Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शशि कपूर की धर्मपुत्र फिल्म किसको भला याद नहीं होगी 1961 की सुपरहिट फिल्म, जिसे देख हर व्यक्ति भावुक हो जाता है

इसमें कहानी होती है कि एक मुस्लिम बच्चे को एक हिंदू परिवार गोद लेता है और उसे पालता है। लेकिन जब मुस्लिम परिवार वापस लौटता है

तो वो अपने मुस्लिम बेटे को एक फासीवादी बना पाता है जो मुस्लिमो से बहुत नफरत करता है और उन्हें देश से निकालना चाहता है, यहां तक कि वो हिंसा कर उन्हे मारने को भी अमादा है

बाद में फिल्म की हैप्पी एंडिंग होती है

ये फिल्म यश चोपड़ा की थी, शायद ही आप जानते होंगे कि इसके दो वर्ष पहले 1959 में भी एक फिल्म आई थी धूल का फूल, जो उनके निर्देशन में ही बनी थी

इसमें भी वहीं कहानी थी लेकिन उल्टी थी, अर्थात एक हिंदू बच्चे को मुस्लिम परिवार पालता है, लोकप्रिय गीत “तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है तू इंसान ही बनेगा” इसी फिल्म में थी

नाजायज बच्चे को स्वीकार करने के कारण पूरा समाज अब्दुल को कोसता है फिर भी वो बच्चे को पालता है

बाद में उसके मूल पिता से उसकी अनजान रूप से भेंट होती है जिसका एक और बेटा जो हिंदू है उसका गहरा दोस्त बन जाता है

सब उसे नाजायज कहकर पुकारते है, पूरी फिल्म भावुकता से भरी है

और अंत में उसकी मां उसे पहचान जाती है और बच्चे को ले जाती है।

अब कांसेप्ट को समझे कि हिंदू के साथ मुस्लिम बच्चा रहा तो दंगाई और नफरत करने वाला बन गया, बल्कि वहीं अब्दुल जब पालता है तो वो शांतिदूत होता है और खुद ही पीड़ित और शोषित रहता है

उस समय सेकुलरिज्म की हिलोरे बड़ी चली थी और नेहरू को खुश करने के लिए अधिकतर फिल्मे बनती थी क्योंकि फिर उन्हे मोटी रकम मिलती थी, बड़ी स्क्रीन मिलती थी

आप पाथेर पांचाली फिल्म याद होगा जहां सत्यजीत को स्वयं राज्य सरकार ने फंड किया था

धर्मपुत्र पहली फिल्म थी जिसने हिंदुओ को दंगाई बताने की नींव रखी थी, बल्कि बंटवारे की क्या वास्तविकता थी वो सबको मालूम था

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने स्पष्ट कहा था कि इन्होंने पाकिस्तान को बनाने में सपोर्ट किया था अब एक दिन में ही इनका मन कैसे बदल गया

ये वास्तव में वैचारिक थी क्योंकि जब डायरेक्ट एक्शन डे घोषित हुआ तो हर एक इलाके में सांप्रदायिक दंगे हुए, जो मुस्लिम बहुल इलाके थे उसका हश्र क्या हुआ ये आप पूछो ही मत

फिर भी दंगाई हिंदू था

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

पूर्वांचल में भेड़िया को हुणार कहा जाता है । हुणार शब्द की व्युत्पति हूण शब्द से हुआ है । हूण एक बर्बर जाति थी , जो कि बहुत लड़ाकू थे । वे जिस देश पर आक्रमण करते थे , उस देश का समूल विनाश करके छोड़ते थे । वे उस देश के बच्चों तक को भी जीवित नहीं छोड़ते थे । उन्हें भी मार देते थे । भेड़िया भी बच्चों को उठाकर ले जाते थे । इसलिए पूर्वांचल में भेड़िए हुणार कहे जाने लगे । माताएं रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए कहा करतीं थीं – चुप हो जाओ , बरना हुणार आ जाएगा ।

गाजीपुर जनपद में गाजीपुर बनारस हाइवे के समीप औड़िहार नगर स्थित है । यहीं स्कंद गुप्त ने हूणों का सामना किया था । जब वह हूणों से समर ले रहा था तब उसके पिता कुमार गुप्त मृत्यु शय्या पर थे । दुःखी मनःस्थिति में होते हुए भी स्कंदगुप्त ने हूणों से डटकर लोहा लिया था । वह युद्ध भूमि में जमीन पर सोता था । सेना राजा को अपने बीच पाकर एक नयी ऊर्जा से लवरेज थी । दो लाख की हूण सेना को गाजर मूली की तरह काटकर फेंक दिया था स्क॔दगुप्त की सेना ने । उसके पास चतुरंगिणी सेना थी ।

हूण हार गये थे । इस जगह का नाम ” हूणहार ” रखा गया , जो कालांतर में औड़िहार बना । हूण सेना के बचे खुचे लोगों में से कुछेक स्वदेश लौट गये थे अपनी पराजय की कहानी बताने के लिए । मरे हुए लोगों की कहानी सुनाने के लिए उनकी विधवाओं को । कुछेक यहीं बस गये थे । आज भी राजस्थान , हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर हूण रहते हैं । ये अपना गोत्र हूण रखते हैं । ये हूण यहाँ की संस्कृति में रच बस गये हैं ।

जीत के बाद स्कंदगुप्त ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी । उसने औड़िहार ( हूणहार ) के नजदीक स्थित सैदपुर भीतरी गाँव के पास एक विजय स्तम्भ बनवाया । उसने इस स्तम्भ पर अपनी विजय गाथा लिखवाई थी । सैदपुर भीतरी गाँव को अपने आराध्य देव को अर्पण किया था ।।

( मान्यताओं पर आधारित )

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📷 राहुल सिंह