Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

धैर्य

एक गाँव में रामू नाम का किसान रहता था, उसके कुछ बड़े सपने थे। वह अपनी खेती से खुश नहीं था और अलग फसल लगाने की सोच रहा था ताकि उसे भविष्य में ज्यादा मुनाफा हो सके। China में एक बाँस का पेड़ होता है, जिसकी खेती करने से बहुत पैसे कमाए जा सकते हैं लेकिन रोपित करने के बाद चार से पांच साल तक उसे पानी और खाद देना होता है। जब रामू को उस बाँस के पेड़ के बारे में पता चला तो उसनें सोचा कि यही आगे बढ़ने के लिए एक बड़ा अवसर है और वह चाइनीस बास के पेड़ का बीज ले आया और उसनें अपने खेत में उसकी फसल बो दी।

जब गांव के दुसरे लोगों को पता चला कि वह अपनी खेती में फसल परिवर्तन कर रहा है और अलग तरह की कोई फसल बो रहा है तब गांववालों ने उसका बहुत मजाक बनाया और सबनें कहा कि ऐसी फसल उग ही नहीं सकती। रामू अपने फैसले पर अड़ा रहा और बाँस का पेड़ उगाने के लिए उसनें दृढ़ निश्चय कर लिया। धीरे-धीरे समय बीतता गया, उसके आसपास के सारे खेत फसलों से लहलहा रहे थे लेकिन रामू का खेत बंजर पड़ा था।

एक साल हो गये, दुसरे लोगों ने अपने खेत की फसलें तक काट डालीं लेकिन रामू का खेत अभी भी ज्यों का त्यों बंजर पड़ा था। अब उसके घरवाले भी उससे कहते फिरते कि उन्हें खेत में वही पुरानी फसलें बो देनी चाहिए लेकिन रामू सभी को धैर्य रखने और मेहनत करने की ही सलाह देता रहता। रामू अपने गांव में निकलता तो सभी उसे ‘बाँस का पेड़ जा रहा है’ करके चिढ़ाया करते थे।

दूसरों की बातों को अनसुना करके रामू अपने काम में ही लगा रहता था। देखते ही देखते चार साल बीत गये, रामू फसलों पर खाद और पानी अभी भी दे रहा था पर उसके खेत में अंकुर तक नहीं फूट रहे थे। सभी लोगों के ताने, मजाक उड़ाने वाली बातों से वह अब भी परेशान नहीं हुआ, लोग उससे कहते कि तुम्हारा परिवार भूखा मर जाएगा, अपनी पागलपन छोड़ो। लेकिन रामू अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। पांचवा साल जब रामू अपनी खेत पर गया तब उसनें पाया कि बंजर जमीन अब बंजर नहीं थी, उसमें अंकुर फूट चुके थे, छोटी छोटी पत्तियां बाहर निकली हुई थीं। यह देखकर रामू बहुत खुश हुआ, उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। और देखते ही देखते ६ सप्ताह में बाँस का वह पेड़ ९० फीट तक बढ़ गया। सारे गांव वाले यह देखकर हैरान थे, रामू आज बहुत ज्यादा खुश था, क्योंकि उसका जो भरोसा था, और उसके अन्दर जो धैर्य थी उसका नतीजा ही आज उसे देखने को मिला।

कहानी से सीख

इस कहानी से हमें २ बड़ी बातें सीखने को मिलती हैं कि या तो हम वो किसान बन जाएं, जहाँ हम अपना एक गोल सेट करते हैं, उस पर भरोसा करते हैं, और दुनिया वाले क्या कहते हैं इस पर ध्यान नहीं देते। हम बस अपना काम करते जाते हैं, ५ साल तक बिना किसी परिणाम के हमें खाद और पानी देना होता है या तो फिर एक बास का पेड़ बन जाएं, जहाँ हम ५ साल तक अपनी जड़ें मजबूत कर रहे हैं, इतनी कि ६ हप्ते में अपनी उस सफलता को संभाल पाएं। यदि हम दोनों में से कोई एक भी बन जाते हैं तो ये बहुत बड़ी बात होगी।

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एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक लड़का रहता था। गरीब परिवार में जन्मे रामू के पास साधन सीमित थे, लेकिन उसकी इच्छाशक्ति असीमित थी। उसका सपना था कि वह एक दिन धावक बने और देश के लिए पदक जीतकर गाँव का नाम रोशन करे। हालांकि, उसके गाँव के लोग हमेशा उसकी क्षमता पर संदेह करते थे और उसे हंसी में उड़ा देते थे।

रामू के पिता एक छोटे किसान थे, जो अपने खेतों में सुबह से शाम तक मेहनत करते थे। उन्होंने अपने बेटे को कभी हार न मानने का पाठ पढ़ाया था। लेकिन रामू की माँ को हमेशा चिंता होती थी कि कहीं उनके बेटे के सपने टूट न जाएँ। गाँव के लोग भी यही कहते थे, “रामू, दौड़ने का सपना देखना छोड़ दो। यहाँ से बड़े खिलाड़ी नहीं निकलते।”

हर साल गाँव में एक दौड़ प्रतियोगिता होती थी, जो रामू के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। पिछली तीन बार वह हार चुका था। उसके हारने के बाद लोग उस पर हँसते थे और कहते थे, “तुमसे न हो पाएगा, रामू। बड़े सपने देखने के लिए बड़ी ताकत चाहिए।”

इस बार रामू ने ठान लिया कि वह अपनी हर कमजोरी को ताकत में बदल देगा। उसने गाँव के मैदान में रोज़ सुबह चार बजे उठकर दौड़ का अभ्यास करना शुरू कर दिया। उसकी हर एक दौड़ में उसकी साँसें तेज हो जाती थीं, पैर थक जाते थे, लेकिन उसकी आँखों में एक चमक थी—जुनून की, जो उसे रुकने नहीं देती थी। उसने किताबों से नई तकनीकों के बारे में सीखा, अपने शरीर को मजबूत करने के लिए व्यायाम किए, और अपनी हर कमजोरी पर कड़ी मेहनत की।

प्रतियोगिता का दिन आ गया। आकाश में बादल थे, मानो मौसम भी रामू की परीक्षा लेने के लिए तैयार था। दौड़ शुरू होते ही सभी धावकों ने तेज़ी दिखाई। रामू का मन भी उथल-पुथल कर रहा था। लेकिन उसने अपनी आँखें लक्ष्य पर टिका लीं। जब सबको लगा कि रामू पिछड़ रहा है, तभी उसने अपनी स्पीड बढ़ाई और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

अंतिम चरण में, जब सबकी उम्मीदें टूट रही थीं, रामू ने अपनी पूरी ताकत और अपने पिता के द्वारा सिखाई गई मेहनत का सहारा लिया। उसकी हर दौड़, हर कदम, उसके सपनों का साकार रूप था। वह तेज़ी से फिनिश लाइन की ओर दौड़ा और सबको पीछे छोड़ते हुए सबसे पहले उस रेखा को पार किया।

भीड़ में सन्नाटा था, फिर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। लोगों के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे, और रामू के चेहरे पर एक अद्भुत शांति। उसने जीत लिया था, लेकिन उस जीत का मतलब अब उसके लिए कुछ और था। यह जीत सिर्फ प्रतियोगिता की नहीं थी; यह उसके खुद पर, अपने सपनों पर, और अपनी मेहनत पर विश्वास की जीत थी।

उसके पिता ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा, “रामू, तुमने साबित कर दिया कि सच्ची जीत वो होती है जब इंसान खुद को हरा दे और अपने सपनों के लिए हर बाधा पार कर जाए।”

रामू की आँखों में आँसू थे, लेकिन वो आँसू हार के नहीं थे, बल्कि उन संघर्षों और कड़ी मेहनत के थे जो उसने इस दिन के लिए की थी। गाँव के लोग जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे, आज गर्व से उसका नाम ले रहे थे।

तात्पर्य: “जीत सिर्फ दौड़ में सबसे तेज़ होने की नहीं होती; असली जीत वो होती है जब हम अपने संदेहों और सीमाओं को पार करके अपने सपनों को साकार करते हैं।”

Posted in संस्कृत साहित्य

ગરુડ પુરાણ અને કર્મોના સિદ્ધાંત પર આધારિત એક સુંદર અને માહિતીપ્રદ લેખ અહીં પ્રસ્તુત છે:
મૃત્યુ પછી શું? ગરુડ પુરાણ અનુસાર આત્માની રહસ્યમય યાત્રા અને કર્મોનો ન્યાય
શું મૃત્યુ એ જીવનનો અંત છે? કે પછી એક નવી યાત્રાની શરૂઆત? આપણા શાસ્ત્રો, ખાસ કરીને ગરુડ પુરાણ, કહે છે કે મૃત્યુ એ માત્ર શરીરનો અંત છે, આત્માનો નહીં. આત્માની ખરી કસોટી તો મૃત્યુ પછી શરૂ થાય છે, જ્યાં માણસની ઓળખ તેના નામ કે હોદ્દાથી નહીં, પરંતુ તેના ‘કર્મો’ થી થાય છે.
વૈતરણી નદી અને યમદૂતોનું આગમન
શાસ્ત્રો અનુસાર, જ્યારે પ્રાણ શરીર છોડે છે ત્યારે યમદૂતો આત્માને લેવા આવે છે. આત્માને યમલોક લઈ જતી વખતે રસ્તામાં ‘વૈતરણી નદી’ આવે છે. એવું કહેવાય છે કે આ નદીમાં પાણી નહીં પણ લોહી અને પરુ વહે છે. જે મનુષ્યે જીવનમાં ગાયોની સેવા કરી હોય, દાન-પુણ્ય કર્યા હોય, તેમના માટે આ નદી પાર કરવી સરળ બને છે. ગાયનું પૂંછડું પકડીને આત્મા આ ભયાનક નદી પાર કરી શકે છે. પરંતુ પાપીઓ માટે આ નદી એક ડરામણું સ્વપ્ન બની જાય છે.
ચિત્રગુપ્તનો ચોપડો અને ન્યાય
યમરાજના દરબારમાં ચિત્રગુપ્ત દરેક જીવના પાપ અને પુણ્યનો હિસાબ રાખે છે. ત્યાં જૂઠ કે છળકપટ ચાલતું નથી. જો પાપોનું પલ્લું ભારે હોય, તો આત્માને શુદ્ધ કરવા માટે નરકની યાાતનાઓ ભોગવવી પડે છે. ગરુડ પુરાણમાં ૨૮ પ્રકારના નરક અને તેમાં મળતી સજાઓનું વર્ણન છે, જે સાંભળીને પણ કંપારી છૂટી જાય.
કેટલાક મુખ્ય નરક અને તેના કારણો:
૧. કુંભીપાક નરક (માતા-પિતાનો અનાદર):
જે લોકો પોતાના માતા-પિતાનું અપમાન કરે છે અથવા તેમને દુઃખ પહોંચાડે છે, તેમને આ નરકમાં સ્થાન મળે છે. અહીં ઉકળતા તેલમાં આત્માને યાતના આપવામાં આવે છે. શાસ્ત્રો માને છે કે માતા-પિતાના આંસુ આ નરકનું દ્વાર ખોલે છે.
૨. તામિસ્ત્ર અને અંધતામિસ્ત્ર (દગો અને વિશ્વાસઘાત):
જે લોકોએ બીજાની સંપત્તિ પચાવી પાડી હોય, છેતરપિંડી કરી હોય કે કોઈનો વિશ્વાસ તોડ્યો હોય, તેમને અહીં ગાઢ અંધકારમાં રાખવામાં આવે છે અને ભયાનક સજા આપવામાં આવે છે. ખાસ કરીને મિત્રો કે જીવનસાથી સાથે દગો કરનારાઓ માટે આ સજા નિર્ધારિત છે.
૩. રૌરવ નરક (ક્રૂરતા અને હિંસા):
જેમણે પોતાના સ્વાર્થ માટે નિર્દોષ જીવોની હત્યા કરી હોય કે બીજાને શારીરિક પીડા આપી હોય, તેમને અહીં બળતી જમીન પર ચાલવું પડે છે અને ‘રુરુ’ નામના ભયાનક જીવો તેમને કરડે છે.
૪. અસિપત્રવન (પાખંડ અને ખોટો ઉપદેશ):
જે લોકો ધર્મના નામે ધતિંગ કરે છે, લોકોને ખોટા રસ્તે દોરે છે, તેમને આ જંગલ જેવા નરકમાં મોકલવામાં આવે છે. અહીં ઝાડના પાંદડા તલવાર જેવા તીક્ષ્ણ હોય છે, જે શરીરને વીંધી નાખે છે.
૫. કૃમિભોજન (બીજાનું હક છીનવવું):
જે લોકો મહેનત વગર બીજાની કમાણી ખાઈ જાય છે અથવા કોઈનો હક મારે છે, તેમને કીડાઓથી ભરેલા કુંડમાં નાખવામાં આવે છે.
નિષ્કર્ષ: ડર નહીં, જાગૃતિ જરૂરી
ગરુડ પુરાણના આ વર્ણનોનો હેતુ મનુષ્યને ડરાવવાનો નથી, પરંતુ તેને સત્કર્મના માર્ગે વાળવાનો છે. આ વાતો આપણને શીખવે છે કે ‘જેવું વાવશો, તેવું લણશો’. જો આપણે આજે કોઈનું ભલું કરીએ, માતા-પિતાની સેવા કરીએ અને નીતિમત્તાથી જીવીએ, તો મૃત્યુ પછીની ગતિ સુધરી જાય છે.
જીવન એક અમૂલ્ય ભેટ છે. તેને બીજાના ભલા માટે અને ઈશ્વર સ્મરણમાં વિતાવવું એ જ સાચો ધર્મ છે. અંતે તો સાથે માત્ર ‘પુણ્ય’ જ આવવાનું છે.
જય શ્રી હરિ

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एक मेडिकल स्कूल में एक दिन प्रोफेसर ने एक छात्र से पूछा।

हमारी कितनी किडनी होते हैं।
छात्र ने जवाब दिया
चार

प्रोफेसर ने कहा
चार सच में

वो एक ऐसा प्रोफेसर था जिसे दूसरों की गलती दिखाना अच्छा लगता था। उसने अपने सहायक से कहा और थोड़ी घास ले आओ क्योंकि कमरे में  गधा है

छात्र ने कहा
और मेरे लिए एक कॉफी भी ले आओ
प्रोफेसर बहुत गुस्से में आ गया और छात्र को कक्षा से बाहर निकाल दिया। लेकिन वह छात्र कोई आम छात्र नहीं था। वह अपरिसियो टोरेल्ली अपोरेल्ली थे जिन्हें Baron of Itarare भी कहा जाता है। वह बहुत प्रसिद्ध हास्य लेखक थे।

जैसे ही वह बाहर जा रहे थे उन्होंने प्रोफेसर से कहा
आपने मुझसे पूछा कि हमारी कितने किडनी हैं। हमारी चार किडनी हैं दो मेरे हैं और दो आपकी।

हम का मतलब है दो से ज्यादा लोग। आप काफी मुझे पीने दीजिए और घास आपके लिए है।

इस तरह उन्होंने प्रोफेसर को जवाब दिया और यह दिखाया कि कभी कभी सही समय पर बुद्धिमानी और हाज़िरजवाबी सबसे बड़ा हथियार होती है।

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JNU के बारे में कुछ रोचक जानकारिया –
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1. JNU दिल्ली में कुल 1019 एकड़ में फैली हुई है I
2. JNU में वार्षिक फीस तक़रीबन 300/- रुपये है I
3. JNU के हॉस्टल में रूम का किराया मात्र 11/- रुपये प्रति महिना है I
4. JNU हॉस्टल की मेस में खाना ऑलमोस्ट फ्री है I
5. JNU में हर 6 छात्र पर 1 प्रोफेसर है I
6. JNU में सन 1990 में 11 हॉस्टल थे जिनकी संख्या अब 22 हो चुकी है I
7. JNU में एक छात्र पर साल में तक़रीबन 11.25 लाख रुपये का खर्चा आता है I
8. केंद्र सरकार ने 2014-15 में JNU को 42 करोड़ की सब्सिडी दी है I
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इतना कुछ होने के बावजूद JNU में सिखाया जाता है ये –
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1. भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह
2. अफजल हम शर्मिंदा है तेरे कातिल जिन्दा है
3. लड़कर लेंगे आजादी, काश्मीर मांगे आजादी
4. पकिस्तान जिंदाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद
5 मोदी तेरी कब्र खुदेगी

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હિન્દુઓનો વિસરાયેલો કોહટ નરસંહાર: એક પ્રારંભિક ઇતિહાસ
સ્વામી દયાનંદ સરસ્વતીએ સનાતન સમાજ માટે જે ઉત્કૃષ્ટ સેવાઓ આપી હતી, તેમાંની એક હતી અત્યંત અસરકારક ‘શુદ્ધિ ચળવળ’ની રચના. તેમના સમયમાં, જબરદસ્તીથી ધર્માંતરિત થયેલા હિન્દુઓને તેમના પૂર્વજોના ધર્મમાં પાછા લાવવાનું કાર્ય સાહસિક અને ઉમદા બંને હતું. આજે તેને ‘ઘર વાપસી’ તરીકે ઓળખવામાં આવે છે. શરૂઆતમાં, શુદ્ધિ ચળવળને નોંધપાત્ર સફળતા મળી.
૧૮૮૩માં સ્વામી દયાનંદ સરસ્વતીના અવસાન પછી, તેમનું કાર્ય તેમના યોગ્ય શિષ્ય સ્વામી શ્રદ્ધાનંદ દ્વારા વધુ ઉત્સાહથી આગળ ધપાવવામાં આવ્યું. સ્વામી શ્રદ્ધાનંદ ઇસ્લામિક કટ્ટરપંથી ભાઈઓ, મુહમ્મદ અલી અને શૌકત અલી સાથે ગાંધીજીના સંબંધો જોઈને ચિંતિત હતા. તેમને ગાંધીજીના ‘હિન્દુ-મુસ્લિમ ભાઈ-ભાઈ’ના પ્રમાણપત્રની જરૂર નહોતી. સ્વામી શ્રદ્ધાનંદના પ્રભાવનો અંદાજ એ વાત પરથી લગાવી શકાય છે કે મલકાણા રાજપૂતોને ફરીથી હિન્દુ ધર્મમાં લાવવાના તેમના પ્રયત્નો સફળ રહ્યા હતા. આ રાજપૂતો લાંબા સમયથી પોતાના ધર્મમાં પાછા આવવા માંગતા હતા, તેમને માત્ર સુરક્ષા અને યોગ્ય નેતૃત્વની જરૂર હતી, જે સ્વામીજીએ પૂરી પાડી.
૧૯૨૩ સુધીમાં, મુસ્લિમ ઉલેમાઓ એટલા ગભરાઈ ગયા કે તેમણે તાત્કાલિક પગલાં લેવાનું નક્કી કર્યું. ૧૯૨૩ના મધ્યમાં, મુસ્લિમ નેતૃત્વએ મુસ્લિમોને એક સંગઠિત સમુદાય તરીકે તૈયાર કરવા માટે ‘તન્ઝીમ અને તબલીગ’ ચળવળ શરૂ કરી.
સ્વામી શ્રદ્ધાનંદે તરત જ વળતો પ્રહાર કર્યો અને ‘સંગઠન’ ચળવળ શરૂ કરી. આ દરમિયાન હિન્દુઓમાં ‘ક્ષત્રિય ભાવ’ અને શારીરિક સંસ્કૃતિનો પુનઃઉદય થયો. ઉત્તર અને ઉત્તર-પશ્ચિમ ભારતમાં અખાડા અને માર્શલ આર્ટ્સ સેન્ટરો શરૂ થયા, જેનાથી તબલીગીઓ વધુ ડરી ગયા. સ્વામી શ્રદ્ધાનંદને શ્રીમંત હિન્દુ જમીનદારોનો ટેકો મળ્યો, જેમણે સેંકડો લોકોને સનાતન ધર્મમાં પાછા લાવવામાં મદદ કરી.
આ તણાવની શરૂઆત હતી. મુહમ્મદ અલીએ તેનું વર્ણન આ રીતે કર્યું હતું:
“હું પ્રામાણિકપણે સ્વીકારું છું કે આવા પ્રસંગોએ હું એ દિવસો માટે નિસાસો નાખું છું જ્યારે અમારા પૂર્વજો માથા ગણવાને બદલે માથા કાપીને બાબતોનો ઉકેલ લાવતા હતા.”

આર.સી. મજુમદારનું વિશ્લેષણ સ્પષ્ટ છે:
હિન્દુઓ સ્વાભાવિક રીતે જ શુદ્ધિ ચળવળ પ્રત્યે મુસ્લિમોના વલણથી નારાજ હતા અને અન્યને પોતાના ધર્મમાં પાછા લાવવાને ન્યાયી માનતા હતા – એક એવો અધિકાર જેનો મુસ્લિમો અત્યાર સુધી કોઈપણ રોકટોક વગર ઉપયોગ કરતા આવ્યા હતા.

મે ૧૯૨૩માં, કલકત્તામાં મસ્જિદ પાસેથી પસાર થતી આર્ય સમાજની શોભાયાત્રા પર મુસ્લિમ ટોળાએ હુમલો કર્યો કારણ કે ત્યાં ‘ધાર્મિક સંગીત’ વાગી રહ્યું હતું. આનાથી લોહિયાળ રમખાણો થયા જેમાં બંને પક્ષે ભારે જાનહાનિ થઈ. પરંતુ સનાતન ભાવના ડગી નહીં.
મુસ્લિમ ઉલેમાઓ આ સહન ન કરી શક્યા. ૨૯ ડિસેમ્બર ૧૯૨૩ના રોજ કાકીનાડા (આંધ્રપ્રદેશ) માં જમીયત-ઉલ-ઉલેમા કોન્ફરન્સ બોલાવવામાં આવી, જેમાં શુદ્ધિ ચળવળને “ભારતના સૌથી મોટા દુશ્મન” ગણાવવામાં આવી.
૧૫ જુલાઈ ૧૯૨૪: બકરી ઈદ અને દિલ્હીની હિંસા
દિલ્હીમાં, કેટલાક કસાઈઓએ હિન્દુ વિસ્તારના રસ્તા પરથી બળજબરીથી ગાયને કતલખાને લઈ જવાનો પ્રયાસ કર્યો, જ્યારે બ્રિટિશ સરકારે તે રસ્તો બંધ રાખવાનો આદેશ આપ્યો હતો. આનાથી રમખાણો ફાટી નીકળ્યા. મુસ્લિમ કસાઈઓએ ૧૨ હિન્દુઓની હત્યા કરી અને ૧૦૦ જેટલાને ઘાયલ કર્યા. હિન્દુઓએ ડરના માર્યા દુકાનો અને ઘરો બંધ કરી દીધા, છતાં છૂટાછવાયા હુમલાઓ અને મંદિર અપવિત્ર કરવાની ઘટનાઓ ચાલુ રહી.
૧૯૨૪ની બકરી ઈદ પર માત્ર દિલ્હી જ નહીં, પણ નાગપુર, જબલપુર અને બેરારમાં પણ આવી જ હિંસા જોવા મળી હતી. દરેક જગ્યાએ કારણ એક જ હતું: મુસ્લિમો દ્વારા ગાયની કુરબાનીનો આગ્રહ અને હિન્દુઓ દ્વારા તેનો વિરોધ.
ગુલબર્ગાનો પ્રકોપ
સૌથી ભયાનક સ્થિતિ ગુલબર્ગામાં હતી, જે ત્યારે હૈદરાબાદના નિઝામના શાસન હેઠળ હતું. ત્યાં મુસ્લિમ ટોળાઓએ લગભગ ૧૫ મંદિરો પર હુમલો કર્યો અને મૂર્તિઓ તોડી નાખી. તેમણે પવિત્ર ‘શરણ વિશ્વેશ્વર મંદિર’ પર હુમલો કર્યો અને રથને સળગાવવાનો પ્રયાસ કર્યો. બીજા દિવસે હિંસા વધુ વધી અને લગભગ ૫૦ જેટલા મંદિરોને નુકસાન પહોંચાડવામાં આવ્યું, મૂર્તિઓ ખંડિત કરવામાં આવી અને હિન્દુઓની દુકાનો લૂંટવામાં આવી.
આ ઘટનાઓના સમાચાર આખા ભારતમાં ફેલાઈ ગયા. જ્યારે હિન્દુઓ આક્રોશ અને દુઃખમાં હતા, ત્યારે મુસ્લિમ નેતૃત્વએ ગુલબર્ગાની ઘટનાને એક પ્રેરણા તરીકે લીધી. તેમનું આગામી લક્ષ્ય હતું: કોહટ (હાલ પાકિસ્તાનમાં). હંમેશની જેમ, હિન્દુઓ અજાણ અને બિનતૈયાર રહ્યા.