ग्रहों की खोज कैप्लर ने की और सौरमंडल की खोज कॉपरनिकस ने…
सनातन का एक हजारों वर्ष पुराना श्लोक है –
ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी
भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव
सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु।।
इस मंत्र में पूरे नौ ग्रहों को शुभ करने की ब्रह्मा, विष्णु, महेश से प्रार्थना की गई है। सभी ग्रहों के नाम के साथ मंगल को भूमि सुतो लिखा है। पंडित जी सबसे पहले पूजा में हांथ में जल लेकर ग्रह शांति और स्वस्ति वाचन मतलब शान्ति पाठ करते हैं। हजारों वर्षों से भारत वर्ष के लोग सुबह जागते ही ये मंत्र पढ़ते हैं। बस ये किसी के नाम पेटेंट नहीं है। इसलिए ग्रहों को प्रगतिवादी अंग्रेज कैप्लर ने खोज लिया।
हमारे धार्मिक ग्रंथों में काकभुशुण्डि जी के प्रवचन का वर्णन है जिसमें उन्होंने अनंत आकाश में उड़ते हुए अनंत गैलेक्सीज अर्थात सौरमंडल के दर्शन किए। फिर भी सौरमंडल की खोज प्रगतिशील कॉपरनिकस ने की है।
कैप्लर के प्रतिपादन 1600 ईसवी में हुए थे। मतलब आज के 400 साल पहले तक अंग्रेजों को न ग्रहों का पता था और न ही गैलेक्सीज का फिर भी हजारों वर्ष पहले ये खोज कर लेने वाला जनसमूह पिछड़ी सोच का कैसे हो गया?
अपने देश व सनातन धर्म और हमारे ज्ञान पर गर्व कीजिए..!!
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