Posted in रामायण - Ramayan

साल 1880… काशी से आई एक रामलीला मंडली तुलसी गांव में ठहरी हुई थी। करीब 22–24 कलाकार, सब एक ही घर में रहते—वहीं रिहर्सल, वहीं भोजन, और वहीं से हर रात मंच पर भगवान राम की लीलाएं जीवंत होतीं।

इस मंडली के दो प्रमुख लोग थे—

पंडित कृपाराम दूबे — मंडली के संचालक, जो हारमोनियम पर बैठकर पूरी रामलीला का संचालन करते थे। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि लोग कहते थे, “उनके सुर में सिर्फ संगीत नहीं, श्रद्धा बहती है।”

और दूसरा था—
फौजदार शर्मा — साज-सज्जा, मंच, वेशभूषा और खासकर “शिव धनुष” बनाने की जिम्मेदारी उसी की थी। पूरे मंच का तकनीकी काम वही संभालता था… और उसे अपने काम पर बहुत गर्व भी था।

एक दिन रिहर्सल चल रही थी…
पंडित जी ने सहज भाव से कहा—
“फौजदार, इस बार धनुष थोड़ा हल्का और लचीला बनवाना… राम का पात्र निभा रहा लड़का अभी छोटा है, पिछली बार उसे धनुष तोड़ने में बहुत समय लग गया था।”

ये बस एक सुझाव था… लेकिन फौजदार के दिल में इसे अपमान समझा गया।

उसे लगा—
“मेरे काम पर उंगली उठाई जा रही है…!
मैं इतना मेहनत करता हूं, और मुझे ही सिखाया जा रहा है?”
उसके भीतर धीरे-धीरे अहंकार और गुस्सा भरने लगा।
और उसी पल उसने मन ही मन ठान लिया—
“अब दिखाऊंगा… असली धनुष क्या होता है।”
संयोग देखिए… अगले ही दिन था सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन।

फौजदार चुपचाप उस घर के मालिक के पास गया, जहां मंडली रुकी थी।
बोला—“एक लोहे की मजबूत छड़ चाहिए, मंच के काम के लिए।”
उसे एक मोटी और भारी लोहे की छड़ मिल गई।
वह उसे लेकर दूसरे गांव के लोहार के पास गया… और उस छड़ को धनुष का आकार दिलवा लाया।

ऊपर से कपड़ा लपेटा, रंगीन कागज लगाया… ताकि कोई पहचान न सके।
अब उसके हाथ में था—लोहे का शिव धनुष।
रात आई… रामलीला शुरू हुई…
हजारों लोग जमा थे, सबको इंतज़ार था उस दृश्य का—
जब श्रीराम शिव धनुष तोड़ेंगे।

फौजदार ने मौका देखकर असली लकड़ी का धनुष हटा दिया… और उसकी जगह लोहे का धनुष रख दिया।
फिर खुद पर्दे के पीछे खड़ा होकर तमाशा देखने लगा।
उसे पूरा भरोसा था—
आज राम धनुष नहीं तोड़ पाएंगे…
और सबके सामने पंडित जी की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी।

लीला आगे बढ़ी…
एक-एक कर सभी राजा आए, धनुष उठाने की कोशिश की… कोई सफल नहीं हुआ।
अब बारी थी राम की।
17 साल का वह बालक, राम का रूप धारण किए, आगे बढ़ा।
जैसे ही उसने धनुष को हाथ लगाया…
उसे समझ आ गया—
“ये धनुष कुछ और है…”
वह हिल भी नहीं रहा था।
बालक घबरा गया… और उसने पंडित कृपाराम दूबे की ओर देखा।

वह एक नजर… जैसे सब कह गई।
पंडित जी सब समझ गए।
आज सिर्फ एक दृश्य नहीं था…
आज हजारों लोगों की आस्था का प्रश्न था।
अगर राम धनुष नहीं तोड़ पाए…
तो यह सिर्फ एक कलाकार की हार नहीं होगी—
यह लोगों के विश्वास को चोट पहुंचाएगी।

पंडित जी ने आंखों से संकेत दिया—
“रुको… धनुष की परिक्रमा करो…”
और फिर उन्होंने आंखें बंद कर लीं।
अगले ही पल…
हारमोनियम से ऐसे सुर निकले…
जैसे किसी ने उसमें प्राण भर दिए हों।

ढोल-नगाड़े तेज़ हो गए…
पेट्रोमेक्स की लौ अचानक तेज़ चमकने लगी…
और बिना बादलों के आकाश में बिजली कौंध गई।
पूरा वातावरण बदल चुका था।
लोग स्तब्ध थे… कोई समझ नहीं पा रहा था क्या हो रहा है।
पंडित जी पूरी तरह समर्पित हो चुके थे…
और तभी उनके मुख से चौपाई निकली—

“लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े, काहू न लखा देख सब ठाढ़े…
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा, भरे भुवन धुनि घोर कठोरा…”

जैसे ही आखिरी शब्द निकले…
एक जोरदार कड़क…
और उसी क्षण—वह लोहे का धनुष दो टुकड़ों में टूट गया।
किसने तोड़ा… कैसे टूटा…
कोई नहीं जान पाया।
बस एक पल… और सब सामान्य।

पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा।
पंडित कृपाराम दूबे मंच के बीच गए…
टूटे धनुष और उस बालक के सामने दंडवत लेट गए।
उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
वह जानते थे—
आज मंच पर सिर्फ लीला नहीं हुई…
आज आस्था ने अहंकार को हरा दिया।
और पर्दे के पीछे खड़ा फौजदार…
जिसने बदले की आग में ये सब किया था…
वह भी स्तब्ध था।

उसका सिर झुक चुका था।
उसे समझ आ गया था—
जहां सच्ची भक्ति होती है…
वहां अहंकार टिक नहीं सकता।
राम किसी के नहीं होते…
लेकिन जो खुद को राम के हवाले कर दे—
राम उसके जरूर हो जाते हैं।
जय श्री राम 🙏

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