Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक घने वन प्रदेश में एक एक गधा निवास करता था..
समय बीतने के साथ उसने वनवासियों के बीच यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि,
“इस जंगल का शासक अब योग्य नहीं रहा। उसमें नेतृत्व का साहस नहीं है।

यदि कोई बड़ा संकट आ गया, तो वह किसी की रक्षा नहीं कर पाएगा।
इसलिए बेहतर होगा कि तुम सब मुझे अपना अगुवा मान लो।”
उसकी बातें सुनकर अधिकतर जीव मुस्कुरा दिए, कुछ ठहाके भी लगाने लगे।

अपनी बातों को वजन देने के लिए गधा सुरक्षित दूरी से शेर के विषय में अपशब्द कहने लगा।
कभी उसके साहस पर प्रश्न उठाता,
कभी उसकी नीतियों पर लांछन लगाता,
तो कभी उसे कायर सिद्ध करने का प्रयास करता।

वह खुलेआम शेर को चुनौती देने लगा—
“अगर तुममें जरा भी दम है, तो सामने आओ और मुझसे टकराकर दिखाओ।”
परंतु वनराज शेर ने उसकी ओर दृष्टि तक नहीं डाली।
वह शांतचित्त होकर अपने कर्तव्यों में संलग्न रहा,
मानो उस शोर-शराबे का अस्तित्व ही न हो।

अंततः थककर गधा लौट गया और जंगल में घोषणा करने लगा—
“देख लिया तुम सबने! मैंने उसे खुली चुनौती दी,
उस पर आरोप लगाए, उसे ललकारा…
पर वह कुछ भी न कर सका।
अब तुम स्वयं समझ लो कि वह कितना निर्बल है।”

कुछ छोटे जीव—जैसे बकरी, खरगोश आदि—
जो गधे से उपकृत थे,
क्योंकि वह उन्हें हरी घास के सुरक्षित मैदानों का पता बताता था,
वे उसके कथनों का समर्थन करने लगे।
धीरे-धीरे वे उसकी बातों को आगे बढ़ाने लगे।

जब यह शोर थमा,
तो शेर के विश्वस्त मंत्री, हाथी ने निवेदन किया—
“महाराज, वह गधा आपको अपमानित करता रहा,
आपको उकसाता रहा,
फिर भी आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
आप चाहते तो एक झटके में उसे समाप्त कर सकते थे।

या मुझे संकेत भर दे देते,
तो जंगल में आपकी प्रभुता और भी सुदृढ़ हो जाती।”
शेर ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“गजराज, इसके पीछे तीन ठोस कारण हैं।

पहला कारण यह कि
यदि मैं या तुम उस तुच्छ प्राणी से उलझते,
तो यही कहा जाता कि हमारा शासक असहिष्णु है।
लोग पूछते—
क्या कोई विवेकशील राजा गधे जैसे प्राणी से युद्ध करता है?
दूसरा कारण यह कि
यदि संघर्ष में उसकी मृत्यु हो जाती,
तो उसके परिवारजन और समर्थक
उसे बलिदानी घोषित कर देते।

वे करुणा बटोरकर
वनवासियों को हमारे विरुद्ध भड़काते।
तीसरा और सबसे गंभीर कारण यह कि
यदि उसे ‘शहीद’ का लाभ मिलता दिखता,
तो अनेक अन्य प्राणी भी
उसी राह पर चलने को उत्सुक हो जाते—
संघर्ष नहीं, बल्कि लाभ पाने के लिए।”

शेर ने शांत स्वर में आगे कहा—
“मैं किसी गधे या उसके अनुयायियों की वजह से राजा नहीं हूं।
मेरा स्थान मेरे कार्य और सामर्थ्य से तय होता है।”
तभी उसने संस्कृत वाक्य उच्चारित किया—
न अभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।

विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
अर्थ —
जंगल में सिंह का राज्याभिषेक नहीं होता।
उसका पराक्रम ही उसे स्वाभाविक रूप से राजा बनाता है।

टिप्पणी —
इस कथा से अगर आपको राजनैतिक संकेत निकालना है तो उसके लिए आप पाठक पूर्णतः स्वतंत्र हैं।

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