सन्त तुकाराम की पत्नी छतपर खड़ी देख रही थी कि उसके पति गन्ने का एक झारा लिये आ रहे हैं। वह नीचे आकर उनकी प्रतीक्षा करने लगी।
तुकाराम के हाथ में केवल एक गन्ना देखकर वह आपे से बाहर हो गायी, उसने खींचकर गन्ना तुकाराम की पीठ पर जड़ दिया। तुकाराम अचानक के प्रहार से देहली की चौखट से टकरा गये, सिर से खून बहने लगा।
खून पोंछकर उठकर बोले- ‘हे दयामयी ! तू कितनी अच्छी है, जिस गन्ने को तोड़ने की जहमत मुझे उठानी पड़ती, उसके दो टुकड़े तूने कर दिये, ले एक तू खा, एक मैं खाऊँ।’
रावणका पद-प्रहार सहकर भी विभीषण ने इतना ही कहा-आप मेरे पिता के समान हैं, आप राम की शरण में जाकर ही चैन से रह सकेंगे।
भृगुने भगवान् विष्णु को छातीपर पद-प्रहार किया, परंतु विष्णु उनका पैर सहलाने लगे, कहा- ऋषिवर ! मेरी छाती तो वज्र के समान है, आपके पैर कोमल हैं, चोट लग गयी होगी।
भगवान् बुद्ध को जब एक व्यक्ति ने आधे घण्टे तक गालियाँ दीं तो वे बोले- मुझे दूसरे गाँव जाना है। यदि और गालियाँ बच गयी हों, तो कल मैं यहीं पर इसी समय आऊँगा, आदमी पानी-पानी हो गया।
रामकृष्ण परमहंस एक भक्त के यहाँ भोजन के लिये निमन्त्रित थे, किंतु बहुत देर तक भी जब उस व्यक्ति ने उनकी सार-सम्हाल नहीं की, तो उनके साथी ने कहा- चलिये महाराज ! यहाँ से चलते हैं, परमहंस बोले- इतनी रात को खाना कहाँ खाऊँगा, तिस पर गाड़ीका किराया तीन रुपया कहाँ से दूँगा, इतने में ही भक्तको अपनी गलती का अहसास हुआ, वह दौड़ा हुआ आया और क्षमा-याचना की। रामकृष्ण हँसने लगे।
रमण महर्षि के आश्रममें कुछ चोरों ने आकर महर्षि की पिटाई की और धन सम्प्पति बताने को कहा। सुबह पुलिस के पूछने पर वे इतना ही बोले- कुछ नादान रात में को आये थे। हसते हुए बोले- उन्होंने मेरी पूजा भी की, किंतु मुझे उनके प्रति कोई शिकायत नहीं
सन्त एकनाथ गोदावरी में स्नान किया करते थे, इससे चिढ़कर एक पठान ने उनके ऊपर एक सौ आठ बार थूका। सन्त ने कहा आज गोदावरी में स्नान का खूब अवसर मिला। पठानने लज्जित होकर क्षमा माँगी।
दक्षिण के सन्त तिरुवल्लुवर को धोती की गाँठ ले जाते देखकर एक उद्दण्ड युवकने आवाज लगायी। ऐ बूढ़े ! क्या है गाँठमें?
सन्तने कहा धोतियाँ हैं, दिखा, एक की कीमत क्या है? बीस रुपये, उसने धोती के दो टुकड़े कर दिये। पूछा अब ? दस रुपये, वह टुकड़े करता रहा और सन्त शान्ति से कीमत बताते रहे। सन्त की शान्तिने युवक को रुला दिया, उसने सन्त से क्षमा माँगी।
सुकरात पत्नी के भुनभुनानेके बाद भी जब अपनी मित्रमण्डली से बात करना बन्द नहीं किये, तो पत्नी ने गन्दा पानी उन पर उड़ेल दिया। सन्त।ने हँसते हुए कहा- गरजने के पश्चात् बादल बरसते भी हैं, मित्रमण्डली हक्की-बक्की रह गयी। उन्होंने सन्त की महानताका परिचय पाया।
एकनाथ महाराज के गाँव में एक बार शर्त लगी कि जो कोई महाराज।को क्रोध दिला देगा, उसे दो सौ रुपये मिलेंगे। दूसरे दिन एक व्यक्ति नाथ के घर जाकर उनकी पत्नी की गोदी में चढ़कर बैठ गये।
महाराज पूर्ववत् भजन करते रहे। थोड़ी देर में उनकी पत्नी गिरिजाबाई दीपक में घी डालने को झुकीं कि वह व्यक्ति उछलकर उनकी पीठ पर सवार हो गया। नाथ ने कहा-देखना, इसको, कहीं गिर न पड़े, चोट न लग जाय। पत्नी ने जवाब दिया- आप बेफिक्र रहें। मुझे हरि पण्डित (पुत्र)-को इस तरह पीठ पर लादे-लादे कार्य करने।का अभ्यास है, व्यक्ति शर्मिन्दा होकर भाग खड़ा हुआ।
कहते हैं कि अक्रोधी मानवों के शरीर से ताजे गुलाब-सी भीनी-भीनी गन्ध निकलती रहती है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ऐसे ही महामानव थे। धरा ऐसे सन्त-महापुरुषोंको पाकर सनाथ होती है।
Day: February 21, 2026
रोम में एक सम्राट ने अपने बड़े वजीर को फांसी की आज्ञा दे दी थी। उस दिन उसका जन्म—दिन था, वजीर का जन्म—दिन था। घर पर मित्र इकट्ठे हुए थे। संगीतज्ञ आए थे, नर्तक थे, नर्तकियां थीं। भोज का आयोजन था, जन्म—दिन था उसका। कोई ग्यारह बजे दोपहर के बाद सम्राट के आदमी आए। वजीर के महल को नंगी तलवारों ने घेरा डाल दिया। भीतर आकर दूत ने खबर दी कि आपको खबर भेजी है सम्राट ने कि आज शाम छह बजे आपको गोली मार दी जाएगी।
उदासी छा गई। छाती पीटी जाने लगीं। वह घर जो नाचता हुआ घर था एकदम से मुर्दा हो गया, सन्नाटा छा गया, नृत्य, गीत बंद हो गए, वाद्य शून्य हो गए। भोजन का पकना, बनना बंद हो गया। मित्र जो आए थे वे घबड़ा गए। घर में एकदम उदासी छा गई। सांझ छह बजे, बस सांझ छह बजे आज ही मौत! सोचा भी नहीं था कि जन्म—दिन मृत्यु का दिन बन जाएगा।
लेकिन वह वजीर, वह जिसकी मौत आने को थी, वह अब तक बैठा हुआ नृत्य देखता था। अब वह खुद उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि वाद्य बंद मत करो और अब नृत्य देखने से ही न चलेगा, अब मैं खुद भी नाचूंगा। क्योंकि आखिरी दिन है यह। फिर इसके बाद कोई दिन नहीं है। और सांझ को अभी बहुत देर है। और चूंकि यह आखिरी सांझ है, अब इसे उदासी में नहीं गंवाया जा सकता। अगर बहुत दिन हमारे पास होते तो हम उदास भी रह सकते थे। वह लक्जरी भी चल सकती थी। अब अवसर न रहा, अब उदास होने के लिए क्षण भर का अवसर नहीं है। बजने दो वाद्य, हो जाए नृत्य शुरू। आज हम नाच लें, आज हम गीत गा लें, आज हम गले मिल लें, क्योंकि यह दिन आखिरी है।
लेकिन वह घर तो हो गया था उदास। वे वाद्यकार हाथ उठाते भी तो वीणा न बजती। उनके हाथ तो हो गए थे शिथिल। वे चौंक कर देखने लगे। वह वजीर कहने लगा, बात क्या है? उदास क्यों हो गए हो?
वे कहने लगे कि कैसे, मौत सामने खड़ी है, हम कैसे खुशी मनाए?
तो उस वजीर ने कहा जो मौत को सामने देख कर खुशी नहीं मना सकता वह जिंदगी में कभी खुशी नहीं मना सकता। क्योंकि मौत रोज ही सामने खड़ी है। मौत तो रोज ही सामने खड़ी है। कहां था पक्का यह कि मैं सांझ नहीं मर जाऊंगा? हर सांझ मर सकता था। हर सुबह मर सकता था। जिस दिन पैदा हुआ उस दिन से ही किसी भी क्षण मर सकता था। पैदा होने के बाद अब एक ही क्षण था मरने का जो कभी भी आ सकता था। मौत तो हर दिन खड़ी है। मौत तो सामने है। अगर मौत को सामने देख कर कोई खुशी नहीं मना सकता तो वह कभी खुशी नहीं मना सकता। और वह वजीर कहने लगा, और शायद तुम्हें पता नहीं है, जो मौत के सामने खड़े होकर खुशी मना लेता है उसके लिए मौत समाप्त हो जाती है। उससे मौत हार जाती है, जो मौत के सामने खड़े होकर हंस सकता है।
मजबूरी थी। वह वजीर तो नाचने लगा तो वाद्य—गीत शुरू हुए थके और कमजोर हाथों से। नहीं, सुर— साज नहीं बैठता था। उदास थे वे लोग, लेकिन फिर भी जब वह नाचने लगा था…।
सम्राट को खबर मिली, वह देखने आया। इसकी तो कल्पना भी न थी। जान कर ही जन्म—दिन के दिन यह खबर भेजी गई थी कि कोई गहरा बदला चुकाने की इच्छा थी कि जब सब खुशी का वक्त होगा तभी दुख की यह खबर गहरा से गहरा आघात पहुंचा सकेगी। जब सारे मित्र इकट्ठे होंगे तभी यह खबर— यह बदले की इच्छा थी।
लेकिन जब दूतों ने खबर दी कि वह आदमी नाचता है और उसने कहा है कि चूंकि सांझ मौत आती है इसलिए अब यह दिन गंवाने के लायक न रहा, अब हम नाच लें, अब हम गीत गा लें, अब हम मिल लें। अब जितना प्रेम मैं कर सकता हूं कर लूं और जितना प्रेम तुम दे सकते हो दे लो, क्योंकि अब एक भी क्षण खोने जैसा नहीं है।
सम्राट देखने आया। वजीर नाचता था। धीरे— धीरे, धीरे— धीरे उस घर की सोई हुई आत्मा फिर जग गई थी। वाद्य बजने लगे थे, गीत चल रहे थे।
सम्राट देख कर हैरान हो गया! वह उस वजीर से पूछने लगा, तुम्हें पता चल गया है कि सांझ मौत है और तुम हंस रहे हो और गीत गा रहे हो?
तो उस वजीर ने कहा. आपको धन्यवाद! इतने आनंद से मैं कभी भी न भरा था जितना आज भर गया हूं और आपकी बड़ी कृपा कि आपने आज के दिन ही यह खबर भेजी। आज सब मित्र मेरे पास थे, आज सब वे मेरे निकट थे जो मुझे प्रेम करते हैं और जिन्हें मैं प्रेम करता हूं। इससे सुंदर अवसर मरने का और कोई नहीं हो सकता था। इतने निकट प्रेमियों के बीच मर जाने से बड़ा सौभाग्य और कोई नहीं हो सकता था। आपकी कृपा, आपका धन्यवाद! आपने बड़ा शुभ दिन चुना है, फिर मेरा यह जन्म—दिन भी है। और मुझे पता भी नहीं था—बहुत जन्म—दिन मैंने मनाए हैं, बहुत सी खुशियों से गुजरा हूं लेकिन इतने आनंद से भी मैं भर सकता हूं इसका मुझे पता नहीं था। यह आनंद की इतनी इंटेंसिटी, तीव्रता हो सकती है मुझे पता नहीं था। आपने सामने मौत खड़ी करके मेरे आनंद को बड़ी गहराई दे दी। चुनौती और आनंद एकदम गहरा हो गया। आज मैं पूरी खुशी से भरा हुआ हूं मैं कैसे धन्यवाद करूं?
वह सम्राट अवाक खड़ा रह गया। उसने कहा कि ऐसे आदमी को फांसी लगाना व्यर्थ है, क्योंकि मैंने तो सोचा था कि मैं तुम्हें दुखी कर सकूंगा। तुम दुखी नहीं हो सके, तुम्हें मौत दुखी नहीं कर सकती तो तुम्हें मौत पर ले जाना व्यर्थ है। तुम्हें जीने की कला मालूम है, मौत वापस लौट जाती है।
जिसे भी जीने की कला मालूम है वह कभी भी नहीं मरा है और न मरता है, न मर सकता है। और जिसे जीने की कला मालूम नहीं वह केवल भ्रम में होता है कि मैं जी रहा हूं वह कभी नहीं जीता, न कभी जीआ है, न जी सकता है। उदास आदमी जी ही नहीं रहा है, न जी सकता है। उसे जीवन की कला का ही पता नहीं। केवल वे जीते हैं जो हंसते हैं, जो खुश हैं, जो प्रफुल्लित हैं, जो जीवन के छोटे से छोटे कंकड़—पत्थर में भी खुशी के हीरे—मोती खोज लेते हैं, जो जीवन के छोटे—छोटे रस में भी परमात्मा की किरण को खोज लेते हैं, जो जीवन के छोटे—छोटे आशीषों में, जीवन के छोटे—छोटे आशीषों की वर्षा में भी प्रभु की कृपा का आनंद अनुभव कर लेते हैं। केवल वे ही जीते हैं। केवल वे ही जीते हैं! केवल वे ही सदा जीए हैं और कोई भी आदमी जिंदा होने का हकदार नहीं है—जिंदा नहीं है।
ओशो, प्रभु की पगडंडिया (प्रवचन-6)