Posted in हिन्दू पतन

एक लॉजिक की बात..गौर करना।
#389 लोग इकट्ठा हुए संविधान बनाने के लिए, और उन 389 लोगों ने बहुमत से निर्णय लिया कि भारत हिंदू राष्ट्र ‘नहीं’ होगा (जबकि हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा ही इसीलिए हुआ था कि एक हिंदू राष्ट्र बनेगा, एक मुस्लिम राष्ट्र बनेगा)। जनता ने 389 लोगों के इस फैसले को माना।
फिर 1975 में संसद में 543 सांसदों ने बहुमत से निर्णय लिया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “पंथ-निरपेक्ष” यानी secular शब्द जोङा जाएगा, अर्थात् भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होगा। जनता ने 543 लोगों के इस फैसले को माना।
फिर 2019 में संसद में 543 सांसदों ने बहुमत से निर्णय लिया कि देश में Citizenship Amendment Bill लाया जाएगा, जिसके अनुसार समुदाय विशेष के लोगों को देश में शरण नहीं दी जाएगी। जनता में से कुछ लोग बसें जला रहे हैं और धमकियां दे रहे हैं कि इसे नहीं मानेंगे। (विरोध करना संवैधानिक है, आगजनी तोङफोङ करना नहीं है)

कुछ झंडु चिल्लाते हुए देखे गये हैं कि CAA गैर संवैधानिक है, यह ‘संविधान की भावना’ के साथ खिलवाड़ है वगैरह वगैरह। वो गौर करें।
संविधान क्या है? संविधान की भावना क्या है? संविधान 389 लोगों (जो कि जनता द्वारा चुने हुए भी नहीं थे) द्वारा बनाए गये नियम हैं, और संविधान की भावना उन 389 लोगों की भावना है, देश की भावना नहीं है। देश उन 389 लोगों की बपौती नहीं है।
CAA क्या है? CAA की भावना क्या है? CAB 543 लोगों (जो कि जनता द्वारा चुने हुए सांसद हैं) द्वारा बनाया गया नियम है, और CAA उन 543 लोगों की भावना है (उनकी भावना में जनता की भावना निहित है, क्योंकि संविधान ने ही उनको जनता के behalf पर फैसले लेने का अधिकार दिया है)।

ना तो संविधान आसमान से उतरा है और ना CAA आसमान से उतरा है। तो CAA उतना ही संवैधानिक और लोकतांत्रिक है जितना कि संविधान है। उल्टा उससे ज्यादा ही है। आखिर 543 लोग 389 से 154 ज्यादा होते हैं।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना संविधान में “धर्म निरपेक्षता” शब्द है।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना देश के संविधान में “समाजवाद” शब्द है (जो 1975 में जोङा गया)।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना AMU, JMI, JNU संवैधानिक है।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना वक्फ बोर्ड और पर्सनल लॉ बोर्ड है।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितनी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ संवैधानिक है।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना ‘न्यायपालिका, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका’ संवैधानिक हैं।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना आरक्षण संवैधानिक है।
CAA उतना ही संवैधानिक है जितना लोकतंत्र है।

और अगर कभी संसद में 543 सांसदों द्वारा बहुमत से निर्णय लिया जाए कि भारत के संविधान से “पंथनिरपेक्ष” शब्द हटेगा और इसे “हिंदू राष्ट्र” घोषित किया जाएगा, तो यह भी उतना ही संवैधानिक होगा (सही हो या गलत वो अलग मैटर है, लेकिन संवैधानिक होगा, यही संविधान है, यही लोकतंत्र है)

संविधान की भावना अगर जनता को पसंद नहीं है तो संविधान की भावना जनता की भावना के अनुसार बदली जाएगी। संविधान स्वयं इसकी इजाजत देता है ‘संशोधन’ द्वारा। संविधान अंतिम नहीं है। संविधान जनता के लिए है, जनता संविधान के लिए नहीं है।

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કર્ણાટકમાં એક ડ્રોન બનાવતી કંપની છે જે ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય કરે છે.

તે વિસ્તારમાં પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર મોહમ્મદ સાદિક પાશા નામનો એક મુસ્લિમ છે.

જ્યારે તે પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર, મોહમ્મદ સાદિક પાશા, ને ખબર પડી કે કંપની ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય કરે છે, ત્યારે તેણે જાણી જોઈને કંપનીને હેરાન કરવાનું શરૂ કર્યું, તેના કર્મચારીઓ, તેના માલિકો અને તેમાં સામેલ દરેકને હેરાન કરવાનું શરૂ કર્યું, જેથી ઉત્પાદન બંધ થઈ જાય અને કંપની ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય કરી શકે નહીં.

કંપની એટલી નારાજ થઈ ગઈ કે તે કર્ણાટક હાઇકોર્ટમાં ગઈ.

અને જ્યારે કર્ણાટક હાઇકોર્ટ સમક્ષ બધી હકીકતો રજૂ કરવામાં આવી, ત્યારે જુઓ કે કર્ણાટક હાઇકોર્ટે મુસ્લિમ પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર, મોહમ્મદ સાદિક પાશાને કેવી રીતે સખત ઠપકો આપ્યો.

તેમના પર રાજદ્રોહનો આરોપ મૂકવો જોઈએ, સેવામાંથી કાઢી મૂકવો જોઈએ અને ધરપકડ કરવી જોઈએ.

પરંતુ કર્ણાટકમાં મુસ્લિમ-મૈત્રીપૂર્ણ કોંગ્રેસ સરકાર હોવાથી, કોંગ્રેસ સરકાર તેમને નાયબ પોલીસ અધિક્ષક તરીકે બઢતી આપશે.

કારણ કે કોંગ્રેસ સરકાર અને રાહુલ ગાંધી ખુશ થશે કારણ કે તેમણે ભારતીય સેનાને ડ્રોન સપ્લાય રોકવા માટે  પ્રયાસો કર્યા હતા.

અને બીજી એક મહત્વની વાત એ છે કે  ખડકે રડતા હતા કે બધા રોકાણ,બધી કંપનીઓ ભાજપ શાસિત રાજ્યોમાં કેમ જાય છે?

હવે ખડગેને પણ ખ્યાલ આવી ગયો હશે કે કંપનીઓ હંમેશા રોકાણ અને ફેક્ટરી સ્થાપના માટે ભાજપ શાસિત રાજ્યો કેમ પસંદ કરે છે.

જિતેન્દ્ર સિંહ

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*बांगरू-बाण*
श्रीमती अर्चना उपाध्याय की पोस्ट

श्रीपाद अवधूत की कलम से

*नर्मदा नदी नहीं, भारत की जीवित चेतना-रेखा व आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की प्रयोगशाला है…*

भारत की नदियों में नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जिसे केवल जलधारा नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन माना गया। जहाँ गंगा यमुना जनसमुदाय की नदी बनी, वहीं नर्मदा संन्यासियों, ऋषियों और साधकों की नदी रही। यही कारण है कि *नर्मदा परंपरा में “पूजी” ही नहीं गई जी गई इसीलिए अमर हो गई।*

नर्मदा नदी की उत्पत्ति के बारे में *पुराण कहते हैं कि यह भगवान शंकर के तपस्या से उत्पन्न पसीने से निर्मित हुई है। इसे ही विज्ञान कहता है नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन “टेक्टॉनिक प्लेट भ्रंश रेखा” (tectonic fault line) व “नर्मदा–सोन भ्रंश रेखा” या “नर्मदा–सोन रेखिक भू-संरचना” (Narmada–Son Lineament) से उत्पन्न ऐसी नदी जिसका प्रमुख जलस्त्रोत वर्षा नहीं, बल्कि भूमिगत झरने और प्राकृतिक स्रोत है। इसे “स्रोत-पोषित नदी” या “झरना-आधारित नदी” (spring-fed river) कहते है।*
*“शिव का पसीना” दरअसल धरती के भीतर संचित ऊर्जा और भूजल का प्रतीक है। शिव के पसीने की कथा शब्दशः नहीं, प्रतीकात्मक (symbolic) रूपक है, जबकि सत्य भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं।*
शिव विंध्याचल पर्वतीय क्षेत्र का भू-ऊर्जा केंद्र है। शिव का तप अर्थात विंध्याचल पर्वत के दीर्घकालीन भूगर्भीय दबाव (geological stress) हैं। एवं *शिव का पसीना अर्थात विंध्याचल पर्वत के भीतर संचित जल का प्रस्फुटन (spring eruption) हैं। सामान्य भाषा में कहें तो धरती के भीतर संचित ऊर्जा और जल-भंडार का फूट पड़ना है।*

*उल्टी बहने वाली अर्थात पश्चिम की ओर बहने वाली नदी और भूगर्भीय परिस्थितियाँ*
भारत का भूभाग सामान्यतः पूर्व-दक्षिण की ओर ढलान लिए है, इसलिए अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं। पर नर्मदा पश्चिम की ओर बहती है क्योंकि वह “भ्रंश घाटी” या “दरार घाटी” (rift valley) में बहती है। पुराण में इसे कहा गया कि *“नर्मदा नाराज़ होकर उल्टी दिशा में बह गई।”*
विज्ञान में इसे कहते हैं। *“भू-उत्थान के कारण नदी के प्रवाह की दिशा का उलट जाना” (drainage reversal due to tectonic uplift)* जब भूपर्पटी के उठने (tectonic uplift) से भूमि का ढाल बदल जाए और नदी का पुराना रास्ता अवरुद्ध हो जाए, तब नदी अपनी प्रवाह दिशा बदल ले इसे drainage reversal कहते हैं इसलिए *पुराण की भाषा में नर्मदा का “स्वभाव” भौगोलिक विज्ञान की भाषा में धरती की संरचना कारण है।*

*“नर्मदा–सोन विवाह” का वैज्ञानिक अर्थ*
*पुराण कहता है: नर्मदा का विवाह सोन से होना था।*
*भूगोल कहता है: नर्मदा और सोन दोनों एक ही भूगर्भीय रेखा (lineament) से निकली हैं। एक ही भ्रंश से उत्पन्न दो नदियाँ अलग-अलग दिशाओं में बँट गईं।* इसे ही *पुराण ने कहा: “विवाह टूट गया।” सहस्रार्जुन ने अपने 1000 हाथों से नर्मदा को रोकने का प्रयास किया। इसका वैज्ञानिक अर्थ सतपुड़ा–विंध्य के बीच के अनेक पर्वत-खंड, चट्टानें, बेसाल्ट प्लेट्स जो जल के प्रवाह को अवरुद्ध करने का काम करते हैं लेकिन नदी फिर भी बह गई क्योंकि जल की दिशा मनुष्य नहीं, गुरुत्व और ढाल तय करते हैं।*

*नर्मदा का सोन से विवाह प्रस्ताव को ठुकराना। नर्मदा का “स्त्री-स्वतंत्रता का निर्णय” है। यह कथा सिर्फ भूगोल नहीं, सामाजिक दर्शन भी है।*
जहाँ *गंगा–यमुना → पितृसत्तात्मक सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है।*
*नर्मदा → स्वयं निर्णय लेने वाली स्वयं प्रेरित नदी है।*
*वह: विवाह से मुड़ती है। समाज की अपेक्षा तोड़ती है। अपनी राह खुद चुनती है। इसलिए: नर्मदा को केवल कन्या। नहीं,“स्वतंत्र योगिनी” कहा गया।*
*गंगा → सत्ता का केन्द्र रही।*
*नर्मदा → साधना की तपस्थली रही इसलिए नर्मदा पश्चिम की ओर बह गई क्योंकि वह “बाहर नहीं, भीतर की यात्रा” की नदी है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में नर्मदा से अधिक तपस्वी किसी एक नदी पर नहीं रहे।*
*गंगा = सबसे पूज्य मानी गई इसीलिए पूजी गई।*
*सरस्वती = सबसे विद्वान मनीषियों की कार्यस्थली रही इसीलिए सभ्यता की प्रेरक रही।*
*नर्मदा = सबसे वैरागी योगियों की तपस्थली रही इसलिए शास्त्र में कहा गया कि “गंगा मोक्ष देती है, नर्मदा मोक्ष की इच्छा ही जला देती है।” यानी नर्मदा मुक्ति नहीं देती मुक्ति का संस्कार पैदा करती है।*

*विश्व की सबसे प्राचीन जैविक सभ्यता*

*नर्मदा घाटी में मिला नर्मदा मानव (Homo erectus) अर्थात वह मानव प्रजाति जिसने पहली बार दो पैरों पर स्थायी रूप से चलना शुरू किया। यह 3 से 5 लाख वर्ष पुराना माना गया है। यह एशिया का सबसे पुराना मानव अवशेष है। सिंधु नदी से भी पहले भारत की मानव संस्कृति नर्मदा नदी पर थी।*
*नर्मदा नदी साम्राज्य नहीं बनाती अपितु जीवन-पद्धति बनाती है।*

नर्मदा का जल हिमनदी नहीं, अपितु भूगर्भीय जल है इसलिए उसमें सिलिका, कैल्शियम, मैग्नीशियम जैसे तत्व अधिक हैं। *जो इसे स्वयं शुद्ध करने वाली अर्थात self-purifying बनाती हैं इसीलिए आज भी नर्मदा नदी के जल का टीडीएस भारत की अन्य सभी नदियों से सबसे कम है पीने योग्य हैं।*

*नर्मदा घाटी तीन जैव-क्षेत्रों का संगम है विंध्य, सतपुड़ा और दक्खन इसलिए इतनी छोटी नदी होकर भी नर्मदा में विश्वस्तर की per square km biodiversity अर्थात जैव विविधता मिलती है।*

*ऋषियों की नदी*

*नर्मदा किनारे नगरों से अधिक आश्रम बसे है। इनमें प्रमुख रूप से वैदिक–पौराणिक काल (सबसे प्राचीन) ये वे ऋषि हैं जिनका उल्लेख वेद, ब्राह्मण, पुराण और उपनिषदों में मिलता है:-*

*ऋषि – नर्मदा से संबंध*

कपिल मुनि-अमरकंटक क्षेत्र
मार्कण्डेय ऋषि-मंडला–डिंडोरी
दत्तात्रेय-महिष्मती (महेश्वर)
पाराशर ऋषि-ओंकारेश्वर
वशिष्ठ ऋषि-भेड़ाघाट
अगस्त्य ऋषि-सतपुड़ा
नारद ऋषि-नर्मदा परिक्रमा मार्ग
भृगु ऋषि-नर्मदा–ताप्ती क्षेत्र
अत्रि ऋषि-मध्य नर्मदा घाटी
जमदग्नि ऋषि-रेवा क्षेत्र
शुकदेव-नर्मदा वन क्षेत्र
व्यास-नर्मदा पर तपस्थली

*शैव अवधूत नाथ परंपरा (मध्यकाल)*
*यह वह काल है जब नर्मदा विशुद्ध संन्यास की नदी बनती है।*

*संत/योगी-परंपरा*

मत्स्येन्द्रनाथ-नाथ योग
गोरखनाथ-हठयोग
जालंधरनाथ-नाथ योग
कान्हप्पा योगी-नाथ योग
भर्तृहरि-वैराग्य योगी
बाबा केनाराम-अघोरी संत
भैरवानंद योगी-शैव उपासक
महेश्वरानंद-अवधूत योगी
राघवानंद’-वैराग्य

*दत्त संप्रदाय और अवधूत परंपरा नर्मदा का सबसे विशुद्ध प्रवाह:-*

*संत-परंपरा*

श्रीपाद श्रीवल्लभ-दत्त संप्रदाय
नृसिंह सरस्वती- दत्त संप्रदाय
स्वामी समर्थ-दत्त संप्रदाय
वासुदेवानंद सरस्वती( टेम्बे स्वामी महाराज)-दत्त संप्रदाय
श्री रंगावधूत दत्त-संप्रदाय
श्रीपाद बाबा (नर्मदा बाबा)-परिक्रमा परंपरा

*भारत के अन्य प्रमुख संतों का भी आश्रय किसी न किसी रूप में नर्मदा का तट रहा है*

स्वामी विवेकानंद-नर्मदा यात्रा
श्री अरविंद-मौन साधना
स्वामी ब्रह्मानंद-ओंकारेश्वर
महर्षि रमण-नर्मदा तट मौन
स्वामी शिवानंद’-योग
श्री बाबा कुटी’-अघोरी
माँ आनंदमयी-नर्मदा आश्रम
श्री जयदेव भारती-शैव

*गंगा भक्ति की नदी मानी गई है जबकि नर्मदा वैराग्य की नदी कहलाती हैं। यही कारण है कि पूरी दुनिया में किसी एक नदी पर इतने वर्षों तक इतने संन्यासी नहीं रहे जितने नर्मदा मैया के तट पर।*

*नर्मदा परिक्रमा :-*

परिक्रमा का मूल सिद्धांत है *बाहर घूमते हुए भीतर का केंद्र ढूँढना।*
नर्मदा परिक्रमा का उद्देश्य “पुण्य” कमाना नहीं है। वह तो द्वितीयक परिणाम है। *वास्तविक उद्देश्य मानव चेतना का पुनर्गठन कार्यक्रम है।* 3500–3600 किमी पैदल परिक्रमा करने पर *व्यक्ति का अहंकार टूटता है।*
*समय-बोध समाप्त होता है।*
*सामाजिक पहचान गिरती है।*
*परिक्रमा में दिन का हिसाब नहीं।*
*तारीख़ का महत्व नहीं।*
*भविष्य की चिंता नहीं।*
*मन काल-चक्र से बाहर आता है।*
*यह आधुनिक मनुष्य के लिए सबसे कठिन और सबसे उपचारक अवस्था है। मन primitive अवस्था में लौटता है। आधुनिक मनोविज्ञान में यह sensory detox*
*dopamine reset*
*ego dissolution कहलाता है।*
*भारतीय परंपरा में इसे “अहं का विसर्जन।” कहा गया है।*

*सामाजिक समानता की दृष्टि से देखने पर नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर राजा और भिखारी एक समान है। यहां जाति, भाषा, पद समाप्त हो जाते हैं। हर गाँव जल देता है, हर आश्रम भोजन देता है। यह दुनिया की एकमात्र जीवित समाजवादी व्यवस्था है। जो बिना सरकार, बिना कानून, केवल संस्कृति से संचालित होती है। वह भी बिना किसी भेदभाव के बिना किसी जाति प्रपंच के।*

*नर्मदा एक नदी नहीं अपितु एक जीवित दर्शन है।*
*नर्मदा मैया के संदर्भ में अगर संक्षेप में कहें तो।*
*भूगोल की दृष्टि से → पृथ्वी की दरार हैं।*
*विज्ञान की दृष्टि में → spring-fed rift river है।*
*जैव विज्ञान की दृष्टि में → biodiversity corridor*
*इतिहास की दृष्टि में → मानव विकास की धुरी हैं।*
*संस्कृति की दृष्टि में → वैराग्य की प्रयोगशाला है।*
*मनोविज्ञान की दृष्टि में → चेतना का रीबूट सिस्टम है।*
*अध्यात्म की दृष्टि में → शिव का मौन विस्तार है।*
और परिक्रमा करने वाला अंत में यही समझता है *“मैं नदी नहीं घूम रहा था, नदी मुझे घुमा रही थी।” इसलिए नर्मदा नदी को भारतीय परंपरा ने केवल “पवित्र” ही नहीं कहा बल्कि “अमर” भी कहा है क्योंकि पवित्र वस्तु पूजी जाती है जबकि अमर वस्तु मनुष्य को बदल देती है।*

*नर्मदा परिक्रमा धार्मिक कर्म नहीं है, न ही सामाजिक प्रयोग, न हीं पर्यटन, न हीं व्रत वैकल्य बल्कि मानव चेतना का प्राचीनतम वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रम है। जहाँ व्यक्ति भीड़ से अलग प्रकृति के साथ स्वयं के सामने खड़ा हो जाता है और यही कारण है कि परिक्रमा के बाद कोई व्यक्ति पहले जैसा कभी नहीं रह पाता।*

*आप भी इसका अनुभव लीजिए। संभव हो तो जीवन में एक बार नर्मदा परिक्रमा अवश्य करें।*

*नर्मदा परिक्रमा*
*पुराने संस्कारों को धीरे-धीरे पिघलाती है जैसे हिम धूप में गलता है। मन का बोझ हल्का होता है। व्यक्ति “खाली” होने लगता है। नर्मदा परिक्रमा से आपका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदत्त

श्रीपाद कुलकर्णी (बांगर)

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मक्का का सौक-अल-अबिद (गुलामों का बाजार)ये सही है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स (19वीं सदी के ट्रैवलर्स और वेस्टर्न रिपोर्ट्स) बताते हैं कि मक्का में सुक-अल-अबिद (Suk al-Abid) नाम का एक रेगुलर स्लेव मार्केट था, जो मस्जिद-ए-हरम (Kaaba) के बहुत करीब था।

अब वो एरिया अब्राज अल-बैत (Clock Tower complex) का हिस्सा बन चुका है—वही विशाल होटल और शॉपिंग मॉल जो मस्जिद के ठीक बगल में है।

ये कोई छिपी हुई बात नहीं, बल्कि पुरानी तस्वीरों और किताबों में दर्ज है।
2. सऊदी अरब में 1950-60 के दशक में कुल गुलामों की संख्या अनुमानित 3-5 लाख के आसपास थी (Anti-Slavery Society और UN रिपोर्ट्स के अनुसार)।
हज के दौरान कुछ गुलाम बेचे जाते थे (पिलग्रिम्स अपने साथ लाते थे), लेकिन 12 साल में 90 लाख? : सऊदी अरब ने 1962 में ऑफिशियली गुलामी खत्म की (King Faisal के डिक्री से)। इससे पहले ये कानूनी थी, और रेड सी और हज रूट्स से अफ्रीकी गुलाम आते रहते थे। कुल मिलाकर, सदियों के अरब स्लेव ट्रेड में 1.7 करोड़ से ज्यादा अफ्रीकी गुलाम बेचे गए, लेकिन 1950-62 का वो स्पेसिफिक आंकड़ा गलत है।
3. इस्लाम के उलेमा गुलामी को जायज बताते हैंबिल्कुल सही। यूट्यूब पर सर्च करें—”Slavery in Islam” या “Gulami Islam Mein Jaiz”—आपको Jonathan AC Brown, Hamza Yusuf, और कई सऊदी/मिस्री शेख मिलेंगे जो क्लासिकल इस्लामी फिक्ह (शरीअत) के मुताबिक बताते हैं कि:गुलामी जायज है, खासकर युद्ध के बंदियों (captives of war) से।
कुरान और हदीस में इसके नियम हैं (जैसे “दाहिने हाथ की मालकिन” यानी concubines)।
आजकल व्यावहारिक रूप से बंद है (क्योंकि कोई “इस्लामी स्टेट” नहीं), लेकिन सैद्धांतिक रूप से हराम नहीं।

कुछ मॉडर्न स्कॉलर्स (जैसे Yaqeen Institute) कहते हैं कि ये “ऐतिहासिक” था और अब “अबोलिश” हो चुका है, लेकिन कई स्ट्रिक्ट उलेमा (Salafi/Wahhabi) इसे अभी भी डिफेंड करते हैं।

ये कोई “इस्लामोफोबिया” नहीं—ये उनके अपने सोर्सेज से है।
4. भारत में “इस्लाम ने सामाजिक न्याय और मानवाधिकार स्थापित किए”?ये नैरेटिव है, हिस्ट्री नहीं। इस्लाम से पहले भारत में दासता थी: हां, दास प्रथा (दास, दासी) थी, लेकिन वो मुख्य रूप से debt bondage या युद्ध का नतीजा थी। बड़े स्केल पर ट्रेडिंग या एक्सपोर्ट नहीं।
मुस्लिम शासन में: 8वीं सदी से (Muhammad bin Qasim) लेकर मुगल तक, लाखों-करोड़ों हिंदू गुलाम बनाए गए। Mahmud of Ghazni के छापों में सैकड़ों हजार।
Delhi Sultanate और Mughals में स्लेव मार्केट्स फलते-फूलते थे—गुलाम बेचे जाते, eunuchs बनाए जाते, concubines रखी जातीं।
Firoz Shah Tughlaq जैसे सुल्तानों ने “हिंदू किडनैपिंग” को स्टेट पॉलिसी बनाया।
अनुमान: 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय गुलाम मध्य एशिया और मिडिल ईस्ट भेजे गए।
सामाजिक न्याय? जजिया टैक्स, मंदिर तोड़ना, जबरन कन्वर्शन—ये “मानवाधिकार” नहीं।
निचली जातियों (दलितों) के लिए? कुछ कन्वर्ट हुए (टैक्स बचाने या प्रोटेक्शन के लिए), लेकिन नई “कास्ट सिस्टम” बनी—Ashraf (विदेशी मुस्लिम), Ajlaf (कन्वर्टेड), Arzal (सबसे नीचे)।
ये “सामाजिक न्याय” का दौर? नहीं, ये विजय का दौर था।

तो सोचिए क्यों?क्योंकि इतिहास को पॉलिटिक्स के लिए री-राइट किया जाता है। लेफ्ट-इस्लामिस्ट एलाइंस में “इस्लाम = इक्वालिटी” का नैरेटिव बेचा जाता है, ताकि हिंदू “ब्राह्मणवाद” को विलेन बनाया जा सके।
लेकिन हकीकत: इस्लाम ने गुलामी को रिगुलेट किया (मानवाधिकारों की बजाय), न कि खत्म। सऊदी में 1962 तक ये चल रही थी—जब भारत “आजाद” हो चुका था।
भारत में ये “लिबरेशन थियोलॉजी” की तरह इस्तेमाल हुआ, लेकिन असल में ये इंपीरियल टूल था।

ये कोई “हेट” नहीं—ये फैक्ट्स हैं। अगर “सामाजिक न्याय” सच में आया होता, तो मक्का का गुलाम बाजार 20वीं सदी में नहीं चलता, न भारत में करोड़ों गुलाम बनते। सोचिए, क्यों ये बातें छुपाई जाती हैं?

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

घोड़े के नाल ठुक रही थी…
तभी तालाब से एक मेंढक बाहर आया
और लोहार से बोला मुझे भी नाल ठुकवानी है

लोहार बोला भाई रहने दे…. अपना साइज देख…

मेंढक बोला… साइज क्यूँ… तू मेरी छलांग देख…. इस घोड़े से शरीर के अनुपात में ज्यादा न हो तो बोल… मेरी पिछली टांग देख
इस घोड़े से लम्बी न हों शरीर के अनुपात में तो बात कर….
तो जब इसके नाल ठुक सकती है तो मेरे क्यूँ नहीं….?

खैर लोहार ने बहस करने की जगह नाल उठा ठोंक दी…
मेंढक का क्या हुआ होगा…. आप जानते ही हैं

छोटे ओवेसी एलान किये हैं
Mr योगी तैयार हो जाओ…. UP आरहा हूँ

बाबू UP है ये…. थोड़ा सोच समझ टांग उठाना… G भी फट सकती है नाल ठुकवाने में
🤣🤣🤣

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

અધૂરું સ્વપ્ન અને દર્દનાક અંત: મોહમ્મદ અલી ઝીણાની કહાણી

૧૯૪૭નો એ સમય જ્યારે અખંડ ભારતના ભાગલા રોકવા માટે લોર્ડ માઉન્ટબેટન, ગાંધીજી, નેહરુ અને પટેલ જેવા દિગ્ગજ નેતાઓ પ્રયત્નશીલ હતા. ગાંધીજીએ તો ઝીણાને ભારતના વડાપ્રધાન બનવાની ઓફર પણ આપી હતી, જેથી ભાગલા અટકી શકે. પરંતુ ઝીણાની જીદ સામે કોઈ ઉપાય કારગત ન નીવડ્યો. “હિન્દુઓના હાથ નીચે રહેવા કરતા બધું ગુમાવવું બહેતર છે”—આ વિચારધારા સાથે તેમણે પાકિસ્તાનનું નિર્માણ કર્યું.
વ્યક્તિગત જીવન અને વિરોધાભાસ
ઇતિહાસ સાક્ષી છે કે ઝીણાના પૂર્વજો કાઠિયાવાડી હિન્દુ હતા. તેમના દાદા પૂંજાભાઈ ઠક્કર માછલીના વેપારને કારણે જ્ઞાતિ બહાર મુકાયા અને ઇસ્લામ ધર્મ અંગીકાર કર્યો. ઝીણા પોતે લંડનમાં ભણ્યા અને પાશ્ચાત્ય સંસ્કૃતિથી પ્રભાવિત થયા. તેઓ દિવસની ૫૦ સિગારેટ ફૂંકતા, દારૂ પીતા અને સુવરનું માંસ પણ ખાતા, જે ઇસ્લામમાં વર્જિત છે. તેમ છતાં, તેમણે ધર્મના નામે અલગ દેશની માંગ કરી.
પ્રેમ અને એકલતા
ઝીણાની અંગત જિંદગી પણ કરુણ રહી. ૧૬ વર્ષની પારસી છોકરી રતી સાથે તેમને પ્રેમ થયો અને લગ્ન કર્યા. પરંતુ રાજકારણ અને પાકિસ્તાનની જીદમાં તેમણે પત્ની તરફ દુર્લક્ષ સેવ્યું. ૨૯ વર્ષની વયે રતીનું અવસાન થયું ત્યારે ઝીણા ધ્રુસકે-ધ્રુસકે રડ્યા હતા. તેમની એકમાત્ર દીકરી દીનાએ પણ પારસી સાથે લગ્ન કરી લીધા અને પાકિસ્તાન જવાની ના પાડી દીધી. અંતે ઝીણા સાવ એકલા પડી ગયા.
પાકિસ્તાન: એક ભૂલ?
પાકિસ્તાન બન્યા પછી ઝીણા જ્યારે કરાચી પહોંચ્યા, ત્યારે તેમનું ભવ્ય સ્વાગત થયું. પરંતુ થોડા જ સમયમાં તેમનો ભ્રમ ભાંગી ગયો. ટીબી અને કેન્સર જેવી ગંભીર બીમારીઓ હોવા છતાં, ડૉક્ટરોએ તેમને સિગારેટ પીવાની છૂટ આપી, જાણે તેઓ તેમના મૃત્યુની રાહ જોઈ રહ્યા હોય.
૧૧ સપ્ટેમ્બર ૧૯૪૮ના રોજ જ્યારે તેમની તબિયત લથડી અને તેમને કરાચી લાવવામાં આવ્યા, ત્યારે રસ્તામાં જ તેમની એમ્બ્યુલન્સનું પેટ્રોલ પૂરું થઈ ગયું! કલાકો સુધી પાકિસ્તાનના નિર્માતા ભરતડકે રસ્તા પર તડપતા રહ્યા. માખીઓ ઉડાડવાની શક્તિ પણ તેમનામાં નહોતી બચી. આખરે, તેમણે દમ તોડી દીધો.
અંતિમ અપમાન
ઝીણા શિયા મુસ્લિમ હતા, પરંતુ પાકિસ્તાનના કટ્ટરપંથીઓએ તેમને સુન્ની રિવાજ મુજબ દફનાવ્યા. તેમની બહેન ફાતિમા ઝીણાને પણ પાછળથી હાંસિયામાં ધકેલી દેવામાં આવી. જ્યારે ફાતિમાએ રેડિયો પર ભાઈના મૃત્યુનું સત્ય કહેવાનો પ્રયાસ કર્યો, ત્યારે પ્રસારણ અટકાવી દેવામાં આવ્યું. ફાતિમાએ પાછળથી સ્વીકાર્યું હતું કે, “પાકિસ્તાન બનાવવું એ મારા ભાઈની સૌથી મોટી ભૂલ હતી.”
જે વ્યક્તિએ ધર્મના નામે દેશના ભાગલા પાડ્યા, તેને જ તે દેશમાં શાંતિ કે સન્માન ન મળ્યું. આ એક ઐતિહાસિક વિડંબના છે કે જેનું સર્જન તેમણે કર્યું, તે જ તેમના અંતનું કારણ બન્યું.
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જે સૂવર નું માસ ખાતો હોય અને સિગારેટ પીતો હોય એ માણસ પાકિસ્તાન જ બનાવી સકે જે અત્યારે આખી દુનિયાનું માથાનો દુખાવો છે

મિત્રો મને લાગે છે કે જીણા ની ભુલ કરતા આપણા સમાજ ની ભૂલ વધારે લાગે છે આપના લખ્યા મુજબ જો કોઈ પણ ધંધો કરતા વ્યક્તિ ને બહિષ્કૃત કરવા માં આવે તો જે ધૃણા ઝીણા ને સમાજ માટે થઈ તે કોઈપણ વ્યક્તિ ને થઇ શકે છે અને આવા પરિણામ ભોગવવા માટે તૈયાર રહેવું પડશે .

અહીંયા એક વાત અધૂરી છે. પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર નો માછલી વેચવા નો ધંધો નહોતો. તેઓ કરિયાણા ની દુકાન ચલાવતા હતા. પુંજાભાઇ ના એક દિકરો જે નાનો હતો. તેને લોકો મુસલમાન કહી ને ચીઢવતા હતા. કરિયાણા ની દુકાને સૌ કોઈ વસ્તુ લેવા આવતા હતા. પુંજાભાઈ વેરાવળ પાસે રહેતા હતા. એક મુસલમાન વ્યક્તિ પુંજાભાઈ ની દુકાને કરિયાણું લેવા આવતા તેમની સાથે મિત્રતા થઈ. તેના લીધે હિન્દુ લોકો એ પુંજાભાઈ સાથે ના વેવાર બંધ કર્યા. કાળ ક્રમે હિન્દુ ઓ કરિયાણું લેવા આવતા હતા તે બંધ થઈ ગયા. તેમની સાથે ના તમામ પ્રકારના વ્યવહારો હિન્દુ ઓ એ બંધ કર્યા. પુંજાભાઈ નો ધંધો બંધ થતાં તેમના મુસલમાન મિત્ર એ તેમને સુક્કી મચ્છી વેચવાનું કહેતાં પુંજાભાઈ વિચાર માં પડ્યા. થાય શું? લોકો છોકરાને મુસલમાન કહી ખીજવતા અને કરિયાણાની દુકાન બંધ થઈ કરવું શું ? આખરે, સુક્કી મચ્છી વેચવાનું શરૂ કર્યું. હિન્દુ ઓ તરફથી પરેશાની વધતાં પુંજાભાઈ પોતાના ભોઈઓ ને વતન માં છોડી કરાંચી જતાં રહ્યાં. જ્યાં આઝાદી વખતે પણ કરાંચી માં એક ગલી છે ત્યાં પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર ની કરિયાણા ની દુકાન ચલાવતા હતા. પુંજાભાઈ નો નાનો દીકરો જે ને ઝિણો હોવાથી ઝિણા તરીકે તેઓ ઓળખાયા. તેમને કરાંચી માં અંગ્રેજે ક્રિશ્ચન સ્કુલ માં ભણવા મુક્યા, કારણકે હિન્દુ સ્કુલોમાં માં એડમિશન મળતું નહોતું. બીજા છોકરાઓ સાથે ઝઘડતા થતાં હતાં.
અળધીરાતે આઝાદી ચોપડી માં ઘણું બધું છે. કાળ ક્રમે પુંજાભાઈ વાલજીભાઈ ઠક્કર  કરાંચી માં ખુબ કમાયા. ઝીણા નું લગ્ન વેરાવળ ગાડુ લઈ ને આવી ગુજરાતી સાથે કર્યું હતું. એક વખત વેરાવળ પાસે ના હિન્દુ સંગઠનો એ કરાંચી જઈ ને પુંજાભાઈ પાસેથી મંદિર બાંધવા માટે પૈસા લઇ આવ્યા હતાં પણ આંખો દિવસ પુંજાભાઈ સાથે વાતો કરી પણ પાણી સુધા પીધું નહોતું. માફ કરજો કોઈ ને ખોટું લાગે તો.

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चमचों के नहेरु

1962 में हिसार से एक सांसद थे –

जिनका नाम था मनीराम बागडी।

बागडी जी को नेहरू की नौटंकी से

बड़ी नफ़रत थी।

बागड़ी जी को पता था नेहरू

14 नवम्बर को सफ़ेद अचकन पर गुलाब का फूल टाँग कर आयेगा और

चमचे चाचा नेहरू ज़िन्दाबाद के नारे लगायेंगे, बागड़ी जी ने एक झुग्गी झोपड़ी का

साँवला सा बच्चा जिसकी नाक बह रही थी, थोड़ी सी राख व कालिख उसके मुँह पर

और लगादी, उसको अपनी गोद में उठाकर अपने शाल में ढककर चुपचाप जा कर

संसद में अपनी सीट पर बैठ गये।

ज्यों ही गुलाब का फूल टाँगकर

नेहरू जी संसद में घुसे तो

उनके चमचों ने चाचा नेहरू ज़िन्दाबाद के नारों से हाल को गुँजा दिया और जब नेहरू का महिमा मण्डन होने लगा

तो बागड़ी जी एकाएक उठ खड़े हुए

और बोले -नेहरू को भारतीय बच्चों से

प्यार नहीं, इसको तो अंग्रेज़ी मेमों के

बच्चे प्यारे लगते हैं !

अगर सच में नेहरू को

भारतीय बच्चों से प्यार है तो

मेरी गोद में जो भारतीय बच्चा बैठा है ,

उसको सबके सामने एक बार चूमकर दिखाएं, यह कहकर बागड़ी जी ने

उस काले कलूटे बच्चे को

नेहरू के सामने कर दिया।

उसके बाद नेहरू आगे आगे और

बागड़ी जी पीछे पीछे,

बागड़ी जी ने नेहरू को संसद भवन से

बाहर तक भगा दिया था।

कहने का मतलब यह है कि नेहरू का

बच्चों से कोई लेना देना नहीं था ,

यह केवल उसको

महान दिखाने के लिए दिया गया

केवल एक दिखावी तगमा था,

एक परिवार के नाम पर देश में

बहुत अति हो चुकी है,

अब समय आ गया है कि

चाचा व बापू नामक तगमे

अब हटा देने चाहिएँ…

आपकी क्या राय है?

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