Posted in संस्कृत साहित्य

ॐ सूर्याय नमः
कोणार्क सूर्य नारायण मंदिर

12वीं शताब्दी में जब ज्यादातर लोग पत्थरों से सिर्फ छत चढ़ा रहे थे
तब यहाँ किसी ने फैसला किया कि पत्थरों से समय बाँधेंगे और हवा को भी चुनौती देंगे

कोणार्क सूर्य देव मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं  एक बहुत सोचा-समझा बहुत बड़ा प्रयोग है

समुद्र के किनारे खड़ा ये काला रथ पुराने नाविकों के लिए ब्लैक पगोडा था।
दूर से टावर दिखता था राह बताता था

पर कई जहाज़ उसी टावर की ओर अनजाने में खिंचे चले आते और चट्टानों से जा टकराते।
लोककथाएँ कहती हैं  शिखर पर एक ऐसा चुंबकीय पत्थर था जो लोहे को अपनी तरफ बुला लेता था।

मंदिर सूर्य भगवान के रथ के रूप में बना है। 
• सात घोड़े – सप्ताह के सात दिन 
• चौबीस पहिए – दिन-रात के चौबीस घंटे और साल के बारह महीने 
कहते हैं ये पहिए इतने सटीक हैं कि रात में भी हल्की हरकत दिखती है, जैसे कोई प्राचीन घड़ी धीरे-धीरे चल रही हो।

वास्तु शास्त्र के हिसाब से ये मंदिर एकदम सटीक और लाभकारी बनाया गया है। 
पूर्व दिशा में मुख करके बना होने से सूर्य की प्रथम किरण सीधे गर्भगृह में पड़ती थी। 
सात घोड़ों और चौबीस पहियों की व्यवस्था से ऊर्जा का संतुलन, स्वास्थ्य, समृद्धि और दीर्घायु का प्रभाव माना जाता है। 
यहाँ की वास्तु व्यवस्था इतनी शक्तिशाली मानी जाती है कि आज भी कई लोग इसे वास्तु का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण मानते हैं।

15वीं सदी में आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं से टावर गिर गया, मंदिर रेत में दफन हो गया।
पुजारी मुख्य मूर्ति लेकर पुरी भागे।
सदियों बाद ब्रिटिश काल में खुदाई हुई और वो टूटा हुआ रथ फिर सामने आया – घायल, पर अभी भी राजसी।

आज तीन सूर्य प्रतिमाएँ बची हैं
• बाल सूर्य – सुबह की उमंग 
• मध्याह्न सूर्य – दोपहर की पूरी ताकत 
• अस्त सूर्य – शाम की शांति 

गर्भगृह खाली है, पर उस खालीपन में एक सवाल सदियों से गूँज रहा है
क्या हम सच में इतने आगे बढ़ गए हैं, या अभी भी वही पुराना आश्चर्य हमें देख रहा है?

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