एक शख़्स के चार बेटे थे। उसने फ़ैसला किया कि वह अपने बेटों को एक सबक सिखाने के लिए दूर दराज़ इलाक़े में मौजूद नाशपाती के एक दरख़्त को देखने भेजेगा।
बारी-बारी चारों बेटों का सफ़र शुरू हुआ। पहला बेटा सर्दी के मौसम में गया, दूसरा बहार में, तीसरा गर्मी में और सबसे छोटा ख़िज़ाँ के मौसम में रवाना हुआ। जब सब अपना सफ़र मुकम्मल करके लौट आए तो बाप ने उन्हें तलब किया और दरख़्त का अहवाल पूछा।
पहला बेटा, जिसने सर्दी में दरख़्त देखा था, कहने लगा:
“वो दरख़्त बहुत बदसूरत, टेढ़ा और झुका हुआ था।”
दूसरे ने फ़ौरन इख़्तिलाफ़ किया:
“नहीं! वो तो हरा-भरा और सब्ज़ पत्तों से ढका हुआ था।”
तीसरा बोला:
“मुझे आप दोनों से इत्तिफ़ाक़ नहीं। वो दरख़्त तो फूलों से लदा हुआ था और उसकी ख़ुशबू दूर-दूर तक फैली हुई थी, वो एक निहायत हसीन मंज़र था।”
सबसे छोटे बेटे ने अपनी राय दी:
“वो दरख़्त तो फलों के बोझ से ज़मीन की तरफ़ झुका हुआ था और बहुत दिलकश नज़र आता था।”
वो आदमी मुस्कुराया और बोला:
“तुम में से कोई भी ग़लत नहीं कह रहा, तुम सब अपनी-अपनी जगह दुरुस्त हो।”
बात जारी रखते हुए बाप ने समझाया:
“तुम किसी भी दरख़्त या इंसान को सिर्फ़ एक मौसम या एक हालत में देखकर उसके बारे में हत्मी फ़ैसला नहीं कर सकते। इंसान कभी किसी कैफ़ियत में होता है और कभी किसी में। जिस तरह दरख़्त कभी बेरौनक होता है, कभी फूलों से महकता है और कभी फलों से लदा होता है, बिल्कुल उसी तरह इंसान भी मुख़्तलिफ़ हालात से गुज़रता है। अगर तुम किसी को सिर्फ़ ग़ुस्से या परेशानी की हालत में देखते हो, तो इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं कि वो इंसान बुरा है। कभी जल्दबाज़ी में फ़ैसला मत करो, बल्कि हालात को अच्छी तरह परख लिया करो।”