एक महात्माजी रात्रि के समय में ‘श्रीराम’ नाम का जाप करते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। जाप करते हुए वे एक गहन जंगल से गुजर रहे थे। विरक्त होने के कारण वे महात्मा बार-बार देशाटन करते रहते थे। वे किसी एक स्थान में अधिक समय नहीं रहते थे। वे ईश्वर नाम प्रेमी थे। इसलिये दिन-रात उनके मुख से राम नाम जप चलता रहता था। स्वयं राम नाम का जाप करते तथा औरों को भी उसी मार्ग पर चलाते।
महात्माजी गहन जंगल में मार्ग भूल गये थे पर अपनी मस्ती में चले जा रहे थे कि जहाँ राम ले चले वहाँ। दूर अँधेरे के बीच में बहुत सी दीपमालाएँ प्रकाशित थीं। महात्माजी उसी दिशा की ओर चलने लगे। निकट पहुँचते ही देखा कि वटवृक्ष के पास अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बज रहे हैं, नाच -गान और शराब की महफ़िल जमी है। कई स्त्री पुरुष साथ में नाचते-कूदते-हँसते तथा औरों को हँसा रहे हैं। उन्हें महसूस हुआ कि वे मनुष्य नहीं प्रेतात्मा हैं।
महात्माजी को देखकर एक प्रेत ने उनका हाथ पकड़कर कहाः ओ मनुष्य ! हमारे राजा तुझे बुलाते हैं, चल। वे मस्तभाव से राजा के पास गये जो सिंहासन पर बैठा था। वहाँ राजा के इर्द-गिर्द कुछ प्रेत खड़े थे।
प्रेतराज ने कहाः तुम इस ओर क्यों आये ? हमारी मंडली आज मदमस्त हुई है, इस बात का तुमने विचार नहीं किया ? तुम्हें मौत का डर नहीं है ?
अट्टहास करते हुए महात्माजी बोलेः मौत का डर ? और मुझे ? राजन् ! जिसे जीने का मोह हो उसे मौत का डर होता हैं। हम साधु लोग तो मौत को आनंद का विषय मानते हैं। यह तो देहपरिवर्तन हैं जो प्रारब्धकर्म के बिना किसी से हो नहीं सकता।
प्रेतराजः तुम जानते हो हम कौन हैं ?
महात्माजीः मैं अनुमान करता हूँ कि आप प्रेतात्मा हो।
प्रेतराजः तुम जानते हो, लोग समाज हमारे नाम से काँपता हैं।
महात्माजीः प्रेतराज ! मुझे मनुष्य में गिनने की गलती मत करना। हम जिन्दा दिखते हुए भी जीने की इच्छा से रहित, मृततुल्य हैं। यदि जिन्दा मानो तो भी आप हमें मार नहीं सकते। जीवन-मरण कर्माधीन हैं। मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ ?
महात्माजी की निर्भयता देखकर प्रेतों के राजा को आश्चर्य हुआ कि प्रेत का नाम सुनते ही मर जाने वाले मनुष्यों में एक इतनी निर्भयता से बात कर रहा हैं। सचमुच, ऐसे मनुष्य से बात करने में कोई हर्ज नहीं।
प्रेतराज बोलाः पूछो, क्या प्रश्न है ?
महात्माजीः प्रेतराज ! आज यहाँ आनंदोत्सव क्यों मनाया जा रहा है ?
प्रेतराजः मेरी इकलौती कन्या, योग्य पति न मिलने के कारण अब तक कुँवारी हैं। लेकिन अब योग्य जमाई मिलने की संभावना हैं। कल उसकी शादी हैं इसलिए यह उत्सव मनाया जा रहा हैं।
महात्माजी (हँसते हुए): “तुम्हारा जमाई कहाँ है ? मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
प्रेतराजः जीने की इच्छा के मोह के त्याग करने वाले महात्मा ! अभी तो वह हमारे पद (प्रेतयोनी) को प्राप्त नहीं हुआ हैं। वह इस जंगल के किनारे एक गाँव के श्रीमंत (धनवान) का पुत्र है। महादुराचारी होने के कारण वह इस समय भयानक रोग से पीड़ित है। कल संध्या के पहले उसकी मौत होगी। फिर उसकी शादी मेरी कन्या से होगी। इस लिये रात भर गीत-नृत्य और मद्यपान करके हम आनंदोत्सव मनायेंगे।
महात्माजी वहाँ से विदा होकर श्रीराम नाम का अजपाजाप करते हुए जंगल के किनारे के गाँव में पहुँचे। उस समय सुबह हो चुकी थी। एक ग्रामीण से महात्मा नें पूछा “इस गाँव में कोई श्रीमान् का बेटा बीमार हैं ?”
ग्रामीणः हाँ, महाराज ! नवलशा सेठ का बेटा सांकलचंद एक वर्ष से रोगग्रस्त हैं। बहुत उपचार किये पर उसका रोग ठीक नहीं होता।
महात्माजी नवलशा सेठ के घर पहुँचे सांकलचंद की हालत गंभीर थी। अन्तिम घड़ियाँ थीं फिर भी महात्माजी को देखकर माता-पिता को आशा की किरण दिखी। उन्होंने महात्मा का स्वागत किया।
सेठपुत्र के पलंग के निकट आकर महात्माजी रामनाम की माला जपने लगे। दोपहर होते-होते लोगों का आना-जाना बढ़ने लगा।
महात्मा: क्यों, सांकलचंद ! अब तो ठीक हो ?
सांकलचंद ने आँखें खोलते ही अपने सामने एक प्रतापी सन्त को देखा तो रो पड़ा। बोला “बाबाजी ! आप मेरा अंत सुधारने के लिए पधारे हो। मैंने बहुत पाप किये हैं। भगवान के दरबार में क्या मुँह दिखाऊँगा ? फिर भी आप जैसे सन्त के दर्शन हुए हैं, यह मेरे लिए शुभ संकेत हैं।” इतना बोलते ही उसकी साँस फूलने लगी, वह खाँसने लगा।
“बेटा ! निराश न हो भगवान राम पतित पावन है। तेरी यह अन्तिम घड़ी है। अब काल से डरने का कोई कारण नहीं। खूब शांति से चित्तवृत्ति के तमाम वेग को रोककर श्रीराम नाम के जप में मन को लगा दे। जाप में लग जा। शास्त्र कहते हैं-
चरितम् रघुनाथस्य शतकोटिम् प्रविस्तरम्।
एकैकम् अक्षरम् पूण्या महापातक नाशनम्।।
अर्थातः सौ करोड़ शब्दों में भगवान राम के गुण गाये गये हैं। उसका एक-एक अक्षर ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश करने में समर्थ हैं।
दिन ढलते ही सांकलचंद की बीमारी बढ़ने लगी। वैद्य-हकीम बुलाये गये। हीरा भस्म आदि कीमती औषधियाँ दी गयीं। किन्तु अंतिम समय आ गया यह जानकर महात्माजी ने थोड़ा नीचे झुककर उसके कान में रामनाम लेने की याद दिलायी।
राम बोलते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। लोगों ने रोना शुरु कर दिया। शमशान यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। मौका पाकर महात्माजी वहाँ से चल दिये। नदी तट पर आकर स्नान करके नामस्मरण करते हुए वहाँ से रवाना हुए। शाम ढल चुकी थी। फिर वे मध्यरात्रि के समय जंगल में उसी वटवृक्ष के पास पहुँचे। प्रेत समाज उपस्थित था।
प्रेतराज सिंहासन पर हताश होकर बैठे थे। आज गीत, नृत्य, हास्य कुछ न था। चारों ओर करुण आक्रंद हो रहा था, सब प्रेत रो रहे थे।
महात्मा ने पूछा “प्रेतराज ! कल तो यहाँ आनंदोत्सव था, आज शोक-समुद्र लहरा रहा हैं। क्या कुछ अहित हुआ हैं ?”
प्रेतराजः हाँ भाई ! इसीलिए रो रहे हैं। हमारा सत्यानाश हो गया। मेरी बेटी की आज शादी होने वाली थी। अब वह कुँवारी रह जायेगी।
महात्मा: प्रेतराज ! तुम्हारा जमाई तो आज मर गया हैं। फिर तुम्हारी बेटी कुँवारी क्यों रही ?
प्रेतराज ने चिढ़कर कहाः तेरे पाप से ! मैं ही मूर्ख हूँ कि मैंने कल तुझे सब बता दिया। तूने हमारा सत्यानाश कर दिया।
महात्मा ने नम्रभाव से कहाः मैंने आपका अहित किया यह मुझे समझ में नहीं आता। क्षमा करना, मुझे मेरी भूल बताओगे तो मैं दुबारा नहीं करूँगा।
प्रेतराज ने जलते हृदय से कहाः यहाँ से जाकर तूने मरने वाले को नाम स्मरण का मार्ग बताया और अंत समय भी राम नाम कहलवाया। इससे उसका उद्धार हो गया और मेरी बेटी कुँवारी रह गयी।
महात्माजीः क्या ? केवल एक बार नाम जप लेने से वह प्रेतयोनि से छूट गया ? आप सच कहते हो ?
प्रेतराजः हाँ भाई ! जो मनुष्य राम नामजप करता हैं वह राम नामजप के प्रताप से कभी हमारी योनि को प्राप्त नहीं होता। भगवन्नाम जप में नरकोद्धारिणी शक्ति हैं।
प्रेत के द्वारा रामनाम का यह प्रताप सुनकर महात्माजी प्रेमाश्रु बहाते हुए भाव समाधि में लीन हो गये। उनकी आँखे खुलीं तब वहाँ प्रेत-समाज नहीं था, बाल सूर्य की सुनहरी किरणें वटवृक्ष को शोभायमान कर रही थीं।
Day: February 19, 2026
“हर चीज का हल होता है,आज नहीं तो कल होता है|”
एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये की जब तुम्हे लगे की बस अब तो सब ख़तम होने वाला है ,परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ ,कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो ,हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना ,उससे पहले नहीं!
राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया !एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया! एक शेर का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया,घना जंगल और सांझ का समय , तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई, राजा आगे आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे! बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया ! भूख प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी ,उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया ! और सांस रोक कर बैठ गया , दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे धीरे पास आने लगी ! दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा ,उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे ! वो जिंदगी से निराश हो ही गया था , की उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई !उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा ! उस पर्ची पर लिखा था —”यह भी कट जाएगा “
राजा को अचानक ही जैसे घोर अन्धकार मे एक ज्योति की किरण दिखी , डूबते को जैसे कोई सहारा मिला ! उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ ! उसे लगा की सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा ,फिर मे क्यों चिंतित होऊं ! अपने प्रभु और अपने पर विश्वासरख उसने स्वयं से कहा की हाँ ,यह भी कट जाएगा !
और हुआ भी यही ,दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी ,कुछ समय बाद वहां शांति छा गई ! राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह अपने राज्य मे वापस आ गया !
दोस्तों,यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है यह हम सब की कहानी है !हम सभी परिस्थिति,काम ,तनाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं की हमे कुछ सूझता नहीं है ,हमारा डर हम पर हावी होने लगता है ,कोई रास्ता ,समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आता ,लगने लगता है की बस, अब सब ख़तम ,है ना?
जब ऐसा हो तो २ मिनट शांति से बेठिये ,थोड़ी गहरी गहरी साँसे लीजिये ! अपने आराध्य को याद कीजिये और स्वयं से जोर से कहिये –यह भी कट जाएगा ! आप देखिएगा एकदम से जादू सा महसूस होगा , और आप उस परिस्थिति से उबरने की शक्ति अपने अन्दर महसूस करेंगे ! आजमाया हुआ है ! बहुत कारगर है !
आशा है जैसे यह सूत्र मेरे जीवन मे मुझे प्रेरणा देता है ,आपके जीवन मे भी प्रेरणादायक सिद्ध होगा !
पान से गंधलाये दाँत… चेहरे पर उतर आयी झुर्रियाँ… ढली जवानी का क्वारापन और अपने ही भाई कामबख्स के साथ अवैध सम्बन्ध…
उस समय की बादशाह बेग़म #ज़ीनत_उन_निसा जो औरंगजेब की तीसरी संतान और बड़ी लाड़ली भी…
ज़ीनत अपनी जवानी में बड़ी ही खूबसूरत थी पर घर के अमरुद घर में खाने की रवायत ने उसका ब्याह न होने दिया….
और जब औरंगजेब दक्कन में मराठों के विरुद्ध अभियान पर निकला तो उसके खेमे में उसकी जवान रखैल उदयपुरी महल और अधेड़ बेटी ज़ीनत भी साथ थे
ज़ीनत के सामने तो मुग़लिया दरबारी खौफ खाते पर पीठ पीछे उसकी उम्र और हरकतों को बूढी घोड़ी लाल लगाम का तमगा भी देते…. और खुद से 24 साल छोटे सौतेले भाई मोहम्मद कामबख्स मिर्ज़ा से सम्बन्ध पर खूब कानाफूसी भी करते… कामबख्स पर ज़ीनत ने बड़ी छोटी उम्र का रहते ही कब्ज़ा ज़मा लिया था… और इसी के चलते सगा भाई अकबर उससे सख्त ख़फ़ा रहता था..
खैर जब #छत्रपति_शम्भूराजे धोखे से गिरफ्तार हुए और उसके बाद उनपर हुए अत्याचार में इस यौन कुंठित ज़ीनत का भी बड़ा हाथ था…
46 की उम्र की बिन ब्याही ज़ीनत औरंगजेब के साथ वहाँ मौजूद थी जब औरंगजेब ने शम्भूराजे को इस्लाम कुबूलने का प्रस्ताव दिया और इसके बदले 50 हज़ार सवार की मनसबदारी व सारे किले वापस करने का वादा भी किया…
शम्भूराजे हँस पड़े और पास खड़े कवी कलश से बोले “कलश औरंगज़ेब अगर अपनी ये बेटी भी मुझसे ब्याह दे तो भी मेरा ज़वाब न होगा”
ज़ीनत अपनी पूरी फ़ौज़ के आगे की इस बेज्जती से तिलमिला उठी….. और शम्भूराजे भी जानते थे कि इसका परिणाम क्या होगा…. पर छावा औरंगजेब और उसकी बेटी के दिल पर कभी न ठीक होने वाली चोट कर चुका था….
और अगले 30 साल में मराठों ने छत्रपति शम्भूराजे के दिए इस घाव को नासूर बना दिया जिसने मुग़ल सत्ता को तिल तिल ख़त्म किया….

एक के साथ एक फ्री
आजकल एक बेहद मजेदार पुस्तक पढ़ रहा हूँ- आख़िरी निज़ाम। उक्त पुस्तक हैदराबाद के निज़ाम वंश पे है।
इस पुस्तक से एक मजेदार वाक्या पढ़िए।
तुर्की के अंतिम ख़लीफ़ा को तुर्की से निर्कर्षित कर पेरिस जाना पड़ा। अंतिम ख़लीफ़ा अपनी बेगमों और औलादों के साथ पेरिस रहने लगे किंतु ख़र्चे पूरे नहीं पड़ते थे। लिहाजा ख़लीफ़ा ने दुनिया भर के नवाब बादशाह आदि से गुहार लगाई कि हमको वज़ीफ़ा भेजो। ये वो दौर था जब भारत में खिलाफत आंदोलन में मौलाना शौकत अली और मौलाना अली जौहर गांधीजी के साथ अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे। मुस्तफा कमाल ने आख़िर ख़िलाफ़त ख़त्म कर के ख़लीफ़े को फ्रांस भेज दिया।
दोनों मौलानाओं ने हिन्दोस्तान के सब रजवाड़ों से गुहार लगाई कि पेरिस में रह रहे इन ख़लीफ़ा को वो माहवार वज़ीफ़ा दें। हैदराबाद के कंजूस निज़ाम से भी इन्होंने तीन सौ पाउंड महीने की किश्त बँधवाई। निज़ाम उस समय दुनिया का सबसे अमीर आदमी था।
अब इधर से कहानी में ट्विस्ट आया।
ख़लीफ़े की औलादों में प्रमुख थी एक बेहद ख़ूबसूरत शहज़ादी- दुर्रुश्शेहवर। शहज़ादी बेहद सुंदर थी और उससे निकाह करने बड़े बड़े लोग तैयार थे जैसे-
ईरान का शाह, इजिप्ट का बादशाह और तुर्की शहज़ादे आदि। सूची काफ़ी बड़ी थी। मतलब शहजादी को चाहने वालों की कमी ना थी।
किंतु ख़लीफ़ा ने शहज़ादी का निकाह करवाया निजाम के सबसे बड़े बेटे से। कारण था- निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी था और वो ख़लीफ़ा की मुफ़लिसी ख़त्म कर सकता था।
मौलाना शौकत अली और अली जौहर ने इस विवाह में अहम भूमिका निभाई- बिचौलिया बने। ख़लीफ़े ने निजाम से कहा- अपनी शहजादी को तुम्हारे लड़के से निकाह के बदले में तुम्हें मेहर में पचास हज़ार पाउंड देने होंगे।
कंजूस निजाम ने साफ़ इंकार कर दिया – कहा ये मुमकिन नहीं। हैदराबाद के गलियारों में अफ़वाह थी- निजाम एक मारवाड़ी जौहरी का खून है जो उनकी अम्मी को गहने आदि खूब बेचता था। निजाम ने कहा- पचास हज़ार पाउंड बहुत ज़ियादा है।
अब मौलाना शौक़त और जौहर ने निजाम ख़लीफ़ा से मांडवाली की- कहा- एक काम करो, पचास हज़ार पाउंड ले लो किंतु एक की जगह दो शहज़ादी निजाम के दो लड़कों से बियाह दो।
निजाम ने कहा- ये ठीक है, एक के साथ एक फ्री। इधर से इंडिया में लगने वाली सेल- buy one get one free सेल की शुरुआत हुई।
तय वक्त पे निजाम ने दोनों शहजादों को फ्रांस भेजा। ख़लीफ़ा को ये मंजूर ना था कि पचास हज़ार में वो दो शहज़ादी दें। उसने एक चाल चली।
उसनेनिजाम के छोटे लड़के के सामने अपनी रिश्तेदारी की भतीजी खड़ी कर दी, जिसे देख छोटा निजामजादा अपना सुध बुध खो बैठा और उसने भतीजी से निकाह करने का फैसला किया। इस निकाह की मेहर की रकम तय हुई पच्चीस हज़ार पाउंड।
इस तरफ़ से ख़लीफ़े ने पचास हज़ार ख़ुद की शहज़ादी के एवज़ में लिए और पच्चीस हज़ार भतीजी के। और बेचारा निज़ाम मांडवली के चक्कर में और रक़म से हाथ धो बैठा।
उक्त क़िस्सा पढ़कर मीर मुंशी जी ने कहा- अब ये तय है निज़ाम मारवाड़ी जौहरी की औलाद नहीं हो सकता, ऐसा घाटे का सौदा मारवाड़ी लोग करते ही नहीं है।
तस्वीर में ख़लीफ़ा अपनी शहजादी और दामाद के साथ!

एक के साथ एक फ्री
आजकल एक बेहद मजेदार पुस्तक पढ़ रहा हूँ- आख़िरी निज़ाम। उक्त पुस्तक हैदराबाद के निज़ाम वंश पे है।
इस पुस्तक से एक मजेदार वाक्या पढ़िए।
तुर्की के अंतिम ख़लीफ़ा को तुर्की से निर्कर्षित कर पेरिस जाना पड़ा। अंतिम ख़लीफ़ा अपनी बेगमों और औलादों के साथ पेरिस रहने लगे किंतु ख़र्चे पूरे नहीं पड़ते थे। लिहाजा ख़लीफ़ा ने दुनिया भर के नवाब बादशाह आदि से गुहार लगाई कि हमको वज़ीफ़ा भेजो। ये वो दौर था जब भारत में खिलाफत आंदोलन में मौलाना शौकत अली और मौलाना अली जौहर गांधीजी के साथ अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे। मुस्तफा कमाल ने आख़िर ख़िलाफ़त ख़त्म कर के ख़लीफ़े को फ्रांस भेज दिया।
दोनों मौलानाओं ने हिन्दोस्तान के सब रजवाड़ों से गुहार लगाई कि पेरिस में रह रहे इन ख़लीफ़ा को वो माहवार वज़ीफ़ा दें। हैदराबाद के कंजूस निज़ाम से भी इन्होंने तीन सौ पाउंड महीने की किश्त बँधवाई। निज़ाम उस समय दुनिया का सबसे अमीर आदमी था।
अब इधर से कहानी में ट्विस्ट आया।
ख़लीफ़े की औलादों में प्रमुख थी एक बेहद ख़ूबसूरत शहज़ादी- दुर्रुश्शेहवर। शहज़ादी बेहद सुंदर थी और उससे निकाह करने बड़े बड़े लोग तैयार थे जैसे-
ईरान का शाह, इजिप्ट का बादशाह और तुर्की शहज़ादे आदि। सूची काफ़ी बड़ी थी। मतलब शहजादी को चाहने वालों की कमी ना थी।
किंतु ख़लीफ़ा ने शहज़ादी का निकाह करवाया निजाम के सबसे बड़े बेटे से। कारण था- निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी था और वो ख़लीफ़ा की मुफ़लिसी ख़त्म कर सकता था।
मौलाना शौकत अली और अली जौहर ने इस विवाह में अहम भूमिका निभाई- बिचौलिया बने। ख़लीफ़े ने निजाम से कहा- अपनी शहजादी को तुम्हारे लड़के से निकाह के बदले में तुम्हें मेहर में पचास हज़ार पाउंड देने होंगे।
कंजूस निजाम ने साफ़ इंकार कर दिया – कहा ये मुमकिन नहीं। हैदराबाद के गलियारों में अफ़वाह थी- निजाम एक मारवाड़ी जौहरी का खून है जो उनकी अम्मी को गहने आदि खूब बेचता था। निजाम ने कहा- पचास हज़ार पाउंड बहुत ज़ियादा है।
अब मौलाना शौक़त और जौहर ने निजाम ख़लीफ़ा से मांडवाली की- कहा- एक काम करो, पचास हज़ार पाउंड ले लो किंतु एक की जगह दो शहज़ादी निजाम के दो लड़कों से बियाह दो।
निजाम ने कहा- ये ठीक है, एक के साथ एक फ्री। इधर से इंडिया में लगने वाली सेल- buy one get one free सेल की शुरुआत हुई।
तय वक्त पे निजाम ने दोनों शहजादों को फ्रांस भेजा। ख़लीफ़ा को ये मंजूर ना था कि पचास हज़ार में वो दो शहज़ादी दें। उसने एक चाल चली।
उसनेनिजाम के छोटे लड़के के सामने अपनी रिश्तेदारी की भतीजी खड़ी कर दी, जिसे देख छोटा निजामजादा अपना सुध बुध खो बैठा और उसने भतीजी से निकाह करने का फैसला किया। इस निकाह की मेहर की रकम तय हुई पच्चीस हज़ार पाउंड।
इस तरफ़ से ख़लीफ़े ने पचास हज़ार ख़ुद की शहज़ादी के एवज़ में लिए और पच्चीस हज़ार भतीजी के। और बेचारा निज़ाम मांडवली के चक्कर में और रक़म से हाथ धो बैठा।
उक्त क़िस्सा पढ़कर मीर मुंशी जी ने कहा- अब ये तय है निज़ाम मारवाड़ी जौहरी की औलाद नहीं हो सकता, ऐसा घाटे का सौदा मारवाड़ी लोग करते ही नहीं है।
तस्वीर में ख़लीफ़ा अपनी शहजादी और दामाद के साथ!

जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध में थीं सोनिया गाँधी, उसे NGT ने दी मंजूरी: जानें- क्या है ₹92000 करोड़ की यह परियोजना, जिससे सिंगापुर को पछाड़ देगा भारत ? 18 February, 2026 रुपम
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को मंजूरी,फोटो साभार-आजतक
देश के सबसे बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी ने मंजूरी दे दी है। 92,000 करोड़ रुपए से बनने वाला यह प्रोजेक्ट भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा। सैन्य रणनीति, सुरक्षा, व्यापार और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अंडमान निकोबार का सबसे निचला द्वीप ग्रेट निकोबार काफी अहम है। सरकार को उम्मीद है कि 2040 तक ये पूरी तरह तैयार हो जाएगा।अगर ये प्रोजेक्ट पूरी तरह बन जाता है तो भारत को एक ‘हॉगकॉग’ या ‘सिंगापुर’ मिल जाएगा। भारत हिन्द महासागर में चीन पर बढ़त बना लेगा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। एनजीटी की कोलकाता स्थिति ईस्टर्न जोनल बेंच ने परियोजना को सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण बताते हुए मंजूरी दी, साथ ही यहाँ पर्यावरण के पर्याप्त सुरक्षा के उपाय किये जाने का शर्त भी लगाया।
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का जलडमरूमध्य वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है। यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर का ‘चोक प्वांइट पॉलिटिक्स’ का केन्द्र भी माना जाता है।
इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट। पावर प्लांट, जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से फायदा
भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन जाएगा, लाखों नौकरियाँ पैदा होगी। अभी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ज्यादा होने से परेशानी आ रही है। जब ग्रेट निकोबार में आधुनिक पोर्ट बनेगा तो कंटेनर सीधे यहाँ पहुँचेंगे। समय के साथ-साथ खर्च भी कम होंगे। दूसरे देशों की शिप भी पहुँचेगी और भारत को समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मिलेगी। इतना ही नहीं सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी ये प्रोजेक्ट काफी अहम है। इस प्रोजेक्ट पर 92000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।
चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्यौकफ्यू और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाहों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। एक तरह से उसने समुद्र में भारत को घेरने की कोशिश की है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाए। इस प्रोजेक्ट से निगरानी और सैनिकों की मौजूदगी आसान हो जाएगी। इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए भी ये काफी अहम है।
साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया। 90000 करोड़ रुपए का ये प्रोजेक्ट शिपिंग, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय के तहत बनेगा और इसे केंद्र से पैसा मिलेगा। इसे चार चरणों में बनाया जाएगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख TEU (कंटेनर) संभालेगा। 2058 तक ये बंदरगाह 1.6 करोड़ कंटेनर तक संभालने के काबिल हो जाएगा।
ये सिर्फ एक और बंदरगाह बनाने की बात नहीं है, बल्कि ये भारत की समुद्री कमजोरी को ठीक करने का मौका है। भारत के पूर्वी तट के ज्यादातर बंदरगाहों की गहराई 8-12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए कम है। दुनिया के बड़े बंदरगाह 12-20 मीटर गहरे हैं, जो 1.65 लाख टन से ज्यादा के जहाज संभाल सकते हैं। इसीलिए भारत का 25% कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से जाता है। इससे हर साल 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान और अर्थव्यवस्था को 3,000-4,500 करोड़ का झटका लगता है।
गलाथिया बे की 18-20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और पूर्व-पश्चिम समुद्री रास्ते के पास इसकी जगह इसे इस निर्भरता को खत्म करने के लिए बिल्कुल सही बनाती है। रणनीतिक तौर पर ये भारत को बांग्लादेश और म्यांमार के कार्गो के लिए सिंगापुर से मुकाबला करने की ताकत देता है, जहाँ अभी 70% से ज्यादा कार्गो विदेशी बंदरगाहों से जाता है।
कॉन्ग्रेस कर रही है विरोध
कॉन्ग्रेस और पर्यावणविद इसके दीर्घकालीन पर्यावरण क्षति को लेकर विरोध कर रहे हैं। परियोजना का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस और पर्यावरणविद का मानना है कि इससे जैव विविधता, पारिस्थिकी तंत्र और शेरोन जैसे जनजातीय समुदाय को नुकसान होगा, जिनकी आबादी पहले ही सैकड़ों में बची है।
परियोजना के विरोध में कई याचिकाएँ कोलकाता हाईकोर्ट में अभी लंबित हैं। इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने कहा कि ‘शोम्पेन और निकोबारी आदिवासियों का अस्तित्व दाँव पर है’ और ‘भारत की आने वाली पीढ़ियाँ इस बड़े पैमाने की तबाही को नहीं झेल सकतीं।’
लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी कुछ नहीं कह रही हैं। भारत का 40% से ज्यादा ट्रांसशिपमेंट कोलंबो से होता है, जहाँ चीन एक टर्मिनल चलाता है और उसने वहाँ अरबों रुपये लगाए हैं। श्रीलंका बीजिंग के कर्ज में डूबता जा रहा है और वहाँ चीनी जासूसी जहाज भी रुकते हैं। इससे भारत की कमजोरी साफ दिखती है। ऐसे में गलाथिया बे का विरोध करना पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि रणनीतिक भूल है।
भारत अब विदेशी बंदरगाहों का इस्तेमाल और चीन के दबदबे को हिन्द महासागर में झेल नहीं सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण को नष्ट करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, नौकरियाँ पैदा करने और भारत को समुद्री ताकत बनाने का प्रोजेक्ट है।
ऑप इंडिया
साल 1880… काशी से आई एक रामलीला मंडली तुलसी गांव में ठहरी हुई थी। करीब 22–24 कलाकार, सब एक ही घर में रहते—वहीं रिहर्सल, वहीं भोजन, और वहीं से हर रात मंच पर भगवान राम की लीलाएं जीवंत होतीं।
इस मंडली के दो प्रमुख लोग थे—
पंडित कृपाराम दूबे — मंडली के संचालक, जो हारमोनियम पर बैठकर पूरी रामलीला का संचालन करते थे। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि लोग कहते थे, “उनके सुर में सिर्फ संगीत नहीं, श्रद्धा बहती है।”
और दूसरा था—
फौजदार शर्मा — साज-सज्जा, मंच, वेशभूषा और खासकर “शिव धनुष” बनाने की जिम्मेदारी उसी की थी। पूरे मंच का तकनीकी काम वही संभालता था… और उसे अपने काम पर बहुत गर्व भी था।
एक दिन रिहर्सल चल रही थी…
पंडित जी ने सहज भाव से कहा—
“फौजदार, इस बार धनुष थोड़ा हल्का और लचीला बनवाना… राम का पात्र निभा रहा लड़का अभी छोटा है, पिछली बार उसे धनुष तोड़ने में बहुत समय लग गया था।”
ये बस एक सुझाव था… लेकिन फौजदार के दिल में इसे अपमान समझा गया।
उसे लगा—
“मेरे काम पर उंगली उठाई जा रही है…!
मैं इतना मेहनत करता हूं, और मुझे ही सिखाया जा रहा है?”
उसके भीतर धीरे-धीरे अहंकार और गुस्सा भरने लगा।
और उसी पल उसने मन ही मन ठान लिया—
“अब दिखाऊंगा… असली धनुष क्या होता है।”
संयोग देखिए… अगले ही दिन था सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन।
फौजदार चुपचाप उस घर के मालिक के पास गया, जहां मंडली रुकी थी।
बोला—“एक लोहे की मजबूत छड़ चाहिए, मंच के काम के लिए।”
उसे एक मोटी और भारी लोहे की छड़ मिल गई।
वह उसे लेकर दूसरे गांव के लोहार के पास गया… और उस छड़ को धनुष का आकार दिलवा लाया।
ऊपर से कपड़ा लपेटा, रंगीन कागज लगाया… ताकि कोई पहचान न सके।
अब उसके हाथ में था—लोहे का शिव धनुष।
रात आई… रामलीला शुरू हुई…
हजारों लोग जमा थे, सबको इंतज़ार था उस दृश्य का—
जब श्रीराम शिव धनुष तोड़ेंगे।
फौजदार ने मौका देखकर असली लकड़ी का धनुष हटा दिया… और उसकी जगह लोहे का धनुष रख दिया।
फिर खुद पर्दे के पीछे खड़ा होकर तमाशा देखने लगा।
उसे पूरा भरोसा था—
आज राम धनुष नहीं तोड़ पाएंगे…
और सबके सामने पंडित जी की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी।
लीला आगे बढ़ी…
एक-एक कर सभी राजा आए, धनुष उठाने की कोशिश की… कोई सफल नहीं हुआ।
अब बारी थी राम की।
17 साल का वह बालक, राम का रूप धारण किए, आगे बढ़ा।
जैसे ही उसने धनुष को हाथ लगाया…
उसे समझ आ गया—
“ये धनुष कुछ और है…”
वह हिल भी नहीं रहा था।
बालक घबरा गया… और उसने पंडित कृपाराम दूबे की ओर देखा।
वह एक नजर… जैसे सब कह गई।
पंडित जी सब समझ गए।
आज सिर्फ एक दृश्य नहीं था…
आज हजारों लोगों की आस्था का प्रश्न था।
अगर राम धनुष नहीं तोड़ पाए…
तो यह सिर्फ एक कलाकार की हार नहीं होगी—
यह लोगों के विश्वास को चोट पहुंचाएगी।
पंडित जी ने आंखों से संकेत दिया—
“रुको… धनुष की परिक्रमा करो…”
और फिर उन्होंने आंखें बंद कर लीं।
अगले ही पल…
हारमोनियम से ऐसे सुर निकले…
जैसे किसी ने उसमें प्राण भर दिए हों।
ढोल-नगाड़े तेज़ हो गए…
पेट्रोमेक्स की लौ अचानक तेज़ चमकने लगी…
और बिना बादलों के आकाश में बिजली कौंध गई।
पूरा वातावरण बदल चुका था।
लोग स्तब्ध थे… कोई समझ नहीं पा रहा था क्या हो रहा है।
पंडित जी पूरी तरह समर्पित हो चुके थे…
और तभी उनके मुख से चौपाई निकली—
“लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े, काहू न लखा देख सब ठाढ़े…
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा, भरे भुवन धुनि घोर कठोरा…”
जैसे ही आखिरी शब्द निकले…
एक जोरदार कड़क…
और उसी क्षण—वह लोहे का धनुष दो टुकड़ों में टूट गया।
किसने तोड़ा… कैसे टूटा…
कोई नहीं जान पाया।
बस एक पल… और सब सामान्य।
पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा।
पंडित कृपाराम दूबे मंच के बीच गए…
टूटे धनुष और उस बालक के सामने दंडवत लेट गए।
उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
वह जानते थे—
आज मंच पर सिर्फ लीला नहीं हुई…
आज आस्था ने अहंकार को हरा दिया।
और पर्दे के पीछे खड़ा फौजदार…
जिसने बदले की आग में ये सब किया था…
वह भी स्तब्ध था।
उसका सिर झुक चुका था।
उसे समझ आ गया था—
जहां सच्ची भक्ति होती है…
वहां अहंकार टिक नहीं सकता।
राम किसी के नहीं होते…
लेकिन जो खुद को राम के हवाले कर दे—
राम उसके जरूर हो जाते हैं।
जय श्री राम 🙏

ज़ब अमित शाह गुजरात के गृहमंत्री थे तो एक आतंकवादी सोहराबुद्दीन शेख गुजरात ATS ने मार दिया था।
केंद्र मे कांग्रेस आ चुकी थी,
कांग्रेस ने फ़ौरन पहले तो सेहराबुद्दीन को क्लीन चीट दिलाने की कोशिश की मगर सफलता नहीं मिली, फिर फर्जी एनकाउंटर की फाइल्स लाद दी, अमित शाह को जेल तक हो गयी।
उन दिनों दूरदर्शन जो कि सरकारी चैनल है, उस पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह का आना बैन था।
हालांकि उनके तमाम विरोधियों को बुलाकर कांग्रेस एक नैरेटिव बनाने की कोशिश जरूर करती थी।
फिर आया 2014, उसके बाद ये बेन हट गया। आज अमित शाह गुजरात से प्रमोट होकर भारत के गृहमंत्री बन गए और अहंकारी माता पुत्र एजेंसियो के चक्कर लगा रहे है।
1938 मे नेहरू जी ने नेशनल हेराल्ड अख़बार शुरू किया था इसे AJL नाम की कंपनी चलाती थी। 2008 मे ये अख़बार बंद हो गया, AJL के पास 2000 करोड़ की अचल सम्पत्ति भी थी।
घोटाला यही से शुरू हुआ, AJL ने कांग्रेस पार्टी से 90 करोड़ का लोन लिया और इसे चुकाने की जगह अपने शेयर दे दिये।
बाद मे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने यंग इंडिया नाम से कंपनी बनाई और 50 लाख कांग्रेस को देकर ये सारे शेयर्स अपने नाम कर लिये।
दरसल AJL मे 154 निवेशक भी थे जो पूर्व क्रांतिकारियो के परिवार से थे। उन्हें पता भी नहीं था कि उनके पास AJL के शेयर है उसी का फायदा गाँधी परिवार ने उठाया और यंग इंडिया के माध्यम से 50 लाख मे सारे शेयर्स अपने नाम कर लिये।
ये क्रिस्टल क्लियर घोटाला है और चोरी है, ऐसा भी नहीं कि गाँधी परिवार किसी गुलाम को आगे कर सके डायरेक्टर भी इटालियन माता और बहरूपिया पुत्र ही है।
इन्हे जेल भी हो चुकी है ये बस जमानत पर बाहर घूम रहे है, अमित शाह आज भी चाहे तो किसी भी दिन इन्हे जेल भेज सकते है। लेकिन बीजेपी जो कर रही है उसे आर्म ट्विस्टिंग कहते है। ये दोनों माँ बेटे बीजेपी की जीत की गारंटी है।
ज़ब तक ये दोनों बाहर है कांग्रेस के सारे नेता इनके गुलाम है और ये दोनों बहुत कमजोर प्रतिद्वंदी है। कांग्रेस कमजोर नहीं है लेकिन वो इन दोनों का बोझा उठाकर भागती है इसलिए पीछे रह जाती है।
दूसरी ओर कांग्रेस के पास आज भी ये क्षमता है कि वो देश मे कही भी दंगे करवा सकती है और ज़ब ज़ब ऐसा प्रयास होता है तो आप देखते है कि इसी केस मे समन आ जाता है। माँ बेटे कितने ही बहादुर बने मगर अंदर से डरपोक है।
शाहीन बाग़ मे ज़ब हिंसा हुई तो पहले दिन राहुल गाँधी का हिन्दू विरोधी बयान आया और अगले दिन नेशनल हेराल्ड केस मे एक नया समन आ गया।
यदि आप ये पैटर्न देखोगे तो ऐसा ही जेएनयू के समय हुआ था और CAA के समय भी। तेलंगाना मे कांग्रेस की सरकार है हैदराबाद मे मुसलमानो का कुछ इलाको मे वर्चस्व भी है, क्या कांग्रेस इतनी सीधी है कि वफ्फ बिल पर वहाँ दंगे नहीं करवा पा रही?
दरसल ज़ब भी लगता है कि कांग्रेस अब दंगे या हिंसा पर आने वाली है नेशनल हेराल्ड का तेल लगाकर संघी लाठी से माँ बेटे को कूटा जाता है।
ये एक बहुत बड़ा कारण है कि पिछले 10 वर्षो मे कई बड़े परिवर्तन हुए मगर दंगे वैसे नहीं हुए जैसे 2014 से पहले अपेक्षित थे।
आप तय समझिये माँ बेटे जेल नहीं जाने वाले, इन्हे मोटा भाई बाहर ही रखेंगे। ताकि भविष्य मे कई अवसरो पर आर्म ट्विस्ट कर अपना काम करवा सके। इस पद के लोगो के लिये जेल से ज्यादा बुरी सजा कोर्ट के चक्कर लगाना और जवाब देना है 💯 #gaming #mexicanmusic #trend #love #viralchallenge #socialimpact #viralphoto #viralreelschallenge #reelsfypシ #siblingrivalry #RIP #trendingnow #viralphotochallenge