Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

मुड़बद्री पर राज करने वाली रानी #अबक्का_चोटा जिस पर हमे गर्व होना चाहिए 🙏🏻🥁🙏

साल था 1555 जब पुर्तगाली सेना कालीकट, बीजापुर, दमन, मुंबई जीतते हुए गोवा को अपना हेडक्वार्टर बना चुकी थी। टक्कर में कोई ना पाकर उन्होंने पुराने कपिलेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर उस पर चर्च स्थापित कर डाली।

मंगलौर का व्यवसायिक बंदरगाह अब उनका अगला निशाना था। उनकी बदकिस्मती थी कि वहाँ से सिर्फ 14 किलोमीटर पर ‘उल्लाल’ राज्य था जहां की शासक थी 30 साल की रानी ‘अबक्का चौटा’ (Abbakka Chowta).।

पुर्तगालियों ने रानी को हल्के में लेते हुए केवल कुछ सैनिक उसे पकडने भेजा। लेकिन उनमेंसे कोई वापस नहीं लौटा। क्रोधित पुर्तगालियों ने अब एडमिरल ‘डॉम अल्वेरो ड-सिलवीरा’ (Dom Álvaro da Silveira) के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी। शीघ्र ही जख्मी एडमिरल खाली हाथ वापस आ गया। इसके बाद पुर्तगालियों की तीसरी कोशिश भी बेकार साबित हुई।

चौथी बार में पुर्तगाल सेना ने मंगलौर बंदरगाह जीत लिया। सोच थी कि यहाँ से रानी का किला जीतना आसान होगा, और फिर उन्होंने यही किया। जनरल ‘जाओ पिक्सीटो’ (João Peixoto) बड़ी सेना के साथ उल्लाल जीतकर रानी को पकड़ने निकला।

लेकिन यह क्या..?? किला खाली था और रानी का कहीं अता-पता भी ना था। पुर्तगाली सेना हर्षोल्लास से बिना लड़े किला फतह समझ बैठी। वे जश्न में डूबे थे कि रानी अबक्का अपने चुनिंदा 200 जवान के साथ उनपर भूखे शेरो की भांति टूट पड़ी।

बिना लड़े जनरल व अधिकतर पुर्तगाली मारे गए। बाकी ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसी रात रानी अबक्का ने मंगलौर पोर्ट पर हमला कर दिया जिसमें उसने पुर्तगाली चीफ को मारकर पोर्ट को मुक्त करा लिया।

अब आप अन्त जानने में उत्सुक होंगे..??

रानी अबक्का के देशद्रोही पति ने पुर्तगालियों से धन लेकर उसे पकड़वा दिया और जेल में रानी विद्रोह के दौरान मारी गई।

क्या आपने इस वीर रानी अबक्का चौटा के बारे में पहले कभी सुना या पढ़ा है..??
इस रानी के बारे में जो चार दशकों तक विदेशी आततायियों से वीरता के साथ लड़ती रही, हमारी पाठ्यपुस्तकें चुप हैं। अगर यही रानी अबक्का योरोप या अमेरिका में पैदा हुई होती तो उस पर पूरी की पूरी किताबें लिखी गई होती।

इस कहानी से दो बातें साफ हैं..

हमें हमारे गौरवपूर्ण इतिहास से जानबूझ कर वन्चित रखा गया है। मैं भी रानी अबक्का चौटा के बारे में उस समय ही जान पाया जब मैं कर्नाटक की कहानी पढ़ रहा था, व हमारी 1000 साल की दासता अपने ही देशवासियों (भितरघातियों) के विश्वासघात का नतीजा है। दुर्भाग्य से यह आज भी यथावत है..🙏😢

साभार :- विद्रोहिणी आर्या जी की वॉल से..🙏🙏🚩

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“जैसे को तैसा” रणनीति पर लड़ा गया वो युद्ध…

#बाबर 1530 ई में ऊपर जा चुका था… बेटा #हुमायूँ भारत में मुग़ल सल्तनत मजबूत के लिए अफगानों से जूझ रहा था! उधर बाबर का दूसरा बेटा गजनी, लाहौर का शासक कामरान भी #हिंदुस्थान पर गिद्धदृष्टि गढ़ाए हुए था।

उसके हुमायूँ के गिरेबां तक पहुँच बनाने में #राजपुताना के राजपूत सबसे बड़ी बाधा थे, इसलिए कामरान को पहले उनको रास्ते से हटाना जरूरी लगा।

तब बीकानेर और आसपास के विशाल जांगल प्रदेश पर प्रबल पराक्रमी राठौड़ राजा #रावजैतसी की सत्ता थी…कामरान ने राव जैतसी को संदेश भेजा, “तत्काल हथियार डालो, दस करोड़ रुपए दो और एक राजकन्या भी”…यह सुन जैतसी का खून ख़ौल गया। जैतसी ने भी कामरान के वध और युद्ध की घोषणा करते हुए दूत को खाली हाथ लौटा दिया।

जवाब में बौखलाया कामरान एक हज़ार अमीरों के साथ… बाबर से भी दोगुनी, अत्याधुनिक हथियारों और तोपखाने से सुसज्जित सेना लेकर जांगल प्रदेश पर चढ़ आया! सतुलज पार कर उसने बिजली की गति से भटनेर को घेर लिया…रास्ते में कई कस्बों को रौंदते आई #कामरान की तोपों के आगे भटनेर का किला टिक न सका… गढ़ में जौहर हुआ और पुरुष योद्धा रणभूमि में मारकाट के बाद साका कर बलिदान हो गए।

जीत से उत्साहित कामरान का रक्तपिपासु टिड्डिदल #बीकानेर की ओर बढ़ा…जैतसी ने चतुराई से काम लेते हुए अधिकतर प्रजा को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया और स्वयं भी मुख्य सेना सहित सौभाग्यदीप दुर्ग से गुप्त स्थानों पर चले गए।
कामरान की तोपों का मुंह अब सौभाग्यदीप दुर्ग की ओर था… भीषण युद्ध हुआ, जैतसी के प्रधानमंत्री सद्धहारण समेत सैकड़ों राजपूत काम आए, और इस दुर्ग पर कामरान काबिज होने में सफल रहा।

#इस्लामी लश्कर जल्दी ही रंग दिखाने लगा…हजारों स्त्रियों-बच्चों को बंधक बना लिया गया। उसकी लूट और जुल्मों की दास्तान सुन राव जैतसी ने गुजरात, मुल्तान, मालवा आदि तक के राजाओं को युद्ध मे साथ आने का निमंत्रण भेजा। किसी ने इंकार नहीं किया। सब आ पहुँचे…जैतसी के पास अब सेना की 108 टुकड़ियां और उनके 108 सेनापति थे, पर जैतसी के मस्तिष्क में कुछ ओर ही चल रहा था! उन्हें हर हाल में विजय चाहिए थी, सो कुटिल इस्लामी रणनीति से हमलावरों को सबक सिखाने का निर्णय लिया गया।

जैतसी ने रात्रि युद्ध का विकल्प चुना… हज़ारों पशुओं के सींगों पर और ऊंटों की पीठ पर मशालें व नगाड़े बांध दसों दिशाओं से उन्हें कामरान पर हांक दिया गया। विशेष प्रकार की #व्यूहरचना बना बिजली की गति से अंधेरे में ऐसा भीषण आक्रमण किया गया कि कामरान की सेना भौचक्की रह गई, जलती मशालों, हज़ारों पशुओं और हज़ारों #राजपूतों की हुंकारों से खुद को घिरा देख मुग़लों में भगदड़ मच गई! कामरान का शिरस्त्राण गिर गया, पर भागने की जल्दी में उसने उसे उठाने का प्रयास तक न किया…राजपूत विजयी रहे और कामरान की सेना उल्टे पांव भाग निकली।

रोचक बात…26 अक्टूबर 1534 को हुए “राती घाटी” के इस युद्ध युद्धघोष “हर हर महादेव” नहीं बल्कि “राम राम” था…और दुर्भाग्य की बात जिस राव जैतसी ने सभी राजाओं को एकजुट किया, मलेच्छों को भगाया… उसी राव जैतसी को अपने पड़ौसी राजा #जोधपुर के राव मालदेव के हाथों कुछ वर्षों बाद 1541ई. में अपनी जान और राज्य गंवाना पड़ी…

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“जैसे को तैसा” रणनीति पर लड़ा गया वो युद्ध…

#बाबर 1530 ई में ऊपर जा चुका था… बेटा #हुमायूँ भारत में मुग़ल सल्तनत मजबूत के लिए अफगानों से जूझ रहा था! उधर बाबर का दूसरा बेटा गजनी, लाहौर का शासक कामरान भी #हिंदुस्थान पर गिद्धदृष्टि गढ़ाए हुए था।

उसके हुमायूँ के गिरेबां तक पहुँच बनाने में #राजपुताना के राजपूत सबसे बड़ी बाधा थे, इसलिए कामरान को पहले उनको रास्ते से हटाना जरूरी लगा।

तब बीकानेर और आसपास के विशाल जांगल प्रदेश पर प्रबल पराक्रमी राठौड़ राजा #रावजैतसी की सत्ता थी…कामरान ने राव जैतसी को संदेश भेजा, “तत्काल हथियार डालो, दस करोड़ रुपए दो और एक राजकन्या भी”…यह सुन जैतसी का खून ख़ौल गया। जैतसी ने भी कामरान के वध और युद्ध की घोषणा करते हुए दूत को खाली हाथ लौटा दिया।

जवाब में बौखलाया कामरान एक हज़ार अमीरों के साथ… बाबर से भी दोगुनी, अत्याधुनिक हथियारों और तोपखाने से सुसज्जित सेना लेकर जांगल प्रदेश पर चढ़ आया! सतुलज पार कर उसने बिजली की गति से भटनेर को घेर लिया…रास्ते में कई कस्बों को रौंदते आई #कामरान की तोपों के आगे भटनेर का किला टिक न सका… गढ़ में जौहर हुआ और पुरुष योद्धा रणभूमि में मारकाट के बाद साका कर बलिदान हो गए।

जीत से उत्साहित कामरान का रक्तपिपासु टिड्डिदल #बीकानेर की ओर बढ़ा…जैतसी ने चतुराई से काम लेते हुए अधिकतर प्रजा को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया और स्वयं भी मुख्य सेना सहित सौभाग्यदीप दुर्ग से गुप्त स्थानों पर चले गए।
कामरान की तोपों का मुंह अब सौभाग्यदीप दुर्ग की ओर था… भीषण युद्ध हुआ, जैतसी के प्रधानमंत्री सद्धहारण समेत सैकड़ों राजपूत काम आए, और इस दुर्ग पर कामरान काबिज होने में सफल रहा।

#इस्लामी लश्कर जल्दी ही रंग दिखाने लगा…हजारों स्त्रियों-बच्चों को बंधक बना लिया गया। उसकी लूट और जुल्मों की दास्तान सुन राव जैतसी ने गुजरात, मुल्तान, मालवा आदि तक के राजाओं को युद्ध मे साथ आने का निमंत्रण भेजा। किसी ने इंकार नहीं किया। सब आ पहुँचे…जैतसी के पास अब सेना की 108 टुकड़ियां और उनके 108 सेनापति थे, पर जैतसी के मस्तिष्क में कुछ ओर ही चल रहा था! उन्हें हर हाल में विजय चाहिए थी, सो कुटिल इस्लामी रणनीति से हमलावरों को सबक सिखाने का निर्णय लिया गया।

जैतसी ने रात्रि युद्ध का विकल्प चुना… हज़ारों पशुओं के सींगों पर और ऊंटों की पीठ पर मशालें व नगाड़े बांध दसों दिशाओं से उन्हें कामरान पर हांक दिया गया। विशेष प्रकार की #व्यूहरचना बना बिजली की गति से अंधेरे में ऐसा भीषण आक्रमण किया गया कि कामरान की सेना भौचक्की रह गई, जलती मशालों, हज़ारों पशुओं और हज़ारों #राजपूतों की हुंकारों से खुद को घिरा देख मुग़लों में भगदड़ मच गई! कामरान का शिरस्त्राण गिर गया, पर भागने की जल्दी में उसने उसे उठाने का प्रयास तक न किया…राजपूत विजयी रहे और कामरान की सेना उल्टे पांव भाग निकली।

रोचक बात…26 अक्टूबर 1534 को हुए “राती घाटी” के इस युद्ध युद्धघोष “हर हर महादेव” नहीं बल्कि “राम राम” था…और दुर्भाग्य की बात जिस राव जैतसी ने सभी राजाओं को एकजुट किया, मलेच्छों को भगाया… उसी राव जैतसी को अपने पड़ौसी राजा #जोधपुर के राव मालदेव के हाथों कुछ वर्षों बाद 1541ई. में अपनी जान और राज्य गंवाना पड़ी…