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૧૯૯૮માં તત્કાલીન વડા પ્રધાન શ્રી અટલ બિહારી વાજપેયીની સરકારે પોખરણમાં પરમાણુ પરીક્ષણો કર્યા હતા. પરીક્ષણો પછી, દક્ષિણ આફ્રિકામાં ભારતના ઉચ્ચ કમિશનર (રાજદૂત) લક્ષ્મીચંદ જૈને વાજપેયી સરકાર દ્વારા કરવામાં આવેલા પરમાણુ પરીક્ષણોનો ખુલ્લેઆમ વિરોધ કર્યો હતો.

આ કૃત્યની કલ્પના કરો: જ્યારે દેશનો દરેક નાગરિક દેશની સિદ્ધિ પર ગર્વ અનુભવી રહ્યો હતો, ત્યારે વિદેશમાં બેઠેલા એક ભારતીય રાજદૂત પરમાણુ પરીક્ષણ જેવા મહત્વપૂર્ણ અને સંવેદનશીલ નીતિગત નિર્ણય પર પોતાના દેશનો વિરોધ કરી રહ્યા હતા. તેઓ માત્ર વિરોધ જ ન કરી રહ્યા હતા, પરંતુ દક્ષિણ આફ્રિકામાં ડર્બન સમિટમાં તેમના રાષ્ટ્રવિરોધી એજન્ડાને જોરશોરથી આગળ વધારી રહ્યા હતા.

વડા પ્રધાન અટલ બિહારી વાજપેયીએ ઝડપી કાર્યવાહી કરી અને આ રાષ્ટ્રવિરોધી અધિકારીને તાત્કાલિક ભારતમાં પાછા બોલાવવાનો આદેશ આપ્યો. જોકે, આ અધિકારીએ આદેશોની અવગણના કરી અને જ્યાં સુધી અધિકારી પાછો ન ફર્યો . ભારત સરકારે તેમને પર્સોના નોન ગ્રેટા જાહેર કર્યા ત્યાં સુધી તેઓ ભારત પાછા ફર્યા નહીં.

પછી એવું બન્યું કે જે માણસે ૧૯૯૮માં રાજદૂત તરીકેની સત્તાવાર ક્ષમતામાં પોતાના દેશના વૈશ્વિક પરમાણુ શક્તિના ઉદયનો વિરોધ કર્યો હતો, તેને ૨૦૧૧માં ૧૦, જનપથથી કાર્યરત કોંગ્રેસ સરકારે દેશના બીજા સર્વોચ્ચ નાગરિક પુરસ્કાર, “પદ્મ વિભૂષણ” થી નવાજ્યો.

શું તમે જાણો છો કે તે રાજદૂત, લક્ષ્મીચંદ જૈનનો પુત્ર કોણ છે? અને તે શું કરે છે?

તે લક્ષ્મીચંદ જૈનનો પુત્ર NDTV પત્રકાર “શ્રીનિવાસન જૈન” છે. હા, તે જ જે ભાજપ વિરોધી, મોદી વિરોધી અને પ્રણય રોય અને રવિશ કુમાર જેવા રાષ્ટ્ર વિરોધીઓનું કેન્દ્ર છે.

આ ઐતિહાસિક ઘટના આપણને કોંગ્રેસ, NDTV અને ભારત વિરોધી ગેંગ વચ્ચેના જોડાણને સમજવામાં મદદ કરી શકે છે.

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चेखोव रूस का एक बहुत बड़ा लेखक हुआ। उसने अपने संस्मरणों के आधार पर एक कहानी लिखी। उसके मित्र का लड़का कोई दस साल पहले घर से भाग गया। मित्र धनी था। लेकिन जैसे अक्सर धनी होते हैं, महा-कृपण था। और लड़के को बाप के साथ रास न पड़ी। तो लड़का घर छोड़ कर भाग गया। एक ही लड़का था। जब भागा था तब तो बाप में अकड़ थीं, लेकिन धीरे-धीरे अकड़ कम हुई। मौत करीब आने लगी। दस साल बीत गये। लड़के के लौटने के कोई आसार न मालूम पड़े।
खोजने वाले भेजे। थोड़ा झुका बाप। क्योंकि वही तो मालिक है सारी संपदा का। और मौत कभी भी घट सकती है। कोई पता न चलता था लेकिन एक दिन एक पत्र आया, कि लड़का बहुत मुसीबत में है और पास के ही शहर में है। पिता को बुलाया है। और कहा है, कि अगर आप आ जाएं तो मैं घर लौट आऊंगा। अपने से मेरी आने की हिम्मत नहीं होती। शर्मिंदा मालूम पड़ता हूं। अपराधी लगता हूं।
तो बाप गया शहर। एक शानदार होटल में ठहरा। लेकिन रात उसने पाया, कि होटल के कमरे के बाहर कोई खांसता, खंखारता…तो दरवाजा खोलकर उस आदमी से कहा कि हट जाओ यहां से। सोने दोगे या नहीं? लेकिन रात सर्द। और बर्फ पड़ रही है। और वह आदमी जाने को राजी नहीं है। तो उसने धक्के देकर उसे बरामदे के बाहर कर दिया। फिर जाकर वह आराम से सो गया।
सुबह होटल के बाहर मैदान में भीड़ लगी पाई। कोई मर गया है। तो वह भी गया देखने। कपड़े तो वही मालूम पड़ते हैं, जिस आदमी को रात उसने बरामदे के निकाल दिया था। भीड़ में पास जाकर देखा, तो चेहरा पहचाना हुआ मालूम पड़ा। यह तो उसका लड़का है!
अपने ही लड़के को रात उसने बाहर निकाल लिया। मन को पता न हो कि वह अपना है, तो अपना नहीं है। मन को पता हो कि अपना है, तो अपना है। सारा खेल मन का है। क्षण भर पहले कोई मतलब न था। यह आदमी मरा पड़ा था। भीड़ लग गयी थी। लेकिन क्षण भर बाद अब बाप छाती पीट कर रो रहा है कि मेरा लड़का मर गया है। और अब यह पीड़ा जीवन भर रहेगी क्योंकि मैंने ही मारा।
खेल सारा मन का है। और अभी सिद्ध हो जाए, कोई दूसरा आदमी आ जाए और कहे कि यह लड़का मेरा है, तुम्हारा नहीं। तुम भूल में पड़ गए। आंसू सूख जाएंगे। प्रफुल्लता वापिस लौट आएगी। क्षण भर में सब बदल जाता है। मन का भाव बदला कि सब बदला।

ओशो,कहे कबीर दीवाना(प्रवचन-9)

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👉🏻जब मुख्तार अंसारी ने कोतवाली में ताला लगवा दिया था, तब कानून का राज था

जब अतीक अहमद ने 20 सिपाहियों को अपने घर में बंदी बना लिया था, तब भी कानून का राज था ??

जब आजम खान ने एक एसएसपी को 3 घंटे अपने घर पर खड़ा होने की सजा दी थी,

तब भी कानून का ही राज था

जब 12 जजों की बेंच ने अतीक अहमद और मुख्तार के खिलाफ चलने वाले केसों को सुनने से मना कर दिया था,तब कानून का राज था ..??

जैसे ही एक संन्यासी ने प्रदेश की कमान संभाली असहाय सी दिखने वाली पुलिस इन्हीं अपराधियों को घसीट घसीट कर थाने में लाने लगी, दौड़ा दौड़ा कर इनकाउंटर करने लगी यूपी को अपने बाप की बपौती समझने वाले अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे दुर्दांत अपराधी डर के मारे यूपी से हजारों किलोमीटर दूर जेलों में छुप कर बैठ गए ।

लाखों अपराधियों ने अपनी जमानत रद्द करा लिया ।

हजारों गले में तख्ती लगा कर आत्म समर्पण करने लगे, लोगों की जान लेने वाले गुंडों का परिवार प्रेस कांफ्रेंस कर के जान बख्श देने की गुहार मांग रहा है ।

लेकिन उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का चाचा कह रहा है की “उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था ध्वस्त है  ये कही पढ़ा था सोचा बता दूं इसमें आपकी क्या राय हैं कमेंट करके जरूर बताइए धन्यवाद

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मैंने सुना है कि पुराने प्राचीन चीन में एक नियम था। अब भी उस नियम की कोई लकीर कहीं-कहीं चलती है। कन्फ्यूसियस के जमाने में वह नियम पैदा हुआ।

उन्नीस सौ दस में एक अमरीकन यात्री चीन गया। वह जैसे ही स्टेशन पर उतरा और स्टेशन के बाहर गया, वहां देखा, कि दो आदमियों में बड़ी घमासान लड़ाई चल रही है। मगर लड़ाई सिर्फ शब्दों की है। और कोई दो सौ आदमियों की भीड़ खड़े हो कर देख रही है। और निरीक्षण ऐसे हो रहा है, जैसे कोई बड़ा खेल हो रहा हो। वह भी खड़ा हो गया। जल्दी ही तूफान इतने करीब आया जा रहा है कि जल्दी ही उपद्रव होगा। और बात वे इतने गुस्से में कर रहे हैं, चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, और एक दूसरे पर बिलकुल झपट रहे हैं, लेकिन वह बड़ा हैरान हुआ कि मारपीट शुरू क्यों नहीं होती? इतनी भूमिका क्यों चल रही है? तो उसने एक चीनी को पूछा कि मैं समझ नहीं पा रहा। बड़ी देर हो गई, आखिर कभी की मारपीट हो गई होती हमारे मुल्क में, यह इतनी देर क्यों लग रही है?

उस चीनी ने कहा, ‘यहां नियम है। नियम यह है, कि जो पहले हमला करे वह हार गया। बस, फिर मामला खतम! जैसे ही इन दो में से किसी ने हमला किया, भीड़ हट जायेगी। मामला खतम ही हो गया है। जो पहले क्रोधित हुआ, वह उथला साबित हुआ। तो ये दोनों एक दूसरे को उकसा रहे हैं, कि किसी तरह दूसरा टेम्पटेशन में आ जाये, उत्तेजित हो जाये और हमला कर दे। बस, मामला खतम हो गया। जो बच गया हमला करने से, वह जीत गया।’

कन्फ्यूसियस ने इसकी आधारशिला रखी थी, कि क्रोध करने का अर्थ है आदमी हार ही चुका। अब उसे और हराने की जरूरत नहीं है। असल में हारा हुआ आदमी ही क्रोध करता है।

तुम जितने गहरे हो उतना ही क्रोध मुश्किल है। और तुम जितने गहरे हो उतनी ही हार असंभव है। गहराई विजय है, उथलाई हार है।

ओशो 🌸, दीया तले अंधेरा, ( झेन कथा)

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भारत के पहले एजुकेशन मिनिस्टर मौलाना आज़ाद थे। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कोई फॉर्मल स्कूलिंग नहीं की थी। वे भारत के नागरिक भी नहीं थे; उनके दादा मक्का में बस गए थे, जबकि वे मक्का में पैदा हुए थे और मक्का और मिस्र में इस्लामिक अज़हर मदरसे में पढ़े थे। फिर भी, पंडित नेहरू ने उन्हें भारत का एजुकेशन मिनिस्टर बनाया।

एजुकेशन मिनिस्टर बनने के बाद, मौलाना आज़ाद ने अपनी ही सोच वाले एक पक्के मुस्लिम इंसान को ढूंढा, ताकि उन्हें भारत का एजुकेशन सेक्रेटरी बनाया जा सके।

अपनी इस तलाश के बाद, उन्हें एक पक्के मुस्लिम अधिकारी, ख्वाजा गुलाम सैय्यदीन मिले।

कांग्रेस ने मौलाना आज़ाद को ‘भारत रत्न’ अवॉर्ड दिया, और उनके एजुकेशन सेक्रेटरी, ख्वाजा गुलाम सैय्यदीन को ‘पद्म भूषण’ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया।

इसी ख्वाजा गुलाम सैय्यदीन की बेटी का नाम सैयदा हामिद है। भले ही सैयदा हामिद एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAS/एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस) में नहीं थीं, लेकिन इंदिरा गांधी ने उन्हें प्राइम मिनिस्टर ऑफिस (PMO) में सेक्रेटरी बना दिया था, क्योंकि वह एक कट्टर मुस्लिम परिवार से थीं।

इसी सैयदा हामिद को ‘पद्म श्री’ अवॉर्ड भी दिया गया था, (कांग्रेस के ज़माने में पद्म श्री, पद्म भूषण जैसे अवॉर्ड किलो के हिसाब से बांटे जाते थे, और उनमें भी मुसलमानों को बहुत पसंद किया जाता था)।

बाद में मनमोहन सिंह प्राइम मिनिस्टर बने और सोनिया गांधी और राहुल गांधी ‘सुपर प्राइम मिनिस्टर’ बने, फिर इसी कट्टर मुस्लिम सैयदा हामिद को कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दिया गया और प्लानिंग कमीशन का मेंबर बनाया गया।

यही सैयदा हामिद कहती हैं कि यह धरती अल्लाह ने बनाई है, इसलिए बांग्लादेशी मुसलमानों को भी भारत में रहने का हक है और आप उन्हें देश से बाहर नहीं निकाल सकते।

जो लोग अब भी सोचते हैं कि राहुल गांधी को प्राइम मिनिस्टर बनना चाहिए, उन्हें अभी से आगे के हालात के लिए खुद को मेंटली तैयार कर लेना चाहिए।# #viralreelsシ #foryouシpage #viralvideoシ #ViralStoryTime #foryoupageシ #foryouシ #reels #stories #story #storytime

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પહેલી તસ્વીર સુપ્રીમ કોર્ટના જજ અબ્દુલ નઝીરની છે, જેમણે ટ્રિપલ તલાકને અસંવિધાનિક જાહેર કરનાર ચુકાદા પર હસ્તાક્ષર કરવા ઇનકાર કર્યો હતો. તેમણે સંવિધાન કરતાં પોતાના વિશ્વાસને વધુ મહત્વ આપ્યું.

બીજી તસ્વીર પૂર્વ ઉપ રાષ્ટ્રપતિ હામિદ અંસારીની છે, જેમના વિશે RAW અધિકારી એન. કે. સૂદના જણાવ્યા અનુસાર વિદેશમાં ભારતીય ગુપ્તચર અધિકારીઓની ઓળખ બહાર પાડવામાં તેમની ભૂમિકા હતી, જેના કારણે ઘણા RAW અધિકારીઓના મોત થયા.

ત્રીજી તસ્વીર પૂર્વ મુખ્ય ચૂંટણી આયુક્ત એન. વાય. કુરૈશીની છે, જેમના કાર્યકાળ દરમિયાન બંગાળ અને ઝારખંડમાં સૌથી વધુ ગેરકાયદેસર બાંગ્લાદેશી મુસ્લિમ મતદાર ઓળખપત્ર બનાવાયા હોવાનું કહેવાય છે.

શિક્ષિત હોય કે અશિક્ષિત, ધર્મની બાબતમાં તેઓ એકસરખું જ વર્તન કરે છે.

તેમના માટે દેશ મહત્વનો નથી. હંમેશા ધર્મ પ્રથમ આવે છે.

“All Peacefools are Terrorists” માત્ર એક દંતકથા નથી, પરંતુ એક હકીકત છે.

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जब परीक्षित जी को भागवत कथा सुनते सुनते 6 दिन बीत गए तब शुकदेव जी ने देखा कि परीक्षित के मन में अभी भी मृत्यु का भय हैं फिर उनकी इस दशा को देखते हुए शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को एक कथा सुनाई , कथा के अनुसार एक राजा एक बार जंगल में शिकार करने गए और जंगल में शिकार करते वक्त राजा अपना रास्ता भटक गया। इधर उधर भटकने के बाद उसे एक छोटी सी झोपड़ी नज़र आयी। जब राजा उसके अंदर गया तो उसने देखा वहाँ पर एक बहेलिया रहता है जो कि लम्बे समय से बीमार चल रहा था।

जब राजा झोपड़ी में गया तो उसने देखा कि उस बीमार बहेलिया ने उसी झोपड़ी में एक तरफ शौच  करने का स्थान  बना रखा था तो खाने पीने के लिए जानवरों का मांस छत से टांग रखा था । उस छोटी सी झोपड़ी में ये सब चीजों कि वजह से वह झोपड़ी दुर्गन्ध से भरी हुई थी। लेकिन राजा के पास कोई दूसरा रास्ता न होने कि वजह से राजा ने उस बहेलिया से उस झोपड़ी में रुकने के लिए निवेदन किया।

इस बात पर बहेलिया बोला कि ” मैं हमेशा से भटके हुए राहगीरों को अपनी इस झोपड़ी में पनाह देता हूँ। लेकिन जब दूसरे दिन कि सुबह होती है तो कोई यहाँ से जाना नहीं चाहता और यहीं रुकने कि ज़िद करने लगता है। अब मैं बार बार इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता तो मैं आपको अपनी इस झोपड़ी मे रुकने नहीं दे सकता। यह सुनकर राजा थोड़े अचंभित हुए और फिर बोले कि मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं ऐसा नहीं करूँगा और सुबह होते ही अपने घर के लिए चला जाऊंगा। तो राजा कि इस बात पर बीमार बहेलिया राजा पर भरोसा कर उसको रुकने के लिए जगह दे देता है। अब राजा रात को वहीं विश्राम करने के लिए लेटता है और उस झोपड़ी की गंध उसके अंदर जा रही थी और सुबह होते होते राजा के अंदर उस गंध का ऐसा नशा चढ़ गया कि वो भी अपना वचन भूल दूसरे लोगों की भाँति वहीं पर रुकने कि बात करने लगा और इस बात को लेकर राजा ने उस बीमार बहेलिया से कलह कर लिया।

फिर शुकदेव राजा परीक्षित से पूछते है कि क्या उस राजा ने यह सही किया तो शुकदेव के इस प्रश्न का जवाब देते हुए राजा परीक्षित ने कहा कि नहीं उसने बिल्कुल गलत किया और वो मूर्ख राजा था जो अपना इतना अच्छा राज पाठ छोड़कर और अपना वचन तोड़ कर उस गन्दी झोपड़ी में रहना चाहता था। क्या आप बता सकते हो कौन था वो राजा ?

तब शुकदेव जी ने कहा कि वह राजा कोई और नहीं स्वयं तुम ही हो राजन। जो कि इस मल मूत्र से भरे झोपड़ी यानी इस शरीर में रहना चाहते हो जब के तुम्हारी  आत्मा का इस शरीर में रहने का समय समाप्त हो गया है। तब भी तुम उसके ही शोक में पड़े हुए हो। और फिर शुकदेव जी पूछते है कि क्या अब भी मरने का शोक करना सही है। उसके बाद राजा परीक्षित ने अपने मन से मौत का डर निकलने का फैसला किया और अपने अंतिम समय तक पूरे भक्ति भाव से कथा श्रवण की।

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जब हम चंद्रशेखर आजाद का नाम लेते हैं, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है… लेकिन उसी वीर सपूत को जन्म देने वाली मां की कहानी सुनेंगे, तो शायद आंखें नम हुए बिना नहीं रह पाएंगी।

जिस बेटे ने अपनी मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर दिए, उसकी मां को इस समाज ने क्या दिया…? सम्मान नहीं… बल्कि तिरस्कार, अपमान और भूख।

आजाद की शहादत के महीनों बाद उनकी मां को यह तक पता नहीं था कि उनका लाल अब इस दुनिया में नहीं रहा। वह रोज दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठतीं—शायद आज मेरा बेटा लौट आए… शायद आज उसकी एक झलक मिल जाए… लेकिन हर शाम उम्मीद की लौ बुझ जाती।

गांव वालों का व्यवहार तो और भी निर्दयी था। जिनके लिए उनका बेटा जान दे गया, उन्हीं लोगों ने उस मां से मुंह मोड़ लिया। उसे “डकैत की मां” कहकर पुकारा जाने लगा… जैसे उसका बेटा कोई अपराधी था, कोई गुनहगार था…! समाज ने उसे अकेला छोड़ दिया, जैसे उसका अस्तित्व ही बोझ बन गया हो।

वह मां, जिसने अपने बेटे को देश के लिए समर्पित किया था, आज अपने ही गांव में अपमान की आग में जल रही थी। कोई सहारा नहीं… कोई अपनापन नहीं… बस ताने, तिरस्कार और बेबसी।

पेट की आग जब असहनीय हो जाती, तो वह जंगलों में जाती… सूखी टहनियां काटती… लकड़ियों का गट्ठर सिर पर उठाकर लाती… और उन्हें बेचकर दो वक्त की रोटी जुटाने की कोशिश करती। एक-एक कदम उसके लिए संघर्ष था… शरीर बूढ़ा हो चुका था, लेकिन मजबूरी उससे भी बड़ी थी।

कभी ज्वार, कभी बाजरे का आटा… उसे पानी में घोलकर पी लेती… क्योंकि उसमें इतना दम नहीं बचा था कि चूल्हा जला सके, अनाज पकाए… वह मां, जिसने एक शेर को जन्म दिया था, खुद भूख से लड़ते-लड़ते कमजोर पड़ रही थी।

सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाली बात यह है कि यह सब उस समय हो रहा था, जब देश आजाद हो चुका था… आजादी के दो साल बाद तक भी उस मां की हालत नहीं बदली। जिस आजादी के लिए उसके बेटे ने अपना खून बहाया, उसी आजाद देश में वह मां भूखी सो रही थी।

तभी सदाशिव राव मलकापुरकर जैसे एक सच्चे साथी की नजर उस पीड़ा पर पड़ी। वह आजाद के करीबी थे, और जब उन्होंने यह हाल देखा, तो उनका दिल भीतर से टूट गया।
उन्होंने गांव वालों से पूछा—“क्यों…? यह मां भूखी क्यों है…?”
और जवाब मिला—“यह एक डकैत की मां है… इसका बहिष्कार किया गया है…”

यह सुनकर मानो इंसानियत ही शर्म से झुक गई हो।
सदाशिव राव से यह सब देखा नहीं गया। उन्होंने उस टूटी हुई मां का हाथ थामा… उसे सम्मान दिया… और अपने साथ झांसी ले आए। उन्होंने न केवल उसे आश्रय दिया, बल्कि मां का दर्जा देकर उसकी सेवा की… जैसे कोई बेटा अपनी जननी की करता है।

लेकिन वक्त ने उस मां को बहुत थका दिया था… वर्षों का दुख, अपमान और संघर्ष उसके शरीर को भीतर तक तोड़ चुका था।
मार्च 1951… वह मां चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गई… बिना किसी शिकायत के… बिना किसी शोर के… जैसे उसने जिंदगी भर सब कुछ सहा था, वैसे ही अंतिम सांस भी ले ली।
सदाशिव राव ने खुद अपने हाथों से उनका अंतिम संस्कार किया… पूरे सम्मान के साथ… जैसे वह उनकी अपनी मां हों। झांसी के बड़ागांव गेट के पास उनकी स्मृति में एक स्थान बना, लेकिन क्या वह उस बलिदान का सम्मान है…? क्या यह उस मां के दर्द का मोल है…?

सोचिए… जिस मां ने एक अमर क्रांतिकारी को जन्म दिया, वह अपने अंतिम दिनों में भूख, अपमान और अकेलेपन से लड़ती रही…
यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है… यह एक सवाल है…
क्या हम सच में अपने नायकों का सम्मान करते हैं…?
या फिर वक्त के साथ उन्हें और उनके परिवारों को भूल जाते हैं…?

जब भी आप आजाद का नाम लें… तो एक पल के लिए उस मां को भी याद करिए…
जिसने अपने बेटे को देश को सौंप दिया…
और बदले में उसे मिला—अकेलापन, अपमान और अधूरी रोटी…!

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

*इंदिरा गांधी द्वारा भारत को दिया गया एक जख्म जो युगो युगो तक भारत माफ नहीं करेगा।*

पाकिस्तान के सिंध राज्य के थारपाकर जिले के तीन तालुका भारत ने 1971 में जीत लिए थे और 6 महीने तक तीन तालुका के सभी गांव में बनासकांठा का कलेक्टर ही राजस्व वसूली करता था।

6 महीने के बाद पता नहीं क्या इंदिरा गांधी को चूल मची कि उन्होंने यह पूरा एरिया जो करीब 800 गांव थे कुल 3 तालुका थे जिसमें नगर पाकर खोखरापार डेरा कासिम उन्हें वापस पाकिस्तान को दे दिया।

थर पारकर, डिप्लो और मीठी एरिया को जीतने वाली आर्मी यूनिट के इंचार्ज ब्रिगेडियर भवानी सिंह (जयपुर रियासत के राजा) थे।

भारत के कन्ट्रोल में आने के बाद कच्छ (भुज) के तत्कालीन कलेक्टर गोपालस्वामी को थर पारकर का एडिशनल चार्ज दिया गया था जो बाद में भारत के चीफ इलेक्शन कमिश्नर के पद से निवृत हुए थे।

इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जीते हुए विशाल एरिया जिनके कुछ हिस्से गुजरात के बनासकांठा में कुछ हिस्से गुजरात के कच्छ में तथा कुछ राजस्थान के बाड़मेर में मिला दिया गया था और जो 6 महीने तक भारत द्वारा शासित थे।

उन इलाकों को इंदिरा गांधी द्वारा पाकिस्तान को वापस देने के पीछे बड़ी रोचक कहानी है।

दरअसल अंग्रेजों ने पूरे विश्व में सबसे शानदार कैनाल सिस्टम पाकिस्तान के सिंध में बनाया था। आज भी अंग्रेजों के बनाए हुए कैनाल सिस्टम के दम पर पाकिस्तान पूरी दुनिया में सबसे शानदार कैनाल नेटवर्क वाला देश है।

सिंधु नदी के पानी को अंग्रेजों ने एक एक खेत तक इसलिए पहुंचाया था कि उस इलाके में गेहूं की खूब ज्यादा खेती हो सके और ब्रिटेन के मिलो को पास्ता और दूसरे फास्ट फूड बनाने के लिए रेगुलर गेहूं मिलता रहे।

जब इतना शानदार उपजाऊ प्रदेश भारत ने पाकिस्तान से छीन लिया तब पाकिस्तान ने अमेरिका के शरणों में गया।

उस वक्त पाकिस्तान और अमेरिका के बहुत अच्छे रिश्ते थे और 1971 में उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन थे।

रिचर्ड निक्सन ने इंदिरा गांधी को यह कहा कि आप अभूतपूर्व काम करते हुए यह सारे इलाके जो आपने पाकिस्तान से छीना है और जिसे आपने भारत में मिला लिया है उसे पाकिस्तान को वापस कर दो इसके बदले में हम आपको नोबेल शांति पुरस्कार दिलाएंगे और इस तरह से आप एक इंटरनेशनल लेवल की नेता बन जाएंगे और नोबेल शांति पुरस्कार से आपका नाम पूरी दुनिया में हो जाएगा।

इंदिरा गांधी निक्सन की बातों में आ गई और विशाल भूभाग जिसमें थारपारकर कार पारकर डेरा गाजी खान और मीरपुरखास के कुछ बड़े एरिया से वह सब के सब पाकिस्तान को वापस दे दिए और जब 3 महीने बाद नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हुई उसमें इंदिरा गांधी का नाम नहीं था।

इंदिरा गांधी ने निक्सन को फोन किया कि आपने कहा था कि आप मुझे नोबल शांति पुरस्कार दिलवा कर विश्व स्तर का नेता बनाएंगे तब निक्सन ने कहा नोबेल शांति तो नहीं मैंने तुम्हारे लिए शानदार उपहार भेजा है वह तुम्हें जल्द मिल जाएगा।

इस तरह इंदिरा गांधी ने भारत के इतिहास की सबसे बड़ी मूर्खता की।

आप ये सारी जानकारी गूगल पर सर्च कर सकते हैं। *

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

सुना है मैंने, वाचस्पति विवाह करके आए। पर वे तो धुनी आदमी थे और बारह वर्षों तक वे तो भूल ही गए कि पत्नी घर में है। कथा बड़ी मीठी है। वाचस्पति लिख रहे थे ब्रह्मसूत्र पर अपनी टीका। वे सुबह से सांझ और रात, आधी रात तक टीका लिखने में लगे रहते। पत्नी को घर ले आए। पिता ने कहा, शादी करनी है।
पिता बूढ़े थे। सुखी होते थे। शादी करके घर आ गए। पत्नी घर में चली गई। वाचस्पति अपनी टीका लिखने में लग गए। बारह वर्ष!
उन्हें खयाल ही न रहा, वह जो शादी हो गई, और पत्नी घर में आ गई। वह सब बात समाप्त हो गई।
लेकिन उन्होंने एक निर्णय किया था कि जिस दिन यह ब्रह्मसूत्र की टीका पूरी हो जाएगी, उस दिन मैं संन्यास ले लूंगा। बारह वर्ष बाद आधी रात टीका पूरी हो गई। अचानक वाचस्पति की आंखें पहली दफा टीका को छोड्कर इधर—उधर गईं। देखा कि एक सुंदर सा हाथ पीछे से आकर दीये की ज्योति को ऊंचा कर रहा है। सोने की चूडियां हैं हाथ पर।
लौटकर उन्होंने देखा, और कहा, कोई स्त्री इस आधी रात में मेरे पीछे! पूछा, तू कौन है? स्त्री ने कहा कि धन्य मेरे भाग्य कि आपने पूछा। बारह वर्ष पहले मुझे आप विवाह करके ले आए थे, तब से मैं प्रतीक्षा कर रही हूं कि कभी आप जरूर पूछेंगे कि तू कौन है! पर इतनी देर तू कहां थी? उसने कहा कि मैं रोज आती थी। जब दीये की लौ कम होती, तब बढ़ा जाती थी। दीया सांझ जला जाती थी, सुबह हटा लेती थी। आपके काम में बाधा न पड़े, इसलिए आपके सामने कभी नहीं आई। आपके काम में रंचमात्र बाधा न पड़े, इसलिए कभी मैंने कोशिश नहीं की कि बताऊं मैं भी हूं। मैं थी, और आप अपने काम में थे।
वाचस्पति की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, अब तो बहुत देर हो गई। क्योंकि मैंने तो निर्णय किया है कि जिस दिन जिस क्षण टीका पूरी हो जाएगी, उसी क्षण घर छोड्कर संन्यासी हो जाऊंगा। अब मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं! तूने बारह वर्ष प्रतीक्षा की और आज की रात मेरे जाने का वक्त है! अब मैं उठकर बस घर के बाहर होने को हूं। अब मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं? वाचस्पति की आंख में आंसू..।
उनकी स्त्री का नाम भामती था। इसलिए उन्होंने अपनी ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामती रखा है। भामती से  कोई संबंध नहीं है। उनकी ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामती से कोई लेना—देना नहीं है। लेकिन अपनी टीका का नाम उन्होंने भामती रखा है। बड़ी अदभुत टीका है।
वाचस्पति अदभुत आदमी थे। कहा कि बस, तेरी स्मृति में भामती इसका नाम रख देता हूं और घर से चला जाता हूं। लेकिन तू दुखी होगी। उनकी पत्नी ने कहा, दुखी नहीं, मुझसे ज्यादा धन्यभागी और कोई भी नहीं। इतना क्या कम है कि आपकी आंखों में मेरे लिए आंसू आ गए! मेरा जीवन कृतार्थ हो गया।
इतनी ही बात वाचस्पति की अपनी स्त्री से हुई है। लेकिन यह बारह साल के मौन के बाद ये जो थोड़े से शब्द हैं, इनको हम वाणी कह सकते हैं, वाक् कह सकते हैं।

ओशो, गीता दर्शन, भाग-5(प्रव.-126)