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अक्टूबर 1993 में 40 से ज़्यादा पाकिस्तानी अफगान आतंकी मय हथियार, गोला बारूद, मशीन गन, राकेट लांचर, श्रीनगर की हज़रत बल दरगाह में घुस गए थे।

ये हज़रत बल दरगाह श्रीनगर में डल झील के किनारे एक बहुत बड़ी दरगाह है जहां कहा जाता है कि हुज़ूर का एक बाल रखा है…।

सो दरगाह के कारिंदों ने पुलिस को खबर की कि अंदर मौजूद आतंकियों ने हुज़ूर के बाल वाले कमरे और उस वॉल्ट के ताले बदल दिए हैं, जिसमें पवित्र बाल रखा है…।

केंद्र में पीवी नरसिंहाराव थे और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था… राज्यपाल थे सेवानिवृत्त जनरल केवी कृष्णा राव… उनके सुरक्षा सलाहकार थे सेवानिवृत्त जनरल एमए ज़की… उन्होंने तुरंत आदेश दिया BSF को… घेर लो… BSF ने घेरा डाल दिया।

दिल्ली अभी ऑपरेशन ब्लूस्टार को भूली नहीं थी… सुरक्षा विशेषज्ञ चाहते थे कि कमांडो कार्यवाही करके दरगाह को खाली करा लिया जाए… पर दिल्ली की जान सूख गयी… बाहर BSF। अंदर आतंकी और उनके साथ 100 से ज़्यादा आम लोग…

सरकार ने कमांडो ऑपरेशन की इजाज़त न दी… सरकार की ओर से एक वरिष्ठ नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह को मध्यस्थ बना के अंदर भेजा गया, आतंकियों के सामने घुटने टेक गिड़गिड़ाने के लिये कि ‘प्लीज भाई लोग, आत्मसमर्पण कर दो’… वो नहीं माने… उन्होंने कहा, ‘आम लोगों को तो छोड़ दो’… आतंकियों ने कहा, ‘हाँ इनको ले जाओ’… पर आम लोगों ने बाहर आने से मना कर दिया…

फौजी सलाहकारों ने दूसरा विकल्प सुझाया, वो जो वो 1988 में स्वर्ण मंदिर में ही ऑपरेशन ब्लैक थंडर में आजमा चुके थे… उस वक़्त उन्होंने जून महीने में स्वर्ण मंदिर घेर लिया था और बिजली पानी काट दी और शौचालय भी घेर लिए थे…

फौजी बोले यही रणनीति अपनाओ यहां भी… सरकार ने दो एक दिन बिजली पानी काटी भी… पर फिर बाद में डर गयी… घेरा डाले हफ्ता बीत गया था… तभी कश्मीरी, राज्य भर में हज़रत बल में नमाज़ पढ़ने को मचलने लगे… सड़कों पे प्रदर्शन होने लगे…

ऐसे ही एक प्रदर्शन में बीजबेहड़ा नामक कस्बे में BSF ने फायरिंग कर दी और 37 आदमी मारे गए, 75 घायल… सरकार की और दम निकल गयी… हज़रत बल से BSF हटा के सेना लगा दी गयी… सरकार को डर था कि BSF कहीं विद्रोह कर खुद ही न घुस जाए हज़रत बल में…

अंदर से आतंकियों ने खबर भेजी कि हमारे पास राशन पानी नहीं है… आमलोग भूखे प्यासे मरेंगे तो तुम जिम्मेदार होगे… काँग्रेस सरकार एकदम आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गयी… बिरयानी बना के भेजी गयी… फौज ने विरोध किया… ये क्या तमाशेबाज़ी है… बिरयानी ही भेजनी है तो घेराबंदी का क्या मतलब?

उधर आतंकियों ने बिरयानी अस्वीकार कर दी… सरकारी बिरयानी नहीं खाएंगे…

वजाहत हबीबुल्लाह ने पूछा, किसने बनाई थी बिरयानी?

बताया गया कि किसी सरकारी मेस में बनी थी…

श्रीनगर के सबसे महंगे 5 स्टार होटल से बिरयानी मंगाई गयी और श्रीनगर के कुछ हुर्रियत छाप संगठन अंदर बिरयानी ले के गए तो नव्वाब साहेब ने बिरयानी खाई…

फिर यही सिलसिला हफ्ता भर चला… उस होटल की एक वैन में पतीला भर भर बिरयानी जाती दिन में 3 बार… साथ में बिस्लरी की बोतलें… बाकायदे कंबल रजाई भेजी गयी… इस बीच शांति वार्ता भी चलती रही…

इधर फौज ने कहा कि इजाज़त दो तो इसी बिरयानी वाली गाड़ी में ही 20 कमांडो भेज दें, 10 मिनट में काम तमाम कर देंगे… पर बुज़दिल काँग्रेस सरकार नहीं मानी… उधर बीजबेहड़ा फायरिंग के कारण बवाल मचा था पूरी घाटी में…

अंततः सरकार ने नव्वाब साहब लोगों को फ्री पैसेज पेशकश किया… बोली ‘आपको हम रिहा करते हैं… हथियार छोड़ पैदल निकल जाओ’… उन्होंने कहा, ‘ना… हथियार तो ले के जाएंगे’… सरकार उस पर भी मान गयी…

अंत में 15 दिन की घेराबंदी के बाद वो 40 पाकिस्तानी–अफगान आतंकी हमारी फौज के सामने से AK 47 लहराते हुए पैदल ही निकले और श्रीनगर की गलियों में गुम हो गए… जब निकले तब भी सेना ने कहा, अब ठोक देते हैं सालों को… पर दिल्ली बोली ‘नहीं… वादा खिलाफ़ी हो जाएगी’…

इस तरह इन काँग्रेसियों ने 40 पाकिस्तानी आतंकियों को 15 दिन दामाद की तरह पाला और फिर सेफ पैसेज दे दिया…

राहुल गांधी इतिहास मत कुरोदों वरना बहुत से कंकाल हैं आपकी अलमारी में… वन्देमातरम्

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दुर्योधन की पत्नी का नाम भानुमति था। कहा जाता है कि “कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा” मुहावरा भी उनके नाम से जुड़ा है।

भानुमति काम्बोज के राजा चन्द्रवर्मा की पुत्री थीं उनके विवाह के लिए राजा ने भव्य स्वयंवर का आयोजन किया था।

स्वयंवर में शिशुपाल, जरासंध, रुक्मी, वक्र, दुर्योधन और कर्ण सहित अनेक पराक्रमी राजा उपस्थित थे राजदरबार वीरों और राजाओं से भरा हुआ था।

जब भानुमति हाथ में वरमाला लेकर सभा में आईं, तो सभी की निगाहें उन पर टिक गईं वे एक-एक राजा के सामने से गुजरती हुई आगे बढ़ती रहीं।

दुर्योधन चाहता था कि भानुमति उसे वरमाला पहनाएँ लेकिन भानुमति उसके सामने से बिना रुके आगे निकल गईं।

तभी दुर्योधन ने आगे बढ़कर भानुमति के हाथ से माला झपट ली उसने स्वयं ही वह माला अपने गले में डाल ली।

यह दृश्य देखकर अन्य राजाओं ने क्रोध में तलवारें निकाल लीं सभा में युद्ध का वातावरण बन गया।

दुर्योधन ने कर्ण को युद्ध के लिए आगे किया कर्ण ने सभी प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर दुर्योधन की प्रतिष्ठा बचा ली।

भानुमति को हस्तिनापुर लाया गया दुर्योधन ने अपने कृत्य को भीष्म पितामह के उदाहरण से उचित ठहराया।

उसने कहा कि जैसे भीष्म ने अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का हरण किया था, वैसे ही उसने भी किया है इस तर्क से भानुमति ने विवाह स्वीकार कर लिया।

दुर्योधन और भानुमति के दो संतान हुए उनके पुत्र का नाम लक्ष्मण और पुत्री का नाम लक्ष्मणा था।

लक्ष्मण का वध महाभारत युद्ध में अभिमन्यु ने किया था लक्ष्मणा का विवाह श्रीकृष्ण की पत्नी जामवंती के पुत्र साम्ब से हुआ।

कहते हैं कि भानुमति और कर्ण के बीच गहरी मित्रता थी दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे और मित्रवत व्यवहार रखते थे।

एक बार कर्ण और भानुमति शतरंज खेल रहे थे खेल में कर्ण जीत की ओर बढ़ रहा था तभी भानुमति ने दुर्योधन को आते हुए देखा वह सम्मान में उठने लगीं।

कर्ण को दुर्योधन के आने का पता नहीं था उसने समझा कि भानुमति हार से बचने के लिए उठ रही हैं।

कर्ण ने उन्हें बैठाने के लिए हाथ बढ़ाया उसी दौरान भानुमति की मोतियों की माला टूटकर बिखर गई।

इतने में दुर्योधन कक्ष में प्रवेश कर चुका था भानुमति और कर्ण दोनों आशंकित हो उठे।

उन्हें लगा कि कहीं दुर्योधन गलत अर्थ न निकाल ले परंतु दुर्योधन को कर्ण पर पूर्ण विश्वास था।

उसने शांत स्वर में कहा कि मोती समेट लो फिर वह अपने कार्य की चर्चा करने लगा।

एक अन्य कथा के अनुसार कर्ण ने भानुमति का आंचल पकड़ लिया था इससे उनका आंचल फट गया और मोती बिखर गए।

दोनों अत्यंत लज्जित हो गए थे उन्हें भय था कि अब दुर्योधन क्या सोचेंगे।

लेकिन दुर्योधन ने मुस्कुराकर कहा कि क्या मोती ऐसे ही पड़े रहेंगे वह स्वयं उन्हें समेटने में सहायता करने लगे।

भानुमति अत्यंत सुंदर और बुद्धिमती थीं वे शारीरिक रूप से भी काफी सबल मानी जाती थीं।

कहते हैं कि वे खेल-खेल में दुर्योधन से कुश्ती करती थीं कई बार दुर्योधन उनसे हार भी जाता था।

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#वृष्णि_वंश के प्रमुख पांच दिव्य पुरुष
यह जानकारी आपको किसी भी पब्लिक प्लेटफॉर्म पर नहीं मिलेगी.. 🙏🏼

🕉️ 1. #श्रीकृष्ण
जन्म: मथुरा में, देवकी और वसुदेव के यहाँ।

पालन-पोषण: गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के सान्निध्य में।

मुख्य कार्य: कंस वध, गोवर्धन धारण, महाभारत में अर्जुन को गीता का उपदेश।

स्वरूप: भगवान विष्णु के पूर्णावतार माने जाते हैं।

विशेषता: नीति, भक्ति, प्रेम और धर्म स्थापना के प्रतीक।

महाभारत में भूमिका: पांडवों के सारथी और मार्गदर्शक।

🕉️ 2. #बलराम
माता-पिता: वसुदेव और रोहिणी।

स्वरूप: शेषनाग के अवतार माने जाते हैं।

प्रतीक: हल (हलधर) और मूसल धारण करते थे।

स्वभाव: अत्यंत बलशाली, सरल और धर्मप्रिय।

महाभारत काल: युद्ध में तटस्थ रहे, किन्तु भीम और दुर्योधन दोनों को गदा-विद्या सिखाई।

🕉️ 3. #प्रद्युम्न
माता: रुक्मिणी।

स्वरूप: कामदेव का पुनर्जन्म माने जाते हैं।

कथा: जन्म के बाद शंबरासुर द्वारा अपहृत, बाद में पत्नी मायावती (रति) की सहायता से शंबरासुर का वध।

विशेषता: अत्यंत रूपवान और वीर योद्धा।

🕉️ 4. #साम्ब
माता: जाम्बवती।

स्वभाव: शरारती और अभिमानी।

प्रसिद्ध कथा: ऋषियों का उपहास करने के कारण यदुवंश के विनाश का शाप मिला।

परिणाम: साम्ब के कारण उत्पन्न लौह मूसल से यदुवंश का अंत हुआ।

🕉️ 5. #अनिरुद्ध
पिता: प्रद्युम्न।

कथा: बाणासुर की पुत्री उषा से विवाह।

विशेष प्रसंग: बाणासुर से युद्ध, जिसमें श्रीकृष्ण ने बाणासुर को पराजित किया।

महत्व: वृष्णि वंश की परंपरा को आगे बढ़ाया।

🔱 पारिवारिक क्रम
******************

श्रीकृष्ण → प्रद्युम्न → अनिरुद्ध
श्रीकृष्ण → साम्ब
श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता → बलराम

#वंश_वृक्ष 👇🏼

वसुदेव
                    │
     ┌──────────────┴──────────────┐
     │                             │
बलराम        श्रीकृष्ण
                                      │
        ┌───────────────┬───────────────┐
        │                               │
प्रद्युम्न              साम्ब
        │
अनिरुद्ध
        │
     (अनिरुद्ध का विवाह बाणासुर की पुत्री उषा से)

✍🏼 Raaj Singh ©

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इमरान ख़ान नियाज़ी अपने ज़माने में मशहूर लड़की@बाज़ आदमी था- बेनज़ीर भुट्टो से लेके अनेक बॉलीवुड हीरोइन, ब्रिटिश लड़कियां आदि को अपने जाल में फँसाने वाला इमरान अपने पहले निकाह से पहले कुछ अमीर ब्रिटिश गोरी लड़कियों को भी गुमराह कर चुका था। मसलन एक टीवी होस्ट को इसने इतना बड़ा झांसा दिया था कि वो उससे निकाह करेगा। निकाह की शर्त थी कि वो लड़की अपना मजहब बदले- और उसने बदला भी। किंतु ख़ान ने इस से निकाह नहीं किया- बस मजहब तब्दील करवा कर पत्ता साफ़ कर दिया।

९२ के वर्ल्ड कप जीत के बाद इमरान ने सीटा वाइट से भी नाता जोड़ा और एक लड़की पैदा की। ख़बरें कहती है वाइट की इस लड़की को इमरान ख़ान ने अपनाया नहीं, अपना नाम नहीं दिया। सीटा वाइट ने अदालती कार्यवाही की- अनेक टेस्ट गवाही आदि के बाद अदालत ने माना कि इमरान ख़ान इस बच्ची का अब्बा है। किंतु ख़बरों में इस लड़की के बारे में कुछ और नहीं ज्ञात होता। आज जानिये सीटा वाइट की कहानी!

सीटा वाइट लंदन के एक बड़े रईस लार्ड वाइट की बेटी थी। लार्ड वाइट सत्तर के दशक में अमेरिका आ गया और इधर वो अरबपति व्यापारी था। लार्ड ने तीन विवाह किए थे। सीटा वाइट उसकी पहली पत्नी की संतान थी।

लार्ड वाइट अपने बुढ़ापे में एक बार बीमार पड़ा और लॉस एंजिलस के एक अस्पताल में भर्ती था। बीमारी के दौरान एक नर्स ने उसकी देखभाल की और इसी दौरान लार्ड वाइट ने नर्स की जवान सुंदर मॉडल बेटी से तीसरा विवाह कर लिया। लार्ड वाइट की ये तीसरी बेटी उससे चालीस साल छोटी थी, और सीटा वाइट से भी चार साल छोटी।

लंदन अमेरिका आदि में इमरान ख़ान सीटा वाइट से पींगे बढ़ाता रहा और इस दौरान सीटा वाइट को एक लड़की हुई। लड़की को अपनाने से इनकार करने के बाद सीटा वाइट ने कैलिफ़ोर्निया कोर्ट का सहारा लिया- लंबी लड़ाई लड़ी और अपनी बेटी का बाप इमरान को साबित करवाया। किंतु इमरान ने अपनी बेटी को अपना नाम देने से साफ़ मना कर दिया।

सीटा वाइट अपनी अबोध बच्ची के साथ कैलिफोर्निया में रहती थी- और इसी दौरान उसका पिता लार्ड वाइट खोदा को पियारा हो गया। और अब इधर से उसकी सम्पत्ति को लेके बवाल मचा।

लार्ड वाइट की पहली दो बीवियों की संतानों और तीसरी बीवी के बीच दौलत जायदाद को लेके बड़ी भसड़ मची। सीटा वाइट को केवल एक मकान मिला- अधिकांश सम्पत्ति तीसरी बीवी ले गई।

सीटा वाइट ने इसी दौरान अर्जेंटीना मूल के एक वेटर से विवाह कर लिया- जो उसे मारता था। और फिर बरस 2004 में जब सीटा वाइट मात्र 42 साल की थी- अचानक से एक दिन मृत मिली। मौत कर कारण लंग फेलियर था। उसके जनाजे में कोई नहीं आया- ना सौतेली माँ, ना सौतेले भाई बहन – कोई नहीं: उसके वेटर पति ने उसका अंतिम संस्कार किया।

सीटा वाइट की मौत के समय इमरान ख़ान की बेटी केवल बारह साल की थी। इस समय इमरान ख़ान जेमिमा गोल्डस्मिथ से विवाह कर चुका था। बेचारी अनाथ लड़की को लार्ड वाइट के रिश्तेदार लंदन ले आए जिधर जेमिमा ने उसकी देखरेख की – उसे अपने शौहर की औलाद बताया।

किंतु इमरान ख़ान ने कभी भी इस लड़की को अपनी औलाद नहीं माना। सारा ज़माना मानता था ये लड़की उसकी औलाद है- कोर्ट ने माना, डीएनए टेस्ट ने साबित किया, जेमिमा ने माना, इमरान के दोनों लड़कों ने उसे अपनी बहन माना बस- इमरान ख़ान ने नहीं माना।

आज ये लड़की लंदन में रहती है- इसे आज भी अपने अब्बा का नाम नहीं मिला।

आज इमरान ख़ान लगभग अंधा हो चुका है। कर्मों का फल उसे इसी जीवन में मिल चुका है!

Mann ji bhai

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सन्त तुकाराम की पत्नी छतपर खड़ी देख रही थी कि उसके पति गन्ने का एक झारा लिये आ रहे हैं। वह नीचे आकर उनकी प्रतीक्षा करने लगी।

तुकाराम के हाथ में केवल एक गन्ना देखकर वह आपे से बाहर हो गायी, उसने खींचकर गन्ना तुकाराम की पीठ पर जड़ दिया। तुकाराम अचानक के प्रहार से देहली की चौखट से टकरा गये, सिर से खून बहने लगा।

खून पोंछकर उठकर बोले- ‘हे दयामयी ! तू कितनी अच्छी है, जिस गन्ने को तोड़ने की जहमत मुझे उठानी पड़ती, उसके दो टुकड़े तूने कर दिये, ले एक तू खा, एक मैं खाऊँ।’

रावणका पद-प्रहार सहकर भी विभीषण ने इतना ही कहा-आप मेरे पिता के समान हैं, आप राम की शरण में जाकर ही चैन से रह सकेंगे।

भृगुने भगवान् विष्णु को छातीपर पद-प्रहार किया, परंतु विष्णु उनका पैर सहलाने लगे, कहा- ऋषिवर ! मेरी छाती तो वज्र के समान है, आपके पैर कोमल हैं, चोट लग गयी होगी।

भगवान् बुद्ध को जब एक व्यक्ति ने आधे घण्टे तक गालियाँ दीं तो वे बोले- मुझे दूसरे गाँव जाना है। यदि और गालियाँ बच गयी हों, तो कल मैं यहीं पर इसी समय आऊँगा, आदमी पानी-पानी हो गया।

रामकृष्ण परमहंस एक भक्त के यहाँ भोजन के लिये निमन्त्रित थे, किंतु बहुत देर तक भी जब उस व्यक्ति ने उनकी सार-सम्हाल नहीं की, तो उनके साथी ने कहा- चलिये महाराज ! यहाँ से चलते हैं, परमहंस बोले- इतनी रात को खाना कहाँ खाऊँगा, तिस पर गाड़ीका किराया तीन रुपया कहाँ से दूँगा, इतने में ही भक्तको अपनी गलती का अहसास हुआ, वह दौड़ा हुआ आया और क्षमा-याचना की। रामकृष्ण हँसने लगे।

रमण महर्षि के आश्रममें कुछ चोरों ने आकर महर्षि की पिटाई की और धन सम्प्पति बताने को कहा। सुबह पुलिस के पूछने पर वे इतना ही बोले- कुछ नादान रात में को आये थे। हसते हुए बोले- उन्होंने मेरी पूजा भी की, किंतु मुझे उनके प्रति कोई शिकायत नहीं

सन्त एकनाथ गोदावरी में स्नान किया करते थे, इससे चिढ़कर एक पठान ने उनके ऊपर एक सौ आठ बार थूका। सन्त ने कहा आज गोदावरी में स्नान का खूब अवसर मिला। पठानने लज्जित होकर क्षमा माँगी।

दक्षिण के सन्त तिरुवल्लुवर को धोती की गाँठ ले जाते देखकर एक उद्दण्ड युवकने आवाज लगायी। ऐ बूढ़े ! क्या है गाँठमें?

सन्तने कहा धोतियाँ हैं, दिखा, एक की कीमत क्या है? बीस रुपये, उसने धोती के दो टुकड़े कर दिये। पूछा अब ? दस रुपये, वह टुकड़े करता रहा और सन्त शान्ति से कीमत बताते रहे। सन्त की शान्तिने युवक को रुला दिया, उसने सन्त से क्षमा माँगी।

सुकरात पत्नी के भुनभुनानेके बाद भी जब अपनी मित्रमण्डली से बात करना बन्द नहीं किये, तो पत्नी ने गन्दा पानी उन पर उड़ेल दिया। सन्त।ने हँसते हुए कहा- गरजने के पश्चात् बादल बरसते भी हैं, मित्रमण्डली हक्की-बक्की रह गयी। उन्होंने सन्त की महानताका परिचय पाया।

एकनाथ महाराज के गाँव में एक बार शर्त लगी कि जो कोई महाराज।को क्रोध दिला देगा, उसे दो सौ रुपये मिलेंगे। दूसरे दिन एक व्यक्ति नाथ के घर जाकर उनकी पत्नी की गोदी में चढ़कर बैठ गये।

महाराज पूर्ववत् भजन करते रहे। थोड़ी देर में उनकी पत्नी गिरिजाबाई दीपक में घी डालने को झुकीं कि वह व्यक्ति उछलकर उनकी पीठ पर सवार हो गया। नाथ ने कहा-देखना, इसको, कहीं गिर न पड़े, चोट न लग जाय। पत्नी ने जवाब दिया- आप बेफिक्र रहें। मुझे हरि पण्डित (पुत्र)-को इस तरह पीठ पर लादे-लादे कार्य करने।का अभ्यास है, व्यक्ति शर्मिन्दा होकर भाग खड़ा हुआ।

कहते हैं कि अक्रोधी मानवों के शरीर से ताजे गुलाब-सी भीनी-भीनी गन्ध निकलती रहती है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ऐसे ही महामानव थे। धरा ऐसे सन्त-महापुरुषोंको पाकर सनाथ होती है।

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रोम में एक सम्राट ने अपने बड़े वजीर को फांसी की आज्ञा दे दी थी। उस दिन उसका जन्म—दिन था, वजीर का जन्म—दिन था। घर पर मित्र इकट्ठे हुए थे। संगीतज्ञ आए थे, नर्तक थे, नर्तकियां थीं। भोज का आयोजन था, जन्म—दिन था उसका। कोई ग्यारह बजे दोपहर के बाद सम्राट के आदमी आए। वजीर के महल को नंगी तलवारों ने घेरा डाल दिया। भीतर आकर दूत ने खबर दी कि आपको खबर भेजी है सम्राट ने कि आज शाम छह बजे आपको गोली मार दी जाएगी।
उदासी छा गई। छाती पीटी जाने लगीं। वह घर जो नाचता हुआ घर था एकदम से मुर्दा हो गया, सन्नाटा छा गया, नृत्य, गीत बंद हो गए, वाद्य शून्य हो गए। भोजन का पकना, बनना बंद हो गया। मित्र जो आए थे वे घबड़ा गए। घर में एकदम उदासी छा गई। सांझ छह बजे, बस सांझ छह बजे आज ही मौत! सोचा भी नहीं था कि जन्म—दिन मृत्यु का दिन बन जाएगा।
लेकिन वह वजीर, वह जिसकी मौत आने को थी, वह अब तक बैठा हुआ नृत्य देखता था। अब वह खुद उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि वाद्य बंद मत करो और अब नृत्य देखने से ही न चलेगा, अब मैं खुद भी नाचूंगा। क्योंकि आखिरी दिन है यह। फिर इसके बाद कोई दिन नहीं है। और सांझ को अभी बहुत देर है। और चूंकि यह आखिरी सांझ है, अब इसे उदासी में नहीं गंवाया जा सकता। अगर बहुत दिन हमारे पास होते तो हम उदास भी रह सकते थे। वह लक्जरी भी चल सकती थी। अब अवसर न रहा, अब उदास होने के लिए क्षण भर का अवसर नहीं है। बजने दो वाद्य, हो जाए नृत्य शुरू। आज हम नाच लें, आज हम गीत गा लें, आज हम गले मिल लें, क्योंकि यह दिन आखिरी है।
लेकिन वह घर तो हो गया था उदास। वे वाद्यकार हाथ उठाते भी तो वीणा न बजती। उनके हाथ तो हो गए थे शिथिल। वे चौंक कर देखने लगे। वह वजीर कहने लगा, बात क्या है? उदास क्यों हो गए हो?
वे कहने लगे कि कैसे, मौत सामने खड़ी है, हम कैसे खुशी मनाए?
तो उस वजीर ने कहा जो मौत को सामने देख कर खुशी नहीं मना सकता वह जिंदगी में कभी खुशी नहीं मना सकता। क्योंकि मौत रोज ही सामने खड़ी है। मौत तो रोज ही सामने खड़ी है। कहां था पक्का यह कि मैं सांझ नहीं मर जाऊंगा? हर सांझ मर सकता था। हर सुबह मर सकता था। जिस दिन पैदा हुआ उस दिन से ही किसी भी क्षण मर सकता था। पैदा होने के बाद अब एक ही क्षण था मरने का जो कभी भी आ सकता था। मौत तो हर दिन खड़ी है। मौत तो सामने है। अगर मौत को सामने देख कर कोई खुशी नहीं मना सकता तो वह कभी खुशी नहीं मना सकता। और वह वजीर कहने लगा, और शायद तुम्हें पता नहीं है, जो मौत के सामने खड़े होकर खुशी मना लेता है उसके लिए मौत समाप्त हो जाती है। उससे मौत हार जाती है, जो मौत के सामने खड़े होकर हंस सकता है।
मजबूरी थी। वह वजीर तो नाचने लगा तो वाद्य—गीत शुरू हुए थके और कमजोर हाथों से। नहीं, सुर— साज नहीं बैठता था। उदास थे वे लोग, लेकिन फिर भी जब वह नाचने लगा था…।
सम्राट को खबर मिली, वह देखने आया। इसकी तो कल्पना भी न थी। जान कर ही जन्म—दिन के दिन यह खबर भेजी गई थी कि कोई गहरा बदला चुकाने की इच्छा थी कि जब सब खुशी का वक्त होगा तभी दुख की यह खबर गहरा से गहरा आघात पहुंचा सकेगी। जब सारे मित्र इकट्ठे होंगे तभी यह खबर— यह बदले की इच्छा थी।
लेकिन जब दूतों ने खबर दी कि वह आदमी नाचता है और उसने कहा है कि चूंकि सांझ मौत आती है इसलिए अब यह दिन गंवाने के लायक न रहा, अब हम नाच लें, अब हम गीत गा लें, अब हम मिल लें। अब जितना प्रेम मैं कर सकता हूं कर लूं और जितना प्रेम तुम दे सकते हो दे लो, क्योंकि अब एक भी क्षण खोने जैसा नहीं है।
सम्राट देखने आया। वजीर नाचता था। धीरे— धीरे, धीरे— धीरे उस घर की सोई हुई आत्मा फिर जग गई थी। वाद्य बजने लगे थे, गीत चल रहे थे।
सम्राट देख कर हैरान हो गया! वह उस वजीर से पूछने लगा, तुम्हें पता चल गया है कि सांझ मौत है और तुम हंस रहे हो और गीत गा रहे हो?
तो उस वजीर ने कहा. आपको धन्यवाद! इतने आनंद से मैं कभी भी न भरा था जितना आज भर गया हूं और आपकी बड़ी कृपा कि आपने आज के दिन ही यह खबर भेजी। आज सब मित्र मेरे पास थे, आज सब वे मेरे निकट थे जो मुझे प्रेम करते हैं और जिन्हें मैं प्रेम करता हूं। इससे सुंदर अवसर मरने का और कोई नहीं हो सकता था। इतने निकट प्रेमियों के बीच मर जाने से बड़ा सौभाग्य और कोई नहीं हो सकता था। आपकी कृपा, आपका धन्यवाद! आपने बड़ा शुभ दिन चुना है, फिर मेरा यह जन्म—दिन भी है। और मुझे पता भी नहीं था—बहुत जन्म—दिन मैंने मनाए हैं, बहुत सी खुशियों से गुजरा हूं लेकिन इतने आनंद से भी मैं भर सकता हूं इसका मुझे पता नहीं था। यह आनंद की इतनी इंटेंसिटी, तीव्रता हो सकती है मुझे पता नहीं था। आपने सामने मौत खड़ी करके मेरे आनंद को बड़ी गहराई दे दी। चुनौती और आनंद एकदम गहरा हो गया। आज मैं पूरी खुशी से भरा हुआ हूं मैं कैसे धन्यवाद करूं?
वह सम्राट अवाक खड़ा रह गया। उसने कहा कि ऐसे आदमी को फांसी लगाना व्यर्थ है, क्योंकि मैंने तो सोचा था कि मैं तुम्हें दुखी कर सकूंगा। तुम दुखी नहीं हो सके, तुम्हें मौत दुखी नहीं कर सकती तो तुम्हें मौत पर ले जाना व्यर्थ है। तुम्हें जीने की कला मालूम है, मौत वापस लौट जाती है।
जिसे भी जीने की कला मालूम है वह कभी भी नहीं मरा है और न मरता है, न मर सकता है। और जिसे जीने की कला मालूम नहीं वह केवल भ्रम में होता है कि मैं जी रहा हूं वह कभी नहीं जीता, न कभी जीआ है, न जी सकता है। उदास आदमी जी ही नहीं रहा है, न जी सकता है। उसे जीवन की कला का ही पता नहीं। केवल वे जीते हैं जो हंसते हैं, जो खुश हैं, जो प्रफुल्लित हैं, जो जीवन के छोटे से छोटे कंकड़—पत्थर में भी खुशी के हीरे—मोती खोज लेते हैं, जो जीवन के छोटे—छोटे रस में भी परमात्मा की किरण को खोज लेते हैं, जो जीवन के छोटे—छोटे आशीषों में, जीवन के छोटे—छोटे आशीषों की वर्षा में भी प्रभु की कृपा का आनंद अनुभव कर लेते हैं। केवल वे ही जीते हैं। केवल वे ही जीते हैं! केवल वे ही सदा जीए हैं और कोई भी आदमी जिंदा होने का हकदार नहीं है—जिंदा नहीं है।

ओशो, प्रभु की पगडंडिया (प्रवचन-6)

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प्रसिद्ध “सूत जी” कौन थे ?

यदि आपने हिन्दू धर्म के किसी भी धर्मग्रन्थ या व्रत कथाओं को पढ़ा है तो आपके सामने पौराणिक “सूत जी” का नाम अवश्य आया होगा। कारण ये है कि सूत जी कदाचित हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्ध वक्ता हैं। कारण ये कि पुराणों की कथा का प्रसार जिस स्तर पर उन्होंने किया है वैसा किसी और ने नहीं किया। किन्तु ये “सूत जी” वास्तव में हैं कौन?

सूत जी का वास्तविक नाम “रोमहर्षण” था। उन्हें लोमहर्षण भी कहते हैं। उनका रोमहर्षण नाम इसीलिए पड़ा क्यूंकि उनका सत्संग पाकर श्रोताओं का रोम-रोम हर्ष से भर जाता था। उन्हें सूत जी इसीलिए कहते हैं क्यूंकि वे सूत समुदाय से थे। उनकी माता ब्राह्मणी और पिता क्षत्रिय थे जिस कारण वे सूत के रूप में जन्में। हालाँकि पुराणों की एक अन्य कथा के अनुसार उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था।

एक बार सम्राट पृथु ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया जिसके अंत में सभी देवताओं को हविष्य दिया जा रहा था। ब्राह्मणों ने भूल से देवराज इंद्र को अर्पित किये जाने वाले सोमरस में देवगुरु बृहस्पति के हविष्य का अंश मिला दिया। जब उस हविष्य को अग्नि में डाला गया तो उसी से रोमहर्षण की उत्पत्ति हुई। चूँकि उनका जन्म इंद्र (क्षत्रिय गुण) और बृहस्पति (ब्राह्मण गुण) के मेल से हुआ था, इसलिए उन्हें “सूत” माना गया।

जब महर्षि वेदव्यास ने महापुराणों की रचना की तो उनके मन में चिंता हुई कि इस ज्ञान को कैसे सहेजा जाये। उनके कई शिष्य थे किन्तु कोई भी उन सभी १८ पुराणों को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए। जब सूत जी किशोरावस्था में पहुंचे तो एक योग्य गुरु की खोज करते हुए महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे। आज ये माना जाता है कि सूत कुल के व्यक्ति को वेदाभ्यास का अधिकार नहीं था, ये बिलकुल गलत है। क्यूंकि महर्षि वेदव्यास ने रोमहर्षण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।

उनके आश्रम में सूत जी की विशेष रूप से वेदव्यास के एक अन्य शिष्य शौनक ऋषि से घनिष्ठ मित्रता हो गयी। ये दोनों महर्षि व्यास के सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक माने जाते हैं। रोमहर्षण ने अपनी प्रतिभा से व्यास रचित सभी १८ महापुराणों को कंठस्थ कर लिया। ये देख कर व्यास मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रोमहर्षण से उस अथाह ज्ञान का प्रसार करने को कहा।

तत्पश्चात रोमहर्षण ने अपने गुरु महर्षि व्यास से अपने पुत्र उग्रश्रवा को उनका शिष्य बनाने का अनुरोध किया। उग्रश्रवा अपने पिता के समान ही तेजस्वी थे जिसे देख कर व्यास जी ने उन्हें भी अपना शिष्य बना लिया। रोमहर्षण सभी वेद पुराणों का अध्ययन तो कर ही चुके थे, वे और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमपिता ब्रह्मा की तपस्या की। ब्रह्मदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें अलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण कर दिया।

रोमहर्षण ने उनसे पूछा कि मुझे अपने गुरु से सभी पुराणों का ज्ञान प्राप्त हुआ है और आपने भी मुझे अलौकिक ज्ञान प्रदान किया है। अब मैं किस प्रकार इस ज्ञान का प्रसार करूँ? इस पर ब्रह्मदेव ने उन्हें एक दिव्य चक्र दिया और कहा कि इसे चलाओ और जिस स्थान पर ये रुक जाये वही अपना आश्रम स्थापित कर इस ज्ञान का प्रसार करो।

ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर रोमहर्षण ने उस चक्र को चलाया और वो जाकर “नैमिषारण्य” नामक स्थान पर रुक गया जो ८८००० तपस्वियों का स्थल था। इसी स्थल पर भगवान विष्णु ने निमिष (आंख झपकने में लगने वाला समय) भर में सहस्त्रों दैत्यों का संहार कर दिया था। इसी कारण उस प्रदेश का नाम नैमिषारण्य पड़ा। उसी पवित्र तीर्थ में रोमहर्ष ने अपना आश्रम स्थापित किया और प्रतिदिन सत्संग करने लगे।

कहा जाता है कि उनकी कथा कहने की शैली इतनी रोचक थी कि मनुष्य तो मनुष्य, जीव-जंतु भी उसे सुनने के लिए वहां आ जाते थे। उसी स्थान पर वे “सूत जी” के नाम से प्रसिद्ध हुए। उधर उनके पुत्र उग्रश्रवा भी महर्षि व्यास से शिक्षा लेकर पारंगत हो गए। उन्होंने अपने पिता से भी अधिक शीघ्रता से समस्त पुराणों का अध्ययन कर लिया और वे अपने पिता की भांति ही उस ज्ञान का प्रसार करने लगे।

एक बार नैमिषारण्य के सभी ८८००० ऋषियों ने महर्षि व्यास से ये अनुरोध किया कि वे उन्हें सभी महापुराणों की सम्पूर्ण कथाओं से अवगत कराएं। ये सुनकर महर्षि व्यास ने कहा कि इसके लिए आपको मेरी क्या आवश्यकता है? नैमिषारण्य में मेरे शिष्य रोमहर्षण हैं जो इन सभी कथाओं को सुना सकते है। आप सभी उन्हें “व्यास पद” पर आसीन कर पुराणों का ज्ञान प्राप्त करें। इस पर ऋषियों ने पूछा कि एक सूत को व्यास पद पर कैसे बिठाया जा सकता है? ये सुनकर महर्षि ने सभी को तत्वज्ञान दिया और बताया कि योग्यता जन्म से नहीं बल्कि कर्म से आती है।

ये सुनकर सभी ८८००० ऋषि नैमिषारण्य लौटे और सूत जी को व्यास गद्दी पर बिठा कर पुराणों का ज्ञान देने का अनुरोध किया। इसपर सूत जी ने १२ वर्षों का विशाल यज्ञ सत्र आयोजित किया जिसे सुनने उनके बाल सखा शौनक जी भी पधारे और यजमान का पद ग्रहण किया। सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व पर उनसे प्रश्न करते थे और सूत जी उत्तर देते थे। ऐसा कहते हुए बहुत समय बीत गया और सूत जी ने १० पुराणों की कथा समाप्त कर ११वां पुराण आरम्भ किया।

उधर महाभारत का युद्ध का समाचार सुनकर भगवान बलराम तीर्थ यात्रा पर निकले। घूमते हुए वे नैमिषारण्य पहुंचे जहाँ सूत जी का यज्ञ सत्र चल रहा था। जैसे ही सभी ऋषियों ने बलराम जी को देखा तो सभी अपने स्थान पर खड़े होकर उनका अभिवादन करने लगे और उन्हें आसन दिया। किन्तु सूत जी व्यास गद्दी पर बैठे होने के कारण ईश्वर के अतिरिक्त किसी और के सम्मान में खड़े नहीं सकते थे। उन्होंने बलराम के आने पर थोड़ी देर के लिए कथा को भी विश्राम दिया।

जब बलराम ने ये देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि इतने बड़े-बड़े महर्षियों ने यहाँ मेरा स्वागत किया किन्तु सूत कुल में जन्मे इस व्यक्ति ने मेरा अपमान किया। यही सोच कर उन्होंने बैठे बैठे ही एक घास को मंत्रसिद्ध कर सूत जी पर चलाया जिससे उनका मस्तक धड़ से अलग हो गया। इस प्रकार सूत जी का वध होते देख कर सारी सभा त्राहि-त्राहि कर उठी। भयानक कोलाहल मच गया।

सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व में बलराम के पास पहुंचे और उनसे कहा कि आपने ये क्या किया? हम सभी ने महर्षि व्यास के आदेशानुसार सूत जी को व्यास पद प्रदान किया था किन्तु आपने बिना सत्य जाने उनका वध कर दिया। अब तो आप पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया है। उससे अधिक हानि हमारी हुई क्यूंकि सूत जी ने अभी तक पुराणों की कथा सम्पूर्ण नहीं की थी। अब ये ज्ञान सदा के लिए लुप्त हो जाएगा।

जब बलराम जी को सत्य का पता चला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने महर्षि शौनक के चरण पकड़ कर कहा कि अनजाने में मुझसे बड़ा पाप हो गया। आप मुझे इसका प्रायश्चित बताएं। किस प्रकार मैं उनके द्वारा दिए गए इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करूँ?

इस पर शौनक जी ने कहा कि आप सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा को यहाँ बुलाइये क्यूंकि व्यास जी के अतिरिक्त अब एक वे ही है जिनके पास समस्त पुराणों का ज्ञान है। ये सुनकर बलराम तत्काल शौनक जी के साथ उग्रश्रवा ऋषि के पास पहुंचे और उनसे क्षमा याचना की। वे उन्हें मना कर नैमिषारण्य ले आये जहाँ उग्रश्रवा जी ने बांकी ८ पुराणों की कथा सुनाने का वचन दिया। बलराम को इससे थोड़ा संतोष हुआ।

उन्होंने पुनः प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले सभी ऋषियों से पूछा कि मुझे बताइये कि मैं प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले आपका और क्या हित करूँ? तब सभी ऋषियों ने कहा कि हे बलराम इस वन में “बल्वल” नामक एक असुर है जो इल्वल का पुत्र है। वो सदैव हमारे यज्ञ में विघ्न डालता है और यज्ञ कुंड में अपशिष्ट पदार्थ डाल देता है। कृपया उससे हमारी रक्षा करें।

ऋषियों का ऐसा अनुरोध सुनकर बलराम जी ने बल्वल ये युद्ध कर सहज ही उसका वध कर दिया और नैमिषारण्य को राक्षसों के आतंक से मुक्त किया। तत्पश्चात वे प्रायश्चित के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल गए। तब सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा ने अपने पिता का सत्संग आगे बढ़ाया और बचे हुए ८ महापुराणों के ज्ञान से समस्त ऋषियों को परिपूर्ण कर दिया।

महाभारत की कथा जो आज हम पढ़ते हैं वो भी सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा सौति द्वारा ही सुनाई हुई है। जब महर्षि वैशम्पायन ने महाभारत की मूल कथा, जिसे जय कहते हैं, परीक्षित पुत्र जन्मेजय को सुनाई थी, उस समय लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति ने भी वो कथा सुनी थी। बाद में उन्होंने नैमिषारण्य में पहुँच कर वही कथा विस्तार पूर्वक ८८००० ऋषियों को महर्षि शौनक की उपस्थिति में सुनाया। उन्होंने अपने पिता का पद प्राप्त किया था इस कारण उग्रश्रवा सौति को भी अपने पिता की भांति सूत जी कहा जाने लगा।

कुछ लोगों का ये भी मानना है कि लोमहर्षण या उग्रश्रवा सौति सूत नहीं बल्कि ब्राह्मण थे किन्तु ये भी गलत है। हालाँकि कुछ पुराणों मेंरोमहर्षण को अग्नि से उत्पन्न अवश्य माना गया है किन्तु वास्तव में वे सूत ही थे। महाभारत में अनेकों स्थानों पर उनके पुत्र उग्रश्रवा सौति को “सूत नंदन” कहकर सम्बोधित किया गया है। वैसे भी सूत एक सम्मानित पद ही था, इसीलिए इसे अन्यथा के रूप में नहीं देखना चाहिए।

समान पद होने के कारण ही जनमानस में ये संदेह फैला है कि वास्तविक सूत जी कौन हैं? कुछ लोग लोमहर्षण को सूत जी मानते हैं तो कुछ लोग उग्रश्रवा सौति को। तो इसे आसान भाषा में इस प्रकार समझें कि दोनों पिता-पुत्र सूत जी ही कहलाते हैं लेकिन पुराणों में अधिकतर स्थानों जिन सूत जी का वर्णन वो लोमहर्षण (रोमहर्षण) हैं और महाभारत के सन्दर्भ में जिन सूत जी का वर्णन आता है वो उग्रश्रवा सौति हैं। आम तौर पर जिन सूत जी की बात होती हैं उन्हें रोमहर्षण ही समझा जाना चाहिए।

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एक महात्माजी रात्रि के समय में ‘श्रीराम’ नाम का जाप करते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। जाप करते हुए वे एक गहन जंगल से गुजर रहे थे। विरक्त होने के कारण वे महात्मा बार-बार देशाटन करते रहते थे। वे किसी एक स्थान में अधिक समय नहीं रहते थे। वे ईश्वर नाम प्रेमी थे। इसलिये दिन-रात उनके मुख से राम नाम जप चलता रहता था। स्वयं राम नाम का जाप करते तथा औरों को भी उसी मार्ग पर चलाते।
महात्माजी गहन जंगल में मार्ग भूल गये थे पर अपनी मस्ती में चले जा रहे थे कि जहाँ राम ले चले वहाँ। दूर अँधेरे के बीच में बहुत सी दीपमालाएँ प्रकाशित थीं। महात्माजी उसी दिशा की ओर चलने लगे।  निकट पहुँचते ही देखा कि वटवृक्ष के पास अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बज रहे हैं, नाच -गान और शराब की महफ़िल जमी है। कई स्त्री पुरुष साथ में नाचते-कूदते-हँसते तथा औरों को हँसा रहे हैं। उन्हें महसूस हुआ कि वे मनुष्य नहीं प्रेतात्मा हैं।
महात्माजी को देखकर एक प्रेत ने उनका हाथ पकड़कर कहाः ओ मनुष्य ! हमारे राजा तुझे बुलाते हैं, चल। वे मस्तभाव से राजा के पास गये जो सिंहासन पर बैठा था। वहाँ राजा के इर्द-गिर्द कुछ प्रेत खड़े थे।
प्रेतराज ने कहाः तुम इस ओर क्यों आये ? हमारी मंडली आज मदमस्त हुई है, इस बात का तुमने विचार नहीं किया ? तुम्हें मौत का डर नहीं है ?
अट्टहास करते हुए महात्माजी बोलेः मौत का डर ? और मुझे ? राजन् ! जिसे जीने का मोह हो उसे मौत का डर होता हैं। हम साधु लोग तो मौत को आनंद का विषय मानते हैं। यह तो देहपरिवर्तन हैं जो प्रारब्धकर्म के बिना किसी से हो नहीं सकता।
प्रेतराजः तुम जानते हो हम कौन हैं ?
महात्माजीः मैं अनुमान करता हूँ कि आप प्रेतात्मा हो।
प्रेतराजः तुम जानते हो, लोग समाज हमारे नाम से काँपता हैं।
महात्माजीः प्रेतराज ! मुझे मनुष्य में गिनने की गलती मत करना। हम जिन्दा दिखते हुए भी जीने की इच्छा से रहित, मृततुल्य हैं। यदि जिन्दा मानो तो भी आप हमें मार नहीं सकते। जीवन-मरण कर्माधीन हैं। मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ ?
महात्माजी की निर्भयता देखकर प्रेतों के राजा को आश्चर्य हुआ कि प्रेत का नाम सुनते ही मर जाने वाले मनुष्यों में एक इतनी निर्भयता से बात कर रहा हैं। सचमुच, ऐसे मनुष्य से बात करने में कोई हर्ज नहीं।
प्रेतराज बोलाः पूछो, क्या प्रश्न है ?
महात्माजीः प्रेतराज ! आज यहाँ आनंदोत्सव क्यों मनाया जा रहा है ?
प्रेतराजः मेरी इकलौती कन्या, योग्य पति न मिलने के कारण अब तक कुँवारी हैं। लेकिन अब योग्य जमाई मिलने की संभावना हैं। कल उसकी शादी हैं इसलिए यह उत्सव मनाया जा रहा हैं।
महात्माजी (हँसते हुए): “तुम्हारा जमाई कहाँ है ? मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
प्रेतराजः जीने की इच्छा के मोह के त्याग करने वाले महात्मा ! अभी तो वह हमारे पद (प्रेतयोनी) को प्राप्त नहीं हुआ हैं। वह इस जंगल के किनारे एक गाँव के श्रीमंत (धनवान) का पुत्र है। महादुराचारी होने के कारण वह इस समय भयानक रोग से पीड़ित है। कल संध्या के पहले उसकी मौत होगी। फिर उसकी शादी मेरी कन्या से होगी। इस लिये रात भर गीत-नृत्य और मद्यपान करके हम आनंदोत्सव मनायेंगे।
महात्माजी वहाँ से विदा होकर श्रीराम नाम का अजपाजाप करते हुए जंगल के किनारे के गाँव में पहुँचे। उस समय सुबह हो चुकी थी। एक ग्रामीण से महात्मा नें पूछा “इस गाँव में कोई श्रीमान् का बेटा बीमार हैं ?”
ग्रामीणः हाँ, महाराज ! नवलशा सेठ का बेटा सांकलचंद एक वर्ष से रोगग्रस्त हैं। बहुत उपचार किये पर उसका रोग ठीक नहीं होता।
महात्माजी नवलशा सेठ के घर पहुँचे सांकलचंद की हालत गंभीर थी। अन्तिम घड़ियाँ थीं फिर भी महात्माजी को देखकर माता-पिता को आशा की किरण दिखी। उन्होंने महात्मा का स्वागत किया।
सेठपुत्र के पलंग के निकट आकर महात्माजी रामनाम की माला जपने लगे। दोपहर होते-होते लोगों का आना-जाना बढ़ने लगा।
महात्मा: क्यों, सांकलचंद ! अब तो ठीक हो ?
सांकलचंद ने आँखें खोलते ही अपने सामने एक प्रतापी सन्त को देखा तो रो पड़ा। बोला “बाबाजी ! आप मेरा अंत सुधारने के लिए पधारे हो। मैंने बहुत पाप किये हैं। भगवान के दरबार में क्या मुँह दिखाऊँगा ? फिर भी आप जैसे सन्त के दर्शन हुए हैं, यह मेरे लिए शुभ संकेत हैं।” इतना बोलते ही उसकी साँस फूलने लगी, वह खाँसने लगा।
“बेटा ! निराश न हो भगवान राम पतित पावन है। तेरी यह अन्तिम घड़ी है। अब काल से डरने का कोई कारण नहीं। खूब शांति से चित्तवृत्ति के तमाम वेग को रोककर श्रीराम नाम के जप में मन को लगा दे। जाप में लग जा। शास्त्र कहते हैं-

चरितम्  रघुनाथस्य  शतकोटिम्  प्रविस्तरम्। 
       एकैकम् अक्षरम् पूण्या महापातक नाशनम्।। 

      अर्थातः सौ करोड़ शब्दों में भगवान राम के गुण गाये गये हैं। उसका एक-एक अक्षर ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश करने में समर्थ हैं। 
      दिन ढलते ही सांकलचंद की बीमारी बढ़ने लगी। वैद्य-हकीम बुलाये गये। हीरा भस्म आदि कीमती औषधियाँ दी गयीं। किन्तु अंतिम समय आ गया यह जानकर महात्माजी ने थोड़ा नीचे झुककर उसके कान में रामनाम लेने की याद दिलायी। 
      राम बोलते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। लोगों ने रोना शुरु कर दिया। शमशान यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। मौका पाकर महात्माजी वहाँ से चल दिये। नदी तट पर आकर स्नान करके नामस्मरण करते हुए वहाँ से रवाना हुए। शाम ढल चुकी थी। फिर वे मध्यरात्रि के समय जंगल में उसी वटवृक्ष के पास पहुँचे। प्रेत समाज उपस्थित था। 
      प्रेतराज सिंहासन पर हताश होकर बैठे थे। आज गीत, नृत्य, हास्य कुछ न था। चारों ओर करुण आक्रंद हो रहा था, सब प्रेत रो रहे थे। 
      महात्मा ने पूछा “प्रेतराज ! कल तो यहाँ आनंदोत्सव था, आज शोक-समुद्र लहरा रहा हैं। क्या कुछ अहित हुआ हैं ?” 
      प्रेतराजः हाँ भाई ! इसीलिए रो रहे हैं। हमारा सत्यानाश हो गया। मेरी बेटी की आज शादी होने वाली थी। अब वह कुँवारी रह जायेगी। 
      महात्मा: प्रेतराज ! तुम्हारा जमाई तो आज मर गया हैं। फिर तुम्हारी बेटी कुँवारी क्यों रही ? 
      प्रेतराज ने चिढ़कर कहाः तेरे पाप से ! मैं ही मूर्ख हूँ कि मैंने कल तुझे सब बता दिया। तूने हमारा सत्यानाश कर दिया। 
      महात्मा ने नम्रभाव से कहाः मैंने आपका अहित किया यह मुझे समझ में नहीं आता। क्षमा करना, मुझे मेरी भूल बताओगे तो मैं दुबारा नहीं करूँगा। 
      प्रेतराज ने जलते हृदय से कहाः यहाँ से जाकर तूने मरने वाले को नाम स्मरण का मार्ग बताया और अंत समय भी राम नाम कहलवाया। इससे उसका उद्धार हो गया और मेरी बेटी कुँवारी रह गयी। 
      महात्माजीः क्या ? केवल एक बार नाम जप लेने से वह प्रेतयोनि से छूट गया ? आप सच कहते हो ? 
      प्रेतराजः हाँ भाई ! जो मनुष्य राम नामजप करता हैं वह राम नामजप के प्रताप से कभी हमारी योनि को प्राप्त नहीं होता। भगवन्नाम जप में नरकोद्धारिणी शक्ति हैं। 
      प्रेत के द्वारा रामनाम का यह प्रताप सुनकर महात्माजी प्रेमाश्रु बहाते हुए भाव समाधि में लीन हो गये। उनकी आँखे खुलीं तब वहाँ प्रेत-समाज नहीं था, बाल सूर्य की सुनहरी किरणें वटवृक्ष को शोभायमान कर रही थीं।

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“हर चीज का हल होता है,आज नहीं तो कल होता है|”
एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन  इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये की जब तुम्हे लगे की बस अब तो सब ख़तम होने वाला है ,परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ ,कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो ,हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना ,उससे पहले नहीं!
राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया !एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया!  एक शेर का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया,घना जंगल और सांझ का समय ,  तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई,  राजा आगे आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे!   बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया !  भूख  प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी ,उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया !  और सांस रोक कर बैठ गया , दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे धीरे पास आने लगी !  दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा ,उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे !  वो जिंदगी से निराश हो ही गया था , की उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई !उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा !   उस पर्ची पर लिखा था —”यह भी कट जाएगा “
राजा को अचानक  ही जैसे घोर अन्धकार मे एक  ज्योति की किरण दिखी , डूबते को जैसे कोई सहारा मिला !  उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ !  उसे लगा की सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा ,फिर मे क्यों चिंतित होऊं !  अपने प्रभु और अपने पर विश्वासरख उसने स्वयं से कहा की हाँ ,यह भी कट जाएगा !
और हुआ भी यही ,दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी ,कुछ समय बाद वहां शांति छा गई !  राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह अपने राज्य मे वापस आ गया !
दोस्तों,यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है यह हम सब की कहानी है !हम सभी परिस्थिति,काम ,तनाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं की हमे कुछ सूझता नहीं है ,हमारा डर हम पर हावी होने लगता है ,कोई रास्ता ,समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आता ,लगने लगता है की बस, अब सब ख़तम ,है ना?
जब ऐसा हो तो २ मिनट शांति से बेठिये ,थोड़ी गहरी गहरी साँसे लीजिये !  अपने आराध्य को याद कीजिये और स्वयं से जोर से कहिये –यह भी कट जाएगा !   आप देखिएगा एकदम से जादू सा महसूस होगा , और आप उस परिस्थिति से उबरने की शक्ति अपने अन्दर महसूस करेंगे !  आजमाया हुआ है ! बहुत कारगर है !
आशा है जैसे यह सूत्र मेरे जीवन मे मुझे प्रेरणा देता है ,आपके जीवन मे भी प्रेरणादायक सिद्ध होगा !

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पान से गंधलाये दाँत… चेहरे पर उतर आयी झुर्रियाँ… ढली जवानी का क्वारापन और अपने ही भाई कामबख्स के साथ अवैध सम्बन्ध…
उस समय की बादशाह बेग़म #ज़ीनत_उन_निसा जो औरंगजेब की तीसरी संतान और बड़ी लाड़ली भी…
ज़ीनत अपनी जवानी में बड़ी ही खूबसूरत थी पर घर के अमरुद घर में खाने की रवायत ने उसका ब्याह न होने दिया….

और जब औरंगजेब दक्कन में मराठों के विरुद्ध अभियान पर निकला तो उसके खेमे में उसकी जवान रखैल उदयपुरी महल और अधेड़ बेटी ज़ीनत भी साथ थे

ज़ीनत के सामने तो मुग़लिया दरबारी खौफ खाते पर पीठ पीछे उसकी उम्र और हरकतों को बूढी घोड़ी लाल लगाम का तमगा भी देते…. और खुद से 24 साल छोटे सौतेले भाई मोहम्मद कामबख्स मिर्ज़ा से सम्बन्ध पर खूब कानाफूसी भी करते… कामबख्स पर ज़ीनत ने बड़ी छोटी उम्र का रहते ही कब्ज़ा ज़मा लिया था… और इसी के चलते सगा भाई अकबर उससे सख्त ख़फ़ा रहता था..

खैर जब #छत्रपति_शम्भूराजे धोखे से गिरफ्तार हुए और उसके बाद उनपर हुए अत्याचार में इस यौन कुंठित ज़ीनत का भी बड़ा हाथ था…
46 की उम्र की बिन ब्याही ज़ीनत औरंगजेब के साथ वहाँ मौजूद थी जब औरंगजेब ने शम्भूराजे को इस्लाम कुबूलने का प्रस्ताव दिया और इसके बदले 50 हज़ार सवार की मनसबदारी व सारे किले वापस करने का वादा भी किया…

शम्भूराजे हँस पड़े और पास खड़े कवी कलश से बोले “कलश औरंगज़ेब अगर अपनी ये बेटी भी मुझसे ब्याह दे तो भी मेरा ज़वाब न होगा”
ज़ीनत अपनी पूरी फ़ौज़ के आगे की इस बेज्जती से तिलमिला उठी….. और शम्भूराजे भी जानते थे कि इसका परिणाम क्या होगा…. पर छावा औरंगजेब और उसकी बेटी के दिल पर कभी न ठीक होने वाली चोट कर चुका था….

और अगले 30 साल में मराठों ने छत्रपति शम्भूराजे के दिए इस घाव को नासूर बना दिया जिसने मुग़ल सत्ता को  तिल तिल ख़त्म किया….