Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

रक्षाबंधन


✍सर्वप्रथम किसने बांधी राखी किस को और क्यों ??

👉लक्ष्मी जी ने सर्वप्रथम बलि को बांधी थी।
ये बात हैं जब की
जब दानबेन्द्र राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहें थे
तब नारायण ने राजा बलि को छलने के लिये वामन अवतार लिया और तीन पग में सब कुछ ले लिया
तब उसे भगवान ने पाताल लोक का राज्य रहने के लिये दें दिया
तब उसने प्रभु से कहा की कोई बात नहीँ मैं रहने के लिये तैयार हूँ
पर मेरी भी एक शर्त होगी
भगवान अपने भक्तो की बात कभी टाल नहीँ सकते
उन्होने कहा ऐसे नहीँ प्रभु आप छलिया हो पहले मुझे वचन दें की जो मांगूँगा वो आप दोगे
नारायण ने कहा दूँगा दूँगा दूँगा
जब त्रिबाचा करा लिया तब बोले बलि
की मैं जब सोने जाऊँ तो जब उठूं तो जिधर भी नजर जाये उधर आपको ही देखूं
नारायण ने अपना माथा ठोका और बोले इसने तो मुझे पहरेदार बना दिया हैं ये सबकुछ हार के भी जीत गया है
पर कर भी क्या सकते थे वचन जो दें चुके थे
ऐसे होते होते काफी समय बीत गया
उधर बैकुंठ में लक्ष्मी जी को चिंता होने लगी नारायण के बिना
उधर नारद जी का आना हुआ
लक्ष्मी जी ने कहा नारद जी आप तो तीनों लोकों में घूमते हैं क्या नारायण को कहीँ देखा आपने
तब नारद जी बोले की पाताल लोक में हैं राजा बलि की पहरेदार बने हुये हैं
तब लक्ष्मी जी ने कहा मुझे आप ही राह दिखाये की कैसे मिलेंगे
तब नारद ने कहा आप राजा बलि को भाई बना लो और रक्षा का वचन लो और पहले तिर्बाचा करा लेना दक्षिणा में जो मांगुगी वो देंगे
और दक्षिणा में अपने नारायण को माँग लेना
लक्ष्मी जी सुन्दर स्त्री के भेष में रोते हुये पहुँची
बलि ने कहा क्यों रो रहीं हैं आप
तब लक्ष्मी जी बोली की मेरा कोई भाई नहीँ हैं इसलिए मैं दुखी हूँ
तब बलि बोले की तुम मेरी धरम की बहिन बन जाओ
तब लक्ष्मी ने तिर्बाचा कराया
और बोली मुझे आपका ये पहरेदार चाहिये
जब
ये माँगा
तो बलि पीटने लगे अपना माथा
और सोचा
धन्य हो माता पति आये सब कुछ लें गये और ये महारानी ऐसी आयीं की उन्हे भी लें गयीं
तब से ये रक्षाबन्धन शुरू हुआ था
और इसी लिये जब कलावा बाँधते समय मंत्र बोला जाता हैं
येन बद्धो राजा बलि दानबेन्द्रो महाबला तेन त्वाम प्रपद्यये रक्षे माचल माचल:
ये मंत्र हैं
रक्षा बन्धन अर्थात बह बन्धन जो हमें सुरक्षा प्रदान करे
सुरक्षा किस से
हमारे आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से रोग ऋण से।
राखी का मान करे।
अपनी भाई बहन क प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखे।
फैशन ना बनाये।
जय हिंद 🇮🇳

Posted in જાણવા જેવું

इस्लामिक शब्द “खान” से खाना बना है।

दोहा:
‘खाना’ खाते खल सभी,
संत करें ‘आहार’!
सज्जन ‘भोजन’ को करे,
भाषा क्रिया प्रकार!

अर्थात: खाना दुष्ट लोग खाते हैं, भोजन ‘सज्जन’ लोग करते हैं। और आहार संत लोग करते हैं!

1. ‘खाना खाया जाता है, ‘भोजन किया जाता है, ‘आहार’
लिया जाता है!

2. ‘खाना’ कांँटे चम्मच से खाया जाता है, ‘भोजन’ एक हाथ से किया जाता है, आहार दोनों हाथ से लिया जाता है!

3. दूसरों का पेट कटकर अपना पेट भरने को ‘खाना’ कहा जाता है। जीवन जीने के लिए ‘भोजन’ हैं। तथा त्याग, तपस्या, संयम और साधना के लिए पेट भरना ‘आहार’ हैं!

तो आज से हम ‘सज्जन लोग’ ‘भोजन’ करेंगे और करवाएंगे!
जय अन्न दाता 🚩

जय श्री राम 🙏🙏

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

नेहरू चिचा ने इतना सशक्त भारत बनाया था कि 1984 में जब इंदिरा जी मरीं और राजीव जी प्रधानमंत्री बने तो देश मे आम नागरिक को दो बोरी सिमेन्ट लेने के लिये तहसीलदार से परमिट लेना पड़ता था।

एक किलो चीनी खरीदने के लिये भी परमिट लगता था। शादी विवाह में एक क्विंटल चीनी लेने के लिये तो लोग महीनों पहले से जुगाड़ सोर्स सिफारिश खोजने लगते थे।

1978 में हम लोग गैंगटॉक सिक्किम में रहते थे। 1975 में ही ताजा ताजा सिक्किम का भारत मे विलय हुआ था। सो भारत सरकार ने सिक्किम राज्य को कुछ सहूलियत सुविधा दे रखी थी। शेष भारत में जहां कि LPG के कनेक्शन के लिये 10 से 15 साल की प्रतीक्षा थी, सिक्किम में तुरंत मिल जाता था। सो हमारे पिता जी ने भी एक LPG कनेक्सन ले लिया… दो साल बाद हम ट्रांसफर हो कर कोटा राजस्थान चले आये…

यकीन मानिए कि पूरी कालोनी में हमारा एकमात्र घर था जहाँ LPG थी, पर हमारी माँ फिर भी स्टोव ही जलाती थीं क्योंकि उन्हें चिंता रहती थी कि अगर गैस खत्म हो गयी तो सिलेंडर कैसे भरायेगा?

वहीं गैंगटॉक में हमारे एक गुरु जी थे, हिंदी पढ़ाते थे, श्री संत शरण शर्मा जी… उन्होंने न जाने कैसे जुगाड़ बैठा के एक नया नकोर लम्ब्रेटा स्कूटर खरीद लिया और उसे रेल में बुक करा के आगरा ले आये… ये वो ज़माना था जब कि देश मे बजाज के स्कूटर प्रीमियम पर बिकते थे मतलब 5000 का स्कूटर और 5000 ब्लैक दो तब 10,000 में स्कूटर मिलेगा…

आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू चिचा कितने बड़े युगद्रष्टा थे इसका एक और क़िस्सा सुनिये…

नेहरू चिचा ने 1957 में राजधानी दिल्ली के विकास के लिए DDA मतलब Delhi Development Authority की स्थापना की… ऐसी एजेंसियां जो मास्टर प्लान बनाती हैं उसमे अगले 50 वर्षों की प्लानिंग करती हैं कि 50 साल बाद ये कैसा शहर होगा उसकी प्लानिंग करके शहर बसाया जाता है… उसकी सड़कें, पुल, सार्वजनिक परिवहन, रेलवे स्टेशन, बिजली पानी की व्यवस्था सब 50 साल का सोच कर की जाती है…

नेहरू चिचा कहते थे, मेरे सपनों का भारत… चिचा ने सपने में भी कभी नही सोचा था कि साले दिल्ली वाले जिंदगी में कभी कार तो छोड़ स्कूटर भी खरीद पाएंगे… इसलिये 60 और 70 के दशक में बने दिल्ली के DDA फ्लैट्स देख लीजिये… किसी फ्लैट में कार तो छोड़ो स्कूटर तक खड़ा करने की जगह नही है…

नेहरू चिचा कितने बड़े युगद्रष्टा थे इसकी एक और मिसाल ‘India Unbounds’ नाम किताब के लेखक गुरुचरण दास ने दी है… आप 60 और 70 के दशक में P&G मतलब procter & Gamble के CEO रहे हैं…

वह लिखते हैं कि लिहडू चिचा पूछते थे कि Why should a country like India should have 10 brands of Toothpaste? भारत जैसे देश मे टूथपेस्ट के 10 ब्रांड क्यों होने चाहिए?

क्या आप जानते हैं कि नेहरू और इंदिरा के भारत में किसी कंपनी को टूथपेस्ट की ज़्यादा ट्यूब बनाने के लिए भी भारत सरकार से आज्ञा लेनी पड़ती थी।

70 के दशक में एक बार तमिलनाडु में फ्लू फैल गया। P&G का मशहूर विक्स इन्हेलर और विक्स वेपोरब तब भी बनता था। फ्लू फैला तो विक्स बाजार से गायब हो गया। कंपनी ने भारत सरकार से 5 लाख विक्स इन्हेलर अतिरिक्त बनाने की इजाजत मांगी। वो इजाजत डेढ़ महीने में जब तक आयी, फ्लू ठीक हो चुका था…

बजाज के पास तब भी क्षमता थी कि लाखों स्कूटर बना देते पर नेहरू और इंदिरा ने उनको कभी स्कूटर बनाने ही नही दिया।

गुरुचरण दास लिखते हैं कि बिड़ला जी के बेटे आदित्य बिड़ला ने भारत मे जब हिंडाल्को खड़ी की तो नेहरू इंदिरा ने उनको इतना परेशान किया कि उन्होंने कसम खा ली कि फिर कभी देश मे कोई फैक्ट्री नही लगाऊंगा। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन मे देश के बाहर 32 बहुत बड़ी बड़ी मिल्स फैक्टरी बनाई पर भारत मे कभी नही लगाई…

इसलिये आज के बाद कोई कांग्रेसी गणचट ये कहे न कि नेहरू जी ने IIT और AIIMS और इसरो बनाया तो उसके पिछवाड़े में इस पोस्ट की बत्ती बना के घुसेड़ देना।

साभार : राकेश

Posted in जीवन चरित्र, नहेरु परिवार - Nehru Family

सैयद हुसैन और जवाहर लाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की कहानी

मिस्र की राजधानी काहिरा में एक क़ब्रिस्तान है ‘अल-अराफ़ा’ जिसे अंग्रेज़ी में कहा जाता है ‘द सिटी ऑफ़ द डेड’.

इस क़ब्रिस्तान में एक अकेला भारतीय दफ़्न है जो अपने ज़माने में एक बहुत बड़ा अध्येता, पत्रकार और देश प्रेमी था और जिसने सालों तक भारत के बाहर रहकर उसकी आज़ादी के लिए बहुत पसीना बहाया था.

इस शख़्स का नाम था सैयद हुसैन जिसका जन्म सन 1888 में ढाका में हुआ था. होसैन मामूली शख़्स नहीं थे.

एनएस विनोध उनकी जीवनी ‘अ फ़ॉरगॉटेन एमबेसेडर इन काएरो द लाइफ़ एंड टाइम्स ऑफ़ सैयद हुसैन’ में लिखते हैं, “सैयद अपने समय के निहायत ही आकर्षक, विद्वान और सुसंस्कृत शख्स थे जिनमें अपने भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देने की ग़ज़ब की क्षमता थी. वो एक असाधारण लेखक और धर्मनिरपेक्ष देशभक्त थे.”

वे लिखते हैं, “उनकी उपलब्धियों को शायद इसलिए नज़रअंदाज़ कर दिया गया क्योंकि उन्हें देश के एक बहुत बड़े परिवार की नाराज़गी का सबब बनना पड़ा था. वो एक ऐसे इंसान थे जिनके बड़े योगदान और उपलब्धियों के बावजूद उनके देश और इतिहास ने उन्हें वो स्थान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था.”
अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के बाद सैयद क़ानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे लेकिन उन्होंने बैरिस्टर बनने के बजाए पत्रकार बनना ज़्यादा पसंद किया.

सैयद 5 फ़ीट 10 इंच लंबे थे और अच्छे कपड़े पहनने के शौकीन थे. अंग्रेज़ी भाषा पर उनका अधिकार इतना ज़बरदस्त था कि इंग्लैंड की कई महिलाएं उनकी तरफ़ आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकीं.

इंग्लैंड में सात साल रहने के बाद सैयद नवंबर 1916 में भारत लौटे थे और एक महीने बाद ही उन्होंने बंबई के बॉम्बे क्रॉनिकल अख़बार में बतौर उप संपादक काम करना शुरू कर दिया था.

अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ लिखे उनके लेखों को पूरे भारत में बहुत दिलचस्पी के साथ पढ़ा जाता था. उन लेखों पर मोतीलाल नेहरू और महात्मा गांधी की भी नज़र गई थी.

सैयद हुसैन की असली कहानी शुरू होती है जनवरी 1919 में जब मोतीलाल नेहरू ने उनके लेखन से प्रभावित होकर ‘इंडिपेंडेंट’ अख़बार का संपादक बनने के लिए इलाहाबाद आमंत्रित किया.

इस अख़बार का दफ़्तर शुरू में मोतीलाल नेहरू के निवास स्थान आनंद भवन में हुआ करता था. सैयद को 1500 रुपये के वेतन पर रखा गया था जो उस ज़माने में बड़ी तनख़्वाह हुआ करती थी.जब सैयद ‘इंडिपेंडेंट’ के संपादक बनकर इलाहाबाद आए तो शुरू में आनंद भवन मे ही रुके. उन्हीं दिनों मोतीलाल नेहरू की बेटी विजयलक्ष्मी पंडित ने सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू को लिखे पत्र में लिखा, “सैयद हमारे साथ ही रह रहे हैं क्योंकि उनको प्रेस के पास कोई ढंग का घर नहीं मिल पाया है.”

आनंद भवन में रहने की वजह से सैयद को नेहरू परिवार से घुलमिल जाने के कई मौके मिले.

तब विजयलक्ष्मी की उम्र 19 वर्ष थी. वो बहुत सुंदर थीं. घर में लोग उन्हें ‘नान’ कहकर पुकारते थे. हालांकि सैयद उनसे उम्र में 12 वर्ष बड़े थे, लेकिन वो उनकी तरफ़ आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके. विजयलक्ष्मी भी उनकी तरफ़ खिंची चली गईं.

उन दिनों इलाहाबाद जैसे शहर में इंग्लैंड में पढ़े लिखे आकर्षक युवा ढूंढने से भी नहीं मिलते थे. उन्हीं दिनों सैयद हुसैन को लंदन में होने वाली ख़िलाफ़त कान्फ़्रेंस के लिए चुन लिया गया.

एक सूत्र के अनुसार दोनों ने सैयद के लंदन जाने से पहले गुपचुप तरीके से मुस्लिम तरीके से विवाह कर लिया.

एनएस विनोद लिखते हैं, “जब मोतीलाल नेहरू को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया. वो इस बात पर आगबबूला हो गए कि इस तरह की चीज़ उनके अपने घर में परिवार की निगरानी के बावजूद कैसे हो गई? जवाहरलाल नेहरू भी अपनी बहन से कम नाराज़ नहीं थे.”बाद में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा ‘स्कोप ऑफ़ हैपिनेस’ में स्वीकार किया, “अपनी किशोरावस्था में मैं एक युवक सैयद हुसैन की तरफ़ आकर्षित हो गई थी. उन्हें मेरे पिता ने ‘इंडिपेंडेंट’ अख़बार का संपादक नियुक्त किया था.”

वे लिखती हैं, “उस ज़माने में जहाँ हर जगह हिंदू-मुस्लिम एकता की बात हो रही थी और उस परिवार का सदस्य होने के नाते जिसके बहुत सारे मुस्लिम दोस्त थे, मैंने सोचा कि धर्म के बाहर शादी करना बहुत अजूबी बात नहीं होगी. लेकिन शादी के मामलों में अभी भी परंपरा का बोलबाला था. लिहाज़ा मुझे ये समझने के लिए मना लिया गया कि ऐसा करना ग़लत होगा.”

विजयलक्ष्मी पंडित की बहन कृष्णा हठी सिंह ने भी अपनी आत्मकथा ‘वी नेहरूज़’ में इस घटना का ज़िक्र दबे छिपे अंदाज़ में किया है.

वे लिखती हैं, “सन 1920 में मेरी बहन की मंगनी रंजीत सीताराम पंडित से हो गई. लेकिन इससे पहले मेरे पिता ने उनके लिए एक वर ढूंढा था लेकिन उन्होंने उससे शादी करने से ये कहते हुए इनकार कर दिया था कि वो एक लड़के को चाहती हैं.”

उन्होंने लिखा, “मेरे पिता का मानना था कि वो लड़का उनके लायक नहीं हैं. इसकी वजह से मेरे पिता और नान (बहन) के बीच तनाव पैदा हो गया था और वो गांधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा के साथ रहने उनके साबरमती आश्रम चली गई थीं. गाँधीजी के प्रयासों के बाद छह महीनों में नान और पिताजी के बीच संबंध सामान्य हो पाए थे.”
उस ज़माने के मशहूर वकील के एल गौबा ने जिन्होंने ख़ुद एक मुस्लिम महिला से शादी की थी अपनी आत्मकथा ‘फ़्रेंड्स एंड फ़ोज़’ में लिखा था, “हिंदू-मुस्लिम रोमाँस का सबसे ताज़ा उदाहरण है एक कश्मीरी महिला जो ‘द इंडिपेंडेंट’ अख़बार के मुस्लिम संपादक के साथ चली गई थीं.”

“महात्मा गाँधी के निजी हस्तक्षेप के बाद उस लड़की को तलाक दिया गया था. बाद में वो गुजरात में जाकर रहीं और बहुत मशहूर महिला बन गई.”

शादी की कहानी के एक और स्रोत नेहरू के सचिव रहे एम ओ मथाई हैं जो अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज’ में लिखते हैं, “गाँधीजी की हत्या के कुछ दिनों बाद राजकुमारी अमृत कौर ने, जो स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं, गाँधी के पास रखी एक सील्ड फ़ाइल नेहरू के पास पहुंचाई थी.”

वे लिखते हैं, “नेहरू ने फ़ाइल खोलने के बाद मुझे बुला कर कहा था, इस फ़ाइल में विजयलक्ष्मी के सैयद हुसैन के साथ जाने संबंधी कागज़ात हैं. आप उनको जला दीजिए. मैंने उनसे अनुरोध किया कि ये कागज़ आप मेरे पास रहने दीजिए, लेकिन वो उसके लिए राज़ी नहीं हुए. मैं उनसे फ़ाइल लेकर सीधे प्रधानमंत्री निवास के रसोइघर गया और तब तक वहाँ खड़ा रहा जब तक वो कागज़ राख में नहीं बदल गए.”इस शादी का वर्णन एक पाकिस्तानी पत्रकार एचएम अब्बासी ने डेली न्यूज़ के 17 नवंबर, 1971 के अंक में छपे अपने लेख ‘लव लाइफ़ ऑफ़ मिसेज़ पंडित’ में किया है.

अब्बासी लिखते हैं, “मैं अपने दादा हज़रत मौलाना रशीद फ़ाकरी के पास बैठा हुआ था. तभी एक आदमी ने उनके कान में आकर कुछ कहा. मौलाना फौरन खड़े होते हुए बोले, सैयद ने मुझे बुलाया है. मैं उनके साथ सैयद हुसैन के कटरा में म्योर कॉलेज के सामने वाले घर में गया.”

उन्होंने लिखा, “जब मैं वहाँ पहुंचा तो क़रीब आधा दर्जन लोग उनके बरामदे में खड़े थे. सैयद काफ़ी परेशान दिख रहे थे. पास में मिस पंडित बैठी हुई थीं जिनके चेहरे पर परेशानी के कोई भाव नहीं थे.”

“वहाँ मौजूद लोगों में नवाब सर मोहम्मद यूसुफ़ जो बाद में उत्तर प्रदेश में मंत्री भी बने और सैयद असग़र हुसैन भी थे. ये दोनों सैयद के क़रीबी दोस्त थे. मुझे तभी पता चला कि सैयद और विजयलक्ष्मी पंडित की उसी समय शादी होने वाली है. मेरे दादा मौलाना रशीद फ़ाकरी ने उन दोनों का निकाह पढ़वाया था.”इस कहानी ने तब दिलचस्प मोड़ लिया जब सैयद हुसैन ने अचानक 18 दिसंबर, 1919 को ‘द इंडिपेंडेंट’ के संपादक पद से इस्तीफ़ा दे दिया और उसी दिन अख़बार में अपना अंतिम संपादकीय लिखा.

22 दिसंबर को इलाहाबाद में एक समारोह हुआ जिसमें कई लोगों ने राष्ट्रीय मसलों में सैयद के योगदान और उनके लेखन की तारीफ़ की. इसके तुरंत बाद हुसैन ख़िलाफ़त कमेटी और कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने अमृतसर चले गए.

एनएस विनोद लिखते हैं, “इस अधिवेशन से कुछ समय निकाल कर गांधी और मोतीलाल ने सैयद हुसैन से इस दुस्साहसी काम के लिए सवाल जवाब किए होंगे और उन्हें इस शादी को तोड़ने के लिए मनाया होगा.”

वे लिखते हैं, “चूँकि सैयद का इंग्लैंड जाने का कार्यक्रम पहले से ही तय था, चतुर गाँधी ने उनसे तब तक इंग्लैंड में रहने का अनुरोध किया जब तक ये मामला ठंडा नहीं पड़ जाता. सैयद इन दो सम्मानित महानुभावों के संयुक्त हमलों का सामना नहीं कर पाए और युवा जोड़ा अपनी शादी तोड़ने के लिए राज़ी हो गया.”बाद में विजयलक्ष्मी पंडित ने 13 मार्च, 1920 को पद्मजा नायडू को लिखे पत्र में इशारा किया कि गांधी ने उनसे और सैयद से मिलकर उनके वैवाहिक ‘मिसएडवेंचर’ के लिए उन्हें काफी खरी खोटी सुनाई. जल्द ही सैयद लंदन जाने के लिए बंबई रवाना हो गए और विजयलक्ष्मी को उनके दिमाग़ और आत्मा की शुद्धि के लिए गाँधीजी के साबरमती आश्रम में भेज दिया गया.

एन एस विनोद लिखते हैं, “पद्मजा और कुछ हद तक उनकी माँ सरोजिनी नायडू उन लड़कियों के लिए ‘एगनी आँट’ का काम करती थीं जो इस तरह के संबंध बनाने की हिम्मत करती थीं. पहले वो जिन्ना की पत्नी रति की राज़दार हुआ करती थीं. बाद में वो विजयलक्ष्मी पंडित की भी राज़दार बनीं.”

वे लिखते हैं, “एक सवाल उठना भी लाज़िम है कि क्या जिन्ना और रति के विवाह से प्रेरणा लेकर तो सैयद और विजयलक्ष्मी ने अपनी शादी की योजना नहीं बनाई थी? दोनों शादियों में कई समानताएं थीं. एक तरफ़ पढ़ा लिखा एक अभिजात्य मुसलमान अपने से कहीं छोटी पारसी लड़की से शादी कर रहा था तो दूसरी तरफ़ एक अच्छे परिवार का मुस्लिम लड़का अपने से कहीं छोटी कश्मीरी ब्राह्मण लड़की से शादी रचा रहा था.”
अमृतसर में काँग्रेस अधिवेशन के बाद महात्मा गाँधी आनंद भवन आए. आनंद भवन में अपने प्रवास के दौरान ही गाँधीजी ने सुझाव दिया कि विजयलक्ष्मी अहमदाबाद के पास साबरमती आश्रम में उनके साथ कुछ दिन गुज़ारें.

विजयलक्ष्मी लिखती हैं, “मेरी माँ का मानना था कि मेरी पश्चिमी तरीके से हुए पालन-पोषण के कारण मैं गैरपरंपरागत ढंग से सोचने लगी हूँ. इसलिए उन्होंने गाँधीजी के मेरे साबरमती आश्रम जाने के सुझाव का स्वागत किया.”

विजयलक्ष्मी को साबरमती जाना पसंद नहीं आया. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, “मैंने जैसे ही उस जगह को देखा मेरा दिल बैठ गया. वहाँ की हर चीज़ नीरस और आँखों के लिए अप्रिय थी.”

उन्होंने लिखा, “हम प्रार्थना के लिए सुबह 4 बजे ही उठ जाते थे और फिर अपने कमरे में झाड़ू लगाते थे. हम पास की नदी में अपने कपड़े धोने जाते थे. आश्रम में ज़ोर रहता था कि हमारी खाने की सभी इच्छाएं मर जाएं. आश्रम में उगने वाली कुछ सब्ज़ियों को बिना नमक, मसाले और घी के उबाल दिया जाता था. उनको हम चपातियों और चावल के साथ खाते थे. आश्रम में न तो चाय पीने के लिए दी जाती थी और न ही कॉफ़ी.”मोतीलाल नेहरू ने रहने और खाने के पश्चिमी तरीके ज़रूर अपना लिए हों लेकिन दिल से वो परंपरागत हिंदू थे जो ये कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनकी बेटी किसी मुस्लिम से शादी करे.

दूसरी तरफ़ महात्मा गाँधी सार्वजनिक रूप से भले ही हिंदू मुस्लिम एकता की बात करते हों लेकिन वो भी परंपराओं में उतना ही यकीन करते थे जितना मोतीलाल नेहरू.

यही कारण था कि उन्होंने 1926 में अपने बेटे मणिलाल को मुस्लिम लड़की फ़ातिमा गुल से शादी नहीं करने दी थी. सैयद के लंदन जाने के कुछ महीनों बाद विजयलक्ष्मी पंडित की मंगनी महाराष्ट्र के सास्वत ब्राह्मण रणजीत पंडित से कर दी गई.

9 मई 1921 को इलाहाबाद में उनकी शादी हुई जिसमें गांधीजी ने भी शिरकत की. इस शादी में सरोजिनी नायडू भी आईं.

15 मई 1921 को उन्होंने अपनी बेटी लैलामणि को एक पत्र में लिखा, “बेचारा सैयद. उसके लिए मेरा दिल बहुत दुखा लेकिन फिर भी शुक्र है इसका अंत इस तरह हुआ क्योंकि विजयलक्ष्मी को इससे शायद ही कोई फ़र्क पड़ा.” हाँ, सैयद हुसैन ताउम्र अविवाहित रहे.इस शादी की गूँज ब्रिटेन के हाउज़ ऑफ़ कॉमंस में भी सुनाई दी.

14 अप्रैल, 1920 को कंज़रवेटिव साँसद कुथबर्ट जेम्स ने भारतीय मामलों के मंत्री एडविन मौंटागू से लिखित सवाल पूछा, “क्या ये सही है कि इस देश की हाल में भारतीय ख़िलाफ़त प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में यात्रा करने वाले सैयद हुसैन पर मोतीलाल नेहरू की बेटी का अपहरण करने का आरोप है?”

एडविन मौंटागू ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.

सैयद ने इसका प्रतिरोध करते हुए जेम्स को एक पत्र लिख कर कहा कि, “मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि आपने मेरे चरित्र पर गंभीर और बेबुनियाद टिप्पणी की है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आपने किस आधार पर ऐसी बेतुकी बात कही? आप अपने इस कथन को वापस लीजिए और इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगिए. अगर आप में ज़रा भी इज़्ज़त बाकी है तो आप ये बात संसद के बाहर कहकर देखिए ताकि मैं इसका यथोचित जवाब दे सकूँ.”सैयद हुसैन ने 1920 में जो भारत छोड़ा तो वो अगले 26 सालों तक भारत नहीं लौटे. बीच में वो 1937 में कुछ दिनों के लिए भारत आए थे.

उन्होंने पहले ब्रिटेन और फिर अमेरिका की धरती पर भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी. इस दौरान भारत में हो रही घटनाओं जैसे असहयोग आँदोलन, मुस्लिम लीग के उदय और पाकिस्तान बनाने के लिए उनके पुराने दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना के किए गए आँदोलन, नेहरू के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार और धर्म के आधार पर देश के विभाजन से उनका सीधा साबिक़ा (वास्ता) नहीं पड़ा.

लंदन प्रवास के दौरान सैयद हुसैन राष्ट्रवादी अख़बार इंडिया के संपादक रहे. अक्टूबर 1921 में उन्होंने लंदन छोड़कर अमेरिका का रुख़ किया जहाँ वो 1946 तक रहे.

इस दौरान वे पूरे अमेरिका में घूम घूम कर भारत की आज़ादी के पक्ष में भाषण दिए.

1924 से 1928 तक वे ‘द न्यू ओरिएंट’ के संपादक रहे. उनके कार्यकाल के दौरान उनके अख़बार में महात्मा गाँधी, अल्बर्ट आइंस्टीन, ख़लील जिब्रान, सरोजिनी नायडू और बर्टरेंड रसेल के लेख छपे.

इसके बाद उन्होंने एक और पत्रिका ‘वॉएस ऑफ़ इंडिया’ का भी संपादन किया. उन्होंने हमेशा भारत की साँस्कृतिक एकता की वकालत की. उनका कहना था कि भारतीय संस्कृति न तो हिंदू है और न ही मुस्लिम. वो पूरी तरह से भारतीय है.

उस दौरान वो शायद उन गिने चुने लोगों में से थे जो अविभाजित भारत का सपना देखते थे जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों को समान अधिकार प्राप्त होंगे.
1945 में जब विजयलक्ष्मी पंडित अमेरिका गईं तो वो 26 साल बाद अपने हुसैन से मिलीं.

1946 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिख भारत वापस आने की इच्छा प्रकट की लेकिन नेहरू की तरफ़ से उन्हें बहुत ठंडा जवाब मिला.

उन्होंने लिखा, “आप अमेरिका में रहकर भारत के लिए बेहतर काम कर सकते हैं.”

एमओ मथाई लिखते हैं, “नेहरू का जवाब उस संभावना को रोकने के लिए था कि विजयलक्ष्मी पंडित और सैयद हुसैन फिर से संपर्क में आ जाएंगे और उनके बारे में बातों का दौर फिर से शुरू हो जाएगा. ज़ाहिर था कि नेहरू ने 30 साल पहले उनकी बहन के साथ हुए उनके प्रेम संबंधों को भुलाया नहीं था.”नेहरू और गाँधी के हतोत्साहित किए जाने के बावजूद सयैद हुसैन 1946 में भारत वापस लौट आए. उस समय विजयलक्ष्मी पंडित उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री थीं.

दो साल पहले उनके पति रंजीत पंडित का देहावसान हो चुका था. उस समय जवाहरलाल नेहरू 17 यॉर्क रोड पर रहते थे.

जब भी विजयलक्ष्मी लखनऊ से दिल्ली आतीं, वो अपने भाई के घर पर ही ठहरतीं.

एमओ मथाई की बात मानी जाए तो रिमलेस चश्मा लगाए सैयद हुसैन रोज़ सुबह नेहरू के घर पहुंच जाते. उनकी पतलून के पीछे की जेब में कोनयेक का एक फ़्लास्क रखा रहता जिससे वो समय समय में कोनयेक का घूँट भरते रहते.

विजयलक्ष्मी पंडित और सैयद हुसैन की मुलाक़ातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया.

संभवतः यही कारण था कि नेहरू ने विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ में भारत का पहला राजदूत नियुक्त किया, हाँलाकि उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ख़ासकर लियाक़त अली ने इसका घोर विरोध किया.

खुद विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि उन्हें अपने भाई का ये फ़ैसला पसंद नहीं आया.

दूसरी तरफ़ सैयद हुसैन को मिस्र में भारत के पहले राजदूत के तौर पर भेजा गया.

इसके पीछे नेहरू की मंशा रही होगी कि विजयलक्ष्मी और सैयद हुसैन को मिलने का मौका इतनी आसानी से न मिल सके.सैयद हुसैन ने 3 मार्च 1948 को मिस्र के सम्राट एमएम फ़ारूख के सामने अपने परिचय पत्र पेश किए.

उनको चार घोड़ों की बग्घी में बैठा कर परंपरगत रूप से मिस्र के सम्राट के महल आबदीन पैलेस ले जाया गया.

उनके जुलूस में मिस्र की सेना के क़रीब 100 घुड़सवार चल रहे थे. महल में उनके पहुंचते ही उन्हें सम्राट के अंगरक्षकों ने गार्ड ऑफ़ ऑनर दिया.

काहिरा में अपने प्रवास के दौरान सैयद घर में न रह कर शैपहर्ड होटल में रहे.

उनके मिस्र प्रवास के दौरान जवाहरलाल नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित और उनकी बेटियाँ चंद्रलेखा और नयनतारा उनसे मिलने वहाँ गए. लेकिन एक वर्ष के अंदर ही सैयद हुसैन का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. उस समय उनकी उम्र 61 साल थी.मिस्र की राजधानी काहिरा में ही उन्हें पूरे सैनिक सम्मान के साथ दफ़नाया गया.

मिस्र की सरकार ने एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा.

भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मई, 1949 में काहिरा जाकर सैयद हुसैन की क़ब्र पर फूल चढ़ाए.

कुछ दिनों बाद विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि बन गईं.

न्यूयॉर्क की अपनी सरकारी यात्राओं के दौरान वो अक्सर काहिरा में रुकतीं और सैयद हुसैन की कब्र पर फूल चढ़ातीं.

साभार – बीबीसी

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક મેજરના નેતૃત્વમાં ૧૫ જવાનોની એક ટૂકડી હિમાલયના રસ્તે જઈ રહી હતી. સખત ઠંડી વચ્ચે મેજર ને વિચાર આવ્યો કે આ સમયે જો એક કપ ચા મળી જાય તો આગળ વધવાની તાકાત મળી જાય. પરંતુ રાતનો સમય હતો અને આજુબાજુ માં કોઈ વસ્તી પણ ન હતી.
લગભગ એક કલાક ના ચઢાણ પછી તેમને એક જર્જરિત ચા ની દુકાન જોવા મળી પરંતુ તેના પર તાળું લાગેલું હતું.ભૂખ અને થાકની તીવ્રતા થઈ મેજર સાહેબ દુકાનનું તાળું તોડવા તૈયાર થઈ ગયા. તાળું તોડ્યું તો અંદર તેમને ચા બનાવવાનો બધો સામાન મળી ગયો.

જવાનોએ ચા બનાવી, ત્યાં રાખેલા બિસ્કીટ વગેરે ખાઈને ક્ષુધા સંતોષી. થોડો આરામ કરી બધા આગળ વધવાની તૈયારી કરવા લાગ્યા પરંતુ મેજર સાહેબને આમ ચોરો ની જેમ દુકાનનું તાળું તોડવા બદલ આત્મગ્લાનિ થઈ રહી હતી.તેમણે પાકીટમાં થઈ એક હજાર ની નોટ કાઢીને ખાંડના ડબ્બા નીચે દબાવીને રાખી દીધી તથા દુકાનનું શટર ઠીકથી બંધ કરીને આગળ વધી ગયા.

ત્રણ મહિના બાદ એ ટુકડીના બધાં ૧૫ જવાન સકુશળ પોતાના મેજર ના નેતૃત્વમાં એ જ રસ્તે પાછા ફરી રહ્યા હતા.રસ્તામાં ચાની એ જ દુકાન ખુલી જોઈને ત્યાં વિશ્રામ કરવા રોકાઈ ગયા.

દુકાનનો માલિક એક બુઢો વ્યક્તિ હતો જે એક સાથે આટલા ગ્રાહકો જોઈને ખુશ થઈ ગયો અને તેમને માટે ચા બનાવવા લાગ્યો. ચાની ચુસ્કીઓ અને બિસ્કીટો વચ્ચે જવાનો બુઢા ચાવાળા ને તેના જીવનના અનુભવો વિશે પૂછવા લાગ્યા, ખાસ કરીને આટલી વેરાન જગ્યામાં દુકાન ચલાવવા વિશે.

બુઢો તેમને ઘણી વાતો સંભળાવતો રહ્યો અને સાથે સાથે ભગવાનનો આભાર માનતો રહ્યો.
ત્યારે એક જવાન બોલ્યો,” બાબા,આપ ભગવાન માં એટલા માનો છો પણ જો ખરેખર ભગવાન હોય તો તેમણે તમને આટલી ખરાબ પરિસ્થિતિ માં શા માટે રાખ્યા છે?”
બાબા બોલ્યા,” ના, સાહેબ ભગવાન વિશે એવું ન કહો, ભગવાન તો છે અને ખરેખર છે.. મેં તેમને જોયા છે.”

આખરી વાક્ય સાંભળીને બધા જવાન કુતૂહલ થી બુઢાની તરફ જોવા લાગ્યા.
બુઢો બોલ્યો,” સાહેબ, હું બહુ મુસીબત માં હતો. એક દિવસ મારા એક ના એક પુત્ર ને આતંકવાદીઓ એ પકડી લીધો.. એમણે તેની ખૂબ મારપીટ કરી પણ મારા પુત્ર પાસે કોઈ જાણકારી ન હતી એટલે મારપીટ કરી છોડી મૂક્યો.”
” હું દુકાન બંધ કરીને તેને હોસ્પિટલમાં લઈ ગયો. હું બહુ આર્થિક તંગી માં હતો અને આતંકવાદીઓ ના ડરથી કોઈ એ મને ઉધાર પણ ન આપ્યું.”

” મારી પાસે દવાઓ ના પૈસા પણ ન હતા. મને કોઈ આશા નજર આવતી નહોતી. એ રાત્રે હું બહુ રડ્યો અને ભગવાનને પ્રાર્થના કરી અને મદદ માંગી.,” અને સાહેબ તે રાત્રે ભગવાન ખુદ મારી દુકાનમાં આવ્યા. હું સવારે મારી દુકાન પર પહોંચ્યો તો તાળું તૂટેલું જોઈને મને લાગ્યું કે મારી પાસે જે થોડું ઘણું પણ હતું તે પણ લૂંટાઈ ગયું હતું. હું દુકાનમાં ઘુસ્યો અને જોયું તો એક હજાર રૂપિયાની નોટ ખાંડના ડબ્બા નીચે ભગવાને મારી માટે રાખેલી હતી.
સાહેબ..તે દિવસે હજારની નોટ નું મૂલ્ય મારા માટે શું હતું એ હું કહી શકતો નથી.પણ ભગવાન છે સાહેબ , ભગવાન તો છે.”બુઢો સ્વગત બબડ્યો.

ભગવાનના હોવાનો આત્મવિશ્વાસ તેની આંખોમાં સાફ ચમકી રહ્યો હતો.
આ સાંભળીને ત્યાં સન્નાટો છવાઈ ગયો.
પંદર જોડી આંખો મેજરના તરફ જોઈ રહી હતી જેની આંખોમાં તેમને માટે સ્પષ્ટ સંદેશો હતો ” ચુપ રહો”
મેજર સાહેબ ઉઠ્યા, ચા નું બીલ ચૂકવ્યું અને બુઢાને ગળે લગાવીને બોલ્યા, હા બાબા, હું જાણું છું ભગવાન છે…અને હા ,તારી ચા પણ શાનદાર હતી.”

એક જવાને બતાવેલી, જમ્મુ-કાશ્મીરના કુપવાડા સેક્ટરમાં બનેલી આ એક સાચી ઘટના છે.

Posted in हिन्दू पतन

रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला

#डॉ_विवेक_आर्य

बचपन में हमें अपने पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता रहा है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपने भाई को राखी बाँध कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। रक्षा बंधन का सबसे प्रचलित उदाहरण चित्तोड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ का दिया जाता है। कहा जाता है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र लिख कर सहायता करने का निवेदन किया। पत्र के साथ रानी ने भाई समझ कर राखी भी भेजी थी। हुमायूँ रानी की रक्षा के लिए आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। रानी ने जौहर कर आत्महत्या कर ली थी। इस इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम एकता तोर पर पढ़ाया जाता हैं।
अब सेक्युलर घोटाला पढ़िए
हमारे देश का इतिहास सेक्युलर इतिहासकारों ने लिखा है। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम थे। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नेहरू ने सख्त हिदायत देकर यह कहा था कि जो भी इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये। उस इतिहास में यह न पढ़ाया जाये कि मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा, हिन्दुओं को जबरन धर्मान्तरित किया, उन पर अनेक अत्याचार किये। मौलाना ने नेहरू की सलाह को मानते हुए न केवल सत्य इतिहास को छुपाया अपितु उसे विकृत भी कर दिया।
रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के किस्से के साथ भी यही अत्याचार हुआ। जब रानी को पता चला की बहादुर शाह उस पर हमला करने वाला है तो उसने हुमायूँ को पत्र तो लिखा। मगर हुमायूँ को पत्र लिखे जाने का बहादुर खान को पता चल गया। बहादुर खान ने हुमायूँ को पत्र लिख कर इस्लाम की दुहाई दी और एक काफिर की सहायता करने से रोका।

मिरात-ए-सिकंदरी में गुजरात विषय से पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा मिलता है-

सुल्तान के पत्र का हुमायूँ पर बुरा प्रभाव हुआ। वह आगरे से चित्तोड़ के लिए निकल गया था। अभी वह ग्वालियर ही पहुंचा था। उसे विचार आया, “सुलतान चित्तोड़ पर हमला करने जा रहा है। अगर मैंने चित्तोड़ की मदद की तो मैं एक प्रकार से एक काफिर की मदद करूँगा। इस्लाम के अनुसार काफिर की मदद करना हराम है। इसलिए देरी करना सबसे सही रहेगा। ” यह विचार कर हुमायूँ ग्वालियर में ही रुक गया और आगे नहीं सरका।
इधर बहादुर शाह ने जब चित्तोड़ को घेर लिया। रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। हुमायूँ का कोई नामोनिशान नहीं था। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया। ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

बहादुर शाह किले में लूटपाट कर वापिस चला गया। हुमायूँ चित्तोड़ आया। मगर पुरे एक वर्ष के बाद आया। परन्तु किसलिए आया? अपने वार्षिक लगान को इकट्ठा करने आया। ध्यान दीजिये यही हुमायूँ जब शेरशाह सूरी के डर से रेगिस्तान की धूल छानता फिर रहा था। तब उमरकोट सिंध के हिन्दू राजपूत राणा ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। यही उमरकोट में अकबर का जन्म हुआ था। एक काफ़िर का आश्रय लेते हुमायूँ को कभी इस्लाम याद नहीं आया। और धिक्कार है ऐसे राणा पर जिसने अपने हिन्दू राजपूत रियासत चित्तोड़ से दगा करने वाले हुमायूँ को आश्रय दिया। अगर हुमायूँ यही रेगिस्तान में मर जाता। तो भारत से मुग़लों का अंत तभी हो जाता। न आगे चलकर अकबर से लेकर औरंगज़ेब के अत्याचार हिन्दुओं को सहने पड़ते।

इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकारों ने इतिहास का केवल विकृति करण ही नहीं किया अपितु उसका पूरा बलात्कार ही कर दिया। हुमायूँ द्वारा इस्लाम के नाम पर की गई दगाबाजी को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और रक्षाबंधन का नाम दे दिया। हमारे पाठ्यक्रम में पढ़ा पढ़ा कर हिन्दू बच्चों को इतना भ्रमित किया गया कि उन्हें कभी सत्य का ज्ञान ही न हो। इसीलिए आज हिन्दुओं के बच्चे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के दर्शन करने जाते हैं। जहाँ पर गाइड उन्हें हुमायूँ को हिन्दू मुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के रूप में बताते हैं।

इस लेख को आज रक्षाबंधन के दिन इतना फैलाये कि इन सेक्युलर घोटालेबाजों तक यह अवश्य पहुंच जाये।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

उसको तो फ़र्क पड़ता है”*
************************
*एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद हजारों मछलियाँ किनारे पर रेत पर तड़प-तड़प कर मर रही थीं ! इस भयानक स्थिति को देखकर पास में रहने वाले एक 6 वर्ष के बच्चे से रहा नहीं गया, और वह एक-एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेकने लगा ! यह देख कर उसकी माँ बोली, बेटा हज़ारों की संख्या में हैं, तू कितनों की जान बचाएगा ,यह सुनकर बच्चे ने अपनी स्पीड और बढ़ा दी, माँ फिर बोली बेटा रहने दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
*बच्चा जोर जोर से रोने लगा और एक मछली को समुद्र में फेकते हुए जोर से बोला माँ “इसको तो फ़र्क पड़ता है” दूसरी मछली को उठाता और फिर बोलता माँ “इसको तो फ़र्क पड़ता हैं” ! माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया !*
*हो सके तो लोगों को हमेशा हौंसला और उम्मीद देने की कोशिश करना चाहिये, न जाने कब हमारी वज़ह से किसी की जिन्दगी बदल जाए! क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर………………….
“उसको तो फ़र्क पड़ता है!”

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક મેજરના નેતૃત્વમાં ૧૫ જવાનોની એક ટૂકડી હિમાલયના રસ્તે જઈ રહી હતી. સખત ઠંડી વચ્ચે મેજર ને વિચાર આવ્યો કે આ સમયે જો એક કપ ચા મળી જાય તો આગળ વધવાની તાકાત મળી જાય. પરંતુ રાતનો સમય હતો અને આજુબાજુ માં કોઈ વસ્તી પણ ન હતી.
લગભગ એક કલાક ના ચઢાણ પછી તેમને એક જર્જરિત ચા ની દુકાન જોવા મળી પરંતુ તેના પર તાળું લાગેલું હતું.ભૂખ અને થાકની તીવ્રતા થઈ મેજર સાહેબ દુકાનનું તાળું તોડવા તૈયાર થઈ ગયા. તાળું તોડ્યું તો અંદર તેમને ચા બનાવવાનો બધો સામાન મળી ગયો.

જવાનોએ ચા બનાવી, ત્યાં રાખેલા બિસ્કીટ વગેરે ખાઈને ક્ષુધા સંતોષી. થોડો આરામ કરી બધા આગળ વધવાની તૈયારી કરવા લાગ્યા પરંતુ મેજર સાહેબને આમ ચોરો ની જેમ દુકાનનું તાળું તોડવા બદલ આત્મગ્લાનિ થઈ રહી હતી.તેમણે પાકીટમાં થઈ એક હજાર ની નોટ કાઢીને ખાંડના ડબ્બા નીચે દબાવીને રાખી દીધી તથા દુકાનનું શટર ઠીકથી બંધ કરીને આગળ વધી ગયા.

ત્રણ મહિના બાદ એ ટુકડીના બધાં ૧૫ જવાન સકુશળ પોતાના મેજર ના નેતૃત્વમાં એ જ રસ્તે પાછા ફરી રહ્યા હતા.રસ્તામાં ચાની એ જ દુકાન ખુલી જોઈને ત્યાં વિશ્રામ કરવા રોકાઈ ગયા.

દુકાનનો માલિક એક બુઢો વ્યક્તિ હતો જે એક સાથે આટલા ગ્રાહકો જોઈને ખુશ થઈ ગયો અને તેમને માટે ચા બનાવવા લાગ્યો. ચાની ચુસ્કીઓ અને બિસ્કીટો વચ્ચે જવાનો બુઢા ચાવાળા ને તેના જીવનના અનુભવો વિશે પૂછવા લાગ્યા, ખાસ કરીને આટલી વેરાન જગ્યામાં દુકાન ચલાવવા વિશે.

બુઢો તેમને ઘણી વાતો સંભળાવતો રહ્યો અને સાથે સાથે ભગવાનનો આભાર માનતો રહ્યો.
ત્યારે એક જવાન બોલ્યો,” બાબા,આપ ભગવાન માં એટલા માનો છો પણ જો ખરેખર ભગવાન હોય તો તેમણે તમને આટલી ખરાબ પરિસ્થિતિ માં શા માટે રાખ્યા છે?”
બાબા બોલ્યા,” ના, સાહેબ ભગવાન વિશે એવું ન કહો, ભગવાન તો છે અને ખરેખર છે.. મેં તેમને જોયા છે.”

આખરી વાક્ય સાંભળીને બધા જવાન કુતૂહલ થી બુઢાની તરફ જોવા લાગ્યા.
બુઢો બોલ્યો,” સાહેબ, હું બહુ મુસીબત માં હતો. એક દિવસ મારા એક ના એક પુત્ર ને આતંકવાદીઓ એ પકડી લીધો.. એમણે તેની ખૂબ મારપીટ કરી પણ મારા પુત્ર પાસે કોઈ જાણકારી ન હતી એટલે મારપીટ કરી છોડી મૂક્યો.”
” હું દુકાન બંધ કરીને તેને હોસ્પિટલમાં લઈ ગયો. હું બહુ આર્થિક તંગી માં હતો અને આતંકવાદીઓ ના ડરથી કોઈ એ મને ઉધાર પણ ન આપ્યું.”

” મારી પાસે દવાઓ ના પૈસા પણ ન હતા. મને કોઈ આશા નજર આવતી નહોતી. એ રાત્રે હું બહુ રડ્યો અને ભગવાનને પ્રાર્થના કરી અને મદદ માંગી.,” અને સાહેબ તે રાત્રે ભગવાન ખુદ મારી દુકાનમાં આવ્યા. હું સવારે મારી દુકાન પર પહોંચ્યો તો તાળું તૂટેલું જોઈને મને લાગ્યું કે મારી પાસે જે થોડું ઘણું પણ હતું તે પણ લૂંટાઈ ગયું હતું. હું દુકાનમાં ઘુસ્યો અને જોયું તો એક હજાર રૂપિયાની નોટ ખાંડના ડબ્બા નીચે ભગવાને મારી માટે રાખેલી હતી.
સાહેબ..તે દિવસે હજારની નોટ નું મૂલ્ય મારા માટે શું હતું એ હું કહી શકતો નથી.પણ ભગવાન છે સાહેબ , ભગવાન તો છે.”બુઢો સ્વગત બબડ્યો.

ભગવાનના હોવાનો આત્મવિશ્વાસ તેની આંખોમાં સાફ ચમકી રહ્યો હતો.
આ સાંભળીને ત્યાં સન્નાટો છવાઈ ગયો.
પંદર જોડી આંખો મેજરના તરફ જોઈ રહી હતી જેની આંખોમાં તેમને માટે સ્પષ્ટ સંદેશો હતો ” ચુપ રહો”
મેજર સાહેબ ઉઠ્યા, ચા નું બીલ ચૂકવ્યું અને બુઢાને ગળે લગાવીને બોલ્યા, હા બાબા, હું જાણું છું ભગવાન છે…અને હા ,તારી ચા પણ શાનદાર હતી.”

એક જવાને બતાવેલી, જમ્મુ-કાશ્મીરના કુપવાડા સેક્ટરમાં બનેલી આ એક સાચી ઘટના છે.
🍁

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

रक्षा बंधन


इदम रक्षाबंधनं नियतकालत्वात भद्रावर्ज्यग्रहणदिनेSपि कार्यं होलिकावत।
ग्रहसंक्रात्यादौ रक्षा निषेधाभावात।।
यहां से लेकर
कर्तव्यों रक्षिताचारो द्विजान संपूज्य शक्तित:।। निर्णय सिंधु द्वितीय परिच्छेद पेज 180 181,

अथ रक्षाबंधनमस्यामेव पूर्णिमायां भद्रा रहितायां त्रिमुहूर्ता
धिकोव्यापिन्यामपरान्हे प्रदोषे वा कार्यम।
उदयत्रिमुहुर्तन्यूनत्वे पूर्वेधयुर्भद्रा रहिते
प्रदोषादिकाले कार्यम।।
धर्म सिंधु द्वितीय परिच्छेद पृष्ठ क्रमांक 103

बाकी भी ग्रंथो में रक्षाबंधन का उल्लेख है

Posted in हिन्दू पतन

January 1966*:
Most renowned nuclear scientist of India and father of Indian nuclear program Homi J Bhabha is travelling in Air India flight 101 from Mumbai to London.
On morning at 8:02 CET, on approach to Geneva, Flight crashed at Mont Blanc area in France.
All 117 people on board were killed including Dr. Homi Jehangir Bhabha.
Black Box of flight never recovered
Actual reason of crash still unknown
No enquiry was done by Indian govt.

30 December 1971, Trivandrum:
Renowned Indian Space scientist and father of Indian space research, Vikram Sarabhai is find dead in a hotel room at Kovalam.
He had shown no signs of illness at previous evening
No autopsy, no investigation was conducted.
Age was 51 years.

30 November 1994, Kerala:
Famous ISRO Scientist who has reached on verge of making cryogenic engine was suddenly arrested by Kerala Police and IB in fake charges.
Indian space mission goes on hold.
Later it was found that it was a fabricated case.
*2009, Mumbai:*
Nuclear scientist Lokanathan Mahalingam goes missing from his morning walk.
His body was recovered five days later at the Kali river.
Only a few weeks earlier, another nuclear scientist was found dead in the same forest.
*Between 2009-13*
11 Indian nuclear scientists die unnatural deaths.
The frequency of death is so high that Bombay High Court in 2017 asks Central government to take care of scientists.
*In November 2013*
Two high-ranking engineers, KK Josh and Abhish Shivam, working on India’s first nuclear-powered submarine were found dead on railway tracks by railway workers.
It was widely speculated that they were poisoned and left on tracks to make it look like accident or a suicide.
*October 2013*
The Sunday Guardian published an article on lack of attention paid by the Indian govt to mysterious deaths of India’s top scientists.
In an article titled
‘PMO unconcerned about scientist deaths’,
The author clearly writes –
“What is surprising is inattention of Government of India towards systematic outside effort to slow down India’s march towards nuclear excellence by killing those involved in the process.”
Defense ministry and media tried to cover up all these unnatural deaths.

*2013: US writer Gregory Douglas* writes a book:
“Conversations with The Crow”
Book is based on his conversation with top CIA operative Robert Crowley, nickname “The Crow”
Crow tells that Air India flight 101 was not crashed. it was blown by CIA.
They put bomb in Cargo area of Plane.
The wanted to kill Homi J Bhabha because he could make India Nuclear Super Power and they were uncomfortable with it.
CIA was behind Vikram Sarabhai.

Another writer Brian Harvey mentioned in his book “Russia in Space” that CIA was behind Nambi’s arrest.
Question is, why Govts never conducted proper enquiry of so many deaths and claims made by foreign authors as in the case of *Adani business operations*?
People were asking what is the role of Govt in success of ISRO ?
One of important role of govt is to provide them security because these people were always in hitlist of international spy agencies (Crows) and terrorists.
And Govts failed in past in this role despite past track record of such mysterious accidents.
The issue is not that they didn’t investigate all these “mysterious” deaths
The issue is that they knew, and yet they chose to remain silent.