धैर्य
एक गाँव में रामू नाम का किसान रहता था, उसके कुछ बड़े सपने थे। वह अपनी खेती से खुश नहीं था और अलग फसल लगाने की सोच रहा था ताकि उसे भविष्य में ज्यादा मुनाफा हो सके। China में एक बाँस का पेड़ होता है, जिसकी खेती करने से बहुत पैसे कमाए जा सकते हैं लेकिन रोपित करने के बाद चार से पांच साल तक उसे पानी और खाद देना होता है। जब रामू को उस बाँस के पेड़ के बारे में पता चला तो उसनें सोचा कि यही आगे बढ़ने के लिए एक बड़ा अवसर है और वह चाइनीस बास के पेड़ का बीज ले आया और उसनें अपने खेत में उसकी फसल बो दी।
जब गांव के दुसरे लोगों को पता चला कि वह अपनी खेती में फसल परिवर्तन कर रहा है और अलग तरह की कोई फसल बो रहा है तब गांववालों ने उसका बहुत मजाक बनाया और सबनें कहा कि ऐसी फसल उग ही नहीं सकती। रामू अपने फैसले पर अड़ा रहा और बाँस का पेड़ उगाने के लिए उसनें दृढ़ निश्चय कर लिया। धीरे-धीरे समय बीतता गया, उसके आसपास के सारे खेत फसलों से लहलहा रहे थे लेकिन रामू का खेत बंजर पड़ा था।
एक साल हो गये, दुसरे लोगों ने अपने खेत की फसलें तक काट डालीं लेकिन रामू का खेत अभी भी ज्यों का त्यों बंजर पड़ा था। अब उसके घरवाले भी उससे कहते फिरते कि उन्हें खेत में वही पुरानी फसलें बो देनी चाहिए लेकिन रामू सभी को धैर्य रखने और मेहनत करने की ही सलाह देता रहता। रामू अपने गांव में निकलता तो सभी उसे ‘बाँस का पेड़ जा रहा है’ करके चिढ़ाया करते थे।
दूसरों की बातों को अनसुना करके रामू अपने काम में ही लगा रहता था। देखते ही देखते चार साल बीत गये, रामू फसलों पर खाद और पानी अभी भी दे रहा था पर उसके खेत में अंकुर तक नहीं फूट रहे थे। सभी लोगों के ताने, मजाक उड़ाने वाली बातों से वह अब भी परेशान नहीं हुआ, लोग उससे कहते कि तुम्हारा परिवार भूखा मर जाएगा, अपनी पागलपन छोड़ो। लेकिन रामू अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। पांचवा साल जब रामू अपनी खेत पर गया तब उसनें पाया कि बंजर जमीन अब बंजर नहीं थी, उसमें अंकुर फूट चुके थे, छोटी छोटी पत्तियां बाहर निकली हुई थीं। यह देखकर रामू बहुत खुश हुआ, उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। और देखते ही देखते ६ सप्ताह में बाँस का वह पेड़ ९० फीट तक बढ़ गया। सारे गांव वाले यह देखकर हैरान थे, रामू आज बहुत ज्यादा खुश था, क्योंकि उसका जो भरोसा था, और उसके अन्दर जो धैर्य थी उसका नतीजा ही आज उसे देखने को मिला।
कहानी से सीख
इस कहानी से हमें २ बड़ी बातें सीखने को मिलती हैं कि या तो हम वो किसान बन जाएं, जहाँ हम अपना एक गोल सेट करते हैं, उस पर भरोसा करते हैं, और दुनिया वाले क्या कहते हैं इस पर ध्यान नहीं देते। हम बस अपना काम करते जाते हैं, ५ साल तक बिना किसी परिणाम के हमें खाद और पानी देना होता है या तो फिर एक बास का पेड़ बन जाएं, जहाँ हम ५ साल तक अपनी जड़ें मजबूत कर रहे हैं, इतनी कि ६ हप्ते में अपनी उस सफलता को संभाल पाएं। यदि हम दोनों में से कोई एक भी बन जाते हैं तो ये बहुत बड़ी बात होगी।

