Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

#रामप्पा_मंदिर, #तेलंगाना

यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर है जिसका नाम भगवान के नाम पर ना होकर उसके शिल्पी के नाम पर है . . .

कई शक्तिशाली भूकंपों के बाद भी इस मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा तब विशेषज्ञों ने इसकी जाँच शुरू की और अंततः इस मंदिर के एक पत्थर को तोड़कर पानी में डाला तो वह पानी पर तैरने लगा । बाद में पता चला कि ऐसे हल्के पत्थरो से बने होने के कारण ही इस मंदिर को क्षति नहीं पहुँचती । अब सवाल है कि जब दुनियाँ में इस तरह के पत्थर कहीं नहीं मिलते तो क्या रामप्पा ने ही 800 साल पहले ये पत्थर खुद बनाये ?

है ना आश्चर्य ?
जय सनातन 🙏
– Manish Thadani

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

*जापान को याद है, लेकिन भारत भूल गया।*

वह दिन था 12 नवंबर, 1948। टोक्यो के बाहरी इलाके में एक विशाल बगीचेवाले घर में टोक्यो ट्रायल चल रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हारने के बाद, जापान के तत्कालीन प्रधान मंत्री तोजो सहित पचपन जापानी युद्धबन्दी यों का मुकदमा चालू है …

इनमें से अट्ठाईस लोगों की पहचान क्लास-ए (शांतिभंग का अपराध) युद्ध अपराधियों के रूप में की गई है। यदि सिद्ध ह़ो जाता है, तो एकमात्र सजा “मृत्युदण्ड” है।

दुनिया भर के ग्यारह अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधीश …… “दोषी” की घोषणा कर रहे हैं …. “दोषी” …… “दोषी” ……… अचानक एक गर्जना, “दोषी नहीं! “

दालान में एक सन्नाटा छा गया। यह अकेला असंतुष्ट कौन है ?

उनका नाम था राधा बिनोद पाल भारत से एक न्यायाधीश थे !

1886 में पूर्वी बंगाल के कुंभ में उनका जन्म हुआ। उनकी माँ ने अपने घर और गाय की देखभाल करके जीवन यापन किया। बालक राधाविनोद गांव के प्राथमिक विद्यालय के पास ही गाय को चराने ले जाता था।

जब शिक्षक स्कूल में पढ़ाते थे, तो राधा बाहर से सुनता था। एक दिन स्कूल इंस्पेक्टर शहर से स्कूल का दौरा करने आये। उन्होंने कक्षा में प्रवेश करने के बाद छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे। सब बच्चें चुप थे। राधा ने कक्षा की खिड़की के बाहर से कहा …. “मुझे आपके सभी सवालों का जवाब पता है।” और उसने एक-एक कर सभी सवालों के जवाब दिए। इंस्पेक्टर ने कहा … “अद्भुत! .. आप किस कक्षा में पढ़ते हो ?”

जवाब आया, “… मैं नहीं पढ़ता … मैं यहां एक गाय को चराता हूं।”

जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। मुख्याध्यापक को बुलाकर, स्कूल निरीक्षक ने लड़के को स्कूल में प्रवेश लेने के साथ-साथ कुछ छात्रवृत्ति प्रदान करने का निर्देश दिया।

इस तरह राधा बिनोद पाल की शिक्षा शुरू हुई। फिर जिले में सबसे अधिक अंकों के साथ स्कूल फाइनल पास करने के बाद, उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज में भर्ती कराया गया। M. Sc.गणित होने के बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से, उन्होंने फिर से कानून का अध्ययन किया और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। दो चीजों के विपरीत चुनने के संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, “कानून और गणित सब के बाद इतने अलग नहीं हैं।”

फिर से वापस आ रहा है… अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय टोक्यो।

बाकी न्यायाधीशों के प्रति अपने ठोस तर्क में उन्होंने संकेत दिया कि मित्र राष्ट्रों (WWII के विजेता) ने भी संयम और अंतरर्राष्ट्रीय कानून की तटस्थता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों को अनदेखा करने के अलावा, उन्होंने परमाणु बमबारी का उपयोग कर लाखों निर्दोष लोगों को मार डाला।

राधा बिनोद पाल द्वारा बारह सौ बत्तीस पृष्ठों पर लिखे गए तर्क को देखकर न्यायाधीशों को क्लास-ए से बी तक के कई अभियुक्तों को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। इन क्लास-बी युद्ध अपराधियों को एक निश्चित मौत की सजा से बचाया गया था। अंतर्राष्ट्रीय अदालत में उनके फैसले ने उन्हें और भारत को विश्व प्रसिद्ध प्रतिष्ठा दिलाई।

जापान इस महान व्यक्ति का सम्मान करता है। 1966 में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान *’कोक्को कुनासाओ’* से सम्मानित किया। टोक्यो और क्योटो में दो व्यस्त सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। उनके निर्णय को कानूनी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा लगाई गई है। 2007 में, प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने दिल्ली में उनके परिवार के सदस्यों से मिलने की इच्छा व्यक्त की और वे उनके बेटे से मिले।

डॉ. राधा बिनोद पाल (27 जनवरी 1886 – 10 जनवरी 1967) का नाम जापान के इतिहास में याद किया जाता है। जापान के टोक्यो में, उनके नाम एक संग्रहालय और यासुकुनी मंदिर में एक मूर्ति है।

उनके नाम पर जापान विश्वविद्यालय का एक शोध केंद्र है। जापानी युद्ध अपराधियों पर उनके फैसले के कारण, चीनी लोग उनसे नफरत करते हैं।

वे कानून से संबंधित कई पुस्तकों के लेखक हैं। भारत में, लगभग कोई भी उन्हें नहीं जानता है और शायद उनके पड़ोसी भी उन्हें नहीं जानते हैं! इरफान खान अभिनीत टोक्यो ट्रायल्स पर एक हिंदी फिल्म बनाई गई थी, लेकिन उस फिल्म ने कभी सुर्खियां नहीं बटोरीं।

…. बहुत सारे अंडररेटेड और अज्ञात भारतीयों में से एक।

🇮🇳

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*बाज ही क्यों ?* 🐔🐔🐔
गुरु गोबिन्द सिंह जी जो भी करते थे उसके पीछे कौम के लिये कोई सन्देश जरूर होता था | इसके पीछे भी था :
1- बाज को कभी गुलाम नहीं रख सकते या तो वो पिंजरा तोड देगा या मर जायगा लेकिन गुलाम नहीं रहेगा।
2- बाज कभी किसी दूसरे का किया हुआ शिकार नहीं खाता।
3- बाज बहुत ऊपर उडता है लेकिन इतना ऊपर उडने के बाद भी उसकी नजर हमेशा जमीन पर ही होती है।
4- बाज अपनी सारी जिंदगी (लगभग 100 साल की) कभी अपने पास आलस्य नहीं आने देता।
5- बाज कभी अपना घर या घोंसला नही बनाता | 18वीं सदी में सिक्ख भी ऐसा ही करते थे।
6- बाज दूसरे पंछियो के समान हवा के साथ नहीं उडता बल्कि हवा के विपरीत दिशा में उडता है।
*गुरु साहिब की सोच को शत शत प्रणाम।*

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पूरी पोस्ट पढ़ें…
#मुस्लिम_इतिहासकार ऐसा लिखते है कि इस्लाम द्वारा भारत विजय का प्रारंभ मुहम्मद बिन कासिम के 712 AD में सिंध पर आक्रमण से हुआ और महमूद गजनवी के आक्रमणों से स्थापित, तथा मुहम्मद गौरी के द्वारा दिल्ली के प्रथ्वीराज चौहान को 1O92 A.D. में हराने से पूर्ण हुआ !
फिर दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंश के सुल्तान और मुग़ल बादशाह हिंदुस्तान के शासक बताये गए !
यह इतिहास का पूरा सच नहीं हैं ,सच यह है कि य़ह 1200 वर्षोँ तक चलने वाला राजपूत मुस्लिम युद्ध था ! जिसमे शुरू के 500 वर्षो में स्लामिक आक्रान्ताओ को राजपूतो ने भारत मे घुसने तक नही दिया था. और बाद के 700 वर्ष में राजपूत और स्लामिक संघर्ष चरम पर रहा, जिसमे अंतिम विजय मराठा साम्राज्य, राजपूत और सिख साम्राज्य के रूप में हुयी और अब सच की विवेचना के लिए इनके बारे में कुछ तथ्य !
मुहम्मद बिन कासिम 712 AD में जब वह सिंध के राजा दाहिर को हराकर आगे बढ़ा उसे गहलोत वंश के राजा कालभोज ने बुरी तरह हराकर वापस भेजा !
अब अगले 250 वर्ष तक मुस्लिम प्रयास तो बहुत हुए पर पीछे धकेल दिए गए इस बीच भारत में राजपूत राज्य ही प्रभावी रहे !
1000 AD से महमूद गजनवी के कथित सत्रह आक्रमणों में पांच हारे, और पांच मन्दिरों की लूट की,
सबसे महत्वपूर्ण सोमनाथ की लूट की दौलत भी गजनी तक वापस नहीं ले जा पाया, जिसे सिन्ध मे लूट लिया गया था वह कही भी सत्ता स्थापित नहीं कर पाया !
इसके बाद अगले 150 वर्ष तक फिर कोई मुसलमान राजपूत सत्ता को चुनौती देने को नहीं आया और भारत में राजपूत राज्य प्रभावी बने रहे !
1178 में मुहम्मद गौरी का गुजरात पर आक्रमण हुआ, चालुक्य राजा ने गौरी को बुरी तरह हराया !इसके बाद 1191 में पृथ्वीराज ने भी गौरी को वुरी तरह हराया ! और जान की भीख दी.
1192 में गौरी ने पृथ्वीराज को हराया फिर गौरी ने पंजाब, सिंध, दिल्ली, और कन्नौज जीते !
पर ये विजयें अस्थायी रहीं क्योंकि वह 1206 में सिंध के खक्खरों के साथ युद्ध में गौरी मार डाला गया !
उसके बाद सत्ता में आया कुतुबुद्दीन ऐबक भी 1210 में लाहौर में ही मर गया और गौरी का जीता हुआ क्षेत्र बिखर गया !
उसके बाद इल्तुतमिश ने अजमेर, रणथम्मौर, ग्वालियर कालिंजर और महोबा जीते !
मगर कुछ समय में ही कालिंजर चंदेलों ने, ग्वालियर को प्रतिहारों ने, बूंदी को चौहानो ने मालवा को परमारों ने वापस ले लिया, रणथम्मौर, मथुरा पर राजपूत कब्ज़ा कर चुके थे !
गहलोत वंशी जैत्र सिंह ने इल्तुतमिश से चित्तौड़ वापस ले लिया इस प्रकार सत्ता राजपूतों के हाथ में ही रही थी !
उसके बाद बलबन ने राज्य बिखराव और राजपूत ज्वार रोकने में असफल रहा और सल्तनत सिमटकर दिल्ली के आसपास रह गयी थी !
गुलाम वंश को हटाकर खिलजी वंश आया, इस वंश के अलाउद्दीन खिलजी ने 1298 में गुजरात और 1303 मे चित्तौड़ जीत लिया !
पर 1316 में राजपूतों ने युद्ध कर पुनः चित्तौड़ वापस जीत लिया, रणथम्मौर में भी खिलजी को हार का मुंह देखना पड़ा था !
खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने देवगिरी, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुराई पर अभियान किया और जीता !
पर उसके वापस जाते ही इन राजाओं ने अपने को स्वतत्र घोषित कर दिया !
1316 में खिलजी के मरने के बाद उसका राज्य ध्वस्त हो गया !
इसके बाद तुगलक वंश आया 1325 में मुहम्मद तुगलक ने देवगिरी और काम्पिली राज्य पर विजय और द्वारसमुद्र और मदुराई को शासन के अन्तर्गत लाया ! राजधानी दिल्ली से हटाकर देवगिरी ले गया !
पर मेवाड़ के महाराणा हम्मीर सिंह ने मुहम्मद तुगलक को बुरी तरह हराया और कैद कर लिया था !
फिर अजमेर, रणथम्मौर और नागौर पर आधिपत्य के साथ 50 लाख रुपये देने पर छोड़ा जिससे तुगलक राज्य दिल्ली तक सीमित रह गया और 1399 में तैमूर के आक्रमण से तुगलक राज्य पूरी तरह बिखर गया !
मुहम्मद तुगलक पर विजय के उपलक्ष्य में हम्मीर ने “महाराणा“ की उपाधि धारण की !
उसके बाद महाराणा कुम्भा द्वारा गुजरात के राजा कुतुबुद्दीन और मालवा के सुल्तान पर विजय प्राप्त की.
इन विजयों के उपलक्ष्य में चित्तौड़ गढ़ मे विजय स्तम्भ और पूरे राजस्थान में 32 किले भी बनवाये !
महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) ने अपने शुरू के शासनकाल में मालवा के शासक को पराजित कर बंदी बनाया और छह महीने बाद छोड़ा !
1519 में इब्राहीम लोदी को भी बुरी तरह हराया !
इस प्रकार महाराणा हम्मीर से राणा सांगा तक 1326 से 1527 (200 वर्ष तक) उत्तर भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राजपूत साम्राज्य छा रहा था और इन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं था !
इसी बीच दक्षिण में विजय नगर साम्राज्य क्षत्रिय शक्ति के रूप में केन्द्रित हो चूका था और कृष्ण देव राय (1505-1530) के समय चरम उत्कर्ष पर था और उड़ीसा ने भी क्षत्रिय स्वातंत्र्य पा लिया था !
तुगलकों के बाद सैयद वंश 1414 से 1451 तक और लोदी वंश 1451 से 1526 तक रहा जो दिल्ली के आस पास तक ही रह गया था !
इसके बाद फिर दोवारा इब्राहीम लोदी को राणा सांगा ने हराया !
प्रमुख इतिहासकार आर सी मजूमदार लिखते है कि दिल्ली सल्तनत अलाउद्दीन खिलजी राज्य के 20 साल (1300-1320)और
मुहम्मद तुगलक के 10 साल इन दो समय को छोड़कर भारत पर तुर्की का कोई साम्राज्य नहीं रहा था !
फिर मुग़ल वंश आया मुग़ल बाबर ने कुछ विजयें अपने नाम की पर कोई स्थायी साम्राज्य बनाने में असफल रहा, इसी दौर में मेवाड़ के राणा सांगा ने बयाना के युद्ध मे बाबर को धूल चटाई….उसके बाद उसका बेटा हुमायु भी शेरशाह से हार कर भारत से बाहर भाग गया था !
शेर शाह (1540-1545) तक रणथम्मौर और अजमेर को जीता पर कालिंजर युद्ध के दौरान उसकी मौत हो गयी और उसका राज्य अस्थायी ही रहा !
फिर एक बार राजपूत राज्य सगठित हुए और दिल्ली की गद्दी पर राजा हेम चन्द्र ने 1556 में विक्रमादित्य की उपाधि धारण की !
1556 में ही अकबर ने हेमचन्द्र (हेमू ) को हराकर मुग़ल साम्राज्य का स्थायी राज्य स्थापित किया जो 150 वर्ष तक चला जिसमे सभी दिशाओं राज्य विस्तार हुआ ! लेकिन इस दौर मेवाड़ ऐसा राज्य था जो अकबर के अधीन नही था, हल्दीघाटी और दिवेर में अकबर की सेना को मुंह की खानी पड़ी…..
इस काल के अधिकांश विजयें राजपूत सेनापतियों और उनकी सेनाओं द्वारा हासिल की गयीं जिनका श्रेय अकबर ने अकेले लिया !
अकबर ने इस्लामिक कट्टरता छोड़ राजपूतों की शक्ति को समझा और उन्हें सहयोगी बनाया !
जहाँगीर और शाहजहाँ के समय तक यही नीति चली, इन 100 वर्षों में मुसलमानों और राजपूत का संयुक्त और राजपूत शक्ति पर आश्रित राज्य था इस्लामी राज्य नहीं |
पूरे मुग़ल राज्य के बीच भी मेवाड़ में राजपूतों की सत्ता कायम रही !
औरंगजेब ने जैसे ही अकबर की नीतियों के विपरीत इस्लामी नीतियां लागू करनी आरम्भ की राजपूतों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया !
उधर शिवाजी ने मुग़ल साम्राज्य के खिलाफ विगुल बजा दिया और 1707 तक मुग़ल राज्य का समापन हो गया उसके बाद के दिल्ली के बादशाह दयनीय स्थिति में कभी राजपूतों के, कभी अंग्रेजों के आश्रित रहे !
1674 से 1818 तक मराठा साम्राज्य भारत में बढ़ता व घटता रहा….
राजस्थान में राजपूत राज्य और पंजाब में सिख साम्राज्य राज्य के रूप में विजयी हुए |
इन शक्तियों के द्वारा मुस्लिम सत्ता की पूर्ण पराजय और अंत हुआ !
इस पूरे विषम काल मे राजपूतों ने 712 ईसवी से ,बप्पा रावल के रूप से संघर्ष शुरू किया और 1000 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद 1600ईसवी में महाराणा प्रताप तक रक्तसंचित संघर्ष किया…1600 के बाद मराठा,सिख, व और साम्रज्यों की नींव पड़ी….जिन्होंने भी इस्लामिक शक्तियों से लोहा लिया……
इस प्रकार जिसे मुस्लिम साम्राज्य कहा जाता है वह वस्तुतः राजपूत राजाओं और मुसलमान आक्रमण कारियों के बीच एक लम्बे समय (1200 वर्ष) तक चलने वाला युद्ध था कुछ लड़ाइयाँ राजपूत हारे, कुछ में हराया और अंतिम जीत राजपूतों की ही रही !!!!

#राजन्य_क्रॉनिकल्स_टीम