગલ જેવા નરકમાં મોકલવામાં આવે છે. અહીં ઝાડના પાંદડા તલવાર જેવા તીક્ષ્ણ હોય છે, જે શરીરને વીંધી નાખે છે.
૫. કૃમિભોજન (બીજાનું હક છીનવવું):
જે લોકો મહેનત વગર બીજાની કમાણી ખાઈ જાય છે અથવા કોઈનો હક મારે છે, તેમને કીડાઓથી ભરેલા કુંડમાં નાખવામાં આવે છે.
નિષ્કર્ષ: ડર નહીં, જાગૃતિ જરૂરી
ગરુડ પુરાણના આ વર્ણનોનો હેતુ મનુષ્યને ડરાવવાનો નથી, પરંતુ તેને સત્કર્મના માર્ગે વાળવાનો છે. આ વાતો આપણને શીખવે છે કે ‘જેવું વાવશો, તેવું લણશો’. જો આપણે આજે કોઈનું ભલું કરીએ, માતા-પિતાની સેવા કરીએ અને નીતિમત્તાથી જીવીએ, તો મૃત્યુ પછીની ગતિ સુધરી જાય છે.
જીવન એક અમૂલ્ય ભેટ છે. તેને બીજાના ભલા માટે અને ઈશ્વર સ્મરણમાં વિતાવવું એ જ સાચો ધર્મ છે. અંતે તો સાથે માત્ર ‘પુણ્ય’ જ આવવાનું છે.
જય શ્રી હરિ

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एक मेडिकल स्कूल में एक दिन प्रोफेसर ने एक छात्र से पूछा।

हमारी कितनी किडनी होते हैं।
छात्र ने जवाब दिया
चार

प्रोफेसर ने कहा
चार सच में

वो एक ऐसा प्रोफेसर था जिसे दूसरों की गलती दिखाना अच्छा लगता था। उसने अपने सहायक से कहा और थोड़ी घास ले आओ क्योंकि कमरे में  गधा है

छात्र ने कहा
और मेरे लिए एक कॉफी भी ले आओ
प्रोफेसर बहुत गुस्से में आ गया और छात्र को कक्षा से बाहर निकाल दिया। लेकिन वह छात्र कोई आम छात्र नहीं था। वह अपरिसियो टोरेल्ली अपोरेल्ली थे जिन्हें Baron of Itarare भी कहा जाता है। वह बहुत प्रसिद्ध हास्य लेखक थे।

जैसे ही वह बाहर जा रहे थे उन्होंने प्रोफेसर से कहा
आपने मुझसे पूछा कि हमारी कितने किडनी हैं। हमारी चार किडनी हैं दो मेरे हैं और दो आपकी।

हम का मतलब है दो से ज्यादा लोग। आप काफी मुझे पीने दीजिए और घास आपके लिए है।

इस तरह उन्होंने प्रोफेसर को जवाब दिया और यह दिखाया कि कभी कभी सही समय पर बुद्धिमानी और हाज़िरजवाबी सबसे बड़ा हथियार होती है।